नहीं , मैं तमाम अहकाम की पाबन्दी नहीं कर रहा हूँ

मुझे अफ़सोस है । यह ख़ुश ख़बरी नहीं है ।  दर असल यह बहुत ही बुरी ख़बर है ,क्यूंकि इस का मतलब यह है कि आप के और मेरे पास एक ही मसला है वह यह है कि हमारे पास रास्त्बाज़ी नहीं है ।  रास्त्बाज़ी एक अहम् चीज़ है क्यूंकि यह बुन्याद है जो ख़ुदा की बादशाही (जन्नत) का हक़दार बनाता है ।  हमारे एक दुसरे के साथ का बर्ताव ही हमारी रास्त्बाज़ी है (जैसे झूट नहीं बोलना , चोरी न करना ,खून न करना , ज़िना न करना वगैरा) और सही मायनों में अल्लाह की इबादत करना जिस से हम जन्नत के वारिस हो सकते हैं ।  इसी लिए सच्ची रास्त्बाज़ी की ज़रुरत है ताकि उस की मुक़द्दस बादशाही में दाख़िल हों जिसतरह हज़रत दाऊद ज़बूरों में कहते हैं ।मगर अफ़सोस कि बात तो यह है कि कुछ ही लोगों के बारे में ज़िकर है कि वह ख़ुदा की मुक़द्दस बादशाही में दाख़िल होंगे । इस लिए वह तारीफ़ के काबिल हैं

हे यहोवा, तेरे पवित्र तम्बू में कौन रह सकता है?
    तेरे पवित्र पर्वत पर कौन रह सकता है?
केवल वह व्यक्ति जो खरा जीवन जीता है, और जो उत्तम कर्मों को करता है,
    और जो ह्रदय से सत्य बोलता है। वही तेरे पर्वत पर रह सकता है।
ऐसा व्यक्ति औरों के विषय में कभी बुरा नहीं बोलता है।
    ऐसा व्यक्ति अपने पड़ोसियों का बुरा नहीं करता।
    वह अपने घराने की निन्दा नहीं करता है।
वह उन लोगों का आदर नहीं करता जो परमेश्वर से घृणा रखते हैं।
    और वह उन सभी का सम्मान करता है, जो यहोवा के सेवक हैं।
ऐसा मनुष्य यदि कोई वचन देता है
    तो वह उस वचन को पूरा भी करता है, जो उसने दिया था।
वह मनुष्य यदि किसी को धन उधार देता है
    तो वह उस पर ब्याज नहीं लेता,
और वह मनुष्य किसी निरपराध जन को हानि पहुँचाने के लिये
    घूस नहीं लेता।

यदि कोई मनुष्य उस खरे जन सा जीवन जीता है तो वह मनुष्य परमेश्वर के निकट सदा सर्वदा रहेगा।

ज़बूर 15:1-5

गुनाह को समझना

मगर जबकि आप ( और मैं ) हमेशा इसी हालत में क़ायम नहीं रहते क्यूंकि जब हम अहकाम की पाबंदी नहीं करते हैं तब हम गुनाह करते हैं । तो फिर गुनाह क्या है ? तौरात की पांच किताबों के बाद पुराने अहद्नामे के किताब की एक आयत ने इसे बेहतर तरीक़े से समझने में मेरी मदद की है ।यह आयत कहती है ।

“उन सब लोगों में हत्थे जवान थे जिन में से हर एक फ़लाख़ुन से बाल के निशान पर बगैर ख़ता किये पत्थर मार सकता था” ।  

कुज़ात 20:16

यह आयत बयान करती है कि वह सिपाही जो फ़लाखुन बाज़ थे वह कभी फ़लाखुन बाज़ी में निशाना चूकते नहीं थे ।तौरेत और पुराने अहद नामे को इब्रानी ज़बान में नबियों के ज़रिये लिखा गया ।  इब्रानी ज़बान में जो लफ्ज़ चूकने के लिए लिखा गया है (יַחֲטִֽא) जिस को इस तरह से तलफ्फुज़ किया गया है (खाव – ताव) वह वही लफ़ज़ है जो गुनाह के लिए भी है । यूसुफ़ को जब मिसर में गुलाम की तरह बेच दिया गया तो ख़ुदा उस के साथ था ।  और वह फ़ोतीफ़ार के महल में रहने लगा था । फ़ोतीफ़ार की बीवी की निय्यत ख़राब थी ।  और वह यूसुफ़ को मजबूर कर रही थी कि उस के साथ हमबिस्तर हो । मगर कलाम कहता है कि यूसुफ़ उस का पीछा छुड़ाकर उस के कमरे से भाग निकला जबकि उस औरत ने यूसुफ़ से गुजारिश की थी ।इन बातों को हम क़ुरान शरीफ़ के सूरा यूसुफ़ में ( 2:22-29) में पढ़ सकते हैं ।  मगर यूसुफ़ ने उस औरत से क्या कहा देखें :

“इस घर में मुझ से बड़ा कोई नहीं , और मेरे आक़ा ने तेरे सिवा कोई चीज़ बाज़ नहीं रखी । क्यूंकि तू उस की बीवी है ।  सो भला मैं क्यूँ ऐसी बड़ी बदी करूं और ख़ुदा का गुनाहगार बनूँ ?।।।

दाइश 39:9

और दस आज्ञाओं के दिए जाने के बाद ही तौरात कहती है:

और दस अहकाम के दिए जाने के फ़ौरन बाद तौरात में हज़रत मूसा ने कहा : तुम डरो मत . . . क्यूंकि ख़ुदा इस लिए आया है कि तुम्हारा इम्तिहान करे और तुमको उस का खौफ़ हो ताकि तुम गुनाह न करो :

ख़ुरूज 20:20

 इन दोनों जगहों में वही इबरानी लफ्ज़ יַחֲטִֽא׃ का इस्तेमाल किया गया जिस का तर्जुमा गुनाह से है । यह बिलकुल हूबहू वही लफ्ज़ है जो फ़लाखुन बाज़ों के न चूकने के लिए इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब है गुनाह । जब बनी इस्राईल एक दुसरे के साथ सुलूक करते थे तो अल्लाह ने एक तस्वीर उन के सामने रखी थी जो हमें समझने में मदद करती है कि गुनाह क्या है ।  एक सिपाही जब एक पत्थर लेकर फ़लाखुन में रखता और निशाना लगाता था तो वह निशाना नहीं चूकता था अगर वह किसी तरह निशाना चूक जाए तो इस का मतलब यह है कि वह अपने मक़सद में नाकाम हो गया ।बिलकुल इसी तरह  अल्लाह ने हमको निशाने पर चलने के लिए (पैदा किया) है ।  यानी उसकी राहों में चलना ही हमारा निशाना होना चाहिए ।पर अगर हम नहीं चलते हैं तो अपने मक़सद में नाकाम हो जाते हैं । और ख़ुदा का मंसूबा हमारी ज़िन्दगी के लिएलिये पूरा नहीं होता । अल्लाह ने हम को पैदा किया  कि हम उस कि इबादत सच्चे दिल से करें और एक दुसरे से सच्चा बरताव करें ।  गुनाह करने का मतलब अपने निशाने से चूक जाना है ।  अल्लाह की पाक मरज़ी यह है कि हम उसके निशाने पर काम करें ।  उसके अहकाम पर चलते वक़्त अगर किसी भी तरह की ला परवाही हो जाती है तो इस का मतलब यह है कि हम अल्लाह के इरादे में चूक गए जो उस ने हमारे लिए ठहराया था ।

