बाइबिल (अल किताब ) का तर्जुमा कैसे हुआ

 बाइबिल या अल किताब आमतौर पर इसकी असली ज़बानों  (हिब्रू और यूनानी ) में नहीं पढ़ी जाती है।इसका मतलब  यह नहीं कि  यह इन असली जवान में मौजूद नहीं है। यह मौजूद है, और विद्वान लोग यूनानी  और हिब्रू का अध्ययन जामीया  मै एक मकसद के साथ करते है ताकी वह अल किताब को उसकी असली जवान मे पड़ और उसका अध्ययन कर सके।(मूल हिब्रू में तोरा यहां देखें, और मूल  यूनानी मे इंजील शरीफ यहां देखें ) यह अक्सर ऐसा होता है बाइबल के पेशेवर  उस्ताद  इसका अध्ययन करते रहते हैं।लेकिन आमतौर पर नियमित विश्वासी अल किताब को असली जवान मे नहीं पड़ते बल्कि अपनी मात्र ज़ुबान  मे किये गए तर्जुमे मे अल किताब को पढ़ते हैं, इसलिए बाइबिल(अल-किताब ) अक्सर अपनी असली ज़ुबान मै नहीं देखी जाती है, और कुछ सोचते है कि असली(मूल) ज़ुबान  खो गयी हैं, और अन्य सोचते है कि तर्जुमा की प्रकिया को आगे बढ़ाते समय भ्रस्टाचार  को बढ़ावा मिला है, इन नतीजों पर कूदने से पहले, अल-किताब या बाइबिल के तर्जुमे की प्रक्रिया को समझना बेहतर है, इस लेख मै हम यही करेंगे।

 तर्जुमा बनाम लिप्यंतरण(उच्चारण )(शब्दो को एक लिपि से दूसरी लिपि में परिवर्तित करना)

हमें पहले तर्जुमे की कुछ बुनियादी बातों को समझना होगा,  तर्जुमेकार कभी कभी मायने के वजाये समान आवाज़ से तर्जुमा करना चुनते हैं, खासकर जब नाम और शीर्षक की बात आती है, यही लिप्यंतरण(उच्चारण) के रूप मै माना जाता है, नीचे दी गयी तस्वीर के उदाहरण मै तर्जुमा और लिप्यंतरण के बीच के फर्क को देख सकते हैं. गॉड लफ्ज को अरबी से अंग्रेजी मे लाने के लिए दो तरीके चुन सकते हैं। अगर आप मायने के रूप मै तर्जुमा करें तो गॉड लफ्ज़ मिलता है या अगर आप आवाज़ के रूप मै तर्जुमा करें तो अल्लाह लफ्ज मिलता है, 

 तर्जुमा बनाम लिप्यंतरण(उच्चारण)                                                                                                                                               

यहां गॉड लफ्ज़ का इस्तेमाल यह बताने के लिए होता है कि इस तरीके को कैसे हम एक ज़ुबान से दूसरी जुबान  मै तर्जुमा या लिप्यंतरण(उच्चारण) को कर सकते हैं।

 हाल के सालों में अंग्रेजी और अरबी के बीच बड़े हुए विनिमय  के साथ शब्द ‘अल्लाह’ अंग्रेजी भाषा में एक पहचान वाला लफ्ज़ बन गया है जिसका मतलब गॉड होता है. उसमे शीर्षक और खास शब्दो के तर्जुमा या लिप्यंतरण मै चूनाव लेते समय कोई सही या गलत विकल्प नहीं है.   यह भाषा को सूनने वाले पर निर्भर करता है की वह इसको कितनी अच्छी तरह समझ सकता है या स्वीकार करता है .

 सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  

 बाइबिल का पहला तर्जुमा तब हुआ था जब यहूदी  का पुराना नियम(तौरेत और जबूर) का यूनानी ज़ुबान मै तर्जुमा 250 बी सी मै हो गया था। इस तर्जुमें को यूनानी पुराने नियम (या llx  ) के रूप मे जानते हैं और यह बहुत प्रभावशाली था, क्योकि नया नियम(इंजील सरीफ) यूनानी ज़ुबान मै लिखा गया था, इसलिए पुराने नियम के कई उद्धरण यूनानी सेप्टुआजेंट से लिए गए थे

सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) मै तर्ज़ुमा और लिप्यंतरण

 नीचे दिए गए आंकड़े से यह पता चलता है कि यह सब आधुनिक दिनों की बाइबिल(अल- किताब) को कैसे प्रभावित करता है जहां अनुवाद  चरण चतुष्कोणों(वृत्त का चतुर्थ भाग) में दिखाए जाते हैं।

बाइबिल   = (अलकिताब ) आधुनिक भाषा मैं,   (उदाहरण -अंग्रेजी)
यह आधुनिक भाषा में बाइबिल (अल किताब) की अनुवाद प्रक्रिया को दर्शाता है,

मूल इब्रानी  पुराना नियम(तौरेत और ज़बूर) चतुर्थांश # 1 में है  और आज  मेसोरेटिक पाठ (आधिकारिक इब्रानी ) और मृत सागर हस्तलिपियों में आसानी से मिलती है।क्योंकि सेप्टुआजेंट( इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) एक  इब्रानी था -> यूनानी  अनुवाद में इसे तीर के रूप में # 1 से # 2 तक जाने वाले तीर के रूप में दिखाया गया है। नया नियम(इंजील) खुद मूल रूप से यूनानी मै लिखा गया था तो इसका मतलब नंबर 2 मै पुराना नियम(तौरेत, जबूर) और नया नियम(इंजील) शामिल है, नीचे के आधे भाग में (नंबर 3) बाइबल का नयी भाषा अनुवाद है (मिशाल के तौर पर अंग्रेजी). वहां जाने के लिए पुराना नियम(तौरेत, ज़बूर) का अनुवाद मूल इब्रानी भाषा मै किया गया है, (1 -> 3 ) और नया नियम(इंजील)  यूनानी मै अनुवादित है (2  -> 3). अनुवादकों को लिप्यंतरण(उच्चारण)  या नामों और शीर्षकों के अनुवाद के बारे में ज़रूर निर्णय लेना चाहिए जैसा की पहले से बताया गया है,  यह हरे रंग के तीर के साथ चित्रित किया गया है की लिप्यांतरण (उच्चारण) और अनुवाद, यह दर्शाता है कि अनुवादक या तो दृष्टिकोण ले सकते हैं।

 सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) बाइबल के बदलने के सवाल पर गवाह

चूंकि 250 ईसा पूर्व के आसपास सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  का इब्रानी भाषा से तर्जुमा किया गया था।  हम देख सकते हैं (यदि हम ग्रीक को इब्रानी  में वापस अनुवाद करते हैं) तो इन अनुवादकों ने अपने इब्रानी पांडुलिपियों में जो अनुवाद किया था, उसमे  क्या था। चूंकि ये ग्रंथ लगभग समान हैं, यह दर्शाता है कि पुराने नियम(तौरेत,ज़बूर)  का पाठ कम से कम 250 ईसा पूर्व से नहीं बदला है। यदि किसी ने (ईसाई, यहूदी या किसी और ने) पुराने नियम(तौरेत , ज़बूर ) को बदल दिया और उसे भ्रष्ट कर दिया, तो सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  इब्रानी पाठ से अलग होना चाहिए। लेकिन वे मूल रूप से समान हैं।

इसी तरह, यदि उदाहरण के लिए, अलेक्जेंड्रिया और मिस्र में किसी ने सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) को ही भ्रष्ट कर दिया था, तो सिकंदरिया में सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) पांडुलिपि की प्रतियां मध्य पूर्व और भूमध्यसागरीय में अन्य सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  पांडुलिपियों से अलग होंगी। लेकिन वे एक ही हैं। तो घटना हमें बिना किसी विरोधाभास के बताती है कि पुराना नियम(तौरेत, ज़बूर) बदला नहीं है।

 तर्जुमा मै सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)

आधुनिक तर्जुमा में मदद के लिए सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) का भी इस्तेमाल किया जाता था । तर्जुमा आलिम सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) का इस्तेमाल  इस दिन करने के लिए करते है ताकि उन्हें पुराने नियम(तौरेत और ज़बूर) के कुछ कठिन भागों का तर्जुमा करने के लिए मदद मिल सके।यूनानी बहुत अच्छी तरह से समझी जाती है,  और कुछ मार्गों में जहां इब्रानी मुश्किल है तर्जुमेकार देख सकते हैं कि 2250 साल पहले सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  तर्जुमेकारो ने इन अस्पष्ट मार्गों को कैसे समझा। तर्जुमे, लिप्यंतरण और सेप्टुआजेंट को समझने में हमें यह समझने में मदद मिलती है कि ‘मसीह’  और ‘मसीहा’ शब्द कहां से आए हैं क्योंकि ये शब्द ईसा (या जीसस – पीबीयूएच) से संबंधित हैं, जिन्हें समझने के लिए हमें  इंजिल शरीफ का संदेश  समझने की जरूरत है। हम इसे आगे देखते हैं।

तहरीफ़ी नुक्ता चीनी का इल्म यह देखने के लिए बाइबिल बिगड़ी हुई है या नहीं

मैं क्यूँ बाइबिल की किताबों का मुताला करता हूँ? यह बहुत अरसा पहले लिखा हुआ था और इस के कई एक तर्जुमे और तनक़ीह (नज़र -ए- सानी हो रखे हैं।  मैं ने सुना है कि इसका असकी पैग़ाम भी बदल गया है। मैं ने यह भी सुन रखा है कि कई बार तौरात, ज़बूर और इंजील इन सब को मिलाकर एक बाइबिल कि शल्क सामने आयी है।

हम में से बहुतों के लिए यही बात अल-किताब बाइबिल की बाबत सुनने में आया है बहर हाल इस को लिखे दो हज़ार साल से भी ज़ियादा हो गए। तो फिर क्या हम इन सवालों का जवाब दे सकते हैं इस बाबत कि आज हम अल – किताब (बाइबिल) में क्या पढ़ते हैं? असल में इस के अन्दर नबियों ने और मुसंननिफ़ों ने कई अरसे पहले क्या लिखा था? दुसरे मायनों में किन तहरीफ़ों की अदल बदल हुई है? मज़हब के अलावा क्या कोई इल्मी या अक़ली असबाब यह जान्ने के लिए है कि बाइबिल जो आज हम पढ़ते हैं वह बिगड़ा हुआ है या असल में वैसा ही है जैसा पहले था?

तहरीफ़ी नुक्ताचीनी के बुनयादी क़वाइद :

अक्सर लोग जो इस तरह के सवाल करते हैं नहीं पहचानते कि इल्मी ज़हनी और अख़लाक़ी तरबियत क्या है जो नुक्ता चीनी बतोर जाना जाता है? जिस के ज़रिये हम इन सवालात का जवाब दे सकते हैं और इस लिए कि यह एक इल्मी और अख़लाक़ी तरबियत है यह किसी भी क़दीम तहरीरों पर नाफ़िज़ होता है यह मज़मून आपको दो क़वाइद देंगे जो तहरीफ़ी नुक्ताचीनी में इस्तेमाल किया गया था और फिर इन्हें बाइबिल के लिए नाफ़िज़ किया गया – ऐसा करने के लिए हम शुरू करते हैं इस नक़शे के साथ जो इस तरीके की मिसाल पेश करता है जिस के ज़रिये क़दीम तहरीरें हर ज़माने में महफूज़ की गयीं ताकि आज हम उन्हें पढ़ सकें –

एक वक़्त की लकीर बता रही है कि किस तरह तमाम क़दीम किताबें आज हमारे पास पहुँचीं

यह ख़ाका किताब की एक मिसाल को बताता है जो 500 कबल मसीह में लिखी गई थी।  इस किताब का असल किसी तरह ग़ैर वाज़ेह तोर से नहीं खोया था। तो इसके गल सड़ने से पहले, खोजाने से पहले या बर्बाद होने से पहले एम एस एस के ज़रिये इस कि एक नक़ल तैयार कर ली गई थी जो उसकी पहली कापी थी। एक पेशावर जमाअत के लोग जिन्हें मुहररीर या कातिब कहा जाता है उनहोंने इसको नक़ल किया।  जैसे जैसे ज़माना आगे बढ़ता गया इसकी (दूसरी और तीसरी नक़ल बन के तैयार हुई) मतलब यह कि एक कापी (नक़ल) की मुहाफ़िज़त हुई ताकि आज के जमाने में इस का वजूद बाक़ी रहे।  हमारे मिसाली ख़ाके में इस तौसी’ शुदा कापी को 500 ईस्वी में तैयार किया गया था इस का मतलब यह है कि इस किताब की हालत को सब से पहले हम सिर्फ़ 500 ईस्वी से ही मालूम कर सकते थे तो फिर 500 क़ब्ल मसीह से 500 ईस्वी तक का जो जो अरसा है (इस को हम ख़ाके में लेबल x) से मालूम कर सकते हैं।  यह वह ज़माना है जहां हम कोई नक़ल नहीं बना सकत थे जबकि तमाम दस्तावेज़ उस ज़माने से ग़ैब हो चुके थे -मिसाल बतोर अगर बिगाड़  पैदा हुआ तो जो दूसरी कापी पहली कापी से बनाई गई थी उस से हम दरयाफ्त नहीं करेंगे इस बतोर कि यह तहरीर या नविश्ता एक दूरे के मवाज़िने के लिए तैयार हैं। यह वक़्त का अरसा (यानि अरसा x) कापियों के वजूद में आने से पहले इस तरह से तहरीफ़ी बे यक़ीनी का वक़फ़ा यानि दरमियानी अरसा है जहां बिगड़ पैदा हो सकते हैं। इस लिए तहरीफ़ी नुक्ताचीनी का पहला उसूल यह है कि इस दरमियानी वक़फ़ा x को कम किया जाए जिस से हमारे वक़्त के लिए तहरीर या नविशतों की सहीह मह्फ़ूज़ियत को ज़ियादा भरोसे के साथ बरक़रार रख सके जबकि बे यकीनी के वक़फ़े कोकम करदिया गया है।

जी हाँ, आम तोर से एक से ज़ियादा नविश्ते का मसौदा (दस्तावेज़) आज की तारीख़ में मौजूद है। मान लीजिये कि उन हर एक में से वही एक अलग किया हुआ दो नविशतों की कापियां हमारे पास मोजूद हैं जिस के लिए ज़ेल का मुहावरा सवाल बतोर है कि :

यह एक वैरिएंट रीडिंग दिखाता है (एक कहता है ‘जोन’ और दूसरा कहता है ‘जॉन’) लेकिन केवल कुछ पांडुलिपियों के साथ यह निर्धारित करना मुश्किल है कि कौन सी गलती है।

     कुछ एम् एस एस के साथ मुश्किल है कि

     ग़ैर उलझी कापियों में ग़लती ज़ाहिर करे

यह बताता है कि यह जुदा जुदा  पढने की चीज़ है (कोई जोन कहता है तो दूसरा जॉन कहता है) मगर कुछ ही   दस्तावेजों के साथ यह फ़ैसला करना मुश्किल है कि कौन सा दस्तावेज़ गलत है।

असली मुसन्निफ़ या तो जोन की बाबत लिख रहा था या फिर जॉन  की बाबत इस के अलावा दुसरे दस्तावेजों में गलतियां पाई जाती हैं।  मगर सवाल यह है कि किस एक से गलती हुई है? दस्तियाब सबूत से फ़ैसला करना बहुत मुश्किल है-

अब मान लीजिये कि हम ने इसी काम से दो और नविशतों की कापियां पाई है जिस तरह ज़ेल में बताया गया है।

अब हमारे पास चार पांडुलिपियां हैं और यह देखना आसान है कि किसमें त्रुटि है।

और ज़ियादा अब तक मौजूद ओ महफूज़ कापियां जो

पूरब रुख की तरफ़ है ताकि नक़ल की गलती पर काम करे

अब हमारे पास चार नविश्ते हैं और यह ज़ियादा आसान है यह देखने के लिए कि कौन सा गलत है।

अब यह ज़ियादा आसान है यह फ़ैसला लेने के लिए कि कौन से नविश्ते में चूक हुई है।  यह ज़ियादा इस तरह का है कि गलती एक बार होती है।  बजाए इस के कि गलती तीन बार दोहराई जाए – तो यह इसी तरह का है कि एम् एस एस एस के पास गलत कापी है और मुसन्निफ़ जोन कि बात कर रहा था न कि जॉन की बाबत ‘जॉन’ का दस्तावेज़ बिगड़ा हुआ है।

यह सादा मिसाल तहरीफ़ी नुक्ताचीनी के दुसरे उसूल को वाज़ेह करता है : और ज़ियादा नविश्ते जो आज वजूद में हैं उन्हें दरयाफ़त करना, गलतियाँ सुधारना और जानना कि असल क्या कहता है।

