रमज़ान का पाक महिना – कैसे रोज़ा रखें

रमज़ान के दिनों में जब रोज़े का वक़्त होता है मैं ने अपने दोस्तों से बात करते सुना कि किस तरह बेहतरीन तरीक़े से रोज़ा रखा जाता है। बात चीत का मुद्दा यह है कि रोज़ा कब शुरू किया जाता है और कब ख़त्म किया जाता है। जब रमज़ान गर्मियों में शुरू होता है और जब हम आम तोर से दिन की रौशनी में 16 घंटे से ज़ि यादा भूके होते हैं तो सवाल यह उठता है कि रोज़ा के लिए क्या कोई किसी और मेयारी दिन की रौशनी का इस्तेमाल कर सकता है (जैसे मक्का में तुलु –ए-आफ़ताब से लेकर गुरूब –ए- आफ़ताब तक वक्फ़े का वक़त)। मेरे दोस्त फ़रक़ फ़रक़ उलमा के क़ानून क़ाइदे इस के लिए इस्तेमाल में लाते हैं और वही सवालात कि क्या चीज़ जायज़ है और क्या चीज़ नहीं।

जिस तरह से यह बहस अहमियत रखते हैं , हम अक्सर मसावी तोर से अहम् सवाल को भूल जाते हैं कि क्यूँकर जियें कि हमारे रोज़े अल्लाह को ख़ुश कर सकें। नबियों ने इस की बाबत लिखा और उनका पैग़ाम सही जिंदगी की बाबत एक खुश करने वाले रोज़े के लिए उन के ज़माने में जितना अहम् था उतना ही आज भी अहम् है।

नबी यसायाह (अलैहिस्सलाम) ऐसे ज़माने में रहते थे जबकि ईमानदार लोग अपने मज़हबी फ़राइज़ (जैसे नमाज़ और रोज़ा) को पाबन्दी के साथ अंजाम दे रहे थे। वह मज़हबी थे।      

नबी यसायाह (अलैहिस्सलाम) की तारीख़ी वक़्त की लकीर ज़बूर में दीगर नबियों के साथ  

मगर वह एक बड़े बिगाड़ का भी ज़माना था (देखें ज़बूर का तआरुफ़)I लोग लगातार एकदूसरे से लड़ झगड़ रहे थे हुज्जत करते और बहस करते थे। तब नबी ने उनके लिए यह पैग़ाम ले आया।  

