सामान्य प्रश्न

शायद इंजील का कोई ऐसा हिस्सा नहीं होगा जिसमें खुदा के बेटे के लक़ब को लेकर मुबाहसा न हो जो नबी ईसा (अलैहिस्सलाम) के लिए लगातार (इंजील ए शरीफ़) में इस्तेमाल किया गया है I इस नाम के खास मक़सद को लेकर क्यूँ बहुत से लोग मशकूक होते हैं कि इंजील की तहरीफ़ बदल चुकी है इंजील की बिगाड़ का मामला (यहाँ) कुरान शरीफ़ से जांचा गया है , (यहाँ) सुन्नत से , इस के अलावा (यहाँ) साईन्स के मुताबिक़ तसनीफ़ ओ तालीफ़ की नुक्ताचीनी से I मगर इस की बे पनाह इखतिताम यह है कि इंजील का बिगाड़ कभी नहीं हुआ और न होगा I मगर इसके बावजूद भी हम इस लक़ब ‘ख़ुदा के बेटे’ को इंजील ए शरीफ़ में किस तरह पाते हैं ?

क्या यह ख़ुदा की वहदानियत के बिलकुल खिलाफ़ है जिस तरह से सूरा अल अखलास में ज़ाहिर किया गया है ?(सूरा — 112 सच्चाई)

कहो: वह भगवान, एक और केवल है;ईश्वर, द इटरनल, एब्सोल्यूट;वह नहीं है, और न ही वह भीख माँग रहा है;और उसके समान कोई नहीं है

सूरा अल – अखलास 112

जिस तरह सूरा अखलास है वैसे ही तौरात भी ख़ुदा की वहदानीयत को शामिल करती है जबकि हज़रत मूसा ने ज़ेल की आयत में ऐलान किया था I

सुनो, हे इज़राइल: भगवान हमारे भगवान, भगवान एक है।

इस्तिसना 6:4

सो किस तरह से ‘ख़ुदा का बेटा’ मुहावरे को समझा जाए ?

इस तहरीर में हम इस मौसूम को समझते हुए गौर करेंगे कि यह कहाँ से आया , इसके क्या मायने हैं , इसके क्या मायने नहीं हैं I तब जाकर हम असबाती हालत में होंगे जिसके साथ हम इंजील ए शरीफ़ से मुत्तफ़िक़ होंगे I

ख़ुदा का बेटा यह मुहावरा कहाँ से आता है ?

‘ख़ुदा का बेटा’ एक लक़ब है जिस का आगाज न्जील ए शरीफ़ से नहीं हुआ I इंजील के मुसन्निफ़ों ने इस लक़ब की ईजाद नहीं की या इसकी शुरुआत नहीं की I न ही यह मसीहीयों के ज़रीए ईजाद की हुई है I हम यह इसलिए कहते हैं क्यूंकि हम जानते हैं कि इसको सब से पहले ज़बूर शरीफ़ में इस्तेमाल किया गया था जब ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) के शागिर्द बहुत पहले ज़िंदा थे I ज़बूर का यह हिस्सा हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) के जरिये 1000 क़बल मसीह ख़ुदा के इल्हाम से लिखा गया था I आइये हम देखें कि इसका हवाला कहां दिया हुआ है :

ति जाति के लोग क्यों हुल्लड़ मचाते हैं, और देश देश के लोग व्यर्थ बातें क्यों सोच रहे हैं?
2 यहोवा के और उसके अभिषिक्त के विरूद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं, कि
3 आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें, और उनकी रस्सियों अपने ऊपर से उतार फेंके॥
4 वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हंसेगा, प्रभु उन को ठट्ठों में उड़ाएगा।
5 तब वह उन से क्रोध करके बातें करेगा, और क्रोध में कहकर उन्हें घबरा देगा, कि
6 मैं तो अपने ठहराए हुए राजा को अपने पवित्र पर्वत सिय्योन की राजगद्दी पर बैठा चुका हूं।
7 मैं उस वचन का प्रचार करूंगा: जो यहोवा ने मुझ से कहा, तू मेरा पुत्रा है, आज तू मुझ से उत्पन्न हुआ।
8 मुझ से मांग, और मैं जाति जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये, और दूर दूर के देशों को तेरी निज भूमि बनने के लिये दे दूंगा।
9 तू उन्हें लोहे के डण्डे से टुकड़े टुकड़े करेगा। तू कुम्हार के बर्तन की नाईं उन्हें चकना चूर कर डालेगा॥
10 इसलिये अब, हे राजाओं, बुद्धिमान बनो; हे पृथ्वी के न्यायियों, यह उपदेश ग्रहण करो।
11 डरते हुए यहोवा की उपासना करो, और कांपते हुए मगन हो।
12 पुत्र को चूमो ऐसा न हो कि वह क्रोध करे, और तुम मार्ग ही में नाश हो जाओ; क्योंकि क्षण भर में उसका क्रोध भड़कने को है॥ धन्य हैं वे जिनका भरोसा उस पर है॥

ज़बूर शरीफ़ 2

यहां पर ‘ख़ुदावंद ख़ुदा’ और उसका ‘मसह किया हुआ’ के बीच एक बात चीत का सिलसिला जारी है I आयत 7 में हम देखते हैं कि ‘ख़ुदावंद ख़ुदा’ (अल्लाह तआला) मसीह से कहता है “… तू मेरा ‘बेटा’ है आज तू मुझ से पैदा हुआ … “I इसको 12 आयत में भी दुहराया गया है और वहाँ हिदायत दी गई है कि “बेटे को चूमो”… जबकि ख़ुदा उस से बात कर रहा है और उसको ‘मेरा बेटा’ कह कर पुकार रहा है तो आप देखें कि यह वह जगह है जहां से ख़ुदा के बेटे का लक़ब का आगाज़ होता है I किस के लिए यह ‘बेटे’ का लक़ब दिया गया ? इसी ज़बूर में इसका जवाब भी है कि यह उसके मसीह के लिए है I दूसरे अल्फ़ाज़ में ‘बेटे’ का यह लक़ब इबारत के तबादिला पिज़ीरी से ‘मसीह’ के साथ इस्तेमाल किया गया है I पिछले तहरीर में हम ने देखा था कि मसह किया हुआ = मसीहा = मसीह=ख्रीस्तुस , और यह ज़बूर भी जहां कि लक़ब मसीहा का भी आगाज़ हुआ है I तो फिर लक़ब ‘ख़ुदा का बेटा’ का भी यहीं इसी इबारत से आगाज़ हुआ I और अगर मसीह = ख्रीस्तुस है तो ख्रीस्तुस का आगाज़ भी यहीं से हुआ I यह ज़बूर शरीफ़ की आयतें 1000 क़बल मसीह में ईसा अल मसीह की पहली आमद से पहले लिखे गए थे I इसे जानते हुए यह हमको समझने देता है कि उसके मुक़द्दमे के दौरान भी हज़रत ईसा के खिलाफ़ ख़ुदा का बेटा होने का इल्ज़ाम लगाया गया था I

येसू के लक़ब : ख़ुदा के बेटे की बाबत उसूल के तोर पर तब्दीलियाँ

66 जब दिन हुआ तो लोगों के पुरिनए और महायाजक और शास्त्री इकट्ठे हुए, और उसे अपनी महासभा में लाकर पूछा,
67 यदि तू मसीह है, तो हम से कह दे! उस ने उन से कहा, यदि मैं तुम से कहूं तो प्रतीति न करोगे।
68 और यदि पूछूं, तो उत्तर न दोगे।
69 परन्तु अब से मनुष्य का पुत्र सर्वशक्तिमान परमेश्वर की दाहिनी और बैठा रहेगा।
70 इस पर सब ने कहा, तो क्या तू परमेश्वर का पुत्र है? उस ने उन से कहा; तुम आप ही कहते हो, क्योंकि मैं हूं।
71 तब उन्होंने कहा; अब हमें गवाही का क्या प्रयोजन है; क्योंकि हम ने आप ही उसके मुंह से सुन लिया है॥

लूका 22:66-71

यहूदी रहनुमाओं ने सब से पहले येसू से पूछा कि क्या वह मसीह है ? (आयत 67) I अगर मैं आप से पूछूं कि क्या आप फ़लां नाम से जाने जाते हैं ? इस का मतलब यह हुआ कि आप का जो भी नाम है वह नाम मेरे दिमाग में पहले से है इसमें फ़र्क़ यह है कि मैं आप के नाम को आप की शख्सियत से जोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ I इसी बतोर हक़ीक़त यह है कि यहूदी रहनुमा येसू से कहते हैं ‘क्या तू वह मसीह है ? इस का मतलब यह है कि मसीह का जो तसव्वुर है वह पहले से ही उन के दमाग में मौजूद था I इसलिए उनका सवाल ‘मसीह’ या (मसह किया हुआ शख्स) का लक़ब ईसा की शख्सियत के साथ शरीक कार हो रहा था I मगर उनहों ने थोड़े सवाल पूछने के बाद अपने मुहावरे को बदल दिया या अपने मुहावरे से पलट गए I और पूछने लगे ,तो फिर क्या तू ‘क्या तू ख़ुदा का बेटा है’? यहाँ इस का मतलब यह हुआ कि वह येसू के लक़ब ‘मसीह’ और ‘ख़ुदा का बेटा’ दोनों मसावी तोर से और तबादिला पिज़ीरी से बर्ताव कर रहे थे I यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे I (मगर ईसा अलैहिस्सलाम ने आईएन दोनों के बीच ‘बनी आदम’ के साथ जवाब देता है) Iयह एक तीसरा लक़ब है जो दानिएल की किताब के इबारत से है जो यहाँ समझाया गया है I मगर यहूदियों के रहनुमाओं को ‘मसीह’ और ‘ख़ुदा के बेटे’ के बीच का तबादिला पिज़ीर ख़्याल कहां से आया ? उन्हें यह ख़्याल ज़बूर 2 से आया जो येसू की पहली आमद से 1000 साल पहले ख़ुदा के इल्हाम से हज़रत दाऊद के ज़रिये लिखा गया था यह उसूली तोर से येसू के लिए मुमकिन था कि अगर वह मसीह न होता ख़ुदा का बेटा भी नहीं होता I यह वह हालत थी कि यहूदी रहनुमाओं ने ऐसा क़दम उठाया जिस तरह से हम ने ऊपर के बयान में देखा I

