पेंतिकुस्त – मददगार क़ुववत देने और रहनुमाई करने आता है

सूरा अल – बलद सूरा 90 – शहर) एक चौड़े शहर का हवाला देता है और गवाही देता है और सूरा अन नसर (सूरा 110 – इलाही मदद) लोगों की भीड़ का रो’या पेश करता है जो खुदा की सच्ची इबादत के लिए आ रहे हैं ।     

मुझे इस शहर (मक्का) की कसम और तुम इसी शहर में तो रहते हो।

सूरा अल – बलद 90: 1-2

ऐ रसूल जब ख़ुदा की मदद आ पहुचेंगी और फतेह (मक्का) हो जाएगी और तुम लोगों को देखोगे कि गोल के गोल ख़ुदा के दीन में दाखि़ल हो रहे हैं तो तुम अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करना और उसी से मग़फे़रत की दुआ माँगना वह बेशक बड़ा माफ़ करने वाला है।

सूरा अन – नसर 110: 1-3

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत के ठीक 50 दिन बाद सूरह अल बलद में रोया दिखाया गया और सूरा अन – नसर में वह वाक़े हुआ । शहर येरूशलेम था, और ईसा अल मसीह के शागिर्द आज़ाद लोग थे जो उस शहर के लिए गवाह थे, मगर वह ख़ुदावंद की रूह थी जो उस शहर में भीड़ के बीचों बीच हरकत कर रही थी जो कि जश्न का, हमद ओ सितायश का और इक़रारे गुनाह और मुआफ़ी का सबब बना था । उस दिन का जो तजरूबा था उसे आज भी तजुरबा किया जा सकता है । इसे हम तब सीखते हैं जब हम तारीख़ की बे मिसल दिन को समझ लेंगे ।    

नबी हज़रत ईसा अल मसीह फ़सह के दिन मसलूब हुए थे और उसी हफ़ते इतवार के दिन मुरदों में से ज़िंदा हुए थे । मौत पर इस फ़तह के साथ अब वह हर किसी को जिंदगी का इनाम पेश करता है जो उसको अपना शख़्सी ख़ुदावंद और मुनजी कर के क़बूल करता है । नबी हज़रत ईसा अल मसीह 40 दिन अपने शागिर्दों के साथ रहे थे ताकि उन्हें यक़ीन होजाए कि वह मुरदों में से जी उठे हैं फिर उसके बाद वह आसमान पर सऊद फ़रमा गए । मगर इस से पहले कि वह सऊद फ़रमाए उनहों ने यह हिदायतें अपने शागिर्दों को दीं ।          

19 इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो।
20 और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं॥

मत्ती 28:19-20

उनहों ने उनके साथ हमेशा तक रहने का वायदा किया इसके बावजूद भी वह कुछ देर बाद उन्हें छोड़ कर आसमान पर सऊद फ़रमा गए । उनके सऊद फ़रमाने के बाद वह अभी भी उनके साथ कैसे साथ रह सकते थे और हमारे साथ कैसे रह सकते हैं ?

इसका जवाब कुछ दिन बाद हुए वाक़िये से हासिल होता है । उन्की गिरफ़्तारी से कुछ ही देर पहले शाम के खाने पर उनहों ने मददगार के आने का वायदा किया था । उनके जी उठने के पचास दिन बाद (उनके सऊद फ़रमाने के 10 दिन बाद) यह वायदा पूरा हुआ था । यह दिन पेनतिकुस्त का दिन कहलाता है या पेनतिकुस्त इतवार कहलाता है । उस दिन बड़े शानदार तरीक़े से जशन मनाया जाता है । यह सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उस दिन क्या हुआ था बल्कि कब और क्यूँ वाक़े हुआ जो  अल्लाह के निशान को ज़ाहिर करता है, और आप के लिए एक ज़बरदस्त इनाम है ।      

पेनतिकुस्त  के दिन क्या हुआ था

मुकम्मल वाक़ियात का ज़िक्र बाइबल के आमाल की किताब के दूसरे बाब में पाया जाता है । उस दिन खुदा का रूहुल क़ुद्दूस नबी हज़रत ईसा अल मसीह के पहले शागिरदों पर नाज़िल हुआ था और वह ऊंची आवाज़ में दुनया के कई मुख़तलिफ़ ज़ुबानों में बोलना शुरू कर दिया था । (मतलब यह कि वह दूसरी दूसरी ज़ुबानों में येसू की मनादी करने लगे थे) । इस वाक़िये ने एक ऐसा माहोल और हलचल पैदा कर दिया था कि हज़ारों लोग जो उस वक़्त येरूशलेम में मौजूद थे बाहर आ गए और उस जगह पर जमा होगाए यह देखने के लिए कि क्या हो रहा था । जहां भीड़ जमा होगयी थी वहाँ पतरस ने खड़े होकर पहली बार इनजील की मनादी की और ‘3000 लोग उसके पैगाम को क़बूल करके ईमान ले आए और उनमें शामिल हो गए’ (आमाल 2:41) । इंजील के पीछे चलने वालों की तादाद उस पेनतिकुस्त की इतवार से लेकर आज तक बढ़ती ही जा रही है ।

पेंतिकुस्त का यह खुलासा पूरा नहीं है । इसलिए कि नबियों की दीगर वाक़ियात की तरह ही पेंतिकुस्त का वाक़िया भी उसी दिन एक तेहवार की तरह हुआ था जो तौरात शरीफ़ के साथ नबी हज़रत मूसा के साथ शुरू हुआ था ।

मूसा  की तौरात से पेंतिकुस्त

हज़रत मूसा जो 1500 कबल मसीह में थे उनहों ने कई एक तेहवारें क़ायम कि पूरे साल भर में मनाई जाए । फ़सह यहूदी केलंडर का पहला ईद था । नबी हज़रत ईसा को फ़सह के दिन ईद पर सलीब दी गई थी । फ़सह के बररों की कुरबानियों का ऐन वक़्त उनकी मौत का वक़्त जो हमारे लिए निशानी है

दूसरी ईद पहले फलों की ईद थी और हम ने देखा था कि किस तरह नबी हज़रत ईसा अल मसीह इस ईद के दिन मुरदों में से जी उठे थे । जबकि उन की क़यामत पहले फलों की ईद के मोक़े पर हुई तो यह हमारे लिए एक वायदा था कि उन सब के लिए जो ईसा अल मसीह पर ईमान लाते वह मरने के बाद उनही की तरह जी उठेंगे । उनका मुरदों में से जी उठना पहला फल था जिस बतोर ईद के नाम की नबुवत हुई थी ।

ठीक इसी तरह पहले फलों की ईद जो इतवार को तौरात के मुताबिक़ यहूदियों को पेंतिकुस्त का ईद मनाने की ज़रूरत थी । (पेंती 50 के लिए कहा गया है) इससे पहले यह हफ़तों की ईद से जाना जाता था जिसमें सात हफ्तों का हिसाब लगाया जाता था । यहूदी लोग लगभग 1500 सालों से नबी हज़रत ईसा अल मसीह तक हफ़्तों की ईद के नाम से मना रहे थे । यही सबब था कि तमाम दुनया से यहूदी लोग मौजूद थे कि उस दिन पतरस के पैगाम को सुनें और उसी दिन जो येरूशलेम में रुहुल कुदुस नाज़िल हुआ था वह सही और साफ़ तोर पर था इसलिए कि उन्हे तौरात के पेनतिकुस्त की ईद को मनाना ज़रूरी था । आज भी यहूदी लोग पेनतिकुस्त को मनाना जारी रखे हुए हैं मगर इसका नाम उन्हों ने बदल दी है । वह इसे शावोत कहते हैं ।               

हम तौरात में पढ़ते हैं कि किस तरह हफ़्तों की ईद को मनाया जाना ज़रूरी था :

16 सातवें विश्रामदिन के दूसरे दिन तक पचास दिन गिनना, और पचासवें दिन यहोवा के लिये नया अन्नबलि चढ़ाना।
17 तुम अपने घरों में से एपा के दो दसवें अंश मैदे की दो रोटियां हिलाने की भेंट के लिये ले आना; वे खमीर के साथ पकाई जाएं, और यहोवा के लिये पहिली उपज ठहरें।

अहबार 23:16 -17

पेनतिकुस्त का दुरुस्त होना : अल्लाह की तरफ़ से निशानी

पेनतिकुस्त का एक ठीक वक़्त था जब लोगों पर रूहुल क़ुदुस नाज़िल हुआ जबकि यह उसी दिन वाक़े हुआ जिस दिन हफ़्तों की ईद थी या तौरात का (पेनतिकुस्त) का दिन था । नबी ईसा अल मसीह की मस्लूबियत फ़सह की ईद पर वाक़े होती है और उनकी क़यामत पहले फलों की ईद के दिन, और आने वाला इस रूहुल कुदुस का नाज़िल होना हफ्तों की ईद पर वाक़े हुआ यह सब कुछ अल्लाह की जानिब से हमारे लिए साफ़ निशानियाँ हैं । एक साल के कई एक दिनों के साथ क्यूँ ईसा अल मसीह की मस्लूबीयत, क़यामत, और फिर रूहुल कुदुस का नुज़ूल हफ्तों की ईद एक साथ दुरुस्तगी से वाक़े हुए वह भी हर एक दिन मोसम –ए- बहार के तीन ईदों के साथ जिन का तौरात शरीफ़ में ज़िकर पाया जाता है । ऐसा क्यूँ हुआ ? यह अल्लाह के पाक मंसूबे के अलावा और क्या हो सकता था जो वह हमको दिखाना चाहता था ।              

इंजील शरीफ के वाक़ियात जो दुरुस्तगी से तौरात शरीफ़ के तीन मौसमे बहार के मोक़े पर वाक़े हुए

 पेंटिकुस्त : मददगार नई क़ुव्वत देता है

रूहुल क़ुदुस के आने के निशानात को समझाने के लिए पतरस ने योएल नबी की एक नबुवत की तरफ़ इशारा किया, यह पेश बीनी करते हुए कि “मैं हर फ़र्द -ए- बशर पर अपनी रूह नाज़िल करूंगा”। पेंतिकुस्त के दिन के इस वाक़िए के साथ यह नबुवत पूरी हुई ।

हम ने देखा कि किस तरह नबियों ने हम पर ज़ाहिर किया कि हमारी रूहानी पियास की ख़सलत ही हमको गुनाह की तरफ़ ले जाती है । नबियों ने यह भी पेशे नज़र की एक नए अहद का आना जहां शरीअत हमारे दिलों के अंदर लिखा होगा न कि पतथर की तख्तियों पर या किताबों में बल्कि शरीअत हमारे दिलों के अंदर लिखे जाने से ही उसके पीछे चलने की ताक़त और क़ाबिलियत हम में होगी । उस पेनतिकुस्त के दिन ही रूहुल कुदुस के नाज़िल होने का मतलब था कि ईमानदारों में सुकूनत करे और इस वायदे की भी तकमील हो जाए ।

इंजील को ‘ख़ुश ख़बरी’ कहने का एक सबब यह है कि यह एक बेहतर ज़िंदगी जीने की ताक़त अता करता है । अब ज़िंदगी अल्लाह और लोगों के बीच इत्तिहाद के साथ है । यह इत्तिहाद तब शुरू होता है जब से कि ख़ुदा का रूह एक ईमानदार के अंदर सुकूनत करने लगता है – जो आमाल 2 के मुताबिक़ पेंतीकुस्त के इतवार के दिन से शुरू हुआ था । यह खुशख़बरी इसलिए भी है अब यह ज़िन्दगी फ़रक़ तरीक़े से गुज़ारी जा सकती है, ख़ुदा के रूह के वसीले से उसके अजीब रिश्ते के साथ । ख़ुदा का रूह हमको बातिनी और सच्ची रहनुमाई अता करता है – यानी ख़ुदा की तरफ़ से रहनुमाई । इसको बाइबल इस तरह से समझाती है :

13 और उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी।
14 वह उसके मोल लिए हुओं के छुटकारे के लिये हमारी मीरास का बयाना है, कि उस की महिमा की स्तुति हो॥

इफ़सियों1:13-14

  11 और यदि उसी का आत्मा जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।

रोमियों 8:11

23 और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।

रोमियों 8:23

ख़ुदा के रूह की सुकूनत एक दूसरा पहला फल है, रूह क्यूंकि पहले से चखा हुआ है – एक मामूली ईमानदार से , ‘ख़ुदा के फ़रज़ंद’ बनने की हमारी तबदीली के पूरा होने का — एक ज़ामिन — भी है ।  

खुशख़बरी एक नई ज़िन्दगी अता करती है कोशिश के जरिये से नहीं — बल्कि — शरीअत के मानने से इंकार के ज़रिये । न ही कसरत की ज़िन्दगी मिल्कियत, ओहदे, दौलत, और दीगर इस दुनया की ऐशो इशरत से हासिल होती है जिन्हें हज़रत सुलेमान ने तजुरबा किया था फिर भी उन्हों ने ख़ालीपन का एहसास किया था । इसके बर अक्स इंजील एक नई कसरत की ज़िन्दगी हमारे दिलों में ख़ुदा के रूह के सुकूनत किए जाने के ज़रिये से हासिल होती है । अगर अल्लाह सुकूनत करने दे, और हमको क़ुव्वत और रहनुमाई अता करे –- तो यह हमारे लिए खुशख़बरी होनी चाहिए ! तौरात के पेंतीकुस्त की ईद के मुताबिक़ इसका जश्न खमीरे आटे से बनी और पकी उम्दा रोटियों से मनाई जाती है जो इस आने वाली कसरत की ज़िन्दगी की तस्वीर है । पुराने और नए पेंतीकुस्त के दरमियान जो दुरुस्तगी पाई जाती है वह एक साफ़ निशानी है कि यह हमारे लिए अल्लाह कि निशानी है कि हम एक कसरत की ज़िन्दगी रखें ।         

अल किताब’ – किताबे मुक़द्दस का पैग़ाम क्या है?

अल किताब (बाइबल) के लफ़ज़ी मायने हैं ‘एक ख़ास किताब’ । तारीख़ में सब से पहले बाइबल बाइबल की तहरीर थी जिसकी किताब की शक्ल में इशाअत हुई जो आज हम देखते हैं । बाइबल दुनया के ऊंचे दरजे की किताब है जिसकी वुसअत में तमाम लोग और ज़मीन के क़बीले शामिल हैं । दुनया के कई एक अक़वाम पर बाइबल का एक गहरा ताससुर शुरू ही से रहा था और कुररा –ए- ज़मीन पर सब से ज़ियादा पढ़ी जाने वाली किताब है । मगर यह किताब भी दीगर किताबों की तरह एक पेचीदा कहानी के साथ लम्बी है । इसलिए हम में से बहुत हैं जो इस किताब के मौज़ू को न जानते और न समझते हैं । यह तहरीर बाइबल की किताब से एक जुमले को लेगा ताकि इस ऊंचे दरजे की किताब से कहानी को समझाए – नबी हज़रत ईसा अल मसीह के काम ।          

बाइबल इस लिए दी गई थी कि हमारे मुस्तक़्बिल के एक हक़ीक़ी मसला (परेशानी) मुख़ातब कराए । इस परेशानी को सूरा मुजादिला (सूरा 58 – हुज्जती औरत) जो इंसाफ के दिन की राह देखती है (इंतज़ार करती है)।   

जिस दिन ख़ुदा उन सबको दोबारा उठाएगा तो उनके आमाल से उनको आगाह कर देगा ये लोग (अगरचे) उनको भूल गये हैं मगर ख़ुदा ने उनको याद रखा है और ख़ुदा तो हर चीज़ का गवाह है। क्या तुमको मालूम नहीं कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा जानता है जब तीन (आदमियों) का ख़ुफिया मशवेरा होता है तो वह (ख़ुद) उनका ज़रूर चैथा है और जब पाँच का मशवेरा होता है तो वह उनका छठा है और उससे कम हो या ज़्यादा और चाहे जहाँ कहीं हो वह उनके साथ ज़रूर होता है फिर जो कुछ वह (दुनिया में) करते रहे क़यामत के दिन उनको उससे आगाह कर देगा बेशक ख़ुदा हर चीज़ से ख़ूब वाकि़फ़ है।

सूरा अल – मुजादिला 58: 6-7

सूरा अल – मुजादिला हम से कहता है कि ऐसी कोई पोशीदा बात नहीं है जिसे अल्लाह तआला हमारे बारे में न जानता हो और वह इस हिकमत का इस्तेमाल हमारा इनसाफ़ करने में करेगा ।  

सूरा अल – क़ियामा (सूरा 75 क़यामत) इस दिन को कियामत का दिन क़रार देता है और ख़बरदार भी करता है कि सब इन्सानों को अल्लाह के हुज़ूर लाया जाएगा कि अपनी जिंदगी के  अययाम में जो कुछ किया है उसका लेखा जोखा पेश करे ।    

तो इन्सान कहेगा आज कहाँ भाग कर जाऊँ। यक़ीन जानों कहीं पनाह नहीं। उस रोज़ तुम्हारे परवरदिगार ही के पास ठिकाना है। उस दिन आदमी को जो कुछ उसके आगे पीछे किया है बता दिया जाएगा। बल्कि इन्सान तो अपने ऊपर आप गवाह है। अगरचे वह अपने गुनाहों की उज्र व ज़रूर माज़ेरत पढ़ा करता रहे।

सूरा अल – क़ियामा 75:10 –15

किताब का पैगाम

हम ने नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आख़री हफ़्ते की जांच की थी । इंजील शरीफ़ बयान करती है कि उन्हें छट्टे दिन – मुबारक जुम्मे को सलीब दी गई थी और उसके तीसरे दिन जो इतवार का दिन था उन्हें जिलाया गया था । इन वाक़ियात को तौरात ज़बूर और नबियों की किताबों इन दोनों में देखा गया । मगर यह सब क्यूँ हुआ और मौजूदा दिनों में आपके और मेरे लिए क्या मायने रखते हैं ? यहाँ हम समझना चाहते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह के जरिये से क्या चीज़ पेश की गई और हम किस तरह फज़ल और बख़्शिश (गुनाहों की मुआफ़ी हासिल कर सकते हैं । यह हमको समझने में हमारी मदद करेगा जिस तरह सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37), सूरह अल- फ़ातिहा (सूरा 1—इफ़्तिताह) जबकि इसमें अल्लाह से    ‘सही रासता दिखाने की मांग की गई है’,इसके अलावा यह भी समझना है कि ‘मुस्लिम’ के मायने हैं ‘वह जो सुपुर्द करता है’, और मज़हबी रस्म ओ रिवाज के पाबंद होना जैसे वज़ू करना , ज़कात देना , और हलाल का इस्तेमाल करना वगैरा यह सब अच्छा है मगर रोज़े इंसाफ के लिए नाकाफ़ी इरादे हैं ।            

बुरी ख़बर – अल्लाह के साथ हमारे रिश्ते की बाबत अँबिया क्या कहते हैं ?

