वह दिन : अल–इनशिक़ाक़ और अत-तूर और अल मसीह

सूरा अल-इनशिक़ाक़ (सूरा 84 आफ़ताब का फटना) बयान करता है कि फ़ैसले के दिन (क़ियामत के दिन)किस तरह आसमान और ज़मीन हिलाई जाएंगी और बर्बाद की जायेगी ।     

जब आसमान फट जाएगा)और अपने परवरदिगार का हुक्म बजा लाएगा और उसे वाजिब भी यही है और जब ज़मीन (बराबर करके) तान दी जाएगी और जो कुछ उसमें है उगल देगी और बिल्कुल ख़ाली हो जाएगी और अपने परवरदिगार का हुक्म बजा लाएगी और उस पर लाजि़म भी यही है (तो क़यामत आ जाएगी) ऐ इन्सान तू अपने परवरदिगार की हुज़ूरी की कोशिश करता है । तो तू (एक न एक दिन) उसके सामने हाजि़र होगा फिर (उस दिन) जिसका नामाए आमाल उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा उससे तो हिसाब आसान तरीके़ से लिया जाएगा और (फिर) वह अपने (मोमिनीन के) क़बीले की तरफ ख़ुश ख़ुश पलटेगा लेकिन जिस शख़्स को उसका नामए आमल उसकी पीठ के पीछे से दिया जाएगा । वह तो मौत की दुआ करेगा और जहन्नुम वासिल होगा ।

सूरए अल इन्शिकाक 84:1-12

सूरा अल- इनशिक़ाक़ उन लोगों को ख़बरदार करता करता है जिनके आमाल का हिसाब किताब उनके दाहने हाथ में नहीं दिया जाएगा वह उस दिन ‘भड़कती हुई आग’ में डाले जाएंगे ।

क्या आप जानते हैं कि आप के आमाल का हिसाब किताब  आपके दहने हाथ में दिए जाएंगे या आपके पीठ पीछे दिए जाएंगे ?

सूरा अत – तूर (सूरा 52 – चढ़ना) इन्साफ़ के दिन ज़मीन के हिलाए जाने की बाबत और लोगों के ख़स्ता हाली की बाबत तफ़सील से बयान करता है ।         

तो (ऐ रसूल) तुम इनको इनकी हालत पर छोड़ दो यहाँ तक कि वह जिसमें ये बेहोश हो जाएँगे । इनके सामने आ जाए जिस दिन न इनकी मक्कारी ही कुछ काम आएगी और न इनकी मदद ही की जाएगी और इसमें शक नहीं कि ज़ालिमों के लिए इसके अलावा और भी अज़ाब है मगर उनमें बहुतेरे नहीं जानते हैं ।

सूरए अत तूर 52:45-47

क्या आपको पक्का यक़ीन है कि आप ने कोई ‘ख़ता नहीं की’ और सच्चाई का बर्ताव नहीं किया जैसे कि ‘झुटलाना’ (झूट बोलना) जिस से कि आप फ़ैसले के दिन अज़ाब से छूट जाएं ?

नबी हज़रत ईसा अल मसीह उन लोगों की मदद करने आये जिन्हें यक़ीन नहीं है कि इन्साफ़ के दिन उनके आमाल का हिसाब किताब किस तरह से दिया जाएगा । वह उनकी मदद करने आये जिनको किसी तरह की मदद मिलने के आसार नज़र नहीं आते । उन्हों ने इनजील शरीफ़ में कहा :      

7 तब यीशु ने उन से फिर कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि भेड़ों का द्वार मैं हूं।
8 जितने मुझ से पहिले आए; वे सब चोर और डाकू हैं परन्तु भेड़ों ने उन की न सुनी।
9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।
11 अच्छा चरवाहा मैं हूं; अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है।
12 मजदूर जो न चरवाहा है, और न भेड़ों का मालिक है, भेड़िए को आते हुए देख, भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है, और भेड़िय़ा उन्हें पकड़ता और तित्तर बित्तर कर देता है।
13 वह इसलिये भाग जाता है कि वह मजदूर है, और उस को भेड़ों की चिन्ता नहीं।
14 अच्छा चरवाहा मैं हूं; जिस तरह पिता मुझे जानता है, और मैं पिता को जानता हूं।
15 इसी तरह मैं अपनी भेड़ों को जानता हूं, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं, और मैं भेड़ों के लिये अपना प्राण देता हूं।
16 और मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं; मुझे उन का भी लाना अवश्य है, वे मेरा शब्द सुनेंगी; तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा।
17 पिता इसलिये मुझ से प्रेम रखता है, कि मैं अपना प्राण देता हूं, कि उसे फिर ले लूं।
18 कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन मैं उसे आप ही देता हूं: मुझे उसके देने का अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है॥

युहन्ना 10;7-18

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने अपनी ‘भेड़ों’ की हिफाज़त करने और उन्हें जिंदगी देने के लिए अपने बड़े इख्तियार का दावा किया – यहाँ तक कि उस आने वाले दहशतनाक दिन से बचाने के लिए भी । क्या वह इस तरह का इख्तियार रखते हैं ? इन दावों के लिए उन का इख्तियार तौरात के नबी हज़रत मूसा के ज़रिये साबित हुआ कि किसतरह उन्हों ने काएनात की छे दिनों की तख्लीक़ से उन के इख्तियारात की बाबत नबुवत की और पहले से देखा गया । फिर ज़बूर और आने वाले नबियों ने उनके आने की बाबत तफ़सील से नबुवत की ताकि हम इस बात को जानें कि हकीकत में उनका आसमान से आना आसमानी मनसूबे के तहत था । मगर कोई किस तरह से ‘उसकी भेड़’ बन सकता है और इसका क्या मतलब है कि “मैं भेड़ों के लिए अपनी जान देता हूँ” इसे हम यहाँ देखते हैं

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की तालीमात हमेशा ही लोगों को एक दुसरे से अलग करती रही है । यह उन के ज़माने में सौ फ़ीसदी सहीह था । यहाँ वह बयान है कि कैसे यह बहस ख़तम होती है और किस तरह से लोग जो उनकी सुनते थे अलग हो गए थे ।       

19 इन बातों के कारण यहूदियों में फिर फूट पड़ी।
20 उन में से बहुतेरे कहने लगे, कि उस में दुष्टात्मा है, और वह पागल है; उस की क्यों सुनते हो?
21 औरों ने कहा, ये बातें ऐसे मनुष्य की नहीं जिस में दुष्टात्मा हो: क्या दुष्टात्मा अन्धों की आंखे खोल सकती है?
22 यरूशलेम में स्थापन पर्व हुआ, और जाड़े की ऋतु थी।
23 और यीशु मन्दिर में सुलैमान के ओसारे में टहल रहा था।
24 तब यहूदियों ने उसे आ घेरा और पूछा, तू हमारे मन को कब तक दुविधा में रखेगा? यदि तू मसीह है, तो हम से साफ कह दे।
25 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मैं ने तुम से कह दिया, और तुम प्रतीति करते ही नहीं, जो काम मैं अपने पिता के नाम से करता हूं वे ही मेरे गवाह हैं।
26 परन्तु तुम इसलिये प्रतीति नहीं करते, कि मेरी भेड़ों में से नहीं हो।
27 मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं।
28 और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।
29 मेरा पिता, जिस ने उन्हें मुझ को दिया है, सब से बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता।
30 मैं और पिता एक हैं।
31 यहूदियों ने उसे पत्थरवाह करने को फिर पत्थर उठाए।
32 इस पर यीशु ने उन से कहा, कि मैं ने तुम्हें अपने पिता की ओर से बहुत से भले काम दिखाए हैं, उन में से किस काम के लिये तुम मुझे पत्थरवाह करते हो?
33 यहूदियों ने उस को उत्तर दिया, कि भले काम के लिये हम तुझे पत्थरवाह नहीं करते, परन्तु परमेश्वर की निन्दा के कारण और इसलिये कि तू मनुष्य होकर अपने आप को परमेश्वर बनाता है।
34 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, क्या तुम्हारी व्यवस्था में नहीं लिखा है कि मैं ने कहा, तुम ईश्वर हो?
35 यदि उस ने उन्हें ईश्वर कहा जिन के पास परमेश्वर का वचन पहुंचा (और पवित्र शास्त्र की बात लोप नहीं हो सकती।)
36 तो जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है, तुम उस से कहते हो कि तू निन्दा करता है, इसलिये कि मैं ने कहा, मैं परमेश्वर का पुत्र हूं।
37 यदि मैं अपने पिता के काम नहीं करता, तो मेरी प्रतीति न करो।
38 परन्तु यदि मैं करता हूं, तो चाहे मेरी प्रतीति न भी करो, परन्तु उन कामों की तो प्रतीति करो, ताकि तुम जानो, और समझो, कि पिता मुझ में है, और मैं पिता में हूं।
39 तब उन्होंने फिर उसे पकड़ने का प्रयत्न किया परन्तु वह उन के हाथ से निकल गया॥
40 फिर वह यरदन के पार उस स्थान पर चला गया, जहां यूहन्ना पहिले बपतिस्मा दिया करता था, और वहीं रहा।
41 और बहुतेरे उसके पास आकर कहते थे, कि युहन्ना ने तो कोई चिन्ह नहीं दिखाया, परन्तु जो कुछ यूहन्ना ने इस के विषय में कहा था वह सब सच था।
42 और वहां बहुतेरों ने उस पर विश्वास किया॥

युहन्ना 10:19-42

वह दिन : अल – मसाद और अल – हदीद और अल मसीह

सूरा अल – मसाद (सूरा 111 – खजूर की साख्त) आखरी दिन में (रोज़े महशर) को भड़कती हुई आगा के फैसले की बाबत ख़बरदार करता है ।     

अबु लहब के हाथ टूट जाएँ और वह ख़ुद सत्यानास हो जाए (आखि़र) न उसका माल ही उसके हाथ आया और (न) उसने कमाया वह बहुत भड़कती हुयी आग में दाखि़ल होगा और उसकी जोरू भी जो सर पर ईंधन उठाए फिरती है और उसके गले में बटी हुयी रस्सी बँधी है ।

 सूरए अल लहब 111:1-5

सूरह अल – मसाद ख़बरदार करता है कि हम बर्बाद हो सकते हैं । यहाँ तक कि हमारे अज़ीज़ भी, जैसे हमारी बीवियां, यह भी फैसले के आखरी दिन मौत की धमकी का सामना करेंगे ।

सो अल्लाह के इस इमतिहान की तय्यारी के लिए हम क्या कर सकते हैं जो हमारे तमाम शर्मनाक पोशीदा कामों से ख़ूब वाक़िफ़ है ? 

सूरा अल – हदीद (सूरा 57 – लोहा) हम से कहता है कि अल्लाह ने निशानात भेजे हैं कि हमारी शर्मनाक पोशीदा चीज़ों की तारीकी में रौशनी की तरफ़ हमारी रहनुमाई करे ।   

 वही तो है जो अपने बन्दे (मोहम्मद) पर वाज़ेए व रौशन आयतें नाजि़ल करता है ताकि तुम लोगों को (कुफ्ऱ की) तारिक़ीयों से निकाल कर (ईमान की) रौशनी में ले जाए और बेशक ख़ुदा तुम पर बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है ।

सूरए अल हदीद 57:9

मगर हमें ख़बरदार किया गया है कि जो तारीकी में रहते थे वह मुज़तरिबाना तोर से उस दिन रौशनी की तलाश करेंगे ।

उस दिन मुनाफि़क मर्द और मुनाफि़क औरतें ईमानदारों से कहेंगे एक नज़र (शफ़क़्क़त) हमारी तरफ़ भी करो कि हम भी तुम्हारे नूर से कुछ रौशनी हासिल करें तो (उनसे) कहा जाएगा कि तुम अपने पीछे (दुनिया में) लौट जाओ और (वही) किसी और नूर की तलाष करो फिर उनके बीच में एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी जिसमें एक दरवाज़ा होगा (और) उसके अन्दर की जानिब तो रहमत है और बाहर की तरफ़ अज़ाब तो मुनाफि़क़ीन मोमिनीन से पुकार कर कहेंगे। (क्यों भाई) क्या हम कभी तुम्हारे साथ न थे तो मोमिनीन कहेंगे थे तो ज़रूर मगर तुम ने तो ख़ुद अपने आपको बला में डाला और (हमारे हक़ में गर्दिषों के) मुन्तजि़र हैं और (दीन में) शक किया किए और तुम्हें (तुम्हारी) तमन्नाओं ने धोखे में रखा यहाँ तक कि ख़ुदा का हुक्म आ पहुँचा और एक बड़े दग़ाबाज़ (शैतान) ने ख़ुदा के बारे में तुमको फ़रेब दिया ।

 सूरए अल हदीद 57:13-14

तब क्या होगा अगर हम ने उस तरह की ज़िन्दगी नहीं गुज़ारी कि इस आखरी दिन में रौशनी की इनायत होती ? क्या अभी भी हमारे लिए कोई उम्मीद नज़र आती है ?  

नबी हज़रत ईसा अल मसीह उस दिन की बदहाली में मदद करने के लिए आये । उन्हों ने साफ़ कहा कि वह वही रौशनी हैं जिसकी ज़रुरत ऐसे लोगों के लिए है जो शर्मनाक तारीकी में गुज़र बसर कर रहे है और जिन्हें फ़ैसले के दिन रौशनी की सख्त ज़रुरत है ।

12 तब यीशु ने फिर लोगों से कहा, जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।
13 फरीसियों ने उस से कहा; तू अपनी गवाही आप देता है; तेरी गवाही ठीक नहीं।
14 यीशु ने उन को उत्तर दिया; कि यदि मैं अपनी गवाही आप देता हूं, तौभी मेरी गवाही ठीक है, क्योंकि मैं जानता हूं, कि मैं कहां से आया हूं और कहां को जाता हूं परन्तु तुम नहीं जानते कि मैं कहां से आता हूं या कहां को जाता हूं।
15 तुम शरीर के अनुसार न्याय करते हो; मैं किसी का न्याय नहीं करता।
16 और यदि मैं न्याय करूं भी, तो मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अकेला नहीं, परन्तु मैं हूं, और पिता है जिस ने मुझे भेजा।
17 और तुम्हारी व्यवस्था में भी लिखा है; कि दो जनों की गवाही मिलकर ठीक होती है।
18 एक तो मैं आप अपनी गवाही देता हूं, और दूसरा पिता मेरी गवाही देता है जिस ने मुझे भेजा।
19 उन्होंने उस से कहा, तेरा पिता कहां है? यीशु ने उत्तर दिया, कि न तुम मुझे जानते हो, न मेरे पिता को, यदि मुझे जानते, तो मेरे पिता को भी जानते।
20 ये बातें उस ने मन्दिर में उपदेश देते हुए भण्डार घर में कहीं, और किसी ने उसे न पकड़ा; क्योंकि उसका समय अब तक नहीं आया था॥
21 उस ने फिर उन से कहा, मैं जाता हूं और तुम मुझे ढूंढ़ोगे और अपने पाप में मरोगे: जहां मैं जाता हूं, वहां तुम नहीं आ सकते।
22 इस पर यहूदियों ने कहा, क्या वह अपने आप को मार डालेगा, जो कहता है; कि जहां मैं जाता हूं वहां तुम नहीं आ सकते?
23 उस ने उन से कहा, तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूं; तुम संसार के हो, मैं संसार का नहीं।
24 इसलिये मैं ने तुम से कहा, कि तुम अपने पापों में मरोगे; क्योंकि यदि तुम विश्वास न करोगे कि मैं वहीं हूं, तो अपने पापों में मरोगे।
25 उन्होंने उस से कहा, तू कौन है यीशु ने उन से कहा, वही हूं जो प्रारम्भ से तुम से कहता आया हूं।
26 तुम्हारे विषय में मुझे बहुत कुछ कहना और निर्णय करना है परन्तु मेरा भेजनेवाला सच्चा है; और जो मैं ने उस से सुना हे, वही जगत से कहता हूं।
27 वे न समझे कि हम से पिता के विषय में कहता है।
28 तब यीशु ने कहा, कि जब तुम मनुष्य के पुत्र को ऊंचे पर चढ़ाओगे, तो जानोगे कि मैं वही हूं, और अपने आप से कुछ नहीं करता, परन्तु जैसे पिता ने मुझे सिखाया, वैसे ही ये बातें कहता हूं।
29 और मेरा भेजनेवाला मेरे साथ है; उस ने मुझे अकेला नहीं छोड़ा; क्योंकि मैं सर्वदा वही काम करता हूं, जिस से वह प्रसन्न होता है।
30 वह ये बातें कह ही रहा था, कि बहुतेरों ने उस पर विश्वास किया॥