मौत : तौरात में गुनाह का अंजाम

सो आप देखें कि इसका अंजाम क्या था ? हम ने सब से पहला इशारा ज़रत आदम की निशानी में देखा था जब आदम ने न फ़रमानी कि थी । (सिर्फ़ एक बार)। इस एक नाफ़रमानी के बाइस अल्लाह ने उसको फानी बना दिया । इस का मतलब यह कि अब वह मर सकता है । यही गुनाह का सिलसिला हज़रत नूह की निशानी के साथ जारी रहता है । मगर अल्लाह ने लोगों का इंसाफ़ मौत के ज़रिये से किया जो एक बड़ा सैलाब बन कर उमंड पड़ा । फिर यह हज़रत लूत की  निशानी के साथ जारी रहा ।  वहां पर भी ख़ुदा का इंसाफ़ मौत के ज़रिये से ही था । यहाँ तक कि हज़रत लूत कि बीवी भी उन मरने वालों में शामिल थी ।  नाफ़रमानी के गुनाह ने उसको नमक का खम्बा बना दिया था ।  हज़रत इब्राहीम के बेटे हज़रत इस्हाक़ को भी मरने की नौबत आगयी थी मगर उस के बदले में एक मेंढा कुर्बान हुआ ।  मुल्क ए मिसर में वबा के दौरान हज़ारों पह्लोठों की मौत हुई ।  इस से बचने के लिए फ़सह को अंजाम देना पड़ा । इस फ़सह को रसम बतोर जारी रखा गया ।  इस से मुताल्लिक़ अल्लाह ने हज़रत मूसा से बात की ।

10 यहोवा ने मूसा से कहा, “आज और कल तुम लोगों को विशेष सभा के लिए अवश्य तैयार करो। लोगों को अपने वस्त्र धो लेने चहिए। 11 और तीसरे दिन मेरे लिए तैयार रहना चाहिए। तीसरे दिन मैं (यहोवा) सीनै पर्वत पर नीचे आऊँगा और सभी लोग मुझ (यहोवा) को देखेंगे। 12-13 किन्तु उन लोगों से अवश्य कह देना कि वे पर्वत से दूर ही रूकें। एक रेखा खींचना और उसे लोगों को पार न करने देना। यदि कोई व्यक्ति या जानवर पर्वत को छूएगा तो उसे अवश्य मार दिया जाएगा। वह पत्थरों से मारा जाएगा या बाणों से बेधा जाएगा। किन्तु किसी व्यक्ति को उसे छूने नहीं दिया जाएगा। लोगों को तुरही बजने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसी समय उन्हें पर्वत पर जाने दिया जाएगा।”

निर्गमन 19: 10-12

यह नमूना पूरे तौरात में जारी रहता है मगर अफ़सोस कि अक्सर बनी इस्राईल अल्लाह के इन अहकाम पर क़ायम नहीं रहे । (उन्हों ने गुनाह किया) । यहां तक कि वह तौबा के बगैर मुक़द्दस मुक़ाम में दाखिल हुए ।  यहाँ गौर करें कि इस का अंजाम क्या हुआ ।

 इस्राएलियों ने मूसा से कहा, “हम मर जाएंगे! हम खो गए, हम सब खो गए! जो कोई भी प्रभु के समीप आता है वह मर जाएगा। क्या हम सब मरने वाले हैं? ”

गिनती 17:12-13

हज़रत हारुन हज़रत मूसा के भाई थे ।उन के खुद के दो बेटे गुनाह कि हालत में मुक़द्दस मुक़ाम में दाखिल होने के सबब से उनकी मौत हुई ।

   हारून के दो पुत्र यहोवा को सुगन्ध भेंट चढ़ाते समय मर गए थे। फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपने भाई हारून से बात करो कि वह जब चाहे तब पर्दे के पीछे महापवित्र स्थान में नहीं जा सकता है। उस पर्दे के पीछे जो कमरा है उसमें पवित्र सन्दूक रखा है। उस पवित्र सन्दूक के ऊपर उसका विशेष ढक्कन लगा है। उस विशेष ढक्कन के ऊपर एक बादल में मैं प्रकट होता हूँ। यदि हारून उस कमरे में जाता है तो वह मर जायेगा!

अह्बार 16:1-2

न सिर्फ़ हज़रत हारुन के दो बेटों की वफ़ात न फ़रमानी की वजह से हुई बल्कि खुद हारून को भी अल्लाह ने हिदायत दी कि वह पाक तरीन मुक़ाम में बिला वजह बगैर कफ़फ़ारह के खून के न जाया करे वरना उन की भी मौत हो सकती है । क्यूंकि वहां सर्पोश रखी हुई थी ।

मैं (अर्थात अल्लाह) आपको (अर्थात् हारून) उपहार के रूप में पुरोहित की सेवा दे रहा हूँ। अभयारण्य के पास जो भी आता है उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है।

गिनती 18:7

बाद में कुछ बेटियां जिन के कोई भाई नहीं थे हज़रत मूसा के पास पहुँच कर ज़मीन की विरासत कि मांग करने लगीं ।उनका बाप सलाफ़हाद क्यूं मरा था ?

 “हमारे पिता जंगल में मर गए। वह कोरह के अनुयायियों में से नहीं था, जिसने प्रभु के खिलाफ एक साथ बंधे, लेकिन वह अपने पाप के लिए मर गया और कोई पुत्र नहीं छोड़ा। ”

गिनती 27:3

सो हज़रत मूसा के ज़माने में ही एक आलमगीर शरीयत का नमूना क़ायम हो चुका था जिसको तौरेत के ज़माने के आखिर में एक किताबी शक्ल दे दिया गया था

…….. इस बतोर कि हर कोई शख्स अपने ही गुनाह के लिए ज़िम्मे दार होगा यानी कि मरेगा

इस्तिसना 24:16

अल्लाह बनी इसराईल को (हम को) सिखा रहा था कि गुनाह का अंजाम मौत है ।

अल्लाह का रहम

मगर अल्लाह के रहम की बाबत क्या कहना ? क्या यह सबूत (क़ानून) हर जगह नाफ़िज़ की गई थीं ? क्या हम इस से कुछ सीख सकते हैं ? जी हां ! और जी हां ! यह हमारे लिए समझना ज़रूरी है कि जिस किसी ने गुनाह किया है और जिस में रास्त्बाज़ी की कमी पाई जाती है इस रहम की सूरत पर धियान दे ।  यह पहले ही से गिनती के कुछ निशानों में ज़ाहिर कर दिया गया है । अब इसे ज़ियादा साफ़ तोर पर हज़रत हारून की निशानी में देखा जा सकता है । यानी एक गाय और दो बकरों के निशान में ।

जी हाँ मैं तमाम अहकाम की पाबन्दी कर रहा हूँ

मुबारक हो ! इंसाफ़ का दिन जो आने वाला है इस्में आप और ज़ियादा भरोसे मंद और महफूज़ हो सकते हैं -अगर आप हमेशा तमाम अहकाम को मानते हैं तो आप रास्त्बाज़ी के हक़दार हैं – मैं किसी को शख्सी तोर से नहीं जानता -जिस ने इस तरीके से अहकाम की पाबंदी की हो तो सच मुच यह एक बड़ी कर्नुमायाँ है – मगर आप अपनी कोशिश को न रोकें बल्कि आप इस सीधी राह को अपनी ज़िन्दगी भर जारी रखना ज़रूरी होगा –