तौरात हमें सिखाती है कि जब अल्लाह ने बनी इंसान को बनाया तो उसने

  27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

पैदाइश1:27

सूरत (शबीह) का मतलब एक जिस्मानी एहसास नहीं है बल्कि वह इसलिए बनाए गए थे कि ख़ुदा को इस बतोर मुनअकिस करें कि हम जज़्बाती तोर से , दमागी तोर से , मुआशिरती तोर से और रूहानी तोर से हरकत पिज़ीर होजाएँ । हमको उसके रिश्ते के साथ बने रहने के लिए बनाया गया है । इस रिश्ते को हम नीचे दी गई तस्वीर के ज़रिये देख सकते हैं । ख़ालिक़ को एक ना महदूद हाकिम बतोर सब से ऊपर रखा गया है जबकि आदमियों और औरतों को तस्वीर के नीचे रखा गया है जबकि हम सब महदूद मख़लूक़ हैं । रिश्ते को तीर के निशाने से जोड़ते हुए दिखाया गया है ।         

उसकी सूरत पर बनाए गए लोगों को चाहिए कि ख़ालिक़ के रिशते में बने रहें

अल्लाह अपनी सीरत में पूरी तरह से कामिल है । वह पाक है । क्यूंकि यह ज़बूर कहती है कि ईसा …

  4 क्योंकि तू ऐसा ईश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न हो; बुराई तेरे साथ नहीं रह सकती।
5 घमंडी तेरे सम्मुख खड़े होने न पांएगे; तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है।

ज़बूर5:4-5

आदम ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी का गुनाह किया था – एक ही गुनाह – और ख़ुदा की पाकीज़गी तक़ाज़ा करती है कि उसको इनसाफ़ करने की ज़रूरत है । तौरात शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ बयान करते हैं कि अल्लाह ने उसको फ़ानी बनाया और उसको अपनी नज़रों (हुज़ूरी) से दूर कर दिया । यही हालत हम पर भी नफ़िज़ होती है । किसी भी तोर बतोर जब हम गुनाह करते या नफ़रमानी करते हैं तो हम अल्लाह की बे इज़्ज़ती करते हैं इसलिए कि हम उस तरह से या उस सूरत में होकर या उसके मुताबिक़ नहीं चलते जिस सूरत में हम बनाए गए थे । हमारा रिश्ता टूटा हुआ है । जिसका अंजाम एक चट्टान की दीवार की तरह मज़बूत रुकावट है जो हमारे और ख़ालिक़ के बीच हायल होकर खड़ी हो जाती है ।    

हमारे गुनाह हमारे और पाक ख़ुदा के बीच एक मज़बूत रुकावट पैदा करते हैं

गुनाह की रुकावट को मज़्हबी नेक कामों से छेदना

हम में से बहुत हैं जो इस रुकावट को जो हमारे और अल्लाह के बीच है उसे मज़्हबी कामों के जरिये दूर करने की कोशिश करते हैं या वह काम जिससे काफ़ी नेकियाँ कमा सकें ताकि उस रुकावट को तोड़ डालें । दुआएं , रोज़े , हज्ज , नमाज़, ज़कात , ख़ैरात और अतिय्या वग़ैरा देना यह सारी चीज़ें नेकी कमाने का ज़रीया बतोर हैं ताकि रुकावट को दूर करें जिस तरह अगली तस्वीर में मिसाल पेश की गई है । उम्मीद यह है कि मज़्हबी नेकियाँ हमारे कुछ गुनाहों को मिटा देंगी । अगर हमारे कई एक आमाल के जरिये काफ़ी नेकियाँ कमाई जा  सकती तो हम अपने तमाम गुनाहों को

ख़ारिज करने की उम्मीद करते और फ़ज़ल और मुआफ़ी हासिल कर लेते ।

  म इस रुकावट को नेक काम करने के ज़रिये दूर करने की कोशिश करते हैं ताकि अल्लाह के हुज़ूर सवाब हासिल करें ।

मगर गुनाहों को खारिज करने के लिए हमको कितने सवाब या नेकियों की ज़रूरत पड़ेगी ? हमारा कितना भरोसा है कि हमारे नेक आमाल हमारे गुनाह खारिज करने के लिए और रुकावट  को छेदने के लिए काफ़ी होंगे जो हमारे और हमारे ख़ालिक़ के बीच खड़ी है ? क्या हम जानते हैं कि अच्छे इरादों के लिए हमारी कोशिशें काफ़ी होंगी ? हमारे पास कोई पक्का भरोसा नहीं है इस लिए हम ज़ियादा से ज़ियादा जितना हम से बनता है नेक कामों को अंजाम देने की कोशिश करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि इनसाफ़ के दिन (रोज़े क़यामत) में जवाब देने के लिए काफ़ी है ।

नेक आमाल के साथ हमको सवाब भी हासिल करने कि ज़रूरत है जो कि नेक इरादों के लिए कोशिश है , हम में से कई लोग साफ़ सुथरे रहने के लिए मेहनत करते हैं । हम आज़ादी से नमाज़ अदा करने से पहले वज़ू करते हैं । हम नापाक लोगों से , चीज़ों से और खानों से दूर रहने की कोशिश करते हैं ताकि वह हमें नापाक न कर दें । मगर नबी यसायह एनई हमपर ज़ाहिर किया कि :

  6 हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते की नाईं मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु की नाईं उड़ा दिया है।

यसायाह 64:6

नबी हम से कहते हैं यहाँ तक कि अगर हम उस हर एक चीज़ को रोकते हैं जो हमें ना पाक करती है , हमारे गुनाह हमारे ‘रासतबाज़ी के कामों’ को साफ़ करने के चक्कर में ऐसा बना देते हैं जैसे मैले गंदे छितड़े । यही तो बुरी ख़बर है । मगर यह और बदतर होता जाता है ।     

बदतर ख़बर : गुनाह और मौत की ताक़त 

नबी हज़रत मूसा ने शरीअत में साफ़ तोर से एक मेयार मुक़र्रर किया था कि  बनी इसराईल में से हर एक को मुकम्मल फ़रमानबरदारी की ज़रूरत थी । शरीयत कभी यह नहीं कहती कि “अहकाम में से फ़लां हुक्म को सख्ती से पाबंदी करो” नहीं ऐसा नहीं है बल्कि दरअसल शरीयत बार बार यह कहती है कि यक़ीनी तोर से गुनाह के कामों की क़ीमत मौत थी । इसे हम ने नबी हज़रत नूह के ज़माने में देखा और यहाँ तक कि नबी हज़रत लूत कि बीवी की  बाबत देखा कि गुनाह का अंजाम मौत साबित हुआ ।

इंजील शरीफ़ इस सच्चाई को इस तरह से ख़ुलासा करती है:         

क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी मौत है …

रोमियों6:23

लफ़ज़ी तोर से “मौत” के मायने हैं ‘जुदाई’ । जब हमारी जान हमारे जिस्म से अलग हो जाती है हम जिस्मानी तोर से मर जाते हैं । इसी तरीक़े से यहाँ तक कि अभी हम रूहानी तोर से ख़ुदा से जुदा हैं और मुरदा हैं और उसकी नज़रों में न पाक हैं ।

यह हमारी उम्मीद की परेशानी को ज़ाहिर करता है लियाक़त (नेकी) को कमाने में ताकि गुनाह की क़ीमत अदा कर सके । परेशानी यह है कि हमारी सख्त कोशिशें, लियाक़तें, अच्छे इरादे, और नेक आमाल हालांकि बुरी नहीं हैं मगर यह सब न काफ़ी हैं इस लिए कि क़ीमत कि ज़रूरत होती है क्यूंकि गुनाह की (‘मज़दूरी’) ‘मौत’ है । सिर्फ मौत ही इस दीवार को छेद  सकती है क्यूंकि यह ख़ुदा के इंसाफ़ के तक़ाज़े को पूरा करती है । नेकियाँ कमाने की हमारी कोशिशें वैसी ही है जैसे कैंसर का इलाज करने की कोशिश करना जिस का नतीजा  (आखिरकार मौत है) । हलाल की चीज़ें खाना बुरा नहीं है बल्कि यह अच्छा है और हर एक मोमिन को हलाल ही खाना चाहिए – मगर यह केनसर का इलाज नहीं कर सकता । केनसर के लिए आपको फ़रक़ तरीक़े से इलाज करने की ज़रूरत है क्यूंकि केन्सर के ख़ुलये मौत पैदा  करते हैं ।  

सो यहाँ तक कि हमारी कोशिशें और अच्छे इरादे मज़्हबी लियाक़त पैदा करने के लिए हम सच मुछ में मरे हुए हैं और अपने ख़ालिक़ की नज़र में मुरदा लाश की तरह हैं ।  

हमारे गुनाह मौत को अंजाम देते हैं । हम अल्लाह के हुज़ूर ना पाक मुरदा लाश की तरह हैं 

नबी हज़रत इब्राहीम का सही रास्ता दिखाना

नबी हज़रत इब्राहीम के साथ यह बात फ़रक़ थी । उसके लिए ‘रास्तबाज़ी गिना गया’ उसके नेक कामों के सबब से नहीं बल्कि इस लिए कि उसने एतक़ाद किया और ख़ुदा के वायदे पर भरोसा किया । उसने ख़ुदा की क़ीमत की ज़रूरत के पूरे होने पर भरोसा किया बजाए इसके कि वह इसे खुद कमाए । हम ने उसकी बड़ी क़ुरबानी में देखा कि मौत (जो गुनाह का ख़मयज़ा था) उसे चुका दिया गया था, मगर उसके बेटे के ज़रिये से नहीं बल्कि उस मेंढ़े के ज़रिये जो ख़ुदा के ज़रिये ज़रूरत को पूरा किया गया था ।       

हज़रत इब्राहीम को सीधी सच्ची राह दिखाई गई थी – क्यूंकि उसने सादे तोर से ख़ुदा के वायदे पर ईमान लाया था और ख़ुदा ने उसके गुनाह के मौत की क़ीमत का इंतज़ाम किया था  

क़ुरान  शरीफ़ इस की बाबत सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37 – वह जिन्हों ने दर्जा बंदी क़ाइम की ) जहां वह कहता है : 

 और हमने इस्माईल का फ़िदया एक ज़िबाहे अज़ीम (बड़ी कुर्बानी) क़रार दियाऔर हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा हैकि (सारी खुदायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं

सूरा अस साफ़्फ़ात 37: 107-109

अल्लाह ने खमयाज़ा अदा किया (क़ीमत चुकाया ) और इबराहीम ने बरकत ,फज़ल ,रहम और मुआफ़ी  हासिल की जिसमें ‘तसल्ली’ भी शामिल है ।

खुशख़बरी : हज़रत ईसा अल मसीह के काम हमारी ख़ातिर

नबी का नमूना यहाँ पर हमें सही रास्ता दिखाने के लिए जिस तरह सूरा अल फ़ातिहा (सूरा 1 – इफ़्तिताही)

रोज़े जज़ा का मालिक है।हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तुझ ही से मदद मांगते है।हमें सीधा रास्ता दिखा।उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, जो माअतूब नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं है।

सूरा 1 – इफ़्तिताही 1:4-7

इंजील शरीफ़ हमें समझाती है कि यह एक मिसाल थी हमें समझाने के लिए कि किस तरह अल्लाह गुनाह की क़ीमत चुकाएगा और मौत और नापाकी के लिए सादे तौर से शिफ़ा का इंतज़ाम करेगा मगर ज़बरदस्त तरीक़े से ।  

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

अबतक यह सारी बातें ‘बुरी ख़बरें’ थीं । मगर ‘इंजील’ के लफ़ज़ी मायनी हैं ‘ख़ुश ख़बरी’ और यह ऐलान करते हुए कि हज़रत ईसा की मौत उस दीवार (रुकावट) को छेदने के लिए काफ़ी है जो हमारे और ख़ुदा के बीच है, और हम देख सकते हैं कि यह क्यूँ ख़ुश ख़बरी है जैसे दिखाया गया है ।      

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी – ख़ुदा का बररा – मौत के ज़रिये हमारी ख़ातिर गुनाहों के लिए क़ीमत अदा करता है जिस तरह नबी हज़रत इबराहीम के मेंढ़े ने किया था ।

  नबी हज़रत ईसा अल मसीह क़ुरबान हुए थे और फिर पहले फल बतोर मुरदों में से जी उठे थे सो अब वह हमारे लिए नई जिंदगी पेश करते हैं । अब हमें  आगे को गुनाह की मौत के क़ैदी बने रहने की ज़रूरत नहीं है ।  

हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत ‘पहला फल’ था । हम मौत से आज़ाद किए जा सकते हैं और यही मौत से ज़िंदा होने की क़ुव्वत को हासिल केएआर सकते हैं ।  

उनकी क़ुरबानी और क़यामत में ईसा अल मसीह दरवाज़ा बन गए कि गुनाह की रुकावट का रास्ता बतोर जो कि हमको ख़ुदा से जुदा करता है । इसी लिये ईसा नबी ने कहा :

  9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।  

यूहनना10:9-10
हज़रत ईसा अल मसीह इस तरह दरवाज़ा हैं जो गुनाह और मौत की रुकावट के लिये अंदर दाख़िल होने का रास्ता हैं

इस दरवाज़े के सबब से अब हम दोबारा से रिश्ते को हासिल कर सकते है जो हमारे ख़ालिक़ के साथ हज़रत आदम के गुनाह करने से पहले मौजूद थी और गुनाह के बाद एक रुकावट बन गई थी मगर अब यक़ीन है कि ख़ुदा का रहम ओ फज़ल गुनाहों की मूआफ़ी हमें हासिल है ।   

एक खुले दरवाज़े के साथ अब हम अपने ख़ालिक़ के साथ एक रिश्ते की बहाली में पाये जाते हैं

जिस तरह इंजील शरीफ़ ऐलान करती है :

  5 क्योंकि परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।
6 जिस ने अपने आप को सब के छुटकारे के दाम में दे दिया; ताकि उस की गवाही ठीक समयों पर दी जाए।  

1तीमुथियुस2:5-6

ख़ुदा का इनाम आप के लिये

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने तमाम लोगों के लिये खुद को देदिया । सो यह आपको और साथ और साथ ही साथ मुझको भी शामिल करता है । उसकी मौत और क़यामत के वसीले से उसने एक ‘दरमियानी’ की क़ीमत अदा की और हमारे लिये जिंदगी भी । यह जिंदगी किस तरह दी जाती है ? 

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

ग़ौर करें कि यह हमको कैसे दिया जाता है । यह हमको एक इनाम बतोर दिया जाता है । कोई बात नहीं कि यह इनाम क्या है, अगर यह हक़ीक़त में इनाम है जिसके लिए आप ने कोई मेहनत नहीं की और जिसे आप ने नेक कामों से नहीं कमाया था । अगर आपने उस इनाम को नेक कामों से कमाया तो वह इनाम, इनाम नहीं रह जाता – बल्कि वह एक मज़दूरी कहलाता ! इसी तरीक़े से नेकी (क़ाबिलियत) या ईसा अल मसीह की क़ुरबानी को भी आप नहीं कमा सकते । यह आप को इनाम बतोर दिया जाता है । क्या यह आसान नहीं है ?

और यह इनाम क्या है ? यह इनाम ‘हमेशा की ज़िन्दगी’ है । इसका मतलब यह है कि गुनाह जो आप के लिए और मेरे लिए मौत लेकर आया था उसकी क़ीमत दी जा चुकी है । इतनी महब्बत ख़ुदा हमसे करता है । क्या यह ज़बरदस्त नहीं है ?

सो किस तरह आप और मैं हमेशा की ज़िन्दगी हासिल करते हैं ? फिर से इनामों की बाबत सोचिये । अगर कोई आप को इनाम देना चाहे तो आपको उसे ‘हासिल करना’ ही होगा । जब भी कभी इनाम दिया जाता है तो सिर्फ दो तबादिले होते हैं । या तो (“नहीं शुकरिया”) बोलकर इन्कार कर दिया जाए या यह कहकर क़बूल कर लिया जाता है कि (“आप के इनाम के लिए शुक्रिया, मैं इसे ले लेता हूँ”) । तो फिर इस इनाम को भी हासिल कर लेनी चाहिए । इस बात को सिर्फ़ दमाग़ एतक़ाद कर लेना, मुताला करना या समझ लेना काफ़ी नहीं है । जो इनाम आप को दिया जाता है उससे फ़ाइदा लेने के लिए, आप को उसे ‘हासिल करना’ ज़रूरी है ।        

  12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहनना1:12-13

दरअसल इंजील शरीफ़ ख़ुदा की बाबत कहती है कि :

ख़ुदा हमारा नजात दहिन्दा है , जो चाहता है कि सब आदमी नजात पाएं …

1तीमुथियुस 2:3-4

वह एक नजात दहिन्दा है और उस की ख़्वाहिश है कि ‘सब लोग’ उसके इनाम को हासिल करें और गुनाह और मौत से बच जाएँ । अगर यह उसका इरादा है तो फिर, उसके इनाम को हासिल करें और सादे तरीक़े से उसके इरादे के तहत खुदको सोंप दें – ‘मुस्लिम’ लफ़्ज़ के मायने ही है – वह जिस ने सौंप दिया है ।

इस इनाम को हम कैसे हासिल करते हैं ? इंजील शरीफ़ कहती है कि:      

  12 यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है; और अपने सब नाम लेने वालों के लिये उदार है।

रोमियों10:12

ग़ौर करें कि यह वायदा ‘हरेक’ के लिए है । जबकि वह मुरदों में से ज़िंदा हो चुके ईसा अल मसीह यहाँ तक कि अभी भी ज़िंदा हैं । अगर आप उन्हे पुकारेंगे तो वह सुनेंगे और अपना इनाम आप को देंगे । आप उन्हें पुकारें और उनसे पूछें । शायद आपने इस तरह इससे पहले कभी न किया हो । ज़ेल में एक हिदायत है जो आप की मदद कर सकती है । यह कोई जादूई तरन्नुम नहीं है । यह कोई ख़ास अलफ़ाज़ नहीं हैं जो ताक़त देती हो । यह हज़रत इब्रहीम का भरोसा जैसा है जो हम ईसा अल मसीह पर रखते हैं ताकि वह हमको यह इनाम दे । जैसे ही हम उनपर भरोसा करेंगे वह हमारी सुनेंगे और जवाब देंगे । इंजील शरीफ़ बहुत ज़ोरावर है, और इसके साथ ही वह बहुत आसान भी है । अगर यह आप के लिए मददगार साबित होता है तो इस हिदायत के पीछे चलने या इसे दोहराने के लिए आज़ाद है ।      

पियारे नबी और और ख़ुदावंद ईसा अल मसीह । मैं जानता हूँ मेरे अपने गुनाहों के साथ अल्लाह जो मेरा ख़ालिक़ है उससे जुदा हो गया हूँ । हालांकि मेरे कोशिश करने पर भी इस रुकावट को दूर नहीं कर पाता हूँ । मगर मैं जानता हूँ कि आपकी मौत एक क़ुरबानी थी जिस से कि मेरे तमाम गुनाह धोने की कुवत रखता है और मुझे साफ़ कर सकता है । मैं जानता हूँ कि आप की क़ुरबानी के बाद आप मुरदों में से ज़िंदा हो गए । मैं एतक़ाद रखता हूँ कि आपकी क़ुरबानी काफ़ी थी इसलिए मैं खुद को आपके सुपुर्द करता हूँ । मैं आप से इल्तिजा करता हूँ कि बराए मेहरबानी मुझे मेरे गुनाहों से धोएँ और मेरवे ख़ालिक़ से मेरी मसालीहत कराएं ताकि मुझे हमेशा की जिंदगी हासिल हो । ईसा अल मसीह आप का शुकरिया यह सब कुछ मेरे लिए करने के लिए यहाँ तक कि अभी भी मेरी जिंदगी में रहनुमाई करने के लिए ताकि मैं आपको अपना ख़ुदावंद मानकर आपके पीछे चल सकूँ ।

   ख़ुदा के नाम में जो निहायत रहम करने वाला है ।

क्या किरामन कातिबीन फ़रिश्ते इंसाफ़ के दिन मदद कर सकते हैं ?

सूरा अल हाक़ा (सूरा 69 – हक़ीक़त) बयान करता है कि किस तरह इनसाफ़ का दिन एक सूर फूंकने के ज़रिये ज़ाहिर होगा I  

फिर जब सूर में एक (बार) फूँक मार दी जाएगी और ज़मीन और पहाड़ उठाकर एक बारगी (टकरा कर) रेज़ा रेज़ा कर दिए जाएँगे तो उस रोज़ क़यामत आ ही जाएगी और आसमान फट जाएगा तो वह उस दिन बहुत फुस फुसा होगा और फ़रिश्ते उनके किनारे पर होंगे और तुम्हारे परवरदिगार के अर्ष को उस दिन आठ फ़रिश्ते अपने सरों पर उठाए होंगे उस दिन तुम सब के सब (ख़ुदा के सामने) पेश किए जाओगे और तुम्हारी कोई पोशीदा बात छुपी न रहेगी

सूरा अल – हाक़ा 69 : 13—18

सूरा क़ाफ़ (सूरा 50 भी बयान करता है एक दिन का जब अल्लाह के हुक्म से सूर फूंकी जाएगी और हमारे मुहाफ़िज़ फ़रिश्ते जो हमारे दाएँ बाएँ मौजूद हैं जो हमारे नेक आमाल और बुरे आमालों का हिसाब किताब रखते हैं वह अल्लाह के हुज़ूर ज़ाहिर करेंगे I यह आयतें इस तरह हैं :  

और बेशक हम ही ने इन्सान को पैदा किया और जो ख़्यालात उसके दिल में गुज़रते हैं हम उनको जानते हैं और हम तो उसकी शहरग से भी ज़्यादा क़रीब हैं। जब (वह कोई काम करता हैं तो) दो लिखने वाले (केरामन क़ातेबीन) जो उसके दाहिने बाएं बैठे हैं लिख लेते हैं। कोई बात उसकी ज़बान पर नहीं आती मगर एक निगेहबान उसके पास तैयार रहता है। मौत की बेहोशी यक़ीनन तारी होगी (जो हम बता देंगे कि) यही तो वह (हालात है) जिससे तू भागा करता था और सूर फूँका जाएगा यही (अज़ाब) के वायदे का दिन है और हर शख़्स (हमारे सामने) (इस तरह) हाजि़र होगा कि उसके साथ एक (फरिश्ता) हांका लाने वाला होगा और एक (आमाल का) गवाह उससे कहा जाएगा कि उस (दिन) से तू ग़फ़लत में पड़ा था तो अब हमने तेरे सामने से पर्दे को हटा दिया तो आज तेरी निगाह बड़ी तेज़ है और उसका साथी (फ़रिश्ता) कहेगा ये (उसका अमल) जो मेरे पास है ।

सूरा क़ाफ़ 50 : 16—23

आयत 20 कहता है सूर फूँकने की चीतौनी पहले से ही दी जा चुकी थी (इस से पहले कि  क़ुरान शरीफ़ का मूकाशफ़ा हुआ) यह कब दिया गया था ? यह हज़रत ईसा अल मसीह के ज़रिये उस वक़्त दिया गया था जब उनहों ने इंजील शारीफ़ में अपने ज़मीन पर लौटने की बाबत पेश बीनी की थी कि आसमानी नरसिंगे के साथ इश्तिहार दिया जाएगा I    

  31 और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने दूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठे करेंगे।

मत्ती 24 :31

इसके बाद क्या होता है ? सूरा क़ाफ़ बयान करता है कि हमारे दाहिने बाएँ कंधे पर एक एक फ़रिशता मौजूद रहता है, और यह दोनों फ़रिश्ते हमारे नेक बद आमाल को लिखते रहते हैं I जबकि अल्लाह हमारे गरदन या हलक़ के रग से भी क़रीब रहता है इंजील शरीफ़ हम से कहती है यह हमारे आमाल की फ़ेहरिस्त जो बहुत लम्बी होती हैं यह दरअसल ‘किताबें’ हैं I इन्हें रो’या में बयान किया गया था कि यूहनना, जो ईसा अल मसीह का शागिर्द था उसने इसके बारे में लिखा जिसे इंजील शरीफ़ की आखरी किताब मुकशफ़ा कहा जाता है I      

  11 फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उस को जो उस पर बैठा हुआ है, देखा, जिस के साम्हने से पृथ्वी और आकाश भाग गए, और उन के लिये जगह न मिली।
12 फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखा, और पुस्तकें खोली गई; और फिर एक और पुस्तक खोली गई; और फिर एक और पुस्तक खोली गई, अर्थात जीवन की पुस्तक; और जैसे उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, उन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया।
13 और समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उस में थे दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने उन मरे हुओं को जो उन में थे दे दिया; और उन में से हर एक के कामों के अनुसार उन का न्याय किया गया।
14 और मृत्यु और अधोलोक भी आग की झील में डाले गए; यह आग की झील तो दूसरी मृत्यु है।
15 और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला, वह आग की झील में डाला गया॥

मुकाशफ़ा 20 :11-15

यह ऐलान करता है कि हम सब का हमारे आमाल के मुताबिक़ इनसाफ़ किया जाएगा जिस तरह ‘किताबों’ में दर्ज है उसी के मुताबिक़ सज़ा और जज़ा मिलेगी I सो नमाज़ के बाद या नमाज़ के ख़त्म होते होते हम इन फ़रिश्तों को (किरामन कातिबीन) को जो दाएँ बाएँ रहते हैं उन्हे सलाम करते हैं इस उम्मीद से कि उनके आमाल के दर्ज में कुछ फ़ाइदा हो सके I     

किताब — ए –हयात

मगर ग़ौर करें कि एक दूसरी किताब है जिसे किताब ए हयात कहा जाता है, यह उस किताब से फ़रक़ है जिसमें नेक ओ बद आमाल का रेकार्ड पाया जाता है I यह बयान करता है कि जिस किसी का नाम इस किताबे हयात में नहीं पाया जाएगा वह आग की झील में डाला जाएगा (यह दोज़ख़ का दूसरा नाम है) I सो नेक ओ बद आमाल की किताब में भले ही हमारे नेक कामों की फ़ेहरिस्त बुरे आमाल के फ़ेहरिस्त के मुक़ाबले में लमबी हो — इसके बावजूद भी – अगर हमारे नाम किताबे हयात में दर्ज न हो तो हम दोज़ख़ के सज़ावार होंगे I अब सवाल यह है की यह ‘किताबे हयात’ क्या है और हमारे नाम में कैसे दर्ज किए जाते हैं ?