उसूली तोर से हज़रत ईसा के लिए यह भी मुमकिन है कि वह ‘मसीह’ और ख़ुदा का बेटा दोनों हों हम यह देखते हैं कि किस तरह पतरस एक रहनुमाई करने वाला हज़रत ईसा का शागिर्द जवाब देता है जब उस से पूछा गया था I इसे इंजील में लिखा गया है :

13 यीशु कैसरिया फिलिप्पी के देश में आकर अपने चेलों से पूछने लगा, कि लोग मनुष्य के पुत्र को क्या कहते हैं?
14 उन्होंने कहा, कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते हैं और कितने एलिय्याह, और कितने यिर्मयाह या भविष्यद्वक्ताओं में से कोई एक कहते हैं।
15 उस ने उन से कहा; परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?
16 शमौन पतरस ने उत्तर दिया, कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है।
17 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि हे शमौन योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।

मत्ती 16 :13-17

पतरस ‘मसीहा’ के लक़ब को फ़ितरी तोर से ख़ुदा के बेटे के साथ जोड़ता है I क्यूंकि इन दोनों लक़बों को ज़बूर में इस तरह से क़ायम किया और ज़बूर में इस का आगाज़ किया गया है I हज़रत ईसा इसको पतरस के लिए ख़ुदा केआई तरफ़ से मूकाशफ़ा बतोर क़बूल करते हैं I सो येसू ‘मसीहा’ है और और साथ ही वह ख़ुदा का बेटा भी है I

इसलिए येसू के लिए ख़ुद का तखालुफ़ मुमकिन है कि वह मसीह हो और ख़ुदा का बेटा न हो क्यूंकि इन दोनों लक़बों का एक ही ज़रीया और एक ही मतलब है I अगर इसपर कोई एतराज़ करे तो वह एक शक्ल के लिए ऐसा कहेगा कि वह एक दाइरा है मगर गोल नहीं I कोई शक्ल एक मुरब्बा हो सकता है ,इस तरह से न तो वह गोल है और न दाइरा , पर अगर वह गोल है तो वह दाइरा भी है I किसी चीज़ के गोलाई में होने का मतलब ही उस के दाइरे में होने का हिस्सा है मगर यह कहना कि फ़ुलां शक्ल गोल है और वह दाइरे में नहीं है तो वह गैर मुत्तसिल है या फिर गलत फ़हमी का शिकार है कि एक दाइरा और गोल शक्ल क्या मायने रखती है I यही बात ‘मसीह’ और ख़ुदा के बेटे पर भी नाफ़िज़ होती है I पतरस के दावे के मुताबिक़ येसू मसीह और ख़ुदा का बेटा दोनों है या उस के मुक़द्दमे के दिन रहनुमाओं के नज़रिये से वह इन दोनों में से एक भी नहीं है I मगर वह एक होकर दूसरा न एचओएनए ऐसा भी मुमकिन नहीं है I

ख़ुदा का बेटा इस के क्या मायने हैं

सो इस लक़ब के क्या मायने हैं ? एक सबूत ज़ाहिर होता है जिस तरह नया अहदनामा में यूसुफ़ की शख़्सियत का तआरुफ़ किया गया है (फ़िरोन के ज़माने का यूसुफ़ नहीं) बलिक वह बहुत ही पुराने                            था I देखें  शागिरदों में से एक था आप देखेँगे कि उस का लक़ब बरनबास यानी नसीहत का बेटा

36 जोसेफ, साइप्रस का एक लेवी, जिसे प्रेरितों ने बरनबास (“प्रोत्साहन का बेटा”) कहा, 37 ने उसके स्वामित्व वाले एक खेत को बेच दिया और पैसे लाकर प्रेरितों के चरणों में रख दिया।()

आमाल 4:36-37

आप देखें कि यह एक क़ियास किया हुआ नाम है जिस के मायने हैं नसीहत का बेटा —- क्या इंजील यह कह रहा है उसके बाप का लफ़ज़ी नाम नसीहत था , और इस सबब से उसका नाम नसीहत का बेटा रखा गया ? जी नहीं I बिलकुल से नहीं ! नसीहत एक पेचीदा तसव्वुर है जिसकी शरह करना मुश्किल है मगर समझना आसान है क्यूंकि उसे एक एक शख्स को नसीहत करते देखा गया था I और इस तरह से समझा जाता है कि नसीहत करना क्या होता है I इस तरीक़े से यूसुफ़ जो है वह नसीहत का बेटा है I उसने ज़िंदगी जीने के तरीक़े से नसीहत के बेटे की नुमाइंदगी की I

“ख़ुदा को कभी किसी ने नहीं देखा” (यूहनना 1:18) I इस लिए हमारे लिए हक़ीक़त में ख़ुदा की फ़ितरत और उसकी खासियत को समझना मुश्किल है I जो हमको गौर करना ज़रूरी है वह यह है कि ख़ुदा ख़ुद को एक ज़िंदा तरीक़े से नुमाइंदगी करे मगर यह ना मुमकिन है क्यूंकि “ख़ुदा रूह है”और इस तरह वह हमारी नज़रों से ओझल है I इंजील ए शरीफ़ इस तरह से तफ़सील पेश करते हुए ईसा अल मसीह की शख़्सियत को दोनों लक़ब के साथ यानी खुदा का कलाम और खुदा का बेटा बतोर जानते हुए समझाती कि जिंदगी कितनी अहमियत रखती है I

14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।
15 यूहन्ना ने उसके विषय में गवाही दी, और पुकारकर कहा, कि यह वही है, जिस का मैं ने वर्णन किया, कि जो मेरे बाद आ रहा है, वह मुझ से बढ़कर है क्योंकि वह मुझ से पहिले था।
16 क्योंकि उस की परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात अनुग्रह पर अनुग्रह।
17 इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई; परन्तु अनुग्रह, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुंची।
18 परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में हैं, उसी ने उसे प्रगट किया॥

यूहनना 1:14-18

हम खुदा के फ़ज़ल और सच्चाई को किस तरह से जानते है ? इसे हम ईसा (अलैहिस्सलाम) की जिंदगी से जो जिस्मानी होने के साथ साथ एक ख़ून की जिंदगी थी उसके साथ जीने के ज़रीए साबित किया I उसके शागिर्द ख़ुदा के फ़ज़ल और सच्चाई को येसु मसीह मे सुकूनत करते हुए देखकर ही समझ सके थे I शरीअत के अहकाम जो ख़ुदा के लोगों को मिले हुए थे वह इस आँखों देखी मिसाल को पेश न कर सकी थी I

बेटा,, बराहे रास्त ख़ुदा की तरफ़ से आता है

ख़ुदा के बेटे का एक दूसरा इस्तेमाल भी बेहतर तरीक़े से समझने में हमारी मदद करता है कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के हक़ में इस के क्या मायने पेश करते हैं I लूक़ा की इंजील येसू मसीह के नसब नामे की फ़ेहरिस्त में (उसके आबा ओ अजदाद से लेकर बेटे तक) को पेश करती है जो पीछे आदम तक लेजाती है I हम इस नसबनामे को लेते हैं जिस के बिलकुल आख़िर में वह कहती है :

38 और वह इनोश का, और वह शेत का, और वह आदम का, और वह परमेश्वर का था॥

लूक़ा 3:38

यहाँ हम देखते हैं कि आदम को ‘ख़ुदा का बेटा’ कहा गया है I क्यूँ ? इसलिए कि आदम का कोई इंसानी बाप नहीं था I वह बराहे रास्त ख़ुदा से आया था I और येसू का भी कोई इंसानी बाप नहीं था , वह कुंवारी से पैदा हुआ था I जिस तरह यूहनना की इंजील में कहा गया है वह बराहे रास्त बाप की तरफ़ से आया I

क़ुरान शरीफ़ से फ़लां के बेटे की मिसाल

इंजील की तरह ही क़ुरान शरीफ़ भी फ़लां के बेटे के इज़हार का इस्तेमाल करता है I इसलिए ज़ेल की आयत पर गौर करें :

(ऐ रसूल) तुमसे लोग पूछते हैं कि हम ख़ुदा की राह में क्या खर्च करें (तो तुम उन्हें) जवाब दो कि तुम अपनी नेक कमाई से जो कुछ खर्च करो तो (वह तुम्हारे माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों का हक़ है और तुम कोई नेक सा काम करो ख़ुदा उसको ज़रुर जानता है

सूरा अल बक़रा 2:215

अङ्ग्रेज़ी में वे फ़ारेस (या ट्रावेल्लेर्स) को लफ़ज़ी तोर पर असल अरबी मे ابن السبيل)).या (इबनुस सबील) का इस्तेमाल करते हुए ‘रास्ते का बेटा’ के लिए लिखा गया है I क्यूँ ? क्यूंकि मुफ़स्सिरों और तर्जुमानों ने मुहावरे को समझ लिया था कि यह मुहावरा लफ़ज़ी रास्ते के बेटे का हवाला नहीं देता मगर वह मुसाफ़िरों को जताने के लिए एक इज़हार का ढंग है I मतलब यह कि वह जो मज़बूती से सड़क से ही जुड़े हैं और सड़क पर ही मुनहसर रहते हैं I