मैं ने बयान किया था कि शरीअत के इन दस अहकाम को मौखूफ़ नहीं किया जा सकता था क्यूंकि इन का ताल्लुक़ एक ख़ुदा की इबादत करने , ज़िना न करने , चोरी न करने , और सच्चाई पर क़ायम रहने के मामलात से जुड़ा हुआ था -बल्कि नबियों ने और ज़ियादा इन अहकाम पर पाबन्द होने के लिए जोर दिया था -ज़ेल में वह  बातें हैं जो ईसा अल मसीह (अलै) ने इंजील ए शरीफ़ में कहा कि किस तरह इन दस अहकाम की पाबंदी करनी है -वह अपनी तालीम में फ़रीसियों से मुख़ातब था -यह उस के ज़माने के मज़हबी उस्ताद थे जो शरीअत से वाक़िफ़कार थे – वह लोग बहुत मज़हबी और अपने ज़माने के आलिम उलमा माने जा सकते थे –

दस अहकाम पर हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के अलफ़ाज़

20 मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जब तक तुम व्यवस्था के उपदेशकों और फरीसियों से धर्म के आचरण में आगे न निकल जाओ, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं पाओगे।

क्रोध

21 “तुम जानते हो कि हमारे पूर्वजों से कहा गया था ‘हत्या मत करो [a] और यदि कोई हत्या करता है तो उसे अदालत में उसका जवाब देना होगा।’ 22 किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जो व्यक्ति अपने भाई पर क्रोध करता है, उसे भी अदालत में इसके लिये उत्तर देना होगा और जो कोई अपने भाई का अपमान करेगा उसे सर्वोच्च संघ के सामने जवाब देना होगा और यदि कोई अपने किसी बन्धु से कहे ‘अरे असभ्य, मूर्ख।’ तो नरक की आग के बीच उस पर इसकी जवाब देही होगी।

23 “इसलिये यदि तू वेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहा है और वहाँ तुझे याद आये कि तेरे भाई के मन में तेरे लिए कोई विरोध है 24 तो तू उपासना की भेंट को वहीं छोड़ दे और पहले जा कर अपने उस बन्धु से सुलह कर। और फिर आकर भेंट चढ़ा।

25 “तेरा शत्रु तुझे न्यायालय में ले जाता हुआ जब रास्ते में ही हो, तू झटपट उसे अपना मित्र बना ले कहीं वह तुझे न्यायी को न सौंप दे और फिर न्यायी सिपाही को, जो तुझे जेल में डाल देगा। 26 मैं तुझे सत्य बताता हूँ तू जेल से तब तक नहीं छूट पायेगा जब तक तू पाई-पाई न चुका दे।

व्यभिचार

27 “तुम जानते हो कि यह कहा गया है, ‘व्यभिचार मत करो।’ [b] 28 किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि यदि कोई किसी स्त्री को वासना की आँख से देखता है, तो वह अपने मन में पहले ही उसके साथ व्यभिचार कर चुका है। 29 इसलिये यदि तेरी दाहिनी आँख तुझ से पाप करवाये तो उसे निकाल कर फेंक दे। क्योंकि तेरे लिये यह अच्छा है कि तेरे शरीर का कोई एक अंग नष्ट हो जाये बजाय इसके कि तेरा सारा शरीर ही नरक में डाल दिया जाये। 30 और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझ से पाप करवाये तो उसे काट कर फेंक दे। क्योंकि तेरे लिये यह अच्छा है कि तेरे शरीर का एक अंग नष्ट हो जाये बजाय इसके कि तेरा सम्पूर्ण शरीर ही नरक में चला जाये।

मत्ती 5:20 -30

इस के अलावा हज़रत ईसा अल मसीह के रसूल —उसके साथी – हम नशीन उन्हों ने भी बुत परस्ती की बाबत तालीम दी -उन्हों ने तालीम दी कि बुत परस्ती सिर्फ़ पत्थर की परस्तिश करना ही नहीं है बल्कि किसी भी चीज़ को इबादत में अल्लाह के साथ शरीक करना बुतपरस्ती है – और इस में दौलत भी शामिल है – चुनांचे आप गौर करेंगे कि वह तालीम देते हैं कि लालच भी एक तरह की बुत परस्ती है , क्यूंकि एक लालची शख्स ख़ुदा के साथ दौलत की भी इबादत करता है -ईसा अल मसीह ने फ़रमाया कि “तुम ख़ुदा और दौलत दोनों की ख़िदमत नहीं कर सकते”-

इसलिए तुममें जो कुछ सांसारिक बातें है, उसका अंत कर दो। व्यभिचार, अपवित्रता, वासना, बुरी इच्छाएँ और लालच जो मूर्ति उपासना का ही एक रूप है, इन ही बातों के कारण परमेश्वर का क्रोध प्रकट होने जा रहा है। [a]

कुलुस्सियों 3:5,6

तुममें न तो अश्लील भाषा का प्रयोग होना चाहिए, न मूर्खतापूर्ण बातें या भद्दा हँसी ठट्टा। ये तुम्हारी अनुकूल नहीं हैं। बल्कि तुम्हारे बीच धन्यवाद ही दिये जायें। क्योंकि तुम निश्चय के साथ यह जानते हो कि ऐसा कोई भी व्यक्ति जो दुराचारी है, अपवित्र है अथवा लालची है, जो एक मूर्ति पूजक होने जैसा है। मसीह के और परमेश्वर के राज्य का उत्तराधिकार नहीं पा सकता।

देखो, तुम्हें कोरे शब्दों से कोई छल न ले। क्योंकि इन बातों के कारण ही आज्ञा का उल्लंघन करने वालों पर परमेश्वर का कोप होने को है।

और इफ़सियों 5:4-6

यह तशरीहात असली दस अहकाम की तरफ़ रुजू कराती हैं जो एक बड़ी हद तक बाहरी आमाल के साथ बर्ताव करते हुए अंदरूनी तहरीक (मक़ासिद) की तरफ़ लेजाती हैं जिसे सिर्फ़ अल्लाह त आला ही देख सकता है – यह शरीअत को और ज़ियादा मुश्किल बना देती हैं –

आप अपने जवाब पर दुबारा गौर कर सकते हैं कि क्या आप दस अहकाम की पाबन्दी कर रहे हैं – पर अगर आप को यक़ीन है कि आप सारे अहकाम की पाबन्दी कर रहे हैं तो इंजील के मुताबिक़ आप के लिए किसी मक़सद का हाल नहीं है – और आप के लिए कोई ज़रुरत भी नहीं है कि आगे किसी निशान के पीछे चलें या इंजील -ए- शरीफ़ को समझने की कोशिश करें -यह इसलिए कि इंजील सिर्फ़ उन्ही के लिए है जो शरीअत की पाबंदी से नाकाम रहते हैं उनके लिए नहीं जो इस के पाबन्द हैं – ईसा अल मसीह ने इस बात को इस तरह से समझाया.

 

10 ऐसा हुआ कि जब यीशु मत्ती के घर बहुत से चुंगी वसूलने वालों और पापियों के साथ अपने अनुयायियों समेत भोजन कर रहा था 11 तो उसे फरीसियों ने देखा। वे यीशु के अनुयायियों से पूछने लगे, “तुम्हारा गुरु चुंगी वसूलने वालों और दुष्टों के साथ खाना क्यों खा रहा है?”

12 यह सुनकर यीशु उनसे बोला, “स्वस्थ लोगों को नहीं बल्कि रोगियों को एक चिकित्सक की आवश्यकता होती है। 13 इसलिये तुम लोग जाओ और समझो कि शास्त्र के इस वचन का अर्थ क्या है, ‘मैं बलिदान नहीं चाहता बल्कि दया चाहता हूँ।’ [a] मैं धर्मियों को नहीं, बल्कि पापियों को बुलाने आया हूँ।”

मत्ती 9 :10 -13

कितना कुछ हमें शरीयत की पाबंदी करनी ज़रूरी है ?