युहन्ना 8:12-30

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने दुनया का नूर होने बतोर एक बड़े इख्तियार का दावा पेश किया और जब दूसरों के ज़रिये चुनौती दी गयी तो उन्हों ने ‘शरीअत’ की किताबों का हवाला दिया । यह मूसा की तौरात है जिसमें मसीह के आने और उनके इख्तियारत की बाबत नबुवत की गयी है । फिर ज़बूर और आने वाले नबियों ने उनके आने की बाबत तफ़सील से नबुवत की ताकि हम जान सकें की उनके पास वही इख्तियारत मौजूद थे जिन का उन्हों ने दावा किया था । ‘इब्न आदम’ क्या है और ईसा अल मसीह के क्या मायने हैं और ‘इब्न आदम को ऊंचे पर चढ़ाए जाने’ का क्या मतलब है ? और अपने अन्दर ‘जिंदगी की रौशनी’ रखना क्या होता है ? इसको हम यहाँ देखते हैं । आज के दिन आप ऐसा ही करें, क्यूंकि इन्साफ़ के दिन इसे ढूंढना शुरू करना बहुत देर साबित होगा फिर जिस तरह अल हदीद ख़बरदार करता है      

जान रखो कि ख़ुदा ही ज़मीन को उसके मरने (उफ़तादा होने) के बाद जि़न्दा (आबाद) करता है हमने तुमसे अपनी (क़ुदरत की) निशानियाँ खोल खोल कर बयान कर दी हैं ताकि तुम समझो ।

 सूरए अल हदीद 57:15

इस तरह आप देख सकते हैं कि कैसे नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने ऐसे मोक़े पर अपनी तालीम को ख़तम किया ।

31 तब यीशु ने उन यहूदियों से जिन्हों ने उन की प्रतीति की थी, कहा, यदि तुम मेरे वचन में बने रहोगे, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे।
32 और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा।
33 उन्होंने उस को उत्तर दिया; कि हम तो इब्राहीम के वंश से हैं और कभी किसी के दास नहीं हुए; फिर तू क्योंकर कहता है, कि तुम स्वतंत्र हो जाओगे?
34 यीशु ने उन को उत्तर दिया; मैं तुम से सच सच कहता हूं कि जो कोई पाप करता है, वह पाप का दास है।
35 और दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है।
36 सो यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करेगा, तो सचमुच तुम स्वतंत्र हो जाओगे।
37 मैं जानता हूं कि तुम इब्राहीम के वंश से हो; तौभी मेरा वचन तुम्हारे ह्रृदय में जगह नहीं पाता, इसलिये तुम मुझे मार डालना चाहते हो।
38 मैं वही कहता हूं, जो अपने पिता के यहां देखा है; और तुम वही करते रहते हो जो तुमने अपने पिता से सुना है।
39 उन्होंने उन को उत्तर दिया, कि हमारा पिता तो इब्राहीम है: यीशु ने उन से कहा; यदि तुम इब्राहीम के सन्तान होते, तो इब्राहीम के समान काम करते।
40 परन्तु अब तुम मुझ ऐसे मनुष्य को मार डालना चाहते हो, जिस ने तुम्हें वह सत्य वचन बताया जो परमेश्वर से सुना, यह तो इब्राहीम ने नहीं किया था।
41 तुम अपने पिता के समान काम करते हो: उन्होंने उस से कहा, हम व्यभिचार से नहीं जन्मे; हमारा एक पिता है अर्थात परमेश्वर।
42 यीशु ने उन से कहा; यदि परमेश्वर तुम्हारा पिता होता, तो तुम मुझ से प्रेम रखते; क्योंकि मैं परमेश्वर में से निकल कर आया हूं; मैं आप से नहीं आया, परन्तु उसी ने मुझे भेजा।
43 तुम मेरी बात क्यों नहीं समझते? इसलिये कि मेरा वचन सुन नहीं सकते।
44 तुम अपने पिता शैतान से हो, और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो आरम्भ से हत्यारा है, और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उस में है ही नहीं: जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है, वरन झूठ का पिता है।
45 परन्तु मैं जो सच बोलता हूं, इसीलिये तुम मेरी प्रतीति नहीं करते।
46 तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है? और यदि मैं सच बोलता हूं, तो तुम मेरी प्रतीति क्यों नहीं करते?
47 जो परमेश्वर से होता है, वह परमेश्वर की बातें सुनता है; और तुम इसलिये नहीं सुनते कि परमेश्वर की ओर से नहीं हो।
48 यह सुन यहूदियों ने उस से कहा; क्या हम ठीक नहीं कहते, कि तू सामरी है, और तुझ में दुष्टात्मा है?
49 यीशु ने उत्तर दिया, कि मुझ में दुष्टात्मा नहीं; परन्तु मैं अपने पिता का आदर करता हूं, और तुम मेरा निरादर करते हो।
50 परन्तु मैं अपनी प्रतिष्ठा नहीं चाहता, हां, एक तो है जो चाहता है, और न्याय करता है।
51 मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि यदि कोई व्यक्ति मेरे वचन पर चलेगा, तो वह अनन्त काल तक मृत्यु को न देखेगा।
52 यहूदियों ने उस से कहा, कि अब हम ने जान लिया कि तुझ में दुष्टात्मा है: इब्राहीम मर गया, और भविष्यद्वक्ता भी मर गए हैं और तू कहता है, कि यदि कोई मेरे वचन पर चलेगा तो वह अनन्त काल तक मृत्यु का स्वाद न चखेगा।
53 हमारा पिता इब्राहीम तो मर गया, क्या तू उस से बड़ा है? और भविष्यद्वक्ता भी मर गए, तू अपने आप को क्या ठहराता है।
54 यीशु ने उत्तर दिया; यदि मैं आप अपनी महिमा करूं, तो मेरी महिमा कुछ नहीं, परन्तु मेरी महिमा करनेवाला मेरा पिता है, जिसे तुम कहते हो, कि वह हमारा परमेश्वर है।
55 और तुम ने तो उसे नहीं जाना: परन्तु मैं उसे जानता हूं; और यदि कहूं कि मैं उसे नहीं जानता, तो मैं तुम्हारी नाईं झूठा ठहरूंगा: परन्तु मैं उसे जानता हूं, और उसके वचन पर चलता हूं।
56 तुम्हारा पिता इब्राहीम मेरा दिन देखने की आशा से बहुत मगन था; और उस ने देखा, और आनन्द किया।
57 यहूदियों ने उस से कहा, अब तक तू पचास वर्ष का नहीं; फिर भी तू ने इब्राहीम को देखा है?
58 यीशु ने उन से कहा; मैं तुम से सच सच कहता हूं; कि पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूं।
59 तब उन्होंने उसे मारने के लिये पत्थर उठाए, परन्तु यीशु छिपकर मन्दिर से निकल गया॥

युहन्ना 8:31-59

वह ख़ास दिन : अल – क़ारीअह और अत – तकासुर और अल मसीह

सूरा अल – क़ारिअह (सूरा 101 – आफ़त) बयान करता है कि आने वाला इन्साफ़ का दिन ऐसा होगा :

वह खड़खड़ाने वाली क्या है और तुम को क्या मालूम कि वह खड़खड़ाने वाली क्या है । जिस दिन लोग (मैदाने हर्ष में) टिड्डियों की तरह फैले होंगे और पहाड़ धुनकी हुयी रूई के से हो जाएँगे तो जिसके (नेक आमालका ) के पल्ले भारी होंगे वह मन भाते ऐश में होंगे और जिनके आमाल के पल्ले हल्के होंगे तो उनका ठिकाना न रहा ।

सूरए अल क़ारिअह 101:2-9

सूरा अल क़ारिआ हम से कहता है कि क़ियामत के दिन जिन के नेक आमाल का पलडा भारी होगा उन्हीं के लिए दोज़ख़ की आग से बचने की उम्मीद की जा सकती है ।

मगर उनका क्या होगा जिन के नेक आमाल का पलडा हल्का होगा ?

  सूरा अत – तकासुर (सूरा 102 दुनया में रक़ाबत बढ़ती जाती है) हमको ख़बरदार करता है    

कुल व माल की बहुतायत ने तुम लोगों को ग़ाफि़ल रखा यहाँ तक कि तुम लोगों ने कब्रें देखी (मर गए)। देखो तुमको अनक़रीब ही मालुम हो जाएगा । फिर देखो तुम्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा । देखो अगर तुमको यक़ीनी तौर पर मालूम होता (तो हरगिज़ ग़ाफिल न होते) तुम लोग ज़रूर दोज़ख़ को देखोगे
फिर तुम लोग यक़ीनी देखना देखोगे फिर तुमसे नेअमतों के बारें ज़रूर बाज़ पुर्स की जाएगी।

सूरए अत तकासुर 102:1-8

सूरा अत – तकासुर हम से कहता है कि इन्साफ़ के दिन जहन्नुम की आग हमको धमकाती है जब हम सवालों के घेरे में होएंगे ।    

क्या हम उस दिन की तय्यारी कर सकते हैं जब हमारे नेक आमाल का पलडा हल्का होगा ?

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ख़ास तोर से उनकी मदद के लिए आए जिन के नेक आमाल का पलडा सच मुच में उस दिन हल्का होगा । उन्हों ने इंजील शरीफ़ में कहा कि :

35 यीशु ने उन से कहा, जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा।
36 परन्तु मैं ने तुम से कहा, कि तुम ने मुझे देख भी लिया है, तोभी विश्वास नहीं करते।
37 जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूंगा।
38 क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, वरन अपने भेजने वाले की इच्छा पूरी करने के लिये स्वर्ग से उतरा हूं।
39 और मेरे भेजने वाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उस ने मुझे दिया है, उस में से मैं कुछ न खोऊं परन्तु उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊं।
40 क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊंगा।
41 सो यहूदी उस पर कुड़कुड़ाने लगे, इसलिये कि उस ने कहा था; कि जो रोटी स्वर्ग से उतरी, वह मैं हूं।
42 और उन्होंने कहा; क्या यह यूसुफ का पुत्र यीशु नहीं, जिस के माता पिता को हम जानते हैं? तो वह क्योंकर कहता है कि मैं स्वर्ग से उतरा हूं।
43 यीशु ने उन को उत्तर दिया, कि आपस में मत कुड़कुड़ाओ।
44 .कोई मेरे पास नहीं आ सकता, जब तक पिता, जिस ने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले; और मैं उस को अंतिम दिन फिर जिला उठाऊंगा।
45 भविष्यद्वक्ताओं के लेखों में यह लिखा है, कि वे सब परमेश्वर की ओर से सिखाए हुए होंगे। जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है।
46 यह नहीं, कि किसी ने पिता को देखा परन्तु जो परमेश्वर की ओर से है, केवल उसी ने पिता को देखा है।
47 मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जो कोई विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसी का है।
48 जीवन की रोटी मैं हूं।
49 तुम्हारे बाप दादों ने जंगल में मन्ना खाया और मर गए।
50 यह वह रोटी है जो स्वर्ग से उतरती है ताकि मनुष्य उस में से खाए और न मरे।
51 जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी मैं हूं। यदि कोई इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा और जो रोटी मैं जगत के जीवन के लिये दूंगा, वह मेरा मांस है

। युहन्ना 6:35-51

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने दावा किया कि वह आसमान से नीचे आए और यह कि जो उन पर ईमान लाते हैं उन्हें हमेशा की ज़िन्दगी अता करते हैं । यहूदी लोग जो उनकी बातों को सुन रहे थे उन्हों ने उन से इस बात के लिए सबूत मांगे । नबी ने उनसे पहले के नबियों का हवाला पेश किया जो उनके आने और उनके इख्तियार की बाबत नबुवत किये थे । हम देख सकते हैं कि किस तरह मूसा की तौरात ने उन के आने की पेश बीनी की और हज़रत मूसा के बाद आने वाले नबियों ने भी । मगर इसका क्या मतलब है ‘जो उसपर ईमान लाये’? इसको हम यहाँ देखते हैं ।

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने भी बीमारों को शिफ़ा देने की , और कुदरत पर इख्तियार रखने की निशानियों के ज़रिये अपने शख्सी इख्तियार का इज़हार किया । उन्हों ने इस बात को अपनी तालीम के दौरान समझाया ।   

14 और जब पर्व के आधे दिन बीत गए; तो यीशु मन्दिर में जाकर उपदेश करने लगा।
15 तब यहूदियों ने अचम्भा करके कहा, कि इसे बिन पढ़े विद्या कैसे आ गई?
16 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मेरा उपदेश मेरा नहीं, परन्तु मेरे भेजने वाले का है।
17 यदि कोई उस की इच्छा पर चलना चाहे, तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा कि वह परमेश्वर की ओर से है, या मैं अपनी ओर से कहता हूं।
18 जो अपनी ओर से कुछ कहता है, वह अपनी ही बड़ाई चाहता है; परन्तु जो अपने भेजने वाले की बड़ाई चाहता है वही सच्चा है, और उस में अधर्म नहीं।
19 क्या मूसा ने तुम्हें व्यवस्था नहीं दी? तौभी तुम में से काई व्यवस्था पर नहीं चलता। तुम क्यों मुझे मार डालना चाहते हो?
20 लोगों ने उत्तर दिया; कि तुझ में है; कौन तुझे मार डालना चाहता है?
21 यीशु ने उन को उत्तर दिया, कि मैं ने एक काम किया, और तुम सब अचम्भा करते हो।
22 इसी कारण मूसा ने तुम्हें खतने की आज्ञा दी है (यह नहीं कि वह मूसा की ओर से है परन्तु बाप-दादों से चली आई है), और तुम सब्त के दिन को मनुष्य का खतना करते हो।
23 जब सब्त के दिन मनुष्य का खतना किया जाता है ताकि मूसा की व्यवस्था की आज्ञा टल न जाए, तो तुम मुझ पर क्यों इसलिये क्रोध करते हो, कि मैं ने सब्त के दिन एक मनुष्य को पूरी रीति से चंगा किया।
24 मुंह देखकर न्याय न चुकाओ, परन्तु ठीक ठीक न्याय चुकाओ॥
25 तब कितने यरूशलेमी कहने लगे; क्या यह वह नहीं, जिस के मार डालने का प्रयत्न किया जा रहा है।
26 परन्तु देखो, वह तो खुल्लमखुल्ला बातें करता है और कोई उस से कुछ नहीं कहता; क्या सम्भव है कि सरदारों ने सच सच जान लिया है; कि यही मसीह है।
27 इस को तो हम जानते हैं, कि यह कहां का है; परन्तु मसीह जब आएगा, तो कोई न जानेगा कि वह कहां का है।
28 तब यीशु ने मन्दिर में उपदेश देते हुए पुकार के कहा, तुम मुझे जानते हो और यह भी जानते हो कि मैं कहां का हूं: मैं तो आप से नहीं आया परन्तु मेरा भेजनेवाला सच्चा है, उस को तुम नहीं जानते।
29 मैं उसे जानता हूं; क्योंकि मैं उस की ओर से हूं और उसी ने मुझे भेजा है।
30 इस पर उन्होंने उसे पकड़ना चाहा तौभी किसी ने उस पर हाथ न डाला, क्योंकि उसका समय अब तक न आया था।
31 और भीड़ में से बहुतेरों ने उस पर विश्वास किया, और कहने लगे, कि मसीह जब आएगा, तो क्या इस से अधिक आश्चर्यकर्म दिखाएगा जो इस ने दिखाए?
32 फरीसियों ने लोगों को उसके विषय में ये बातें चुपके चुपके करते सुना; और महायाजकों और फरीसियों ने उसके पकड़ने को सिपाही भेजे।
33 इस पर यीशु ने कहा, मैं थोड़ी देर तक और तुम्हारे साथ हूं; तब अपने भेजने वाले के पास चला जाऊंगा।
34 तुम मुझे ढूंढ़ोगे, परन्तु नहीं पाओगे और जहां मैं हूं, वहां तुम नहीं आ सकते।
35 यहूदियों ने आपस में कहा, यह कहां जाएगा, कि हम इसे न पाएंगे: क्या वह उन के पास जाएगा, जो यूनानियों में तित्तर बित्तर होकर रहते हैं, और यूनानियों को भी उपदेश देगा?
36 यह क्या बात है जो उस ने कही, कि तुम मुझे ढूंढ़ोगे, परन्तु न पाओगे: और जहां मैं हूं, वहां तुम नहीं आ सकते?
37 फिर पर्व के अंतिम दिन, जो मुख्य दिन है, यीशु खड़ा हुआ और पुकार कर कहा, यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।
38 जो मुझ पर विश्वास करेगा, जैसा पवित्र शास्त्र में आया है उसके ह्रृदय में से जीवन के जल की नदियां बह निकलेंगी।
39 उस ने यह वचन उस आत्मा के विषय में कहा, जिसे उस पर विश्वास करने वाले पाने पर थे; क्योंकि आत्मा अब तक न उतरा था; क्योंकि यीशु अब तक अपनी महिमा को न पहुंचा था।
40 तब भीड़ में से किसी किसी ने ये बातें सुन कर कहा, सचमुच यही वह भविष्यद्वक्ता है।
41 औरों ने कहा; यह मसीह है, परन्तु किसी ने कहा; क्यों? क्या मसीह गलील से आएगा?
42 क्या पवित्र शास्त्र में यह नहीं आया, कि मसीह दाऊद के वंश से और बैतलहम गांव से आएगा जहां दाऊद रहता था?
43 सो उसके कारण लोगों में फूट पड़ी।
44 उन में से कितने उसे पकड़ना चाहते थे, परन्तु किसी ने उस पर हाथ न डाला॥