ख़ुदा का बेटा क्या मायने नहीं रखता

बाइबल के साथ यह बिलकुल वैसे ही है जब इस लक़ब ख़ुदा के बेटे का इस्तेमाल करते हैं I तौरात शरीफ़ , ज़बूर शरीफ़ या इंजील शरीफ़ में कहीं पर भी ख़ुदा के बेटे के लक़ब को लेकर यह नहीं बताया गया है कि ख़ुदा का किसी औरत के साथ जिंसी ताल्लुक़ात थे I जिस के अंजाम बतोर लफ़ज़ी या जिस्मानी बेटा हुआ हो I यह समझ क़दीम असनाम परसती की है जहां देवताओं की बीवियाँ हुआ करती थीं I मगर बाइबल अल किताब में कहीं पर भी इस बात का कोई ज़िकर नहीं है I यक़ीनी तोर से यह ना मुमकिन है कि जबकि इंजील कहती है येसू कुंवारी से पैदा हुए , इस तरह से बाप का कोई रिश्ता नहीं है I

ख़ुलासा

यहाँ हमने देखा की नबी यसायाह (अलैहिस्सलाम) ने 750 क़बल मसीह में नबुवत की थी कि एक दिन उसके मुस्तक़्बिल में ख़ुदावंद की तरफ़ से बराहे रास्त उस के आने की एक निशानी दी जाएगी

14 इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिन्ह देगा। सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानूएल रखेगी।

यसायाह 7:14

शरह के मुताबिक़ कुंवारी के बेटे का कोई इंसानी बाप नहीं होता I यहाँ हम ने देखा कि जिबराईल फ़रिश्ते ने मरयम को यह पैगाम सुनाया कि ऐसा होकर रहेगा क्यूंकि ख़ुदा तआला कि क़ुदरत तुझ पर एसएएवाईए करेगी तो यह ख़ुदा और मरयम के बीच किसी नापाक रिश्ते से नहीं होने वाला था —-जबकि यह यक़ीनी तोर से शिर्क या कुफ़्र नहीं माना जाएगा बल्कि यह बेटा एक मौलूद ए मुक़द्दस होगा और अज़हद बे मिसल तरीक़े से होगा जो बराहे रास्त ख़ुदा की तरफ़ से होगा बगैर इनसानी मनसूबा या कोशिश के I वह बराहे रास्त ख़ुदा की तरफ़ एएजीई बढ़ेगा जिस तरह कलाम हमारी तरफ़ से एलओजीओएन तक पहुंचता है I इस समझ के साथ मसीहा ख़ुदा का बेटा और साथ ही साथ ख़ुदा का कलाम भी था I       

हम ने बनी इसराईल की तारीख़ में देखा कि 70 ईस्वी में वायदा किये हुए मुल्क से शहर बदर कर दिए गए थे ताकि वह दुनया की तमाम क़ौमों में जिलावतन के तोर पर रहें और परदेसी होकर रहें ।  तक़रीबन 2000 सालों तक इसी तरह होता रहा जहां बनी इसराईल रहा करते थे । जब वह इन मुख्तलिफ़ अक़वाम में रह रहे थे तो मीआदी तोर पर (कुछ अरसे के लिए इन्हें बहुत बुरी तरह से सताया भी गया था । उन्हों ने बहुत ही शदीद सताव सहे । ख़ास तोर से मसीही मुल्क यूरोप में इन पर स्ताव का पहाड़ टूट पड़ा था । इस के अलावा स्पेन में , और मगरीबी यूरोप में भी ।  यहाँ तक कि वह रूस के ऐसे मुक़ाम में रहे जहां इन में से बहुतों का क़त्ल ए आम हुआ ।  अक्सर औक़ात में उन्हें जोखिम भरे हालात में रहना पड़ा ।  हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये कि गई लानतें जिस तरह लिखी गई हैं वह सब पूरी हुईं ।

  65 “तुम्हें इन राष्ट्रों के बीच तनिक भी शान्ति नहीं मिलेगी। तुम्हें आराम की कोई जगह नहीं मिलेगी। यहोवा तुम्हारे मस्तिष्क को चिन्ताओं से भर देगा। तुम्हारी आँखें पथरा जाएंगी। तुम अपने को ऊखड़ा हुआ अनुभव करोगे।

इस्तिसना 28:65

ज़ेल में जो वक़्त की लकीर का नक्शा दिया गया है  वह पूरे 2000 साल के ज़माने को दिखाता है । और यह आगे चलकर बनी इस्राईल की तारीख़ बाइबिल के वक़्त के बाद के हिस्से पर पहुंचता है ।  इस ज़माने को सुरख़ मोटी लकीर (बार) में दिखाया गया है ।

यहूदियों की एक तारीख़ी वक़त की लकीर हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के दौर से लेकर आज के दौर तक

 आप देख सकते हैं कि बनी इस्राईल अपनी तारीख़ के दौर में दो बार जिलावतनी में गए मगर जो दूसरा दौर था वह पहले दौर के मुक़ाबले में जिलावतनी की मीआद कुछ ज़ियादा ही लम्बी थी ।  ( जो पहला दौर था वह सिर्फ़ 600 से 530 क़ब्ल मसीह तक था)।

यहूदियों ने अपनी तहज़ीबी पहचान को बारक़रार रखा

जो बात मुझे गुरवीदा करती है (मोह लेती) है वह यह है कि हालांकि बनी इसराईल के पास अपना कोई मरकजी मक़ाम नहीं था कि अपनी तहज़ीबी बुनियादों को नीचे कि तह पर रखा ।  और हालांकि उन्हों ने कभी अपनी नसल बढ़ाई (तादाद में बढ़े) वजह यह थी कि जब जब इन पर सताव होता था वह हलाक होते जाते थे और गिनती में कम होते जाते थे । फिर भी उन्हों ने इस 2000 साल के अरसे में अपनी तहज़ीबी पहचान को नहीं खोया ।  यह सचमुच में काबिले ज़िक्र है ।  यहाँ तौरात में उन क़ौमों की फ़ेहरिस्त है जिन में वह वादा किया हुआ मुल्क में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) 1 निशान के दौरान रहते थे ।

 मैं अब जाऊँगा और मिस्रियों से अपने लोगों को बचाऊँगा। मैं उन्हें उस देश से निकालूँगा और उन्हें मैं एक अच्छे देश में ले जाऊँगा जहाँ वे कष्टों से मुक्त हो सकेंगे। जो अनेक अच्छी चीजों से भरा पड़ा है। [a] उस प्रदेश में विभिन्न लोग रहते हैं। कनानी, हित्ती, एमोरी, परिज्जी हिब्बी और यबूसी।

ख़ुरूज 3:8

और जब इन्हें बरकतें और लानतें दी जा रही थीं उन दिनों से :

  “यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें उस देश में ले जायेगा जिसे अपना बनाने के लिए तुम उसमें जा रहे हो। यहोवा तुम्हारे लिए बहुत से राष्ट्रों को बलपूर्वक हटाएगा—हित्ती, गिर्गाशी, एमोरी, कनानी, परिज्जी, हिब्बी और यबूसी, सात तुमसे बड़े और अधिक शक्तिशाली राष्ट्रों को ।

इस्तिसना 7:1

क्या इन लोगों में से कोई अभी भी अपनी तहज़ीबी और बोली कि पेहचान को बदस्तूर थामे हुए है ? इस का जवाब है नहीं ।  यह बातें बहुत पहले से ही इन में से ख़तम हो गयी थीं ।  इस पुरानी तारीख़ से हम सिर्फ़ “गिरगेशैट” की बाबत ही जानते हैं ।  जिसतरह निहायत ज़बरदस्त सल्तनतें जैसे बाबुल , फ़ारस , यूनान और रोमी सल्तनतें इन कौमों पर फ़तेह हासिल कीं तो ऊन्हों ने बहुत जल्द अपनी ज़बान और पेचां को खो दिया था जैसे कि यह सल्नातों में दब कर रह गए थे ।  जैसे कि मैं केनडा में रहता हूँ ।  मैं कई एक तब्दीले वतन करने वालों को तमाम दुनया से यहाँ आते हुए देखता हूँ ।  तो यह देखता हूँ कि इन कि तीसरी पीढ़ी में ही तहज़ीब और मुल्क की ज़ुबान तब्दीले वतन करने वालों में से ख़तम हो जाती है ।  जब मैं जवान ही था तो मैं ने स्वीडन से कनाडा के लिए तब्दीले वतन किया ।  मेरा बेटा उस वक़्त स्वीडन की ज़बान बोल नहीं सकता था न ही मेरे भाई या बहन के बच्चे ।  कैनाडा की तहज़ीब में मेरे बाप दादा की स्वेदानी पेहचान बहुत तेज़ी से गायब हो रही है ।  यह तक़रीबन हरेक तब्दीले वतन करने वाले शख्स के लिए सच है चाहे वह अफ्रीक़ा से , चीन से , जापान से , कोरिया से , इरान से , जुनूबी अमेरिका से , जुनूबी अफ्रीक़ा से या यूरोप के किसी भी मुल्क से क्यूँ न आते हों ।  तीन ही पीढ़ी में उन कि ज़बान और तहज़ीब खो जाती है ।