तारीख़ी किताबों की तहरीफ़ी नुक्ताचीनी

सो अब हमारे पास दो क़वाइद हैं जो इल्मी तहरीफ़ी नुक्ताचीनी के हैं जिनको मेरी क़दीम किताब का तहरीफ़ी एतबारी के लिए फ़ैसला लिया जाता रहा है: 1) और सब से क़दीम वजूद में आने वाली कापियों और असली तहरीरों के दरमियान औक़ात को नापना और 2) वजूद में आए नविशतों की कापियों की गिनती करना।  जबकि यह क़वाइद तमाम क़दीम तहरीरों के लिए नाफ़िज़ होती हैं।  हम उन्हें बाइबिल और दीगर क़दीम किताबों के लिए नाफ़िज़ कर सकते हैं जिस तरह ज़ेल की टेबल में किया जा चुका है। ( मैक डोवेल.जे.एविडेंस से लिया गया जो एक राय की मांग करता है।  1979 सफहा नंबर 42, 48)-

मुसन्निफ़ कब लिखा क़दीम वक़्त की #
  गया नक़ल मी आद  
कैसर 50 BC 900 AD 950 10
प्लेटो 350 BC 900 AD 1250 7
अरिस्तोटल 300 BC 1100 AD 1400 5
थुसिदिदास 400 BC 900 AD 1300 8
हेरोदोतुस 400 BC 900 AD 1300 8
सोफोकाल्स 400 BC 1000 AD 1400 100
टेकितुस 100 AD 1100 AD 1000 20
पिलिनी 100 AD  850 AD 750 7

*किसी एक के काम से

यह मुसन्निफ़ीन क़दीम यूनानी और रोमी ज़माने के बड़े मुसन्निफ़ीन में गिने जाते हैं।  इन की तहरीरों ने मौजूदा इस्लाह की तरक्की को शक्ल दी है।  औसतन उन्हों ने हम तक 10 से 100 नविश्ते पहुंचाए हैं जो असली नविशतों के लिखे जाने के बाद पिछले 1000 सालों से महफूज़ किये गए थे।

बाइबिल /अल किताब की तहरीफ़ी नुक्ताचीनी

ज़ेल की टेबल बाइबिल की (ख़ास तोर से इंजील या नए अहद्नामे की) तहरीरों का इन्हीं बातों में मवाज़िना करते हैं। (कम्फ़र्ट पी डब्लू से लिया गया – बाइबिल का असल  1992- सफ़हा 193)।

एम् एस एस कब लिखा एम् एस एस वक़्त की
गया की तारीख़ मीआद
जॉन रयलन 90 AD 130  AD 40 साल
बोड्मेर 90 AD 150 -200 110 साल
पपिरस AD
चेस्टर 60AD 200 AD 140 साल
बीटटी
कोडेक्स 60 -90 AD 325 AD 265 साल
वेटिकनस
कोडेक्स 60 -90 AD 350 AD 290 साल
सिनैतिकस

बाइबिल / अल किताब की तहरीफ़ी नुक्ता चीनी का ख़ुलासा

नए अहद्नामे के दस्तावेज़ की कापियां इतनी कसीर तादाद में हैं कि एक टेबल में इनसब की फहरिस्त बनाना ना  मुमकिन है जिस तरह कि एक मुतअल्लिम जिसने इस मामले में बरसों से मुताला किया वह इस तरह बयान करता है:

“आज हमारे पास नए अहद नामे के हिस्सों की 24000 से भी ज़ियादा एम् एस एस की कापियां मौजूद हैं ….दूसरा किसी भीदस्तावेज़ की क़दामत इस तादाद तक पहुंचना और तसदीक़ करना शुरू भी नहीं करते। म्वाज़िना बतोर होमर के ज़रिये  ILIAD 643 एम् एस एस की कापियों के साथ दूसरे नंबर पर है जो अभी भी ज़िन्दा है” (मैक डोवेल, जे. सबूत जो एक तजवीज़

राए) की मांग करता है।  1979.सफ़्हा 40

बिरिटिश म्यूज़ियम में एक मशहूर मुतअल्लिम जिस बात से इत्तिफ़ाक़ रखता है वह इसतरह है :

“उलमा इस बात से तसल्ली बख्श हैं कि उन के पास हकीकी तोर से असल यूनानी और रोमी मुसन्निफ़ीन की सच्ची किताबें मौजूद हैं….इस के बावजूद भी उन की तहरीरों का इल्म मुट्ठी भर एम् एस एस कि दस्तावेज़ों पर मुनहसर है जहां कि नए अहदनामे की हज़ारों कापियां पाई जाती हैं” किन्योन . F.G.- (बिरिटिश म्यूज़ियम के साबिक डाइरेक्टर) किताब .

हमारी बाइबिल और क़दीम नविश्ते’ 1941 सफ़्हा 23

नए अहद्नामे के दस्तावेज़ की बाबत मेरे पास एक किताब है जो इन बातों से शुरू होती है :

“यह किताब नए अहद नामे के क़दीम दस्तावेजों की 69 वीं कापी है जो हाथ से लिखी हुई नक़ल मुहैया करती है जिस की तारीख़ दूसरी सदिसे शुरू होकर चौथी सदी तक की है (200 – 400 ईस्वी) ….जिसमें नए अहद्नामे का 2/3 हिस्सा मौजूद है। ( पी कम्फ़र्ट, किताब का नाम “

नए अहद्नामे की सब से क़दीम किताब, यूनानी दस्तावेज़” दीबाचे का सफ़हा नंबर 17 . 2001

दुसरे अलफ़ाज़ में कई एक मौजूद नविश्ते बहुत क़दीम हैं,तक़रीबन 100 साल क़दीम या इतनी क़दीम कि नए अहद्नामे की तहरीरों से पहले की – यह नविशते कांस्टनटाईन के इक़तिदार में आने से भी पहले और रोमी कलीसिया के आग़ाज़ से पहले के हैं।  यह दीगर इलाके के नविशतों के साथ बहीरा -ए- रोम के आस पास फैल गए। मगर वह वही नविश्ते थे जो पहले मिले थे।

सो हम इस से क्या फ़ैसला लेते हैं? यक़ीनन कम अज़ कम उन में जो एक मक़सद के साथ नापते हैं। असली और पहले की फैली हुई नविशतों के साथ एम् एस एस कि फैली हुई गिनती और वक़्त की मीआद के बीच नए अहद्नामे (इंजील) की कापी दीगर रोमी तहरीरों से ज़ियादा हिमायत के लाइक़ हुआ है -फ़ैसला जिस के लिए सबूत है वह हमको ज़ेल के बयान के ज़रिये मिलता है :

“नए अहद नामे की असल इबारत की हासिले क़ुवत का शुबहा होने के लिए तमाम पुराने ज़माने की नविश्तों को ग़ैर वाज़ेह कि तरफ़ चूक होने के लिए रखा गया है क्यूंकि कोई और पुराने ज़माने की दस्तावेज़ नए अहद्नामे की तरह मुख्तलिफ़  नुसखों की तारीख़ के एतबार से तसदीक़ किया हुआ नहीं है”

मोंट गोमरी, तारीख़ और मसीहियत 1971. सफ़्हा 29.

जो वह कह रहा है वह यकसां होना चाहिए, अगर हम अल किताब (बाइबिल) की एतबारी कि बाबत सवाल करते हैं तो हम उन सब को तरक कर सकते हैं जो हम क़दीम तारीख़ की बाबत आम तोर पर जानते हैं,यह भी कि किसी तारीख्दान ने कभी न किया हो – हेरूदुतुस की तहरीरों को बदली हुई तहरीर बतोर क्यूँ लेना चाहिए जबकि उन में से सिर्फ़ आठ दस्तावेज़ 1300 सालों के दौर में हमारे हाथ लगे हैं और वह भी क़दीम कापी के लिखे जाने के दौर से लेकर मौजूद शुदा कापी तक -अगर हम सोचते हैं कि बाइबिल की असल इबारत में बिगाड़ हुआ है जबकि उस वक़्त 24000 दस्तावेज़ मौजूद थे जिन में से कुछ पहले लिखे जाने के 100 साल बाद की हैं ऐसा सोचना समझदारी नहीं है।

हम जानते हैं कि बाइबिल की असली इबारतों को पहले ज़माने से ही किसी भी तरह से कोई तबदीली नहीं की गई जबकि कई ज़बानों का वजूद हुआ और ख़तम भी हुआ, कई एक सल्तनतों का आग़ाज़ हुआ और मिट भी गए जबकि यह एम् एस एस की यह दस्तावेज़ इन तमाम वाक़ि आत के वाक़े होने से पहले की हैं।  मिसाल के तोर पर हम जानते हैं कि कोई पोप या रोमी शाहिनशाह कान्स्टनटाइन ने बाइबिल को तब्दील नहीं किया इस लिए कि हमारे पास भारी तादाद में बाइबिल के दस्तावेज़ इन पापों और कान्सटनटाईन से पहले मौजूद थे। जो दस्तावेज़ बाइबिल के तर्जुमे के लिए आज इस्तेमाल की जाती हैं वह पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (सल्लम) के ज़माने से पहले मौजूद थे। और हक़ीक़त यह है कि जिस हालत में उनहोंने उसे पाया था उस को उन्हों ने अपने ज़माने में बाइबल में से तअय्युन भी किया।  तो यह साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि  उन के ज़माने में दस्तावेजों में कोई भी तब्दीली नहीं हुई ना ही की गयीं।

इसको ज़ेल के वक़्त की लकीर में जहां दस्तावेज़ के ज़राए बताए गए हैं जो मौजूदा बाइबिल के तर्जुमों में इस्तेमाल किये जाते हैं और यह इस्तेमाल बहुत पहले से है।

मौजूदा बाइबिलें क़दीम से मौजूद शुदा दस्तावेज़ों से की जाती रही हैं जिन में से कुछ तो 100 से लेकर 300 ईस्वी पुराने होते हैं। इन दस्तावेज़ों के ज़राए कान्स्टनटाईन से भी पहले के हैं या दीगर मज़हबी सियासी इक्तिदार से पहले के होते हैं और यहाँ तककि पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (सल्लम) से भी पहले के।

ख़ुलासा करने के लिए न तो वक़्त ने और न मसीही रहनुमाओं ने बाइबिल की असली हालत, ख़यालात और पैग़ामात को बिगाड़ा और इस की ज़रुरत भी नहीं थी।  यह वैसी ही है जिस तरह अल किताब या बाइबिल की असल तहरीर सब से पहले पेश किया गया था। आज जो हम उस से पढ़ते हैं वही पढ़ते हैं जो दस्तावेज़ों हारों साल पहले मुसननिफों ने तहरीर किया था। तहरीफ़ी नुक्ताचीनी का इल्म अल किताब (बाइबिल) की हिमायत करता है।

यूनिवरसिटी की तक़रीर में तहरीफ़ी नुक्ताचीनी

इस मज़मून पर केनेडा के मगरिबी अन्टोरियो के यूनिवरसिटी में मुझे एक आम तक़रीर देने का मौक़ा मिला था। इसको ज़ियादा अरसा नहीं हुआ है। यह 17 मिनिट की तक़रीर का अंग्रेज़ी विडियो सवालात के साथ ज़ेल के वेब साईट पर मजूद है।

इस तरह से अबतक हम ने सचमुच में नए अहदनामे (इंजील) की तहरीफ़ी नुताचीनी की बाबत देखा है मगर तौरात और ज़बूर की बाबत क्या कह सकते हैं जो पुराने अहद नामे को तरतीब देता है।  ज़ेल में 7 मिनिट का आडिओ विडियो तक़रीर अंग्रेजी ज़बान में मौजूद है जिस में मैं ने पुराने अहद्नामे के तहरीफ़ी नुक्ता चीनी के उसूल कि बाबत खुलासा पेश किया है।

http://vimeo.com/29541364   .  

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने किसकी क़ुर्बानी दी , इस्माईल की या इस्हाक़ की?

जब हम नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत जब हम बात करते हैं तो मेरे दोस्त लोग इसरार करते हैं कि बेटा जो कुर्बान होने को था वह इस्माईल था जो हज़रत इब्राहीम का बड़ा बेटा था जो हाजरा से था, छोटा बेटा इस्हाक़ नहीं था जो सारह से था। मगर मैं ने जब कुरान शरीफ़ में इस के बारे में पढ़ा तो मैं ता’ज्जुब में पढ़ गया।  जब मैं ने अपने दोस्तों को दिखाया तो वह लोग भी ताज्जुब करने लगे।  इब्राहीम के निशान 3 में मैं ने इस अहम् वक़िये को देखा जहां पूरी इबारत का हवाला दिया गया है। सो यह इबारत क्या कहती है? ख़ास आयत को दोबारा से दोहराया गया है। 

फिर जब इस्माईल अपने बाप के साथ दौड़ धूप करने लगा तो (एक दफा) इबराहीम ने कहा बेटा खूब मैं (वही के ज़रिये क्या) देखता हूँ कि मैं तो खुद तुम्हें ज़िबाह कर रहा हूँ तो तुम भी ग़ौर करो तुम्हारी इसमें क्या राय है इसमाईल ने कहा अब्बा जान जो आपको हुक्म हुआ है उसको (बे तअम्मुल) कीजिए अगर खुदा ने चाहा तो मुझे आप सब्र करने वालों में से पाएग

अल-सफ़फ़ात 37:102

इस इबारत में हज़रत इब्राहीम के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत बेटे के नाम का ज़िक्र तक नहीं  किया गया है और ऐसी हालत में और ज़ियादा कलाम की खोज और मुताला करनी चाहिए। अगर आप पूरी कुरान शरीफ़ में नबी इस्माईल के नाम की तलाश करेंगे तो आप देखेंगे कि 12 मर्तबा उस के नाम का ज़िकर आया हुआ है।

°  इन बारह में से दो मर्तबा अपने बाप इब्राहीम के साथ उस का नाम आया हुआ है (2:125, 2:127)

°  बाक़ी बचे दस में से पांच मर्तबा उसका नाम इब्राहीम के साथ अपने भाई इस्हाक़ के साथ आया हुहै (2:133, 2:136, 2:140, 3:84, 4:163)।

°  बाक़ी बची पांच इबारतें अपने बाप इब्राहीम के नाम के बगैर ज़िकर किया गया है, मगर दीगर नबियों की फ़ेहरिस्त के साथ (6:86, 14:39, 19:54, 21:85, 38:48)।

दो मर्तबा उस का नाम अपने बाप हज़रत इब्राहीम के साथ ज़िकर हुआ है। आप इसको दुआ के दीगर वाक़ियात में देख सकते हैं –  न कि क़ुर्बानी के सिलसिले में।

 (ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो

अल – बक़रह 2:125

और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है

अल – बक़रह 2:127

कुरान शरीफ़ कभी भी  तअय्युन नहीं करता कि क़ुर्बानी के लिए इस्माईल को क़ुरबानगाह पर रखकर ख़ुदा के ज़रिये उसके बाप इब्ररहीम (अलैहिस्सलाम) का इम्तिहान लिया गया था। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘बेटे’ को कहता है। सो मुझे नहीं मा’लूम कि ऐसा क्यूँ यकीन किया जाता है कि वह इसमाईल था जिसे क़ुर्बानी के लिए नज़र किया गया था। 

हज़रत इब्राहीम के बेटे की क़ुर्बानी पर शरह (तफ़सीर)

यूसुफ अली कुरान शरीफ़ के एक मुअज़ज़िज़ मुफ़स्सिर और मुतर्जिम भी हैं।  उनकी तफ़सीर http://al-quraan.info में दस्तियाब है।

बेटे की क़ुर्बानी दिए जाने की तफ़सीर ज़ेल के दो हाशियों पर क़ुरबानी की इबारत मरक़ूम है :

4071 यह सीरिया और फ़लिस्तीन के ज़रखेज़ इलाक़े में था।  लड़का जो पैदा हुआ था वह मुस्लिम रिवायत के मुताबिक था, और वह इब्राहीम का पह्लोठा बेटा था या’नि इस्माईल – यह नाम खुद् ब खुद लफ़ज़ के असल समि’ आ से है जिस के मायने हैं सुनना। इसलिए कि ख़ुदा ने इब्राहीम की दुआ सुन ली थी (आयत 100) जब इस्माईल पैदा हुआ था तो उस वक़्त इब्राहिम की उम्र 86 थी

पैदाइश 16:16

।  इस हिसाब से देखा जाए तो इस्माईल इस्हाक़ से 14 साल बड़ा था। उसके पहले 14 सालों में इस्माईल ही इब्राहीम का एकलौता बेटा था इस के बाद जब इस्हाक़ पैदा हुआ तो वही उस का एकलौता बन गया। इस के बावजूद भी जब हम क़ुर्बानी की बात करते हैं तो पुराना अहद नामा कहता है (पैदाइश 22:2) “तब ख़ुदा ने कहा तू अपने बेटे इस्हाक़ को जो तेरा एकलौता है और जिसे तू प्यार करता है ,अपने साथ लेकर मोरियाह के मुल्क में जा और वहां उसे पहाड़ों में से एक पहाड़ पर जो मैं तुझे बताऊंगा सोख़तनी क़ुर्बानी के तोर पर चढ़ा …”   