युहन्ना 7:14-44

जिस जिंदगी के पानी के लिए उन्हों ने वायदा किया था वह रूहुल कुदुस है जो पेंतिकुस्त के दिन रसूलों पर नाज़िल हुआ था और अब हमें वह जिंदगी मुफ़्त में बख्शता है जो हमको इन्साफ़ के दिन की मौत से और जहन्नुम की आग से बचाएगा । इस के लिए हमें सिर्फ़ अपनी पियास को पहचानने की ज़रुरत है

वह ख़ास दिन : अत-तारिक़, अल -आदियात और अल मसीह

सूरा अत – तारिक़ (सूरा 86 – आने वाली रात) हमको आने वाले इन्साफ के दिन के लिए ख़बरदार करता है जब   

बेषक ख़ुदा उसके दोबारा (पैदा) करने पर ज़रूर कु़दरत रखता है । जिस दिन दिलों के भेद जाँचे जाएँगे।
तो (उस दिन) उसका न कुछ ज़ोर चलेगा और न कोई मददगार होगा।

सूरए अत तारिक़   86:8-10

सूरा अत – तारिक़ हमसे कहता है कि उस दिन अल्लाह हमारी पोशीदा बातों का और शर्मनाक ख़यालात और अमल की जांच करेगा और उस दिन उसके फ़ैसले की जांच से कोई भी शख्स रोकने में मदद नहीं कर सकता । इसी तरह सूरा अल – आदियात (सूरा 100 लानत भेजने वाला) उसी दिन का बयान करता है जब    

(ग़रज़ क़सम है) कि बेशक इन्सान अपने परवरदिगार का नाशुक्रा है और यक़ीनी ख़ुदा भी उससे वाकि़फ़ है और बेषक वह माल का सख़्त हरीस है तो क्या वह ये नहीं जानता कि जब मुर्दे क़ब्रों से निकाले जाएँगे और दिलों के भेद ज़ाहिर कर दिए जाएँगे बेशक उस दिन उनका परवरदिगार उनसे ख़ूब वाकि़फ़ होगा ।

सूरए अल आदियात 100:6-11

सूरा अल – आदियात ख़बरदार करता है कि उस दिन यहाँ तक कि हमारी शर्मनाक पोशीदा बातें जो हमारे सीनों में दबी हैं वह भी आशकारा हो जाएंगे जबकि अल्लाह तआला हमारे तमाम कामों से ख़ूब वाक़िफ है ।

हम उस दिन के आने के ख़याल को तरक कर सकते हैं , और सिर्फ़ यह उम्मीद कर सकते हैं यह हमारे लिए काम करता है , मगर सूरा अत – तारिक़ और सूरा अल – आदियात उस दिन की बाबत बहुत सफ़ाई से हमको ख़बरदार करते हैं ।   

क्या यह मुनासिब नहीं है कि हम इसके लिए तययार रहें ? मगर कैसे ?

नबी हज़रत ईसा अल मसीह उनके लिए आए जो उस दिन के लिए तययार रहते हैं । उन्हों ने इंजील शरीफ़ में इस तरह कहा है :

21 क्योंकि जैसा पिता मरे हुओं को उठाता और जिलाता है, वैसा ही पुत्र भी जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है।
22 और पिता किसी का न्याय भी नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है।
23 इसलिये कि सब लोग जैसे पिता का आदर करते हैं वैसे ही पुत्र का भी आदर करें: जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का जिस ने उसे भेजा है, आदर नहीं करता।
24 मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।
25 मैं तुम से सच सच कहता हूं, वह समय आता है, और अब है, जिस में मृतक परमेश्वर के पुत्र का शब्द सुनेंगे, और जो सुनेंगे वे जीएंगे।
26 क्योंकि जिस रीति से पिता अपने आप में जीवन रखता है, उसी रीति से उस ने पुत्र को भी यह अधिकार दिया है कि अपने आप में जीवन रखे।
27 वरन उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है।

युहन्ना 5:21-27

नबी हज़रत ईसा अल मसीह बहुत बड़े इख्तियारात का दावा करते हैं – यहाँ तक कि इन्साफ़ के दिन की निगरानी करने की बाबत । इन दावों के लिए उन का इख्तियार तौरात के नबी हज़रत मूसा के ज़रिये साबित हुआ कि किसतरह उन्हों ने काएनात की छे दिमों तख्लीक़ से उन के इख्तियारात की बाबत नबुवत की फिर ज़बूर और आने वाले नबियों ने उनके आने की बाबत तफ़सील से नबुवत की जो इस बात को ज़ाहिर करता है कि उनका आसमान से आना अल्लाह के एक मनसूबे के तहत था । नबी के यह कहने का क्या मतलब है  कि “जो कोई मेरे कलाम को सुनता और जिसने मुझे भेजा उस पर ईमान लाए तो हमेश की जिंदगी उसकी है और वह कभी हलाक नहीं होगा” ? इसके लिए हम यहाँ देखते है

एक ख़ास दिन : अल – हुमज़ह और अल – मसीह

सूरा अल – हुमज़ह (सूरा 104 – बुह्तान बाँधने वाला) इन्साफ के दिन की बाबत हमको इस तरीक़े से ख़बरदार करता है :

हर ताना देने वाले चुग़लख़ोर की ख़राबी है जो माल को जमा करता है और गिन गिन कर रखता है वह समझता है कि उसका माल उसे हमेषा जि़न्दा बाक़ी रखेगा हरगिज़ नहीं वह तो ज़रूर हुतमा में डाला जाएगा और तुमको क्या मालूम हतमा क्या है वह ख़ुदा की भड़काई हुयी आग है जो (तलवे से लगी तो) दिलों तक चढ़ जाएगी ।

सूरए अल हुमज़ह 104:1-6

सूरा अल हुमज़ह कहता है कि अल्लाह की जानिब से ग़ज़ब की आग हमारा इंतज़ार कर रही है , ख़ास तोर से अगर हम ने लालच किया हो और दूसरों की बाबत बुरी बातें की हों ।  मगर उनके लिए जो लगातार उन सब के लिए खैराती है जो उस से मदद मांगते हैं , उन के लिए जिन्हों ने कभी अमीर आदमी की दौलत का लालच न किया हो , वह जो दूसरों की बाबत कभी भी बुरी बातें न की हों , वह जो पैसों के मामले में कभी किसी से बहस न किया हो शायद ऐसे लोगों के लिए एक उम्मीद है कि उनकी जान का कुछ नुक़सान नहीं होगा और उस दिन वह खुदा के ग़ज़ब के घेरे में नहीं होंगे ।

मगर हम बाक़ियों का क्या होगा ? 

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ख़ास तोर से उनके लिए आए जो आने वाले उस ख़ुदा के ग़ज़ब से खौफ़ज़दा हैं जो उनपर आने वाली है जिस तरह से उन्हों ने इंजील शरीफ़ में कहा है ।

13 और कोई स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, केवल वही जो स्वर्ग से उतरा, अर्थात मनुष्य का पुत्र जो स्वर्ग में है।
14 और जिस रीति से मूसा ने जंगल में सांप को ऊंचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊंचे पर चढ़ाया जाए।
15 ताकि जो कोई विश्वास करे उस में अनन्त जीवन पाए॥
16 क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।
17 परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए।
18 जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।
19 और दंड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उन के काम बुरे थे।
20 क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए।
21 परन्तु जो सच्चाई पर चलता है वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रगट हों, कि वह परमेश्वर की ओर से किए गए हैं।   

युहन्ना 3:13-21  

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने अपने बड़े इख्तियार का दावा किया — यहाँ तक कि उन्हों ने कहा कि ‘वह आसमान से उतरे हैं’ । एक सामरी औरत के साथ बात चीत के दौरान उन्हों ने कुछ और बातें समझाईं (जिसकी तफ़सील यहाँ पर है) नबी ने खुद को ‘जिंदगी का पानी’ होने बतोर दावा किया ।    

10 यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।
11 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया?
12 क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिस ने हमें यह कूआं दिया; और आप ही अपने सन्तान, और अपने ढोरों समेत उस में से पीया?
13 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा।
14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।

युहन्ना 4:10-14

इन दावों के लिए उन का इख्तियार तौरात के नबी हज़रत मूसा के ज़रिये साबित हुआ कि किसतरह उन्हों ने काएनात की छे दिमों की तख्लीक़ से उन के इख्तियारात की बाबत नबुवत की । फिर ज़बूर और आने वाले नबियों ने उनके आने की बाबत तफ़सील से नबुवत की जो इस बात को ज़ाहिर करता है कि उनका आसमान से आना अल्लाह के एक मनसूबे के तहत था । मगर नबी के कहने का क्या मतलब था कि ‘मुझे ऊंचे पर चढ़ाया जाना ज़रूरी है’ ताकि ‘जो उस पर ईमान लाए हमेशा की ज़िन्दगी उसकी होजाए’? इसको यहाँ पर समझाया गया है । 

हज़रत यूसुफ़ कौन था? उसका निशान क्या था

सूरा यूसुफ़ (सूरा 12 – यूसुफ़) नबी हज़रत यूसुफ़/जोसेफ़  की कहानी कहती है । नबी हज़रत यूसुफ़ हज़रत याक़ूब (जैकब) के बेटे थे , और हज़रत याक़ूब हज़रत इसहाक़ के बेटे थे , और हज़रत इसहाक़ नबी हज़रत इब्राहीम (अबराहाम) के बेटे थे । हज़रत याकूब के 12 बेटे थे , उन में से एक हज़रत यूसुफ़ थे । हज़रत याक़ूब यूसुफ़ को दीगर बेटों से ज़ियादा चाहते थे इस सबब से यूसुफ़ के 11 भाइयों ने उसके खिलाफ साज़िश की और उसके ख़िलाफ़ में जो उन्हों ने मनसूबा बांधा था यूसुफ़ की कहानी का एक रूप ले लिया । इस कहानी को हज़रत मूसा की तौरात में पहली बार 3500 साल पहले लिखा गया था । तौरात शरीफ़ से इस का पूरा बयान यहाँ पर है । और सूरा यूसुफ़ (सूरा 12 यूसुफ़) का बयान यहाँ पर है । सूरा यूसुफ़ हम से कहता है यह सिर्फ़ मामूली कहानी नहीं है बल्कि       

(ऐ रसूल) यूसुफ और उनके भाइयों के किस्से में पूछने वाले (यहूद) के लिए (तुम्हारी नुबूवत) की यक़ीनन बहुत सी निशनियाँ हैं ।

सूरए यूसुफ़ 12:7

कहानी में यूसुफ़ और उसके भाई मुतालाशियों के लिए कौन सी ‘निशानियाँ’ हैं ? हम इस कहानी को तौरात शरीफ़ और सूरा यूसुफ़ दोनों से नज़रे सानी करते हैं ताकि इन ‘निशानियों’ को समझ सकें ।   

सामने सिजदा करना  ….?

एक साफ़ निशानी वह ख़ाब है जो यूसुफ़ ने अपने बाप हज़रत याक़ूब से कही जहां  

(वह वक़्त याद करो) जब यूसूफ ने अपने बाप से कहा ऐ अब्बा मैने ग्यारह सितारों और सूरज चाँद को (ख़्वाब में) देखा है मैने देखा है कि ये सब मुझे सजदा कर रहे हैं।

सूरए यूसुफ़ 12:4

कहानी के आख़िर में हम हक़ीक़त में देखते हैं कि

(ग़रज़) पहुँचकर यूसुफ ने अपने माँ बाप को तख़्त पर बिठाया और सब के सब यूसुफ की ताज़ीम के वास्ते उनके सामने सजदे में गिर पड़े (उस वक़्त) यूसुफ ने कहा ऐ अब्बा ये ताबीर है मेरे उस पहले ख़्वाब की कि मेरे परवरदिगार ने उसे सच कर दिखाया बेशक उसने मेरे साथ एहसान किया जब उसने मुझे क़ैद ख़ाने से निकाला और बावजूद कि मुझ में और मेरे भाईयों में शैतान ने फसाद डाल दिया था उसके बाद भी आप लोगों को गाँव से (शहर में) ले आया (और मुझसे मिला दिया) बेशक मेरा परवरदिगार जो कुछ करता है उसकी तद्बीर खूब जानता है बेशक वह बड़ा वाकिफकार हकीम है

सूरए यूसुफ़ 12:100

पूरे क़ुरान शरीफ़ में सजदा करने को बहुत बार ज़िकर किया गया है । मगर वह सारे सजदे दुआ (नमाज़ या इबादत) में क़ादिरे मुतलक़ खुदा के सामने , का’बा में या अल्लाह के मोजिज़ों के सामने (जैसे मिसर के जादूगरों और हज़रत मूसा) के बीच जो करामात हुए इन के लिए सजदा करने का हवाला दिया गया है । मगर यहाँ एक मुसतस्ना वाली बात है कि एक आदमी (यूसुफ़) के सामने ‘सजदा करना’। एक दूसरा हूबहू वाक़िया उस वक़्त का है जब फ़रिश्तों को हुक्म दिया गया था कि हज़रत आदम के सामने सजदा करें । (सूरा ता-हा 116 और सूरा अल आराफ़ 11) । मगर फ़रिश्ते इनसान नहीं थे , और एक आम दस्तूर (क़ाइदा) यह कहता है कि बनी इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदावंद को ही सजदा करे ।        

और तमाम उमूर की रूजूअ खु़दा ही की तरफ होती है ऐ ईमानवालों रूकू करो और सजदे करो और अपने परवरदिगार की इबादत करो और नेकी करो ।

सूरए अल हज 22:77

हज़रत यूसुफ़ की बाबत क्या मुस्तस्ना थी कि हज़रत याक़ूब जो उनके वालिद थे , उनकी वालिदा और उनके भाइयों ने यूसुफ़ के सामने सजदा किया ?