सो यह काबिले ज़िकर है कि बनी इसराईल (यहूदी) ऐसी मुख़ालिफ़त में जी रहे थे उन्हें मजबूर किया जा रहा था कि सदियों तक मारे मारे फिरे , भटकते फिरे ।  फिर भी उनकी आलमगीर आबादी , मज़हबी , तहज़ीबी और ज़ुबान की पहचान कभी भी नहीं खोई ।  यहाँ तक कि यह सारी बातें उन में 2000 साल तक क़ायम रहीं ।

आज़ादी से पूरी यहूदी क़ौम को हलाक करने की मौजूदा सियासी मसलिहत –  क़त्ले आम

फिर सताव के तहत यहूदियों के ख़िलाफ़ एक साथ क़त्ले आम की साजिशें अपने उरूज पर पहुंचीं ।  हिटलर ने दूसरी आलमगीर जंग में जर्मनी के नाजियों के ज़रिये तमाम उन यहूदियों को जो यूरोप में रहते थे नेस्त ओ नाबूद करने की थां ली थी ।  और वह तक़रीबन इस साज़िश में कामयाब भी हुआ ।  उसने उन्हें तकनीकी तरीक़े से गैस कि भट्टियों में डालकर ज़हरीली गास से मरवा डाला  और उन्हें नेस्त ओ नाबूद कर दिया ।  किसी तरह कुछ यहूदी उस के इस साज़िश के शिकार न हुए और वह नाकाम रहा ।  इस तरह कुछ यहूदी ज़िन्दा रहे ।

मौजूदा इस्राएल का नया जन्म

और फिर 1948 में अक़वामे मुताहिद्दा के ज़रिये यहूदियों के हक़ में मौजूदा इस्राईल की रियासत का क़ाबिले ज़िकर नया जन्म हुआ ।  जिस तरह मुन्दर्जा बाला में बयान किया गया है ।  यह सच मुच में क़ाबिले ज़िकर है कि कई मक़ामों में ऐसे लोग पाए गए जो यहूदी बतोर पहचाने गए थे गए थे ।  मगर इन अलफ़ाज़ के लिए जो हज़रत मूसा ने 3500 साल पहले लिखा था सच साबित होना था ताकि एक ‘तुम’ बाक़ी रहो या वह जो लोगों की एक जमाअत बतोर रह गए थे।  यहाँ तक कि  उनकी लम्बी जिलावतनी की हालत में भी ।

  तब यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम पर दयालु होगा। यहोवा तुम्हें फिर स्वतन्त्र करेगा। वह उन राष्ट्रों से तुम्हें लौटाएगा जहाँ उसने तुम्हें भेजा था। चाहे तुम पृथ्वी के दूरतम स्थान पर भेज दिये गये हो, यहोवा, तुम्हारा परमेश्वर तुमको इकट्ठा करेगा और तुम्हें वहाँ से वापस लाएगा।

इस्तिस्ना 30:3-4

यह हक़ीक़त में एक निशानी है कि अल्लाह अपने कलाम को बरक़रार रखता है ।

यह भी काबिले ज़िकर था यह उस हालत में थे कि वह सताव के चुंगल में थे ।  कई एक क़ौमें उस इलाक़े में इसराईल के ख़िलाफ़ 1948 में … 1956 में …1967 में … और फिर 1973 में जंग का मज़ाहिरा किया ।  इस्राईल जो कि एक छोटा सा मुल्क है अक्सर अपने मुल्क के चारों तरफ़ के पांच पड़ोसी मुल्कों के साथ जंग के लिए कभी भी किसी भी वक़्त आमादा रहता है ।  इस के बावजूद भी वह किसी से नहीं हारता बल्कि अपनी सरहद बढ़ाता रहता है । 1967 की जंग में यहूदियों ने दुबारा येरूशलेम पर फ़तेह पाई थी जो उन का पाए तख़्त था जिसकी बुन्याद हज़रत दाऊद ने डाली थी ।  

अल्लाह ने इन का नया जन्म (नई पैदाइश) क्यूं होने दी

इन दिनों तक यह तमाम मौजूदा तरक़क़ियात नज़ाइया हैं (यानी बहस का मुद्दा बने हुए हैं) ।  क़रीब क़रीब कोई भी मौजूदा वाक़िया इसराईल की नई पैदाइश और उनकी वापसी को लेकर नहीं है जो बहुत ज़ियादा बहस का मुद्दा बने क्यूंकि यह तो आजकल रोज़ाना वाक़े हो रहा है । तमाम दुनया में इन क़ौमों से जहां यह हज़ार साल से जिलावतनी में रहते थे और शायद जब आप इसे पढ़ते हैं तो आप गुस्से से भर जाएंगे क्यूंकि मौजूदा यहूदी उतने मज़हबी नहीं हैं जितने कि पहले थे । उनमें से बहुत से दुनयावी (ग़ैर मज़हबी) या काफ़िर जैसे हो चुके हैं ।  क्यूंकि हिटलर ने जबसे उन के साथ बुरा बर्ताव किया था उनकी क़ौम का क़त्ले आम करेने में कामयाब हुआ था । और यह कोई ज़रूरी नहीं कि वह लोग सही थे मगर काबिले ज़िक्र हक़ीक़त यह है कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन के हक़ में जो आख़िर आख़िर में लानतें भेजी थीं वह सच साबित हुईं और आज भी हमारी आँखों के सामने हो रहे हैं ।  क्यूं ? इस्का क्या मतलब है ? इस कि रोकथाम कैसे होगी ? जबकि वह अभी भी मसीहा का इनकार करते हैं ।  यह बहुत ही अहम् सवालात हैं ।  इन तमाम सवालात के जवाबत तौरात और ज़बूरों में हो सकते हैं ।  जो अभी मैं ने बयान किया उस से गुस्सा हो सकते हैं । और शायद उनके लिए कड़वाहट भी हो सकती है ।  मगर शायद हम इसे रोक सकते और आख़री फ़ैसला ले सकते हैं उस वक़्त तक कि हम नबियों की उन बातों को जो उन्हों ने इन क़ाबिले ज़िक्र वाक़ियात की बाबत लिखे थे ।  उन्हों ने हमारे   फ़ाइदे के लिए लिखे थे ।  क्यूंकि यह सारी बातें अल्लाह से होकर इनसान कि तरफ़ लेजाती हैं ।  इसलिए कि क्या यहूदी क्या दुसरे मज़ाहिब के लोग सब एक जैसे हैं ।  आइये हम मतला किये जाएं कि इन नबियों ने जो लिखा था इन लिखी हुई बातों के मुताबिक फ़ैसला करें ।  ज़बूर के साथ हम इस सिलसिले को जारी रखेंगे यह पूछने के लिए कि यहूदियों ने मसीहा का इनकार क्यूं किया था ?                  

बनी इसराईल की तारीख़ का आसानी से पीछा करने के लिए मैं वक़्त की लकीरों का एक सिलसिला उन की तारीख़ को बयान करते हुए तामीर करने जारहा हूँ ।  बनी इस्राईल कि तारीख़ को बहुत ज़ियादा जाने पहचाने बाइबिल के नबियों को फ़ाइज़ करते हुए शुरू करके एक वक़्त की लकीर में ईसा अल मसीह के ज़माने तक ले जाते हैं ।

बाइबिल के सबसे मान्यता प्राप्त पैगंबर

यह वक़्त की लकीर मशरिकी कैलंडर का इस्तेमाल करती है (और याद रखें कि यह सब क़ब्ल मसीह या बी सी ई  तारीख़ से जुड़ी है) ।  चौड़ान वाली लकीरें बताती हैं कि एक ख़ास नबी कब तक जिया ।  इन की निशानी के लिए हज़रत इब्राहिम (अलै.) और हज़रत मूसा अलै.) बहुत ही अहम् हैं जिनकी बाबत हम हम पहले ही देख चुके हैं । इसके अलावा हज़रत दाऊद (अलै.) पछाने गए हैं क्यूंकि उन्हों ने ज़बूर शरीफ़ का आग़ाज़ किया था और वह बनी इस्राईल के पहले बादशाह थे और येरूशलेम में एक शाही सल्तनत का सिलसिला क़ायम किया था ।  हज़रत ईसा अल मसीह (अलै.) इस में बहुत ही ख़ास हैं क्यूंकि वह इंजील के मरकज़ हैं ।

हम हरे रंग के ज़माने में देखते हैं कि बनी इसराईल मिसर में गुलाम बतोर ज़िन्दगी गुज़ारते जा रहे थे ।

यह वक़्त का ज़माना उस वक़्त शुरू हुआ जब युसूफ जो हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का पर पोता था उसने अपने लोगों को मिसर की तरफ़ रहनुमाई की मगर उसके मरने के बाद जो फ़िरों तख़्त पर बैठा था वह युसूफ को नहीं जानता था ।  इसलिए बनी इस्राईल वहां पर गुलाम बन गए ।  फिर हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) बनी इस्राईल को फ़सह की निशानी के साथ मिसर कि गुलामी से छुड़ाया और उनकी रहनुमाई की ।

तो फिर हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के साथ बनी इस्राईल की तारीख़ बदलती है । और अब इस को पीले रंग में  दिखाया गया है ।  

 बनी इस्राईल इस्राईल के मुल्क या फ़लस्तीन में रहते हैं ।  हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) उन पर अपनी ज़िन्दगी के आख़री अय्याम में बरकतों और लानतों का एलान करते हैं ।  जब वक़्त की लकीर हरे से पीले की तरफ़ जाती है तब से लेकर अब तक कई सौ साल के लिए कई सौ साल के लिए बनी इसराईल इस मुल्क में रह रहे हैं जिस का वायदा हज़रत इब्राहीम के निशान 1 में किया गया था ।   किसी तरह उन के पास कोई बादशाह नहीं है ।  न ही उन्हों ने येरूशलेम को अपना एक पाए तख़्त बतोर क़ायम किया था ।  इस ज़माने दौरान वक़्त कि लकीर में येरूशलेम किसी और क़ौम के मातहत में थी ।