ज़ेल के इस हाशिये में वह बहस करता है कि जबकि तौरात कहती है कि ‘तू अपने को ले जो तेरा एकलोता है …..” (पैदाइश 22:2) और इस्माईल 14 साल का था, इस लिए सिर्फ़ इस्माईल को ही एकलोता बेटा बतोर क़ुर्बानी के लिए नज़र किया जा सकता था। मगर वह भूल जाता है कि इस से पहले पैदाइश 21 में उसने इस्माईल आर हाजरा को अपने ख़ानदान से दूर कर दिया था तो इस्हाक़ ही वाजिब तोर से उस का एकलोता बेटा ठहरा – यहाँ ज़ेल में कुछ और बातें तफ़सील से दी गई हैं :

इब्राहीम का बेटा क़ुर्बान हुआ : तौरात की गवाही

तो फिर कुरान शरीफ़ तअय्युन नहीं करता कि किस बेटे को क़ुर्बानी के लिए नज़र किया गया था मगर तौरात में साफ़ लिखा है-आप देख सकते हैं कि तौरात में पैदाइश के 22 बाब में इस्हाक़ के नाम को फ़रक़ फ़रक़ औक़ात में 6 बार ब्यान करता है : देखें (22:2, 3, 6, 7 और 9 आयत में दो बार)-

तौरात का हज़रत मुहम्मद (सल्लम) के ज़रिये तस्दीक़ किया जाना 

तौरात जो आज की तारीख़ में मौजूद है उसको हज़रत मोहम्मद (सल्लम)के ज़रिये किये जाने का साफ़ बयान हदीसों में मौजूद है। इस से ताल्लुक़ रखते हुए कई एक हदीसें मेरे पास मौजूद हैं जिन में से एक बयान करता है : मुलाहजा फरमाएं :

 नाराज़ अब्दुल्ला इब्न उमर: .. यहूदियों का एक समूह आया और अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) को क्वफ में आमंत्रित किया। … उन्होंने कहा: Q अबुलकसीम, हमारे एक आदमी ने एक महिला के साथ व्यभिचार किया है; इसलिए उन पर फैसला सुनाएँ। ‘ उन्होंने अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) के लिए एक गद्दी रखी जो उस पर बैठ गया और कहा: “टोरा लाओ”। इसे तब लाया गया था। फिर उसने अपने नीचे से गद्दी वापस ले ली और यह कहते हुए तोराह को रख दिया: “मैं तुम पर विश्वास करता था और तुम कौन हो।” :

सुनन अबू दाऊद, किताब 38 सफ़्हा 4434:

तौरात का नबी हज़रत ईसा अल – मसीह (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये तस्दीक़ किया जाना

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने भी तौरात को पूरे दा’वे के साथ तसदीक़ की है जिस के बयानात को हम ने यहाँ देखा -उसकी तरफ़ से एक ता’लीम इस तरह है देखें :

18 मैं तुम से सत्य कहता हूँ कि जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।19 “इसलिये जो इन आदेशों में से किसी छोटे से छोटे को भी तोड़ता है और लोगों को भी वैसा ही करना सिखाता है, वह स्वर्ग के राज्य में कोई महत्व नहीं पायेगा। किन्तु जो उन पर चलता है और दूसरों को उन पर चलने का उपदेश देता है, वह स्वर्ग के राज्य में महान समझा जायेगा।

मत्ती 5:18-19

  चौकन्ना होना : रिवायात तौरात पर कभी हावी नहीं होती

किसी रिवायत का वास्ता देकर हज़रत मूसा के ज़रिये लिखी गई तौरात को ख़ारिज कर देना समझदारी नहीं है।  दरअसल हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) ने अपने ज़माने के मज़हबी रहनुमाओं की बाक़ायदा तौर से नुक्ताचीनी की थी क्यूंकि वह लोग मूसा की शरीयत के साथ अपनी रिवायात का इज़ाफ़ा अपने मतलब के लिए करदेते थे जिसतरह हम यहाँ देखते हैं :

  यीशु ने उत्तर दिया, “अपने रीति-रिवाजों के कारण तुम परमेश्वर के विधि को क्यों तोड़ते हो? क्योंकि परमेश्वर ने तो कहा था ‘तू अपने माता-पिता का आदर कर’ [a] और ‘जो कोई अपने पिता या माता का अपमान करता है, उसे अवश्य मार दिया जाना चाहिये।’ [b] किन्तु तुम कहते हो जो कोई अपने पिता या अपनी माता से कहे, ‘क्योंकि मैं अपना सब कुछ परमेश्वर को अर्पित कर चुका हूँ, इसलिये तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।’ इस तरह उसे अपने माता पिता का आदर करने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार तुम अपने रीति-रिवाजों के कारण परमेशवर के आदेश को नकारते हो। ओ ढोंगियों, तुम्हारे बारे में यशायाह ने ठीक ही भविष्यवाणी की थी। उसने कहा था:

मत्ती 15: 3 – 7

नबी की तंबीह पैग़ाम को रिवायात की खातिर कभी भी बातिल या मनसूख़ करने के लिए कभी नहीं है यह बिलकुल साफ़ है।

मौजूदा तौरात की गवाही बहीरा -ए- मुरदार के तूमार की तसदीक़ करती है

ज़ेल का नक्शा बताता है कि जो सब से क़दीम तौरात के तूमार हैं वह बहीरा -ए- मुरदार के तूमार हैं, जिन की तारीख़ लग भाग 200 क़ब्ल मसीह है – (इस से भी ज़ियादा ज़ेल के नक्शे में यहाँ है। इस का मतलब यह है कि जिस तौरात का हवाला हज़रत मोहम्मद (सल्लम) और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने दिया था वह वही है, जिन का मौजूदा दौर में इस्तेमाल किया जा रहा है ।

The Bible through time

जो कुछ नबियों ने ज़ाहिर किया है उस की तरफ़ वापस लौटते हुए यह सवाल हमारे लिए साफ़ करती है।

तौरात से : नबी इस्माईल (अलैहिस्सलाम) का बयान क्या है ?

हज़रत इस्माईल की ज़िन्दगी में जो भी कुछ हुआ इस कि बाबत बहुत सारी ग़लत फ़हमियां हैं। तौरात को जो कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से 3500 साल पहले लिखा गया थाउन के बारे में सही वाक़िया बताने में हमारी मदद करती है। अल्लाह ने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) कि वह उन को बरकत देगा और उनकी औलाद को समुन्दर के किनारे की रेत की तरह या आसमान के तारों की मानिंद कर देगा (यहाँ देखें)। हज़रत इब्राहीम ने आखिरकार अपनी दो बीवियों से दो बेटे हासिल किये थे।  मगर उन दो बीवियों के दरमियान रक़ाबत के सबब से हाजरा और इस्माईल दोंनों को घर से बाहर होना पड़ा। यह रक़ाबत दो मरहलों से होकर गुज़रा। पहला मरहला था ह्ज़रत इस्माईल के पैदा होने के बाद का था और दूसरा मरहला हज़रत इस्साक़ के पैदा होने से पहले का था। यहां तौरात इस रक़ाबत की बाबत जो कहती है वह यह कि किसतरह अल्लाह ने हाजरा की हिफ़ाज़त की, उस पर ज़ाहिर होकर हज़रत इस्माईल को बरकत दी।

 हैगर और इश्माएल – उत्पत्ति 16

 सारै अब्राम की पत्नी थी। अब्राम और उसके कोई बच्चा नहीं था। सारै के पास एक मिस्र की दासी थी। उसका नाम हाजिरा था। सारै ने अब्राम से कहा, “देखो, यहोवा ने मुझे कोई बच्चा नहीं दिया है। इसलिए मेरी दासी को रख लो। मैं इसके बच्चे को अपना बच्चा ही मान लूँगी।” अब्राम ने अपनी पत्नी का कहना मान लिया।कनान में अब्राम के दस वर्ष रहने के बाद यह बात हुई और सारै ने अपने पति अब्रहमको हजिरा को दे दिया (हाजिरा मिस्री दासी थी।)।

हाजिरा, अब्राम से गर्भवती हुई। जब हाजिरा ने यह देखा तो उसे बहुत गर्व हुआ और यह अनुभव करने लगी कि मैं अपनी मालकिन सारै से अच्छी हूँ। लेकिन सारै ने अब्राम से कहा, “मेरी दासी अब मुझसे घृणा करती है और इसके लिए मैं तुमको दोषी मानती हूँ। मैंने उसको तुमको दिया। वह गर्भवती हुई और तब वह अनुभव करने लगी कि वह मुझसे अच्छी है। मैं चाहती हूँ कि यहोवा सही न्याय करे।”

लेकिन अब्राम ने सारै से कहा, “तुम हाजिरा की मालकिन हो। तुम उसके साथ जो चाहो कर सकती हो।” इसलिए सारै ने अपनी दासी को दाण्ड दिया और उसकी दासी भाग गई।

यहोवा के दूत ने मरुभूमि में पानी के सोते के पास दासी को पाया। यह सोता शूर जाने वाले रास्ते पर था। दूत ने कहा, “हाजिरा, तुम सारै की दासी हो। तुम यहाँ क्यों हो? तुम कहाँ जा रही हो?”

हाजिरा ने कहा, “मैं अपनी मालकिन सारै के यहाँ से भाग रही हूँ।”

यहोवा के दूत ने उससे कहा, “तुम अपनी मालकिन के घर जाओ और उसकी बातें मानो।” 10 यहोवा के दूत ने उससे यह भी कहा, “तुमसे बहुत से लोग उत्पन्न होंगे। ये लो इतने हो जाएंगे कि गिने नहीं जा सकेंगे।”

11 दूत ने और भी कहा,“अभी तुम गर्भवती हो और तुम्हे एक पुत्र होगा। तुम उसका नाम इश्माएल रखना।क्योंकि यहोवा ने तुम्हारे कष्ट को सुना हैऔर वह तुम्हारी मदद करेगा।12 इश्माएल जंगली और आजाद होगा एक जंगली गधे की तरह।
वह सबके विरुद्ध होगा। वह एक स्थान से दूसरे स्थान को जाएगा।वह अपने भाइयों के पास अपना डेरा डालेगाकिन्तु वह उनके विरुद्ध होगा।”

13 तब यहोवा ने हाजिरा से बातें कीं उसने परमेश्वर को जो उससे बातें कर रहा था, एक नए नाम से पुकारा। उसने कहा, “तुम वह ‘यहोवा हो जो मुझे देखता है।’” उसने उसे वह नाम इसलिए दिया क्योंकि उसने अपने—आप से कहा, “मैंने देखा है कि वह मेरे ऊपर नज़र रखता है।” 14 इसलिए उस कुएँ का नाम लहैरोई पड़ा। यह कुआँ कादेश तथा बेरेद के बीच में है।

15 हाजिरा ने अब्राम के पुत्र को जन्म दिया। अब्राम ने पुत्र का नाम इश्माएल रखा। 16 अब्राम उस समय छियासी वर्ष का था जब हाजिरा ने इश्माएल को जन्म दिया।

पैदाइश 16:1-16

हम देखते हैं कि जबकि हाजरा ने खुदावंद से कलाम किया था तो वह एक नाबिय्या साबित हुई। अल्लाह ने हाजरा से कहा कि उसका नाम इस्माईल रखना और उस से वायदा किया कि उसकी औलाद कसरत से होगी। इस तरह इस मुटभेड़ और अल्लाह् के वायदे के साथ वह अपनी बेगम (मालीकिन) के पास वापस गई और यह रक़ाबत दूर हुई।

रक़ाबत बढ़ती जाती है

मगर 14 साल बाद सारै से इसहाक़ पैदा होता है फिर से रकाबत शुरू हो जाती है।  तौरात शरीफ़ समझाती है कि यह किस तरह वाक़े हुआ।

पैदाइश 21: 8-21

अब बच्चा इतना बड़ा हो गया कि माँ का दूध छोड़ वह ठोस भोजन खाना शुरू करे। जिस दिन उसका दूध छुड़वाया गया उस दिन इब्राहीम ने एक बहुत बड़ा भोज रखा। सारा ने हाजिरा के पुत्र को खेलते हुए देखा। (बीते समय में मिस्री दासी हाजिरा ने एक पुत्र को जन्म दिया था। इब्राहीम उस पुत्र का भी पिता था।) 10 इसलिए सारा ने इब्राहीम से कहा, “उस दासी स्त्री तथा उसके पुत्र को यहाँ से भेज दो। जब हम लोग मरेंगे हम लोगों की सभी चीज़ें इसहाक को मिलेंगी। मैं नहीं चाहती कि उसका पुत्र इसहाक के साथ उन चीज़ों में हिस्सा ले।”

11 इन सभी बातों ने इब्राहीम को बहुत दुःखी कर दिया। वह अपने पुत्र इश्माएल के लिए दुःखी था। 12 किन्तु परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, “उस लड़के के बारे में दुःखी मत होओ। उस दासी स्त्री के बारे में भी दुःखी मत होओ। जो सारा चाहती है तुम वही करो। तुम्हारा वंश इसहाक के वंश से चलेगा। 13 लेकिन मैं तुम्हारी दासी के पुत्र को भी अशीर्वाद दूँगा। वह तुम्हारा पुत्र है इसलिए मैं उसके परिवार को भी एक बड़ा राष्ट्र बनाऊँगा।”

14 दूसरे दिन बहुत सवेरे इब्राहीम ने कुछ भोजन और पानी लिया। इब्राहीम ने यह चीज़ें हाजिरा को दें दी। हाजिरा ने वे चीज़ें लीं और बच्चे के साथ वहाँ से चली गई। हाजिरा ने वह स्थान छोड़ा और वह बेर्शेबा की मरुभूमि में भटकने लगी।

15 कुछ समय बाद हाजिरा का सारा पानी स्माप्त हो गया। पीने के लिए कुछ भी पानी न बचा। इसलिए हाजिरा ने अपने बच्चे को एक झाड़ी के नीचे रखा। 16 हाजिरा वहाँ से कुछ दूर गई। तब वह रुकी और बैठ गई। हाजिरा ने सोचा कि उसका पुत्र मर जाएगा क्योंकि वहाँ पानी नहीं था। वह उसे मरता हुआ देखना नहीं चाहती थी। वह वहाँ बैठ गई और रोने लगी।

17 परमेश्वर ने बच्चे का रोना सुना। स्वर्ग से एक दूत हाजिरा के पास आया। उसने पूछा, “हाजिरा, तुम्हें क्या कठिनाई है। परमेश्वर ने वहाँ बच्चे का रोना सुन लिया। 18 जाओ, और बच्चे को संभालो। उसका हाथ पकड़ लो और उसे साथ ले चलो। मैं उसे बहुत से लोगों का पिता बनाऊँगा।”

19 परमेश्वर ने हाजिरा की आँखे इस प्रकार खोलीं कि वह एक पानी का कुआँ देख सकी। इसलिए कुएँ पर हाजिरा गई और उसके थैले को पानी से भर लिया। तब उसने बच्चे को पीने के लिए पानी दिया।

20 बच्चा जब तक बड़ा न हुआ तब तक परमेश्वर उसके साथ रहा। इश्माएल मरुभूमि में रहा और एक शिकारी बन गया। उसने बहुत अच्छा तीर चलाना सीख लिया। 21 उसकी माँ मिस्र से उसके लिए दुल्हन लाई। वे पारान मरुभूमि में रहने लगे।

पैदाइश 21: 8-21

हम देखते हैं कि सारह (अब सारै का नाम बदलकर सारह रख दिया था) उसी घराने में हाजरा के साथ नहीं रह सकती थी। सो उस ने हज़रत इब्राहीम से मांग की कि हाजरा और उसके बेटे को घर से बाहर भेज दिया जाए। हालाँकि हज़रत इब्राहीम ना रज़ामंद थे मगर क्यूंकि अल्लाह ने हाजरा और इस्माईल को बरकत देने का वायदा किया था।  इस बार हक़ीक़त में अल्लाह ने दुबारा उस से बात की।  और जब उस के पास पानी ख़तम हो गया था और रेगस्तान में जब कहीं भी पानी नहीं मिल सकता था तो अल्लाह ने हाजरा की आँखें खोलीं जिस से उसने पानी देखा।  और उससे वायदा किया कि हज़रत इस्माईल से भी एक बहुत ‘बड़ी क़ौम’ बनेगी।

तौरात लगातार बयान करती जाती है कि किसतरह यह कौम आगे तरक़क़ी करती गई।  जब इब्राहीम (अलै.) की मौत होती है उस दौरान हम हज़रत इस्माईल के बारे में पढ़ते हैं।

इब्राहिम उत्पत्ति 25: 8-18 की मृत्यु

इब्राहीम धीरे—धीरे कमज़ोर पड़ता गया और भरे—पूरे जीवन के बाद चल बसा। उसने लम्बा भरपूर जीवन बिताया और फिर वह अपने पुरखों के साथ दफनाया गया। उसके पुत्र इसहाक और इश्माएल ने उसे मकपेला की गुफा में दफनाया। यह गुफा सोहर के पुत्र एप्रोन के खेत में है। यह मम्रे के पूर्व में थी। 10 यह वही गुफा है जिसे इब्राहीम ने हित्ती लोगों से खरीदा था। इब्राहीम को उसकी पत्नी सारा के साथ दफनाया गया। 11 इब्राहीम के मरने के बाद परमेश्वर ने इसहाक पर कृपा की और इसहाक लहैरोई में रहता रहा।