इब्न आदम

वक़्त की लकीर नबी हज़रत दानिएल और दीगर ज़बूर के नबियों को दिखा रहा है  

इसी तरह बाइबिल में हमको हुक्म दिया गया है कि इबादत में या खुदावंद के आगे सजदा करें मगर यहाँ पर भी एक इस्तिसना की बात है । नबी हज़रत दानिएल ने एक एक रोया हासिल करी थी जो वक़्त से बहुत बहुत आगे नज़र आ रही थी कि खुदा की बादशाही का क़ायम किया जाना था और उसके रोया में उसने ‘इब्न आदम’ को देखा था ।    

13 मैं ने रात में स्वप्न में देखा, और देखो, मनुष्य के सन्तान सा कोई आकाश के बादलों समेत आ रहा था, और वह उस अति प्राचीन के पास पहुंचा, और उसको वे उसके समीप लाए।
14 तब उसको ऐसी प्रभुता, महिमा और राज्य दिया गया, कि देश-देश और जाति-जाति के लोग और भिन्न-भिन्न भाषा बालने वाले सब उसके आधीन हों; उसकी प्रभुता सदा तक अटल, और उसका राज्य अविनाशी ठहरा॥

दानिएल 7:13-14

रोया में लोग ‘इब्न आदम’ के सामने सजदा करते हैं , जिस तरह से हज़रत यूसुफ़ का ख़ानदान हज़रत यूसुफ़ के सामने सजदा कर रहे थे ।  

‘इब्न आदम’ एक लक़ब है जो नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने अक्सर अपने लिए इस्तेमाल किया था । उसने जब वह ज़मीन पर चलता था तालीम देने में , मरीज़ों को शिफ़ा देने में , क़ुदरत पर इख्तियार जताने में अपने बड़े इख़तियार का किरदार निभाया था । मगर वह उन दिनों में ‘आसमान के बादलों पर’ नहीं आया था जिस तरह से हज़रत दानिएल के रोया की पेशीन गोई की गयी है । यह इसलिए कि वह रोया आगे को मुस्तक़बिल की तरफ देखा जा रहा था माज़ी में उसकी पहली आमद से लेकर दूसरी आमद तक – और फिर वापस ज़मीन पर लौटने में ताकि दज्जाल को ख़तम करे उसे आना ज़रूरी था (जिसतरह हज़रत आदम को पहले से ही बताया गया था) और खुदा की बादशाही को क़ायम करनी थी ।

उनकी पहली आमद कुंवारी मरयम से पैदा होना लोगों को छुटकारा देने के लिए था ताकि खुदा की बादशाही के शहरी बन सके । मगर इस के बावजूद भी उसने नबुवत की कि किसतरह इब्न व् आदम अपनी दूसरी आमद में बादलों पर अपने लोगों को दुसरे लोगों से जुदा करेगा । उसने पेशे नज़र की कि तमाम कौमें उसके सामने सजदा कर रहे हैं जिसतरह यूसुफ़ के भाई खुद से यूसुफ़ के सामने सजदा किये थे । यहाँ वह बातें हैं जो मसीह ने तालीम दी थी ।

  31 जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्ग दूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिहांसन पर विराजमान होगा।
32 और सब जातियां उसके साम्हने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकिरयों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।
33 और वह भेड़ों को अपनी दाहिनी ओर और बकिरयों को बाई और खड़ी करेगा।
34 तब राजा अपनी दाहिनी ओर वालों से कहेगा, हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है।
35 क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी पिलाया, मैं पर देशी था, तुम ने मुझे अपने घर में ठहराया।
36 मैं नंगा था, तुम ने मुझे कपड़े पहिनाए; मैं बीमार था, तुम ने मेरी सुधि ली, मैं बन्दीगृह में था, तुम मुझ से मिलने आए।
37 तब धर्मी उस को उत्तर देंगे कि हे प्रभु, हम ने कब तुझे भूखा देखा और खिलाया? या प्यासा देखा, और पिलाया?
38 हम ने कब तुझे पर देशी देखा और अपने घर में ठहराया या नंगा देखा, और कपड़े पहिनाए?
39 हम ने कब तुझे बीमार या बन्दीगृह में देखा और तुझ से मिलने आए?
40 तब राजा उन्हें उत्तर देगा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया।
41 तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, हे स्रापित लोगो, मेरे साम्हने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है।
42 क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को नहीं दिया, मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी नहीं पिलाया।
43 मैं परदेशी था, और तुम ने मुझे अपने घर में नहीं ठहराया; मैं नंगा था, और तुम ने मुझे कपड़े नहीं पहिनाए; बीमार और बन्दीगृह में था, और तुम ने मेरी सुधि न ली।
44 तब वे उत्तर देंगे, कि हे प्रभु, हम ने तुझे कब भूखा, या प्यासा, या परदेशी, या नंगा, या बीमार, या बन्दीगृह में देखा, और तेरी सेवा टहल न की?
45 तब वह उन्हें उत्तर देगा, मैं तुम से सच कहता हूं कि तुम ने जो इन छोटे से छोटों में से किसी एक के साथ नहीं किया, वह मेरे साथ भी नहीं किया।
46 और यह अनन्त दण्ड भोगेंगे परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।

मत्ती 25:31-46

हज़रत यूसुफ़ और हज़रत ईसा अल मसीह

मुस्तस्ना के साथ जो दीगर बनी आदम जो अपने खुद के सामने सजदा करेंगे , हज़रत यूसुफ़ और हज़रत ईसा अल मसीह भी हूबहू इन्हीं नमूने के वाक़ियात से गुज़रे ।  ज़ेल के ख़ाके में ग़ौर करें कि उन दोनों की जिंदगियां किन किन तरीक़ों से मुशाबहत रखती थीं ।  

हज़रत यूसुफ़ की जिंदगी में वाक़ियात  हज़रत ईसा अल मसीह की जिंदगी में वाक़ियात
उसके भाई जो इसराईल के 12 क़बीले बन कर उभरे , उन्हों ने यूसुफ़ से नफरत की और और उसका इनकार किया  यहूदी लोग उन्ही क़बीलों से निकले एक क़ौम होने पर भी ईसा अल मसीह से नफ़रत की और उसको मसीहा होने से इनकार भी किया   
यूसुफ़ अपने भाइयों के मुस्तक़बिल के सजदे का एलान इस्राईल (याकूब) से करता है (याक़ूब का नाम खुदा के ज़रिये दिया गया था) ईसा अल मसीह अपने भाइयों की मुस्तक़बिल के सजदे की बाबत (अपने ज़ाती भाइयों) इस्राईल से पेश बीनी करते हैं (मरक़ुस 14:62)  
यूसुफ़ को उसके बाप याक़ूब के ज़रिये उसके भाइयों के पास भेजा जाता है मगर वह उसका इनकार कर उसके खिलाफ़ साज़िश करते हैं कि  उसकी जान ले ले  हज़रत ईसा अल मसीह को उसके बाप के ज़रिये अपने यहूदी भाइयों के पास भेजा गया “मगर उसके अपनों ने उसे कबूल नहीं किया”(युहन्ना 1:11) और उन्हों ने “उसकी जान लेने के  लिए उसके खिलाफ़ साज़िश की”(युहन्ना 11:53)    
उन्हों ने उसको ज़मीन के एक गढ़े में फ़ेंक दिया हज़रत ईसा अल मसीह ज़मीन के अन्दर आलमे अर्वाह में गए      
यूसुफ़ को बेचा गया और ग़ैर मुल्की सौदागरों के हाथों सोंपा गया ईसा अल मसीह को बेचा गया और ग़ैर क़ौमों के हाथों उस का काम तमाम करने के लिए सोंपा गया
उसको अपने मक़ाम से बहुत दूर ले जाया गया ताकि उसके भाइयों और बाप के ज़रिये मरा हुआ समझा जाए बनी इस्राईल और उसके यहूदी भाइयों ने सोचा कि ईसा अल मसीह का वजूद नहीं रहा औ अब वह मर गए हैं  
यूसुफ़ ने एक ख़ादिम की तरह खुद को हलीम किया     ईसा अल मसीह ने एक खादिम की सूरत इख्तियार की और इतना हलीम किया कि सलीबी मौत तक सह लिया (फ़िलि-2:7)  
यूसुफ़ पर गुनाह का झूठा इलज़ाम लगाया गया  यहूदियों ने अल मसीह पर “कई तरह के झूठे इलज़ाम लगाए” (मरक़ुस 15:3)  
यूसुफ़ को क़ैद में एक गुलाम की तरह भेजा जाता है जहां से वह पहले से ही कुछ क़ैदियों के तहख़ाने की तार्रीकी से आज़ाद किये जाने की पेशबीनी करता है (नान बाई)     हज़रत ईसा अल मसीह को भेजा गया था कि शिकस्ता दिलों को तसल्ली दे , क़ैदियों के लिए रिहाई और असीरों के लिए आज़ादी का एलान करे ….(यसायाह 61:1)
यूसुफ़ को मिस्र के तख़्त पर बिठाया गया और उसे मिसर के कुल इख्तियारत से नवाज़ा गया जो सिर्फ़ फ़िरोन को हासिल थे । जो लोग उसके सामने से गुज़रते थे उसको सिजदा करते थे ।    “इसी वास्ते खुदा ने भी उसे (मसीह को) बहुत सर बुलंद किया और उसे वह नाम बख्शा जो सब नामों से आला है ताकि येसू के नाम पर हर एक घुटना टिके ख्वाह आस्मानियों का हो ख्वाह ज़मिनियों का ख्वाह उनका जो ज़मीन  के निचे हैं ….(फ़ि लिप्पियों 2:10 -11)   
उसके भाइयों की तरफ़ से जबकि अभी भी इनकार किया गया था और मरा हुआ समझा गया था , क़ौमें अनाज के लिए यूसुफ के पास आती थीं की वह रोटी मुहैया करे ।     मस्लूबियत के बाद जबकि उसको मरा हुआ समझ कर अपने ज़ाती भाइयों से इनकार किया गया कौमें ईसा अल मसीह के पास जिंदगी की रोटी के लिए आती हैं और सिर्फ़ वही अकेला उन्हें वह रोटी मुहैया कर सकता है ।
यूसुफ़ अपने धोका दिए जाने की बाबत अपने भाइयों से कहता है (पैदाइश 50 20) ईसा अल मसीह कहते हैं अपने यहूदी भाई के ज़रिये धोका दिया जाना यह खुदा की मर्ज़ी के मुताबिक है जिस से बहुत सी जिंदगियां बचाई जाएंगी (युहन्ना 5:24)  
उसके भाई और क़ौमें यूसुफ़ के सामने सिजदा करती हैं इब्न आदम की बाबत दानिएल की नबुवतें कहती हैं कि “तमाम कौमें और हर ज़बान के लोग उसकी इबादत करेंगे “।

कई नमूने — कई निशानियां

तौरात शरीफ़ से तक़रीबन तमाम क़दीम अंबिया की जिंदगियां नबी हज़रत हज़रत ईसा अल मसीह के नमूने पर क़ा इम थीं – इन नमूनों को उनकी आमद से सदियों साल पहले क़ायम किया गया था । इसको इस तरह किया गया गया था ताकि हम को यह ज़ाहिर करे कि मसीह की आमद हक़ीक़त में खुदा के मनसूबे के मुताबिक था । यह कोई इंसानी ख़याल के मुताबिक़ नहीं था क्यूंकि बनी इंसान पहले से ही मुस्तक़बिल की बातों को नहीं जानता ।

हज़रत आदम से शुरू करते हुए , जिसमें मसीह की बाबत पेश बीनी की गयी थी । बाइबिल कहती है कि हज़रत आदम

…एक नमूना बतोर हैं उस एक् के जो आने वाला था (मिसाल बतोर हज़रत ईसा अल मसीह) 

रोमियों 5:14

हालाँकि यूसुफ़ अपने भाइयों की तरफ़ से सजदे कबूल करना ख़तम करता है , यह एक इनकारी है ,क़ुरबानी और अपने भाइयों की तरफ़ से बेगानगी यही थे जो उसकी जिंदगी में ज़ोर दिया गया । और इस अहमियत को मसीह की क़ुरबानी में भी नबी हज़रत इबराहीम की क़ुरबानी के साथ देखा गया है । यूसुफ के बाद हज़रत याकूब के बारह बेटे इस्राईल के बारह क़बीले बन जाते हैं और नबी हज़रत मूसा के ज़रिये मिसर में रहनुमाई किये जाते हैं । और जिस तरीक़े से हज़रत मूसा ने रहनुमाई की और बनी इस्राईल ने क़ुरबानियों को अंजाम दिया वह सब नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी का एक नमूना और पेश बिनी की तफ़सील थी । दरअसल तौरात में निशानियों की तफ़सीलें हैं जो मसीह के आने के सदियों पहले लिखी गयी थीं । इसके अलावा ज़बूर और दीगर नबियों की किताबें भी मुस्तक़बिल की तफसीलें थीं जो मसीह के आने के सदियों साल पहले लिखे गए थे । इन में दुःख उठाने वाले ख़ादिम की नबुवत जिसे इनकारी के साथ ज़ोर दिया गया है । जबकि कोई भी बनी इंसान सदियों साल बाद होने वाली मुस्तक़बिल को नहीं मालूम कर सकता इन नबियों को इन की तफसील की बाबत कैसे इल्म हुआ जब तक कि खुदा के ज़रिये इल्हाम नहीं दिया गया था ? अगर उन्हें खुदा के ज़रिये इल्हाम दिया गया था तो ईसा अल मसीह की इनकारी और उनकी क़ुरबानी भी खुदा के मनसूबे में ज़रूर शामिल थी ।        

इन नमूनों या नबुवतों में से अक्सर मसीह की पहली आमद ताल्लुक़ रखते हैं जहाँ उसने खुद को पेश किया ताकि हम अपने गुनाहों से छुड़ाये जा सकें और खुदा की बादशाही में दाखिल होने के क़ाबिल हो सकें ।      

मगर यूसुफ़ का नमूना भी बहुत आगे चलकर नज़र आता है जब बादशाही को पहल दिया जाएगा और ईसा अल मसीह ज़मीन पर लौटने के वक़्त तमाम क़ौमें उसके सामने सजदा करेंगी । जबकि हम अभी आज के ज़माने में ऐसे वक़्त में जी रहे हैं जब हमको ख़ुदा की बादशाही के लिए दावत दी जा रही है , तो उस बेवकूफ़ शख्स की मानिन्द न बनें जो सूरा अल – मिराज में ज़िक्र किया गया है जिसने एक छुड़ाने वाले की खोज करने में देर लगादी और इन्साफ़ के दिन तक का इंतज़ार किया – और वह बहुत देर हो चुकी थी । सो आप के लिए मसीह की ज़िन्दगी की पेश कश की बाबत अभी और ज़ियादा सीखें ।      

मसीह ने सिखाया कि उसकी दूसरी आमद इस तरह से वाक़े होगी 

ब स्वर्ग का राज्य उन दस कुंवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं।
2 उन में पांच मूर्ख और पांच समझदार थीं।
3 मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया।
4 परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया।
5 जब दुल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं, और सो गई।
6 आधी रात को धूम मची, कि देखो, दूल्हा आ रहा है, उस से भेंट करने के लिये चलो।
7 तब वे सब कुंवारियां उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं।
8 और मूर्खों ने समझदारों से कहा, अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझी जाती हैं।
9 परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया कि कदाचित हमारे और तुम्हारे लिये पूरा न हो; भला तो यह है, कि तुम बेचने वालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो।
10 जब वे मोल लेने को जा रही थीं, तो दूल्हा आ पहुंचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ ब्याह के घर में चलीं गई और द्वार बन्द किया गया।
11 इसके बाद वे दूसरी कुंवारियां भी आकर कहने लगीं, हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे।
12 उस ने उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच कहता हूं, मैं तुम्हें नहीं जानता।
13 इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम न उस दिन को जानते हो, न उस घड़ी को॥
14 क्योंकि यह उस मनुष्य की सी दशा है जिस ने परदेश को जाते समय अपने दासों को बुलाकर, अपनी संपत्ति उन को सौंप दी।
15 उस ने एक को पांच तोड़, दूसरे को दो, और तीसरे को एक; अर्थात हर एक को उस की सामर्थ के अनुसार दिया, और तब पर देश चला गया।
16 तब जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने तुरन्त जाकर उन से लेन देन किया, और पांच तोड़े और कमाए।
17 इसी रीति से जिस को दो मिले थे, उस ने भी दो और कमाए।
18 परन्तु जिस को एक मिला था, उस ने जाकर मिट्टी खोदी, और अपने स्वामी के रुपये छिपा दिए।
19 बहुत दिनों के बाद उन दासों का स्वामी आकर उन से लेखा लेने लगा।
20 जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने पांच तोड़े और लाकर कहा; हे स्वामी, तू ने मुझे पांच तोड़े सौंपे थे, देख मैं ने पांच तोड़े और कमाए हैं।
21 उसके स्वामी ने उससे कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।
22 और जिस को दो तोड़े मिले थे, उस ने भी आकर कहा; हे स्वामी तू ने मुझे दो तोड़े सौंपें थे, देख, मैं ने दो तोड़े और कमाएं।
23 उसके स्वामी ने उस से कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।
24 तब जिस को एक तोड़ा मिला था, उस ने आकर कहा; हे स्वामी, मैं तुझे जानता था, कि तू कठोर मनुष्य है, और जहां नहीं छीटता वहां से बटोरता है।
25 सो मैं डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया; देख, जो तेरा है, वह यह है।
26 उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, कि हे दुष्ट और आलसी दास; जब यह तू जानता था, कि जहां मैं ने नहीं बोया वहां से काटता हूं; और जहां मैं ने नहीं छीटा वहां से बटोरता हूं।
27 तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रुपया सर्राफों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता।
28 इसलिये वह तोड़ा उस से ले लो, और जिस के पास दस तोड़े हैं, उस को दे दो।
29 क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा: परन्तु जिस के पास नहीं है, उस से वह भी जो उसके पास है, ले लिया जाएगा।
30 और इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धेरे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।

मत्ती 25:1-30

नबी हज़रत अय्यूब कौन थे ? आज वह क्यूँ अहमियत रखते हैं ?

