दिन छे – हज़रत ईसा अल मसीह और मुबारक जुम्मा

सूरा 62 (इबादत गुज़ारों की जमाअत, रोज़े जुम्मा—अल जुम्मा) हम से कहता है कि रोज़े जुम्मा मुसमानों के लिए नमाज़ अदा करने का दिन है, मगर सूरा अल—जुम्मा सब से पहले एक दावा पेश करता है – जिसको नबी हज़रत ईसा ने अपनी अदाकारी में मसीह अल जुम्मा होने बतोर कबूल किया, नमाज़ के दिन को मुक़द्दस ठहराते हुए की वह जुम्मे का दिन हो, एलान किया:     

 (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं तो अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करोऔर ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है

सूरा अल–जुम्मा 62:6—7

(ऐ रसूल)) तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख़्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं तो अगर तुम(अपने दावे में) सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करो
और ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है

सूरा अल – जुम्मा की इन आयतों का मतलब है कि अगर हम अल्लाह के सच्चे दोस्त हैं तो हमको मौत का कोई खौफ़ नहीं होगा I मगर जबकि वह (और हम) अपने नेक आमाल की बाबत शक करते की वह कैसे हैं तो हम मौत की बड़ी क़ीमत का एहतिराज़ करते हैं I मगर इस जुम्मे को उसके आख़री हफ़्ते के छट्टे दिन एक यहूदी होने के नाते ईसा अल मसीह ने इस क़तई इम्तिहान का सामना किया – और इसको दुआ के साथ शुरू किया I जिस तरह इंजील शरीफ़ नबी की बाबत समझाती है :    

  37 और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा।
38 तब उस ने उन से कहा; मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला चाहते: तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो।
39 फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।

मत्ती 26:37—39

इस जुम्मे के वाक़ियात को जारी रखने से पहले, हम उन वाकियात की नज़रे सानी करेंगे जो इस जुम्मे की नमाज़ तक ले जा रही है I   हमारा ठहराया हुआ दुश्मन, शैतान पांचवें दिन यहूदा इस्करयूत में समा चुका था कि नबी ईसा अल मसीह को पकड़वाए I दुसरे दिन यानी 6 की शाम को नबी ने अपने आखरी अशा को अपने साथियों के साथ अंजाम दिया (जिन्हें उनके शागिर्द भी कहा जाता है) I उस खाने पर उन्हों ने तम्सीलों और तालीमात के ज़रिये समझाया कि हमें किसतरह खुदा की उस बड़ी महब्बत को जानते हुए एक दुसरे से महब्बत करनी चाहिए I बजा तोर से उन्हों ने इसे कैसे अंजाम दिया इंजील शरीफ़ से बयान किया गया है I फिर उन्हों ने तमाम ईमानदारों के लिए दुआ की जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं I       

इंजील शरीफ़ इस बात का ज़िक्र करती है कि उनके जुम्मे की नमाज़ के बाद क्या हुआ था :   

गत्सम्नी बाग़ में गिरफ़्तारी

  शु ये बातें कहकर अपने चेलों के साथ किद्रोन के नाले के पार गया, वहां एक बारी थी, जिस में वह और उसके चेले गए।
2 और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी वह जगह जानता था, क्योंकि यीशु अपने चेलों के साथ वहां जाया करता था।
3 तब यहूदा पलटन को और महायाजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहां आया।
4 तब यीशु उन सब बातों को जो उस पर आनेवाली थीं, जानकर निकला, और उन से कहने लगा, किसे ढूंढ़ते हो?
5 उन्होंने उस को उत्तर दिया, यीशु नासरी को: यीशु ने उन से कहा, मैं ही हूं: और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उन के साथ खड़ा था।
6 उसके यह कहते ही, कि मैं हूं, वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।
7 तब उस ने फिर उन से पूछा, तुम किस को ढूंढ़ते हो।
8 वे बोले, यीशु नासरी को। यीशु ने उत्तर दिया, मैं तो तुम से कह चुका हूं कि मैं ही हूं, यदि मुझे ढूंढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।
9 यह इसलिये हुआ, कि वह वचन पूरा हो, जो उस ने कहा था कि जिन्हें तू ने मुझे दिया, उन में से मैं ने एक को भी न खोया।
10 शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर, उसका दाहिना कान उड़ा दिया, उस दास का नाम मलखुस था।
11 तब यीशु ने पतरस से कहा, अपनी तलवार काठी में रख: जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे न पीऊं?
12 तब सिपाहियों और उन के सूबेदार और यहूदियों के प्यादों ने यीशु को पकड़कर बान्ध लिया।
13 और पहिले उसे हन्ना के पास ले गए क्योंकि वह उस वर्ष के महायाजक काइफा का ससुर था।