12 इश्माएल के परिवार की यह सूची है। इश्माएल इब्राहीम और हाजिरा का पुत्र था। (हाजिरा सारा की मिस्री दासी थी।) 13 इश्माएल के पुत्रों के ये नाम हैं पहला पुत्र नबायोत था, तब केदार पैदा हुआ, तब अदबेल, मिबसाम, 14 मिश्मा, दूमा, मस्सा, 15 हदर, तेमा, यतूर, नापीश और केदमा हुए। 16 ये इश्माएल के पुत्रों के नाम थे। हर एक पुत्र के अपने पड़ाव थे जो छोटे नगर में बदल गए। ये बारह पुत्र अपने लोगों के साथ बारह राजकुमारों के समान थे। 17 इश्माएल एक सौ सैंतीस वर्ष जीवित रहा। 18 इश्माएल के लोग हवीला से लेकर शूर के पास मिस्र की सीमा और उससे भी आगे अश्शूर के किनारे तक, घूमते रहे और अपने भाईयों और उनसे सम्बन्धित देशों में आक्रमण करते रहे। [b]

पैदाइश 25:8-18

दर हक़ीक़त इस्माईल की उम्ररदराज़ी हुई और यह भी कि हज़रत इस्माईल और हज़रत इस्हाक़ दोनों के 12 ,12 क़बीलों के सरदार हुए।  हज़रत इस्माईल के लिए जिसतरह अल्लांह ने वायदा किया था उसको बहुत बरकत दी।  आज  जितने भी अरब के लोग पाए जाते हैं वह सब उनके बाप दादा हज़रत इस्माईल और हज़रत इब्राहीम की औलाद यानि उन्ही की नसल से हैं।                    

हज़रत मूसा की निशानी : फ़सह

500 सालों के लग भाग जो अब गुज़र गया है जब से कि हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) जो 1500 क़ब्ल मसीह के लगभग थे।  हज़रत इब्राहीम के मरने के बाद के उन के बेटे हज़रत इस्हाक़ की औलाद आज इस्राईल कहलाते हैं।  अब उन्की तादाद बहुत ज़ियादा है। मगर एक ज़माना था कि वह मिसर में फ़िरोन  के गुलाम हो चुके थे। यह इसलिए हुआ कि हज़रत यूसुफ़ जो हज़रत इब्राहीम के पर पोते थे उनको मिसर में गुलाम बतोर बेच दिया गया था।  इस के कई सालों बाद उनकी शादी हुई और उन का ख़ानदान मिसर में बूदो बाश करने लगा -इन सारी वाक़ियात को पैदाइश 45-46 बाब में समझाया गया है जो हज़रत मूसा की किताब तौरात की पहली किताब है।

सो अब हम एक और बड़े नबी हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बड़ी निशानी में आ गए हैं जिन की बाबत तौरात की दूसरी किताब में ज़िकर पाया जाता है।  हज़रत मूसा को ख़ुदा की तरफ़ से हुक्म दिया गया था कि वह जाकर मिसर के बादशाह फ़िरोन से मुलाक़ात करे। हज़रत मूसा हुक्म मानकर फ़िरोन के पास गए जिस का अंजाम यह हुआ कि हज़रत मूसा और फ़िरोन के जादूगरों से मुडभेड़ हो गई। इस मुडभेड़ के चलते फ़िरोन और उस का खानदान और दीगर मिसरी लोग जो फ़िरोन की पैरवी करते थे उन के ख़िलाफ़ 9 वाबाएं नाज़िल हुईं जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के लिए निशानी बतोर थीं। मगर इन सब के बावजूद भी फ़िरोन ख़ुदा पर ईमान नहीं लाया और उन निशानियों को नज़र अंदाज़ करके ख़ुदा की न फ़रमानी की।

सूरा अन नाज़िआत (सूरा 79 – वह लोग जो आगे घसीटे गए) इन वाक़ियात को इस तरह से बयान किया गया है

(ऐ रसूल) क्या तुम्हारे पास मूसा का किस्सा भी पहुँचा हैजब उनको परवरदिगार ने तूवा के मैदान में पुकाराकि फिरऔन के पास जाओ वह सरकश हो गया है(और उससे) कहो कि क्या तेरी ख्वाहिश है कि (कुफ्र से) पाक हो जाएऔर मैं तुझे तेरे परवरदिगार की राह बता दूँ तो तुझको ख़ौफ (पैदा) होग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया e

सूरा  अन नाज़ीआत  79:15-20

सूरा अल मुज़म्मिल (सूरा 73 – जिन्हें छिपा लिया गया या ढांक लिया गया) यह फ़िरों के जवाब का ज़िकर करता है:

 तो फिरऔन ने उस रसूल की नाफ़रमानी की तो हमने भी (उसकी सज़ा में) उसको बहुत सख्त पकड़ा

सुरह  अलमुज़म्मिल 73:16

हज़रत मूसा की बड़ी निशानी क्या थी जो सूरा अन नाज़ियात में बयान किया गया है? और सूरा अल मुज़म्मिल में फ़िरोन के लिए बड़ी सज़ा क्या थी?निशानी और सज़ा इन दोनों की बाबत दसवें वबा में बताया गया है।

दसवीं वबा

सो अल्लाह दसवें वबा को लेन वाला था जो बहुत ही इन्तहा दर्जे का ख़ौफ़नाक वबा (आफ़त) थी। भारी मुसीबत (दसवीं वबा के आने से पहले कुछ तैयारियों और तशरीह की बाबत तौरात हमें समझाती है और कुरान शरीफ़ की ज़ेल की  आयत भी इस मुद्दे पर बयान पेश करता है।

और हमने यक़ीनन मूसा को खुले हुए नौ मौजिज़े अता किए तो (ऐ रसूल) बनी इसराईल से (यही) पूछ देखो कि जब मूसा उनके पास आए तो फिरऔन ने उनसे कहा कि ऐ मूसा मै तो समझता हूँ कि किसी ने तुम पर जादू करके दीवाना बना दिया हैमूसा ने कहा तुम ये ज़रुर जानते हो कि ये मौजिज़े सारे आसमान व ज़मीन के परवरदिगार ने नाज़िल किए (और वह भी लोगों की) सूझ बूझ की बातें हैं और ऐ फिरऔन मै तो ख्याल करता हूँ कि तुम पर यामत आई है(सूरा  बनी इस्राईल

रात का सफ़र  17:101-102

सो फ़िरों के सल्तनत की तबाही और बर्बादी हुई। मगर सवाल यह है कि इस तबाही और बर्बादी के पीछे कौन था?क्या वाक़िया पेश आया था? आप देखें कि उस के आधे सल्तनत की तबाही उन नौ वाबाओं के ज़रिये फ़रक फ़रक तरीकों से हो चुकी थी। शायद आपको याद होगा कि नूह के ज़माने के लोग आलमगीर दर्जे पर उस बड़े सैलाब में डूब कर मर गए थे, तबाह हो गए थे।  और अगर आप हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की बात करें तो उन की बीवी ख़ुदा के हुक्म की नाफ़रमानी की वजह से नमक का खम्बा बन गई थी। मगर यह तबाही नूह के ज़माने के लोगों की तबाही से फ़रक थी क्यूंकि यह बनी इस्राईल के तमाम लोगों के लिए निशानी थी – एक बड़ी निशानी जिसतरह कुरान शरीफ़ कहता है

 ग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया

सूरा 79:20

दसवीं वबा की तशरीहात को आप तौरात की दूसरी किताब ख़ुरूज में पढ़ सकते हैं जिस को यहाँ पर जोड़ा गया है -यह एक मुकम्मल बयान है जिस से ज़ेल के मज़ामीं को समझने के लिए बहतर तशरीह हासिल होगी –

फ़सह का बर्रा मरने से बचाता है

यह ख़ुदा का कलाम हमको बताता है कि जो तबाही (दसवां वबा) बतोर था वह जो अल्लाह के ज़रिये नाज़िल हुआ थावह यह था कि उस आख़री रात को तमाम पह्लोठों को मार दिया जाना था सिवाए उन घरों के जहां पर एक बर्रा ज़ुबह करके उसके खून को घर की चौखट पर लगा दिया गया था। यह सारे घर बनी इस्राएल के घर थे जिन्हों ने ख़ुदा के हुक्म की फ़रमानबरदारी की थी। मगर इस में फ़िरोन का घराना शामिल नहीं था।  न ही उसके उमरा और उसके हाकिम लोग थे।  इन सब के घराने में पह्लोठे बच्चों की मौत हुई जो आगे चलकर ताजो तख़्त के और ऊंचे ओहदों के वारिस थे अगर फ़िरोन ख़ुदा पर ईमान लाकर मूसा की बात पर अमल करता तो क्या उस के बच्चे मरते? मगर ऐसा नहीं हुआ। मिस्रियों का का सारा घराना अपने पह्लोठे बच्चों को मरने से रोक न सके – जब उन्हों ने हज़रत मूसा की बात नहीं मानी, बर्रे की क़ुर्बानी नहीं की, उस का खून दरवाज़े के चौखट पर पर नहीं लगाया तो उन सब ने एक आलमगीर वबा का सामना किया । मगर जिन के घरों में एक बर्रा कुर्बान हुआ था और उस का खून दरवाज़े के चौखट पर लगाया गया था, उन में से हर एक के लिए वायदा था कि उन के पह्लोठे यहाँ तक कि उन का पूरा ख़ानदान तबाह होने से बच जाएगा। अल्लाह का इंसाफ़ उन के घरों से होकर गुजरेगा और वह महफूज़ रहेंगे -सो उस दिन उस निशानी को ही फ़सह कहा गया है (जबकि मौत उन तमाम घरों से होकर गुज़री जिन के घरों पर बर्रे के खून के निशान थे)। मगर दरवाजों पर यह जो खून का निशान था वह किस लिए था? तौरात हमें बताती है :

और खुदावंद ने मूसा से कहा ….” …और जिन घरों में तुम हो उन पर वह फ़सह के बर्रे का खून तुम्हारी तरफ़   से निशान ठहरेगा और मैं उस खून को देखकर तुमको छोड़ता जाऊंगा – और जब मैं मिस्रियों को मारूंगा तो वह वबा तुम्हारे पास फटकने की भी नहीं कि तुमको हलाक करे”  

ख़ुरूज 12:13

सो हालांकि ख़ुदा दरवाज़े पर लगे उस खून को देख रहा था और जब उस ने उस खून को देखा तो उस ने यह नहीं कहा  कि यह उस के लिए निशाँ था बल्कि उस ने कहा कि वह खून ‘तुम्हारी तरफ़ से निशान’ ठहरेगा – यानी बनी इस्राईल की तरफ़ से उस हरेक शख्स के लिए जो तौरात में इस बयान को पढ़ता है। तो फिर यह निशान हमारे लिए किसतरह है? उस खुश क़िस्मती की रात के बाद खुदावंद ने उन पर हुक्म जारी किया, वह क्या हुक्म था इस को पढ़ें :

27 तो तुम लोग कहोगे, ‘यह फसह पर्व यहोवा की भक्ति के लिए है। क्यों? क्योंकि जब हम लोग मिस्र में थे तब यहोवा इस्राएल के घरों से होकर गुजरा था। यहोवा ने मिस्रियों को मार डाला, किन्तु उसने हम लोगों के घरों में लोगों को बचाया।’

ख़ुरूज 12:27

फ़सह के दिन से यहूदी केलेन्डर का आग़ाज़ होता है

सो तमाम बनी इस्राईल को हुक्म दिया जाता है कि हर साल उसी दिन फ़सह मनाया करें। इस्राईली केलेन्डर मग़रिबी केलेन्डर से थोड़ा फ़रक़ है। सो अगर आप मग़रिबी केलेन्डर के पीछे चलते हैं तो हर साल दिन का हल्का सा फ़रक़हो जाता है – यह बिलकुल वैसे ही है जैसे रमज़ान का महीना और ईद में हर साल दिन का फ़रक़ हो जाता है क्यूंकि यह दोनों केलेन्डर चाँद के हिसाब से चलते हैं।  मगर आज के दिन तक 3500 साल के बाद भी यहूदी लोग हर साल इस वाक़िये की याद में फ़सह की ईद मनाते आ रहे हैं। हज़रत मूसा का वह वाक़िया जिस में खुदावंद ने तौरात शरीफ़ में हुक्म दिया था उसकी ताबेदारी में यहूदी लोग इसे मनाते हैं।   

  1. मौजूदा दिनों का नज़ारा जब कई एक बर्रे आने वाले यहूदियों की

फ़सह के जश्न के लिए ज़बह किये जाते हैं –

यहाँ यहूदी लोगों के मौजूदा ज़माने की तस्वीर है जिस में फ़सह की ईद की तैयारी में कई एक बर्रों की क़ुरबानी दी जा रही है।  यह ईद का जश्न मनाने की तरह ही है तारीख़ के ज़रिये इस जश्न को मानते हुए हम बिलकुल खिलाफ़ मामूल तोर से एक बात नोट कर सकते हैं।  आप इंजील शरीफ़ में नबी हज़रत ईसा अल मसीह की गिरफ़्तारी और मुक़द्दमे की तफ़सीलात के बयान पर गौर कर सकते हैं।  

“फिर यहूदियों के सरदार येसू को कैफ़ा के पास से क़िले को ले गए और सुबह का वक़्त था और वह खुद किले में न गए ताकि ना पाक न हों बल्कि फ़सह खा सकें “……”मगर तुम्हारा दस्तूर है कि मैं फ़साह के मौके पर तुम्हारी खातिर एक आदमी को छोड़ दिया करता हूँ – पस तुमको क्या मंज़ूर है कि मैं तुम्हारी खातिर यहूदियों के बादशाह (येसू ) को छोड़ दूँ? उन्हों ने चिल्लाकर फिर कहा कि उस को नहीं बराब्बा को -और बराब्बा एक डाकू था “

युहन्ना 18:28, 39-40

दूसरे अलफ़ाज़ में,हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) गिरफ़तार हुए थे और यहूदी केलेन्डर के मुताबिक फ़सह के दिन ही येसू को मस्लूबियत के लिए ले जाया गया था। अगर आप को हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की तीसरी निशानी की बाबत याद है तो हज़रत यहया ने हज़रत ईसा अल मसीह को जो लक़ब दिया था वह था वह था :

 29 अगले दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी तरफ आते देखा और कहा, “परमेश्वर के मेमने को देखो जो जगत के पाप को हर ले जाता है। 30 यह वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, ‘एक पुरुष मेरे पीछे आने वाला है जो मुझसे महान है, मुझसे आगे है क्योंकि वह मुझसे पहले विद्यमान था।’

युहन्ना 1 : 29 -30

ईसा (अलैहिस्सलाम) फ़सह के दिन सज़ा याफ़ता हुए

यहाँ हम इस निशानी की बे मिसाली को देखते हैं।  ईसा (अलैहिस्सलाम) ख़ुदा का बर्रा इसी फ़सह के दिन मस्लूब (क़ुर्बान) होने के लिए दुनिया में भेजा गया था जिन दिनों में  यहूदी लोग (मग़रिबी केलेन्डर के मुताबिक़ 33 ईस्वी में रहते थे) जिस दिन 1500 साल पहले फ़सह की यादगारी में ईद मना रहे थे।  इसी लिए यहूदियों के फ़सह का जश्न आम तोर से हर साल ईस्टर के हफ़ते में पड़ता है – ईसा अल मसीह के गुज़रने की याददाश्त बतोर – क्यूंकि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम इसी मुक़र्ररा दिन में कुर्बान होने के लिए भेजे गए थे।  (ईस्टर और फ़सह का एक जैसा तारीख़ नहीं है क्यूंकि यहूदी और मग़रिबी केलेन्डर के साल को फ़रक़ फ़रक़ तरीक़े से मुवाफ़िक़ बना कर पूरा किया जाता है।  मगर आम तोर से यह दोनों उसी हफ़्ते में पास्ता है )

अब आप एक मिनिट के लिए सोचें कि “निशानी” क्या क रत्ते हैं -आप एक ही निशानियों को ज़ेल में देख सकते हैं जब हम खोपड़ी और हड्डियों के निशाँ को देखते हैं तो हम मौत और खतरे कि बाबत सोचते हैं।  सुनहरे तीर की ‘निशानी’  देखते हैं तो हम यह मान कर चलते हैं कि हम मैक डोनल्स कि बाबत सोच रहे हैं। निशानियाँ क्या करते हैं? वह हमारे दमागों में इशारा करने वाले होते हैं ताकि किसी चीज़ की तरफ़ देख कर हम सोच सकें।                                                