सूरा अल – बययानह (सूरा 98 – साफ़ सबूत) एक अच्छे आदमी के लिए ज़रूरतों का बयान करता है । वह कहता है :    

(तब) और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के ख़ुदा की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है।

 सूरए अल बय्यानह 98: 5

इसी तरह सूरह अल – अस्र (103 – ढलने वाला दिन) बयान करता है कि हमको अल्लाह के सामने किन  नुख़सान दिह आदतों से बाज़ रहना पड़ेगा ।   

बेशक इन्सान घाटे में है। मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे।

सूरए अल अस्र 103:2-3

नबी हज़रत अय्यूब एक ऐसे शख्स थे जिस तरह सूरा अल – बय्यानह और सूरा अल- असर में बयान किया गया है । नबी हज़रत अय्यूब ज़ियादा मशहूर नहीं हैं । उन का नाम क़ुरान शरीफ़ में सिर्फ़ चार मर्तबा आया हुआ है ।

(ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (भी) तो इसी तरह ‘वही’ भेजी जिस तरह नूह और उसके बाद वाले पैग़म्बरों पर भेजी थी और जिस तरह इबराहीम और इस्माइल और इसहाक़ और याक़ूब और औलादे याक़ूब व ईसा व अय्यूब व युनुस व हारून व सुलेमान के पास ‘वही’ भेजी थी और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता की ।

 सूरए निसा4:163

और ये हमारी (समझाई बुझाई) दलीलें हैं जो हमने इबराहीम को अपनी क़ौम पर (ग़ालिब आने के लिए) अता की थी हम जिसके मरतबे चाहते हैं बुलन्द करते हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार हिक़मत वाला बाख़बर है।

 सूरए अनआम 6:84

(कि भाग न जाएँ) और (ऐ रसूल) अय्यूब (का कि़स्सा याद करो) जब उन्होंने अपने परवरदिगार से दुआ की कि (ख़ुदा वन्द) बीमारी तो मेरे पीछे लग गई है और तू तो सब रहम करने वालो से (बढ़ कर है मुझ पर तरस खा) ।

सूरए अल अम्बिया 21:83

और (ऐ रसूल) हमारे (ख़ास) बन्दे अय्यूब को याद करो जब उन्होंने अपने परवरगिार से फरियाद की कि मुझको शैतान ने बहुत अज़ीयत और तकलीफ पहुँचा रखी है ।

साद 38:41

नबी हज़रत अय्यूब का नाम दीगर नबियों जैसे हज़रत इबराहीम, हज़रत ईसा अल मसीह और नबी हज़रत दाऊद की फ़ेहरिस्त में ज़ाहिर होता है जिन्हों ने ज़बूर शरीफ़ को लिखा । वह नबी हज़रत नूह और हज़रत इबराहीम के ज़माने में रहते थे । बाइबिल उन के बारे में इस तरह बयान करती है कि :  

ज़ देश में अय्यूब नाम एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्वर का भय मानता और बुराई से परे रहता था।
2 उसके सात बेटे और तीन बेटियां उत्पन्न हुई।
3 फिर उसके सात हजार भेड़-बकरियां, तीन हजार ऊंट, पांच सौ जोड़ी बैल, और पांच सौ गदहियां, और बहुत ही दास-दासियां थीं; वरन उसके इतनी सम्पत्ति थी, कि पूरबियों में वह सब से बड़ा था।
4 उसके बेटे उपने अपने दिन पर एक दूसरे के घर में खाने-पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने-पीने के लिये बुलवा भेजते थे।
5 और जब जब जेवनार के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवा कर पवित्र करता, और बड़ी भोर उठ कर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, कि कदाचित मेरे लड़कों ने पाप कर के परमेश्वर को छोड़ दिया हो। इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।

अय्यूब 1:1-5

नबी हज़रत अय्यूब में वह सारी अच्छी खूबियाँ मौजूद थीं जो सूरा अल – बय्यनाह और सूरा अल अस्र दावा करता है । मगर शैतान खुदावंद के सामने हाज़िर हुआ । अयूब की किताब खुदावंद और शैतान के बीच जो गुफ़्तगू हुई उसको बयान करती है ।

6 एक दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके साम्हने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया।
7 यहोवा ने शैतान से पूछा, तू कहां से आता है? शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, कि पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।
8 यहोवा ने शैतान से पूछा, क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य और कोई नहीं है।
9 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?
10 क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बान्धा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है,
11 और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुंह पर तेरी निन्दा करेगा।
12 यहोवा ने शैतान से कहा, सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना। तब शैतान यहोवा के साम्हने से चला गया।

अय्यूब 1:6-12

तो फिर शैतान ने इस तरह से नबी हज़रत अय्यूब पर एक आफ़त पर दूसरी आफ़त ले कर आया ।

13 एक दिन अय्यूब के बेटे-बेटियां बड़े भाई के घर में खाते और दाखमधु पी रहे थे;
14 तब एक दूत अय्यूब के पास आकर कहने लगा, हम तो बैलों से हल जोत रहे थे, और गदहियां उनके पास चर रही थी,
15 कि शबा के लोग धावा कर के उन को ले गए, और तलवार से तेरे सेवकों को मार डाला; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
16 वह अभी यह कह ही रहा था कि दूसरा भी आकर कहने लगा, कि परमेश्वर की आग आकाश से गिरी और उस से भेड़-बकरियां और सेवक जलकर भस्म हो गए; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
17 वह अभी यह कह ही रहा था, कि एक और भी आकर कहने लगा, कि कसदी लोग तीन गोल बान्धकर ऊंटों पर धावा कर के उन्हें ले गए, और तलवार से तेरे सेवकों को मार डाला; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
18 वह अभी यह कह ही रहा था, कि एक और भी आकर कहने लगा, तेरे बेटे-बेटियां बड़े भाई के घर में खाते और दाखमधु पीते थे,
19 कि जंगल की ओर से बड़ी प्रचण्ड वायु चली, और घर के चारों कोनों को ऐसा झोंका मारा, कि वह जवानों पर गिर पड़ा और वे मर गए; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
20 तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुंड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् कर के कहा,
21 मैं अपनी मां के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊंगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।
22 इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।

अय्यूब 1:13-32

शैतान अभी भी इस जुस्तजू में था कि वह खुदावंद को आमादा करे कि अय्यूब को लानत भेजे । सो हज़रत अय्यूब के लिए एक दूसरा इम्तिहान था ।   

र एक और दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके साम्हने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके साम्हने उपस्थित हुआ।
2 यहोवा ने शैतान से पूछा, तू कहां से आता है? शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, कि इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।
3 यहोवा ने शैतान से पूछा, क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य और कोई नहीं है? और यद्यापि तू ने मुझे उसको बिना कारण सत्यानाश करते को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।
4 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, खाल के बदले खाल, परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है।
5 सो केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियां और मांस छू, तब वह तेरे मुंह पर तेरी निन्दा करेगा।
6 यहोवा ने शैतान से कहा, सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।
7 तब शैतान यहोवा के साम्हने से निकला, और अय्यूब को पांव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया।
8 तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा ले कर राख पर बैठ गया।
9 तब उसकी स्त्री उस से कहने लगी, क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।
10 उसने उस से कहा, तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें? इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुंह से कोई पाप नहीं किया।

अय्यूब 2:1-10

इस लिए सूरा अल – अंबिया  हज़रत अय्यूब को मुसीबत में पुकारते हुए बयान करता है और सूरा साद समझाता है कि शरीर (शैतान) ने उनको ईज़ा पहुँचाया । 

उनके दुःख तकलीफ़ में साथ देने के लिए उनके तीन दोस्त थे जिन्हों ने उनकी मुलाक़ात की कि उन्हें ऐसे वक़्त में तसल्ली दे सके ।   

11 जब तेमानी एलीपज, और शूही बिलदद, और नामाती सोपर, अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं, तब वे आपस में यह ठान कर कि हम अय्यूब के पास जा कर उसके संग विलाप करेंगे, और उसको शान्ति देंगे, अपने अपने यहां से उसके पास चले।
12 जब उन्होंने दूर से आंख उठा कर अय्यूब को देखा और उसे न चीन्ह सके, तब चिल्लाकर रो उठे; और अपना अपना बागा फाड़ा, और आकाश की ओर धूलि उड़ाकर अपने अपने सिर पर डाली।
13 तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही।

अय्यूब 2:11-13

अय्यूब की किताब उनके बीच हुई बात चीत का बयान करती है कि इस तरह की बद – नसीबी का वाक़िया हज़रत अय्यूब के साथ क्यूँ गुज़रा । इन की बातचीत कई एक अबवाब में जाकर एक सरसरी तस्वीर पेश करती है । मुख़तसर तोर से , उनके दोस्त लोग उनसे कहते हैं कि इसतरह की बद – क़िस्मत मुसीबतें बुरे लोगों पर ही आते हैं । इसका मतलब यह हुआ कि शायद हज़रत अय्यूब ने पोशीदा तोर से गुनाह किये हों । अगर वह इन गुनाहों का इक़रार करले तो शायद उनको गुनाहों की मुआफ़ी हासिल हो सकती है । मगर हज़रत अय्यूब लगातार उन्हें जवाब देते हैं कि वह किसी भी तरह की ख़ताकारी करने से बे – जुर्म हैं । वह इस बात को समझ नहीं सकते थे कि क्यूँ बद-क़िस्मती ने उनको चारों तरफ़ घेर लिया था ।     

हम उनकी लम्बी बातचीत के हर एक हिस्से की तह तक नहीं पहुँच सकते , मगर उनके सवालात के बीच हज़रत अय्यूब वही बयान करते हैं जिनको वह यक़ीनी तोर से जानते हैं ।   

25 मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ाने वाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।
26 और अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में हो कर ईश्वर का दर्शन पाऊंगा।
27 उसका दर्शन मैं आप अपनी आंखों से अपने लिये करूंगा, और न कोई दूसरा। यद्यपि मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर भी हो जाए, तौभी मुझ में तो धर्म का मूल पाया जाता है

अय्यूब 19:25-27

हालांकि हज़रत अय्यूब नहीं समझ सकते थे कि क्यूँ इस तरह का अलमिया (शदीद वाक़िया) उन पर आ गुज़रा मगर वह इतना ज़रूर जानते थे कि एक ‘छुड़ाने वाला’ था जो ज़मींन पर आ रहा था । वह छुड़ाने वाला ऐसा शख्स होगा जो उनके गुनाहों के लिए पूरी कीमत चुकाएगा । छुड़ाने वाले को हज़रत अय्यूब ‘मेरा छुड़ाने वाला कहते हैं । सो वह जानते थे की उनका छुड़ाने वाला उनके लिए आ रहे थे । उन्हें यह यक़ीन था कि इसतरह से ‘उनके खाल के बर्बाद होजाने पर’ भी (मरने के बाद) वह ख़ुदा को इसी खाल के साथ देखेंगे ।

मतलब यह कि हज़रत अयूब क़यामत के दिन की राह देख रहे थे । बल्कि उन्हें यही भी यक़ीन था कि क़ियामत के दिन पोशीदा तोर से वह खुदा का मुंह देखेंगे क्यूंकि उनका छुड़ाने वाला आज भी ज़िन्दा है और उसने उनको छुड़ाया है ।

सूरा अल – मआरिज (सूरा 70 – आने वाली सीढ़ियों का रास्ता) यह सूरा भी कियामत के दिन एक छुड़ाने वाले की बात करता है । मगर सूरा अल – मआरिज एक बेवकूफ़ आदमी का ज़िकर करता है जो मुज़तरिबाना तोर से उस दिन किसी भी छुटकारा देने वाले की राह देखता है ।           

कोई किसी दोस्त को न पूछेगा गुनेहगार तो आरज़ू करेगा कि काश उस दिन के अज़ाब के बदले उसके बेटों और उसकी बीवी और उसके भाई और उसके कुनबे को जिसमें वह रहता था और जितने आदमी ज़मीन पर हैं सब को ले ले और उसको छुटकारा दे दें

सूरए अल मआरिज 70:11-14

सूरा अल – मआरिज में यह बे – वकूफ़ आदमी बग़ैर कामयाबी से किसी की भी राह देखता है कि उसको छुड़ा ए । वह एक छुड़ाने वाले की राह देख रहा है जो उसको ‘उस दिन के ख़मयाज़े से’ उसको छुड़ाए — (इन्साफ़ के दिन के खम्याज़े से) । उसके बच्चे , बीवी , भाई बहिन और ज़मींन पर जो भी उसके ख़ानदान के हैं उन में से कोई भी उसको छुड़ा नहीं सकते क्यूंकि उन सबको अपने किये की सज़ा भुगतनी पड़ेगी , उनके लिए अपने खुद का खम्याज़ा भरना पड़ेगा ।          

हज़रत अय्यूब एक रास्त्बाज़ शख्स थे इसके बावजूद भी वह जानते थे कि उस दिन के लिए उन्हें एक छुड़ाने वाले की ज़रुरत है । उनके तमाम दुःख मुसीबत होने के बावजूद भी उन्हें यक़ीन था उन के पास यह छुड़ाने वाला था । जबकि तौरात शरीफ़ ने एलान कर दिया था कि किसी भी गुनाह का खम्याज़ा (मज़दूरी) मौत है । छुड़ाने वाले को उसकी अपनी जिंदगी का खम्याज़ा देना पड़ेगा । हज़रत अय्यूब जानते थे कि उनका छुड़ाने वाला उनके लिए ‘ज़माने के आख़िर में ज़मीन पर खड़ा होगा’ । हज़रत अय्यूब का ‘छुड़ाने वाला’ कौन था ? वह एक ही शख्स हो सकता है जो कभी मरा था मगर मौत से जिंदा हुआ ताकि ज़माने के आख़िर में फिर से खड़ा हो सके । वह हैं हज़रत ईसा अल मसीह । वही एक हैं जो मुमकिन तोर से खम्याज़े की क़ीमत (मौत) को अदा कर सकते थे । मगर वह ‘ज़माने के आख़िर में ज़मीन पर खड़े होंगे’ ।          

अगर हज़रत अय्यूब जैसे रास्त्बाज़ शख्स के खुद के लिए एक छुड़ाने वाले की सख्त ज़रुरत थी तो आप के और मेरे लिए एक छुड़ाने वाले की कैसी सख्त ज़रुरत होनी चाहिए ताकि हमारे गुनाहों का खाम्याज़ा अदा कर सके ? वह शख्स जो अच्छी खूबियाँ रखने वाला हो , जिसे सूरह अल – बय्यानह और अल – असर नबियों की फ़ेहरिस्त में शामिल करे ऐसे शख्स के लिए एक छुड़ाने वाले की ज़रूरत थी तो हमारी क्या औक़ात कि हमें ज़रुरत न पड़े ? सूरा अल – मआरिज़ में ज़िकर किये हुए बेवकूफ़ शख़स की तरह न हों जो आखरी दिन तक इंतज़ार करता है कि मुज़तरिबाना तोर से ऐसे शख्स को पाए जो उसके गुनाहों का खमयाज़ा अदा कर सके । आज और अभी समझलें कि किस तरह से नबी हज़रत ईसा अल मसीह आप को छुड़ा सकते हैं जिस तरह नबी हज़रत अय्यूब ने पहले से ही देख लिया था ।      

किताब के आख़िर में , नबी हज़रत अय्यूब का आमना सामना (यहाँ) खुदावंद के साथ होता है और उसकी खुश नसीबी (यहाँ) बहाल होती है ।

नबी हज़रत इल्यास कौन थे ? वह आज हमारी रहनुमाई कैसे कर सकते हैं ?