सच्चा रोज़ा

  ला खोल कर पुकार, कुछ न रख छोड़, नरसिंगे का सा ऊंचा शब्द कर; मेरी प्रजा को उसका अपराध अर्थात याकूब के घराने को उसका पाप जता दे।
2 वे प्रति दिन मेरे पास आते और मेरी गति बूझने की इच्छा ऐसी रखते हैं मानो वे धर्मी लोगे हैं जिन्होंने अपने परमेश्वर के नियमों को नहीं टाला; वे मुझ से धर्म के नियम पूछते और परमेश्वर के निकट आने से प्रसन्न होते हैं।
3 वे कहते हैं, क्या कारएा है कि हम ने तो उपवास रखा, परन्तु तू ने इसकी सुधि नहीं ली? हम ने दु:ख उठाया, परन्तु तू ने कुछ ध्यान नहीं दिया? सुनो, उपवास के दिन तुम अपनी ही इच्छा पूरी करते हो और अपने सेवकों से कठिन कामों को कराते हो।
4 सुनो, तुम्हारे उपवास का फल यह होता है कि तुम आपस में लड़ते और झगड़ते और दुष्टता से घूंसे मारते हो। जैसा उपवास तुम आजकल रखते हो, उस से तुम्हारी प्रार्थना ऊपर नहीं सुनाई देगी।
5 जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूं अर्थात जिस में मनुष्य स्वयं को दीन करे, क्या तुम इस प्रकार करते हो? क्या सिर को झाऊ की नाईं झुकाना, अपने नीचे टाट बिछाना, और राख फैलाने ही को तुम उपवास और यहोवा को प्रसन्न करने का दिन कहते हो?
6 जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूं, वह क्या यह नहीं, कि, अन्याय से बनाए हुए दासों, और अन्धेर सहने वालों का जुआ तोड़कर उन को छुड़ा लेना, और, सब जुओं को टूकड़े टूकड़े कर देना?
7 क्या वह यह नहीं है कि अपनी रोटी भूखों को बांट देना, अनाथ और मारे मारे फिरते हुओं को अपने घर ले आना, किसी को नंगा देखकर वस्त्र पहिनाना, और अपने जातिभाइयों से अपने को न छिपाना?
8 तब तेरा प्रकाश पौ फटने की नाईं चमकेगा, और तू शीघ्र चंगा हो जाएगा; तेरा धर्म तेरे आगे आगे चलेगा, यहोवा का तेज तेरे पीछे रक्षा करते चलेगा।
9 तब तू पुकारेगा और यहोवा उत्तर देगा; तू दोहाई देगा और वह कहेगा, मैं यहां हूं। यदि तू अन्धेर करना और उंगली मटकाना, और, दुष्ट बातें बोलना छोड़ दे,
10 उदारता से भूखे की सहायता करे और दीन दु:खियों को सन्तुष्ट करे, तब अन्धियारे में तेरा प्रकाश चमकेगा, और तेरा घोर अन्धकार दोपहर का सा उजियाला हो जाएगा।
11 और यहोवा तुझे लगातार लिए चलेगा, और काल के समय तुझे तृप्त और तेरी हड्डियों को हरी भरी करेगा; और तू सींची हुई बारी और ऐसे सोते के समान होगा जिसका जल कभी नहीं सूखता।
12 और तेरे वंश के लोग बहुत काल के उजड़े हुए स्थानों को फिर बसाएंगे; तू पीढ़ी पीढ़ी की पड़ी हुई नेव पर घर उठाएगा; तेरा नाम टूटे हुए बाड़े का सुधारक और पथों का ठीक करने वाला पड़ेगा॥

यसायाह 58 1-12

क्या यह वायदे कसरत की ज़िन्दगी के लिए सच्चे और अजीब ओ गरीब रोज़ों के बाईस नहीं है ? मगर आगे चलकर न तो नबी की बातों पर धियान दिया न ही गुनाहों से तौबा करी (तौबा से मुताल्लिक़ नबी हज़रत यह्या की तालीम को ठुकरा रहे थे)। सो जिसतरह नबी हज़रत मूसा ने नबुवत की थी उनका उनका इन्साफ़ किया गया। हमारे लिए भी यह पैग़ाम आगाही और तंबीह के लिए है जबकि नबी हज़रत यसायाह के बयान के मुताबिक़ कि जिसतरह से उन्हों ने रोज़ों के दरमियान बर्ताव किया था उसी तरह आज के ज़माने में भी बरताव करते नज़र आते हैं I

हमारे इमाम जिन क्वानेन की इजाज़त देते हैं उसके मुताबिक़ रोज़े रखने के बावजूद भी अगर हम अल्लाह को खुश करने वाली जिंदगी न जीएं जिस से उसको ठेस लगती है तो हमारा कुछ फ़ाइदा न होगा। हमारे रोज़े बेकार साबित होंगे। सो नबी हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये अल्लाह के उस बड़े रहम को मालूम करें और समझें।       