तौरत शारीफ़ और क़ुरान शारीफ़ दोनों बयान करती हैं कि जब हज़रत आदम ने गुनाह किया, तो उन्हें बाग़ –ए- अदन से निकाल दिया गया था और उन्हें फ़ानी क़रार दे दिया गया था I इस का मतलब यह था कि वह और (उनकी औलाद होने के नाते हम) ज़िन्दगी का ज़रिया होने से जुदा कर दिये गए थे I यही सबब है कि हम फ़ानी हैं और एक हम मर जाएंगे I नबी हज़रत ईसा अल मसीह इसलिए आए कि इस ‘ज़िन्दगी’ को हमारे लिए बहाल करे ताकि हमारे नाम इस किताबे हयात में दाखिल किए जाएँ I जिस तरह से उसने ऐलान किया कि :          

  24 मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

यूहनना5:24

किस तरह नबी हज़रत इब्राहीम ने ज़िन्दगी के इस इनाम को पहले से देखा और क्यूँ हज़रत ईसा अल मसीह ही हमको ज़िन्दगी दे सकते है इन बातों की तफ़्सील यहाँ पर समझाई गई है I सूरा क़ाफ़ हमको ख़बरदार करता है कि :

  तब हुक्म होगा कि तुम दोनों हर सरकश नाशुक्रे को दोज़ख़ में डाल दो

सूरा क़ाफ़ 50 : 24

सो अगर हमेशा की ज़िन्दगी पेश की गई है तो इसकी बाबत इतला क्यूँ नहीं दी गई ?

ईसा अल मसीह से ज़िंदगी के इनाम को समझना और हासिल करना

हम ने नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आख़री हफ़्ते की जांच की थी । इंजील शरीफ़ बयान करती है कि उन्हें छट्टे दिन – मुबारक जुम्मे को सलीब दी गई थी और उसके तीसरे दिन जो इतवार का दिन था उन्हें जिलाया गया था । इन वाक़ियात को तौरात ज़बूर और नबियों की किताबों इन दोनों में देखा गया । मगर यह सब क्यूँ हुआ और मौजूदा दिनों में आपके और मेरे लिए क्या मायने रखते हैं ? यहाँ हम समझना चाहते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह के जरिये से क्या चीज़ पेश की गई और हम किस तरह फज़ल और बख़्शिश (गुनाहों की मुआफ़ी हासिल कर सकते हैं । यह हमको समझने में हमारी मदद करेगा जिस तरह सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37), सूरह अल- फ़ातिहा (सूरा 1—इफ़्तिताह) जबकि इसमें अल्लाह से    ‘सही रासता दिखाने की मांग की गई है’,इसके अलावा यह भी समझना है कि ‘मुस्लिम’ के मायने हैं ‘वह जो सुपुर्द करता है’, और मज़हबी रस्म ओ रिवाज के पाबंद होना जैसे वज़ू करना , ज़कात देना , और हलाल का इस्तेमाल करना वगैरा यह सब अच्छा है मगर रोज़े इंसाफ के लिए नाकाफ़ी इरादे हैं ।            

बुरी ख़बर – अल्लाह के साथ हमारे रिश्ते की बाबत अँबिया क्या कहते हैं ?

तौरात हमें सिखाती है कि जब अल्लाह ने बनी इंसान को बनाया तो उसने

  27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

पैदाइश1:27

सूरत (शबीह) का मतलब एक जिस्मानी एहसास नहीं है बल्कि वह इसलिए बनाए गए थे कि ख़ुदा को इस बतोर मुनअकिस करें कि हम जज़्बाती तोर से , दमागी तोर से , मुआशिरती तोर से और रूहानी तोर से हरकत पिज़ीर होजाएँ । हमको उसके रिश्ते के साथ बने रहने के लिए बनाया गया है । इस रिश्ते को हम नीचे दी गई तस्वीर के ज़रिये देख सकते हैं । ख़ालिक़ को एक ना महदूद हाकिम बतोर सब से ऊपर रखा गया है जबकि आदमियों और औरतों को तस्वीर के नीचे रखा गया है जबकि हम सब महदूद मख़लूक़ हैं । रिश्ते को तीर के निशाने से जोड़ते हुए दिखाया गया है ।         

उसकी सूरत पर बनाए गए लोगों को चाहिए कि ख़ालिक़ के रिशते में बने रहें

अल्लाह अपनी सीरत में पूरी तरह से कामिल है । वह पाक है । क्यूंकि यह ज़बूर कहती है कि ईसा …

  4 क्योंकि तू ऐसा ईश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न हो; बुराई तेरे साथ नहीं रह सकती।
5 घमंडी तेरे सम्मुख खड़े होने न पांएगे; तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है।

ज़बूर5:4-5

आदम ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी का गुनाह किया था – एक ही गुनाह – और ख़ुदा की पाकीज़गी तक़ाज़ा करती है कि उसको इनसाफ़ करने की ज़रूरत है । तौरात शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ बयान करते हैं कि अल्लाह ने उसको फ़ानी बनाया और उसको अपनी नज़रों (हुज़ूरी) से दूर कर दिया । यही हालत हम पर भी नफ़िज़ होती है । किसी भी तोर बतोर जब हम गुनाह करते या नफ़रमानी करते हैं तो हम अल्लाह की बे इज़्ज़ती करते हैं इसलिए कि हम उस तरह से या उस सूरत में होकर या उसके मुताबिक़ नहीं चलते जिस सूरत में हम बनाए गए थे । हमारा रिश्ता टूटा हुआ है । जिसका अंजाम एक चट्टान की दीवार की तरह मज़बूत रुकावट है जो हमारे और ख़ालिक़ के बीच हायल होकर खड़ी हो जाती है ।    

हमारे गुनाह हमारे और पाक ख़ुदा के बीच एक मज़बूत रुकावट पैदा करते हैं

गुनाह की रुकावट को मज़्हबी नेक कामों से छेदना

हम में से बहुत हैं जो इस रुकावट को जो हमारे और अल्लाह के बीच है उसे मज़्हबी कामों के जरिये दूर करने की कोशिश करते हैं या वह काम जिससे काफ़ी नेकियाँ कमा सकें ताकि उस रुकावट को तोड़ डालें । दुआएं , रोज़े , हज्ज , नमाज़, ज़कात , ख़ैरात और अतिय्या वग़ैरा देना यह सारी चीज़ें नेकी कमाने का ज़रीया बतोर हैं ताकि रुकावट को दूर करें जिस तरह अगली तस्वीर में मिसाल पेश की गई है । उम्मीद यह है कि मज़्हबी नेकियाँ हमारे कुछ गुनाहों को मिटा देंगी । अगर हमारे कई एक आमाल के जरिये काफ़ी नेकियाँ कमाई जा  सकती तो हम अपने तमाम गुनाहों को

ख़ारिज करने की उम्मीद करते और फ़ज़ल और मुआफ़ी हासिल कर लेते ।

  म इस रुकावट को नेक काम करने के ज़रिये दूर करने की कोशिश करते हैं ताकि अल्लाह के हुज़ूर सवाब हासिल करें ।

मगर गुनाहों को खारिज करने के लिए हमको कितने सवाब या नेकियों की ज़रूरत पड़ेगी ? हमारा कितना भरोसा है कि हमारे नेक आमाल हमारे गुनाह खारिज करने के लिए और रुकावट  को छेदने के लिए काफ़ी होंगे जो हमारे और हमारे ख़ालिक़ के बीच खड़ी है ? क्या हम जानते हैं कि अच्छे इरादों के लिए हमारी कोशिशें काफ़ी होंगी ? हमारे पास कोई पक्का भरोसा नहीं है इस लिए हम ज़ियादा से ज़ियादा जितना हम से बनता है नेक कामों को अंजाम देने की कोशिश करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि इनसाफ़ के दिन (रोज़े क़यामत) में जवाब देने के लिए काफ़ी है ।

नेक आमाल के साथ हमको सवाब भी हासिल करने कि ज़रूरत है जो कि नेक इरादों के लिए कोशिश है , हम में से कई लोग साफ़ सुथरे रहने के लिए मेहनत करते हैं । हम आज़ादी से नमाज़ अदा करने से पहले वज़ू करते हैं । हम नापाक लोगों से , चीज़ों से और खानों से दूर रहने की कोशिश करते हैं ताकि वह हमें नापाक न कर दें । मगर नबी यसायह एनई हमपर ज़ाहिर किया कि :

  6 हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते की नाईं मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु की नाईं उड़ा दिया है।

यसायाह 64:6

नबी हम से कहते हैं यहाँ तक कि अगर हम उस हर एक चीज़ को रोकते हैं जो हमें ना पाक करती है , हमारे गुनाह हमारे ‘रासतबाज़ी के कामों’ को साफ़ करने के चक्कर में ऐसा बना देते हैं जैसे मैले गंदे छितड़े । यही तो बुरी ख़बर है । मगर यह और बदतर होता जाता है ।     

बदतर ख़बर : गुनाह और मौत की ताक़त 

नबी हज़रत मूसा ने शरीअत में साफ़ तोर से एक मेयार मुक़र्रर किया था कि  बनी इसराईल में से हर एक को मुकम्मल फ़रमानबरदारी की ज़रूरत थी । शरीयत कभी यह नहीं कहती कि “अहकाम में से फ़लां हुक्म को सख्ती से पाबंदी करो” नहीं ऐसा नहीं है बल्कि दरअसल शरीयत बार बार यह कहती है कि यक़ीनी तोर से गुनाह के कामों की क़ीमत मौत थी । इसे हम ने नबी हज़रत नूह के ज़माने में देखा और यहाँ तक कि नबी हज़रत लूत कि बीवी की  बाबत देखा कि गुनाह का अंजाम मौत साबित हुआ ।

इंजील शरीफ़ इस सच्चाई को इस तरह से ख़ुलासा करती है:         

क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी मौत है …

रोमियों6:23

लफ़ज़ी तोर से “मौत” के मायने हैं ‘जुदाई’ । जब हमारी जान हमारे जिस्म से अलग हो जाती है हम जिस्मानी तोर से मर जाते हैं । इसी तरीक़े से यहाँ तक कि अभी हम रूहानी तोर से ख़ुदा से जुदा हैं और मुरदा हैं और उसकी नज़रों में न पाक हैं ।

यह हमारी उम्मीद की परेशानी को ज़ाहिर करता है लियाक़त (नेकी) को कमाने में ताकि गुनाह की क़ीमत अदा कर सके । परेशानी यह है कि हमारी सख्त कोशिशें, लियाक़तें, अच्छे इरादे, और नेक आमाल हालांकि बुरी नहीं हैं मगर यह सब न काफ़ी हैं इस लिए कि क़ीमत कि ज़रूरत होती है क्यूंकि गुनाह की (‘मज़दूरी’) ‘मौत’ है । सिर्फ मौत ही इस दीवार को छेद  सकती है क्यूंकि यह ख़ुदा के इंसाफ़ के तक़ाज़े को पूरा करती है । नेकियाँ कमाने की हमारी कोशिशें वैसी ही है जैसे कैंसर का इलाज करने की कोशिश करना जिस का नतीजा  (आखिरकार मौत है) । हलाल की चीज़ें खाना बुरा नहीं है बल्कि यह अच्छा है और हर एक मोमिन को हलाल ही खाना चाहिए – मगर यह केनसर का इलाज नहीं कर सकता । केनसर के लिए आपको फ़रक़ तरीक़े से इलाज करने की ज़रूरत है क्यूंकि केन्सर के ख़ुलये मौत पैदा  करते हैं ।  

सो यहाँ तक कि हमारी कोशिशें और अच्छे इरादे मज़्हबी लियाक़त पैदा करने के लिए हम सच मुछ में मरे हुए हैं और अपने ख़ालिक़ की नज़र में मुरदा लाश की तरह हैं ।  

हमारे गुनाह मौत को अंजाम देते हैं । हम अल्लाह के हुज़ूर ना पाक मुरदा लाश की तरह हैं 

नबी हज़रत इब्राहीम का सही रास्ता दिखाना

नबी हज़रत इब्राहीम के साथ यह बात फ़रक़ थी । उसके लिए ‘रास्तबाज़ी गिना गया’ उसके नेक कामों के सबब से नहीं बल्कि इस लिए कि उसने एतक़ाद किया और ख़ुदा के वायदे पर भरोसा किया । उसने ख़ुदा की क़ीमत की ज़रूरत के पूरे होने पर भरोसा किया बजाए इसके कि वह इसे खुद कमाए । हम ने उसकी बड़ी क़ुरबानी में देखा कि मौत (जो गुनाह का ख़मयज़ा था) उसे चुका दिया गया था, मगर उसके बेटे के ज़रिये से नहीं बल्कि उस मेंढ़े के ज़रिये जो ख़ुदा के ज़रिये ज़रूरत को पूरा किया गया था ।       

हज़रत इब्राहीम को सीधी सच्ची राह दिखाई गई थी – क्यूंकि उसने सादे तोर से ख़ुदा के वायदे पर ईमान लाया था और ख़ुदा ने उसके गुनाह के मौत की क़ीमत का इंतज़ाम किया था  

क़ुरान  शरीफ़ इस की बाबत सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37 – वह जिन्हों ने दर्जा बंदी क़ाइम की ) जहां वह कहता है : 

 और हमने इस्माईल का फ़िदया एक ज़िबाहे अज़ीम (बड़ी कुर्बानी) क़रार दियाऔर हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा हैकि (सारी खुदायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं

सूरा अस साफ़्फ़ात 37: 107-109

अल्लाह ने खमयाज़ा अदा किया (क़ीमत चुकाया ) और इबराहीम ने बरकत ,फज़ल ,रहम और मुआफ़ी  हासिल की जिसमें ‘तसल्ली’ भी शामिल है ।

खुशख़बरी : हज़रत ईसा अल मसीह के काम हमारी ख़ातिर

नबी का नमूना यहाँ पर हमें सही रास्ता दिखाने के लिए जिस तरह सूरा अल फ़ातिहा (सूरा 1 – इफ़्तिताही)

रोज़े जज़ा का मालिक है।हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तुझ ही से मदद मांगते है।हमें सीधा रास्ता दिखा।उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, जो माअतूब नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं है।

सूरा 1 – इफ़्तिताही 1:4-7

इंजील शरीफ़ हमें समझाती है कि यह एक मिसाल थी हमें समझाने के लिए कि किस तरह अल्लाह गुनाह की क़ीमत चुकाएगा और मौत और नापाकी के लिए सादे तौर से शिफ़ा का इंतज़ाम करेगा मगर ज़बरदस्त तरीक़े से ।  

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

अबतक यह सारी बातें ‘बुरी ख़बरें’ थीं । मगर ‘इंजील’ के लफ़ज़ी मायनी हैं ‘ख़ुश ख़बरी’ और यह ऐलान करते हुए कि हज़रत ईसा की मौत उस दीवार (रुकावट) को छेदने के लिए काफ़ी है जो हमारे और ख़ुदा के बीच है, और हम देख सकते हैं कि यह क्यूँ ख़ुश ख़बरी है जैसे दिखाया गया है ।      

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी – ख़ुदा का बररा – मौत के ज़रिये हमारी ख़ातिर गुनाहों के लिए क़ीमत अदा करता है जिस तरह नबी हज़रत इबराहीम के मेंढ़े ने किया था ।

  नबी हज़रत ईसा अल मसीह क़ुरबान हुए थे और फिर पहले फल बतोर मुरदों में से जी उठे थे सो अब वह हमारे लिए नई जिंदगी पेश करते हैं । अब हमें  आगे को गुनाह की मौत के क़ैदी बने रहने की ज़रूरत नहीं है ।  

हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत ‘पहला फल’ था । हम मौत से आज़ाद किए जा सकते हैं और यही मौत से ज़िंदा होने की क़ुव्वत को हासिल केएआर सकते हैं ।  

उनकी क़ुरबानी और क़यामत में ईसा अल मसीह दरवाज़ा बन गए कि गुनाह की रुकावट का रास्ता बतोर जो कि हमको ख़ुदा से जुदा करता है । इसी लिये ईसा नबी ने कहा :

  9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।  

यूहनना10:9-10
हज़रत ईसा अल मसीह इस तरह दरवाज़ा हैं जो गुनाह और मौत की रुकावट के लिये अंदर दाख़िल होने का रास्ता हैं

इस दरवाज़े के सबब से अब हम दोबारा से रिश्ते को हासिल कर सकते है जो हमारे ख़ालिक़ के साथ हज़रत आदम के गुनाह करने से पहले मौजूद थी और गुनाह के बाद एक रुकावट बन गई थी मगर अब यक़ीन है कि ख़ुदा का रहम ओ फज़ल गुनाहों की मूआफ़ी हमें हासिल है ।   

एक खुले दरवाज़े के साथ अब हम अपने ख़ालिक़ के साथ एक रिश्ते की बहाली में पाये जाते हैं

जिस तरह इंजील शरीफ़ ऐलान करती है :

  5 क्योंकि परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।
6 जिस ने अपने आप को सब के छुटकारे के दाम में दे दिया; ताकि उस की गवाही ठीक समयों पर दी जाए।  

1तीमुथियुस2:5-6

ख़ुदा का इनाम आप के लिये

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने तमाम लोगों के लिये खुद को देदिया । सो यह आपको और साथ और साथ ही साथ मुझको भी शामिल करता है । उसकी मौत और क़यामत के वसीले से उसने एक ‘दरमियानी’ की क़ीमत अदा की और हमारे लिये जिंदगी भी । यह जिंदगी किस तरह दी जाती है ? 

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

ग़ौर करें कि यह हमको कैसे दिया जाता है । यह हमको एक इनाम बतोर दिया जाता है । कोई बात नहीं कि यह इनाम क्या है, अगर यह हक़ीक़त में इनाम है जिसके लिए आप ने कोई मेहनत नहीं की और जिसे आप ने नेक कामों से नहीं कमाया था । अगर आपने उस इनाम को नेक कामों से कमाया तो वह इनाम, इनाम नहीं रह जाता – बल्कि वह एक मज़दूरी कहलाता ! इसी तरीक़े से नेकी (क़ाबिलियत) या ईसा अल मसीह की क़ुरबानी को भी आप नहीं कमा सकते । यह आप को इनाम बतोर दिया जाता है । क्या यह आसान नहीं है ?

और यह इनाम क्या है ? यह इनाम ‘हमेशा की ज़िन्दगी’ है । इसका मतलब यह है कि गुनाह जो आप के लिए और मेरे लिए मौत लेकर आया था उसकी क़ीमत दी जा चुकी है । इतनी महब्बत ख़ुदा हमसे करता है । क्या यह ज़बरदस्त नहीं है ?