नबी हज़रत इल्यास (या एलियाह) के नाम का ज़िक्र तीन बार सूरा अल –-अनआम और अस — साफ़फ़ात में किया गया है । वह हम से कहते हैं :      

और हमने इबराहीम को इसहाक़ वा याक़ूब (सा बेटा पोता) अता किया हमने सबकी हिदायत की और उनसे पहले नूह को (भी) हम ही ने हिदायत की और उन्हीं (इबराहीम) को औलाद से दाऊद व सुलेमान व अय्यूब व यूसुफ व मूसा व हारुन (सब की हमने हिदायत की) और नेकों कारों को हम ऐसा ही इल्म अता फरमाते हैं।

सूरए अनआम 6:85

और इसमें शक नहीं कि इलियास यक़ीनन पैग़म्बरों में से थे।

सूरए अस साफ़्फ़ात 37:123-132

इल्यास का ज़िक्र युहन्ना (यहया) और येसू (ईसा अल मसीह) के साथ किया गया है क्यूंकि वह भी बाइबिल के नबियों में से एक हैं । जैसा बयान किया गया है कि इल्यास (एलियाह) ने बाल देवता के नबियों का सामना किया । इस सयाक़े इबारत को बड़ी तफ़सील के साथ यहाँ बाइबिल में कलमबंद किया गया है । ज़ेल में जो बरकत हमारे लिए रखा गया है उसकी हम तलाश करते हैं (आने वाली नसल के लिए जिस तरह सूरा अस साफ़फ़ात वायदा करता है) ।      

नबी हज़रत इल्यास और बा’ल के नबियों के लिए इम्तहान

एलियाह एक सख्त आदमी था जिसने 450 बाल देवता के नबियों का सामना किया । इतने लोगों का मुक़ाबला वह कैसे कर सकता था ? बाइबिल हमें समझाती है कि उसने एक शातिराना इम्तिहान का इस्तेमाल किया । उन्हें और बाल देवता के नबियों को एक जानवर की क़ुरबानी देनी थी मगर वह दोनों ही उस क़ुरबानी को जलाने के लिए उसमें आग नहीं लगाएंगे । (वह दोनों) एक तरफ़ एलियाह अकेले खड़ा हुआ था और दूसरी तरफ़ उस के मुकाबले में बाल देवता के नबी थे । हरेक तरफ़ से अपने अपने ख़ुदा, देवता को बुलाना था ताकि राखी हुई क़ुरबानी में आग भेज कर उसे भसम करदे । जिस किसी का ख़ुदा या देवता आसमान से आग भेज कर क़ुरबानी को जलाकर भस्म करदे वही सच्चा देवता या जिंदा खुदा माना जाएगा । सो उन 450 बाल देवता के नबियों ने पूरे दिन भर बाल को पुकारा कि आसमान से आग भेज कर उनकी क़ुरबानी को जलाकर भस्म करदे –– मगर आसमान से कोई आग नाजिल नहीं हुई । फिर एलियाह ने अपने ख़ालिक़ को पुकारा कि आसमान से आग नाजिल हो और उसकी क़ुरबानी को जला कर भस्म कर दे , और फ़ौरन आसमान से आग नाजिल हुई और उसकी ऊँई तमाम चीजों को जला कर राख कट दिया । वह लोग जिन्हों ने इस मुक़ाबले की गवाही दी वुन्हों ने मालूम कर लिया कि कौन सच्चा ख़ुदा है और कौन झूठा । इस तरह बाल देवता लोगों की नज़र में झूठा साबित हुआ ।        

हम इस मुकाबले के गवाह तो नहीं हैं मगर हम एलिया के इस हिकमत ए अमली का पीछा कर सकते हैं यह जान्ने के लिए कि अगर एक पैग़ाम या एक नबी खुदा की तरफ़ से आता है तो उसकी जांच इस तरिके से करनी है सिर्फ़ खुदा और उसके पैग़म्बर ही कामयाब हो सके और वह लोग जो महज़ इंसानी क़ाबिलियत के साथ हो जैसे बाल देवता के पुजारी नहीं हो सकते ।   

इल्यास की जांच आज के दौर में   

इल्यास की रूह में होकर ऐसी कौनसी हो सकती है ?

सूरा अन नज्म हम से कहता है

 आख़ेरत और दुनिया तो ख़ास ख़ुदा ही के एख़्तेयार में हैं।

सूरए अन नज्म 53:25

आक़िबत की साड़ी चीज़ें सिर्फ़ खुदा ही जानता है, यहाँ तक कि ख़ात्मा जब वाक़े होता है ।बनी इनसान ख़ातिमे की चीज़ों को उन के वाक़े होने से पहले नहीं जनता उसको तब ही जनता है जब वह आकर गुज़र जाए । इसलिए जांच यह देखने के लिए होती है कि अगर पैग़ाम वाक़े होने के बहुत पहले मुस्तकबिल की पेशबीनी सही तरीक़े से की जाए । कोई भी इंसान या मूरत (देवता) इसे नहीं कर सकता । सिर्फ़ खुदा कर सकता है ।        

कई एक अजीब काम नबी हज़रत ईसा अल मसीह जिसतरह इंजील शरीफ़ में ज़ाहिर किये एक सही ख़ुदा का पैग़ाम है, या फिर चालाक लोगों के ज़रिये ईजाद किया हुआ है । तो हम इल्यास की जांच को इस सवाल के लिए नाफ़िज़ कर सकते है । तौरात और ज़बूर की किताबें नबियों की किताबों के साथ जिन में इल्यास का बयान है इन्हें नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़माने से सदियों साल पहले लिखे गए थे ।इन्हें यहूदी नबियों के ज़रिये लिखे गए थे और इस तरह से यह ‘मसीही’ तहरीर नहीं थे । क्या इन क़दीम तहरीरों में नबुवतें पाई जाती हैं जो सही तोर से नबी हज़रत ईसा अल मसीह के वाक़ियात की पेश बीनी करते हैं ? जिन नबुवतों का ज़िक्र तौरेत में दिया गया है यहाँ उसका ख़ुलासा पेश किया गया है । ज़बूर में और उसके बाद की नबियों की किताबों में जो नबुवतें पाई जाती है उन का खुलासा यहाँ पेश किया गया है । अब आप नबी हज़रत इल्यास की तरह जांच कर सकते है यह देखने के लिए कि अगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह जैसे इंजील शरीफ़ में बयान किया गया है क्या वह खुदा की तरफ़ से सच्चे नबी हैं, या आदमियों के ज़रिये एक झूटी ग़लत बयानी है ।         

सूरा अल -अनआम ने नबी हज़रत यहया और ईसा अल मसीह के साथ हज़रत इल्यास के नाम का ज़िकर किया । दिलचस्पी की बात यह है कि पुराने अहद नामे की आखरी किताब में नबी हज़रत इल्यास की बाबत नबुवत की गयी है कि वह हज़रत मसीह की आमद के लिए हमारे दिलों को तैयार करने आएँगे । हम इंजील शरीफ़ में देखते हैं कि किस तरह नबी हज़रत यहया नबी इल्यास की शक्ल में आये ताकि लोगों को तस्कीन और तसल्ली दे और उन्हें नबी हज़रत ईसा अल मसीह के कलाम को सुनने और उनकी आमद के लिए दिलों को तैयार करे । नबी हज़रत इल्यास की शख्सियत खुद ही यहया नबी और नबी हज़रत ईसा अल मसीह की नबुवतों में बंध कर रह गयी है ।    

क़ुरान शरीफ़ : कोई इख्तिलाफ़ नहीं ! हदीसें क्या कहती हैं

 “क़ुरान शरीफ़ असली किताब है –वही ज़ुबान, अहराफ़ और तिलावत । इंसानी तशरीह के लिए या तर्जुमे की बिगाड़ के लिए कोई मक़ाम नहीं … अगर आप क़ुरान शरीफ़ की एक जिल्द दूनया के किसी भी घर से उठालें तौ भी मुझे शक है कि आप उस में और दीगर क़ुरान में कोई फ़रक़ देख पाएंगे । “  

एक दोस्त ने मुझे यह मुख़तसर हाशिया (नोट) भेजा । वह मुक़द्दस क़ुरान शारीफ़ के मत्न का मवाज़िना इंजील शारीफ़/बाइबल से कर रहा था । 24,000 इंजील के क़दीम नुस्ख़जात (दस्तावेज़) आज मौजूद हैं और उनमें कुछ छोटे इनहिराफ़ को छोड़ किसी तरह का इख्तिलाफ़ नहीं पाया जाता । हालांकि तमाम मोज़ूअ और ख़यालात उन तमाम 24,000 नुस्ख़जात में एक ही हैं इस मोज़ू को शामिल करते हुए कि ईसा अल मसीह अपनी मौत और कियामत में हमारा फ़िद्या देता है, ऊपर दिये गये बयानात के मुताबिक़ मताल्बा अक्सर किया जाता है कि क़ुरान शरीफ़ में कोई इख्तिलाफ़ नहीं पाया जाता यह बाइबल की निस्बत में क़ुरान शरीफ़ की अज़मत का एक इशारा बतोर और उसकी मोजिज़ाना तहफ़्फुज़ बतोर देखा गया है । मगर क़ुरान शरीफ़ की तरतीब व तालीफ़ की बाबत हदीस हम से क्या कहते हैं ?           

क़ुरान शरीफ़ की तरतीब नबी से लेकर खलीफ़ाओं तक

उमर बिन ख़तताब ने फ़रमाया :

मैं ने हिशाम बिन हकीम बिन हिज़ाम को सूरा अल – फ़ुरक़ान को जैसे मैं तिलावत  करता हूँ उससे फ़रक़ तरीक़े से तिलावत करते हुए पाया । अल्लाह के पैगंबर ने मुझे इसको (फ़रक़ तरीक़े) से सिखाया था । सो (नमाज़ के वक़्त) मेरा उनसे झगड़ा होने को था मगर उनकी तिलावत खत्म होने तक मैं ने इंतज़ार किया फिर मैं ने कपड़े से उनकी गरदन बांधकर उन्हें अल्लाह के पैगम्बर के पास खींच कर ले गया और कहा, “हुज़ूर मैंने इनको सूरा अल – फ़ुरकान को जिस तरह आप ने मुझे तिलावत करना सिखाया था उस से फ़रक़ तरीक़े से तिलावत करते सुना है । पैगम्बर ने मुझे उनको छोड़ देने को कहा और हिशाम से कहा कि उसकी तिलावत करो । जब हिशाम ने तिलावत की तो अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया, “यह इस तरीक़े से इनकिशाफ़ हुआ था” । फिर उनहों ने मुझसे तिलावत करने को कहा । जब मैं ने तिलावत की तो उनहों ने कहा, “यह इस तरह से इंकिशाफ़ हुआ है । क़ुरान शरीफ़ का इंकिशाफ़ सात फ़रक़ तरीक़े से हुआ है, सो जैसे तुमको आसान लगे वैसे तुम इसकी तिलावत करो ।”          

सहीह अल-बुख़ारी 241 9 : किताब 44, हदीस 9 

इब्न मसूद ने बयान किया:

मैं ने एक शख्स को (क़ुरान शरीफ़) की एक आयत को फुलां तरीक़े से तिलावत करते सुना, और मैं ने उसी आयत को नबी हज़रत मोहम्मद की मुबारक ज़ुबानी भी तिलावत करते सुना मगर फ़रक़ तरीक़े से । सो मैं उसको नबी के पास ले गया और यह बात कही, मगर मैं ने उन के चेहरे पर ना मंज़ूरी के आसार देखे और फिर उन्हों ने कहा, “तुम दोनों सही हो, सो फ़रक़ मत करो, क्यूंकि तुम्हारे सामने फ़रक़ कर दिया, इस लिए वह बर्बाद हो गए ।”               

सहीह अल – बुख़ारी 3476  : किताब 60, हदीस 143

यह दोनों हम से साफ़ कहते हैं कि हज़रत मोहम्मद सल्लम की जिंदगी के दौरान क़ुरान शरीफ़ की तिलावत के लिए कई एक फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे थे जो तिलावत के इस्तेमाल के लिए हज़रत मोहम्मद सल्लम के ज़रिये मंज़ूरी दी गयी थी । तो फिर उन की मौत के बाद क्या हुआ ? 

हज़रत अबू बककर और क़ुरान शरीफ़

ज़ैद बिन थाबित ने बयान किया :

जब यमामा के लोग क़त्ल किये गए तो मेरे लिए हज़रत अबूबक्कर सिद्दीक़ को भेजा गया (यमामा के लोग वह लोग थे जो नबी हज़रत मोहम्मद के साथी थे जिन्हों ने मुसैलिमा के खिलाफ़ जंग लड़ी थी)। (मैं उन के पास गया) और पाया कि उमर बिन अल – ख़त्ताब उन के साथ बैठे हुए थे) तब हज़रत अबू बककर ने (मुझ से) कहा “हज़रत उमर मेरे पास आए हैं और वह कहते हैं : हाफ़िज़े क़ुरान में से मजरूहीन की तादाद ज़ियादा है (हाफ़िज़े क़ुरान वह लोग हैं जिन्हों ने क़ुरान शरीफ़ को पूरी तरह से हिफ्ज़ कर लिया है) । यमामा के जंग के दिन मुझे दर है कि जंगे मैदान की दूसरी तरफ़ और ज़ियादा हाफ़िज़ लोग मारे न जाएं और क़ुरान के अक्सर हिस्सों का नुक़सान होजाए । इसलिए मैं तुम्हें (अबू बककर) सलाह देता हूँ हुक्म करो कि क़ुरान ऐसा हो “आप ऐसा कुछ कैसे कर सकते हैं जो आल्लाह के रसूल ने नहीं किया ?”(यानी सब को एक साथ जमा नहीं किया) । तब मैं ने हज़रत उमार से कहा, हज़रत उमर ने कहा, “अल्लाह की क़सम यह तो बहुत अच्छी तजवीज़ है ।” हज़रत उमर लगातार मुझ से बहस करते रहे कि जब तक अल्लाह ने इस बात के लिए मेरे सीने को खोल रखा है मैं इस मनसूबे को क़बूल करता हूँ और अब मैं पेहचान्ने लगा हूँ कि यह एक अच्छी तजवीज़ है जिसको हज़रत उमर ने महसूस किया “फिर हज़रत अबूबककर ने (मुझ से कहा) ‘और अल्लाह तुम एक अक़लमंद जवान हो और हमें तुम्हारी बाबत कोई शुबह नहीं है । और तुम अल्लाह के पैग़मबर के लिए इलाही पैग़ाम लिखते थे – सो तुम को इस की खोज करनी है (ख़ास इबारत के ग़ैर मुकम्मल हिस्सों) की और उन्हें एक किताब की शक्ल में जमा करनी है । तब हज़रत उमर ने कहा “अल्लाह की क़सम, अगर उन्हों ने मुझे एक पहाड़ हटाने का भी हुक्म फ़रमाते तो यह मेरे लिए मुश्किल बात नहीं थी मगर यह तो क़ुरान शरीफ़ को एक जगह जमा करने का है । फिर मैं ने हज़रत अबू बककर से कहा, आप उस काम को कैसे करेंगे जिसे अल्लाह के पैग़म्बर ने नहीं किया ?”हज़रत अबू बककर ने जवाब में कहा, “अल्लाह की क़सम यह एक अच्छी तजवीज़ है, हज़रत अबू बककर मुझ से अपने ख़यालात का इज़हार करते हुए बहस करते जा रहे थे जब तक कि अल्लाह ने मेरे सीने को न खोला जिसके लिए उसने हज़रत अबू बककर के सीने को खोला था (यानि इस काम के किये हम दोनों एक साथ मुत्तफ़िक़ नहीं हुए) । सो मैं ने क़ुरान शरीफ़ के चीदा चीदा हिस्सों को ढूँढना शुरू किया और उन को जमा करता गया (जिन पर क़ुरान की आयतें लिखी हुई थीं) इनमें खजूर के डंठल, बारीक सफ़ेद पत्थर वगैरा थे और उन हाफ़िज़ों को भी बुलाया गया जिन्हों ने आयतों को हिफ्ज़ कर लिए थे । जब तक कि मैं सूरा अत – तौबा की आखरी आयत तक नहीं पहुंचा मैं ने इस काम को जारी रखा । इस काम में अबी ख़ुज़ैमा अल – अंसारी मेरा साथ दे रहे थे । उन को छोड़ मैं ने किसी और को इस लायक़ नहीं पाया । सो वह सूरा अत – तौबा की आयत थी : …“लोगोतुम्हारेपास और तुम ही में से एक पैग़मबर आए हैं । तुम्हारी तकलीफ़ उनको गिरां मालूम होती है और तुम्हारी भलाई के बहुत ख्वाहिशमंद हैं और मोमिनों पर निहायत शफ़क़त करने वाले और मेहेरबान हैं ….(इस सूरा के आख़िर तक सूरा – बारा (अत – तौबा) (9:128 -129) । हज़रत उमर के ज़रिये क़ुरान शरीफ़ की इस तरतीब के बाद मुकम्मल दस्तावेज़ (नुस्ख़ाजात) हज़रत अबू बककर के साथ उनके मरने तक रहा फिर यह मसौदा हज़रत उमर के साथ उनके मरने तक रहा फिर यह हज़रत हफ़सा के पास रहा जो हज़रत उमर की बेटी थी ।                              