किसी तरह ख़ुदा की तरफ़ से 1000 क़ब्ल मसीह के दौरान बनी इसराईल के बीच में हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) का भेजा जाना एक बड़ा बदलाव ले आया ।

 अपना महल होता है और वह नबी हज़रत समूएल (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये बादशाह होने बतोर मखसूस किये जाते हैं ।  और उन का बेटा सुलेमान जो अपनी हिकमत के लिए मशहूर था दाऊद का जानशीन बतोर हुकूमत करता है । सुलेमान येरूशलेम शहर में एक आलिशान खूबसूरत हैकल ख़ुदावंद के लिए तामीर करता है ।  दाऊद बादशाह की  नसल 400 साल तक लगातार हुकूमत करते हैं । और इस ज़माना । ए। वक़्त को हलके नीले रंग में ज़ाहिर किया गया है ।  (क़ब्ल मसीह 1000 ।  600) , यह ज़माना बनी इस्राईल के लिए सुनहरा ज़माना था ।  क्यूंकि उनहोंने वायदा किया हुआ बरकतों को देखना शुरू किया था ।  यह उस ज़माने का सब से बड़ा ताक़तवर हुकूमत था ।  क्यूंकि इस में एक आला (तरक़क़ी याफ़ता) मुआशरा था ।  उनकी एक अच्छी तहज़ीब थी ।  उनके पास ए३क आलिशान मंदिर था । और यह एक ऐसा जाना था जिस में कई एक नबियों के पास अल्लाह के कई एक पैग़ाम मौजूद थे । और वह ज़बूरों में कलमबंद किये गए थे जिन्हें हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) ने शुरू किया था ।  कई एक नबियों का भेजा जाना और क़ौम के लोगों और बादशाहों तक पैग़ाम पहुंचाना इस लिए था क्यूंकि दिन ब दिन लोग ज़ियादा से ज़ियादा बिगड़ते जारहे थे ।  ग़ैर मबूदों की परस्तिश कर रहे थे और दस अहकाम की ख़िलाफ़ वर्ज़ी कर रहे थे । सो अल्लाह ने उनके दरमियान नबियों को भेज कर उन्हें ख़बरदार किया और उन्हें याद दिलाया कि अगर वह अपने बुरे कामों से बाज़ नहीं आयेंगे तो हज़रत मूसा की लानतें उन पर नाजिल होंगी मगर उनहोंने सुना अनसुना करदिया ।

आखिर ए कार 600 क़ब्ल मसीह के दौरान हज़रत मूसा की लानतें सच साबित होने लगीं ।  नबुकद नेज़र जो एक ज़बरदस्त बादशाह था बाबुल में आया । और हज़रत मूसा ने जिसतरह अपनी लानत की पेश बीनी में लिखा था । कि

खुदावंद दूर से बल्कि ज़मीन के किनारे से एक क़ौम को तुझ पर चढ़ा लाएगा जैसे उक़ाब टूट कर आता है ।  उस  क़ौम कि ज़ुबान को तू नहीं समझेगा ।  उस क़ौम के लोग तुर्श रू होंगे जो न बुड्ढों का लिहाज़ करेंगे न जवानों पर तरस खाएंगे …और वह तेरे तमाम मुल्कों में तेरा मुहासरा तेरी ही बसतियों में किये रहेंगे ।

इस्तिसना 28:49। 52

नबुकद नेज़र बादशाह ने येरूशलेम को फ़तेह किया , आग ज़नी फैला कर उसको तेहस नेहस किया ।  फिर उस की सल्तनत ने बनी इसराईल की अक्सरियत को अपने निहायत वसीअ शहर बाबुल में लेजाकर जिलावतन कर दिया । बाक़ी के सिर्फ़ ग़रीब इसराईल पीछे छोड़ दिए गए थे ।  इसतरह से हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) कि पेशीन गोई पूरी हुई  जिसतरह उन्हों कहा कि :

और तुम उस मुल्क से उखाड़ दिए जाओगे जहां तू उस पर क़ब्ज़ा क़ब्ज़ा करने को जा रहा है ।  और खुदावंद तुझको ज़मीन के एक सिरे से दुसरे सिरे तक तमाम क़ौमों में परागंदा करेगा ।                    

इस्तिसना 28 : 63। 64

फ़तेह किया और जिलावतन करके बाबुल को ले गया ।

अब तक जो 70 साल हुए इस अरसे को सुरख़ रंग में दिखाया गया है ।  बनी इसराईल जिलावतन बतोर वायदा किया मुल्क के बाहर रहने लगे ।

इस के बाद फ़ारस का बादशाह साइरस ने बाबुल को फ़तह किया ।  और साइरस दुनया का सब से बड़ा ज़बरदस्त बादशाह बन गया ।  और उसने एक शाही फरमान जारी किया और इजाज़त कि बनी इस्राईल अपने मुल्क को वापस लौट जाएं ।

किसी तरह बनी इसराईल एक आज़ाद मुल्क में नहीं थे ।  अब वह एक निहायत वसीअ फ़ारस कि सल्तनत के मातहत एक रियासत में रहने लगे थे । यह 200 साल तक जारी रहा और इसको गुलाबी रंग के वक़्त की लकीर में दिखाया गया है ।  इसी अरसे के दौरान मंदिर को दुबारा तामीर किया गया (जो दूसरा मंदिर बतोर जाना जाने लगा था) और पुराने अहद नामे के आख़री नबियों के पास अपने पैग़ामात थे ।

और फिर सिकंदर – ए –  आज़म आज़म ने फ़ारसी सल्तनत फ़तह हासिल की और इस्राईल को अपनी सल्तनत में एक रियासत बनाया जो कि दुसरे 200 साल यह सल्तनत भी जारी रहा ।  इसे गहरे नीले रंग में दिखाया गया है ।

फिर रोमियों ने यूनानी सल्तनत को शिकस्त दी और वह एक ज़बरदस्त रोमी सल्तनत बतोर रूनुमा हुए ।  फिर से एक बार बनी इसराईल इस सल्तनत में सिमट कर रह गए और उसको हलके पीले रंग में दिखाया गया है ।  ज़माने में ही नबी हज़रत ईसा अल मसीह इसराएल में रहते थे ।  यह हमें समझाता है कि सारे अनाजील के बयानात में बार बार रोमी गवर्नर और रोमी सिपाहियों का ज़िक्र क्यूँ आता है  – क्यूंकि हज़रत ईसा अल मसीह के दरान ए ज़िन्दगी में रोमियों ने यहूदियों के मुल्क में हुकूमत की थी ।

हालाँकि, बेबीलोनियों (600 ईसा पूर्व) के समय से इस्राएलियों (या यहूदियों को अब उन्हें बुलाया गया था) के रूप में वे फिर से स्वतंत्र नहीं थे क्योंकि वे दाऊद के राजाओं के अधीन थे। वे अन्य लोगों की अन्य सरकारों द्वारा शासित थे। उन्होंने इस पर नाराजगी जताई और ईसा अल मसीह के गुजर जाने के बाद उन्होंने रोमन शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया। आजादी की जंग शुरू हो गई। लेकिन यहूदियों ने इस युद्ध को खो दिया। वास्तव में रोमन आए और यरूशलेम को नष्ट कर दिया, 2 टेंपल को जला दिया और यहूदियों को रोमन साम्राज्य में गुलाम बना दिया। चूंकि यह साम्राज्य इतना विशाल था, इसलिए यहूदियों को पूरी दुनिया में प्रभावी रूप से फैलाया गया था।

और इसी हालत में यह लोग लगभग 2000 साक यूँ ही परागंदा हो रहे थे , मारे मारे फिर रहे थे , एक दुसरे से अलाहिदा होते रहे , ग़ैर मुल्कों में बसते रहे ।  यह उनकी बदनसीबी थी कि वह किसी भी मुल्क में क़बूल नहीं किये गए ।  हज़रत मूसा के अलफ़ाज़ जो लानत बतोर थे वह सब के सब जिसतरह तौरात में लिखी गई हैं पूरे हुए ।

…उन क़ौमों के बीच तुझको चैन नसीब न होगा और न तेरे पांव के तलवों को आराम मिलेगा बल्कि खुदावंद तुझको वहां दिल लरज़ान और आँखों की धुन्द्लाहट और जी की कुढ़न देगा ।

इस्तिसना 28 :65

तो फिर क्या हज़रत मूसा की ला’नतें जो बनी इसराईल के ख़िलाफ़ थीं पूरी हुईं थीं ? जी हाँ । । ।  पूरी तफ़सील के साथ यह पूरी हुईं ।  बनी इस्राईल के ख़िलाफ़ लानतें जो की गयी थीं वह हमें जो यहूदी नहीं हैं यह सवाल पूछने पर मजबूर करते हैं :

तब वह बल्कि सब कौमें पूछेंगी कि “खुदावंद ने इस मुल्क से ऐसा बर्ताव क्यूँ किया ? और ऐसे बड़े क़हर के भड़कने का सबब क्या है ?”