सो किस तरह आप और मैं हमेशा की ज़िन्दगी हासिल करते हैं ? फिर से इनामों की बाबत सोचिये । अगर कोई आप को इनाम देना चाहे तो आपको उसे ‘हासिल करना’ ही होगा । जब भी कभी इनाम दिया जाता है तो सिर्फ दो तबादिले होते हैं । या तो (“नहीं शुकरिया”) बोलकर इन्कार कर दिया जाए या यह कहकर क़बूल कर लिया जाता है कि (“आप के इनाम के लिए शुक्रिया, मैं इसे ले लेता हूँ”) । तो फिर इस इनाम को भी हासिल कर लेनी चाहिए । इस बात को सिर्फ़ दमाग़ एतक़ाद कर लेना, मुताला करना या समझ लेना काफ़ी नहीं है । जो इनाम आप को दिया जाता है उससे फ़ाइदा लेने के लिए, आप को उसे ‘हासिल करना’ ज़रूरी है ।        

  12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहनना1:12-13

दरअसल इंजील शरीफ़ ख़ुदा की बाबत कहती है कि :

ख़ुदा हमारा नजात दहिन्दा है , जो चाहता है कि सब आदमी नजात पाएं …

1तीमुथियुस 2:3-4

वह एक नजात दहिन्दा है और उस की ख़्वाहिश है कि ‘सब लोग’ उसके इनाम को हासिल करें और गुनाह और मौत से बच जाएँ । अगर यह उसका इरादा है तो फिर, उसके इनाम को हासिल करें और सादे तरीक़े से उसके इरादे के तहत खुदको सोंप दें – ‘मुस्लिम’ लफ़्ज़ के मायने ही है – वह जिस ने सौंप दिया है ।

इस इनाम को हम कैसे हासिल करते हैं ? इंजील शरीफ़ कहती है कि:      

  12 यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है; और अपने सब नाम लेने वालों के लिये उदार है।

रोमियों10:12

ग़ौर करें कि यह वायदा ‘हरेक’ के लिए है । जबकि वह मुरदों में से ज़िंदा हो चुके ईसा अल मसीह यहाँ तक कि अभी भी ज़िंदा हैं । अगर आप उन्हे पुकारेंगे तो वह सुनेंगे और अपना इनाम आप को देंगे । आप उन्हें पुकारें और उनसे पूछें । शायद आपने इस तरह इससे पहले कभी न किया हो । ज़ेल में एक हिदायत है जो आप की मदद कर सकती है । यह कोई जादूई तरन्नुम नहीं है । यह कोई ख़ास अलफ़ाज़ नहीं हैं जो ताक़त देती हो । यह हज़रत इब्रहीम का भरोसा जैसा है जो हम ईसा अल मसीह पर रखते हैं ताकि वह हमको यह इनाम दे । जैसे ही हम उनपर भरोसा करेंगे वह हमारी सुनेंगे और जवाब देंगे । इंजील शरीफ़ बहुत ज़ोरावर है, और इसके साथ ही वह बहुत आसान भी है । अगर यह आप के लिए मददगार साबित होता है तो इस हिदायत के पीछे चलने या इसे दोहराने के लिए आज़ाद है ।      

पियारे नबी और और ख़ुदावंद ईसा अल मसीह । मैं जानता हूँ मेरे अपने गुनाहों के साथ अल्लाह जो मेरा ख़ालिक़ है उससे जुदा हो गया हूँ । हालांकि मेरे कोशिश करने पर भी इस रुकावट को दूर नहीं कर पाता हूँ । मगर मैं जानता हूँ कि आपकी मौत एक क़ुरबानी थी जिस से कि मेरे तमाम गुनाह धोने की कुवत रखता है और मुझे साफ़ कर सकता है । मैं जानता हूँ कि आप की क़ुरबानी के बाद आप मुरदों में से ज़िंदा हो गए । मैं एतक़ाद रखता हूँ कि आपकी क़ुरबानी काफ़ी थी इसलिए मैं खुद को आपके सुपुर्द करता हूँ । मैं आप से इल्तिजा करता हूँ कि बराए मेहरबानी मुझे मेरे गुनाहों से धोएँ और मेरवे ख़ालिक़ से मेरी मसालीहत कराएं ताकि मुझे हमेशा की जिंदगी हासिल हो । ईसा अल मसीह आप का शुकरिया यह सब कुछ मेरे लिए करने के लिए यहाँ तक कि अभी भी मेरी जिंदगी में रहनुमाई करने के लिए ताकि मैं आपको अपना ख़ुदावंद मानकर आपके पीछे चल सकूँ ।

   ख़ुदा के नाम में जो निहायत रहम करने वाला है ।

किस तरह ज़बूर और नबियों ने ईसा अल मसीह की नबुवत की ?

नबी हज़रत मूसा की तौरात ने हज़रत ईसा अल मसीह की इलमे पेशीन को निशानत के जरिये ज़ाहिर किया है जो नबी के आने के ऐन मुताबिक़ थे I अँबिया जो मूसा नबी का पीछा कर रहे थे , उनहों ने अल्लाह के मंसूबे को तरतीब से बयान करने के ज़रिये बताया I हज़रत दाऊद ख़ुदा के ज़रिये इलहाम शुदा थे , और मसीह के आने की बाबत दूसरे ज़बूर जो उनहों ने पहली बार नबुवत की थी वह 1000 क़बल मसीह में हुई थी I फिर ज़बूर 22 में उनहों ने किसी के बारे में एक पैगाम हासिल किया जिसके हाथ और पाओं छेदे जाकर सताया गाया था , और फिर उसे ‘मौत की मिट्टी में सुला दिया गया था’ मगर उसके बाद एक बड़ी फ़तह हासिल करने के साथ ‘ज़मीन के खानदानों को मुतासिर करेगा’ I क्या यह नबुवत नबी ईसा अल मसीह के आने वाली मस्लूबियत और क़यामत की बाबत है ? इसके लिए हम दो सूरों पर गौर करेंगे कि वह क्या कहते हैं , सूरा सबा (सूरा 34) और सूरा अन – नमल (सूरा 27) हम से कहते हैं कि किस तरह अल्लाह ने हज़रत दाऊद को इल्हाम दी (मिसाल बतोर ज़बूर 22) I            

ज़बूर 22 की नबुवत

पूरे ज़बूर का मुताला आप यहाँ कर सकते हैं I ज़ेल की फ़ेहरिस्त में ज़बूर 22 के साथ साथ ईसा अल मसीह की मस्लूबियत का भी बयान है जो इंजील में उनके शागिरदों (साथियों) के ज़रिये उन की गवाही बतोर पेश की गई है I आयतों को रंग से मिलाया गया है ताकि मवाज़िनात को आसानी से नोट किया जा सके I  

   ज़बूर 22 –1000 क़ब्ल मसीह में लिखा गया
(मत्ती 27: 31—48)… और वह मसलूब करने उसे (ईसा) को ले गए….39 और राह चलने वाले सर हिला हिला कर उसको लान तान करते और कहते थे “… अपने तईं बचा –अगर तू ख़ुदा का बेटा है तो सलीब पर से उतर आ !“41 इसी तरह सरदार काहिन भी फ़क़ीहों और बुज़ुरगों के साथ मिलकर ठट्ठे से कहते थे 42 इसने औरों को बचाया –मगर अपने तईं नहीं बचा सकता!यह तो इसराईल का बादशाह है – अब सलीब पर से उतर आए तो हम इसपर ईमान लाएँ – 43 इसने ख़ुदा पर भरोसा किया है , अगर वह इसे चाहता है तो अब इसको छुड़ा ले ….46 और तीसरे पहर के क़रीब येसू ने बड़ी आवाज़ से चिल्ला कर कहा….”एली – एली । लमा शबक़तनी?” यानी “ऐ मेरे ख़ुदा ! ऐ मेरे ख़ुदा तू ने मुझे क्यूँ छोड़ दिया”?…48 और फ़ौरन उनमें से एक शख्स दौड़ा और स्पंज लेकर सिरके में डुबोया और सरकंडे पर रखकर उसे चुसाया ।                मरकुस 15:16-2016 और सिपाही उसको उस सहन में ले गए जो परिटूरियुन कहलाता है और सारी पलटन को बुला लाए – और उनहों ने उसे अरगुवानी चोगा पहनाया और काँटों का ताज बना कर उसके सर पर रखा ।18 और उसे सलाम करने लगे कि “ऐ यहूदियों के बादशाह आदाब !”19 और वह बार बार उसके सर पर सरकंडा मारते और उसपर थूकते और घुटने टेक टेक कर उसे सिजदा करते रहे ।20 और जब उसे ठट्टों में उड़ा चुके तो उसपर से अरगुवानी चोगा उतार कर उसी के कपड़े उसे पहनाए फिर उसे सलीब देने को बाहर ले गए...37 फिर येसू ने बड़ी आवाज़ से चिल्लाकर डैम दे दिया । (यूहनना 19:34) लेकिन जब उनहों ने येसू के पास आकर देखा कि वह मर चुका है तो उसकी टांगें न तोड़ीं …, एक सिपाही ने भाले से उसकी पसली छेदी और फ़िल्फ़ोर उससे ख़ून और पानी बह निकला….  (यूहनना 20:25)[तोमा] जब तक मैं उसके हाथों में मेखों के सूराख़ न देख लूँ ….”… यूहनना19:23-24 जब सिपाही येसू को मसलूब कर चुके उसके कपड़े लेकर चार हिस्से किए –हर सिपाही के लिए एक हिस्सा और उसका कुर्ता भी बचे हुए कपड़ों के साथ लिया … यह कुर्ता बिन सिला सरासर बुना हुआ था , इसलिए कहा कि “इसे फाड़ें नहीं बल्कि आओ हम इस पर क़ुरा डालें –’’      1 ऐ मेरे ख़ुदा ! ऐ मेरे ख़ुदा ! तूने मुझे क्यूँ छोड़ दिया ? तू मेरी मदद और मेरे नाला व फ़रयाद से क्यूँ दूर रहता है ? 2 ऐ मेरे ख़ुदा ! मैं दिन को पुकारता हूँ पर तू जवाब नहीं देता और रात को भी खामोश नहीं होता… 7 वह सब जो मुझे देखते हैं मेरा मज़हका उड़ाते हैं ; वह मुंह चिड़ाते –वह सिर हिला हिला कर कहते हैं 
8 अपने को ख़ुदावंद के सुपुर्द करदे –वही उसे छुड़ाए – जबकि वह उससे खुश है तो वही उसे छुड़ाए – 9 पर तू ही मुझे पेट से बाहर लाया – जब मैं शीरखार ही था तूने मुझे त्वककुल करना सिखाया ।
10 मैं पैदाइश ही से तुझ पर छोड़ा गया –मेरी मां के पेट ही से तू मेरा ख़ुदा है 12 बहुत से सांडों ने मुझे घेर लिया है – बसन के ज़ोरावर सांड मुझे घेरे हुए हैं – 13 वह फाड़ने और गरजने वाले बबर की तरह मुझ पर अपना मुंह पसारे हुए हैं – 14 मैं पानी की तरह बह गया । मेरी सब हड्डियाँ उखड़ गईं । मेरा दिल मोम की मानिंद हो गया – वह मेरे सीने में पिघल गया । 15 मेरी क़ुव्वत ठीकरे की मानिंद ख़ुश्क हो गयी और मेरी ज़बान तालू से चिपक गई और तूने मुझे मौत की ख़ाक में मिला दिया।16 क्यूंकि कुत्तों ने मुझे घेर लिया है बदकारों की गुरूह मुझे घेरे हुए है । 17 मैं अपनी सब हड्डियाँ गिन सकता हूँ वह मुझे ताकते और घूरते हैं –18 वह मेरे कपड़े आपस में बाँटते हैं और मेरी पोशाक पर क़ुरा डालते हैं ।
           

इंजीले शरीफ को चश्म दीद गवाहों के ज़ाहिरी तनासुब से लिखा गया है जिन्हों ने मस्लूबियत को अज़हद ग़ौर से देखा था I मगर ज़बूर 22 किसी के ज़ाहिरी तनासुब से लिखा गया जो उसका तजरूबा कर रहा था I अब सवाल यह है कि ज़बूर 22 और के ईसा अल मसीह की मस्लूबियत के मवाज़िने को कैसे समझाया जाए ? यह मुताबिक़त ज़रूर है कि तफ़सील हूबहू मिलते जुलते हैं जिस तरह शामिल करने के लिए कि कपड़े बांटे गए थे I (सिले हुए कपड़ों को फाड़ा गया था और बिन सिले को सिपाहियों में दे दिया गया था) और (बहुत कुछ बिन सिले कपड़े रह जाते और बर्बाद होजाते सो उनहों ने उनका क़ुरा डाला) I ज़बूर 22 जो कि  मस्लूबियत से पहले लिखी गई थी इसकी खोज की गई थी मगर इस की खास तफ़सीलें (हाथों पाओं को छेदा जाना, और उस की हड्डियों का जोड़ों से उखड़ जाना इस बात का सबूत है कि उसके दोनों हाथ लंबे किए गए थे जिस तरह दीगर मुजरिमों के हाथ लंबी किए जाते हैं) इस के अलावा यूहनना की इंजील बयान करती है कि जब मसीह की पसली में नेज़े से छेदा गया था तो खून और पानी बह निकला था जो इस बात का इशारा करता है कि दिल के आस पास सयाल जुज़ो का जमा हो जाना यह दिल के धड़कन के रुकने की निशानी है I इस तरह ईसा अल मसीह की मौत दिल की धड़कन रुक जाने के सबब से हुई थी I यह ज़बूर 22 के बयान से मेल खाता है की “मेरा दिल मोम में तब्दील हो गया I छेदे जाने के  लिए इबरानी का जो लफ़्ज़ है उसके सही मायने हैं जैसे बबर शेर के हमले से इंसान का जिस्म छिद जाता है वैसे ही है I दूसरे मायनों में हाथ और पाओं को काट डालना (बेकार कर देना) या बबर शेर के ज़रिये बुरी तरह मार कर ज़ख्मी करदेना, खराब कर देना वग़ैरा है I जब किसी के हाथ पैर छेदे जाते हैं ऐसी ही हालत हो जाती है I

ग़ैर ईमानदार जवाब देते हैं कि ज़बूर 22 की यक्सानियत चश्मदीद गवाहों के साथ जो इंजील मेन बयान किया गया है डबल्यूएच शायद इस वजह से क्यूंकि ईसा अल मसीह के शागिरदों ने वाक़िए को नबुवत के तोर बतोर बनाया I क्या वह यकसानियत को समझा सकती है ?      

ज़बूर 22 और ईसा अल मसीह की विरासत

मगर ज़बूर 22 मज़कूरे बाला फ़ेहरिस्त के मुताबिक 18 आयत के साथ खतम नहीं होती –बल्कि वह जारी रहती है I यहाँ नोट करें कि इसके ख़ातिमे पर –। मौत के बाद कितनी शानदार फ़तह होती है I       

26 नम्र लोग भोजन करके तृप्त होंगे; जो यहोवा के खोजी हैं, वे उसकी स्तुति करेंगे। तुम्हारे प्राण सर्वदा जीवित रहें!
27 पृथ्वी के सब दूर दूर देशों के लोग उसको स्मरण करेंगे और उसकी ओर फिरेंगे; और जाति जाति के सब कुल तेरे साम्हने दण्डवत करेंगे।
28 क्योंकि राज्य यहोवा की का है, और सब जातियों पर वही प्रभुता करता है॥
29 पृथ्वी के सब हृष्टपुष्ट लोग भोजन करके दण्डवत करेंगे; वह सब जितने मिट्टी में मिल जाते हैं और अपना अपना प्राण नहीं बचा सकते, वे सब उसी के साम्हने घुटने टेकेंगे।
30 एक वंश उसकी सेवा करेगा; दूसरा पीढ़ी से प्रभु का वर्णन किया जाएगा।
31 वह आएंगे और उसके धर्म के कामों को एक वंश पर जो उत्पन्न होगा यह कहकर प्रगट करेंगे कि उसने ऐसे ऐसे अद्भुत काम किए॥

ज़बूर 22:26-31

यह इस शख़्स की मौत की तफ़सील की बाबत बात नहीं करता I वह ज़बूर के शुरू में सुलूक या बरताव का किया जाना था I अब नबी हज़रत दाऊद आगे मुसतक़बिल की तरफ़ देख रहे हैं और इस शख़्स की मौत के ता’ससुर की तरफ़ और आयनदा की मुस्तक़बिल की नस्लों की तरफ़ मुख़ातब होता है (आयत 30) I यानी कि हम जो ईसा अल मसीह के 2000 बाद रह रहे हैं I हज़रत दाऊद हम से कहते हैं कि आयनदा की नसलें जो इस शख़्स का पीछा करती हैं वह शख़्स जिसके ‘हाथ और पाँव छिदे होंगे’, जो ऐसी शिद्दतनाक मौत मरता है जिसकी ‘ख़िदमत की जाएगी’ और उसकी चर्चा होगी I आयत 27 तरक़्क़ी (फैलाव) की बाबत पेश बीनी करता है – यह फैलाव ‘दुन्या के आख़िर तक’ ‘तमाम क़ौमों के ख़ानदानों तक’ पहुंचेगा, और यह उनके लिए ‘ख़ुदावंद की तरफ़ फिरने’ का सबब बनेगा I आयत 29 इशारा करती है कि किस तरह ‘वह लोग जो खुद को ज़िंदा नहीं रख सकते हैं’ (हम सब के सब) एक दिन उसके सामने घुटने टेकेंगे I इस शख्स की रास्तबाज़ी का लोगों में मनादी की जाएगी जिन का वजूद उस ज़माने तक नहीं हुआ था जिस ज़माने में उसकी मौत हुई थी I

इसका इस ज़माने की इंतिहा से कुछ लेना देना नहीं था चाहे इंजील शरीफ़ ज़बूर 22 से मेल खाता था या नहीं I क्यूंकि यह अभी इसका बरताव बाद के वाक़ियात से है ।।। जो हमारे ज़माने के लोग हैं I इंजील शरीफ़ के मुसन्निफ़ जो पहली सदी में थे वह ईसा अल मसीह की मौत का ताससुर हमारे ज़माने में न दे सके थे I ग़ैर ईमानदारों की अक़लियत का रंग चढ़ना एक लंबे दौर को नहीं समझाता, ईसा अल मसीह की आलमगीर विरासत का जिसका 22 ज़बूर में मुनासिब तोर से पेश बीनी की गई है वह 3000 साल पहले की गई थी I           

क़ुरान शरीफ़ – दाऊद को इलमे पेशीन अल्लाह के ज़रिये दी गई  

ज़बूर 22 के आख़िर में फ़ातिहाना हमद ओ ता’रीफ़ बिलकुल वैसा ही है जो क़ुरान शरीफ़ के सूरा सबा और सूरा अन नमल (शेबा 34 और 27 चींटी) में ज़िकर किया गया है कि हज़रत दाऊद को ज़बूर लिखने के लिए इल्हाम किया गया था I    

और हमने यक़ीनन दाऊद को अपनी बारगाह से बुर्जुग़ी इनायत की थी (और पहाड़ों को हुक्म दिया) कि ऐ पहाड़ों तसबीह करने में उनका साथ दो और परिन्द को (ताबेए कर दिया) और उनके वास्ते लोहे को (मोम की तरह) नरम कर दिया था

सूरा सबा 34:10

और हमने यक़ीनन दाऊद को अपनी बारगाह से बुज़ुर्गी इनायत की थी (और पहाड़ों को हुक्म दिया) कि ऐ पहाड़ों तसबीह करने में उनका साथ दो और परिन्द को (ताबेए कर दिया) और उनके वास्ते लोहे को (मोम की तरह) नरम कर दिया था

 और इसमें शक नहीं कि हमने दाऊद और सुलेमान को इल्म अता किया और दोनों ने (ख़ुश होकर) कहा ख़ुदा का शुक्र जिसने हमको अपने बहुतेरे ईमानदार बन्दों पर फज़ीलत दी

सूरा अन–नमल 27:15

और इसमें शक नहीं कि हमने दाऊद और सुलेमान को इल्म अता किया और दोनों ने (ख़ुश होकर) कहा ख़ुदा का शुक्र जिसने हमको अपने बहुतेरे ईमानदार बन्दों पर फज़ीलत दी

जिस तरह से यह दोनों सूराजात कहते हैं कि अल्लाह ने हज़रत दाऊद को हिकमत और फज़ल दिया कि उस हिकमत से उनहों ने ज़बूर 22 में हमद ओ तारीफ़ के गीत गाए I   

अब इस सवाल पर ग़ौर करें जो सूरा अल वाक़िया में पेश किया गया है (सूरा 56 – ना गुज़ीर वाक़िया) I   

 तो क्या जब जान गले तक पहुँचती हैऔर तुम उस वक्त (क़ी हालत) पड़े देखा करते होऔर हम इस (मरने वाले) से तुमसे भी ज्यादा नज़दीक होते हैं लेकिन तुमको दिखाई नहीं देतातो अगर तुम किसी के दबाव में नहीं होतो अगर (अपने दावे में) तुम सच्चे हो तो रूह को फेर क्यों नहीं देते

सूरा अल – वाक़िया 56:83-87

कौन मौत से अपनी जान को वापस बुला सकता है ? यह दावा इस बतोर है कि इंसान के काम को अल्लाह के काम से अलग करदे I इसके बावजूद भी सूरा अल..वाक़िया वही बात पेश कर रहा है जो ज़बूर 22 में बयान किया गया है I हज़रत दाऊद ने जो हज़रत ईसा अल मसीह की बाबत जो बयान दी उसको उनहों ने पेशबीनी या नबुवत के ज़रिये दीI  

जिस तरह से ज़बूर 22 में नबी हज़रत ईसा अल मसीह की असरदार मस्लूबियत का ज़िकर पाया जाता है इस से बेहतर तरीक़े से कोई पेशबीनी नहीं कर सकता I दुनया की तारीख़ में ऐसा कौन शख़्स है जो उसकी मौत की तफ़सीलात पेश करने का दावा करे जिस बतोर उसकी ज़िन्दगी की विरासत मुस्तक़्बिल की दूरी में चली जाए और दूनया में उसके वजूद के1000 साल पहले पेशबीनी की जाए ? जबकि कोई भी इंसान दूर मुस्तक़्बिल की बातों का इतनी तफ़सील से पेशगोई करे टीओ इससे यह साबित होता है कि ईसा अल मसीह की क़ुरबानी ख़ुदा के आज़ाद मनसूबे और इलमे पेशीन के ज़रिये ही मुमकिन थी I       

दीगर अंबिया ईसा अल मसीह की क़ुरबानी की बाबत पेश बीनी करते हैं

जिस तरह तौरात शरीफ़ ने आईने की तसवीर के साथ ईसा अल मसीह के आख़री दिनों के वाक़ियात के साथ शुरू किया और फिर तसवीर को और ज़ियादा सफ़ाई से आगे की तफ़सील पेश की, और अंबिया जिन्हों ने हज़रत दाऊद का पीछा किया उनहों ने भी ईसा अल मसीह की मौत और क़ियामत को और ज़ियादा सफ़ाई के साथ तफ़सीलें पेश की I ज़ेल की फ़ेहरिस्त उन बातों का ख़ुलासा पेश करती है जिनपर हम ने ग़ौर करके मुताला किया है I   