हज़रत यूसुफ़ कौन था? उसका निशान क्या था

सूरा यूसुफ़ (सूरा 12 – यूसुफ़) नबी हज़रत यूसुफ़/जोसेफ़  की कहानी कहती है । नबी हज़रत यूसुफ़ हज़रत याक़ूब (जैकब) के बेटे थे , और हज़रत याक़ूब हज़रत इसहाक़ के बेटे थे , और हज़रत इसहाक़ नबी हज़रत इब्राहीम (अबराहाम) के बेटे थे । हज़रत याकूब के 12 बेटे थे , उन में से एक हज़रत यूसुफ़ थे । हज़रत याक़ूब यूसुफ़ को दीगर बेटों से ज़ियादा चाहते थे इस सबब से यूसुफ़ के 11 भाइयों ने उसके खिलाफ साज़िश की और उसके ख़िलाफ़ में जो उन्हों ने मनसूबा बांधा था यूसुफ़ की कहानी का एक रूप ले लिया । इस कहानी को हज़रत मूसा की तौरात में पहली बार 3500 साल पहले लिखा गया था । तौरात शरीफ़ से इस का पूरा बयान यहाँ पर है । और सूरा यूसुफ़ (सूरा 12 यूसुफ़) का बयान यहाँ पर है । सूरा यूसुफ़ हम से कहता है यह सिर्फ़ मामूली कहानी नहीं है बल्कि       

(ऐ रसूल) यूसुफ और उनके भाइयों के किस्से में पूछने वाले (यहूद) के लिए (तुम्हारी नुबूवत) की यक़ीनन बहुत सी निशनियाँ हैं ।

सूरए यूसुफ़ 12:7

कहानी में यूसुफ़ और उसके भाई मुतालाशियों के लिए कौन सी ‘निशानियाँ’ हैं ? हम इस कहानी को तौरात शरीफ़ और सूरा यूसुफ़ दोनों से नज़रे सानी करते हैं ताकि इन ‘निशानियों’ को समझ सकें ।   

सामने सिजदा करना  ….?

एक साफ़ निशानी वह ख़ाब है जो यूसुफ़ ने अपने बाप हज़रत याक़ूब से कही जहां  

(वह वक़्त याद करो) जब यूसूफ ने अपने बाप से कहा ऐ अब्बा मैने ग्यारह सितारों और सूरज चाँद को (ख़्वाब में) देखा है मैने देखा है कि ये सब मुझे सजदा कर रहे हैं।

सूरए यूसुफ़ 12:4

कहानी के आख़िर में हम हक़ीक़त में देखते हैं कि

(ग़रज़) पहुँचकर यूसुफ ने अपने माँ बाप को तख़्त पर बिठाया और सब के सब यूसुफ की ताज़ीम के वास्ते उनके सामने सजदे में गिर पड़े (उस वक़्त) यूसुफ ने कहा ऐ अब्बा ये ताबीर है मेरे उस पहले ख़्वाब की कि मेरे परवरदिगार ने उसे सच कर दिखाया बेशक उसने मेरे साथ एहसान किया जब उसने मुझे क़ैद ख़ाने से निकाला और बावजूद कि मुझ में और मेरे भाईयों में शैतान ने फसाद डाल दिया था उसके बाद भी आप लोगों को गाँव से (शहर में) ले आया (और मुझसे मिला दिया) बेशक मेरा परवरदिगार जो कुछ करता है उसकी तद्बीर खूब जानता है बेशक वह बड़ा वाकिफकार हकीम है

सूरए यूसुफ़ 12:100

पूरे क़ुरान शरीफ़ में सजदा करने को बहुत बार ज़िकर किया गया है । मगर वह सारे सजदे दुआ (नमाज़ या इबादत) में क़ादिरे मुतलक़ खुदा के सामने , का’बा में या अल्लाह के मोजिज़ों के सामने (जैसे मिसर के जादूगरों और हज़रत मूसा) के बीच जो करामात हुए इन के लिए सजदा करने का हवाला दिया गया है । मगर यहाँ एक मुसतस्ना वाली बात है कि एक आदमी (यूसुफ़) के सामने ‘सजदा करना’। एक दूसरा हूबहू वाक़िया उस वक़्त का है जब फ़रिश्तों को हुक्म दिया गया था कि हज़रत आदम के सामने सजदा करें । (सूरा ता-हा 116 और सूरा अल आराफ़ 11) । मगर फ़रिश्ते इनसान नहीं थे , और एक आम दस्तूर (क़ाइदा) यह कहता है कि बनी इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदावंद को ही सजदा करे ।        