युहन्ना18:1—13

हज़रत ईसा नबी येरूशलेम से कुछ ही फ़ासिले पर बाहर दुआ करने गए I जहां यहूदा इस्करयूत सिपाहियों को अपने साथ ले आया कि उन्हें गिरफ़्तार करे I अगर हाँ गिरफ़्तारी का सामना करते हैं तो हम लड़ने, भागने या छिपने की कोशिश करते I मगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने न लड़ाई की और न छिपने या भागने की कोशिश की I उन्हों ने साफ़ तोर से क़बूला कि वह हक़ीक़त में नबी ईसा हैं जिन की उन्हें तलाश थी I उनका साफ़ इक़रार (“मैं वही हूं”) सिपाहियों को अछमबा कर दिया था और उनके शागिर्द उन्हें छोड़ कर भाग लिए थे हज़रत ईसा नबी ने खुद को गिरफ़्तारी दी और उन्हें मुक़द्दमे के लिए सरदार काहिन हन्ना के घर ले गए I        

पहला मुक़द्दमा

इंजील शरीफ़ बयान करती है कि ईसा नबी पर किस तरह मुक़द्दमा चलाया गया था :

  18 दास और प्यादे जाड़े के कारण को एले धधकाकर खड़े ताप रहे थे और पतरस भी उन के साथ खड़ा ताप रहा था॥
19 तक महायाजक ने यीशु से उसके चेलों के विषय में और उसके उपदेश के विषय में पूछा।
20 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि मैं ने जगत से खोलकर बातें की; मैं ने सभाओं और आराधनालय में जहां सब यहूदी इकट्ठे हुआ करते हैं सदा उपदेश किया और गुप्त में कुछ भी नहीं कहा।
21 तू मुझ से क्यों पूछता है? सुनने वालों से पूछ: कि मैं ने उन से क्या कहा? देख वे जानते हैं; कि मैं ने क्या क्या कहा
22 तब उस ने यह कहा, तो प्यादों में से एक ने जो पास खड़ा था, यीशु को थप्पड़ मारकर कहा, क्या तू महायाजक को इस प्रकार उत्तर देता है।
23 यीशु ने उसे उत्तर दिया, यदि मैं ने बुरा कहा, तो उस बुराई पर गवाही दे; परन्तु यदि भला कहा, तो मुझे क्यों मारता है?
24 हन्ना ने उसे बन्धे हुए काइफा महायाजक के पास भेज दिया॥  

युहन्ना18:19-24

नबी हज़रत ईसा अल मसीह को साबिक़ सरदार काहिन् से पूछ ताछ के बाद उस ज़माने के हाल के सरदार काहीं के पास दुसरे मुक़द्दमे के भेजा गया I   

दूसरा मुक़द्दमा                      

वहाँ उनको तमाम मज़हबी रहनुमाओं के सामने पूछ ताछ की जाएगी I इंजील शरीफ़ इसको आगे के मुक़द्दमे के साथ बयान करती है :