तो इस का जवाब यह होगा : “… उस वक़्त लोग जवाब देंगे कि खुदवान इनके बाप दादा के ख़ुदा ने जो अहद इनके साथ इनको मुल्क ए मिसर के निकालते वक़्त बाँधा था उसे इन लोगों ने छोड़ दिया” ।  

इस्तिसना 29:24। 25

हमारे लिए यह एक अहम् निशान है कि नबियों की तंबीह (चितौनियों) को संजीदा तोर से लें –   क्यूंकि यह तंबीह हमारे लिए भी हो सकते हैं ।

जी हाँ यह तारीख़ी जायज़ा सिर्फ़ 2000 साल पहले तक ही जाता है ।  मगर यह जान्ने के लिए यहाँ पर किलिक करें कि किसतरह नबी हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बरकतें और ला’नतें हमारे इस मौजूदा ज़माने में इख्तिताम तक पहुंची यानी इसका ख़ात्मा हुआ ।                 

मुझे अफ़सोस है । यह ख़ुश ख़बरी नहीं है ।  दर असल यह बहुत ही बुरी ख़बर है ,क्यूंकि इस का मतलब यह है कि आप के और मेरे पास एक ही मसला है वह यह है कि हमारे पास रास्त्बाज़ी नहीं है ।  रास्त्बाज़ी एक अहम् चीज़ है क्यूंकि यह बुन्याद है जो ख़ुदा की बादशाही (जन्नत) का हक़दार बनाता है ।  हमारे एक दुसरे के साथ का बर्ताव ही हमारी रास्त्बाज़ी है (जैसे झूट नहीं बोलना , चोरी न करना ,खून न करना , ज़िना न करना वगैरा) और सही मायनों में अल्लाह की इबादत करना जिस से हम जन्नत के वारिस हो सकते हैं ।  इसी लिए सच्ची रास्त्बाज़ी की ज़रुरत है ताकि उस की मुक़द्दस बादशाही में दाख़िल हों जिसतरह हज़रत दाऊद ज़बूरों में कहते हैं ।मगर अफ़सोस कि बात तो यह है कि कुछ ही लोगों के बारे में ज़िकर है कि वह ख़ुदा की मुक़द्दस बादशाही में दाख़िल होंगे । इस लिए वह तारीफ़ के काबिल हैं

हे यहोवा, तेरे पवित्र तम्बू में कौन रह सकता है?
    तेरे पवित्र पर्वत पर कौन रह सकता है?
केवल वह व्यक्ति जो खरा जीवन जीता है, और जो उत्तम कर्मों को करता है,
    और जो ह्रदय से सत्य बोलता है। वही तेरे पर्वत पर रह सकता है।
ऐसा व्यक्ति औरों के विषय में कभी बुरा नहीं बोलता है।
    ऐसा व्यक्ति अपने पड़ोसियों का बुरा नहीं करता।
    वह अपने घराने की निन्दा नहीं करता है।
वह उन लोगों का आदर नहीं करता जो परमेश्वर से घृणा रखते हैं।
    और वह उन सभी का सम्मान करता है, जो यहोवा के सेवक हैं।
ऐसा मनुष्य यदि कोई वचन देता है
    तो वह उस वचन को पूरा भी करता है, जो उसने दिया था।
वह मनुष्य यदि किसी को धन उधार देता है
    तो वह उस पर ब्याज नहीं लेता,
और वह मनुष्य किसी निरपराध जन को हानि पहुँचाने के लिये
    घूस नहीं लेता।

यदि कोई मनुष्य उस खरे जन सा जीवन जीता है तो वह मनुष्य परमेश्वर के निकट सदा सर्वदा रहेगा।

ज़बूर 15:1-5

गुनाह को समझना

मगर जबकि आप ( और मैं ) हमेशा इसी हालत में क़ायम नहीं रहते क्यूंकि जब हम अहकाम की पाबंदी नहीं करते हैं तब हम गुनाह करते हैं । तो फिर गुनाह क्या है ? तौरात की पांच किताबों के बाद पुराने अहद्नामे के किताब की एक आयत ने इसे बेहतर तरीक़े से समझने में मेरी मदद की है ।यह आयत कहती है ।

“उन सब लोगों में हत्थे जवान थे जिन में से हर एक फ़लाख़ुन से बाल के निशान पर बगैर ख़ता किये पत्थर मार सकता था” ।  

कुज़ात 20:16

यह आयत बयान करती है कि वह सिपाही जो फ़लाखुन बाज़ थे वह कभी फ़लाखुन बाज़ी में निशाना चूकते नहीं थे ।तौरेत और पुराने अहद नामे को इब्रानी ज़बान में नबियों के ज़रिये लिखा गया ।  इब्रानी ज़बान में जो लफ्ज़ चूकने के लिए लिखा गया है (יַחֲטִֽא) जिस को इस तरह से तलफ्फुज़ किया गया है (खाव – ताव) वह वही लफ़ज़ है जो गुनाह के लिए भी है । यूसुफ़ को जब मिसर में गुलाम की तरह बेच दिया गया तो ख़ुदा उस के साथ था ।  और वह फ़ोतीफ़ार के महल में रहने लगा था । फ़ोतीफ़ार की बीवी की निय्यत ख़राब थी ।  और वह यूसुफ़ को मजबूर कर रही थी कि उस के साथ हमबिस्तर हो । मगर कलाम कहता है कि यूसुफ़ उस का पीछा छुड़ाकर उस के कमरे से भाग निकला जबकि उस औरत ने यूसुफ़ से गुजारिश की थी ।इन बातों को हम क़ुरान शरीफ़ के सूरा यूसुफ़ में ( 2:22-29) में पढ़ सकते हैं ।  मगर यूसुफ़ ने उस औरत से क्या कहा देखें :

“इस घर में मुझ से बड़ा कोई नहीं , और मेरे आक़ा ने तेरे सिवा कोई चीज़ बाज़ नहीं रखी । क्यूंकि तू उस की बीवी है ।  सो भला मैं क्यूँ ऐसी बड़ी बदी करूं और ख़ुदा का गुनाहगार बनूँ ?।।।

दाइश 39:9

और दस आज्ञाओं के दिए जाने के बाद ही तौरात कहती है:

और दस अहकाम के दिए जाने के फ़ौरन बाद तौरात में हज़रत मूसा ने कहा : तुम डरो मत . . . क्यूंकि ख़ुदा इस लिए आया है कि तुम्हारा इम्तिहान करे और तुमको उस का खौफ़ हो ताकि तुम गुनाह न करो :

ख़ुरूज 20:20

 इन दोनों जगहों में वही इबरानी लफ्ज़ יַחֲטִֽא׃ का इस्तेमाल किया गया जिस का तर्जुमा गुनाह से है । यह बिलकुल हूबहू वही लफ्ज़ है जो फ़लाखुन बाज़ों के न चूकने के लिए इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब है गुनाह । जब बनी इस्राईल एक दुसरे के साथ सुलूक करते थे तो अल्लाह ने एक तस्वीर उन के सामने रखी थी जो हमें समझने में मदद करती है कि गुनाह क्या है ।  एक सिपाही जब एक पत्थर लेकर फ़लाखुन में रखता और निशाना लगाता था तो वह निशाना नहीं चूकता था अगर वह किसी तरह निशाना चूक जाए तो इस का मतलब यह है कि वह अपने मक़सद में नाकाम हो गया ।बिलकुल इसी तरह  अल्लाह ने हमको निशाने पर चलने के लिए (पैदा किया) है ।  यानी उसकी राहों में चलना ही हमारा निशाना होना चाहिए ।पर अगर हम नहीं चलते हैं तो अपने मक़सद में नाकाम हो जाते हैं । और ख़ुदा का मंसूबा हमारी ज़िन्दगी के लिएलिये पूरा नहीं होता । अल्लाह ने हम को पैदा किया  कि हम उस कि इबादत सच्चे दिल से करें और एक दुसरे से सच्चा बरताव करें ।  गुनाह करने का मतलब अपने निशाने से चूक जाना है ।  अल्लाह की पाक मरज़ी यह है कि हम उसके निशाने पर काम करें ।  उसके अहकाम पर चलते वक़्त अगर किसी भी तरह की ला परवाही हो जाती है तो इस का मतलब यह है कि हम अल्लाह के इरादे में चूक गए जो उस ने हमारे लिए ठहराया था ।

मौत : तौरात में गुनाह का अंजाम

सो आप देखें कि इसका अंजाम क्या था ? हम ने सब से पहला इशारा ज़रत आदम की निशानी में देखा था जब आदम ने न फ़रमानी कि थी । (सिर्फ़ एक बार)। इस एक नाफ़रमानी के बाइस अल्लाह ने उसको फानी बना दिया । इस का मतलब यह कि अब वह मर सकता है । यही गुनाह का सिलसिला हज़रत नूह की निशानी के साथ जारी रहता है । मगर अल्लाह ने लोगों का इंसाफ़ मौत के ज़रिये से किया जो एक बड़ा सैलाब बन कर उमंड पड़ा । फिर यह हज़रत लूत की  निशानी के साथ जारी रहा ।  वहां पर भी ख़ुदा का इंसाफ़ मौत के ज़रिये से ही था । यहाँ तक कि हज़रत लूत कि बीवी भी उन मरने वालों में शामिल थी ।  नाफ़रमानी के गुनाह ने उसको नमक का खम्बा बना दिया था ।  हज़रत इब्राहीम के बेटे हज़रत इस्हाक़ को भी मरने की नौबत आगयी थी मगर उस के बदले में एक मेंढा कुर्बान हुआ ।  मुल्क ए मिसर में वबा के दौरान हज़ारों पह्लोठों की मौत हुई ।  इस से बचने के लिए फ़सह को अंजाम देना पड़ा । इस फ़सह को रसम बतोर जारी रखा गया ।  इस से मुताल्लिक़ अल्लाह ने हज़रत मूसा से बात की ।