कभी कभी मुझ से पूछा जाता है कि अगर अल्लाह सच मुच हम से तवक़क़ो रखता और सौ फ़ीसदी फ़रमान बरदारी की उम्मीद करता है ? हम इस की बाबत इंसानों के दरमियान बहस कर सकते हैं ।  मगर इस सवाल का जवाब इंसानों के ज़रिये नहीं बल्कि अल्लाह की जानिब से ही मिलेगा ।  सो बजाए इस के कि मैं तौरात से आयतों को चुनूं जो हम से कहते हैं कि फ़रमान बरदारी के फैलाव के लिए या इस में क़दम बढ़ाने के लिए कीं बातों की ज़रुरत है या कीं बातों की उम्मीद की जाती है ।  ज़ेल में कुछ बातें हैं उनपर गौर करें या आप खुद पता लगाएं कि इनसे मुताल्लिक़ कितनी आयतें कितनी साफ़ तोर पर बयान करती हैं । यह आयतें इस तरह कि मुहावरों से भरी हैं जैसे : “ख़बरदारी से शरीयत की पाबन्दी करो”…“तमाम अहकाम की पाबन्दी करो”…“खबरदारी से पाबन्दी करो”…. “अपने पूए दिल से इन्हें मानो”…“हर हमेशा शरीयत की बातों पर धियान दो”…“पूरी फ़र्मान्बर्दारी करो”… “शरीयत की तमाम बातों को सुनो” वगैरा वगैरा ।

इस फ़रमान बरदारी का 100 % फ़ीसदी मेयार बाद के नबियों के ज़माने में कभी नहीं बदला ।  न ही इंजील में ईसा अल मसीह के ज़माने में ।

17 “यह मत सोचो कि मैं मूसा के धर्म-नियम या भविष्यवक्ताओं के लिखे को नष्ट करने आया हूँ। मैं उन्हें नष्ट करने नहीं बल्कि उन्हें पूर्ण करने आया हूँ। 18 मैं तुम से सत्य कहता हूँ कि जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।

19 “इसलिये जो इन आदेशों में से किसी छोटे से छोटे को भी तोड़ता है और लोगों को भी वैसा ही करना सिखाता है, वह स्वर्ग के राज्य में कोई महत्व नहीं पायेगा। किन्तु जो उन पर चलता है और दूसरों को उन पर चलने का उपदेश देता है, वह स्वर्ग के राज्य में महान समझा जायेगा।

मत्ती 5:17- 19

और हज़रत मोहम्मद सल्लम ने इस से मुताल्ल्लिक़ जो बात कही इस का ज़िक्र पाया जाता है ।

नाराज़ अब्दुल्ला इब्न उमर: .. यहूदियों का एक समूह आया और अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) को क्वफ में आमंत्रित किया। … उन्होंने कहा: Q अबुलकसीम, हमारे एक आदमी ने एक महिला के साथ व्यभिचार किया है; इसलिए उन पर फैसला सुनाएँ। ‘ उन्होंने अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) के लिए एक गद्दी रखी जो उस पर बैठ गया और कहा: “टोरा लाओ”। इसे तब लाया गया था। फिर उसने अपने नीचे से गद्दी वापस ले ली और यह कहते हुए तोराह पर रख दिया: “मैं तुम पर विश्वास करता था और तुम कौन हो।”

सुनन अबू दाऊद किताब 38 ।  सफ़्हा नंबर 4434

और यही एक बात काबिल ए क़बूल है कि अल्लाह जन्नत को तैयार कर रहा है और यह कामिल और मुक़द्दस मुक़ाम है जहां वह सुकूनत करता है ।  वहां न पुलिस है न फ़ौज ।  न वहां क़ुफुल ताले की ज़रुरत है । वहां पर मुहाफ़िज़ों की भी ज़रुरत नहीं है । आज हमें दुनया में रहते हुए खुद को और दूसरों के गुनाह और उसके असरात से हिफाज़त करने की ज़रुरत है ।  यही हमारे लिए जन्नत साबित होगा ।  मगर इस कामिल और मुक़द्दस मुक़ाम में सिर्फ़ कामिल लोग ही दाखिल हो सकते हैं । और वह कामिल लोग कौन हैं ? वह कामिल लोग जो तमाम अहकाम को “हमेशा”  “पूरी तरह से” और हर बात में मानने के लिए तैयार रहते हैं ।

यहाँ तौरेत शरीयत के अहकाम की फ़रमानबरदारी में आगे बढ़ने के लिए जिस बात की ज़रुरत को बताती है वह यह है कि                                  

बाइबिल (अल किताब ) का तर्जुमा कैसे हुआ

 बाइबिल या अल किताब आमतौर पर इसकी असली ज़बानों  (हिब्रू और यूनानी ) में नहीं पढ़ी जाती है।इसका मतलब  यह नहीं कि  यह इन असली जवान में मौजूद नहीं है। यह मौजूद है, और विद्वान लोग यूनानी  और हिब्रू का अध्ययन जामीया  मै एक मकसद के साथ करते है ताकी वह अल किताब को उसकी असली जवान मे पड़ और उसका अध्ययन कर सके।(मूल हिब्रू में तोरा यहां देखें, और मूल  यूनानी मे इंजील शरीफ यहां देखें ) यह अक्सर ऐसा होता है बाइबल के पेशेवर  उस्ताद  इसका अध्ययन करते रहते हैं।लेकिन आमतौर पर नियमित विश्वासी अल किताब को असली जवान मे नहीं पड़ते बल्कि अपनी मात्र ज़ुबान  मे किये गए तर्जुमे मे अल किताब को पढ़ते हैं, इसलिए बाइबिल(अल-किताब ) अक्सर अपनी असली ज़ुबान मै नहीं देखी जाती है, और कुछ सोचते है कि असली(मूल) ज़ुबान  खो गयी हैं, और अन्य सोचते है कि तर्जुमा की प्रकिया को आगे बढ़ाते समय भ्रस्टाचार  को बढ़ावा मिला है, इन नतीजों पर कूदने से पहले, अल-किताब या बाइबिल के तर्जुमे की प्रक्रिया को समझना बेहतर है, इस लेख मै हम यही करेंगे।

 तर्जुमा बनाम लिप्यंतरण(उच्चारण )(शब्दो को एक लिपि से दूसरी लिपि में परिवर्तित करना)

हमें पहले तर्जुमे की कुछ बुनियादी बातों को समझना होगा,  तर्जुमेकार कभी कभी मायने के वजाये समान आवाज़ से तर्जुमा करना चुनते हैं, खासकर जब नाम और शीर्षक की बात आती है, यही लिप्यंतरण(उच्चारण) के रूप मै माना जाता है, नीचे दी गयी तस्वीर के उदाहरण मै तर्जुमा और लिप्यंतरण के बीच के फर्क को देख सकते हैं. गॉड लफ्ज को अरबी से अंग्रेजी मे लाने के लिए दो तरीके चुन सकते हैं। अगर आप मायने के रूप मै तर्जुमा करें तो गॉड लफ्ज़ मिलता है या अगर आप आवाज़ के रूप मै तर्जुमा करें तो अल्लाह लफ्ज मिलता है, 

 तर्जुमा बनाम लिप्यंतरण(उच्चारण)                                                                                                                                               

यहां गॉड लफ्ज़ का इस्तेमाल यह बताने के लिए होता है कि इस तरीके को कैसे हम एक ज़ुबान से दूसरी जुबान  मै तर्जुमा या लिप्यंतरण(उच्चारण) को कर सकते हैं।

 हाल के सालों में अंग्रेजी और अरबी के बीच बड़े हुए विनिमय  के साथ शब्द ‘अल्लाह’ अंग्रेजी भाषा में एक पहचान वाला लफ्ज़ बन गया है जिसका मतलब गॉड होता है. उसमे शीर्षक और खास शब्दो के तर्जुमा या लिप्यंतरण मै चूनाव लेते समय कोई सही या गलत विकल्प नहीं है.   यह भाषा को सूनने वाले पर निर्भर करता है की वह इसको कितनी अच्छी तरह समझ सकता है या स्वीकार करता है .

 सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  

 बाइबिल का पहला तर्जुमा तब हुआ था जब यहूदी  का पुराना नियम(तौरेत और जबूर) का यूनानी ज़ुबान मै तर्जुमा 250 बी सी मै हो गया था। इस तर्जुमें को यूनानी पुराने नियम (या llx  ) के रूप मे जानते हैं और यह बहुत प्रभावशाली था, क्योकि नया नियम(इंजील सरीफ) यूनानी ज़ुबान मै लिखा गया था, इसलिए पुराने नियम के कई उद्धरण यूनानी सेप्टुआजेंट से लिए गए थे

सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) मै तर्ज़ुमा और लिप्यंतरण

 नीचे दिए गए आंकड़े से यह पता चलता है कि यह सब आधुनिक दिनों की बाइबिल(अल- किताब) को कैसे प्रभावित करता है जहां अनुवाद  चरण चतुष्कोणों(वृत्त का चतुर्थ भाग) में दिखाए जाते हैं।

बाइबिल   = (अलकिताब ) आधुनिक भाषा मैं,   (उदाहरण -अंग्रेजी)
यह आधुनिक भाषा में बाइबिल (अल किताब) की अनुवाद प्रक्रिया को दर्शाता है,

मूल इब्रानी  पुराना नियम(तौरेत और ज़बूर) चतुर्थांश # 1 में है  और आज  मेसोरेटिक पाठ (आधिकारिक इब्रानी ) और मृत सागर हस्तलिपियों में आसानी से मिलती है।क्योंकि सेप्टुआजेंट( इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) एक  इब्रानी था -> यूनानी  अनुवाद में इसे तीर के रूप में # 1 से # 2 तक जाने वाले तीर के रूप में दिखाया गया है। नया नियम(इंजील) खुद मूल रूप से यूनानी मै लिखा गया था तो इसका मतलब नंबर 2 मै पुराना नियम(तौरेत, जबूर) और नया नियम(इंजील) शामिल है, नीचे के आधे भाग में (नंबर 3) बाइबल का नयी भाषा अनुवाद है (मिशाल के तौर पर अंग्रेजी). वहां जाने के लिए पुराना नियम(तौरेत, ज़बूर) का अनुवाद मूल इब्रानी भाषा मै किया गया है, (1 -> 3 ) और नया नियम(इंजील)  यूनानी मै अनुवादित है (2  -> 3). अनुवादकों को लिप्यंतरण(उच्चारण)  या नामों और शीर्षकों के अनुवाद के बारे में ज़रूर निर्णय लेना चाहिए जैसा की पहले से बताया गया है,  यह हरे रंग के तीर के साथ चित्रित किया गया है की लिप्यांतरण (उच्चारण) और अनुवाद, यह दर्शाता है कि अनुवादक या तो दृष्टिकोण ले सकते हैं।

 सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) बाइबल के बदलने के सवाल पर गवाह

चूंकि 250 ईसा पूर्व के आसपास सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  का इब्रानी भाषा से तर्जुमा किया गया था।  हम देख सकते हैं (यदि हम ग्रीक को इब्रानी  में वापस अनुवाद करते हैं) तो इन अनुवादकों ने अपने इब्रानी पांडुलिपियों में जो अनुवाद किया था, उसमे  क्या था। चूंकि ये ग्रंथ लगभग समान हैं, यह दर्शाता है कि पुराने नियम(तौरेत,ज़बूर)  का पाठ कम से कम 250 ईसा पूर्व से नहीं बदला है। यदि किसी ने (ईसाई, यहूदी या किसी और ने) पुराने नियम(तौरेत , ज़बूर ) को बदल दिया और उसे भ्रष्ट कर दिया, तो सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  इब्रानी पाठ से अलग होना चाहिए। लेकिन वे मूल रूप से समान हैं।

इसी तरह, यदि उदाहरण के लिए, अलेक्जेंड्रिया और मिस्र में किसी ने सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) को ही भ्रष्ट कर दिया था, तो सिकंदरिया में सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) पांडुलिपि की प्रतियां मध्य पूर्व और भूमध्यसागरीय में अन्य सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  पांडुलिपियों से अलग होंगी। लेकिन वे एक ही हैं। तो घटना हमें बिना किसी विरोधाभास के बताती है कि पुराना नियम(तौरेत, ज़बूर) बदला नहीं है।

 तर्जुमा मै सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)

आधुनिक तर्जुमा में मदद के लिए सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) का भी इस्तेमाल किया जाता था । तर्जुमा आलिम सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) का इस्तेमाल  इस दिन करने के लिए करते है ताकि उन्हें पुराने नियम(तौरेत और ज़बूर) के कुछ कठिन भागों का तर्जुमा करने के लिए मदद मिल सके।यूनानी बहुत अच्छी तरह से समझी जाती है,  और कुछ मार्गों में जहां इब्रानी मुश्किल है तर्जुमेकार देख सकते हैं कि 2250 साल पहले सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  तर्जुमेकारो ने इन अस्पष्ट मार्गों को कैसे समझा। तर्जुमे, लिप्यंतरण और सेप्टुआजेंट को समझने में हमें यह समझने में मदद मिलती है कि ‘मसीह’  और ‘मसीहा’ शब्द कहां से आए हैं क्योंकि ये शब्द ईसा (या जीसस – पीबीयूएच) से संबंधित हैं, जिन्हें समझने के लिए हमें  इंजिल शरीफ का संदेश  समझने की जरूरत है। हम इसे आगे देखते हैं।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने किसकी क़ुर्बानी दी , इस्माईल की या इस्हाक़ की?

जब हम नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत जब हम बात करते हैं तो मेरे दोस्त लोग इसरार करते हैं कि बेटा जो कुर्बान होने को था वह इस्माईल था जो हज़रत इब्राहीम का बड़ा बेटा था जो हाजरा से था, छोटा बेटा इस्हाक़ नहीं था जो सारह से था। मगर मैं ने जब कुरान शरीफ़ में इस के बारे में पढ़ा तो मैं ता’ज्जुब में पढ़ गया।  जब मैं ने अपने दोस्तों को दिखाया तो वह लोग भी ताज्जुब करने लगे।  इब्राहीम के निशान 3 में मैं ने इस अहम् वक़िये को देखा जहां पूरी इबारत का हवाला दिया गया है। सो यह इबारत क्या कहती है? ख़ास आयत को दोबारा से दोहराया गया है। 

फिर जब इस्माईल अपने बाप के साथ दौड़ धूप करने लगा तो (एक दफा) इबराहीम ने कहा बेटा खूब मैं (वही के ज़रिये क्या) देखता हूँ कि मैं तो खुद तुम्हें ज़िबाह कर रहा हूँ तो तुम भी ग़ौर करो तुम्हारी इसमें क्या राय है इसमाईल ने कहा अब्बा जान जो आपको हुक्म हुआ है उसको (बे तअम्मुल) कीजिए अगर खुदा ने चाहा तो मुझे आप सब्र करने वालों में से पाएग

अल-सफ़फ़ात 37:102

इस इबारत में हज़रत इब्राहीम के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत बेटे के नाम का ज़िक्र तक नहीं  किया गया है और ऐसी हालत में और ज़ियादा कलाम की खोज और मुताला करनी चाहिए। अगर आप पूरी कुरान शरीफ़ में नबी इस्माईल के नाम की तलाश करेंगे तो आप देखेंगे कि 12 मर्तबा उस के नाम का ज़िकर आया हुआ है।