  53 फिर वे यीशु को महायाजक के पास ले गए; और सब महायाजक और पुरिनए और शास्त्री उसके यहां इकट्ठे हो गए।
54 पतरस दूर ही दूर से उसके पीछे पीछे महायाजक के आंगन के भीतर तक गया, और प्यादों के साथ बैठ कर आग तापने लगा।
55 महायाजक और सारी महासभा यीशु के मार डालने के लिये उसके विरोध में गवाही की खोज में थे, पर न मिली।
56 क्योंकि बहुतेरे उसके विरोध में झूठी गवाही दे रहे थे, पर उन की गवाही एक सी न थी।
57 तब कितनों ने उठकर उस पर यह झूठी गवाही दी।
58 कि हम ने इसे यह कहते सुना है कि मैं इस हाथ के बनाए हुए मन्दिर को ढ़ा दूंगा, और तीन दिन में दूसरा बनाऊंगा, जो हाथ से न बना हो।
59 इस पर भी उन की गवाही एक सी न निकली।
60 तब महायाजक ने बीच में खड़े होकर यीशु से पूछा; कि तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं?
61 परन्तु वह मौन साधे रहा, और कुछ उत्तर न दिया: महायाजक ने उस से फिर पूछा, क्या तू उस पर म धन्य का पुत्र मसीह है?
62 यीशु ने कहा; हां मैं हूं: और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी और बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे।
63 तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा; अब हमें गवाहों का और क्या प्रयोजन है
64 तुम ने यह निन्दा सुनी: तुम्हारी क्या राय है? उन सब ने कहा, वह वध के योग्य है।
65 तब कोई तो उस पर थूकने, और कोई उसका मुंह ढांपने और उसे घूसे मारने, और उस से कहने लगे, कि भविष्यद्वाणी कर: और प्यादों ने उसे लेकर थप्पड़ मारे॥

मरक़ुस14:53-65

यहूदी रहनुमाओं ने नबी ईसा अल मसीह पर मौत का फ़रमान जारी किया I मगर जबकि येरुशलेम में रोम की सल्तनत थी तो क़त्ल का हुक्म सिर्फ़ और सिर्फ़ रोम के हाकिम की मंज़ूरी से ही होसकता था इसो उन्हों ने नबी हज़रत मसीह को हाल के रोमी हाकिम पिन्तुस पिलातुस के पास ले गए I इन्जील शरीफ़ यह भी बयां करती है कि उसी दौरान यहूदा इस्करयूत का क्या हुआ जिसने नबी हज़रत ईसा को पकड़वाया था I   

यहूदा इस्करयूत फ़रेबी का क्या हुआ ?

  ब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।
2 और उन्होंने उसे बान्धा और ले जाकर पीलातुस हाकिम के हाथ में सौंप दिया॥
3 जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया।
4 और कहा, मैं ने निर्दोषी को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान।
5 तब वह उन सिक्कों मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फांसी दी।
6 महायाजकों ने उन सिक्कों लेकर कहा, इन्हें भण्डार में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लोहू का दाम है।
7 सो उन्होंने सम्मति करके उन सिक्कों से परदेशियों के गाड़ने के लिये कुम्हार का खेत मोल ले लिया।
8 इस कारण वह खेत आज तक लोहू का खेत कहलाता है।

मत्ती 27:1-8

रोम के हाकिम के ज़रिये हज़रत ईसा अल मसीह की पेशी हुई

  11 जब यीशु हाकिम के साम्हने खड़ा था, तो हाकिम ने उस से पूछा; कि क्या तू यहूदियों का राजा है? यीशु ने उस से कहा, तू आप ही कह रहा है।
12 जब महायाजक और पुरिनए उस पर दोष लगा रहे थे, तो उस ने कुछ उत्तर नहीं दिया।
13 इस पर पीलातुस ने उस से कहा: क्या तू नहीं सुनता, कि ये तेरे विरोध में कितनी गवाहियां दे रहे हैं?
14 परन्तु उस ने उस को एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहां तक कि हाकिम को बड़ा आश्चर्य हुआ।
15 और हाकिम की यह रीति थी, कि उस पर्व्व में लोगों के लिये किसी एक बन्धुए को जिसे वे चाहते थे, छोड़ देता था।
16 उस समय बरअब्बा नाम उन्हीं में का एक नामी बन्धुआ था।
17 सो जब वे इकट्ठे हुए, तो पीलातुस ने उन से कहा; तुम किस को चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूं? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?
18 क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे डाह से पकड़वाया है।
19 जब वह न्याय की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उस की पत्नी ने उसे कहला भेजा, कि तू उस धर्मी के मामले में हाथ न डालना; क्योंकि मैं ने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है।
20 महायाजकों और पुरनियों ने लोगों को उभारा, कि वे बरअब्बा को मांग ले, और यीशु को नाश कराएं।
21 हाकिम ने उन से पूछा, कि इन दोनों में से किस को चाहते हो, कि तुम्हारे लिये छोड़ दूं? उन्होंने कहा; बरअब्बा को।
22 पीलातुस ने उन से पूछा; फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूं? सब ने उस से कहा, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।
23 हाकिम ने कहा; क्यों उस ने क्या बुराई की है? परन्तु वे और भी चिल्ला, चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए”।
24 जब पीलातुस ने देखा, कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इस के विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के साम्हने अपने हाथ धोए, और कहा; मैं इस धर्मी के लोहू से निर्दोष हूं; तुम ही जानो।
25 सब लोगों ने उत्तर दिया, कि इस का लोहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो।
26 इस पर उस ने बरअब्बा को उन के लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए॥