और तमाम उमूर की रूजूअ खु़दा ही की तरफ होती है ऐ ईमानवालों रूकू करो और सजदे करो और अपने परवरदिगार की इबादत करो और नेकी करो ।

सूरए अल हज 22:77

हज़रत यूसुफ़ की बाबत क्या मुस्तस्ना थी कि हज़रत याक़ूब जो उनके वालिद थे , उनकी वालिदा और उनके भाइयों ने यूसुफ़ के सामने सजदा किया ?

इब्न आदम

वक़्त की लकीर नबी हज़रत दानिएल और दीगर ज़बूर के नबियों को दिखा रहा है  

इसी तरह बाइबिल में हमको हुक्म दिया गया है कि इबादत में या खुदावंद के आगे सजदा करें मगर यहाँ पर भी एक इस्तिसना की बात है । नबी हज़रत दानिएल ने एक एक रोया हासिल करी थी जो वक़्त से बहुत बहुत आगे नज़र आ रही थी कि खुदा की बादशाही का क़ायम किया जाना था और उसके रोया में उसने ‘इब्न आदम’ को देखा था ।    

13 मैं ने रात में स्वप्न में देखा, और देखो, मनुष्य के सन्तान सा कोई आकाश के बादलों समेत आ रहा था, और वह उस अति प्राचीन के पास पहुंचा, और उसको वे उसके समीप लाए।
14 तब उसको ऐसी प्रभुता, महिमा और राज्य दिया गया, कि देश-देश और जाति-जाति के लोग और भिन्न-भिन्न भाषा बालने वाले सब उसके आधीन हों; उसकी प्रभुता सदा तक अटल, और उसका राज्य अविनाशी ठहरा॥

दानिएल 7:13-14

रोया में लोग ‘इब्न आदम’ के सामने सजदा करते हैं , जिस तरह से हज़रत यूसुफ़ का ख़ानदान हज़रत यूसुफ़ के सामने सजदा कर रहे थे ।  

‘इब्न आदम’ एक लक़ब है जो नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने अक्सर अपने लिए इस्तेमाल किया था । उसने जब वह ज़मीन पर चलता था तालीम देने में , मरीज़ों को शिफ़ा देने में , क़ुदरत पर इख्तियार जताने में अपने बड़े इख़तियार का किरदार निभाया था । मगर वह उन दिनों में ‘आसमान के बादलों पर’ नहीं आया था जिस तरह से हज़रत दानिएल के रोया की पेशीन गोई की गयी है । यह इसलिए कि वह रोया आगे को मुस्तक़बिल की तरफ देखा जा रहा था माज़ी में उसकी पहली आमद से लेकर दूसरी आमद तक – और फिर वापस ज़मीन पर लौटने में ताकि दज्जाल को ख़तम करे उसे आना ज़रूरी था (जिसतरह हज़रत आदम को पहले से ही बताया गया था) और खुदा की बादशाही को क़ायम करनी थी ।

उनकी पहली आमद कुंवारी मरयम से पैदा होना लोगों को छुटकारा देने के लिए था ताकि खुदा की बादशाही के शहरी बन सके । मगर इस के बावजूद भी उसने नबुवत की कि किसतरह इब्न व् आदम अपनी दूसरी आमद में बादलों पर अपने लोगों को दुसरे लोगों से जुदा करेगा । उसने पेशे नज़र की कि तमाम कौमें उसके सामने सजदा कर रहे हैं जिसतरह यूसुफ़ के भाई खुद से यूसुफ़ के सामने सजदा किये थे । यहाँ वह बातें हैं जो मसीह ने तालीम दी थी ।