°  इन बारह में से दो मर्तबा अपने बाप इब्राहीम के साथ उस का नाम आया हुआ है (2:125, 2:127)

°  बाक़ी बचे दस में से पांच मर्तबा उसका नाम इब्राहीम के साथ अपने भाई इस्हाक़ के साथ आया हुहै (2:133, 2:136, 2:140, 3:84, 4:163)।

°  बाक़ी बची पांच इबारतें अपने बाप इब्राहीम के नाम के बगैर ज़िकर किया गया है, मगर दीगर नबियों की फ़ेहरिस्त के साथ (6:86, 14:39, 19:54, 21:85, 38:48)।

दो मर्तबा उस का नाम अपने बाप हज़रत इब्राहीम के साथ ज़िकर हुआ है। आप इसको दुआ के दीगर वाक़ियात में देख सकते हैं –  न कि क़ुर्बानी के सिलसिले में।

 (ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो

अल – बक़रह 2:125

और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है

अल – बक़रह 2:127

कुरान शरीफ़ कभी भी  तअय्युन नहीं करता कि क़ुर्बानी के लिए इस्माईल को क़ुरबानगाह पर रखकर ख़ुदा के ज़रिये उसके बाप इब्ररहीम (अलैहिस्सलाम) का इम्तिहान लिया गया था। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘बेटे’ को कहता है। सो मुझे नहीं मा’लूम कि ऐसा क्यूँ यकीन किया जाता है कि वह इसमाईल था जिसे क़ुर्बानी के लिए नज़र किया गया था। 

हज़रत इब्राहीम के बेटे की क़ुर्बानी पर शरह (तफ़सीर)

यूसुफ अली कुरान शरीफ़ के एक मुअज़ज़िज़ मुफ़स्सिर और मुतर्जिम भी हैं।  उनकी तफ़सीर http://al-quraan.info में दस्तियाब है।

बेटे की क़ुर्बानी दिए जाने की तफ़सीर ज़ेल के दो हाशियों पर क़ुरबानी की इबारत मरक़ूम है :

4071 यह सीरिया और फ़लिस्तीन के ज़रखेज़ इलाक़े में था।  लड़का जो पैदा हुआ था वह मुस्लिम रिवायत के मुताबिक था, और वह इब्राहीम का पह्लोठा बेटा था या’नि इस्माईल – यह नाम खुद् ब खुद लफ़ज़ के असल समि’ आ से है जिस के मायने हैं सुनना। इसलिए कि ख़ुदा ने इब्राहीम की दुआ सुन ली थी (आयत 100) जब इस्माईल पैदा हुआ था तो उस वक़्त इब्राहिम की उम्र 86 थी

पैदाइश 16:16

।  इस हिसाब से देखा जाए तो इस्माईल इस्हाक़ से 14 साल बड़ा था। उसके पहले 14 सालों में इस्माईल ही इब्राहीम का एकलौता बेटा था इस के बाद जब इस्हाक़ पैदा हुआ तो वही उस का एकलौता बन गया। इस के बावजूद भी जब हम क़ुर्बानी की बात करते हैं तो पुराना अहद नामा कहता है (पैदाइश 22:2) “तब ख़ुदा ने कहा तू अपने बेटे इस्हाक़ को जो तेरा एकलौता है और जिसे तू प्यार करता है ,अपने साथ लेकर मोरियाह के मुल्क में जा और वहां उसे पहाड़ों में से एक पहाड़ पर जो मैं तुझे बताऊंगा सोख़तनी क़ुर्बानी के तोर पर चढ़ा …”   

ज़ेल के इस हाशिये में वह बहस करता है कि जबकि तौरात कहती है कि ‘तू अपने को ले जो तेरा एकलोता है …..” (पैदाइश 22:2) और इस्माईल 14 साल का था, इस लिए सिर्फ़ इस्माईल को ही एकलोता बेटा बतोर क़ुर्बानी के लिए नज़र किया जा सकता था। मगर वह भूल जाता है कि इस से पहले पैदाइश 21 में उसने इस्माईल आर हाजरा को अपने ख़ानदान से दूर कर दिया था तो इस्हाक़ ही वाजिब तोर से उस का एकलोता बेटा ठहरा – यहाँ ज़ेल में कुछ और बातें तफ़सील से दी गई हैं :

इब्राहीम का बेटा क़ुर्बान हुआ : तौरात की गवाही

तो फिर कुरान शरीफ़ तअय्युन नहीं करता कि किस बेटे को क़ुर्बानी के लिए नज़र किया गया था मगर तौरात में साफ़ लिखा है-आप देख सकते हैं कि तौरात में पैदाइश के 22 बाब में इस्हाक़ के नाम को फ़रक़ फ़रक़ औक़ात में 6 बार ब्यान करता है : देखें (22:2, 3, 6, 7 और 9 आयत में दो बार)-

तौरात का हज़रत मुहम्मद (सल्लम) के ज़रिये तस्दीक़ किया जाना 

तौरात जो आज की तारीख़ में मौजूद है उसको हज़रत मोहम्मद (सल्लम)के ज़रिये किये जाने का साफ़ बयान हदीसों में मौजूद है। इस से ताल्लुक़ रखते हुए कई एक हदीसें मेरे पास मौजूद हैं जिन में से एक बयान करता है : मुलाहजा फरमाएं :

 नाराज़ अब्दुल्ला इब्न उमर: .. यहूदियों का एक समूह आया और अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) को क्वफ में आमंत्रित किया। … उन्होंने कहा: Q अबुलकसीम, हमारे एक आदमी ने एक महिला के साथ व्यभिचार किया है; इसलिए उन पर फैसला सुनाएँ। ‘ उन्होंने अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) के लिए एक गद्दी रखी जो उस पर बैठ गया और कहा: “टोरा लाओ”। इसे तब लाया गया था। फिर उसने अपने नीचे से गद्दी वापस ले ली और यह कहते हुए तोराह को रख दिया: “मैं तुम पर विश्वास करता था और तुम कौन हो।” :

सुनन अबू दाऊद, किताब 38 सफ़्हा 4434:

तौरात का नबी हज़रत ईसा अल – मसीह (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये तस्दीक़ किया जाना

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने भी तौरात को पूरे दा’वे के साथ तसदीक़ की है जिस के बयानात को हम ने यहाँ देखा -उसकी तरफ़ से एक ता’लीम इस तरह है देखें :

18 मैं तुम से सत्य कहता हूँ कि जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।19 “इसलिये जो इन आदेशों में से किसी छोटे से छोटे को भी तोड़ता है और लोगों को भी वैसा ही करना सिखाता है, वह स्वर्ग के राज्य में कोई महत्व नहीं पायेगा। किन्तु जो उन पर चलता है और दूसरों को उन पर चलने का उपदेश देता है, वह स्वर्ग के राज्य में महान समझा जायेगा।

मत्ती 5:18-19

  चौकन्ना होना : रिवायात तौरात पर कभी हावी नहीं होती

किसी रिवायत का वास्ता देकर हज़रत मूसा के ज़रिये लिखी गई तौरात को ख़ारिज कर देना समझदारी नहीं है।  दरअसल हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) ने अपने ज़माने के मज़हबी रहनुमाओं की बाक़ायदा तौर से नुक्ताचीनी की थी क्यूंकि वह लोग मूसा की शरीयत के साथ अपनी रिवायात का इज़ाफ़ा अपने मतलब के लिए करदेते थे जिसतरह हम यहाँ देखते हैं :