यह निशान टेनिस के खिलाड़ी नाडल बनडाना कि नाइक के लिए है।  नाइक चाहता है कि हम नाडल पर इस निशानी को देखें। दूसरे लफ़्ज़ों में निशानियाँ हमारे दमाग़ को इशारा करने वाले होते हैं कि हम अपनी समझ को ख्वाहिश की हुई चीज़ की तरफ़ देखने के लिए तवज्जोह करें। इसी तरह हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की निशानी भी है।  यह अल्लाह ही है जिस ने यह निशान हमारे लिए दिया है।  उस ने यह निशान क्यूँ दिया? खैर यह निशानी काबिले मुलाहज़ा बर्रों के औक़ात के साथ है जो एक ही दिन में क़ुर्बान हुए थे उसी तरह ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) क़ुर्बानी के लिए एक इशारा करने वाला बतोर होना चाहिए।

यह हमारे दमागों में काम करता है जिस तरह मैं ने नक्शे में दिखाया है।  निशानी वहां पर मजूद थी कि ईसा अल मसीह के दिए जाने की तरफ़ हमको इशारा करे। उस पहले फ़साह में बर्रे क़ुर्बान किये जाते थे और खून निथारे जाते थे और फैलाए जाते थे कि लोग ज़िन्दा रह सकें। और इस तरह यह निशानी हज़रत ईसा की तरफ़ इशारा करते हुए हम से कहता है कि यह वही ख़ुदा का बर्रा है जो मौत के हवाला किया गया ताकि हम ज़िन्दगी हासिल कर सकें।

हज़रत इब्राहिम की तीसरी निशानी में हमने देखा था कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का इम्तिहान मोरियाह के पहाड़ पर अपने बेटे की क़ुरबानी से हुआ। मगर आख़री लम्हे में हमने देखा था कि उसके बेटे के बदले में एक मेंढा कुर्बान किया गया। एक मेंढा मारा ताकि हज़रत इब्राहीम का बेटा ज़िन्दा रह सके। मोरिया का पहाड़ बिलकुल वही जगह थी जहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को क़ुर्बानी के वास्ते दिया गया था – वह एक निशानी थी हमारे सोचने के लिए कि हज़रत ईसा अल मसीह क़ुर्बानी के लिए उसी मक़ाम  का इशारा करने के ज़रिये दिए जा रहे हैं। यहाँ इस मूसा की निशानी में उसी वाक़िये के लिए एक और इशारा करने वाले को पाते हैं – हज़रत ईसा अल मसीह का क़ुर्बानी के लिए दिया जाना – फ़सह की क़ुर्बानी की बाबत केलेन्डर के उस दिन की तरफ़ इशारा करने के ज़रिये इसी वाक़िये की तरफ़ इशारा करने के लिए एक बर्रे की क़ुर्बानी को एक बार फिर इस्तेमाल किया गया – क्यूँ? हम हज़रत मूसा की अगली निशानी के साथ बयान को जारी रखेंगे ताकि आगे की मालूमात हासिल कर सकें। यह निशानी है सीना पहाड़ पर शरीअत का दिया जाना।

मगर इस कहानी को ख़तम करने के लिए कि फ़िरोन का क्या हाल हुआ? जिसतरह हम ने तौरात की इबारत में से   पढ़ा उस ने उस तंबीह की परवाह नहीं की जो हज़रत मूसा ने उसे साफ़ लफ़्ज़ों में बताया था न ही अपने पह्लोठे बेटे का ख़याल किया जो उस का वारिस था और उस रात मारा गया था -तब उस ने बनी इस्राईल को मिसर छोड़ने की इजाज़त दी थी। मगर कुछ घंटों बाद उस ने अपना इरादा बदल दिया था और उस ने बहरे क़ुल्ज़ुम तक बनी इस्राईल का पीछा किया। वहां खुदावंद ने बनी इस्राईल को बहरे क़ुल्ज़ुम को पार करने का रास्ता तैयार किया। मगर फ़िरोन और उसका सारा लश्कर उसी दरया में डूब कर मर गए – 9 वबाओं के बाद फ़साह की मौतें (पह्लोठों का मारा जाना) और लश्कर का नुक़सान यह सब मिलकर मुल्क -ए- मिसर में फ़िरोन कि सल्तनत को ऐसा कमज़ोर किया कि अपने उस पहले दर्जे को फिर से हासिल नहीं कर पाया जिसतरह कि वह दुनया सब से ज़ियादा ताक़तवर फ़ौजी बेड़ा माना जाता था।  अल्लाह ने मुल्क -ए- मिसर का इंसाफ़ किया।

इब्राहीम का निशान 3 : क़ुरबानी

पिछली निशानी में बड़े पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को एक बेटे का वायदा किया गया था। और अल्लाह ने अपने वायदे को क़ाइम रखा। दरअसल तौरात इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के इस  कैफ़ियत को जारी रखती है यह बयान करने के लिए कि किसतरह उसके दो बेटे हुए थे। पैदाइश का 16 बाब बताता है कि किसतरह उसने हाजरा से अपने बेटे इस्माईल को पाया और फिर उसके बाद पैदाइश का 21 बाब बताता है कि किसतरह उसने सारा से 14 साल बाद अपने बेटे इस्हाक़ को पाया। बदक़िस्मती से उसके घराने के लिए यह बात उन दो औरतों, हाजरा और सारा के दरमियान एक बड़े रक़ाबत का अंजाम ज़ाहिर हुआ कि इब्राहीम को मजबूरन हाजरा और उसके बेटे को घर से बाहर भेजना पड़ा।  यह कैसे हुआ इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं और मालूम कर सकते हैं कि किसतरह अल्लाह ने दुसरे तरीक़े से हाजरा और इस्माईल को बरकत दी।          

पैग़म्बर इब्राहीम की क़ुरबानी : ईद -उल- अज़हा के लिए बुनियाद

इसतरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के घराने में एक ही बेटा रह गया था कि उसका सब से बड़ा इम्तिहान से मुक़ाबला हो मगर यह एक ही ज़रीया है जो हमारे लिए सीधे रास्ते की एक बड़ी समझ का रासता खोलता है। आप इस बयान को जो उस के बेटे की क़ुर्बानी की इम्तिहान की बाबत है तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में यहाँ पढ़ सकते हैं। इन किताबों की कहानी के सबब से ही ईद -उल- अज़हा मनाई जाती है – मगर यह सिर्फ़ एक तारीक़ी वाक़िया नहीं है। बल्कि यह इस से भी ज़ियादा है।

किताबों के बयान से हम देख सकते हैं कि यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए एक इम्तिहान है मगर यह इस से भी ज़ियादा कुछ और है। जबकि इब्राहीम (अलै.) एक पैग़म्बर हैं तो यह इम्तिहान भी हमारे लिए एक निशानी है ताकि हमारे लिए ख़ुदा की परवाह की बाबत हम और ज़ियादा सीख सकें -किस तरीक़े से यह एक निशानी है? बराए मेहरबानी उस जगह पर धियान दें जिसे इब्राहीम ने नाम दिया था जहाँ कि उसके बेटे को कुर्बान होना था।  तौरात के उस हिस्से को यहां बताया गया है ताकि आप उसे बराहे रास्त पढ़ सकें।

 13 इब्राहीम ने ऊपर दृष्टि की और एक मेढ़े को देखा। मेढ़े के सींग एक झाड़ी में फँस गए थे। इसलिए इब्राहीम वहाँ गया, उसे पकड़ा और उसे मार डाला। इब्राहीम ने मेढ़े को अपने पुत्र के स्थान पर बलि चढ़ाया। इब्राहीम का पुत्र बच गया। 14 इसलिए इब्राहीम ने उस जगह का नाम “यहोवा यिरे” [a] रखा। आज भी लोग कहते हैं, “इस पहाड़ पर यहोवा को देखा जा सकता है।”

पैदाइश 22:13-14

उस नाम पर धियान दें जो इब्राहीम (तौरात में “अब्रहाम”है) ने उस जगह के लिए दी।  उसने नाम दिया “खुदावंद मुहैया करेगा।”  क्या यह नाम माज़ी में है, हाल में या मुस्तक़बिल में? यह साफ़ ज़ाहिर है कि यह ज़माना -ए-मुस्तक़बिल में है। यहां तक कि इसकी शरह ज़ियादा साफ़ तब होजाता है जब आगे चलकर यह यकीन होजाता है कि (इसे मूसा (अलैहिस्सलाम) ने ठीक 500 साल बाद तौरात में इस बयान का ज़िकर किया) इस मुहावरे को दोबारा देखें “…. यह मुहैया किया जाएगा ” फिर से देखें कि यह ज़माना -ए- मुस्तक़बिल में है और मुस्तक़बिल की तरफ़ देखा जा रहा है।  बहुत से लोग सोचते हैं कि इब्राहीम उस मेंढे (एक नर भेड़) का हवाला दे रहा था जिस के सींग झाड़ी में अटके हुए थे और उस ने उस को पकड़ कर अपने बेटे के बदल में कुर्बान किया -मगर आप देखें कि इब्राहीम जब इस जगह का नाम रखता है तो उस से पहले ही मेंढा कुर्बान हो चुका था, मर चुका था, और जला दिया गया था -अगर इब्राहीम उस मेंढे की बाबत सोचता – जो पहले ही से मर चुका था , कुर्बान हो चुका था और जला दिया गया था। तो उस को नाम देना चाहिए था ‘खुदावंद ने मुहैया किया है ‘, मतलब यह कि माजी के ज़माने में -और मूसा (अलैहिस्सलाम) अगर वह मेंढे की बाबत सोचते जो इब्राहीम के बेटे की जगह ली थी, उसको भी तौरात में इस तरह ज़िकर करना चाहिए था, ”चुनांचि आज के दिन तक यह कहावत है कि ख़ुदावंद के पहाड़ पर मुहैया किया गया था।”’मगर इब्राहीम और मूसा दोनों ही इस नाम को ज़माना -ए- मुस्तक़बिल में पेश करते हैं।  इस लिए वह दोनों उस मरे हुए और कुर्बान किये हुए मेंढे की बाबत नहीं सोच रहे थे।

तो फिर वह किसकी बाबत सोच रहे थे? अगर हम एक सुराग़ पर गौर करते हैं तो हम देखते हैं कि इस निशानी के  के आग़ाज़ में अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम को जिस जगह पर जाने के लिए फ़रमाया था इसे हम 22 बाब की 2 आयत पाते हैं, जहां इसतरह लिखा है :

 “तब ख़ुदा ने अब्रहाम से कहा तू अपने बेटे इस्हाक़ को जो तेरा एकलोता है और जिसे तू प्यार करता हैसाथ लेकर मोरियाह के मुल्क में जा और वहां उसे पहाड़ों में से एक पहाड़ जो मैं तुझे बताऊंगा सोख्तानीकुर्ब्क्नी के तोर पर चढ़ा“

यह वाक़िया ‘मोरियाह’ के पहाड़ों में से एक पहाड़ पर हुई।  और वह कहां पर है? हालाँकि हज़रत इब्राहिम के ज़माने  (2000 क़बल मसीह) में वह एक बयाबान का इलाक़ा था मगर 1000 साल बाद (1000 क़बल मसीह) में मशहूर दाऊद बादशाह ने वहां पर येरूशलेम शहर को बसाया और उस के बेटे सुलेमान ने खुदावंद के लिए एक अज़ीमुश्शान मक्दिस (हैकल–ए-सुलेमानी) ता’मीर की – इसकी बाबत हम ज़बूर में पढ़ते हैं :

सुलैमान ने यहोवा का मन्दिर मोरिय्याह पर्वत पर यरूशलेम में बनाना आरम्भ किया। पर्वत मोरिय्याह वह स्थान है जहाँ यहोवा ने सुलैमान के पिता दाऊद को दर्शन दिया था। सुलैमान ने उसी स्थान पर मन्दिर बनाया जिसे दाऊद तैयार कर चुका था। यह स्थान उस खलिहान में था जो ओर्नान का था। ओर्नान यबूसी लोगों में से एक था।

2 तवारीख़ 3:1

दुसरे लफ़्ज़ों में मोरियाह का पहाड़ हज़रत इब्राहीम के ज़माने में (और बाद में हज़रत मूसा के ज़माने में) एक तनहा उंचाई पर बसा हुआ पहाड़ों से ढका हुआ बयाबान में वाक़े था। मगर 1000 साल बाद हज़रत दाऊद और सुलेमान के ज़माने में जब उनहोंने एक अज़ीमुश्शान हैकल (इबादत का घर) तामीर किया तो वह इस्राईल का मरकज़ी दारुल खिलाफ़ा बन गया- अब वह मौजूदा ज़माने में यहूदियों की मुक़द्दस इबादतगाह मानी जाती है।              

मोरियाह का पहाड़ ख़ुदावंद की तरफ़ से चुना गया था हज़रत इब्ररहीम की तरफ़ से नहीं। जिस तरह कुरान शरीफ़ के सूरा अल-जिन्ना (72) में हमें समझाया गया है :

और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न

करना(सूरा अल -जिन्ना 72 :18

जहाँ इस तरह लिखा है “इबादत के मक़ामात ख़ुदा की तरफ़ से चुने जाते हैं“ हम मा’लूम करेंगे कि इस मक़ाम को क्यूँ खुदा की तरफ़ से चुना गया था?

ईसा अल मसीह और मोरियाह पहाड़ पर उनकी क़ुर्बानी

और थां हम ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) और इंजील-ए- शरीफ़ से बराहे रास्त ताल्लुक़ को पाते हैं -हम इस ताल्लुक़ को उस वक़्त देखते हैं जब हम ईसा अल मसीह के कई एक अलक़ाब में से एक लक़ब को जानते हैं – ईसा अल मसीह को कई एक लक़ब से नवाज़ा गया था – शायद जो जाना पहचाना लक़ब था वह था “मसीह”- जिसे (मसीहा) भी कहा जाता है। मगर एक और दूसरा लक़ब भी है जो उसे दिया गया था – यह इतना जाना पहचाना नहीं है मगर यह बहुत ही अहम् है। इसको हम युहन्ना की इंजील में देखते हैं जिस में यहया नबी जिन्हें इंजील में युहन्ना इसतिबाग़ी कहा गया है कहते हैं :

29 अगले दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी तरफ आते देखा और कहा, “परमेश्वर के मेमने को देखो जो जगत के पाप को हर ले जाता है। 30 यह वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, ‘एक पुरुष मेरे पीछे आने वाला है जो मुझसे महान है, मुझसे आगे है क्योंकि वह मुझसे पहले विद्यमान था।

युहन्ना 1:29 -30

एक अहम्, मगर ईसा के लक़ब (अलैहिस्सलाम) में से कम जाना पहचाना जो उसे दिया गया था वह है ख़ुदा का बर्रा“अब हज़रत ईसा की ज़िन्दगी के आखरी दौर को देखें।  उन्हें कहां गिरफ्तार किया गया था और कहां पर उन्हें सलीबी मौत कि सज़ा सुनाई गई थी ? यह सब कुछ येरूशलेम में हुआ था।  और जहाँ सलीब दी गई थी वह ‘मोरयाह  का पहाड़’ ही था जिसे हम ने पिछले वाकिये में देखा था -उस की गिरफ़्तारी के वक्त इंजील में इस तरह कहा गया है :

 फिर जब उसको यह पता चला कि वह हेरोदेस के अधिकार क्षेत्र के अधीन है तो उसने उसे हेरोदेस के पास भेज दिया जो उन दिनों यरूशलेम में ही था।

लूका 23:7

दुसरे लफ़्ज़ों में कहा जाए तो हज़रत ईसा का गिरफ्तार होना, मुक़द्दमा और सलीबी मौत कि सज़ा का सुनाया जाना सब कुछ येरूशलेम में (= मोरयाह पहाड़) में वाक़े हुआ।

हज़रत इब्राहीम की तरफ़ चलें।  क्यूँ उसने उस जगह का नाम मुस्तक़बिल के ज़माने का रखा “खुदावंद मुहैया करेगा”? क्यूंकि वह एक नबी था और वह जानता था कि वहां पर कुछ न कुछ “मुहय्या” किया जाएगा और नाटकीय मंज़र में हज़रत इब्राहिम का बेटा आखरी वक़्त में बचा लिया जाता है, क्यूंकि एक मेंढा उस कि जगह पर मरता है। उसके ठीक 2000 साल बाद ईसा अल मसीह को ख़ुदा का बर्रा कहा जाता है – और उसी जगह पर उसकी गिरफ़्तारी होती है , और उसकी मौत की सज़ा सुनाई जाती है!