10 यहोवा ने मूसा से कहा, “आज और कल तुम लोगों को विशेष सभा के लिए अवश्य तैयार करो। लोगों को अपने वस्त्र धो लेने चहिए। 11 और तीसरे दिन मेरे लिए तैयार रहना चाहिए। तीसरे दिन मैं (यहोवा) सीनै पर्वत पर नीचे आऊँगा और सभी लोग मुझ (यहोवा) को देखेंगे। 12-13 किन्तु उन लोगों से अवश्य कह देना कि वे पर्वत से दूर ही रूकें। एक रेखा खींचना और उसे लोगों को पार न करने देना। यदि कोई व्यक्ति या जानवर पर्वत को छूएगा तो उसे अवश्य मार दिया जाएगा। वह पत्थरों से मारा जाएगा या बाणों से बेधा जाएगा। किन्तु किसी व्यक्ति को उसे छूने नहीं दिया जाएगा। लोगों को तुरही बजने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसी समय उन्हें पर्वत पर जाने दिया जाएगा।”

निर्गमन 19: 10-12

यह नमूना पूरे तौरात में जारी रहता है मगर अफ़सोस कि अक्सर बनी इस्राईल अल्लाह के इन अहकाम पर क़ायम नहीं रहे । (उन्हों ने गुनाह किया) । यहां तक कि वह तौबा के बगैर मुक़द्दस मुक़ाम में दाखिल हुए ।  यहाँ गौर करें कि इस का अंजाम क्या हुआ ।

 इस्राएलियों ने मूसा से कहा, “हम मर जाएंगे! हम खो गए, हम सब खो गए! जो कोई भी प्रभु के समीप आता है वह मर जाएगा। क्या हम सब मरने वाले हैं? ”

गिनती 17:12-13

हज़रत हारुन हज़रत मूसा के भाई थे ।उन के खुद के दो बेटे गुनाह कि हालत में मुक़द्दस मुक़ाम में दाखिल होने के सबब से उनकी मौत हुई ।

   हारून के दो पुत्र यहोवा को सुगन्ध भेंट चढ़ाते समय मर गए थे। फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपने भाई हारून से बात करो कि वह जब चाहे तब पर्दे के पीछे महापवित्र स्थान में नहीं जा सकता है। उस पर्दे के पीछे जो कमरा है उसमें पवित्र सन्दूक रखा है। उस पवित्र सन्दूक के ऊपर उसका विशेष ढक्कन लगा है। उस विशेष ढक्कन के ऊपर एक बादल में मैं प्रकट होता हूँ। यदि हारून उस कमरे में जाता है तो वह मर जायेगा!

अह्बार 16:1-2

न सिर्फ़ हज़रत हारुन के दो बेटों की वफ़ात न फ़रमानी की वजह से हुई बल्कि खुद हारून को भी अल्लाह ने हिदायत दी कि वह पाक तरीन मुक़ाम में बिला वजह बगैर कफ़फ़ारह के खून के न जाया करे वरना उन की भी मौत हो सकती है । क्यूंकि वहां सर्पोश रखी हुई थी ।

मैं (अर्थात अल्लाह) आपको (अर्थात् हारून) उपहार के रूप में पुरोहित की सेवा दे रहा हूँ। अभयारण्य के पास जो भी आता है उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है।

गिनती 18:7

बाद में कुछ बेटियां जिन के कोई भाई नहीं थे हज़रत मूसा के पास पहुँच कर ज़मीन की विरासत कि मांग करने लगीं ।उनका बाप सलाफ़हाद क्यूं मरा था ?

 “हमारे पिता जंगल में मर गए। वह कोरह के अनुयायियों में से नहीं था, जिसने प्रभु के खिलाफ एक साथ बंधे, लेकिन वह अपने पाप के लिए मर गया और कोई पुत्र नहीं छोड़ा। ”

गिनती 27:3

सो हज़रत मूसा के ज़माने में ही एक आलमगीर शरीयत का नमूना क़ायम हो चुका था जिसको तौरेत के ज़माने के आखिर में एक किताबी शक्ल दे दिया गया था

…….. इस बतोर कि हर कोई शख्स अपने ही गुनाह के लिए ज़िम्मे दार होगा यानी कि मरेगा

इस्तिसना 24:16

अल्लाह बनी इसराईल को (हम को) सिखा रहा था कि गुनाह का अंजाम मौत है ।

अल्लाह का रहम

मगर अल्लाह के रहम की बाबत क्या कहना ? क्या यह सबूत (क़ानून) हर जगह नाफ़िज़ की गई थीं ? क्या हम इस से कुछ सीख सकते हैं ? जी हां ! और जी हां ! यह हमारे लिए समझना ज़रूरी है कि जिस किसी ने गुनाह किया है और जिस में रास्त्बाज़ी की कमी पाई जाती है इस रहम की सूरत पर धियान दे ।  यह पहले ही से गिनती के कुछ निशानों में ज़ाहिर कर दिया गया है । अब इसे ज़ियादा साफ़ तोर पर हज़रत हारून की निशानी में देखा जा सकता है । यानी एक गाय और दो बकरों के निशान में ।

मुबारक हो ! इंसाफ़ का दिन जो आने वाला है इस्में आप और ज़ियादा भरोसे मंद और महफूज़ हो सकते हैं -अगर आप हमेशा तमाम अहकाम को मानते हैं तो आप रास्त्बाज़ी के हक़दार हैं – मैं किसी को शख्सी तोर से नहीं जानता -जिस ने इस तरीके से अहकाम की पाबंदी की हो तो सच मुच यह एक बड़ी कर्नुमायाँ है – मगर आप अपनी कोशिश को न रोकें बल्कि आप इस सीधी राह को अपनी ज़िन्दगी भर जारी रखना ज़रूरी होगा –

मैं ने बयान किया था कि शरीअत के इन दस अहकाम को मौखूफ़ नहीं किया जा सकता था क्यूंकि इन का ताल्लुक़ एक ख़ुदा की इबादत करने , ज़िना न करने , चोरी न करने , और सच्चाई पर क़ायम रहने के मामलात से जुड़ा हुआ था -बल्कि नबियों ने और ज़ियादा इन अहकाम पर पाबन्द होने के लिए जोर दिया था -ज़ेल में वह  बातें हैं जो ईसा अल मसीह (अलै) ने इंजील ए शरीफ़ में कहा कि किस तरह इन दस अहकाम की पाबंदी करनी है -वह अपनी तालीम में फ़रीसियों से मुख़ातब था -यह उस के ज़माने के मज़हबी उस्ताद थे जो शरीअत से वाक़िफ़कार थे – वह लोग बहुत मज़हबी और अपने ज़माने के आलिम उलमा माने जा सकते थे –

दस अहकाम पर हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के अलफ़ाज़

20 मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जब तक तुम व्यवस्था के उपदेशकों और फरीसियों से धर्म के आचरण में आगे न निकल जाओ, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं पाओगे।

क्रोध

21 “तुम जानते हो कि हमारे पूर्वजों से कहा गया था ‘हत्या मत करो [a] और यदि कोई हत्या करता है तो उसे अदालत में उसका जवाब देना होगा।’ 22 किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि जो व्यक्ति अपने भाई पर क्रोध करता है, उसे भी अदालत में इसके लिये उत्तर देना होगा और जो कोई अपने भाई का अपमान करेगा उसे सर्वोच्च संघ के सामने जवाब देना होगा और यदि कोई अपने किसी बन्धु से कहे ‘अरे असभ्य, मूर्ख।’ तो नरक की आग के बीच उस पर इसकी जवाब देही होगी।

23 “इसलिये यदि तू वेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहा है और वहाँ तुझे याद आये कि तेरे भाई के मन में तेरे लिए कोई विरोध है 24 तो तू उपासना की भेंट को वहीं छोड़ दे और पहले जा कर अपने उस बन्धु से सुलह कर। और फिर आकर भेंट चढ़ा।

25 “तेरा शत्रु तुझे न्यायालय में ले जाता हुआ जब रास्ते में ही हो, तू झटपट उसे अपना मित्र बना ले कहीं वह तुझे न्यायी को न सौंप दे और फिर न्यायी सिपाही को, जो तुझे जेल में डाल देगा। 26 मैं तुझे सत्य बताता हूँ तू जेल से तब तक नहीं छूट पायेगा जब तक तू पाई-पाई न चुका दे।

व्यभिचार

27 “तुम जानते हो कि यह कहा गया है, ‘व्यभिचार मत करो।’ [b] 28 किन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि यदि कोई किसी स्त्री को वासना की आँख से देखता है, तो वह अपने मन में पहले ही उसके साथ व्यभिचार कर चुका है। 29 इसलिये यदि तेरी दाहिनी आँख तुझ से पाप करवाये तो उसे निकाल कर फेंक दे। क्योंकि तेरे लिये यह अच्छा है कि तेरे शरीर का कोई एक अंग नष्ट हो जाये बजाय इसके कि तेरा सारा शरीर ही नरक में डाल दिया जाये। 30 और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझ से पाप करवाये तो उसे काट कर फेंक दे। क्योंकि तेरे लिये यह अच्छा है कि तेरे शरीर का एक अंग नष्ट हो जाये बजाय इसके कि तेरा सम्पूर्ण शरीर ही नरक में चला जाये।

मत्ती 5:20 -30

इस के अलावा हज़रत ईसा अल मसीह के रसूल —उसके साथी – हम नशीन उन्हों ने भी बुत परस्ती की बाबत तालीम दी -उन्हों ने तालीम दी कि बुत परस्ती सिर्फ़ पत्थर की परस्तिश करना ही नहीं है बल्कि किसी भी चीज़ को इबादत में अल्लाह के साथ शरीक करना बुतपरस्ती है – और इस में दौलत भी शामिल है – चुनांचे आप गौर करेंगे कि वह तालीम देते हैं कि लालच भी एक तरह की बुत परस्ती है , क्यूंकि एक लालची शख्स ख़ुदा के साथ दौलत की भी इबादत करता है -ईसा अल मसीह ने फ़रमाया कि “तुम ख़ुदा और दौलत दोनों की ख़िदमत नहीं कर सकते”-