  यीशु ने उत्तर दिया, “अपने रीति-रिवाजों के कारण तुम परमेश्वर के विधि को क्यों तोड़ते हो? क्योंकि परमेश्वर ने तो कहा था ‘तू अपने माता-पिता का आदर कर’ [a] और ‘जो कोई अपने पिता या माता का अपमान करता है, उसे अवश्य मार दिया जाना चाहिये।’ [b] किन्तु तुम कहते हो जो कोई अपने पिता या अपनी माता से कहे, ‘क्योंकि मैं अपना सब कुछ परमेश्वर को अर्पित कर चुका हूँ, इसलिये तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।’ इस तरह उसे अपने माता पिता का आदर करने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार तुम अपने रीति-रिवाजों के कारण परमेशवर के आदेश को नकारते हो। ओ ढोंगियों, तुम्हारे बारे में यशायाह ने ठीक ही भविष्यवाणी की थी। उसने कहा था:

मत्ती 15: 3 – 7

नबी की तंबीह पैग़ाम को रिवायात की खातिर कभी भी बातिल या मनसूख़ करने के लिए कभी नहीं है यह बिलकुल साफ़ है।

मौजूदा तौरात की गवाही बहीरा -ए- मुरदार के तूमार की तसदीक़ करती है

ज़ेल का नक्शा बताता है कि जो सब से क़दीम तौरात के तूमार हैं वह बहीरा -ए- मुरदार के तूमार हैं, जिन की तारीख़ लग भाग 200 क़ब्ल मसीह है – (इस से भी ज़ियादा ज़ेल के नक्शे में यहाँ है। इस का मतलब यह है कि जिस तौरात का हवाला हज़रत मोहम्मद (सल्लम) और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने दिया था वह वही है, जिन का मौजूदा दौर में इस्तेमाल किया जा रहा है ।

The Bible through time

जो कुछ नबियों ने ज़ाहिर किया है उस की तरफ़ वापस लौटते हुए यह सवाल हमारे लिए साफ़ करती है।

तौरात से : नबी इस्माईल (अलैहिस्सलाम) का बयान क्या है ?

हज़रत इस्माईल की ज़िन्दगी में जो भी कुछ हुआ इस कि बाबत बहुत सारी ग़लत फ़हमियां हैं। तौरात को जो कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से 3500 साल पहले लिखा गया थाउन के बारे में सही वाक़िया बताने में हमारी मदद करती है। अल्लाह ने इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) कि वह उन को बरकत देगा और उनकी औलाद को समुन्दर के किनारे की रेत की तरह या आसमान के तारों की मानिंद कर देगा (यहाँ देखें)। हज़रत इब्राहीम ने आखिरकार अपनी दो बीवियों से दो बेटे हासिल किये थे।  मगर उन दो बीवियों के दरमियान रक़ाबत के सबब से हाजरा और इस्माईल दोंनों को घर से बाहर होना पड़ा। यह रक़ाबत दो मरहलों से होकर गुज़रा। पहला मरहला था ह्ज़रत इस्माईल के पैदा होने के बाद का था और दूसरा मरहला हज़रत इस्साक़ के पैदा होने से पहले का था। यहां तौरात इस रक़ाबत की बाबत जो कहती है वह यह कि किसतरह अल्लाह ने हाजरा की हिफ़ाज़त की, उस पर ज़ाहिर होकर हज़रत इस्माईल को बरकत दी।

 हैगर और इश्माएल – उत्पत्ति 16

 सारै अब्राम की पत्नी थी। अब्राम और उसके कोई बच्चा नहीं था। सारै के पास एक मिस्र की दासी थी। उसका नाम हाजिरा था। सारै ने अब्राम से कहा, “देखो, यहोवा ने मुझे कोई बच्चा नहीं दिया है। इसलिए मेरी दासी को रख लो। मैं इसके बच्चे को अपना बच्चा ही मान लूँगी।” अब्राम ने अपनी पत्नी का कहना मान लिया।कनान में अब्राम के दस वर्ष रहने के बाद यह बात हुई और सारै ने अपने पति अब्रहमको हजिरा को दे दिया (हाजिरा मिस्री दासी थी।)।

हाजिरा, अब्राम से गर्भवती हुई। जब हाजिरा ने यह देखा तो उसे बहुत गर्व हुआ और यह अनुभव करने लगी कि मैं अपनी मालकिन सारै से अच्छी हूँ। लेकिन सारै ने अब्राम से कहा, “मेरी दासी अब मुझसे घृणा करती है और इसके लिए मैं तुमको दोषी मानती हूँ। मैंने उसको तुमको दिया। वह गर्भवती हुई और तब वह अनुभव करने लगी कि वह मुझसे अच्छी है। मैं चाहती हूँ कि यहोवा सही न्याय करे।”

लेकिन अब्राम ने सारै से कहा, “तुम हाजिरा की मालकिन हो। तुम उसके साथ जो चाहो कर सकती हो।” इसलिए सारै ने अपनी दासी को दाण्ड दिया और उसकी दासी भाग गई।

यहोवा के दूत ने मरुभूमि में पानी के सोते के पास दासी को पाया। यह सोता शूर जाने वाले रास्ते पर था। दूत ने कहा, “हाजिरा, तुम सारै की दासी हो। तुम यहाँ क्यों हो? तुम कहाँ जा रही हो?”

हाजिरा ने कहा, “मैं अपनी मालकिन सारै के यहाँ से भाग रही हूँ।”

यहोवा के दूत ने उससे कहा, “तुम अपनी मालकिन के घर जाओ और उसकी बातें मानो।” 10 यहोवा के दूत ने उससे यह भी कहा, “तुमसे बहुत से लोग उत्पन्न होंगे। ये लो इतने हो जाएंगे कि गिने नहीं जा सकेंगे।”

11 दूत ने और भी कहा,“अभी तुम गर्भवती हो और तुम्हे एक पुत्र होगा। तुम उसका नाम इश्माएल रखना।क्योंकि यहोवा ने तुम्हारे कष्ट को सुना हैऔर वह तुम्हारी मदद करेगा।12 इश्माएल जंगली और आजाद होगा एक जंगली गधे की तरह।
वह सबके विरुद्ध होगा। वह एक स्थान से दूसरे स्थान को जाएगा।वह अपने भाइयों के पास अपना डेरा डालेगाकिन्तु वह उनके विरुद्ध होगा।”

13 तब यहोवा ने हाजिरा से बातें कीं उसने परमेश्वर को जो उससे बातें कर रहा था, एक नए नाम से पुकारा। उसने कहा, “तुम वह ‘यहोवा हो जो मुझे देखता है।’” उसने उसे वह नाम इसलिए दिया क्योंकि उसने अपने—आप से कहा, “मैंने देखा है कि वह मेरे ऊपर नज़र रखता है।” 14 इसलिए उस कुएँ का नाम लहैरोई पड़ा। यह कुआँ कादेश तथा बेरेद के बीच में है।

15 हाजिरा ने अब्राम के पुत्र को जन्म दिया। अब्राम ने पुत्र का नाम इश्माएल रखा। 16 अब्राम उस समय छियासी वर्ष का था जब हाजिरा ने इश्माएल को जन्म दिया।

पैदाइश 16:1-16

हम देखते हैं कि जबकि हाजरा ने खुदावंद से कलाम किया था तो वह एक नाबिय्या साबित हुई। अल्लाह ने हाजरा से कहा कि उसका नाम इस्माईल रखना और उस से वायदा किया कि उसकी औलाद कसरत से होगी। इस तरह इस मुटभेड़ और अल्लाह् के वायदे के साथ वह अपनी बेगम (मालीकिन) के पास वापस गई और यह रक़ाबत दूर हुई।