येरुस्शालेम में वाक़िआत की वक़्त की लकीर / मौरयाह पहाड़

   क़ुर्बानी ने इब्राहिम का मौत से  फ़िदया  दिया

क्या यह हमारे लिए ज़रूरी है।  मैं नोट करता हूँ कि किसतरह यह इब्राहिम की निशानी ख़त्म होती है। 37 सूरा का 107 आयत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बारे में कहता है कि :

  और हम ने एक निहायत अहम् क़ुरबानी के साथ फिदया दिया

लूका 23:7

“फ़िदया” देने का क्या मतलब है? एक फ़िदयादेने का मतलब है क़ीमत अदा करना किसी ऐसे शख्स के लिए जो क़ैद में है ताकि उस को क़ैद से छुटकारा मिल सके। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए फ़िदया दिए जाने मतलब है कि वह किसी तरह के क़ैद में था (जी हाँ यहाँ तक कि एक बड़ा नबी होने के बावजूद भी)! वह किस तरह कि क़ैद में था? यह उसके बेटे के साथ का मंज़र हमें दिखाता है- वह मौत का एक कैदी था -हालाँकि वह एक नबी था -फिर भी मौत ने उसको एक कैदी की तरह जकड़ रखा था। आदम की निशानी में हम ने देखा था कि अल्लाह ने आदम और उसकी औलाद को गुनाह के अंजाम बतोर (हरेक को — जिसमें नबी लोग भी शामिल थे) फ़ना पिज़ीर कर दिया था। अब वह सब के सब गुनाह के क़ैद में थे। मगर किसी तरह बर्रे की क़ुरबानी के इस ड्रामे में हज़रत इब्राहीम के लिए यह ‘फ़िदया’ साबित हुआ -अगर आप दोबारा से इन सिसिले वार निशानियों पर गौर करेंगे तो (आदम, क़ाईन और हाबील, नूह अब यहां इब्राहीम – इन सब की जिंदगियों में आप देखें कि यह लोग जानवर की क़ुरबानी से किस तरह जुड़े हुए हैं।  इस का मतलब यह है कि वह इस की बाबत कुछ न कुछ जानते थे कि यह उन को बचाएगा -और हम इब्राहीम के मामले में देख सकते हैं कि उस का यह अमल भी मुस्तक़बिल में हज़रत ईसा के ख़ुदा का बर्रा होने की तरफ़ इशारा करता है जो कि इब्राहीम से भी ताल्लुक़ रखता है।

क़ुरबानी : हमारे लिए बरकत का बाइस है

मौरयाह के पहाड़ पर मेंढे की क़ुरबानी हमारे लिए भी बहुत ज़ियादा अहमियत रखती है।  जब अदला बदली हुई तो उस वक़्त अल्लाह हज़रत इब्राहीम से कहता है कि :

 “….और तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब कौमें बरकत पाएंगी क्यूंकि तूने मेरी बात मानकर उसपर  अमल किया”

पैदाइश 22 :18

अगर आप दुनिया की किसी भी ‘कौम’ से ताल्लुक़ रखते हैं (वैसे तो आप रखते ही हैं) तो यह आप से भी ताल्लुक़ रखता है,आप भी इस वायदे के हक़दार हैं क्यूंकि खुद अल्लाह ने यह वायदा आप के हक़ में किया है! क्या यह आप के लिए कीमती नहीं है! किसतरह इब्राहीम की कहानी का यह ताल्लुक़जो हज़रत ईसा से जुड़ाहुआ है किस तरह हमारे लिए बरकत का बाईस है? और क्यों? हम ने गौर किया था कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का फ़िदया हुआ था। और यह हमारे लिए भी एक इशारा है मगर इस के अलावा यह जवाब तय्यारी के साथ नुमायाँ नहीं है इसलिए हम को हज़रत मूसा की निशानी के साथ जारी रहना होगा (जो कि दो निशानियाँ हैं) और वह हमारे लिए इन सवालात को वाज़ेह करेंगे।

मगर एक लम्हे के लिए लफ्ज़ ‘नसल’ की तरफ़ इशारा करना चाहता हूँ जो यहाँ ‘नसल’ का लफ़ज़  वाहिद के सेगे में है।  यहां नस्लें नहीं लिखा गया है जिस तरह कई एक औलाद या लोगों में से होते हैं। एक बरकत का वायदा हज़रत इब्राहीम के एक ख़ास नसल के वसीले से था इसलिए यह वाहिद के सेगे में है न कि कई लोगों के वसीले से या लोगों की जमाअत से या’नी कि ‘उन से’ बल्कि “उस से”- आगे चल कर फ़सह जो मूसा की निशानी है इसे समझने में हमारी मदद करेगा।                          

इब्राहीम की 2 निशानी : रास्त्बाज़ी

अल्लाह की जानिब से हम को क्या कुछ ज़रूरत है ? इस सवाल के लिए कई एक जवाब हैं, मगर आदम की निशानी हम को याद दिलाती है कि हमारी सब से पहली और सब से बड़ी ज़रुरत रास्त्बाज़ी  है। यहाँ हम उन अलफ़ाज़ को देखते हैं जो बराहे रास्त हमारी तरफ़ मुखातब है (बनी आदम)।

  हे आदम के बच्चों! हमने आपकी लाज को ढंकने के लिए आपको शुभकामनाएँ दी हैं, साथ ही साथ आपके लिए श्रंगार भी किया है। लेकिन धार्मिकता की छाप – यही सबसे अच्छा है। ऐसे अल्लाह के संकेतों में से हैं, कि उन्हें नसीहत मिल सकती है।

सूरत 7:26

तो फिर ‘रास्त्बाज़ी’ क्या है ? तौरेत अल्लाह कि बाबत हम से कहती है कि (इसतिसना 32:4)

मैं यहोवा के नाम की घोषणा करूंगा।
ओह, हमारे भगवान की महानता की प्रशंसा करो!
वह रॉक है, उसके काम एकदम सही हैं,
और उसके सभी तरीके सिर्फ हैं।
एक वफादार ईश्वर जो गलत नहीं करता,
ईमानदार और बस वह है।

यह अल्लाह की रास्त्बाज़ी की तस्वीर है जिसको तौरेत में बयान किया गया है ।रास्त्बाज़ी के मायने हैं वह जो कामिल है; यानि मुकम्मल तोर से कामिल; (थोड़ा या ज़ियादा नहीं बल्कि तमाम कमाल) जिसकी राहें सच्ची हैं ,जिसमें थोड़ी सी भी,नाम के लिए भी बुराई नहीं पाई जाती; जो कि बरहक़ है। यह है रास्त्बाज़ी जिसतरह से अल्लाह के बारे में तौरेत ज़िकर करती है। मगर सवाल यह है कि हमको रास्त्बाज़ी कि क्या ज़रुरत है और क्यूँ ज़रुरत है? इस का जवाब पाने के लिए हम एक ज़बूर का हवाला देखेंगे। ज़बूर 15 जिसको हज़रत दाऊद (अलै.) ने लिखा है इसे हम इस तरह से पढ़ते हैं:

प्रभु, आपके पवित्र तम्बू में कौन रह सकता है?
  आपके पवित्र पर्वत पर कौन रह सकता है?

   2 जिसकी राह चलती है, वह निर्दोष है,
    जो धर्मी है,
   जो उनके दिल से सच बोलता है;
    3 जिसकी जीभ में कोई बदनामी न हो,
    जो पड़ोसी के लिए गलत नहीं है,
    और दूसरों पर कोई गाली नहीं डालता;
     4 जो एक वीभत्स व्यक्ति का तिरस्कार करता है
    जो प्रभु से डरते हैं उनका आदर करते हैं;
    जो दर्द होने पर भी शपथ रखता है,
    और उनका मन नहीं बदलता है;
    5 जो बिना ब्याज के गरीबों को पैसा उधार देता है;
    जो निर्दोष के खिलाफ रिश्वत स्वीकार नहीं करता है …

  जब यह पूछा जाता है कि कौन अल्लाह के ‘मुक़द्दस पहाड़’ पर रह सकता है, तो दुसरे तरीके से यह पूछा जाता है या इस सवाल का दूसरा पहलू यह है कि ‘अल्लाह के साथ कौन जन्नत में रहेगा’? तो हम देख सकते हैं कि इस का जवाब यह है कि “वह जो बे गुनाह और ‘रास्त्बाज़’ है (आयत 2)। वह शख्स अल्लाह के साथ जन्नत में दाखिल हो सकता है। इसी लिए हम को रास्त्बाज़ी की ज़रूरत है। रास्त्बाज़ी की ज़रुरत इस लिए भी है क्यूंकि खुद अल्लाह कामिल है।

अब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दूसरी निशानी पर गौर करें। किताबों से इबारत को खोलने के लिए यहाँ पर किलिक करें। तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ की आयतों को पढने के बाद हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के रास्ते पर चले (सूरा 37:83) और ऐसा करते हुए उस ने ‘रास्त्बाज़ी’ हासिल की (पैदाइश 15:6)। यही बात आदम कि निशानी में भी हम से कहा गया था कि हमें रास्त्बाज़ी की ज़रुरत है। सो अहम् सवाल हमारे लिए यह है कि : उसने इसे किस तरह हासिल किया ?

अक्सर मैं सोचता हूँ कि मै रास्त्बाज़ी को दो रास्तों में से एक को चुनने के ज़रिये हासिल करता हूँ पहले रास्ते में (मेरे ख़यालात में) अल्लाह के वजूद पर ईमान लाने के ज़रिये या उसे तस्लीम करने के ज़रिये मैं रास्त्बाज़ी को हासिल करता हूँ। मैं अल्लाह पर ‘ईमान’ लाता हूँ। इस ख़याल का सहारा लेते हुए क्या हम तौरेत में ऐसा नहीं पढ़ते कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) खुदावंद पर ईमान नहीं लाए थे? देखें (पैदाइश 15:6) मगर कुछ और गौर ओ फ़िक्र के साथ मैं ने यह महसूस किया है कि ईमान लाने का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि एक वाहिद ख़ुदा के वजूद पर ईमान लाना – नहीं बल्कि अल्लाह ने उसको एक पक्का वायदा किया था कि वह अपना एक बेटा हासिल करेगा। और वह एक ऐसा वायदा था जिस के लिए इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को चुनना था कि वह इस पर ईमान लाएं या नहीं। इस की बाबत आगे सोचें कि शैतान या इब्लीस भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखता है। और यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि उस के अन्दर कोई रास्त्बाज़ी नहीं है। सो सादगी के साथ अल्लाह के वजूद पर ईमान लाना ही ‘किसी मसले का हल’ नहीं है। मतलब यह कि इतना ही काफ़ी नहीं है।

दूसरा रासता जो मैं अक्सर सोचता हूँ वह यह है कि रास्त्बाज़ी को मैं अपनी क़ाबिलियत से हासिल कर सकता हूँ या मैं इसको नेक काम या मज़हबी कामों को करने के ज़रिये अल्लाह से कमा सकता हूँ जैसे बुरे कामों की निस्बत भले कामों को ज़ियादा करना, नमाज़ अदा करना, रोज़े रखना या किसी तरह के मज़हबी कामों को अंजाम देना मुझे इजाज़त देता है कि मैं रस्त्बाज़ी हासिल करने का हक़दार बनू, कमाऊं या क़ाबिल बनूं। मगर गौर करें तौरेत शरीफ़ इस तरह से हरगिज़ नहीं कहती।

अबराम खुदावंद पर ईमान लाया और उसने [यानी कि अल्लाह ने] उसके लिए [यानी इब्राहीम अलै. के लिए] रास्त्बाज़ी गिना गया।

पैदाइश15:6

इब्राहीम (अलै.) ने रास्त्बाज़ी को कमाया नहीं था बल्कि यह उसके लिए ‘शुमार किया गया’ था। सो इन दोनों में क्या फ़रक़ है? सहीह मायनों में देखा जाए, अगर कोई चीज़ ‘कमानी’ है तो आप उस के लिए काम करते हैं फिर आप उसके मुस्तहक़ होते हैं। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे आप मेहनत करते हैं तो आप मज़दूरी के हक़दार होते है। पर अगर आप के नाम कोई चीज़ जमा की जाती या मंसूब की जाती है तो यह आप को अता की जाती है। यह आप का कमाया हुआ नहीं है या आप मुस्तहक़ नहीं थे।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) वह शख्स थे जो गहराई से अल्लाह (वाहिद ख़ुदा) के वजूद पर ईमान लाए थे। वह दुआ बंदगी करने वाले और दूसरों की मदद करने वाले थे। जैसे कि वह अपने भतीजे लूत/लोट की मदद करते और उस के लिए दुआ करते थे। यह वह बातें हैं जिन का हम इनकार नहीं कर सकते। मगर जो कुछ इब्राहीम के तोर तरीके की बाबत बताया वह बहुत ही सीधा साधा जिन्हें हम तक़रीबन चूक जाते हैं। तौरेत हम से कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) रास्त्बाज़ी इसव लिए अता हुई क्यूंकि उन्हों ने अल्लाह के वायदों पर यकीन किया था। रास्त्बाज़ी हासिल करने की बाबत जो भी हमारी आम समझ है यह उसको मंसूख करता है चाहे इस सोच के ज़रिये से कि अल्लाह के वजूद पर ईमान रखना ही काफी है या किसी हद तक नेक काम और मज़हबी सरगर्मियां (नमाज़, रोज़ा वगैरा) इन्हें बजा लाने से हम रास्त्बाज़ी को कमा सकते या उसके हक़दार हो सकते हैं। मगर याद रखें कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने इस रास्ते को नहीं अपनाया था। उन्हों ने सादगी से अल्लाह के वायदे पर यक़ीन करने को चुना।

अब आप देखें कि एक बेटा इनायत किये जाने के वायदे पर यकीन करने का चुनाव शायद एक सीधी बात हो सकती थी मगर यह यक़ीनी तोर से आसान नहीं था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) आसानी वायदे कि परवाह किये बगैर रह सकते थे इस सबब से कि हक़ीक़त में अल्लाह उसे एक बेटा देने की कुदरत रखता है तो उसी वक़्त उसे इनायत करे क्यूंकि इस दौरान इब्राहीम और उसकी बीवी सारा इतने उमरज़दह हो चुके थे कि बच्चे का होना ना मुमकिन था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की पहली निशानी में उसकी उम्र 75 साल से ऊपर थी जब उस ने अपने मुल्क को छोड़ा था और कनान में पहुंचा था। उस वक़्त अल्लाह ने उसको वादा किया था कि उस से एक बहुत ‘बड़ी कौम’ बनेगी। इस वायदे के बाद कई एक साल गुज़र चुके थे और वह दोनों उमर रसीदा हो चुके थे और डर हक़ीक़त उन्हों ने पहले से ही बहुत ज़ियादा इंतज़ार किया था। और अभी तक उनके एक बच्चा भी नहीं हुआ था तो एक ‘बड़ी कौम’ की बात कैसे हो सकती थी? “अगर अल्लाह को एक बड़ी कौम ही बनाना था तो उसने पहले से ही एक बेटा क्यूँ नहीं दिया” ? उसको शायद ताज्जुब लगा होगा। दुसरे लफ़्ज़ों में हालांकि उसके एक बेटा होने के वादे पर यकीन तो किया था मगर गालिबन उसके दमाग में वायदे की बाबत जवाब न मिलने वाले सवालात थे। उसने वायदे पर यकीन किया था इसलिए कि वायदे का देने वाला अल्लाह था – हालाँकि वह वायदे की हर बात को समझता नहीं था। मगर बुढापे की  उम्र में बच्चा होने के इस वायदे पर यकीन करने के लिए उसे और उसकी बीवी को ज़रुरत थी कि वह अल्लाह के एक मोजिज़े पर ईमान लाए कि वह एक मोजिज़े को अंजाम दे।

वायदे पर ईमान रखना सरगरम होकर इंतज़ार करने का भी तक़ाज़ा करता है। उसकी पूरी ज़िन्दगी एक तरह से दखलंदाज़ थी जब वह कनान के वायदा किये हुए मुल्क में खेमों में सालों तक इंतज़ारी में अपने दिन गुज़ार रहा था कि वायदा किया हुआ बेटा उसे मिल जाए। यह उस के लिए बड़ा आसान हो जाता अगर वह अल्लाह के वायदे को इल्तिफ़ात कर जाता और मसोपतामिया (मौजूदा इराक़) में अपने घर वापस चला जाता जिसे वह बहुत सालों पहले छोड़ चुका था जहां उस के भाई और उस का ख़ानदान और दीगर रिश्तेदार अभी भी खयाम करते थे। सो इब्राहीम (अलै.) को मुश्किलों के साथ जीना पड़ रहा था ताकि वायदे पर ईमान रखना जारी रखे। हर एक घड़ी और हर एक दिन बल्कि कुछ साल तक जबकि वह वायदे के पूरा होने का इंतज़ार कर रहा था – वायदे पर का उसका भरोसा बहुत बड़ा था जो कि ज़िन्दगी के आम हुसूल (जैसे तस्कीन और फ़लाह व बहबूद) पर फौकिय्क्त हासिल था। हकीकी मायनों में वायदे के पेशबंदी में जीना इस का मतलब था कि ज़िन्दगी के आम हुसूल के लिए मरना। वायदे पर ईमान रखने के ज़रिये वह अपने भरोसे और अल्लाह के लिए महब्बत दोनों का इज़हार कर रहा था।

इस तरह वायदे पर यक़ीन करना यह सिर्फ़ उस के लिए दिमाग़ी समझोते से बाहर जा रहा था। इब्राहीम (अलै.) को  अपनी ज़िन्दगी, शोहरत, मुहाफ़िज़त, हाल के अमल और उम्मीदों को इस वायदे पर मुताक्बिल के लिए जोखों में डालने की ज़रुरत थी। क्यूंकि उसने मुस्तअद्दी और फ़रमानबरदारी से इंतज़ार किया था।             