अंबिया कलाम करते हैं वह किसतरह आने वाले मसीह के मनसूबे को ज़ाहिर किया   
कुंवारी से पैदा होने की निशानी ‘एक कुंवारी बेटा जनेगी’ इस की पेशीन गोई नबी हज़रत यसायाह ने 700 क़बल मसीह में की थी और यह भी कि वह बग़ैर गुनाह के जिएगा I जिस की कामिल ज़िन्दगी हो वही दूसरों के लिए क़ुरबानी दे सकता है I इसी सोच के मातहत ही उस नबुवत की तामील में होकर ईसा अल मसीह पैदा हुए और एक पाक ज़िन्दगी गुज़ारी I     
आने वाली ‘शाख़’ की नबूवत हुई ईसा के नाम से जो हमारे गुनाहों की मौक़ूफ़ी है   नबी यसायाह , यरमियाह और ज़करियाह ने उस आने वाले की बाबत नबूवतों का एक सिलसिला अता किया जिसको नबी ज़करियाह ने ईसा की पैदाइश के 500 साल पहले ही ईसा करके सही नाम दिया I उन्हों ने नबुवत की कि ‘एक दिन’ उसके ईमानदारों के गुनाह मौक़ूफ़ किए जाएंगे I इन तमाम नबुवतों को पूरा करते हुए ईसा नबी ने ख़ुद की क़ुरबानी पेश की ताकि एक दिन उसपर ईमान लाने वालों के गुनाहों का कफ़्फ़ारा हो सके I         
नबी दानिएल और आने वाले मसीह का वक़्त   नबी दानिएल ने नबुवत की और मसीह के आने का ठीक 480 सालों का एक नक्शा।ए।औक़ात पेश किया I ईसा अल मसीह की आमद नबुवत के ऐन मुताबिक़ हुई I      
नबी दनिएल ने यह भी नबुवत की कि मसीह ‘काट डाला जाएगा’  मसीह के आने के बाद, दानिएल नबी ने लिखा कि वह ‘काट डाला जाएग और उसका कुछ भी बाक़ी न रहेगा’ I ईसा अल मसीह के आने वाली मौत कि बाबत यह एक नबुवत थी कि वह ज़िन्दगी से काट डाला गया था I   
नबी यसायाह आने वाले ख़ादिम की मौत और क़यामत की बाबत पेशगोई करते हैं   नबी यसायाह ने बड़ी तफ़सील के साथ पेश गोई की कि किस तरह मसीह ‘ज़िनदों की ज़मीन से काट डाला जाएग’ इसके साथ ही यह भी पेश गोई की कि वह सताया जाएग, रद्द किया जाएगा , हमारे गुनाहों की ख़ातिर ज़ख़्मी किया जाएगा, बररे की तरह ज़बह करने को ले जाया जाएगा, उसकी ज़िन्दगी गुनाहों की क़ुरबानी साबित होगी , मगर उसके बाद वह अपनी ज़िन्दगी दोबारा देखेगा और फ़तहयाब होगा I यह तमाम मुफ़स्सिल पेश बीनियाँ तब पूरी हुईं जब ईसा अल मसीह मसलूब हुए और मुरदों में से जी उठे I इस तरह की तफ़सीलें जिन की पेश गोई 700 साल पहले हुई थी एक बड़ी निशानी है जिसका अल्लाह ने मनसूबा किया था I          
 नबी यूनुस और ईसा अल मसीह की मौत   नबी यूनुस ने क़बर का तजुरबा जब वह एक बड़ी मछ्ली के पेट मे थे I यह एक तसवीर थी कि ईसा अल मसीह ने समझाया कि इसी तरीक़े से वह ख़ुद भी मौत का तजुरबा करेंगे I    
नबी ज़करियाह और मौत के असीरी से आज़ाद किया जाना  ईसा अल मसीह नबी ज़करियाह की एक नबुवत का हवाला पेश करते हैं कि वह ‘मौत के असीरों’ को आज़ाद करेंगे (यानी वह जो पहले से मुर्दा हैं) उनकी ख़िदमत यह होगी कि वह मौत में दाख़िल होंगे और जो फंसे हुए हैं उन्हें आज़ाद करेंगे जिस तरह नबियों के ज़रिये पेश गोई की गई थी I     

इन बहुत सी नबुवतों के साथ नबियों से जिन्हों ने ख़ुद सदियों साल पहले मुख़तलिफ़ मुल्कों में रहते हुए , मुखतलिफ़ गोशा–ए।गुमनामी के होते हुए भी उन सब ने ईसा अल मसीह की बड़ी फ़तह की कुछ हिस्सों की बाबत पेश गोई की जो उन की मौत और क़यामत के वसीले से थी I यह इस बात का सबूत है कि यह अल्लाह के मनसूबे के मुताबिक़ था I इसी सबब से पतरस जो ईसा अल मसीह के शागिर्दों का रहनुमा था, अपने सामईन से कहा :        

  18 परन्तु जिन बातों को परमेश्वर ने सब भविष्यद्वक्ताओं के मुख से पहिले ही बताया था, कि उसका मसीह दु:ख उठाएगा; उन्हें उस ने इस रीति से पूरी किया।

आमाल 3:18

इस बात को कहने के फ़ौरन बाद, फिर उसने ऐलान किया : 

  19 इसलिये, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं, जिस से प्रभु के सम्मुख से विश्रान्ति के दिन आएं।

आमाल 3:19

हमारे लिए एक बरकत का वायदा है कि अब हम अपने गुनाहों को मिटा सकते, धो सकते हैं I इसके क्या मायने हैं इसे हम यहाँ देखते हैं I

ईसा अल मसीह की बाबत मूसा के तौरात की नबुवत कैसे पूरी हुई ?

इंजील शरीफ़ एलान करती है कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत और  क़यामत अल्लाह के मनसूबे का मरकज़ था I नबी की क़यामत के ठीक 50 दिनों के बाद पतरस जो शागिर्दों का रहनुमा था उसने सरे आम नबी ईसा अल मसीह की बाबत यह एलान किया :

  23 उसी को, जब वह परमेश्वर की ठहराई हुई मनसा और होनहार के ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तो तुम ने अधमिर्यों के हाथ से उसे क्रूस पर चढ़वा कर मार डाला।
24 परन्तु उसी को परमेश्वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया: क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता।

आमाल2:23-24

पतरस के पैग़ाम के बाद हज़ारों लोग ईमान ले आए और उस ज़माने के भीड़ के लोगों के ज़रिये कबूल किया गया तमाम लोग किसी भी क़िसम की ज़बरदस्ती के बगैर I इंजील की मनादी कबूल करने वालों की तादाद इसलिए बढ़ती जा रही थी क्यूंकि तौरात और ज़बूर के नबियों के सहीफ़े (तहरीरें) उन दिनों मजूद थीं जो सदियों साल पहले लिखे गए थे I लोगों ने इन सहीफों की जांच पड़ताल की यह देखने के लिए कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मौत और क़यामत की बाबत जो पेशबीनी हुई थी वह उसी के मुताबिक़ थी या नहीं I यही ग़ैर तबदील सहीफ़े आज भी मौजूद और दस्तियाब हैं ताकि हम भी इनकी तहक़ीक़ात करें और देखें कि इन सहाइफ़ में लिखी बातें “खुदा के आज़ाद मनसूबे और इल्मे पेशीन के मुताबिक़”थे कि नहीं जिसका पतरस उन दिनों में एलान कर रहा था I यहाँ हम कुछ बातों का ख़ुलासा पेश कर रहे हैं जिन्हें शुरूआती इंजील की मनादी के सामईन तौरात से मुआइना कर रहे थे I यहाँ तक कि उन्हों ने पीछे हज़रत आदम और छे दिन की तख्लीक़ पर भी गौर किया I          

 “…हर दिन किताबे मुक़द्दस की तहक़ीक़ करने लगे …”

आमाल 17:11

उन्हों ने किताबे मुक़द्दस की जांच पड़ताल बड़ी होशियारी से की क्यूंकि रसूलों के ज़रिये से दिया गया पैग़ाम उनके लिए अजीब और नया सा था I वह कहते थे हम इस पैगाम का तास्सुब की बिना पर इंकार करते हैं क्यूंकि यह हमारे कानों के लिए अजीब है I हम इन सब को करने के लिए तय्यार हैं बशरतेकि वह अल्लाह की तरफ से हो I इसतरह कुछ लोगों ने इनकार किया I सूरा अल — गाशिया की चितौनी उन के लिए भरी पड़ रही थी I  

हाँ जिसने मुँह फेर लिया
और न माना तो ख़ुदा उसको बहुत बड़े अज़ाब की सज़ा देगा
बेशक उनको हमारी तरफ़ लौट कर आना है
फिर उनका हिसाब हमारे जि़म्मे है

सूरए अल गाशियह 88: 23-26

वह यक़ीनी तोर से गुमान करना जानते थे कि अगर यह ना वाक़िफ़ पैग़ाम अल्लाह की तरफ़ से था कि नहीं तो उस पैग़ाम को नबियों की किताबों के खिलाफ़ जांचना ज़रूरी था I यह उनको अल्लाह की जानिब से एक पैग़ाम के इनकार करने के ख़म्याज़े से महफूज़ रखेगा I हमारी अक़ल्मंदी होगी कि उनके नमूनों का पीछा करें ताकि किताबे मुक़द्दस का पीछा करें यह देखने के लिए कि अगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मौत और जी उठने का पैग़ाम पहले की किताबों में पहले ही से मुक़र्रर किया गया था I हम तौरात से शुरू करते हैं I       

अल्लाह का इल्मे पेशीन तौरात शरीफ़ के शुरू से और क़ुरान शरीफ़ में ज़ाहिर किया गया था

तौरात के पहले सफ़हे से ही हम देख सकते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह के अय्याम और उनकी क़ुरबानी अल्लाह के इल्मे पेशीन में मुक़र्रर की जा चुकी थी I तमाम मुक़द्दस किताबों (तौरात, ज़बूर, इंजील और क़ुरान शरीफ़ के सिर्फ़ दो ही हफ़्ते हैं जहां कि हरेक मुसलसल हफ़्ते के दिनों का ज़िकर किया गया है I पहला हफ़्ता ऐसा है जिस का बयान कि किस तरह अल्लाह ने सारी चीज़ों को छे दिन में बनाया इसका ज़िक्र तौरात शरीफ़ के पहले दो अबवाब में किया गया है I गौर करें कि किस तरह क़ुरान शरीफ़ छे दिन की तख्लीक़ पर जोर देता है I  

बेशक उन लोगों ने अपना सख़्त घाटा किया और जो इफ़तेरा परदाजि़या किया करते थे वह सब गायब़ (ग़ल्ला) हो गयीं बेषक तुम्हारा परवरदिगार ख़ुदा ही है जिसके (सिर्फ) 6 दिनों में आसमान और ज़मीन को पैदा किया फिर अर्ष के बनाने पर आमादा हुआ वही रात को दिन का लिबास पहनाता है तो (गोया) रात दिन को पीछे पीछे तेज़ी से ढूंढती फिरती है और उसी ने आफ़ताब और माहताब और सितारों को पैदा किया कि ये सब के सब उसी के हुक्म के ताबेदार हैं

सूरए आराफ़ 7:54

जिसने सारे आसमान व ज़मीन और जो कुछ उन दोनों में है छहः दिन में पैदा किया फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ और वह बड़ा मेहरबान है तो तुम उसका हाल किसी बाख़बर ही से पूछना

सूरए अल फु़रकान 25:59

ख़़ुदा ही तो है जिसने सारे आसमान और ज़मीन और जितनी चीज़े इन दोनो के दरम्यिान हैं छहः दिन में पैदा की फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ उसके सिवा न कोई तुम्हारा सरपरस्त है न कोई सिफारिशी तो क्या तुम (इससे भी) नसीहत व इबरत हासिल नहीं करते

सूरए अस सजदह  32:4

और हमने ही यक़ीनन सारे आसमान और ज़मीन और जो कुछ उन दोनों के बीच में है छहः दिन में पैदा किए और थकान तो हमको छुकर भी नहीं गयी

सूरए क़ाफ़ 50:38

वह वही तो है जिसने सारे आसमान व ज़मीन को छहः दिन में पैदा किए फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ जो चीज़ ज़मीन में दाखिल होती है और जो उससे निकलती है और जो चीज़ आसमान से नाजि़ल होती है और जो उसकी तरफ़ चढ़ती है (सब) उसको मालूम है और तुम (चाहे) जहाँ कहीं रहो वह तुम्हारे साथ है और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है

सूरए अल हदीद (लोहा) 57:4

रोज़ाना के वाक़ियात के साथ दूसरा हफ़्ता जो बयान किया गया है वह है नबी हज़रत ईसा अल मसीह का आख़री हफ़्ता I दीगर कोई और नबी, चाहे हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा, हज़रत दाऊद और हज़रत मोहम्मद (सल्लम) उनके रोज़ाना की सरगर्मियों का बयान करते हुए एक हफ़्ता पूरा नहीं किया गया है I पूरी तख्लीक़ के हफ़्ते का बयान जो तौरात के शुरू का बयान है वह यहाँ दिया गया है I हम ने हज़रत ईसा अल मसीह के आखरी हफ़्ते के रोज़ाना के वाक़ियात को पढ़ा और देखा है I ज़ेल की यह फ़हरिस्त इन दो हफ़्तों के हरेक दिन के वाकियात को म्वाज़िने के लिए किसतरह साथ साथ रहती है देखें :      

हफ़्ते का दिन तख्लीक़  का हफ़्ता ईसा अल मसीह का आख़री हफ़्ता
  दिन 1 वहाँ पर अँधेरा है और अल्लाह कहता है ‘रौशनी हो जा’ और रौशनी हो गई I वहां तारीकी में रौशनी है   मसीह येरूशलेम में दाखिल होते और कहते हैं “मैं दुनया में रौशनी बनकर आया हूँ…”और रौशनी तारीकी में चमकती है 
  2 दिन   अल्लाह ज़मीन को आसमान से जुदा करता है   मक़दिस की सफाई करते हुए ईसा ज़मीन की उन चीज़ों को अलग करते हैं कि वह दुआ का घर साबित हो   
  दिन 3 अल्लाह कलाम करता है और समुन्दर में से सूखी ज़मीन निकल आती है       ईसा ईमान की बात करते हुए कहते हैं कि रत्ती भर ईमान पहाड़ को हिलाकर समुन्दर में डाल सकता है
  अल्लाह फिर से कलाम करता है कि ‘ज़मीन मुख़तलिफ़ पौदे उगाए’ और वह ऐसा ही हुआ I                             ईसा कलाम करते हैं और अंजीर का पेड़ जड़ से सूख जाता है I
Day 4   दिन 4 अल्लाह कलाम करता है ‘फ़लक पर नय्यर हों’ और सूरज चाँद और सितारे आसमान पर रौशनी देने लगते हैं I    ईसा अपनी दूसरी आमद में ज़मीन पर लौटने की निशानी की बाबत कहते हैं – सूरज,चाँद और सितारे बे-नूर होजाएंगे I   
Day 5   दिन 5 अल्लाह तमाम उड़ने वाले परिंदों को पैदा किया,और बड़े जानवर जैसे डैनासोर,रेंगने वाले जानवर = ड्रैगन वगैरा      शैतान जो बड़ा अज़धा है जो बाग़े अदन में ज़ाहिर हुआ था वह यहूदा में समाता है की मसीह को मारे 
    दिन 6 अल्लाह कलाम करता है और घरेलू जानवर वजूद में आते हैं   फ़सह के बर्रे और दीगर जानवर मक़दिस में ज़बह किये जाते है I    
   ‘ख़ुदावंद ख़ुदा ने…आदम के नथनों में जिंदगी का दम फूंका तो आदम जीती जान हुआ’   “फिर येसू ने बड़ी आवाज़ से चिल्लाकर अपना दम दे दिया I” (मरकुस 15:37)   
  अल्लाह ने आदम को बाग़े अदन में रखा                         ईसा  आज़ादी से चुनाव करते हैं कि गत्सम्नी के बाग़ में दाखिल हों
  आदम को ख़बरदार किया जाता है कि एक लानत के साथ नेक व बद की पहचान के दरख़्त से दुर रहेI     ईसा को एक लकड़ी के काट पर लटका दिया गया और वह इस तरह से लानती हुआ I (गलतियों 3:13)
  जानवरों और चौपायों में से कोई भी उसकी मानिंद मददगार न मिलने की सूरत में उसके लिए एक दुसरे शख्स की ज़रुरत थी  फ़सह के जानवर क़ुरबानियों के लिए काफ़ी नहीं थे I एक शख्स की क़ुरबानी की ज़रुरत थी I (इब्रानियों 10:4-5)  
  अल्लाह आदम को एक गहरी नींद में डाल देता है                                             ईसा मौत की गहरी नींद में दाख़िल हो जाते हैं
  अल्लाह आदम की पसली की तरफ ज़ख़्मी करके एक को निकलता और हव्वा को बनाता है – आदम की दुल्हन बतोर ईसा की पसली में एक ज़ख्म बनाया गया I उसकी अप्नी क़ुरबानी से ईसा एक दुल्हन को जीत लेते हैं – जो उनकी है I (मुकाश्फ़ा 21:9 )     
दिन 7 अल्लाह अपने सारे काम से फ़ा रिग़ होकर आराम करता है I वह दिन पाक माना जाता है I    ईसा अल मसीह मौत की हालत में आराम करते हैं                                  

इन दो हफ़्तों के लिए हर दिन के वाक़ियात एक दुसरे के लिए आईने के अक्स की तरह हैं I इन में मौज़ूनियत पाई जाती है I इन दोनों हफ़्तों के आखिर में नई  ज़िन्दगी के पहले फल फटने और एक नई तख्लीक़ में फलने फूलने को तययार हैं I हज़रत आदम और हज़रत ईसा अल मसीह एक दुसरे के बर अक्स तस्वीरें हैं I     

कुरान शरीफ कहता है कि ईसा अल मसीह और आदम :

ख़ुदा के नज़दीक तो जैसे ईसा की हालत वैसी ही आदम की हालत कि उनको को मिट्टी का पुतला बनाकर कहा कि ‘हो जा’ बस (फ़ौरन ही) वह (इन्सान) हो गया

सूरए आले इमरान3:59

इंजील शरीफ़ आदम की बाबत कहती है कि

…आदम ,जो आने वाले का मसील था I

(रोमियों 5:14

और

21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।
22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे                                                                                        

1कुरिन्थियों15:21-22

इन दो हफ़्तों का मवाज़िना करते हुए हम देखते हैं कि आदम ईसा अल मसीह का एक उल्टा नमूना है I क्या अल्लाह को काएनात की तख़लीक़ के लिए छे दिनों की ज़रुरत थी ? क्या वह एक ही मर्तबा हुक्म देकर उसे पूरा नहीं कर सकता था ? क्यूँ उसने उस तरीक़े से अंजाम दिया जैसे बयां किया गया है? अल्लाह ने क्यूं सातवें दिन आराम किया जब वह थका हुआ नहीं था ? उसने सब कुछ एक तनज़ीम ओ तरतीब से किया और उसने ऐसा इसलिए किया ताकि ईसा अल मसीह की आखरी सरगर्मियां तख्लीकी हफ़्ते के रोज़ाना के कामों में इस्तेमाल किया जा सके I यह खास तोर से छट्टे दिन के लिए सच्च है I हम नमूने को बराहे रास्त अल्फाज़ में देख सकते हैं I मिसाल के तोर पर सादे तरीक़े से यह कहने के बजाए कि ‘ईसा अल मसीह मर गए’ इंजील कहती है कि “उसने आखरी सांस ली” आदम से एक बराहे रास्त उल्टा नमूना जिसने जिंदगी का दम हासिल किया था I वक़्त के शुरू से इस तरह का नमूना ‘इल्मे पेशीन’ कहलाता है,वैसे ही जैसे पतरस ने हज़रत ईसा अल मसीह के जी उठने के बाद बयान किया I        

तौरात    में     ता’खखुर     तमसीलात

तौरात शरीफ़ फिर ख़ास वाक़ियात का बयान करती है और रस्में मुक़र्रर करती है जो तसव्वुर बतोर खिदमत अनजान देती है जिस का इशारा नबी ईसा अल मसीह की आने वाली कुर्बानी की तरफ है I यह इसलिए दिए गए थे कि अल्लाह के मनसूबे के तहत उसके इल्मे पेशीन को समझने में हमारी मदद हो सके I हम ने इन में से कुछ मील के पत्थरों को ऊपर के बयानात में देखा था I ज़ेल की फ़ेहरिस्त इन का ख़ुलासा पेश करती है जो इन बड़े निशानात की कड़ियों के साथ है जिनको नबी ईसा अल मसीह से एक हज़ार साल से ज़ियादा पहले क़लमबंद (रिकॉर्ड) किया गया था I   