मत्ती 27:11-26

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत, मौत और तद्फ़ीन (दफ़न किया जाना)

इंजील शरीफ़ बड़े तफ़सील के साथ बयान करती है कि हज़रत ईसा अल मसीह को किस तरह सलीब दी गयी थी I यहाँ इस का पूरा बयान मौजूद है I

  27 तब हाकिम के सिपाहियों ने यीशु को किले में ले जाकर सारी पलटन उसके चहुं ओर इकट्ठी की।
28 और उसके कपड़े उतारकर उसे किरिमजी बागा पहिनाया।
29 और काटों को मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा; और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेककर उसे ठट्ठे में उड़ाने लगे, कि हे यहूदियों के राजा नमस्कार।
30 और उस पर थूका; और वही सरकण्डा लेकर उसके सिर पर मारने लगे।
31 जब वे उसका ठट्ठा कर चुके, तो वह बागा उस पर से उतारकर फिर उसी के कपड़े उसे पहिनाए, और क्रूस पर चढ़ाने के लिये ले चले॥
32 बाहर जाते हुए उन्हें शमौन नाम एक कुरेनी मनुष्य मिला, उन्होंने उसे बेगार में पकड़ा कि उसका क्रूस उठा ले चले।
33 और उस स्थान पर जो गुलगुता नाम की जगह अर्थात खोपड़ी का स्थान कहलाता है पहुंचकर।
34 उन्होंने पित्त मिलाया हुआ दाखरस उसे पीने को दिया, परन्तु उस ने चखकर पीना न चाहा।
35 तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया; और चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।
36 और वहां बैठकर उसका पहरा देने लगे।
37 और उसका दोषपत्र, उसके सिर के ऊपर लगाया, कि “यह यहूदियों का राजा यीशु है”।
38 तब उसके साथ दो डाकू एक दाहिने और एक बाएं क्रूसों पर चढ़ाए गए।
39 और आने जाने वाले सिर हिला हिलाकर उस की निन्दा करते थे।
40 और यह कहते थे, कि हे मन्दिर के ढाने वाले और तीन दिन में बनाने वाले, अपने आप को तो बचा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो क्रूस पर से उतर आ।
41 इसी रीति से महायाजक भी शास्त्रियों और पुरनियों समेत ठट्ठा कर करके कहते थे, इस ने औरों को बचाया, और अपने को नहीं बचा सकता।
42 यह तो “इस्राएल का राजा है”। अब क्रूस पर से उतर आए, तो हम उस पर विश्वास करें।
43 उस ने परमेश्वर का भरोसा रखा है, यदि वह इस को चाहता है, तो अब इसे छुड़ा ले, क्योंकि इस ने कहा था, कि “मैं परमेश्वर का पुत्र हूं”।
44 इसी प्रकार डाकू भी जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे उस की निन्दा करते थे॥
45 दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अन्धेरा छाया रहा।
46 तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, एली, एली, लमा शबक्तनी अर्थात हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?
47 जो वहां खड़े थे, उन में से कितनों ने यह सुनकर कहा, वह तो एलिय्याह को पुकारता है।
48 उन में से एक तुरन्त दौड़ा, और स्पंज लेकर सिरके में डुबोया, और सरकण्डे पर रखकर उसे चुसाया।
49 औरों ने कहा, रह जाओ, देखें, एलिय्याह उसे बचाने आता है कि नहीं।
50 तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्लाकर प्राण छोड़ दिए।
51 और देखो मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट कर दो टुकड़े हो गया: और धरती डोल गई और चटानें तड़क गईं।
52 और कब्रें खुल गईं; और सोए हुए पवित्र लोगों की बहुत लोथें जी उठीं।
53 और उसके जी उठने के बाद वे कब्रों में से निकलकर पवित्र नगर में गए, और बहुतों को दिखाई दिए।
54 तब सूबेदार और जो उसके साथ यीशु का पहरा दे रहे थे, भुईंडोल और जो कुछ हुआ था, देखकर अत्यन्त डर गए, और कहा, सचमुच “यह परमेश्वर का पुत्र था”।
55 वहां बहुत सी स्त्रियां जो गलील से यीशु की सेवा करती हुईं उसके साथ आईं थीं, दूर से यह देख रही थीं।
56 उन में मरियम मगदलीली और याकूब और योसेस की माता मरियम और जब्दी के पुत्रों की माता थीं।                                                         