यह निशानी बताती है कि किस तरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के उस वायदे पर ईमान लाया जो एक बेटे के अता करने की बाबत थी और ऐसा करने के ज़रिये उसको अता भी हुई और रास्त्बाज़ी उस के नाम शुमार किया गया। सही मायनों में देखा जाए तो इब्राहीम (अलै.) ने खुद को इस वायदे के लिए मख़सूस किया था। उस के पास चुनाव था कि वायदे की परवाह न करता और अपने मुल्क (मौजूदा इराक़) में वापस चला जाता जहां से वह वापस आया था। और वह ऐसा भी कर सकता था कि उस वायदे की परवाह न करता जबकि अभी भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखे हुए था, अभी भी नमाज़ रोज़े की पाबंदी और दूसरों की मदद करनी जारी थी – मगर इसके बाद अगर वह सिर्फ़ अपने मज़हब पर काइम रहता मगर उसको ‘रास्त्बाज़ी’ में शुमार नहीं किया जाता। और जिस तरह कुरान शरीफ़ कहता है “हम सब जो आदाम की औलाद हैं – रास्त्बाज़ी के पोशाक हैं – जो कि बहुत ही उमदा है” – यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का रासता था।

हम ने रस्त्बाज़ी की बाबत बहुत कुछ सीखा है जो कि जन्नत में दाखिल होने के लिए ज़रूरी है और यह कमाया नहीं जाता बल्कि हमारे लिए शुमार किया जाता है। और यह अल्लाह के वायदे पर भरोसा करने के ज़रिये शुमार किया जाता है ।मगर सवाल यह है कि रस्त्बाज़ी के लिए कौन क़ीमत चुकाएगा ? हम निशानी 3 के साथ जारी रखेंगे।

इब्राहीम की 1 निशानी : बरकत

इब्राहीम! उसे अब्रहाम और अब्राम (अलै.) के नाम से भी जाना जाता है। वाहिद ख़ुदा पर ईमान रखने वाले तमाम तीनों मज़ाहिब यहूदियत, मसीहियत और इस्लाम उसके पीछे चलने के लिए एक नमूना पेश करती है। अरब के लोग और यहूदी मौजूदा ज़माने में उसके बेटे इश्माईल और इस्साक़ के जिस्मानी नसल के ज़रिये उसके नाम को बड़े एहतिमाम से लेते हैं। नबियों की क़तार में भी वह बहुत ही अहम् माने जाते हैं क्यूंकि उन के बाद के अंबिया उन्हीं की नसल से ताल्लुक़ रखते हैं। सो हम अब्रहाम (अलैहिस्सलाम) कि निशानी को कई एक हिस्सों में गौर करेंगे। उसकी पहली निशानी को कुरान शरीफ़ और तौरात शरीफ़ में पढने के लिए यहाँ पर किलिक करें

कुरान शरीफ़ से एक आयत में हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पीछे कई एक क़बीले वजूद में आए जिस से क़ौम के लोग पैदा हुए। इन लोगों के ज़रिये कई एक ‘बड़ी हुकूमतें’ क़ाइम हुईं। मगर लोगों के ‘क़बीले’ रुनुमा होने से पहले एक शख्स के पास कम अज़ कम एक बेटा तो ज़रूर होना चाहिए था और एक ‘बड़ी हुकूमत’ को शक्ल देने के लिए एक बड़ी जगह का होना भी ज़रूरी था।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए वायदा

तौरेत की इबारत (पैदाइश 12:1।7) बताती है कि अल्लाह किसतरह ‘क़बीले’ और ‘बड़ी हुकूमत’ जो इब्राहीम (अलै.) से आने वाली थी अपने इस दोहरे तकमील को आशकारा करने जा रहा था। अल्लाह ने उसे एक वायदा दिया जो मुस्तकबिल के लिए एक बुन्याद था। आइये हम इसे तफ़सील के साथ मज़ीद नज़र।ए।सानी करें। हम देखते हैं कि अल्लाह इब्राहीम (अलै.) से कहता है :

2 “मैं तुम्हें एक महान राष्ट्र में बनाऊंगा,
और मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगा;
मैं तुम्हारा नाम महान कर दूंगा,
और आप एक आशीर्वाद होंगे।
3 मैं उन्हें आशीर्वाद दूंगा जो तुम्हें आशीर्वाद देते हैं,
और जो कोई तुम्हें शाप देगा, मैं शाप दे दूंगा;
और सभी लोग पृथ्वी पर हैं
आपके माध्यम से धन्य हो जाएगा।

   इब्राहीम (अलै.) की अज़मत

जहां मैं रहता हूँ वहाँ बहुत से लोग ताज्जुब करते हैं कि क्या कोई ख़ुदा है और कोई शख्स कैसे जान सकता है कि अगर उसने हक़ीक़त में खुद को तौरेत के वसीले से ज़ाहिर किया हो। यहां हमारे सामने एक वायदा है जिस के हिससों से हम सहीह साबित कर सकते हैं। इस मुकाश्फ़े का ख़ातमा कलमबंद करता है कि अल्लाह ने बराहे रास्त इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से वायदा किया कि “मैं तेरा नाम सरफ़राज़ करूंगा” हम 21 वीं सदी में बैठे हुए हैं और इब्राहीम/अब्रहाम/अब्राम का नाम तारीक़ में अलमगीर तोर से जाना पहचाना नामों में से एक है। यह वायदा ल्फ्ज़ी और तारीक़ी तोर से सच साबित होता है। तौरेत का सब से क़दीम नुसख़ा जो आज मौजूद है वह बहीरा।ए।मुरदार के तूमार में से है जिस की तारीक़ 200 -100 क़ब्ल मसीह है। इसका मतलब यह है कि यह वायदा ज़ियादा से ज़ियादा इसके लिखे जाने वक़्त से मौजूद है। उस ज़माने में इब्राहीम (अलै.) के नाम और शख्सियत को सहीह तोर से नहीं जाना जाता था सिवाए यहूदियों की अक़लियत के जो तौरेत के मानने वाले थे। मगर आज उसका नाम बहुत ऊँचा है। सो हम सही साबित कर सकते हैं कि एक तकमील तभी पूरी होती है जब उसे लिखा जाता है, उससे पहले नहीं।

इब्राहीम (अलै.) के लिए वायदे का यह हिस्सा यक़ीनी तोर से वाक़े हुआ यहाँ तक कि ग़ैर ईमानदारों के लिए ज़रूरी था और यहाँ तक कि यह हआरे लिए अल्लाह का वायदा जो इब्राहीम (अलै.) के लिए है उसके बाक़ी हिस्से को समझने के लिए ज़ियादा यकीन दिलाता है। सो आइये हम इस मुताला को जारी रखें।

हमारे लिए बरकत

फिर से हम इब्राहीम (अलै.) की तरफ़ से एक बड़ी क़ौम के बरपा होने के वायदे को देखते हैं जो खुद इब्राहीम (अलै.) के लिए बाईस ए बरकत है। मगर इस के अलावा और भी कुछ है यह बरकत सिर्फ़ इब्राहीम (अलै.)के लिए ही नहीं है क्यूंकि यह इबारत कहती है “ज़मीन की तमाम कौमें तेरे वसीले से बरकत पाएंगीं” (यानी इब्राहीम अलै. के वसीले से)। यह मेरे और आप के लिए गौर करने की बात है क्यूंकि आप और मैं ‘ज़मीन के तमाम लोगों का’ एक हिस्सा हैं। इससे कुछ फ़रक नहीं पड़ता कि हम किस मज़हब से ताल्लुक रखते हैं, हमारी नसल की गोशा ।ए। गुमनामी क्या है, हम कहां रहते हैं, हमारी तहज़ीबी रुतबा क्या है, या हम कौनसी ज़बान बोलते हैं वगैरा। यह वायदा हर एक के लिए है जो आज ज़िन्दा मौजूद हैं। यह वायदा आपके और मेरे लिए है। हालांकि हमारे फ़रक़ फ़रक़ मज़ाहिब, नसल बतोर गोशा।ए।गुम्नामियाँ और ज़बानें अक्सर लोगों को तकसीम करते और मुख़ालिफ़त का सबब बनाते हैं। मगर यह ऐसा वायदा है जो इन बातों पर ग़ालिब आता नज़र आता है जो आम तोर से हमको तक़सीम करता है। किस तरह? कब? किस तरह की बरकतें? यह इस मुद्दे पर साफ़ नहीं करता। मगर इस निशानी ने एक वायदे को जन्म दिया है जो इब्राहीम (अलै.) के वसीले से आपके और मेरे लिए है। जबकि हम जानते हैं कि इस वायदे का एक हिस्सा सच साबित हुआ है और हम भरोसा कर सकते हैं कि दूसरा हिस्सा जो हम पर नाफ़िज़ होता है वह भी साफ़ हो जाएगावह भी लफ्ज़ी तकमील बतोर – हमें इस को खोलने के लिए सिर्फ़ इसकी कुन्जी को ढूंढना ज़रूरी है।

हम इस बात पर गौर कर सकते हैं कि जब इब्राहीम (अलै.) ने इस वायदे को हासिल किया तो वह अल्लाह का फरमान बरदार हुआ और ….

“सो अब्राम खुदावंदके कहने के मुताबिक चल पड़ा”

पैदाइश 12:4

      इब्राहीम (अलै.) की हिजरत

ऊर से ।।> हारान ।।>कनान का मुल्क

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वायदा किया हुआ मुल्क में पहुँचने के लिए यह सफ़र कितना लम्बा था? यहाँ पर यह नक्शा इब्राहीम (अलै.) के सफ़र को दिखता है। वह असल में ऊर (मौजूदा जुनूबी इराक़) में रहता था। फिर वह हारान (मौजूदा शुमाली इराक़) में आया ।फिर उसने अपने ज़माने के कनान कि तरफ़ सफ़र किया। नक्शे में आप देख सकते हैं कि यह बहुत लम्बा सफ़र था। उसको ऊँट घोड़ा या गधे पर सवार होकर सफ़र करना था। सो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इस सफ़र को अंजाम देने में कई एक महीने लगे होंगे जब अल्लाह कि बुलाहट हुई तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने ख़ानदान को छोड़ा। अपनी ऐशो इशरत की ज़िन्दगी को छोड़ा जिसे वह मसोपतामिया में रहकर गुज़ारा करता था। मौजूदा मसोपतामिया उस ज़माने में ख़ास तहज़ीब ।ओ। तमद्दुन का मरकज़ था। उसकी मुहाफ़ज़त को लेकर और जो कुछ उसके इस सफ़र से मुताल्लिक़ मशहूर है वह यह है कि जिस तरफ़ वह सफ़र कर रहा था वह उस के लिए बिलकुल बेगाना था। जब वह अपनी मंजिल पर पहुंचा तो तोरेत हम से कहती है कि उस वक़्त उस की उम्र 75 साल कि थी!

पेश्तर नबियों की तरह जानवरों की कुर्बानियां

तौरेत हम से यह भी कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) हिफाज़त से जब कनान में पहुंचे:

“तो उसने खुदावंद के लिए एक मज़बह बनाया”

पैदाइश 12:7

एक मजबह वह है जहां हाबील और नूह (अलैहिस्सलाम) ने इस से पहले क़ुर्बानी अदा की थी। उन्होंने अल्लाह के लिए जानवरों के खून की क़ुर्बानी दी। हम देखते हैं कि नबियों ने किस तरह अल्लाह की इबादत की थी उसका यह एक नमूना था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उस नए मुल्क में दाखिल होने और सफ़र करने के लिएअपनी ज़िन्दगी के आखरी अय्याम में जोखिम उठाया था। मगर ऐसा करने के लिए उसने खुद को अल्लाह के वायदे के हाथों में सोंप दिया था ताकि खुद के लिए और दीगर तमाम लोगों के लिए बरकत का बाइस बने। और इसी लिए वह हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है। हम इब्राहीम की अगली निशानी नम्बर 2 के साथ इस मुताले को जारी रखते हैं।

लूत की निशानी

(तौरात या बाइबिल) का लूत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का भतीजा था। उसने शरारत पसंद लोगों के बीच रहना पसंद किया था। अल्लाह ने इस हालत को उस ज़माने के तमाम लोगों के लिये पैगम्बराना निशानी बतोर इस्तेमाल किया। मगर सवाल यह है कि वह निशानात क्या थे ? इस के जवाब के लिए हमको इस बयान में दिए गए फ़रक़ फ़रक़ लोगों की तरफ़ नज़दीकी से धियान देना होगा। इस बयान को तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तौरेत्त शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में देख सकते हैं कि तीन जमाअत के लोग पाए फ़ जाते हैं, इन के अलावा अल्लाह के फरिश्तों (पैगम्बरों की जमाअत)। आइये हम इन्हें बारी बारी से देखें।

सदोम के लोग

यह लोग निहायत ही गुमराह थे। यह लोग उम्मीद करते थे कि इनसानी औरतों के अलावा दूसरों की इज़्ज़त से भी खेल सकते थे (जो हक़ीक़त में फ़रिश्ते थे मगर सदोम के लोगों ने सोचा कि वह इंसान थे सो उन्हों ने उन के साथ गिरोह में होकर अस्मतदरी करने का मंसूबा किया)। इस तरह का गुनाह ऐसी संगीन बुराई थी कि अल्लाह ने सारे शहर का इंसाफ़ करने का फ़ैसला किया। फ़ैसला वही था जो इस से पहले भी आदम को दिया गया था।पीछे शुरुआत में अल्लाह ने आदम को इस फ़ैसले से ख़बरदार किया था कि गुनाह की मज़दूरी मौत है। और दूसरी तरह कि सज़ा नहीं (जैसे मारना , क़ैद करना वगेरा जो काफ़ी नहीं था। अल्लाह ने आदम से कहा था:

“….लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का फल कभी न खाना क्यूंकि जिस रोज़ तूने उस में से खाया    तू मरा।”

पैदाइश 2:17

इसी तरह से सदोम के लोगों के गुनाहों कि सज़ा यह थी कि उन लोगों को भी मरना था। दरअसल सदोम शहर के सारे लोगों को और उस में रहने वाले तमाम जानदारों को आस्मान से नाजिल आग के ज़रिये बर्बाद किया जाना था।यह एक नमूने की मिसाल है जो बाद में इंजील शरीफ़ में समझाया गया है:

  “क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी तो मौत है”

रोमियों 6:23

लूत के दामाद 

नूह के बयान में। अल्लाह ने तमाम दुनिया का फ़ैसला किया और आदम की निशानी के साथ यकसां (बराबर का सुलूक किया कि सारे लोग उस बड़े तूफ़ान के ज़रिये हलाक हुए। मगर तौरात शरीफ और कुरान शरीफ़ हमसे कहते हैं कि नूह के ख़ानदान को छोड़ सारी दुनया के लोग बुरे थे। अल्लाह ने सदोम के लोगों का भी इन्साफ़ किया जबकि वह लोग भी गुमराह और बुरे थे। सिर्फ़ इन बयानात के साथ मैं यह सोचने के लिए आज़माया जा सकता हूँ कि मैं अल्लाह के इंसाफ़ से महफूज़ हूँ क्योंकि मैं इतना बुरा नहीं हूँ जैसे कि वह लोग थे । आखिर कार मैं अल्लाह पर पूरा ईमान रखता हूँ, मैं बहुत से नेक काम करता हूँ और मैं ने कभी इस तरह के बुरे काम अनजाम नहीं दिए। तो फिर क्या मैं महफूज़ हूँ ? लूत की निशानी उस के दामादों के साथ मुझे ख़बरदार करती है। हालाँकि वह लोग इस गिरोह में शरीक नहीं थे जो एक गिरोह में होकर जिंसी गुनाह (असमतदरी) अंजाम देने की कोशिश कर रहे थे किसी तरह से उन्हों ने आने वाले इंसाफ़ की तंबीह को संजीदा तोर से नहीं लिया। दरअसल तौरेत शरीफ़ हम से कहती है, लोग  सोच रहे थे कि ‘(वह) लूत उन से मज़ाक़ कर रहा था’। मगर सवाल यह है कि क्या उन की किस्मत शहर के दुसरे लोगों से फ़रक़ थी ? नहीं ! वह उन्हीं की किस्मत में शरीक हुए। अंजाम बतोर लूत के दामादों और सदोम के बुरे लोगों उन दोनों में कोई फ़रक नहीं था। यहाँ निशानी यह है कि हर एक शख्स को इस तंबीह को संजीदा तोर से लेना ज़रूरी था क्यूंकि वह न सिर्फ़ गुमराह लोग थे।

लूत की बीवी          

लूत की बीवी हमारे लिए एक बड़ी निशानी है। तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में ही वह भी दीगर शरीर लोगों के साथ हलाक हुई – वह एक नबी की बीवी थी – मगर लूत के साथ उसका एक ख़ास रिश्त्ता होते हुए भी वह रिश्ता बचा न सका हांलांकि वह सदोम के लोगों के साथ उस बड़े गुनाह में शामिल नहीं थी। उसने फ़रिश्ते के हुक्म को तोड़ा:

              ‘तुम में से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे’ (सूरा 11:81) सूरा ।ए। हूद या

              ‘पीछे मुड़कर न देखना’ (पैदाइश 19:17)

तौरेत हम से कहती है कि

 लेकिन लूत की पत्नी ने वापस देखा, और वह नमक का एक स्तंभ बन गई।

उत्पत्ति १ ९: २६

उसके “पीछे मुड़ कर देखने” का असल मक़सद क्या था उसे समझाया नहीं गया है मगर उस ने सोचा कि अल्लाह के इस छोटे से हुक्म को नज़र अंदाज़ करदेने से कोई ख़ास फ़रक नहीं पड़ेगा – उसकी किस्मत – उसके “छोटे” गुनाह के साथ वैसा ही था जैसा कि सदोम के लोगों का “बड़ा” गुनाह उन के लिए मौत बन कर आई थी। यह हमारे लिए कुछ ऐसी ज़रूरी निशानी है जो कभी कभी यह सोचने से दूर रखती हैं कि यह छोटे गुनाह हैं जिन्हें अल्लाह हिसाब में नहीं लाएगा (इन का इंसाफ़ नहीं होगा) — लूत की बीवी इस ग़लत सोच के खिलाफ़ तम्बीह के लिए हमारी निशानी है:

लूत, अल्लाह और फ़रिश्ते पैग़म्बरान 

जिसतरह हम ने आदम की निशानी में देखा था कि जब अल्लाह ने आदम का इंसाफ़ किया था तो उस ने तो उसने उस पर अपना फ़ज़ल भी अता किया था। और वह इंसाफ़ था उन के लिए चमड़े के पोशाक का इनायत किया जाना। नूह के साथ जब अल्लाह ने इंसाफ़ किया तो उसने फिर से एक बड़ी कश्ती के साथ फ़ज़ल अता किया। फिर से एक बार अल्लाह यहाँ तक कि अपने इंसाफ़ में बा ख़बर है कि वह इंसाफ़ अता करता है ।इसको तौरेत ने इसतरह बयान किया है कि:

जब वह (ल्यूक) हिचकिचाया, तो पुरुषों (स्वर्गदूत जो पुरुषों की तरह दिखते थे) ने अपना हाथ और अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के हाथों को पकड़ लिया और उन्हें सुरक्षित रूप से शहर से बाहर ले गए, क्योंकि प्रभु उनके लिए दयालु थे।

उत्पत्ति १ ९: १६

इससे हम क्या सीख सकते हैं? से पीछे की निशानियों की तरह फ़ज़ल आलमगीर था मगर सिर्फ़ एक तरीके के ज़रीये ही अता किया जाना था। लूत के ख़ानदान को शहर से बाहर रहनुमाई करते हुए अल्लाह ने रहम करके मिसाल के तोर पर शहर के अन्दर एक ऐसी पनाहगाह का इंतज़ाम नहीं किया जो आसमान से आग नाज़िल होने पर उनकी मुहाफ़िज़त हो सके। अल्लाह की तरफ़ से रहम हासिल करने का एक ही रास्ता था – कि शहर से बाहर फ़रिश्तों के पीछे चलो। अल्लाह ने लूत और उसके खानदान पर इसलिए रहम नहीं किया क्यूंकि लूत एक कामिल शख्स था। दरअसल तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ इन दोनों में हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों को अस्मतदरी करने वालों के हाथ सोंपने जा रहा था। यह एक शरीफ़ाना पेशकश नहीं थी। तौरेत हमसे कहती है कि फरिशतों के ख़बरदार किये जाने पर भी लूत ‘हिचकिचाया’। इन सब के बावजूद भी अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिये उसका हाथ पकड़ कर शहर के बाहर लेजाने के ज़रिये उसपर अपना रहम ज़ाहिर करता है। यह हमारे लिए एक निशानी है : अल्लाह हम पर रहम इनायत करेगा, यह हमारी भलाई पर मुनहसर नहीं है। मगर हम लूत की मानिंद जो हमारे सामने है रहम हासिल करने की ज़रुरत है जिस से हमारी मदद हो – लूत के दामादों ने इसे हासिल नहीं किया और उन्हें इससे कोई फाइदा हासिल नहीं हुआ।

तौरेत हम से कहती है कि अल्लाह ने लूत के चचा, एक बड़े नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबब से जिसने उसके लिए अल्लाह से इल्तिजा करी थी उस पर अपना रहम ज़ाहिर किया – (यहाँ पैदाइश की इबारत को देखें) तौरेत शरीफ़ इब्राहिम (अलै.) के निशानियों के वसीले से अल्लाह की  जानिब से वायदों को को जारी रखती है कि “तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब क़ौमें बरकत पाएंगीं क्यूंकि तू ने मेरी बात मानी” (पैदाइश 22:11)। यह वायदा हमको चौकन्ना कर देना चाहिए इसलिए कि कोई फ़रक़ नहीं पड़ता कि हम कौन हैं, कौन सी ज़बान हम बोलते हैं, हम किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, या हम कहां रहते हैं वगैरा हम मालूम कर सकते हैं कि आप और मैं ‘ज़मीन की तमाम कौमों का’ एक हिस्सा हैं।अगर इब्राहिम की इल्तिजा के ज़रिये अललाह ने मुतहर्रिक होकर लूत पर रहम ज़ाहिर किया हालांकि वह इस के लिए काबिल नहीं था तो कितना ज़ियादा इब्राहीम (अलै.) की निशानियां हम पर रहम ज़ाहिर करेंगीं जो कि हम भी ‘तमाम कौमों में से’ एक हैं? इसी सोच के साथ हम तौरेत में इब्राहीम की निशानियों को देखते हुए आगे बढ़ेंगे।

नूह की निशानी

हम तारीक़ी सिलसिले को शुरू से जारी रखेंगे (मिसाल के तौर पर आदम/हव्वा और काबील/हाबील) और अब तौरेत में हमारा अगला तवज्जो के क़ाबिल न्काबी है नूह (अलैहिस्सलाम) जो आदम के ज़माने के 1600  बाद रहा करता था। बहुत से लोग मशरिक में नूह (अलैहिस्सलाम) की कहानी को जानते हैं और इनकार न करने लायक़ सैलाब की  बाबत कहानी को भी जानते हैं। मगर दुनिया तिलछट के तौर पर चट्टानों से ढका हुआ है जो कि कहा जाता है कि ऐसा सैलाब के दौरान ही तिलछट के जमा होने ज़रिये शक्ल इख्तियार करता है। सो हमारे पास इस सैलाब का माद्दी सबूत मौजूद है मगर सवाल यह है कि नूह की क्या निशानी थी जिस पर हमको गौर करने की ज़रुरत है? अब नूह (अलैहिस्स्सलाम)के बयान को तौरात और कुरान में पढ़ने के लिए यहां पर किलिक करें-

ग़ैब हो जाना  मुक़ाबिल  रहम हासिल करना

जब मैं मशरिकी लोगों से अल्लाह के इंसाफ़ की  बात करता हूँ तो अक्सर मुझे कुछ इस तरह के जवाब सुनने को मिलते हैं,  “मैं इंसाफ़ के लिए इतना ज़ियादा फ़िकर मंद नहीं हूँ क्यूंकि अल्लाह इतना ज़ियादा रहम करने वाला है कि मैं नहीं सोचता कि वह सच मुच मेरा इंसाफ़ करेगा।” यह वह नूह (अलैहिस्स्स्लाम) का बयान है जो एक सबब के लिए सवाल खड़ा करता है। जी हाँ। अल्लाह बहुत ज़ियादा रहम करने वाला है। वह अपने सिफ़त में बदलता नहीं है, और इस में कोई शक नहीं कि वह नूह (अलैहिस्स्सलाम) के ज़माने में भी रहम करने वाला था। इस्के बावजूद भी (नूह और उसके खानदान को) छोड़ तमाम दुनया अल्लाह के इंसाफ़ के तहत तबाह व बर्बाद हो गयी थी। 

अपने पापों के कारण वे डूब गए और उन्हें आग में डाल दिया, और उन्होंने अपने लिए अल्लाह [कोई भी] मददगार नहीं पाया सूरा नूह

सूरा 71 – नूह हमें बताती है कि

तो फिर उस का इंसाफ़ कहां गया? उसका इंसाफ़ उस कश्ती में मौजूद था। जिस तरह हम कुरान शरीफ़ में पढ़ते हैं:

            हम (अल्लाह) ने उसे (नूह पीबीयूएच) दिया, और उन लोगों को आर्क में

द हाइट्स 7:64

अल्लाह ने अपने रहम में होकर नबी नूह (अलैहिस्सलाम) का इसतेमाल करते हुए एक कश्ती का इन्तिज़ाम किया जो किसी के लिए भी दस्तियाब था। हर कोई उस कशती में दाखिल हो सकता था और खुद के लिए रहम और मह्फूज़ियत को हासिल कर सकता था। मगर एक संजीदा मसला यह था कि नूह के खानदान को छोड़ तक़रीबन सब लोग ख़ुदा के पैग़ाम पर ईमान नहीं लाए थे। और ईमान लाना तो दूर उल्टा नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाया और आने वाले इंसाफ़ की बाबत भरोसा नहीं किया। अगर यह सब न करते हुए सिर्फ़ कश्ती में दाखिल भी हो जाते तो वह लोग अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाते।

कुरान शरीफ़ की इबारत भी हमसे कहती है कि नूह का एक बेटा अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान नहीं लाया था। हक़ीक़त में वह एक पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। वह सोच रहा था कि ऐसा करके वह अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाएगा। मगर फिर से यहाँ पर एक परेशानी थी। वह अपने ईमान को मख्सूसियत के साथ जोड़ नहीं पाया था और इस चुनाव का फ़ैसला नहीं कर पाया था। उसने इंसाफ़ से बचने के लिए अपने तरीके का इस्तेमाल किया। मगर उस के बाप ने उससे कहा:

“आज के दिन तुझे अल्लाह के हुक्म से कोई चीज़ बचा नहीं सकती मगर उन्हीं को जिन पर उसने अपना रहम ज़ाहिर किया      है!”

हूद 11:43

उस बेटे को अल्लाह के रहम की सख्त ज़रुरत थी न कि खुद की अपनी कोशिश जो उसे इंसाफ़ से बचा सकती थी। दर हक़ीक़त पहाड़ पर चढ़ने की उस की कोशिश फुज़ूल और बे हासिल था। इसलिए इस का अंजाम भी उन लोगों के साथ ही था जो नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाते थे। और उनका मज़ाक़ उन्हें पानी में डूब कर मरने पर मजबूर किया।  यह सब कुछ करने से बेहतर अगर वह अपने बाप के साथ कश्ती में दाखिल हो जाता तो अल्लाह के इंसाफ से बच सकता था। इस बयान से हम मालूम कर सकते हैं कि सिर्फ़ अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान लाना ही काफ़ी नहीं था कि सैलाब से बच जाते। दर असल अल्लाह जो रहम इनायत करता है उस के लिए मखसूस हो जाना य सुपुर्द करना भी ज़रूरी होता है बनिस्बत इस के कि हमारे अपने ख़यालात को इस में शामिल करें कि हम यकीनी तौर से अल्लाह के रहम को हासिल कर लेंगे। सो – कश्ती हमारे लिए ‘नूह’ की निशानी है। सच पूछा जाए तो यह सरे आम यानी कि खुल्लम खुल्ला अल्लाह के इंसाफ़ की निशानी थी और साथ ही बचने और उस के रहम का ज़रिया भी था। क्यूंकि नूह के जमाने के लोगों में से हर किसी ने उस किश्ती को तैयार होते हुए देखा था। इस लिए यह आने वाले इंसाफ़ का और रहम की दस्तियाबी दोनों के लिए ‘खुल्लम खुल्ला’ निशानी था। मगर यह दिखता है कि उस के रहम का हुसूल उस फ्राह्मी के ज़रिये ही मुमकिन था जिसे अल्लाह ने पहले से इंतज़ाम किया हुआ था।

सो नूह ने अल्लाह के रहम व फ़ज़ल को क्यूँ हासिल किया? तौरेत बहुत बार इस मुहावरे को दोहराती है कि

            “नूह ने उन सब कामों को अंजाम दिया जो खुदावंद ने उसे हुक्म दिया था”

मैं यह पाता हूँ कि मैं उसी काम को करने पर माइल होता हूँ जो मैं समझता हूँ या जो मैं चाहता हूँ या जिस से मैं राज़ी होता हूँ।  मुझे यकीन है कि – नूह (अलैहिस्सलाम) के दिल में भी सैलाब के आने की इतला (तंबीह) और सूखी ज़मीन पर एक बड़ी कश्ती के तामीर के लिए अल्लाह के हुक्म को लेकर कई एक सवाल उस के दिल ओ दमाग में रहे थे होंगे। मगर मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि दीगर लोगों की बनिस्बत नूह एक रास्त्बाज़ शख्स था उसने कश्ती बनाने के मामले में कोई धियान नहीं दिया। मगर उस ने वही सब किया जो उस को अल्लाह की तरफ़ से हुक्म मिला था इस बिना पर नहीं कि उस के बाप ने उसे क्या सिखाया था या इस बिना पर नहीं कि उस ने अपनी ज़िन्दगी में क्या सीखा और समझा था। इस बिना पर नहीं कि उन चीज़ों से जिन से वह मुतमइन था और इस बिना पर भी नहीं कि यह उस के लिए क्या मायने रखता है। सो यह बातें हमारे लिए बड़ी मिसालें यानी कि नमूने हैं जिन के पीछे हमें चलने की ज़रुरत है।

नजात के लिए दरवाज़ा

तौरात हम से यह भी कहती है कि नूह, उसका ख़ानदान और तमाम जानवरों के कश्ती में दाखिल होने के बाद (सवार होने बाद)

            “खुदावंद ने बाहर से उस कश्ती का दरवाज़ा बंद कर दिया था”

पैदाइश 7:16

यह अल्लाह ही था जिसने कश्ती के उस एक दरवाज़े पर काबू रखा हुआ था न कि नूह (अलैहिस्सलाम) ने जब इंसाफ़ की बिना पर ज़मीन पर पानी आया तो बाहर से लोग कश्ती को किसी तरह का नुख्सान नहीं पहुंचा सकते थे न ही उसका दरवाज़ा खोल सकते थे क्यूंकि अल्लाह उस एक दरवाज़े को पूरी तरह से काबू में रखा हुआ था। मगर उसी वक़्त जो अन्दर मौजूद थे वह इस यकीन के साथ आराम से रह सकते थे कि अल्लाह ने कश्ती के दरवाज़े पर काबू कर रखा है इस लिए कोई हवा या मौज उस दरवाज़े को खोल नहीं सकती थी। वह लोग अल्लाह की हिफाज़त और उसके रहम में महफूज़ थे।

इसलिए कि अल्लाह बदलता नहीं है यह बात आज भी हमारे लिए नाफ़िज़ होती है। तमाम नबियों ने ख़बरदार किया है कि एक और इंसाफ़ का दिन आने वाला है। और यह आग के साथ आएगा मगर नूह (अलैहिस्सलाम) की  निशानी हमको यक़ीन दिलाती है कि उस के इंसाफ़ के साथ वह अपना रहम भी पेश करेगा। मगर हमको एक दरवाज़े के साथ उसके कश्ती की राह देखनी है जो हमको रहम हासिल करने की ज़मानत देगा।

अंबिया की क़ुर्बानी

तौरात हमसे यह भी कहती कि

   तब नूह ने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई। उसने कुछ शुद्ध पक्षियों और कुछ शुद्ध जानवर  को लिया और उनको वेदी पर परमेश्वर को भेंट के रूप में जलाया।

पैदाइश 8:20

यह आदम/हव्वा और क़ाबील/हाबील के जानवरों कि क़ुर्बानी के नमूने के लिए मुनासिब बैठता है। इस का मतलब यह है कि एक बार फिर एक जानवर की मौत और उस के खून के छाने जाने के ज़रिये नूह (अलैहिस्सलाम) ने दुआ की और अल्लाह के ज़रिये वह दुआ क़बूल की गई। “और ख़ुदा ने नूह और उसके बेटों को बरकत दी” (पैदाइश 9:1) “और नूह के साथ एक अहद बांधा” (पैदाइश 9:8) कि वह आइन्दा से कभी भी पानी के सैलाब के ज़रिये लोगों का इंसाफ नहीं करेगा। तो ऐसा लगता है कि नूह के ज़रिए क़ुर्बानी , मौत और एक जानवर के खून का छाना जाना अल्लाह की इबादत में बहुत दिक्कतें लेकर आ रही थीं। इस के बावजूद भी यह कितनी अहम् बात है। हम तौरेत के नबियों के वसीले से अगली बार लूत के साथ इस जायज़ा को जारी रखेंगे।