तौरात से निशानी नबी हज़रत ईसा अल मसीह की आने वाली क़ुरबानी के मनसूबे को यह किस तरह ज़ाहिर करती है
आदम की निशानी   हज़रत आदम की नाफ़रमानी के बाद जब उनका सामना अल्लाह से हुआ तब उसने एक औरत की नसल की बात कही थी जो (सिर्फ़) एक औरत से आने वाल था (इसतरह से वह एक कुंवारी से जन्म था) I यह नस्ल शैतान को कुचलेगा मगर वह इस तरीक़े अमल में खुद को भी मारेगा I     
क़ाबील और हाबील की निशानी  एक मौत की कुर्बानी की ज़रुरत थी I क़ाबील ने फल तरकारियों का हदया चढ़ाया था (जिसमें कोई जान नहीं थी) मगर हाबील ने एक जानवर के जिंदगी की क़ुरबानी दी I यह अल्लाह के ज़रिये कबूल किया गया I यह ईसा अल मसीह की कुर्बानी के लिए मिसाली मंसूबा था I     
इब्राहीम की क़ुरबानी की निशानी  तस्वीर और ज़ियादा तफ़सील को जोड़ती है जैसे वह मक़ाम जहां नबी इब्राहीम ने अपने बेटे की क़ुरबानी दी थी जहां नबी हज़रत ईसा अल मसीह को भी उसी मक़ाम पर कुर्बान होना था I और नबी इब्राहीम ने भी उस आने वाली कुर्बानी की बाबत कहा था I बेटे को मरना था मगर आख़री लम्हे में एक मेंढे को उसकी जगह पर चढ़ाया गया ताकि बीटा जिंदा रह सके I यह तस्वीरकशी करता था कि किस तरह ईसा अल मसीह ‘खुदा का  बररा’ बतोर खुद की कुर्बानी देंगे ताकि हम जिंदा रह सकें I        
मूसा के फ़सह की निशानी                         अल्लाह के मनसूबे की आगे की तफ़सील उस वक़्त ज़ाहिर हुए जब मेंढे और बर्रे एक ख़ास दिन यानी — फ़सह पर कुर्बान होने लगे थे I मिसर का  फ़िरोन, जिसने एक बर्रे की क़ुर्बानी नहीं दी थी उसने मौत का तजुर्बा किया I मगर बनी इस्राईल जिन्हों ने बर्रे की कुर्बानी दी वह मौत से बच गएI सदियों साल बाद कैलंडर के उसी दिन उसी महीने ईसा अल मसीह को — फ़सह का बर्रा बतोर कुर्बान किया गया I          
हारुन की क़ुरबानी की निशानी हारुन ख़ास रस्मी अदाएगी के तहत जानवरों की कुर्बानी देते थे I बनी इस्राईल जो गुनाह करते थे उनके गुनाह के कफ़फ़ारे के लिए हारुन के ज़रिये क़ुरबानी पेश कर सकते थे I मगर कुर्बानी में मौत का होना ज़रूरी था I लोगों की जानिब से (हिमायत) में काहिन ही कुर्बानी को अंजाम देता था I यह वक़्त से पहले हज़रत ईसा अल मसीह ने काहिन बतोर अपने किरदार में अंजाम दिया यानी हमारे लिए अपनी जान की क़ुरबानी दी I      

इसलिए कि नबी हज़रत मूसा की तौरात बहुत ही साफ़ तरीक़े से नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आने की तरफ़ इशारा करती है जिस तरह कहा गया है :

जो हज़रत ईसा अल मसीह के कामों पर ईमान नहीं लाता उसको उन्हों ने इसतरह ख़बरदार किया है कि : 

 (इब्रानियों10:1)

  43 मैं अपने पिता के नाम से आया हूं, और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते; यदि कोई और अपने ही नाम से आए, तो उसे ग्रहण कर लोगे।
44 तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो और वह आदर जो अद्वैत परमेश्वर की ओर से है, नहीं चाहते, किस प्रकार विश्वास कर सकते हो?
45 यह न समझो, कि मैं पिता के साम्हने तुम पर दोष लगाऊंगा: तुम पर दोष लगाने वाला तो है, अर्थात मूसा जिस पर तुम ने भरोसा रखा है।
46 क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करते, तो मेरी भी प्रतीति करते, इसलिये कि उस ने मेरे विषय में लिखा है।
47 परन्तु यदि तुम उस की लिखी हुई बातों की प्रतीति नहीं करते, तो मेरी बातों की क्योंकर प्रतीति करोगे॥

युहन्ना5:43-47

ईसा अल मसीह ने अपने शागिर्दों से भी कहा कि जो ईमान लाते हैं उनकी मदद करें कि उनके मिशन को समझें

  44 फिर उस ने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों।

लूक़ा24:44

नबी ने सफ़ाई से कहा कि न सिर्फ़ तौरात, बल्कि ज़बूर के नबियों की तहरीरें भी नबी ईसा की बाबत लिखते हैं I इसे हम यहाँ पर देखते हैं I हालाँकि तौरात शरीफ़ ने जिन वाक़ियात का इस्तेमाल किया वह उनके दुनया में आने की तम्सीलें थीं मगर बाद के नबियों ने बराहे रास्त उनकी आने वाली मौत और मुर्दों में से जी उठने की बाबत एक तबसिरा बतोर लिखा I

यहाँ हम समझते हैं कि किस तरह अब्दी ज़िन्दगी के इनाम को हासिल करें जो नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़रिये हमारे लिए पेश किया गया है I

क़यामत पहले फलों में से एक : आप के लिए ज़िन्दगी

सूरा अर – रा’द (सूरा 13 – बिजली) एक आम दावा या या ग़ैर ईमानदारों से नुक्ताचीनी को बयान करता है I   

और अगर तुम्हें (किसी बात पर) ताज्जुब होता है तो उन कुफ्फारों को ये क़ौल ताज्जुब की बात है कि जब हम (सड़गल कर) मिट्टी हो जायंगें तो क्या हम (फिर दोबारा) एक नई जहन्नुम में आयंगे ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने परवरदिगार के साथ कुफ्र किया और यही वह लोग हैं जिनकी गर्दनों में (क़यामत के दिन) तौक़ पड़े होगें और यही लोग जहन्नुमी हैं कि ये इसमें हमेशा रहेगें

सूरा अर – रा’द 13:5,7

और वो लोग काफिर हैं कहते हैं कि इस शख़्स (मोहम्मद) पर उसके परवरदिगार की तरफ से कोई निशानी (हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़) क्यों नहीं नाजि़ल की जाती ऐ रसूल तुम तो सिर्फ (ख़ौफे ख़़ुदा से) डराने वाले हो

सूरा अर – रा’द 13:,7

यह दो हिस्सों में बाटता I सूरा रा’द का 5 आयत पूछता है कि क्या क़यामत कभी होगीI उनके ज़ाहिरी तनासुब से ऐसा कभी भी इस से पहले नहीं हुआ, और न मुस्तक़बिल में होगा I फिर वह पूछते हैं कि ज्यूँ कोई मोजिज़ाना निशानीजायज़ क़रार देने के लिए निहीं दिया एक क़ियामत वाक़े होगी I हकीकी मायनों में पुछा जाए तो वह कहते हैं कि, “सबूत पेश करो”!    

सूरह अल – फुरक़ान (सूरा 25 — मेयार) इसी दावे को दिखाता है जो हलके तोर से फ़रक़ तोर पर दिखाया गया है I    

हमने उनको ख़ूब सत्यानास कर छोड़ा और ये लोग (कुफ़्फ़ारे मक्का) उस बस्ती पर (हो) आए हैं जिस पर (पत्थरों की) बुरी बारिश बरसाई गयी तो क्या उन लोगों ने इसको देखा न होगा मगर (बात ये है कि) ये लोग मरने के बाद जी उठने की उम्मीद नहीं रखते (फिर क्यों इमान लाएँ)
और (ऐ रसूल) ये लोग तुम्हें जब देखते हैं तो तुम से मसख़रा पन ही करने लगते हैं कि क्या यही वह (हज़रत) हैं जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है (माज़ अल्लाह)

सूरा अल-फ़ुरक़ान 25:40 -41

उनको क़यामत के आने का कोई डर नहीं है, न ही नबी हज़रत मोहम्मद का I वह क़यामत के आने के सबूत में अड़े रहे I   

सूरा अल – फ़ुरक़ान भी ज़ाहिर करता है कि किसतरह अल्लाह ग़ैर ईमानदारों पर नज़र करता है I

और लोगों ने उसके सिवा दूसरे दूसरे माबूद बना रखें हैं जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते बल्कि वह खुद दूसरे के पैदा किए हुए हैं और वह खुद अपने लिए भी न नुक़सान पर क़ाबू रखते हैं न नफ़ा पर और न मौत ही पर इख्तियार रखते हैं और न जि़न्दगी पर और न मरने के बाद जी उठने पर

सूरा अल-फ़ुरक़ान 25:3 

सूरा अल फ़ुरक़ान ज़ाहिर करता है कि लोग अक्सर ग़ैर माबूदों को लेते हैं I कोई कैसे सच्चे खुदा और ग़ैर मबूदों में फरक कर सकता है ? आयत इसका जवाब देती है, ग़ैर माबूद ‘न मौत न ज़िन्दगी और न क़यामत पर क़ाबू पा सकते हैं’ I एक क़यामत पर क़ाबू पाने के लिए —जो झूठे माबूद को सच्चे खुदा से अलग करता है I     

चाहे दावा ग़ैर ईमानदारों की तरफ़ से अल्लाह और उसके रसूलों को पेश किया गया हो किस बात से खौफ़ रखना चाहिए जो नज़र अंदाज़ किया जा सकता है, या चाहे चितौनी अल्लाह की तरफ़ से ग़ैर ईमानदारों को दी गयी हो की सच्चे खुदा की इबादत करें न कि ग़ैर माबूदों की, नापने वाली छड़ी एक ही है –यानी कि क़यामत I    

क़ियामत आख़िरेकार इख्तियार और क़ुव्वत का तक़ाज़ा करता है I नबी हज़रत इबराहीम (अलैहिस्सलाम),मूसा (अलैहिस्सलाम), दाऊद (अलैहिस्सलाम)और मोहम्मद (सल्लम) — हालांकि बहुत बड़े नबी थे I इसके बावजूद भी वह — मुर्दों में से जिंदा नहीं हुए I सक़रात, एनिसटिन, न्यूटन, और सुलेमान क्या यह बड़े लोग नहीं थे I इनमें  से कोई भी मुर्दों में से जिंदा नहीं हुए I किसी भी शाहिन्शाह को लीजिये जो कभी तख़्त में बैठ कर हुकूमत किया करते थे यूनानियों को शामिल करते हुए, रोमोयों , बैज़नटाइन, उममायाद , अब्बासिद , मम्लूक और ओटटोमन की सल्तनतें –इन में से कोई भी मौत पर हावी नहीं हो पाए और दोबारा ज़िन्दा नहीं हुए I यह आखरी दावा है I यह वह दावा है जिस को हज़रत ईसा अल मसीह ने सामना करने का चुनाव किया I                   

उन्हों ने अपनी फ़तेह को इतवार के दिन पौ फटने से पहले हासिल किया I पौ फटने पर मौत पर उनकी फ़तेह आपके और मेरे लिए भी थी I जो मसीह ईसा पर ईमान रखते हैं उनके लिए दुन्या में आगे को ख़ताओं और गुनाहों के गुलाम होने की ज़रुरत नहीं है I जिस तरह सूरा अल – फ़लक़ (सूरा 113 – पौ फटना) दरखास्त करता है       

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की हर चीज़ की बुराई स
जो उसने पैदा की पनाह माँगता हूँ
और अँधेरी रात की बुराई से जब उसका अँधेरा छा जाए

(सूरए अल फलक़ 113:1-3)

यहाँ हम गौर करेंगे कि इस ख़ास फ़ज्र की बाबत जिसकी सदियों पहले पेश्बीनी हुई थी वह तौरात में पहले फलों की ईद से मुतालिक़ थी और किस तरह फ़ज्र का ख़ुदावंद दुन्या के गुनाहों से हमको छुटकारा दिलाता है I                                                                        

ईसा अल मसीह और तौरात शरीफ़ की ईदें

हमने होशियारी से नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आखरी हफ़्ते के वाक़ियात को जो इंजील शरीफ़ बयान करती है उसका पीछा किया I हफ़्ते के आखिर में फ़सह के दिन जो यहूदियों की मुक़द्दस ईद है वह मस्लूब हुए I फिर वह सबत के दौरान मौत की हालत में आराम किये,वह दिन हफ़्ते का मुक़द्दस सातवाँ दिन था I इन मुक़द्दस दिनों को अल्लाह की जानिब से हज़रत मूसा के वसीले से तौरात में मुक़र्रर किया था I इन हिदायत व अहकाम को हम यहाँ पर इसतरह पढ़ते हैं :   

  यहोवा ने मूसा से कहा,
2 इस्त्राएलियों से कह, कि यहोवा के पर्ब्ब जिनका तुम को पवित्र सभा एकत्रित करने के लिये नियत समय पर प्रचार करना होगा, मेरे वे पर्ब्ब ये हैं।
3 छ: दिन कामकाज किया जाए, पर सातवां दिन परमविश्राम का और पवित्र सभा का दिन है; उस में किसी प्रकार का कामकाज न किया जाए; वह तुम्हारे सब घरों में यहोवा का विश्राम दिन ठहरे॥
4 फिर यहोवा के पर्ब्ब जिन में से एक एक के ठहराये हुए समय में तुम्हें पवित्र सभा करने के लिये प्रचार करना होगा वे ये हैं।
5 पहिले महीने के चौदहवें दिन को गोधूलि के समय यहोवा का फसह हुआ करे।

अह्बार 23:1-5

क्या यह हैरत अंगेज़ नहीं है कि हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत और आराम दोनों हूबहू दो मुक़द्दस ईदों के साथ मुत्तफ़िक़ हो रहा था जिसका ज़िक्र 1500 साल पहले हुआ जैसा की तारीख़ी वक़्त की लकीर में दिखाया गया है ? ऐसा क्यूं है ? इस का जवाब हम सब तक पहुँचता है यहाँ तक कि हम किस तरह हर दिन एक दुसरे को सलाम करते हैं I    

हज़रत ईसा अल मसीह की मौत फ़सह की क़ुरबानी के दिन वाक़े हुई (दिन 6) और उसका आराम सबत के आराम के दिन (दिन 7)

यह तंज़ीम व तरतीब नबी हज़रत ईसा अल मसीह तौरात की ईदों के दरमियान जारी रहती है I तौरात से ऊपर के आयातों की तिलावत सिर्फ़ पहली दो ईदों से मेल जोल रखती है I दूसरा ईद था ‘पहले फलों’ को खुदावंद के हुज़ूर लाने की ईद , और तौरात इसकी बाबत हिदायत पेश करती है I   

  9 फिर यहोवा ने मूसा से कहा,
10 इस्त्राएलियों से कह, कि जब तुम उस देश में प्रवेश करो जिसे यहोवा तुम्हें देता है और उस में के खेत काटो, तब अपने अपने पक्के खेत की पहिली उपज का पूला याजक के पास ले आया करना;
11 और वह उस पूले को यहोवा के साम्हने हिलाए, कि वह तुम्हारे निमित्त ग्रहण किया जाए; वह उसे विश्रामदिन के दूसरे दिन हिलाए।
12 और जिस दिन तुम पूले को हिलवाओ उसी दिन एक वर्ष का निर्दोष भेड़ का बच्चा यहोवा के लिये होमबलि चढ़ाना।
13 और उसके साथ का अन्नबलि एपा के दो दसवें अंश तेल से सने हुए मैदे का हो वह सुखदायक सुगन्ध के लिये यहोवा का हव्य हो; और उसके साथ का अर्घ हीन भर की चौथाई दाखमधु हो।
14 और जब तक तुम इस चढ़ावे को अपने परमेश्वर के पास न ले जाओ, उस दिन तक नये खेत में से न तो रोटी खाना और न भुना हुआ अन्न और न हरी बालें; यह तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में तुम्हारे सारे घरानों में सदा की विधि ठहरे॥

अह्बार 23:11,14

सो फ़सह के सबत के दुसरे दिन के बाद एक तीसरा मुक़द्दस दिन था I हर साल इस दिन सरदार काहिन मुक़द्दस मक्दिस में दाखिल होता था और बाहर आकर फ़सल के पहले फलों को खुदावंद के आगे लहराया करता था I यह इस बात को ज़ाहिर करता था की जाड़े की मुर्दगी के बाद एक नई जिंदगी की शुरुआत हुई है I लोग आने वाले दिनों में भी भरपूर फ़सल की उम्मीद लगाते थे ताकि लोग खाएं और सैर हो सकें I

सबत के बाद यह बिलकुल वही दिन था जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह मौत की हालत में आराम किया, नए हफ़्ते का पहला इतवार निसान महीने की 16 तारीख़ थी I इंजील शरीफ़ उसी दिन चोंका देने वाले वाक़ियात का बयान करती है कि सरदार काहिन मक़दिस के अन्दर जाता हैकी नै जिंदगी के नए फलों का चढ़ावा चढ़ाए I यहाँ इस का बयां पेश है I      

ईसा अल मसीह मुरदों में से ज़िनदा हुए

  रन्तु सप्ताह के पहिले दिन बड़े भोर को वे उन सुगन्धित वस्तुओं को जो उन्होंने तैयार की थीं, ले कर कब्र पर आईं।
2 और उन्होंने पत्थर को कब्र पर से लुढ़का हुआ पाया।
3 और भीतर जाकर प्रभु यीशु की लोथ न पाई।
4 जब वे इस बात से भौचक्की हो रही थीं तो देखो, दो पुरूष झलकते वस्त्र पहिने हुए उन के पास आ खड़े हुए।
5 जब वे डर गईं, और धरती की ओर मुंह झुकाए रहीं; तो उन्होंने उन ने कहा; तुम जीवते को मरे हुओं में क्यों ढूंढ़ती हो?
6 वह यहां नहीं, परन्तु जी उठा है; स्मरण करो; कि उस ने गलील में रहते हुए तुम से कहा था।
7 कि अवश्य है, कि मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथ में पकड़वाया जाए, और क्रूस पर चढ़ाया जाए; और तीसरे दिन जी उठे।
8 तब उस की बातें उन को स्मरण आईं।
9 और कब्र से लौटकर उन्होंने उन ग्यारहों को, और, और सब को, ये बातें कह सुनाईं।
10 जिन्हों ने प्रेरितों से ये बातें कहीं, वे मरियम मगदलीनी और योअन्ना और याकूब की माता मरियम और उन के साथ की और स्त्रियां भी थीं।
11 परन्तु उन की बातें उन्हें कहानी सी समझ पड़ीं, और उन्होंने उन की प्रतीति न की।
12 तब पतरस उठकर कब्र पर दौड़ गया, और झुककर केवल कपड़े पड़े देखे, और जो हुआ था, उस से अचम्भा करता हुआ, अपने घर चला गया॥
13 देखो, उसी दिन उन में से दो जन इम्माऊस नाम एक गांव को जा रहे थे, जो यरूशलेम से कोई सात मील की दूरी पर था।
14 और वे इन सब बातों पर जो हुईं थीं, आपस में बातचीत करते जा रहे थे।
15 और जब वे आपस में बातचीत और पूछताछ कर रहे थे, तो यीशु आप पास आकर उन के साथ हो लिया।
16 परन्तु उन की आंखे ऐसी बन्द कर दी गईं थी, कि उसे पहिचान न सके।
17 उस ने उन से पूछा; ये क्या बातें हैं, जो तुम चलते चलते आपस में करते हो? वे उदास से खड़े रह गए।
18 यह सुनकर, उनमें से क्लियुपास नाम एक व्यक्ति ने कहा; क्या तू यरूशलेम में अकेला परदेशी है; जो नहीं जानता, कि इन दिनों में उस में क्या क्या हुआ है?
19 उस ने उन से पूछा; कौन सी बातें? उन्होंने उस से कहा; यीशु नासरी के विषय में जो परमेश्वर और सब लोगों के निकट काम और वचन में सामर्थी भविष्यद्वक्ता था।
20 और महायाजकों और हमारे सरदारों ने उसे पकड़वा दिया, कि उस पर मृत्यु की आज्ञा दी जाए; और उसे क्रूस पर चढ़वाया।
21 परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्त्राएल को छुटकारा देगा, और इन सब बातों के सिवाय इस घटना को हुए तीसरा दिन है।
22 और हम में से कई स्त्रियों ने भी हमें आश्चर्य में डाल दिया है, जो भोर को कब्र पर गई थीं।
23 और जब उस की लोथ न पाई, तो यह कहती हुई आईं, कि हम ने स्वर्गदूतों का दर्शन पाया, जिन्हों ने कहा कि वह जीवित है।
24 तब हमारे साथियों में से कई एक कब्र पर गए, और जैसा स्त्रियों ने कहा था, वैसा ही पाया; परन्तु उस को न देखा।
25 तब उस ने उन से कहा; हे निर्बुद्धियों, और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करने में मन्दमतियों!
26 क्या अवश्य न था, कि मसीह ये दुख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे?
27 तब उस ने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्र शास्त्रों में से, अपने विषय में की बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।
28 इतने में वे उस गांव के पास पहुंचे, जहां वे जा रहे थे, और उसके ढंग से ऐसा जान पड़ा, कि वह आगे बढ़ना चाहता है।
29 परन्तु उन्होंने यह कहकर उसे रोका, कि हमारे साथ रह; क्योंकि संध्या हो चली है और दिन अब बहुत ढल गया है। तब वह उन के साथ रहने के लिये भीतर गया।
30 जब वह उन के साथ भोजन करने बैठा, तो उस ने रोटी लेकर धन्यवाद किया, और उसे तोड़कर उन को देने लगा।
31 तब उन की आंखे खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उन की आंखों से छिप गया।
32 उन्होंने आपस में कहा; जब वह मार्ग में हम से बातें करता था, और पवित्र शास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?
33 वे उसी घड़ी उठकर यरूशलेम को लौट गए, और उन ग्यारहों और उन के साथियों को इकट्ठे पाया।
34 वे कहते थे, प्रभु सचमुच जी उठा है, और शमौन को दिखाई दिया है।
35 तब उन्होंने मार्ग की बातें उन्हें बता दीं और यह भी कि उन्होंने उसे रोटी तोड़ते समय क्योंकर पहचाना॥
36 वे ये बातें कह ही रहे ये, कि वह आप ही उन के बीच में आ खड़ा हुआ; और उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले।
37 परन्तु वे घबरा गए, और डर गए, और समझे, कि हम किसी भूत को देखते हैं।
38 उस ने उन से कहा; क्यों घबराते हो और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं?
39 मेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वहीं हूं; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी मांस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।
40 यह कहकर उस ने उन्हें अपने हाथ पांव दिखाए।
41 जब आनन्द के मारे उन को प्रतीति न हुई, और आश्चर्य करते थे, तो उस ने उन से पूछा; क्या यहां तुम्हारे पास कुछ भोजन है?
42 उन्होंने उसे भूनी मछली का टुकड़ा दिया।
43 उस ने लेकर उन के साम्हने खाया।
44 फिर उस ने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों।
45 तब उस ने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी।
46 और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।
47 और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।
48 तुम इन सब बातें के गवाह हो।