मत्ती 27:27-56

इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह की मौत के लम्हों पर कई मकामों में ज़लज़लों के आने, चट्टानों के तड़ख़ने, और क़ब्रों के खुलने का बयान करती है जबकि सूरा अज़–ज़ल्ज़लह भी इन्हीं बैटन का ज़िकर करता है (सूरा 99 – ज़ल्ज़लह)

 जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगीऔर ज़मीन अपने अन्दर के बोझे (मादनयात मुर्दे वग़ैरह) निकाल डालेगीऔर एक इन्सान कहेगा कि उसको क्या हो गया हैउस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगीक्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसको हुक्म दिया होगाउस दिन लोग गिरोह गिरोह (अपनी कब्रों से) निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देखे                                                        

सूरा अज़ – ज़ल्ज़लह 99:1—6

सूरा अज़–ज़ल्ज़लह इन्साफ़ के दिन (क़यामत के दिन) का इस्तेमाल करता है I हज़रत ईसा अल मसीह की मौत पर सूरा अज़ — ज़लज़ला के वाक़ियात का मुताबिक़ होना एक निशानी बतोर है कि उनकी मौत उस आने वाले इन्साफ़ के दिन के लिए एक बहुत ही ज़रूरी क़ीमत थी I     

उसके पहलू को ‘छेदा गया’

युहन्ना की इनजील मस्लूबियत के दौरान एक गुरवीदा किये जाने की तफ़सील को बयान करती है I वह बयान करती है :

  31 और इसलिये कि वह तैयारी का दिन था, यहूदियों ने पीलातुस से बिनती की कि उन की टांगे तोड़ दी जाएं और वे उतारे जाएं ताकि सब्त के दिन वे क्रूसों पर न रहें, क्योंकि वह सब्त का दिन बड़ा दिन था।
32 सो सिपाहियों ने आकर पहिले की टांगें तोड़ीं तब दूसरे की भी, जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे।
33 परन्तु जब यीशु के पास आकर देखा कि वह मर चुका है, तो उस की टांगें न तोड़ीं।
34 परन्तु सिपाहियों में से एक ने बरछे से उसका पंजर बेधा और उस में से तुरन्त लोहू और पानी निकला।
35 जिस ने यह देखा, उसी ने गवाही दी है, और उस की गवाही सच्ची है; और वह जानता है, कि सच कहता है कि तुम भी विश्वास करो।
36 ये बातें इसलिये हुईं कि पवित्र शास्त्र की यह बात पूरी हो कि उस की कोई हड्डी तोड़ी न जाएगी।
37 फिर एक और स्थान पर यह लिखा है, कि जिसे उन्होंने बेधा है, उस पर दृष्टि करेंगे॥

युहन्ना19:31-37

युहन्ना ने रोमी सिपाहियों को ईसा अल मसीह के पहलू पर नेज़े से छेदते हुए देखा था जिस से पानी और खून पह्लू से बहने लगा था, जो इस बात का इशारा करता है कि ईसा नबी की मौत दिल की धड़कन रुकने के सबब से हुई थी I

इंजील शरीफ उस दिन के एक ख़ास वाक़िये का बयान करती है – यानी कि उन के बदन का दफ़नाया जाना I   