 सहीह  अल -बुख़ारी 4986 : किताब 66, हदीस 8  

यह वाक़िआ उस ज़माने में हुआ जब हज़रत अबू बककर ख़लीफ़ा थे बराहे रास्त नबी हज़रत मोहम्मद के इनतक़ाल के बाद । यह हम से कहती है कि हज़रत मोहम्मद ने कभी भी क़ुरान शरीफ़ की आयतों को जमा करके उसकी असल इबारतों को कमाल तक नहीं पहुंचाया था न ही उन्हों ने ऐसा कुछ इशारा किया कि इसकी तरतीब ओ तालीफ़ होनी चाहिए थी । मगर यह ज़रूर हुआ कि जंग के दौरान जो मजरूहीन (जंग में मारे गए लोग) थे उन में से बहुत से हाफ़िज़ लोग थे । तब हज़रत और हज़रत उमर (जो दुसरे नंबर के ख़लीफ़ा हुए) उन्हों ने हज़रत ज़ैद बिन हारिस को क़ाइल किया कि मुख़तलिफ़ ज़रायों से क़ुरान शरीफ़ को जमा करना शुरू करे । हज़रत ज़ैद बिन हारिस शुरू शुरू में इस काम के लिए रज़ा मन्द नहीं थे क्यूंकि वह जानते थे कि नबी हज़रत मोहम्मद ने कभी भी ख्वाहिश ज़ाहिर नहीं की थी कि क़ुरान शरीफ़ की इबारतों को मेयार के मुवाफ़िक़ तरतीब दिया जाए । नबी हज़रत मोहम्मद सल्लम ने अपने कई एक साथियों पर भरोसा किया था कि वह उनके पीछे चलने वालों को क़ुरान शरीफ़ की तालीम दे जिस तरह ज़ेल की हदीस हम से कहती है ।          

मसरिक़ ने बयान किया :

अब्दुल्ला बिन अमर ने ज़िकर किया, अब्दुल्ला बिन मसूद के बारे में यह कहते हुए कि मैं उस शख्स से कभी प्यार करूंगा क्यूंकि मैं ने नबी को यह कहते सुना ()[],”चार अशख़ास से क़ुरान पढ़ना सीखो : अब्दुल्लाह बिन मसूद, सलीम मुआध और उबैद बिन कअब’ “         

 सहीह अल बुख़ारी 4999 :किताब 66, हदीस 21

 
किसी तरह नबी के इंतक़ाल के बाद उन के साथियों के बीच इन फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों को लेकर ना मंज़ूरियां  हो गईं । ज़ेल की हदीस सूरा 92:1-3 की तिलावत को लेकर एक ना मंज़ूरी का बयान करती है (सूरा अल –लैल)       

इब्राहीम ने बयान किया :

अब्दुल्लाह (बिन मसूद ) के साथी लोग  अबू दरदा के पास आए (और उन के उसके घर पहुंचने से पहले) वह उन से मिला और उनसे पुछा : “तुम में से कौन है जो अब्दुल्ला जैसे (क़ुरानशरीफ़) की तिलावत कर सकता है ?”  उन्हों ने जवाब दिया “हम सब हैं “ फिर उसने पुछा तुम में से कौन है जो इसे मुंह ज़ुबानी जानता हो ? उन्हों ने अलक़मा की तरफ़ इशारा किया । उसने उस से पुछा तुम ने किस से सुना ? उस ने कहा “मैं ने अब्दुल्लाह बिन मसूद सूरा अल – लैल (रात) की तिलावत करते सुना”। अलक़मा ने तिलावत की :’आदमियों और औरतों के ज़रिये’ । अबू अल दरदा ने कहा “मैं गवाही देता हूँ कि मैं ने नबी को ऐसे ही तिलावत करते सुना है मगर यह लोग चाहते हैं कि मैं इसे  तिलावत करूँ – ‘और उसके ज़रिये जिसने आदमी और औरत को बनाया’ मगर अल्लाह ज़रिये, मैं उनकी तरह तिलावत नहीं करूंगा ।”  

जिल्द 6 किताब 60 हदीस 468


आज का क़ुरान सूरा अल लैल 92:3 के लिए दूसरी तिलावत है । दिलचस्पी के साथ अब्दुल्लाह, इसके पिछले हदीस में जो चार में से एक हैं ख़ास तोर से जिन को नबी हज़रत मोहम्मद (सल्लम) की जानिब से क़ुरान शरीफ़ की तिलावत का ख़ास इख्तियार रखने वाले बतोर इशारा किया गया था और अबू दरदा ने इस आयत के लिए एक फ़रक़ तिलावत करी थी और नहीं चाहते थे की दूसरों का पीछा करे ।

ज़ेल की हदीस बताती है कि इस्लामी सल्तनत का पूरे का पूरा इलाक़ा जिन के पास ज़ेल की फ़रक़ फ़रक़ तिलावातें हैं । अगर इसकी पेहचान बढ़ानी है तो यह देखना पड़ता है कि तिलावत करने वाला शख्स किस इलाके से ताल्लुक़ रखता है और किस तरह की तिलावत का वह इस्तेमाल करता था । ज़ेल के मामले में कुफ़ा के इराक़ी लोग अब्दुल्ला बिन मसूद की सूरा 92:1-3 की तिलावत का इस्तेमाल करते हैं ।

      अलक़मा ने रिपोर्ट दी :

‘मैं अबू दरदा से मिला’ और उसने मुझ से पुछा : तुम किस मुल्क से ताल्लुक़ रखते हो ? मैं ने कहा मैं एक इराक़ी हूँ । उसने दोबारा मुझ से पुछा : कौनसे शहर से ? मैं ने जवाब दिया, कुफ़ा शहर से । उसने फिर मुझ से पुछा : क्या तुम अब्दुल्लाह बिन मसूद की तिलावत का इस्तेमाल करते हो ? मैं ने कहा, हाँ । उसने कहा, इस आयत की तिलावत करो (रात के ज़रिये जब वह छा जाती है) सो मैं ने उसकी तिलावत की : रात जब छा जाती है और जब दिन चमकता (उगता) है और मर्द और औरत की तखलीक) वह हंसा और कहा, मैं ने अल्लाह के पैग़म्बर से इस तरह ()[] तिलावत करते सुना है ।           

   सहीह मुस्लिम 824c: किताब 6, हदीस 346


इब्न अब्बास ने बयान किया :

उमर ने कहा उबैद हम में से सब से अच्छा (कुरान शरीफ़ की) तिलावत करने वाला था इसके बावजूद भी हमारे पास कुछ है जिस से वह तिलावत करता है । ‘ उबैद कहता है, “मैं ने उसे अल्लाह के पैग़म्बर की ज़ुबानी सुनी है ()[] और मैं किसी भी हालत में इसे नहीं छोडूंगा” मगर अल्लाह ने कहा “हम जिस आयत को मंसूख कर देते या उसे फ़रामोश करा देते हैं तो उस से बेहतर या वैसी ही और आयत भेज देते हैं, क्या तुम नहीं जानते कि खुदा हर बात पर क़ादिर है ?” 2:106                                                                                                

सहीह अल बुख़ारी 5005  किताब 66 हदीस 27


हालांकि उबैद क़ुरान शरीफ़ की तिलावत के लिए ‘सब से बेहतर’ शख्स माने जाते थे (वह उन में से एक थे जो पहले हज़रत मोहम्मद (सल्लम) के ज़रिये जांचे गए थे) और जमाअत में से दीगर छोड़ दिए गए थे । सो इस को लेकर जो बात मनसूख़ हुई और जो बात मनसूख़ नहीं हुई इस का इख्तिलाफ हुआ । इख्तिलाफ़ फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों को लेकर था और जो मनसूख़ किये जाते थे इस से तनाव का माहोल था । हम ज़ेल की हदीस में देखते हैं कि इस परेशानी का कैसे हल हुआ ।             

ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान और क़ुरान

अनस बिन मालिक ने बयान किया:

हुदैफ़ा बिन अल यमन उस वक़्त हज़रत उस्मान के पास आए जब शाम और इराक़ के लोग जंग का मशाहिदा कर रहे थे की आर्मीनिया और अधरबिजन के खिलाफ़ जंग लड़ सके और उनपर जीत हासिल कर सके । हुदैफ़ा को (शाम और इराक़ के लोगों से) उनके क़ुरान शरीफ़ की तिलावत के फ़रक़ को लेकर उन से डर था । सो हुदैफ़ा ने हज़रत उस्मान से कहा, ”ऐ मोमिनों के सरदार ! इस से पहले कि क़ुरान   शरीफ़ की तिलावत में फ़रक़ करने लगे इस क़ौम को बचाएं जिस तरह यहूदियों और मसीहियों ने इस से पहले बचाया था । “सो हज़रत उस्मान ने हज़रत हफ़सा को यह कहकर पैग़ाम भेजा कि क़ुरान की दस्तावेज़ों को हमारे पास भेजा जाए ताकि हम क़ुरान के मसौदों को लेकर एक कामिल नक़लें तैयार कर सकें और फिर दस्तावेज़ आपको वापस कर देंगे । हज़रत उस्मान ने हज़रत हफ़सा को वह सारे दस्तावेज़ भेजे । फिर हज़रत उस्मान ने ज़ैद बिन थाबित, अब्दुल्लाह बिन अज़ ज़ुबैर, सैद बिन अल आस और अब्दुर रहमान बिन हरीत बिन हिशाम को हुक्म फ़रमाया कि बेहतर तरीक़े से दस्तावेज़ों की दोबारा से नक़ल करें । इस के अलावा हज़रत उस्मान ने तीन क़ुरेशियों को हिदायत दी कि अगर किसी सूरत में क़ुरान शरीफ़ के मामले में आप ज़ैद बिन थाबित से इत्तिफाक़ नहीं रखते हैं तो क़ुरान शरीफ़ की आयतों को कुरेश के मक़ामी ज़बान में लिखें क्यूंकि क़ुरान शरीफ़ को उनकी ज़बान में इन्किशाफ़ हुआ है ।” सो उन्हों ने वैसा ही किया और जब उन्हों ने बहुत सारी नकलें तैयार कर लीं तो हज़रत उस्मान ने असली दस्तावेजों को हज़रत हफ़सा के यहाँ लौटा दीं । हज़रत उस्मान ने उनमें से एक एक कापी मुस्लिम मुल्कों में भेज दीं और हुक्म दिया कि दस्तावेज़ों को छोड़ दीगर मसौदों और छोटे हिस्सों को जला दिया जाए ।          

सहीह अल –बुख़ारी 4987 : किताब 66, हदीस 9

इसी लिए मौजूदा ज़माने में फ़रक़ फ़रक़ तिलावातें नहीं हैं । यह इस सबब से नहीं था कि सिर्फ़ नबी हज़रत मोहम्मद ने तिलावत हासिल की या एक ही तिलावत का इस्तेमाल किया (उन्हों ने नही किया,उन्हों ने सात तरह की तिलावातों का इस्तेमाल किया) न ही इस सबब से कि उन्हों ने कोई इख्तियार दिए जाने वाले मुकम्मल क़ुरान किसी के हाथों में दी । उन्हों ने नहीं दी । दर असल अगर आप आन लाइन फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों की खोज करेंगे सुन्नाह की 61 हदीसें पाएंगे जो क़ुरान शरीफ़ की फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों पर बहस की गयी है । मौजूदा क़ुरान शरीफ़ ग़ैर तग़ययुर पिज़ीर है क्यूंकि हज़रत उस्मान (जो तीसरे ख़लीफ़ा थे) उन्हों ने एक तरह की तिलावत को चुना था उनकी ग़लतियों को सुधारा था और दीगर तमाम नुस्ख़ों को जला दिया था । ज़ेल की हदीस बताती है कि उस सुधार को मौजूदा क़ुरान शरीफ़ में आज भी जारी रखा गया है ।             

इब्न अब्बास ने बयान किया :

हज़रत उमर ने कहा, एक अरसा गुज़र चुका है मुझे डर है कि कहीं लोग कहने लगें कि मुक़द्दस किताब में रजम (मौत तक संगसार किये जाने) की बाबत हम कोई आयत नहीं पाते,” नतीजा बतोर हो सकता है वह क़ानूनी पाबन्दी को छोड़ कर बहुत दूर चले जाएं जो अल्लाह ने ज़ाहिर किया है । मैं इस बात की तौसीक़ करता हूँ कि रजम संगसार किये जाने का ख़मयाज़ा उस शख्स पर लगाया जाए ग़ैर क़ानूनी तोर से ज़िना करता है, अगर वह पहले से ही शादी शुदा है और जुर्म गवाहों से साबित हुआ है, जैसे हमल ठहरने या खुद के इक़रार के ज़रिये से हो ।”सुफ़यान ने यह बात शामिल की, “मैं ने इस बयान को इस तरीक़े से याद किया”। हज़रत उमर ने कहा “यक़ीनन अल्लाह के पैगम्बर ने रजम ()[]संगसार किए जाने के ख़म्याज़े को जारी रखा और उन के बाद हम ने इसे किया ।      

सहीह अल बुख़ारी 6829 : किताब 86, हदीस 56


इब्न अब्बास ने बयान किया :

अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद को सच्चाई के साथ भेजा और उन पर मुक़द्दस किताब क़ुरान शरीफ़ को इल्हाम होने दिया । उन क़ुरान शरीफ़ की आयातों के साथ अल्लाह ने जिसका मुकाशिफ़ा किया वह राजम की आयत थी (एक शादीशुदा शख्स का संगसार किया जाना(आदमी और औरत दोनों को) जो ग़ैर कानूनी तरीक़े से ज़िनाकारी को अंजाम देते हैं, और हम ने इस आयत की तिलावत की और उसे हिफ्ज़ किया था अल्लाह के पैगम्बर ने रजम ()[]संगसार किए जाने के ख़म्याज़े को जारी रखा और उन के बाद हम ने इसे किया । …..      

     बुख़ारी किताब 86, हदीस 57

संगसार किया जाना (रजम) की बाबत ज़िनाकारी की बदकारी के लिए मौजूदा क़ुरान शरीफ़ में कोई आयत नहीं है । इस के बगैर ही इसकी इशा अत हुई है ।  

इब्न अज़ –ज़ुबैर ने बयान किया : मैं नेहज़रत उस्मान से कहा “ यह आयत जो सूरा बक़रा में पाया जाता है : आप में से जो मर जाते हैं और अपने पीछे बेवाओं को छोड़ जाते हो ….उनके फिर जाने के बगैर” उन्हें दूसरी आयत के ज़रिये मनसूख़ किया गया है । मगर हज़रत उस्मान ने कहा, आप उस को क्यूँ लिखते हो (क़ुरान शरीफ़ में) ?” हज़रत उस्मान ने कहा (वह जहां है) उसे वहीँ छोड़ दो,…… क्यूंकि मैं उस आयत की जगह को उसकी असली जगह से नहीं बदल सकता ।”          

जिल्द 6 किताब 60 हदीस 60   किताब 65 हदीस 4536

यहाँ हम हज़रत उस्मान और इब्न अज़ – ज़ुबैर के बीच एक इख्तिलाफ़ देखते हैं चाहे वह एक आयत की मंसूख की बाबत मायना रखे या न रखे क़ुरान शरीफ़ में रखा जाना था । हज़रत उस्मान का अपना तरीक़ा था और इस लिए यह आयत क़ुरान शरीफ़ में पाई जाती है । मगर इस की बाबत तख़ालुफ़ ज़रूर था ।      

हज़रत उस्मान और सूरा 9 के लिए उनकी क़ियादत

उस्मान बिन अफ़फ़ान ने बयान किया:                                                

यज़ीद अल फ़रीसी ने कहा: मैं ने इब्न अब्बास को कहते सुना :मैं ने उस्मान इब्न अफ्फ़ान से पुछा, किस बात ने आप को तरगीब दी कि (सूरा) अल बरा’हा को जो (सूरा) मीईन से ताल्लुक़ रखता है उसमें रखे (जिसमें एक सौ आयतें हैं) और (सूरा) अल-अनफ़ाल को जो मदनी के सुराजात में से हैं उस दरजे के सूरे में रखा जो सबा’अत-तवील (क़ुरान शरीफ़ के सात लम्बे सूराजात में गिने जाते हैं), और आप ने उसे “बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम” से शुरू नहीं किया या इसे नहीं लिखा ?