लूक़ा 24:1-48

ईसा अल मसीह की फ़तेह

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ‘पहले फलों’ के उस मुक़द्दस दिन पर एक इतनी बड़ी फ़तेह हासिल की कि उनके दुश्मनों और उनके साथियों को एत्क़ाद करना मुमकिन न था I उन्हों ने मौत पर ज़िन्दगी की जीत हासिल करके फ़ातिहाना जिंदगी में वापस आ गए थे I जिस तरह से इंजील शरीफ़ हमें समझाती है:     

  54 और जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।
55 हे मृत्यु तेरी जय कहां रही?
56 हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है।

1कुरिनथियों15:54-56

मगर यह फ़तेह सिर्फ़ नबी के लिए नहीं थी बल्कि यह फ़तेह आपके और मेरे लिए भी थी, वक़्तों की मीयाद के ज़रीये ज़मानत देते हुए ईद के पहले फलों के साथ I इंजील शरीफ़ इसे इस तरह समझाती है:   

  20 परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ।
21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।
22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।
23 परन्तु हर एक अपनी अपनी बारी से; पहिला फल मसीह; फिर मसीह के आने पर उसके लोग।
24 इस के बाद अन्त होगा; उस समय वह सारी प्रधानता और सारा अधिकार और सामर्थ का अन्त करके राज्य को परमेश्वर पिता के हाथ में सौंप देगा।
25 क्योंकि जब तक कि वह अपने बैरियों को अपने पांवों तले न ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है।
26 सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।

1कुरिन्थियों15:20-25

पहले फलों का ईद बतोर नबी हज़रत ईसा अल मसीह को भी उसी दिन मुर्दों में से जिंदा किया गया था ताकि हम जानें कि इसी मुर्दों में से जी उठने में हम भी यकसां तोर से शामिल हो सकें I जिस तरह से पहले फलों की ईद आने वाले दिनों के लिए मोसम –ए- बहार में अच्छे फ़सल की उम्मीदों के साथ एक नयी जिंदगी का हदया था इंजील शरीफ़ हम से कहती है कि हज़रत ईसा अल मसीह का मुर्दों में से ज़िन्दा होना भी तमाम जी उठने वालों में से पहला फल है और इससे यह उम्मीद की जाती है कि उसके ईमानदार लोग भी ‘जो उसके हैं’ कसीर तादाद में मुर्दों में से जी उठेंगे I तौरात शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ हमें समझाते हैं कि हज़रत आदम के सबब से मौत आयी I इंजील शरीफ़ हमसे कहती है कि एक मुतवाज़ी तरीक़े से ईसा अल मसीह के वसीले से क़यामत की जिंदगी हासिल होती है I ईसा नबी नयी जिंदगी का पहला फल है जिस में शामिल होने के लिए सब को दावत दी जाती है I      

ईस्टर : उस इतवार के दिन जी उठने को मनाना

मौजूदा ज़माने में हज़रत ईसा अल मसीह के जी उठने को अक्सर ईस्टर बतोर हवाला दिया जाता है,और वह इतवार का दिन था इसलिए उसे अक्सर ईस्टर का इतवार (ईस्टर सन्डे) बतोर याद किया जाता है I मगर यह अलफ़ाज़ सदियों साल बाद ही इस्तेमाल में लाये गए I इसके लिए मख़सूस अलफ़ाज़ ज़रूरी नहीं हैं I जो ज़रूरी है वह यह कि ईसा नबी का जी उठना पहले फलों की ईद की तकमील बतोर है जो सदियों साल पहले हज़रत मूसा के ज़माने से शुरू होकर ईसा नबी की सलीबी मौत तक चला आ रहा था, और यह भी कि आपके और मेरे लिए यह क्या मायने रखता है I                                                                                                                                             

नए हफ़्ते के इतवार के दिन के लिए इसे वक़्त की लकीर में देखा जा चूका है :                                                 

ईसा अल मसीह पहले फलों के दिन जी उठते हैं – मौत से नयी जिंदगी की नेमत आपके लिए और मेरे लिए पेश किया गया है I 

 ‘मुबारक जुम्मा’ जवाब दिया गया

 ‘मुबारक जुम्मे’ की बाबत यह भी हमारे सवाल का जवाब देता है I जिस तरह इंजील शरीफ समझाती है :

  9 पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।

इब्रानियों 2:9

मुबारक जुम्मे के दिन जब ‘इम्तिहान शुदा मौत’ की तरह उन्हों ने आप के और मेरे लिए और हम में से ‘हरेक के लिए’ किया तो मुबारक जुम्मा यह नाम इसलिए है कि यह हमारे लिये मुबारक था I जब वह पहले फलों की ईद में जी उठे तो वह अब हम में से हरेक के लिए नयी जिंदगी पेश करते हैं I    

हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत और तसल्ली क़ुरान शरीफ़ में

हालांकि हज़रत ईसा अल मसीह के मुर्दों में से जी उठने की बाबत कुरान शरीफ़ बहुत कम तफ़सील पेश करता है मगर तीन बहुत ही जियादा ख़ास दिनों की बाबत जोर देता है I इसे सूरा मरयम इस तरीके से तिलावत करता है कि :

 और (खुदा की तरफ़ से) जिस दिन मैं पैदा हुआ हूँ और जिस दिन मरूँगा मुझ पर सलाम है और जिस दिन (दोबारा) ज़िन्दा उठा कर खड़ा किया जाऊँगा

सूरए मरयम 19:33

इंजील शरीफ भी हज़रत ईसा अल मसीह की पैदाइश, उनकी मौत और अब उनकी क़ियामत I जबकि उनकी क़ियामत ‘पहला-फल’ है, जो तसलली नबी पर उनकी क़यामत में थी वह आज और अभी आपके और मेरे लिए भी दस्तियाब है I हज़रत ईसा अल मसीह ने इसे तब दिखाया जब वह मुर्दों में से जी उठे थे और जब उन्हों ने अपने शागिर्दों को सलाम किया था :       

  19 उसी दिन जो सप्ताह का पहिला दिन था, सन्ध्या के समय जब वहां के द्वार जहां चेले थे, यहूदियों के डर के मारे बन्द थे, तब यीशु आया और बीच में खड़ा होकर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले।
20 और यह कहकर उस ने अपना हाथ और अपना पंजर उन को दिखाए: तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।
21 यीशु ने फिर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूं।
22 यह कहकर उस ने उन पर फूंका और उन से कहा, पवित्र आत्मा लो।  

युहन्ना 20:19-22

दस्तूर के मुताबिक़ मुलिम्स ने एक दुसरे को सलाम करने के रिवाज को अपनाया है वह है : (अस-सलामु अलैकुम —तुम पर सलाम या (सलामती) हो) I इसको नबी हज़रत हज़रत इसा अल मसीह अपने ज़माने में सलामती के साथ अपनी क़यामत को जोड़ने के लिए इस्तेमाल करते थे जिसे आज हमारे लिए दिया गया है I ईसा नबी की जानिब से हर वक़्त हमें इस वायदे को याद करनी चाहिए जब हम एक दुसरे को सलाम करते वक़्त इमं अल्फाज़ को बोलते या सुनते हैं, और रूहुल कुदुस की नेमत को भी सोचें जो अभी हमारे लिए दस्तियाब है I              

हज़रत ईसा अल मसीह की क़ियामत का लिहाज़ किया गया

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने खुद को बहुत दिनों तक अपने शागिर्दों पर मुर्दों में से जिंदा साबित किया I यह वाक़ियात इंजील शरीफ़ से यहाँ बयान किया गया है I मगर हमको इसपर भी गौर करना चाहिए जो उन्हों ने अपने शागिर्दों पर अपना पहला मज़ाहिरा पेश किया I  

….उनके लिए कहानी सी मालूम हुईं

लूक़ा 24:10

नबी ख़ुद को चाहिए था कि:

  27 तब उस ने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्र शास्त्रों में से, अपने विषय में की बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।

लूक़ा 24:27

और फिर से बाद में

  44 फिर उस ने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों।

लूक़ा 24:44

हम कैसे यक़ीन कर सकते हैं कि अगर यह हक़ीक़त में अल्लाह का मंसूबा है जो हमें मौत से जिंदगी देता है ? सिर्फ़ ख़ुदा ही मुस्तक़बिल को जान सकता है, सो निशानात सदियों साल पहले तौरात शरीफ़ और ज़बूर शरीफ़ के नबियों के ज़रिये ज़ाहिर कर दिए गए थे और वह नबी ईसा अल मसीह के ज़रिये पूरे हुए थे उसे हमारे यकीन के लिए लिखे गए थे : 

  4 कि तू यह जान ले, कि वे बातें जिनकी तू ने शिक्षा पाई है, कैसी अटल हैं॥

लूक़ा1:4

कि हम नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी और जी उठने के अहम् सवाल की मतला कर सकते हैं जो चार मुख़तलिफ़ तहरीरों को जोड़ता है जो दस्तियाब हैं :

  1. यह निशानियों की नज़रे सानी करता है जो मूसा की तौरात में दी गयी है जिसका इशारा अल मसीह की तरफ़ है I
  2. यह निशानियों की तरफ़ नज़रे सानी करता है जो ‘नबियों की किताबों और ज़बूरों’ में दी गयी हैं I यह दो तहरीरें हमें इजाज़त देती हैं कि हम अपने खुद के लिए इन्साफ़ करें कि क्या वह हक़ीक़त में लिखा गया था कि “मसीह दुःख उठाएगा और तीसरे दिन मुर्दों में से जिलाया जाएगा”(लूक़ा 24:46) I
  3. यह हमको समझने में मदद करता है कि किस तरह इस क़यामत की जिंदगी के इनाम को हज़रत ईसा अल मसीह के ज़रिये से हासिल करें I
  4. यह हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत की बाबत कुछ गलत फह्मिफह्मी ले आता है,नज़रे सानी करते हुए कि मुक़द्दस कुरान शरीफ इस के बारे में क्या कहता है I     

दिन 7 – सबत का आराम

नबी हज़रात ईसा अल मसीह को फ़रेब दिया गया था और यहूदियों के फ़सह के मुक़द्दस दिन पर सलीब दी गयी थी, जो अब मुबारक जुम्मा बतोर जाना जाता है I फ़सह जुमेरात की शाम गुरूबे आफ़ताब से शुरू होता और जुम्मे के दिन गुरूबे आफ़ताब पर — छटे दिन ख़तम होता है I उस दिन का आखरी वाक़िया नबी के मुर्दा जिस्म का दफ़नाया जाना था I इंजील शरीफ़ बयान करती है कि किसतरह औरतों ने नबी के दफ़नाए जाने की गवाही दी I    

  55 और उन स्त्रियों ने जो उसके साथ गलील से आईं थीं, पीछे पीछे जाकर उस कब्र को देखा, और यह भी कि उस की लोथ किस रीति से रखी गई है।
56 और लौटकर सुगन्धित वस्तुएं और इत्र तैयार किया: और सब्त के दिन तो उन्होंने आज्ञा के अनुसार विश्राम किया॥

लूक़ा 23:55-56

औरतें नबी के जिस्म को तय्यार करना चाहती थीं मगर वक़्त निकल चुका था और जुम्मे की शाम को गुरूबे आफ़ताब पर सबत का आराम का दिन शुरू हो चुका था I और यह हफ़्ते का सातवां दिन था और यहूदी लोगों को उस दिन काम करने की इजाज़त नहीं थी I यह हुक्म तौरात में तखलीक के शुरू से चली आरही है I अल्लाह ने तमाम चीज़ों को छे दिन में बनाए I तौरात में इसतरह ज़िक्र है :   

आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया।
2 और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया। और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया।

पैदाइश 2:1-2

सो औरतें हालाँकि नबी के जिस्म को तैयार तो करना चाहती थीं, मगर तौरात के दस अहकाम की फ़रमान बरदार थी और उन्हों ने उस दिन आराम किया I

मगर सरदार काहिनों ने सबत के दिन भी अपना काम जारी रखा I इनजीले शरीफ़ गवर्नर के साथ उनकी मीटिंगों की बाबत बयान करती है I      

 

62 दूसरे दिन जो तैयारी के दिन के बाद का दिन था, महायाजकों और फरीसियों ने पीलातुस के पास इकट्ठे होकर कहा।
63 हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमाने वाले ने अपने जीते जी कहा था, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा।
64 सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहने लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।
65 पीलातुस ने उन से कहा, तुम्हारे पास पहरूए तो हैं जाओ, अपनी समझ के अनुसार रखवाली करो।
66 सो वे पहरूओं को साथ ले कर गए, और पत्थर पर मुहर लगाकर कब्र की रखवाली की॥

मत्ती 27:62 -66

सो उस सबत के दिन काम करते हुए देखा और सोचा कि मसीह का जिस्म जो कब्र में दफ़न है उसकी हिफ़ाज़त होनी चाहिए I नबी हज़रात ईसा अल मसीह का जिस्म मुर्दे की हालत में आराम किया जा औरतों ने उस मुक़द्दस हफ़्ते में सबत की फ़रमान बरदारी में आराम किया I वक़्त की लकीर बताती है कि उस दिन उनका आराम सातवें दिन की तख़लीक़ का अक्स था जहां तौरात कहती है कि अल्लाह ने तख़ लीक़ के काम से आराम किया I     

मौत के सबत का आराम नबी हज़रत ईसा अल मसीह के लिए

मगर यह अपने कुव्वत के इज़हार से पहले सिर्फ़ आराम था I सूरा अल फ़ज्र (सूरा 89— तुलूए सुबह)हम को याद दिलाती है कि एक अँधेरी रात के बाद का फ़ज्र कितना अहम् हो सकता है I पौ फटना अजीब कामों को ज़ाहिर कर सकता है ‘उनके लिए जो समझते हैं’I    

सुबह की क़सम
और दस रातों की
और ज़ुफ्त व ताक़ की
और रात की जब जाने लगे
अक़्लमन्द के वास्ते तो ज़रूर बड़ी क़सम है (कि कुफ़्फ़ार पर ज़रूर अज़ाब होगा) और दुसरे दिन अछम्बे में डालने वाली फ़तेह वाक़े हुई जिस तरह हम यहाँ देखते है I

सूरा अल फ़ज्र 89:1-5 

पौ फटने पर हम वह चीज़ देखते हैं जो दुसरे दिन इज़हार होता है 

दिन छे – हज़रत ईसा अल मसीह और मुबारक जुम्मा

सूरा 62 (इबादत गुज़ारों की जमाअत, रोज़े जुम्मा—अल जुम्मा) हम से कहता है कि रोज़े जुम्मा मुसमानों के लिए नमाज़ अदा करने का दिन है, मगर सूरा अल—जुम्मा सब से पहले एक दावा पेश करता है – जिसको नबी हज़रत ईसा ने अपनी अदाकारी में मसीह अल जुम्मा होने बतोर कबूल किया, नमाज़ के दिन को मुक़द्दस ठहराते हुए की वह जुम्मे का दिन हो, एलान किया:     

 (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं तो अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करोऔर ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है

सूरा अल–जुम्मा 62:6—7

(ऐ रसूल)) तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख़्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं तो अगर तुम(अपने दावे में) सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करो
और ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है

सूरा अल – जुम्मा की इन आयतों का मतलब है कि अगर हम अल्लाह के सच्चे दोस्त हैं तो हमको मौत का कोई खौफ़ नहीं होगा I मगर जबकि वह (और हम) अपने नेक आमाल की बाबत शक करते की वह कैसे हैं तो हम मौत की बड़ी क़ीमत का एहतिराज़ करते हैं I मगर इस जुम्मे को उसके आख़री हफ़्ते के छट्टे दिन एक यहूदी होने के नाते ईसा अल मसीह ने इस क़तई इम्तिहान का सामना किया – और इसको दुआ के साथ शुरू किया I जिस तरह इंजील शरीफ़ नबी की बाबत समझाती है :    

  37 और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा।
38 तब उस ने उन से कहा; मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला चाहते: तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो।
39 फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।

मत्ती 26:37—39

इस जुम्मे के वाक़ियात को जारी रखने से पहले, हम उन वाकियात की नज़रे सानी करेंगे जो इस जुम्मे की नमाज़ तक ले जा रही है I   हमारा ठहराया हुआ दुश्मन, शैतान पांचवें दिन यहूदा इस्करयूत में समा चुका था कि नबी ईसा अल मसीह को पकड़वाए I दुसरे दिन यानी 6 की शाम को नबी ने अपने आखरी अशा को अपने साथियों के साथ अंजाम दिया (जिन्हें उनके शागिर्द भी कहा जाता है) I उस खाने पर उन्हों ने तम्सीलों और तालीमात के ज़रिये समझाया कि हमें किसतरह खुदा की उस बड़ी महब्बत को जानते हुए एक दुसरे से महब्बत करनी चाहिए I बजा तोर से उन्हों ने इसे कैसे अंजाम दिया इंजील शरीफ़ से बयान किया गया है I फिर उन्हों ने तमाम ईमानदारों के लिए दुआ की जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं I       

इंजील शरीफ़ इस बात का ज़िक्र करती है कि उनके जुम्मे की नमाज़ के बाद क्या हुआ था :   

गत्सम्नी बाग़ में गिरफ़्तारी

  शु ये बातें कहकर अपने चेलों के साथ किद्रोन के नाले के पार गया, वहां एक बारी थी, जिस में वह और उसके चेले गए।
2 और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी वह जगह जानता था, क्योंकि यीशु अपने चेलों के साथ वहां जाया करता था।
3 तब यहूदा पलटन को और महायाजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहां आया।
4 तब यीशु उन सब बातों को जो उस पर आनेवाली थीं, जानकर निकला, और उन से कहने लगा, किसे ढूंढ़ते हो?
5 उन्होंने उस को उत्तर दिया, यीशु नासरी को: यीशु ने उन से कहा, मैं ही हूं: और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उन के साथ खड़ा था।
6 उसके यह कहते ही, कि मैं हूं, वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।
7 तब उस ने फिर उन से पूछा, तुम किस को ढूंढ़ते हो।
8 वे बोले, यीशु नासरी को। यीशु ने उत्तर दिया, मैं तो तुम से कह चुका हूं कि मैं ही हूं, यदि मुझे ढूंढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।
9 यह इसलिये हुआ, कि वह वचन पूरा हो, जो उस ने कहा था कि जिन्हें तू ने मुझे दिया, उन में से मैं ने एक को भी न खोया।
10 शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर, उसका दाहिना कान उड़ा दिया, उस दास का नाम मलखुस था।
11 तब यीशु ने पतरस से कहा, अपनी तलवार काठी में रख: जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे न पीऊं?
12 तब सिपाहियों और उन के सूबेदार और यहूदियों के प्यादों ने यीशु को पकड़कर बान्ध लिया।
13 और पहिले उसे हन्ना के पास ले गए क्योंकि वह उस वर्ष के महायाजक काइफा का ससुर था।

युहन्ना18:1—13

हज़रत ईसा नबी येरूशलेम से कुछ ही फ़ासिले पर बाहर दुआ करने गए I जहां यहूदा इस्करयूत सिपाहियों को अपने साथ ले आया कि उन्हें गिरफ़्तार करे I अगर हाँ गिरफ़्तारी का सामना करते हैं तो हम लड़ने, भागने या छिपने की कोशिश करते I मगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने न लड़ाई की और न छिपने या भागने की कोशिश की I उन्हों ने साफ़ तोर से क़बूला कि वह हक़ीक़त में नबी ईसा हैं जिन की उन्हें तलाश थी I उनका साफ़ इक़रार (“मैं वही हूं”) सिपाहियों को अछमबा कर दिया था और उनके शागिर्द उन्हें छोड़ कर भाग लिए थे हज़रत ईसा नबी ने खुद को गिरफ़्तारी दी और उन्हें मुक़द्दमे के लिए सरदार काहिन हन्ना के घर ले गए I        

पहला मुक़द्दमा

इंजील शरीफ़ बयान करती है कि ईसा नबी पर किस तरह मुक़द्दमा चलाया गया था :

  18 दास और प्यादे जाड़े के कारण को एले धधकाकर खड़े ताप रहे थे और पतरस भी उन के साथ खड़ा ताप रहा था॥
19 तक महायाजक ने यीशु से उसके चेलों के विषय में और उसके उपदेश के विषय में पूछा।
20 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि मैं ने जगत से खोलकर बातें की; मैं ने सभाओं और आराधनालय में जहां सब यहूदी इकट्ठे हुआ करते हैं सदा उपदेश किया और गुप्त में कुछ भी नहीं कहा।
21 तू मुझ से क्यों पूछता है? सुनने वालों से पूछ: कि मैं ने उन से क्या कहा? देख वे जानते हैं; कि मैं ने क्या क्या कहा
22 तब उस ने यह कहा, तो प्यादों में से एक ने जो पास खड़ा था, यीशु को थप्पड़ मारकर कहा, क्या तू महायाजक को इस प्रकार उत्तर देता है।
23 यीशु ने उसे उत्तर दिया, यदि मैं ने बुरा कहा, तो उस बुराई पर गवाही दे; परन्तु यदि भला कहा, तो मुझे क्यों मारता है?
24 हन्ना ने उसे बन्धे हुए काइफा महायाजक के पास भेज दिया॥  

युहन्ना18:19-24

नबी हज़रत ईसा अल मसीह को साबिक़ सरदार काहिन् से पूछ ताछ के बाद उस ज़माने के हाल के सरदार काहीं के पास दुसरे मुक़द्दमे के भेजा गया I   

दूसरा मुक़द्दमा                      

वहाँ उनको तमाम मज़हबी रहनुमाओं के सामने पूछ ताछ की जाएगी I इंजील शरीफ़ इसको आगे के मुक़द्दमे के साथ बयान करती है :

  53 फिर वे यीशु को महायाजक के पास ले गए; और सब महायाजक और पुरिनए और शास्त्री उसके यहां इकट्ठे हो गए।
54 पतरस दूर ही दूर से उसके पीछे पीछे महायाजक के आंगन के भीतर तक गया, और प्यादों के साथ बैठ कर आग तापने लगा।
55 महायाजक और सारी महासभा यीशु के मार डालने के लिये उसके विरोध में गवाही की खोज में थे, पर न मिली।
56 क्योंकि बहुतेरे उसके विरोध में झूठी गवाही दे रहे थे, पर उन की गवाही एक सी न थी।
57 तब कितनों ने उठकर उस पर यह झूठी गवाही दी।
58 कि हम ने इसे यह कहते सुना है कि मैं इस हाथ के बनाए हुए मन्दिर को ढ़ा दूंगा, और तीन दिन में दूसरा बनाऊंगा, जो हाथ से न बना हो।
59 इस पर भी उन की गवाही एक सी न निकली।
60 तब महायाजक ने बीच में खड़े होकर यीशु से पूछा; कि तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं?
61 परन्तु वह मौन साधे रहा, और कुछ उत्तर न दिया: महायाजक ने उस से फिर पूछा, क्या तू उस पर म धन्य का पुत्र मसीह है?
62 यीशु ने कहा; हां मैं हूं: और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी और बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे।
63 तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा; अब हमें गवाहों का और क्या प्रयोजन है
64 तुम ने यह निन्दा सुनी: तुम्हारी क्या राय है? उन सब ने कहा, वह वध के योग्य है।
65 तब कोई तो उस पर थूकने, और कोई उसका मुंह ढांपने और उसे घूसे मारने, और उस से कहने लगे, कि भविष्यद्वाणी कर: और प्यादों ने उसे लेकर थप्पड़ मारे॥

मरक़ुस14:53-65

यहूदी रहनुमाओं ने नबी ईसा अल मसीह पर मौत का फ़रमान जारी किया I मगर जबकि येरुशलेम में रोम की सल्तनत थी तो क़त्ल का हुक्म सिर्फ़ और सिर्फ़ रोम के हाकिम की मंज़ूरी से ही होसकता था इसो उन्हों ने नबी हज़रत मसीह को हाल के रोमी हाकिम पिन्तुस पिलातुस के पास ले गए I इन्जील शरीफ़ यह भी बयां करती है कि उसी दौरान यहूदा इस्करयूत का क्या हुआ जिसने नबी हज़रत ईसा को पकड़वाया था I   

यहूदा इस्करयूत फ़रेबी का क्या हुआ ?