  57 जब सांझ हुई तो यूसुफ नाम अरिमतियाह का एक धनी मनुष्य जो आप ही यीशु का चेला था आया: उस ने पीलातुस के पास जाकर यीशु की लोथ मांगी।
58 इस पर पीलातुस ने दे देने की आज्ञा दी।
59 यूसुफ ने लोथ को लेकर उसे उज्ज़वल चादर में लपेटा।
60 और उसे अपनी नई कब्र में रखा, जो उस ने चट्टान में खुदवाई थी, और कब्र के द्वार पर बड़ा पत्थर लुढ़काकर चला गया।
61 और मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम वहां कब्र के साम्हने बैठी थीं॥

मत्ती 27:57-61

दिन 6 – मुबारक जुम्मा

यहूदी कैलंडर के हिसाब से उनका हरेक दिन गुरूबे आफ़ताब से शुरू होता है I सो हफ़्ते का वह छटटा दिन ईसा नबी के अपने शागिरदों के साथ पाक अशा में शरीक होने के साथ शुरू हुआ I मगर दिन के ख़त्म होने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया, कई मर्तबा मुक़द्दमे में लेजाया गया, सलीब दी गयी, उनके पहलू पर नेज़े से छेदा गया, और उन्हें दफ़नाया गया I इस दिन को अक्सर ‘मुबारक जुम्मा’ के नाम से हवाला दिया जाता है I मगर यह वाक़ियात एक सवाल ले आता है कि : एक पकड़वाए जाने का दिन, सताए जाने और एक नबी की मौत को क्या कभी ‘अच्छा’ या ‘मुबारक’ बतोर क़रार दिया जा सकता है? यह क्यूँ मुबारक या अच्छा जुम्मा है , और खराब जुम्मा क्यूं नहीं है ?

यह एक बड़ा सवाल है जिसे हम इंजील के बयानात को अगले दिनों में जारी रखते हुए जवाब दे सकते हैं , मगर तारीखी वक़्त की लकीर में एक सबूत पाया जाता है वह यह है कि अगर हम गौर करते हैं कि यह जुम्मे का दिन निसान महीने की 14 तारीख़ को पड़ता है और उसी दिन फ़सह का दिन भी है जिस दिन यहूदियों ने मिस्र में 1500 साल पहले मिस्र की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए हर ख़ानदान के हिसाब से एक बर्रे को ज़बह किया था I                   

दिन 6–जुम्मा – ईसा अल मसीह की जिंदगी के आखरी हफ़्ते को तौरात शरीफ़ की तंज़ीम ओ तरतीब से मवाज़िना किया गया है

कई एक आदमियों की ज़िन्दगी का बयान उनकी मौत पर ख़त्म होता है, मगर इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह की कहानी को जरी रखती है ताकि हम समझ सकें कि यह दिन एक मुबारक जुम्मा  बतोर कभी सोचा जा सकता है I उसका दूसरा दिन सबत का दिन था – दिन 7 .    

मगर इस से पहले आइये हम सूरा अल – जुम्मा की तरफ़ वापस जाएं उस आयत को जारी रखते हुए जिसे हम ने पढ़ा था I 

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मौत जिससे तुम लोग भागते हो वह तो ज़रूर तुम्हारे सामने आएगी फिर तुम पोशीदा और ज़ाहिर के जानने वाले (ख़ुदा) की तरफ लौटा दिए जाओगे फिर जो कुछ भी तुम करते थे वह तुम्हें बता देगाऐ ईमानदारों जब जुमा का दिन नमाज़ (जुमा) के लिए अज़ान दी जाए तो ख़ुदा की याद (नमाज़) की तरफ दौड़ पड़ो और (ख़रीद) व फरोख्त छोड़ दो अगर तुम समझते हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है

सूरए जुमुअह62:8-9

नबी हज़रत ईसा अल मसीह सूरह अल –जुम्मा की छटटी और सातवें आयत को चुनौती बतोर लेते हुए मौत से नहीं भागे थे, मगर दुआ के साथ शुरू करते हुए इस बड़े इम्तिहान का सामना किया,यह साबित करने के लिए कि  वह ‘खुदा के एक दोस्त’ हैं I तो फिर क्या यह उनकी दिलेरी की याददाश्त नहीं है कि बाद में मुस्लिम्स ने जुम्मे को मस्जिद में नमाज़ के लिए अलग कर किया ? इस बतोर अल्लाह नहीं चाहता कि हम नबी की ख़िदमत गुज़ारी को भूल जाएं I

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