हज़रत उस्मान ने जवाब दिया : जब क़ुरान शरीफ़ की आयतें नबी हज़रत मोहम्मद पर इनकिशाफ़ हो रहे थे ()[] तो उन्हों ने एक शख्स को बुलाया कि उन आयतों को लिखे और उस से कहा कि फ़लां फ़लां आयतों को फ़लां फ़लां सूरे में रखा जाए जैसी जैसी बातों का ज़िकर किया गया है । और जब एक या दो आयतों की वही उतरती थी (उनकी बाबत भी) ऐसा ही कहते थे । सूरा अनफ़ाल पहला सूरा था जो मदीने में नाजिल हुआ था और सूरा अल-बराहा सबसे आख़िर में । और उसके मज़मून वैसे ही थे जैसे सूरा अल-अनफ़ाल के । इस सबब से मैं ने सोचा कि यह सूरा अल -अनफ़ाल का हिस्सा है । चुनांचि मैं ने उसको उस दरजे सूरे में रखा जो सबा’अत-तवील (क़ुरान शरीफ़ के सात लम्बे सूराजात) में रखा, और मैं ने उन के बीच “बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम” नहीं लिखा।                            

सुनन अबी दाऊद 786  : किताब 2 हदीस 396


सूरा 9 (अत तौबा या अल बराहा) क़ुरान शरीफ़ में एक ही सूरा है जो “बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम”से शुरू नहीं होता । हदीस हमें समझाती है क्यूँ ? हज़रत उस्मान ने सिखाया कि सूरा 9 सूरा 8 का हिस्सा था  और इसका मज़मून भी एक जैसा ही था । इसकी बाबत जो सवालात खड़े होते हैं इससे हम देख सकते हैं कि पिछले ज़माने के मुस्लिम क़ौम में मुबाहसा हुआ करता था । अगली हदीस बताती है कि हज़रत उस्मान की क़ुरान से दीगर ख़लीफ़ा के साथियों का क्या रद्दे अमल था ।     

अब्दुल्लाह (बिन मसूद) ने रिपोर्ट दी है कि उसने (अपने साथियों से कहा की अपने क़ुरान शरीफ़ के नुस्खों को पोशीदा रखें) और आगे कहा :  

वह शख्स जो कोई चीज़ छिपाता है तो जो चीज़ ऊसने छिपाई है उसे इन्साफ़ के दिन ज़ाहिर किया जाएगा, और फिर कहा कि आप मुझे किसके नमूने की तिलावत का हुक्म फ़रमाते हैं कि तिलावत करूं ? दरअसल मैं ने अल्लाह के पैगम्बर के सामने ()[] सत्तर से जियादा सूराजात की तिलावत की है और अल्लाह के पैग़म्बर ()[] के साथी लोग जानते हैं कि मैं (उन से ज़ियादा) अल्लाह की किताब की बाबत बेहतर समझ रखता हूँ और जब भी मुझे मालूम पड़ा कि कोई और शख्स मुझसे जियादा इल्म रखता था तो मैं उस के पास गया । शक़ीक़ ने कहा : मैं हज़रत मोहम्मद के साथियों()[] की जमाअत में बैठने का शर्फ़ हासिल हुआ मगर मैं ने किसी को फ़लां शख्स की तिलावत को रद्द करते या नज़र करते हुए नहीं पाया यह कहते हुए कि (यह उस की तिलावत है) या उसमें कुछ नुख्स बताते हुए पाया हो ।         

  सहीह मुस्लिम  2462: किताब 44, हदीस 162 

              कई एक चीज़ें अलग नज़र आती हैं :

  1. अब्दुल्लाह बिन मसूद अपने पैरूओं से कहते हैं कि अपने क़ुरान के नुस्खों को किसी सबब से छिपालो ।
  2. ऐसा लगता है वह किसी के ज़रिये से हुक्म पाए हुए हैं कि एक फ़रक़ तिलावत का इस्तेमाल करें । यह बेहतरीन समझ है जिसतरह वक़्त का हवाला दिया जाता है जब हज़रत उस्मान ने क़ुरान शरीफ़ के अपने तर्जुमे का मेयार कायम किया ।
  3. उसने जिस तरीक़े से क़ुरान शरीफ़ की तिलावत की उसको बदलने की बाबत इब्न मसूद का एतराज़ यह था कि : वह फ़ख़र से कहते थे : मैं(इब्न मसूद मुक़द्दस किताब की बेहतर समझ रखता हूँ )
  4. शक़ीक़ ने कहा हज़रत मोहम्मद के साथी इब्न मसूद से इख्तिलाफ़ राय नहीं थे । 

मौजूदा क़ुरान शरीफ़ की असल इबारत के तर्जुमे 

हज़रत उस्मान की इशाअत का पीछा करते हुए किसी तरह फ़रक़ फ़रक़ तरजुमे आज भी मौजूद हैं । दरअसल ऐसा लगता है कि हज़रत मोहम्मद के बाद चौथी सदी में कुछ किसम की तर्जुमों के लिए मंज़ूरी दी गयी थी । हालाँकि मौजूदा दौर में अरब के असली इबारत की तर्जुमें है हफ़स (या होफ़्स) है, एक वार्श भी है जो अक्सर शुमाली अफ्रीक़ा में इस्तेमाल किया जाता है, अल दुरी अक्सर मगरिबी अफ्रीक़ा यहाँ तक कि दीगर हिस्सों में भी इस्तेमाल किया जाता हैं । इन तर्जुमों के दरमियान ख़ास तोर से तलफ़फ़ुज़ का फ़रक़ पाया जाता है और कुछ हलके से अलफ़ाज़ की तरतीब (तर्ज़ –ए- बयान) का फ़रक़, आम तोर से इस के मायने पर कोई असर नहीं पड़ता, मगर कुछ अफ़राक़ के साथ मायनों में असर पड़ जाता है सिर्फ़ फ़ौरी सयाक़े इबारत में न कि अस्बाती समझ में ।                  

तो फिर एक चुनाव की बात है की क़ुरान शरीफ़ के कौन से तर्जुमे का इस्तेमाल करें ।                                                 

हम ने सीखा है कि मौजूदा दौर में अरबी क़ुरान शरीफ़ के फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे पाए जाते है और नबी हज़रत मोहामद के इंतक़ाल के बाद इन की तरतीब और ग़लतियों का सुधार और चुनाव का तरीक़े अमल हो चुका है यही सबब है कि क़ुरान शरीफ़ की असल इबारत के बहुत कम तर्जुमे पाए जाते है क्यूंकि दीगर तर्जुमों को हज़रत उस्मान के दौर ए ख़िलाफ़त में दीगर इबारतों को नक़ल के बाद जला दिया गया था । क़ुरान शरीफ़ में मुताबादिल अलफ़ाज़ या सफ़्हे के आख़िर में लिखी हुई शरह या कोई हाशिया नहीं पाया जाता । क्यूंकि उन्हें पहले से ही बर्बाद किया जा चुका था । हज़रत उस्मान ने क़ुरान शरीफ़ की ग़ालिबन एक अच्छी तिलावत पेश करी थी मगर वह एक ऐसी नक़ल नहीं थी जो मुबाहसे के बगैर हो मतलब यह कि मुबाहसे से भरपूर था । इस में एक बात ज़रूर है कि इसतरह इसको वसी‘अ तरीक़े से क़ुरान शरीफ़ का “असली नुस्खा (सहीफ़ा) बतोर कबूल किया गया — जिसकी ज़ुबान, अल्फ़ाज़ और तिलावत तीनों असल हैं । इसमें इंसानी तशरीह के लिए कोई मक़ाम नहीं है” यह सहीं नहीं है । हालांकि बाइबिल और क़ुरान दोनों के फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे हैं और दोनों के पास पक्का दस्तावेजी सबूतें पाई जाती हैं जो इशारा करते हैं कि माजूदा ज़माने में जो इबारत पाई जाती है वह असल के बहुत नज़दीक है । दोनों ही असली होने का एक क़ाबिले एतमाद नक़शा पेश कर सकते हैं । बहुत से लोग इन दोनों किताबों के समझने की तलाश से भटक चुके हैं इस बतोर कि कुरान के तहफ्फुज़ के तरीक़े को लेकर और बाइबिल के तहफ्फुज़ की तहकीर करते हुए । हमारे लिए यह बेहतर होगा कि इन दोनों  किताबों को बेहतर तरीक़े से समझने में धियान लगाना होगा । यही एक सबब था कि इन दोनों को पहला मक़ाम और पहला दर्जा दिया गया । शुरुआत के लिए अच्छा मुकाम आदम के साथ है ।                   

क़ुदरत की रात, जलाल का दिन और अँबिया का कलाम

सूरा अल – क़दर (सूरा 97 – क़ुदरत) क़ुदरत की रात का ज़िकर करता है जब कुरान शरीफ का पहला मुकशफ़ा हुआ ।   

हमने (इस कु़रान) को शबे क़द्र में नाजि़ल (करना शुरू) किया । और तुमको क्या मालूम शबे क़द्र क्या है । शबे क़द्र (मरतबा और अमल में) हज़ार महीनो से बेहतर है । इस (रात) में फ़रिश्ते और जिबरील (साल भर की) हर बात का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार के हुक्म से नाजि़ल होते हैं । ये रात सुबह के तुलूअ होने तक (अज़सरतापा) सलामती है।

सूरए अल–क़द्र  97:1-5

सूरा अल — क़दर, हालांकि क़ुदरत की रात का बयान करता है इस बतोर कि यह रात ‘एक हज़ार महीनों की रात’ से भी बेहतर है फिर भी यह पूछता है कि यह कुदरत कि रात क्या थी ? रूह क्या कर रही थी कि क़ुदरत कि रात को एक हज़ार महीनों कि रात से बेहतर बनाए ?

सूरा अल –- लैल, (सूरा 92 –- रात) इसका भी वही दिन और रोशनी का मोज़ू है जो रात का पीछा करता है । दिन जलाल के साथ निकलता है, और अल्लाह रहनुमाई करता है क्यूंकि वह हर चीज़ को शुरू से लेकर आख़िर तक जानता है । इसलिए वह हमको आख़िर में जहन्नम कि आग से ख़बरदार करता है ।           

 रात की क़सम जब (सूरज को) छिपा ले । और दिन की क़सम जब ख़ूब रौशन हो ।

सूरए अल लैल 92:1-2

हमें राह दिखा देना ज़रूर है । और आख़ेरत और दुनिया (दोनों) ख़ास हमारी चीज़े हैं। तो हमने तुम्हें भड़कती हुयी आग से डरा दिया।

सूरए अल लै ल 92:12-14

ज़ेल की इंजील शरीफ़ की आयत से सूरा अल—क़दर और सूरा अल—लैल की आयतों का मवाज़िना करें : 

और हमारे पास पैगंबरों का वचन अधिक निश्चित है, और आप उस पर ध्यान देने के लिए अच्छी तरह से करेंगे, जैसे कि एक अंधेरी जगह में एक प्रकाश चमक रहा है, जब तक कि दिन और सुबह का तारा आपके दिलों में उगता है

2 पतरस 1:19

क्या आप मुशाबहतों को देखते हैं ? जब मैं ने सूरा अल – क़दर और सूरा अल – लैल को पढ़ा तो मुझे इस हवाले को याद दिलाया गया था । यह इस बात को भी बयान करता है कि एक रात के बाद दूसरा दिन निकलता है । रात के दौरान नबियों को मुकाशफ़ा दिया जाता था । यह हमको इस बात से भी खबरदार करता है कि पैग़मबराना पैगामात को नज़र अंदाज़ न करे । वरना हम संजीदा अनजामत केए सामना करना पड़ेगा ।

इस खत को पतरस रसूल के जरिये लिखा गया था जो शागिरदों का रहनुमा और नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़ियादा करीब में रहने वाला शागिर्द था । सूरा अस — साफ़ (सूरा 61 –सिलसिला) ईसा अल मसीह के शागिरदों की बाबत कहता है : 

ऐ ईमानदारों ख़ुदा के मददगार बन जाओ जिस तरह मरियम के बेटे ईसा ने हवारियों से कहा था कि (भला) ख़ुदा की तरफ़ (बुलाने में) मेरे मददगार कौन लोग हैं तो हवारीन बोल उठे थे कि हम ख़ुदा के अनसार हैं तो बनी इसराईल में से एक गिरोह (उन पर) ईमान लाया और एक गिरोह काफ़िर रहा, तो जो लोग ईमान लाए हमने उनको उनके दुशमनों के मुक़ाबले में मदद दी तो आखि़र वही ग़ालिब रहे।

 सूरए अस साफ़ 61:14

सूरा अस साफ़ एलान करता है कि ईसा अल मसीह के शागिर्द ‘ख़ुदा’ के मददगार’ थे । शागिर्दों के पैगाम पर जो ईमान वह उस क़ुवत को हासिल करता था जिस के बारे में कहा गया है । पतरस जो शागिर्दों का रहनुमा था वह एक तरह से खुदा की मदद कर रहा था । हालांकि वह नबी हज़रत ईसा अल मसीह का एक शागिर्द था, वह अल मसीह के किए हुए कई एक मोजिज़ों का गवाह था, उनकी दी हुई कई एक तालिमात को बगोर सुनता था और जो उसके इख्तियारात हैं उसका उनहों ने कैसे इस्तेमाल किया इन सब को पतरस ने नजदीकी से देखा था । ऊपर दिये गए बयानात में उसने यहाँ तक एलान किया कि नबियों के कलाम जो उसके बारे में कहे गए थे वह यक़ीन से ज़ियादा साबित हुए । नबियों के कलाम जो उसके हक़ में कहे गए थे वह यक़ीन से ज़ियादा और उसके ख़ुद की गवाही से ज़ियादा क्यूँ साबित हुए ? इस बात को वह जारी रखता है ।         

  20 पर पहिले यह जान लो कि पवित्र शास्त्र की कोई भी भविष्यद्वाणी किसी के अपने ही विचारधारा के आधार पर पूर्ण नहीं होती।
21 क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे॥

2 पतरस 1:20-21

यह हम से कहता है कि खुदा का पाक रूह नबियों को अपने साथ ‘लिए चलता’ था, और जो खुदा के पैगामात को वह हिफ़्ज़ करते थे उन्हें खुदा के पाक रूह की मौजूदगी में लिख लेते थे इसी लिए यह कलाम ‘खुदा के इल्हाम’ से कहलाते हैं । इसी सबब से इस तरह कीएक रात एक हज़ार महीनों की रातों से बेहतर है । इस लिए कि यह रूहुल कुदुस से जड़ पकड़ी हुई हैं इंसान की ख़्वाहिश से कभी नहीं हुई । सूरा अस साफ़ हम से कहता है कि जिन्हों ने पतरस के पैगाम पर धियान दिया वह ऐसी कुवत हासिल करेंगे जो ताक़त की रात में इस्तेमाल किया गया था  और वह गालिब आएंगे ।  

नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़माने में रहते वक़्त ‘अँबिया’ जिनकी बाबत पतरस ने लिखा वह पुराने अहद नामे के नबियों की बाबत है – पुराना अहद नामा वह मुक़द्दस किताबों का मज्मूआ है जो मुक़द्दस इंजील से पहले लिखी गई थींहज़रत मूसा की तौरात में कई एक बयानात हैं जो हज़रत आदम, क़ाबील और हाबील, हज़रत नूह, हज़रत लूत और हज़रत इब्राहीम और दीगर नबियों के साथ जुड़ी हुई हैं । इन नबियों के बयानात के साथ यह भी ज़िकर है कि जब हज़रत मूसा ने फ़िरोन का सामना किया और फिर शरीयत की किताब हासिल की । उसी उनके के भाई हज़रत हारून की कुरबानियों का ज़िकर है । क़ुरान शरीफ़ में सूरह बक़रा इन्हीं कुरबानियों को लेकर नाम दिया गया है ।

तौरात के ख़ात्मे का पीछा करते हुए हम ज़बूर शरीफ़ में पहुँचते हैं जहां हज़रत दाऊद हज़रत मसीह की आमद के बारे में लिखने के लिए इल्हामी होते हैं । फिर सिलसिलेवार नबियों ने नबूवत की कि मसीह कुंवारी से पैदा होंगे तो अल्लाह की बादशाही ज़मीन के सब लोगों के लिए खुल जाएगी । मसीह को आने वाला ख़ादिम भी कहा गया है जो दुखों को सहने वाला होगा । फिर उस का नाम मसीह होगा करके नबुवत की गई । इसके साथ ही उसके ज़ाहिर होने का वक़्त भी नबुवत के ज़रिये बताया गया एक रास्ता तयार करने वाला पेशवा के वायदे के साथ

हम में से अक्सर लोगों के पास मोक़ा नहीं रहा था होगा कि अपने खुद के लिए इन दस्तावेज़ों को पढ़ते यहाँ इन फ़रक़ फ़रक़ कड़ियों के साथ इन्हें पढ़ने का एक सुनेहरा मोक़ा है । सूरा अल- लैल आने वाली आग की बाबत ख़बरदार करता है । सूरा अल–क़द्र ऐलान करता है कि खुदा का रूह उस क़ुदरत की रात के दौरान खुदा का रूह काम कर रहा था । सूरा अस—साफ़ उन लोगों को रूह की क़ुवत देने का वायदा करता है जो रसूलों के पैगाम पर ईमान लाते हैं । पतरस जो शागिरदों का रहनुमा था वह हमें नसीहत देता है कि खादीम नबियों के मुकाश्फ़े जो दस्तावेज़ों में मौजूद हैं उनपर गौर तलब फ़रमाएँ, जो रात के वक़्त में दिये गए थे, जिन्हों ने अच्छे दिन की राह देखि । क्या यह समझदारी नहीं होगी कि उनके पैगामात को जानें ?