  ब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।
2 और उन्होंने उसे बान्धा और ले जाकर पीलातुस हाकिम के हाथ में सौंप दिया॥
3 जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया।
4 और कहा, मैं ने निर्दोषी को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान।
5 तब वह उन सिक्कों मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फांसी दी।
6 महायाजकों ने उन सिक्कों लेकर कहा, इन्हें भण्डार में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लोहू का दाम है।
7 सो उन्होंने सम्मति करके उन सिक्कों से परदेशियों के गाड़ने के लिये कुम्हार का खेत मोल ले लिया।
8 इस कारण वह खेत आज तक लोहू का खेत कहलाता है।

मत्ती 27:1-8

रोम के हाकिम के ज़रिये हज़रत ईसा अल मसीह की पेशी हुई

  11 जब यीशु हाकिम के साम्हने खड़ा था, तो हाकिम ने उस से पूछा; कि क्या तू यहूदियों का राजा है? यीशु ने उस से कहा, तू आप ही कह रहा है।
12 जब महायाजक और पुरिनए उस पर दोष लगा रहे थे, तो उस ने कुछ उत्तर नहीं दिया।
13 इस पर पीलातुस ने उस से कहा: क्या तू नहीं सुनता, कि ये तेरे विरोध में कितनी गवाहियां दे रहे हैं?
14 परन्तु उस ने उस को एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहां तक कि हाकिम को बड़ा आश्चर्य हुआ।
15 और हाकिम की यह रीति थी, कि उस पर्व्व में लोगों के लिये किसी एक बन्धुए को जिसे वे चाहते थे, छोड़ देता था।
16 उस समय बरअब्बा नाम उन्हीं में का एक नामी बन्धुआ था।
17 सो जब वे इकट्ठे हुए, तो पीलातुस ने उन से कहा; तुम किस को चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूं? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?
18 क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे डाह से पकड़वाया है।
19 जब वह न्याय की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उस की पत्नी ने उसे कहला भेजा, कि तू उस धर्मी के मामले में हाथ न डालना; क्योंकि मैं ने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है।
20 महायाजकों और पुरनियों ने लोगों को उभारा, कि वे बरअब्बा को मांग ले, और यीशु को नाश कराएं।
21 हाकिम ने उन से पूछा, कि इन दोनों में से किस को चाहते हो, कि तुम्हारे लिये छोड़ दूं? उन्होंने कहा; बरअब्बा को।
22 पीलातुस ने उन से पूछा; फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूं? सब ने उस से कहा, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।
23 हाकिम ने कहा; क्यों उस ने क्या बुराई की है? परन्तु वे और भी चिल्ला, चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए”।
24 जब पीलातुस ने देखा, कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इस के विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के साम्हने अपने हाथ धोए, और कहा; मैं इस धर्मी के लोहू से निर्दोष हूं; तुम ही जानो।
25 सब लोगों ने उत्तर दिया, कि इस का लोहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो।
26 इस पर उस ने बरअब्बा को उन के लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए॥

मत्ती 27:11-26

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत, मौत और तद्फ़ीन (दफ़न किया जाना)

इंजील शरीफ़ बड़े तफ़सील के साथ बयान करती है कि हज़रत ईसा अल मसीह को किस तरह सलीब दी गयी थी I यहाँ इस का पूरा बयान मौजूद है I

  27 तब हाकिम के सिपाहियों ने यीशु को किले में ले जाकर सारी पलटन उसके चहुं ओर इकट्ठी की।
28 और उसके कपड़े उतारकर उसे किरिमजी बागा पहिनाया।
29 और काटों को मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा; और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेककर उसे ठट्ठे में उड़ाने लगे, कि हे यहूदियों के राजा नमस्कार।
30 और उस पर थूका; और वही सरकण्डा लेकर उसके सिर पर मारने लगे।
31 जब वे उसका ठट्ठा कर चुके, तो वह बागा उस पर से उतारकर फिर उसी के कपड़े उसे पहिनाए, और क्रूस पर चढ़ाने के लिये ले चले॥
32 बाहर जाते हुए उन्हें शमौन नाम एक कुरेनी मनुष्य मिला, उन्होंने उसे बेगार में पकड़ा कि उसका क्रूस उठा ले चले।
33 और उस स्थान पर जो गुलगुता नाम की जगह अर्थात खोपड़ी का स्थान कहलाता है पहुंचकर।
34 उन्होंने पित्त मिलाया हुआ दाखरस उसे पीने को दिया, परन्तु उस ने चखकर पीना न चाहा।
35 तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया; और चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।
36 और वहां बैठकर उसका पहरा देने लगे।
37 और उसका दोषपत्र, उसके सिर के ऊपर लगाया, कि “यह यहूदियों का राजा यीशु है”।
38 तब उसके साथ दो डाकू एक दाहिने और एक बाएं क्रूसों पर चढ़ाए गए।
39 और आने जाने वाले सिर हिला हिलाकर उस की निन्दा करते थे।
40 और यह कहते थे, कि हे मन्दिर के ढाने वाले और तीन दिन में बनाने वाले, अपने आप को तो बचा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो क्रूस पर से उतर आ।
41 इसी रीति से महायाजक भी शास्त्रियों और पुरनियों समेत ठट्ठा कर करके कहते थे, इस ने औरों को बचाया, और अपने को नहीं बचा सकता।
42 यह तो “इस्राएल का राजा है”। अब क्रूस पर से उतर आए, तो हम उस पर विश्वास करें।
43 उस ने परमेश्वर का भरोसा रखा है, यदि वह इस को चाहता है, तो अब इसे छुड़ा ले, क्योंकि इस ने कहा था, कि “मैं परमेश्वर का पुत्र हूं”।
44 इसी प्रकार डाकू भी जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे उस की निन्दा करते थे॥
45 दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अन्धेरा छाया रहा।
46 तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, एली, एली, लमा शबक्तनी अर्थात हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?
47 जो वहां खड़े थे, उन में से कितनों ने यह सुनकर कहा, वह तो एलिय्याह को पुकारता है।
48 उन में से एक तुरन्त दौड़ा, और स्पंज लेकर सिरके में डुबोया, और सरकण्डे पर रखकर उसे चुसाया।
49 औरों ने कहा, रह जाओ, देखें, एलिय्याह उसे बचाने आता है कि नहीं।
50 तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्लाकर प्राण छोड़ दिए।
51 और देखो मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट कर दो टुकड़े हो गया: और धरती डोल गई और चटानें तड़क गईं।
52 और कब्रें खुल गईं; और सोए हुए पवित्र लोगों की बहुत लोथें जी उठीं।
53 और उसके जी उठने के बाद वे कब्रों में से निकलकर पवित्र नगर में गए, और बहुतों को दिखाई दिए।
54 तब सूबेदार और जो उसके साथ यीशु का पहरा दे रहे थे, भुईंडोल और जो कुछ हुआ था, देखकर अत्यन्त डर गए, और कहा, सचमुच “यह परमेश्वर का पुत्र था”।
55 वहां बहुत सी स्त्रियां जो गलील से यीशु की सेवा करती हुईं उसके साथ आईं थीं, दूर से यह देख रही थीं।
56 उन में मरियम मगदलीली और याकूब और योसेस की माता मरियम और जब्दी के पुत्रों की माता थीं।                                                         

मत्ती 27:27-56

इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह की मौत के लम्हों पर कई मकामों में ज़लज़लों के आने, चट्टानों के तड़ख़ने, और क़ब्रों के खुलने का बयान करती है जबकि सूरा अज़–ज़ल्ज़लह भी इन्हीं बैटन का ज़िकर करता है (सूरा 99 – ज़ल्ज़लह)

 जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगीऔर ज़मीन अपने अन्दर के बोझे (मादनयात मुर्दे वग़ैरह) निकाल डालेगीऔर एक इन्सान कहेगा कि उसको क्या हो गया हैउस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगीक्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसको हुक्म दिया होगाउस दिन लोग गिरोह गिरोह (अपनी कब्रों से) निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देखे                                                        

सूरा अज़ – ज़ल्ज़लह 99:1—6

सूरा अज़–ज़ल्ज़लह इन्साफ़ के दिन (क़यामत के दिन) का इस्तेमाल करता है I हज़रत ईसा अल मसीह की मौत पर सूरा अज़ — ज़लज़ला के वाक़ियात का मुताबिक़ होना एक निशानी बतोर है कि उनकी मौत उस आने वाले इन्साफ़ के दिन के लिए एक बहुत ही ज़रूरी क़ीमत थी I     

उसके पहलू को ‘छेदा गया’

युहन्ना की इनजील मस्लूबियत के दौरान एक गुरवीदा किये जाने की तफ़सील को बयान करती है I वह बयान करती है :

  31 और इसलिये कि वह तैयारी का दिन था, यहूदियों ने पीलातुस से बिनती की कि उन की टांगे तोड़ दी जाएं और वे उतारे जाएं ताकि सब्त के दिन वे क्रूसों पर न रहें, क्योंकि वह सब्त का दिन बड़ा दिन था।
32 सो सिपाहियों ने आकर पहिले की टांगें तोड़ीं तब दूसरे की भी, जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे।
33 परन्तु जब यीशु के पास आकर देखा कि वह मर चुका है, तो उस की टांगें न तोड़ीं।
34 परन्तु सिपाहियों में से एक ने बरछे से उसका पंजर बेधा और उस में से तुरन्त लोहू और पानी निकला।
35 जिस ने यह देखा, उसी ने गवाही दी है, और उस की गवाही सच्ची है; और वह जानता है, कि सच कहता है कि तुम भी विश्वास करो।
36 ये बातें इसलिये हुईं कि पवित्र शास्त्र की यह बात पूरी हो कि उस की कोई हड्डी तोड़ी न जाएगी।
37 फिर एक और स्थान पर यह लिखा है, कि जिसे उन्होंने बेधा है, उस पर दृष्टि करेंगे॥

युहन्ना19:31-37

युहन्ना ने रोमी सिपाहियों को ईसा अल मसीह के पहलू पर नेज़े से छेदते हुए देखा था जिस से पानी और खून पह्लू से बहने लगा था, जो इस बात का इशारा करता है कि ईसा नबी की मौत दिल की धड़कन रुकने के सबब से हुई थी I

इंजील शरीफ उस दिन के एक ख़ास वाक़िये का बयान करती है – यानी कि उन के बदन का दफ़नाया जाना I   

  57 जब सांझ हुई तो यूसुफ नाम अरिमतियाह का एक धनी मनुष्य जो आप ही यीशु का चेला था आया: उस ने पीलातुस के पास जाकर यीशु की लोथ मांगी।
58 इस पर पीलातुस ने दे देने की आज्ञा दी।
59 यूसुफ ने लोथ को लेकर उसे उज्ज़वल चादर में लपेटा।
60 और उसे अपनी नई कब्र में रखा, जो उस ने चट्टान में खुदवाई थी, और कब्र के द्वार पर बड़ा पत्थर लुढ़काकर चला गया।
61 और मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम वहां कब्र के साम्हने बैठी थीं॥

मत्ती 27:57-61

दिन 6 – मुबारक जुम्मा

यहूदी कैलंडर के हिसाब से उनका हरेक दिन गुरूबे आफ़ताब से शुरू होता है I सो हफ़्ते का वह छटटा दिन ईसा नबी के अपने शागिरदों के साथ पाक अशा में शरीक होने के साथ शुरू हुआ I मगर दिन के ख़त्म होने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया, कई मर्तबा मुक़द्दमे में लेजाया गया, सलीब दी गयी, उनके पहलू पर नेज़े से छेदा गया, और उन्हें दफ़नाया गया I इस दिन को अक्सर ‘मुबारक जुम्मा’ के नाम से हवाला दिया जाता है I मगर यह वाक़ियात एक सवाल ले आता है कि : एक पकड़वाए जाने का दिन, सताए जाने और एक नबी की मौत को क्या कभी ‘अच्छा’ या ‘मुबारक’ बतोर क़रार दिया जा सकता है? यह क्यूँ मुबारक या अच्छा जुम्मा है , और खराब जुम्मा क्यूं नहीं है ?

यह एक बड़ा सवाल है जिसे हम इंजील के बयानात को अगले दिनों में जारी रखते हुए जवाब दे सकते हैं , मगर तारीखी वक़्त की लकीर में एक सबूत पाया जाता है वह यह है कि अगर हम गौर करते हैं कि यह जुम्मे का दिन निसान महीने की 14 तारीख़ को पड़ता है और उसी दिन फ़सह का दिन भी है जिस दिन यहूदियों ने मिस्र में 1500 साल पहले मिस्र की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए हर ख़ानदान के हिसाब से एक बर्रे को ज़बह किया था I                   

दिन 6–जुम्मा – ईसा अल मसीह की जिंदगी के आखरी हफ़्ते को तौरात शरीफ़ की तंज़ीम ओ तरतीब से मवाज़िना किया गया है

कई एक आदमियों की ज़िन्दगी का बयान उनकी मौत पर ख़त्म होता है, मगर इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह की कहानी को जरी रखती है ताकि हम समझ सकें कि यह दिन एक मुबारक जुम्मा  बतोर कभी सोचा जा सकता है I उसका दूसरा दिन सबत का दिन था – दिन 7 .    

मगर इस से पहले आइये हम सूरा अल – जुम्मा की तरफ़ वापस जाएं उस आयत को जारी रखते हुए जिसे हम ने पढ़ा था I 

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मौत जिससे तुम लोग भागते हो वह तो ज़रूर तुम्हारे सामने आएगी फिर तुम पोशीदा और ज़ाहिर के जानने वाले (ख़ुदा) की तरफ लौटा दिए जाओगे फिर जो कुछ भी तुम करते थे वह तुम्हें बता देगाऐ ईमानदारों जब जुमा का दिन नमाज़ (जुमा) के लिए अज़ान दी जाए तो ख़ुदा की याद (नमाज़) की तरफ दौड़ पड़ो और (ख़रीद) व फरोख्त छोड़ दो अगर तुम समझते हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है

सूरए जुमुअह62:8-9

नबी हज़रत ईसा अल मसीह सूरह अल –जुम्मा की छटटी और सातवें आयत को चुनौती बतोर लेते हुए मौत से नहीं भागे थे, मगर दुआ के साथ शुरू करते हुए इस बड़े इम्तिहान का सामना किया,यह साबित करने के लिए कि  वह ‘खुदा के एक दोस्त’ हैं I तो फिर क्या यह उनकी दिलेरी की याददाश्त नहीं है कि बाद में मुस्लिम्स ने जुम्मे को मस्जिद में नमाज़ के लिए अलग कर किया ? इस बतोर अल्लाह नहीं चाहता कि हम नबी की ख़िदमत गुज़ारी को भूल जाएं I

दिन 5 – शैतान नीचे उतरता है कि मसीह को मारे

नबी ईसा अल मसीह अपनी ज़िन्दगी के आख़री हफ़ते के चौथे दिन अपने ज़मीन पर लौटने के निशानात की बाबत नबुवत की थी I इंजील शरीफ़ फिर बयान करता कि किस तरह मज़हबी रहनुमा उन्हें गिरफ़्तार करना चाहते थे I शैतान (या इबलीस)ने यह तरीक़ा इस्तेमाल किया कि नबी को मारे – वह उनका ठहराया हुआ दुशमन है I यहाँ देखें कि इंजील में इसको किस तरह बयान किया गया है I     .

  खमीरी रोटी का पर्व्व जो फसह कहलाता है, निकट था।
2 और महायाजक और शास्त्री इस बात की खोज में थे कि उस को क्योंकर मार डालें, पर वे लोगों से डरते थे॥
3 और शैतान यहूदा में समाया, जो इस्करियोती कहलाता और बारह चेलों में गिना जाता था।
4 उस ने जाकर महायाजकों और पहरूओं के सरदारों के साथ बातचीत की, कि उस को किस प्रकार उन के हाथ पकड़वाए।
5 वे आनन्दित हुए, और उसे रूपये देने का वचन दिया।
6 उस ने मान लिया, और अवसर ढूंढ़ने लगा, कि बिना उपद्रव के उसे उन के हाथ पकड़वा दे॥                                                                                  

लूका 22:1-6

हम देखते हैं कि शैतान ने पूरा फ़ाइदा उठाया कि यहूदा इसकरयूत में समाए ताकि नबी को पकड़वाए I यह हमको हैरतज़दह नहीं करना चाहिए I सूरा फ़तीर (सूरा 35 – मोजिद) और सूरा या – सीन (सूरा 36 – यासीन) शैतान की बाबत इस तरह कहता है कि :      

 बेशक शैतान तुम्हारा दुश्मन है तो तुम भी उसे अपना दुशमन बनाए रहो वह तो अपने गिरोह को बस इसलिए बुलाता है कि वह लोग (सब के सब) जहन्नुमी बन जाएँ

सूरा फ़तीर 35:6

“बेशक शैतान तुम्हारा दुशमन है सो तुम भी (उसकी मुखालफ़त की शक्ल में) उसे दुशमन ही बनाए रखो I वह तो अपने गिरोह को इसलिए बुलाता है कि वह दोज़खियों में शामिल हो जाएँ I”    

 ऐ आदम की औलाद क्या मैंने तुम्हारे पास ये हुक्म नहीं भेजा था कि (ख़बरदार) शैतान की परसतिश न करना वह यक़ीनी तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन हैऔर ये कि (देखो) सिर्फ मेरी इबादत करना यही (नजात की) सीधी राह हैऔर (बावजूद इसके) उसने तुममें से बहुतेरों को गुमराह कर छोड़ा तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते थे

सूरा यासीन 36:60-62

इंजील शरीफ़ के आख़िर में शैतान को रोया में बयान किया गया है I

  7 फिर स्वर्ग पर लड़ाई हुई, मीकाईल और उसके स्वर्गदूत अजगर से लड़ने को निकले, और अजगर ओर उसके दूत उस से लड़े।
8 परन्तु प्रबल न हुए, और स्वर्ग में उन के लिये फिर जगह न रही।
9 और वह बड़ा अजगर अर्थात वही पुराना सांप, जो इब्लीस और शैतान कहलाता है, और सारे संसार का भरमाने वाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया; और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए।

मुकाशफ़ा12:7-9

शैतान आप का भी ठहराया हुआ दुश्मन है जिसको एक ज़बरदस्त अशधा बतोर तसव्वुर किया गया है I वह इतना अययार (धूर्त) है कि पूरी दुनया को वरग़ला कर सही रास्ते से दूर ले जा सकता है I इस दुश्मन को हज़रत आदम के साथ बागे अदन में इस बतोर नबुवत किया गया था कि वह बुरे कामों को ही अंजाम देगा I सो उसने यहूदा इसकरयूत को अपने क़ाबू में लिया कि नबी ईसा अल मसीह को बर्बाद करे I जिसे इंजील इस तरह बयान करती है कि :     

  16 और वह उसी समय से उसे पकड़वाने का अवसर ढूंढ़ने लगा॥

मत्ती  26:16

दूसरे दिन – दिन 6 – फ़सह की ईद थी जेओ जेओ नबी हज़रत मूसा ने उस ज़माने के हिसाब से 1500 साल पहले शुरू किया था I किस शैतान यहूदा इसकरयूत के ज़रिये इस मुक़द्दस दिन में अपने मोक़े का फ़ाइदा उठाएगा इसे हम अगली तहरीर में देखेंगे I  

दिन 5 का खुलासा

वक़्त की लकीर बताती है कि उस हफ़्ते के पांचवें दिन वह बड़ा अज़धा शैतान हरकत में आया कि उसके सबसे बड़े दुश्मन – नबी हज़रत ईसा अल मसीह को मारे –

Shaytan, the Great Dragon, enters Judas to strike the Prophet Isa al Masih

शैतान बड़ा अज़धा यहूदा इसकरयूत में समाता है ताकि नबी हज़रत ईसा अल मसीह को मारे I