इसलिए तुममें जो कुछ सांसारिक बातें है, उसका अंत कर दो। व्यभिचार, अपवित्रता, वासना, बुरी इच्छाएँ और लालच जो मूर्ति उपासना का ही एक रूप है, इन ही बातों के कारण परमेश्वर का क्रोध प्रकट होने जा रहा है। [a]

कुलुस्सियों 3:5,6

तुममें न तो अश्लील भाषा का प्रयोग होना चाहिए, न मूर्खतापूर्ण बातें या भद्दा हँसी ठट्टा। ये तुम्हारी अनुकूल नहीं हैं। बल्कि तुम्हारे बीच धन्यवाद ही दिये जायें। क्योंकि तुम निश्चय के साथ यह जानते हो कि ऐसा कोई भी व्यक्ति जो दुराचारी है, अपवित्र है अथवा लालची है, जो एक मूर्ति पूजक होने जैसा है। मसीह के और परमेश्वर के राज्य का उत्तराधिकार नहीं पा सकता।

देखो, तुम्हें कोरे शब्दों से कोई छल न ले। क्योंकि इन बातों के कारण ही आज्ञा का उल्लंघन करने वालों पर परमेश्वर का कोप होने को है।

और इफ़सियों 5:4-6

यह तशरीहात असली दस अहकाम की तरफ़ रुजू कराती हैं जो एक बड़ी हद तक बाहरी आमाल के साथ बर्ताव करते हुए अंदरूनी तहरीक (मक़ासिद) की तरफ़ लेजाती हैं जिसे सिर्फ़ अल्लाह त आला ही देख सकता है – यह शरीअत को और ज़ियादा मुश्किल बना देती हैं –

आप अपने जवाब पर दुबारा गौर कर सकते हैं कि क्या आप दस अहकाम की पाबन्दी कर रहे हैं – पर अगर आप को यक़ीन है कि आप सारे अहकाम की पाबन्दी कर रहे हैं तो इंजील के मुताबिक़ आप के लिए किसी मक़सद का हाल नहीं है – और आप के लिए कोई ज़रुरत भी नहीं है कि आगे किसी निशान के पीछे चलें या इंजील -ए- शरीफ़ को समझने की कोशिश करें -यह इसलिए कि इंजील सिर्फ़ उन्ही के लिए है जो शरीअत की पाबंदी से नाकाम रहते हैं उनके लिए नहीं जो इस के पाबन्द हैं – ईसा अल मसीह ने इस बात को इस तरह से समझाया.

 

10 ऐसा हुआ कि जब यीशु मत्ती के घर बहुत से चुंगी वसूलने वालों और पापियों के साथ अपने अनुयायियों समेत भोजन कर रहा था 11 तो उसे फरीसियों ने देखा। वे यीशु के अनुयायियों से पूछने लगे, “तुम्हारा गुरु चुंगी वसूलने वालों और दुष्टों के साथ खाना क्यों खा रहा है?”

12 यह सुनकर यीशु उनसे बोला, “स्वस्थ लोगों को नहीं बल्कि रोगियों को एक चिकित्सक की आवश्यकता होती है। 13 इसलिये तुम लोग जाओ और समझो कि शास्त्र के इस वचन का अर्थ क्या है, ‘मैं बलिदान नहीं चाहता बल्कि दया चाहता हूँ।’ [a] मैं धर्मियों को नहीं, बल्कि पापियों को बुलाने आया हूँ।”

मत्ती 9 :10 -13

कभी कभी मुझ से पूछा जाता है कि अगर अल्लाह सच मुच हम से तवक़क़ो रखता और सौ फ़ीसदी फ़रमान बरदारी की उम्मीद करता है ? हम इस की बाबत इंसानों के दरमियान बहस कर सकते हैं ।  मगर इस सवाल का जवाब इंसानों के ज़रिये नहीं बल्कि अल्लाह की जानिब से ही मिलेगा ।  सो बजाए इस के कि मैं तौरात से आयतों को चुनूं जो हम से कहते हैं कि फ़रमान बरदारी के फैलाव के लिए या इस में क़दम बढ़ाने के लिए कीं बातों की ज़रुरत है या कीं बातों की उम्मीद की जाती है ।  ज़ेल में कुछ बातें हैं उनपर गौर करें या आप खुद पता लगाएं कि इनसे मुताल्लिक़ कितनी आयतें कितनी साफ़ तोर पर बयान करती हैं । यह आयतें इस तरह कि मुहावरों से भरी हैं जैसे : “ख़बरदारी से शरीयत की पाबन्दी करो”…“तमाम अहकाम की पाबन्दी करो”…“खबरदारी से पाबन्दी करो”…. “अपने पूए दिल से इन्हें मानो”…“हर हमेशा शरीयत की बातों पर धियान दो”…“पूरी फ़र्मान्बर्दारी करो”… “शरीयत की तमाम बातों को सुनो” वगैरा वगैरा ।

इस फ़रमान बरदारी का 100 % फ़ीसदी मेयार बाद के नबियों के ज़माने में कभी नहीं बदला ।  न ही इंजील में ईसा अल मसीह के ज़माने में ।

17 “यह मत सोचो कि मैं मूसा के धर्म-नियम या भविष्यवक्ताओं के लिखे को नष्ट करने आया हूँ। मैं उन्हें नष्ट करने नहीं बल्कि उन्हें पूर्ण करने आया हूँ। 18 मैं तुम से सत्य कहता हूँ कि जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।

19 “इसलिये जो इन आदेशों में से किसी छोटे से छोटे को भी तोड़ता है और लोगों को भी वैसा ही करना सिखाता है, वह स्वर्ग के राज्य में कोई महत्व नहीं पायेगा। किन्तु जो उन पर चलता है और दूसरों को उन पर चलने का उपदेश देता है, वह स्वर्ग के राज्य में महान समझा जायेगा।

मत्ती 5:17- 19

और हज़रत मोहम्मद सल्लम ने इस से मुताल्ल्लिक़ जो बात कही इस का ज़िक्र पाया जाता है ।

नाराज़ अब्दुल्ला इब्न उमर: .. यहूदियों का एक समूह आया और अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) को क्वफ में आमंत्रित किया। … उन्होंने कहा: Q अबुलकसीम, हमारे एक आदमी ने एक महिला के साथ व्यभिचार किया है; इसलिए उन पर फैसला सुनाएँ। ‘ उन्होंने अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) के लिए एक गद्दी रखी जो उस पर बैठ गया और कहा: “टोरा लाओ”। इसे तब लाया गया था। फिर उसने अपने नीचे से गद्दी वापस ले ली और यह कहते हुए तोराह पर रख दिया: “मैं तुम पर विश्वास करता था और तुम कौन हो।”

सुनन अबू दाऊद किताब 38 ।  सफ़्हा नंबर 4434

और यही एक बात काबिल ए क़बूल है कि अल्लाह जन्नत को तैयार कर रहा है और यह कामिल और मुक़द्दस मुक़ाम है जहां वह सुकूनत करता है ।  वहां न पुलिस है न फ़ौज ।  न वहां क़ुफुल ताले की ज़रुरत है । वहां पर मुहाफ़िज़ों की भी ज़रुरत नहीं है । आज हमें दुनया में रहते हुए खुद को और दूसरों के गुनाह और उसके असरात से हिफाज़त करने की ज़रुरत है ।  यही हमारे लिए जन्नत साबित होगा ।  मगर इस कामिल और मुक़द्दस मुक़ाम में सिर्फ़ कामिल लोग ही दाखिल हो सकते हैं । और वह कामिल लोग कौन हैं ? वह कामिल लोग जो तमाम अहकाम को “हमेशा”  “पूरी तरह से” और हर बात में मानने के लिए तैयार रहते हैं ।

यहाँ तौरेत शरीयत के अहकाम की फ़रमानबरदारी में आगे बढ़ने के लिए जिस बात की ज़रुरत को बताती है वह यह है कि                                  

तौरात से : नबी इस्माईल (अलैहिस्सलाम) का बयान क्या है ?

हज़रत इस्माईल की ज़िन्दगी में जो भी कुछ हुआ इस कि बाबत बहुत सारी ग़लत फ़हमियां हैं। तौरात को जो कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के… Read More »तौरात से : नबी इस्माईल (अलैहिस्सलाम) का बयान क्या है ?

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने किसकी क़ुर्बानी दी , इस्माईल की या इस्हाक़ की?

जब हम नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत जब हम बात करते हैं तो मेरे दोस्त लोग इसरार करते हैं कि बेटा… Read More »इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने किसकी क़ुर्बानी दी , इस्माईल की या इस्हाक़ की?

बाइबिल (अल किताब ) का तर्जुमा कैसे हुआ

 बाइबिल या अल किताब आमतौर पर इसकी असली ज़बानों  (हिब्रू और यूनानी ) में नहीं पढ़ी जाती है।इसका मतलब  यह नहीं कि  यह इन असली… Read More »बाइबिल (अल किताब ) का तर्जुमा कैसे हुआ

बाइबिल के मुख्तलिफ़ तर्जुमें क्यों हैं ?

हाल ही में मैं एक मस्जिद में इमाम साहिब की तालीम को सुन रहा था I उन्हों ने जो कुछ कहा वह बिलकुल गलत था… Read More »बाइबिल के मुख्तलिफ़ तर्जुमें क्यों हैं ?