रक़ाबत बढ़ती जाती है

मगर 14 साल बाद सारै से इसहाक़ पैदा होता है फिर से रकाबत शुरू हो जाती है।  तौरात शरीफ़ समझाती है कि यह किस तरह वाक़े हुआ।

पैदाइश 21: 8-21

अब बच्चा इतना बड़ा हो गया कि माँ का दूध छोड़ वह ठोस भोजन खाना शुरू करे। जिस दिन उसका दूध छुड़वाया गया उस दिन इब्राहीम ने एक बहुत बड़ा भोज रखा। सारा ने हाजिरा के पुत्र को खेलते हुए देखा। (बीते समय में मिस्री दासी हाजिरा ने एक पुत्र को जन्म दिया था। इब्राहीम उस पुत्र का भी पिता था।) 10 इसलिए सारा ने इब्राहीम से कहा, “उस दासी स्त्री तथा उसके पुत्र को यहाँ से भेज दो। जब हम लोग मरेंगे हम लोगों की सभी चीज़ें इसहाक को मिलेंगी। मैं नहीं चाहती कि उसका पुत्र इसहाक के साथ उन चीज़ों में हिस्सा ले।”

11 इन सभी बातों ने इब्राहीम को बहुत दुःखी कर दिया। वह अपने पुत्र इश्माएल के लिए दुःखी था। 12 किन्तु परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, “उस लड़के के बारे में दुःखी मत होओ। उस दासी स्त्री के बारे में भी दुःखी मत होओ। जो सारा चाहती है तुम वही करो। तुम्हारा वंश इसहाक के वंश से चलेगा। 13 लेकिन मैं तुम्हारी दासी के पुत्र को भी अशीर्वाद दूँगा। वह तुम्हारा पुत्र है इसलिए मैं उसके परिवार को भी एक बड़ा राष्ट्र बनाऊँगा।”

14 दूसरे दिन बहुत सवेरे इब्राहीम ने कुछ भोजन और पानी लिया। इब्राहीम ने यह चीज़ें हाजिरा को दें दी। हाजिरा ने वे चीज़ें लीं और बच्चे के साथ वहाँ से चली गई। हाजिरा ने वह स्थान छोड़ा और वह बेर्शेबा की मरुभूमि में भटकने लगी।

15 कुछ समय बाद हाजिरा का सारा पानी स्माप्त हो गया। पीने के लिए कुछ भी पानी न बचा। इसलिए हाजिरा ने अपने बच्चे को एक झाड़ी के नीचे रखा। 16 हाजिरा वहाँ से कुछ दूर गई। तब वह रुकी और बैठ गई। हाजिरा ने सोचा कि उसका पुत्र मर जाएगा क्योंकि वहाँ पानी नहीं था। वह उसे मरता हुआ देखना नहीं चाहती थी। वह वहाँ बैठ गई और रोने लगी।

17 परमेश्वर ने बच्चे का रोना सुना। स्वर्ग से एक दूत हाजिरा के पास आया। उसने पूछा, “हाजिरा, तुम्हें क्या कठिनाई है। परमेश्वर ने वहाँ बच्चे का रोना सुन लिया। 18 जाओ, और बच्चे को संभालो। उसका हाथ पकड़ लो और उसे साथ ले चलो। मैं उसे बहुत से लोगों का पिता बनाऊँगा।”

19 परमेश्वर ने हाजिरा की आँखे इस प्रकार खोलीं कि वह एक पानी का कुआँ देख सकी। इसलिए कुएँ पर हाजिरा गई और उसके थैले को पानी से भर लिया। तब उसने बच्चे को पीने के लिए पानी दिया।

20 बच्चा जब तक बड़ा न हुआ तब तक परमेश्वर उसके साथ रहा। इश्माएल मरुभूमि में रहा और एक शिकारी बन गया। उसने बहुत अच्छा तीर चलाना सीख लिया। 21 उसकी माँ मिस्र से उसके लिए दुल्हन लाई। वे पारान मरुभूमि में रहने लगे।

पैदाइश 21: 8-21

हम देखते हैं कि सारह (अब सारै का नाम बदलकर सारह रख दिया था) उसी घराने में हाजरा के साथ नहीं रह सकती थी। सो उस ने हज़रत इब्राहीम से मांग की कि हाजरा और उसके बेटे को घर से बाहर भेज दिया जाए। हालाँकि हज़रत इब्राहीम ना रज़ामंद थे मगर क्यूंकि अल्लाह ने हाजरा और इस्माईल को बरकत देने का वायदा किया था।  इस बार हक़ीक़त में अल्लाह ने दुबारा उस से बात की।  और जब उस के पास पानी ख़तम हो गया था और रेगस्तान में जब कहीं भी पानी नहीं मिल सकता था तो अल्लाह ने हाजरा की आँखें खोलीं जिस से उसने पानी देखा।  और उससे वायदा किया कि हज़रत इस्माईल से भी एक बहुत ‘बड़ी क़ौम’ बनेगी।

तौरात लगातार बयान करती जाती है कि किसतरह यह कौम आगे तरक़क़ी करती गई।  जब इब्राहीम (अलै.) की मौत होती है उस दौरान हम हज़रत इस्माईल के बारे में पढ़ते हैं।

इब्राहिम उत्पत्ति 25: 8-18 की मृत्यु

इब्राहीम धीरे—धीरे कमज़ोर पड़ता गया और भरे—पूरे जीवन के बाद चल बसा। उसने लम्बा भरपूर जीवन बिताया और फिर वह अपने पुरखों के साथ दफनाया गया। उसके पुत्र इसहाक और इश्माएल ने उसे मकपेला की गुफा में दफनाया। यह गुफा सोहर के पुत्र एप्रोन के खेत में है। यह मम्रे के पूर्व में थी। 10 यह वही गुफा है जिसे इब्राहीम ने हित्ती लोगों से खरीदा था। इब्राहीम को उसकी पत्नी सारा के साथ दफनाया गया। 11 इब्राहीम के मरने के बाद परमेश्वर ने इसहाक पर कृपा की और इसहाक लहैरोई में रहता रहा।

12 इश्माएल के परिवार की यह सूची है। इश्माएल इब्राहीम और हाजिरा का पुत्र था। (हाजिरा सारा की मिस्री दासी थी।) 13 इश्माएल के पुत्रों के ये नाम हैं पहला पुत्र नबायोत था, तब केदार पैदा हुआ, तब अदबेल, मिबसाम, 14 मिश्मा, दूमा, मस्सा, 15 हदर, तेमा, यतूर, नापीश और केदमा हुए। 16 ये इश्माएल के पुत्रों के नाम थे। हर एक पुत्र के अपने पड़ाव थे जो छोटे नगर में बदल गए। ये बारह पुत्र अपने लोगों के साथ बारह राजकुमारों के समान थे। 17 इश्माएल एक सौ सैंतीस वर्ष जीवित रहा। 18 इश्माएल के लोग हवीला से लेकर शूर के पास मिस्र की सीमा और उससे भी आगे अश्शूर के किनारे तक, घूमते रहे और अपने भाईयों और उनसे सम्बन्धित देशों में आक्रमण करते रहे। [b]

पैदाइश 25:8-18

दर हक़ीक़त इस्माईल की उम्ररदराज़ी हुई और यह भी कि हज़रत इस्माईल और हज़रत इस्हाक़ दोनों के 12 ,12 क़बीलों के सरदार हुए।  हज़रत इस्माईल के लिए जिसतरह अल्लांह ने वायदा किया था उसको बहुत बरकत दी।  आज  जितने भी अरब के लोग पाए जाते हैं वह सब उनके बाप दादा हज़रत इस्माईल और हज़रत इब्राहीम की औलाद यानि उन्ही की नसल से हैं।