  31 जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्ग दूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिहांसन पर विराजमान होगा।
32 और सब जातियां उसके साम्हने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकिरयों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।
33 और वह भेड़ों को अपनी दाहिनी ओर और बकिरयों को बाई और खड़ी करेगा।
34 तब राजा अपनी दाहिनी ओर वालों से कहेगा, हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है।
35 क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी पिलाया, मैं पर देशी था, तुम ने मुझे अपने घर में ठहराया।
36 मैं नंगा था, तुम ने मुझे कपड़े पहिनाए; मैं बीमार था, तुम ने मेरी सुधि ली, मैं बन्दीगृह में था, तुम मुझ से मिलने आए।
37 तब धर्मी उस को उत्तर देंगे कि हे प्रभु, हम ने कब तुझे भूखा देखा और खिलाया? या प्यासा देखा, और पिलाया?
38 हम ने कब तुझे पर देशी देखा और अपने घर में ठहराया या नंगा देखा, और कपड़े पहिनाए?
39 हम ने कब तुझे बीमार या बन्दीगृह में देखा और तुझ से मिलने आए?
40 तब राजा उन्हें उत्तर देगा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया।
41 तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, हे स्रापित लोगो, मेरे साम्हने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है।
42 क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को नहीं दिया, मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी नहीं पिलाया।
43 मैं परदेशी था, और तुम ने मुझे अपने घर में नहीं ठहराया; मैं नंगा था, और तुम ने मुझे कपड़े नहीं पहिनाए; बीमार और बन्दीगृह में था, और तुम ने मेरी सुधि न ली।
44 तब वे उत्तर देंगे, कि हे प्रभु, हम ने तुझे कब भूखा, या प्यासा, या परदेशी, या नंगा, या बीमार, या बन्दीगृह में देखा, और तेरी सेवा टहल न की?
45 तब वह उन्हें उत्तर देगा, मैं तुम से सच कहता हूं कि तुम ने जो इन छोटे से छोटों में से किसी एक के साथ नहीं किया, वह मेरे साथ भी नहीं किया।
46 और यह अनन्त दण्ड भोगेंगे परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।

मत्ती 25:31-46

हज़रत यूसुफ़ और हज़रत ईसा अल मसीह

मुस्तस्ना के साथ जो दीगर बनी आदम जो अपने खुद के सामने सजदा करेंगे , हज़रत यूसुफ़ और हज़रत ईसा अल मसीह भी हूबहू इन्हीं नमूने के वाक़ियात से गुज़रे ।  ज़ेल के ख़ाके में ग़ौर करें कि उन दोनों की जिंदगियां किन किन तरीक़ों से मुशाबहत रखती थीं ।  

हज़रत यूसुफ़ की जिंदगी में वाक़ियात  हज़रत ईसा अल मसीह की जिंदगी में वाक़ियात
उसके भाई जो इसराईल के 12 क़बीले बन कर उभरे , उन्हों ने यूसुफ़ से नफरत की और और उसका इनकार किया  यहूदी लोग उन्ही क़बीलों से निकले एक क़ौम होने पर भी ईसा अल मसीह से नफ़रत की और उसको मसीहा होने से इनकार भी किया   
यूसुफ़ अपने भाइयों के मुस्तक़बिल के सजदे का एलान इस्राईल (याकूब) से करता है (याक़ूब का नाम खुदा के ज़रिये दिया गया था) ईसा अल मसीह अपने भाइयों की मुस्तक़बिल के सजदे की बाबत (अपने ज़ाती भाइयों) इस्राईल से पेश बीनी करते हैं (मरक़ुस 14:62)  
यूसुफ़ को उसके बाप याक़ूब के ज़रिये उसके भाइयों के पास भेजा जाता है मगर वह उसका इनकार कर उसके खिलाफ़ साज़िश करते हैं कि  उसकी जान ले ले  हज़रत ईसा अल मसीह को उसके बाप के ज़रिये अपने यहूदी भाइयों के पास भेजा गया “मगर उसके अपनों ने उसे कबूल नहीं किया”(युहन्ना 1:11) और उन्हों ने “उसकी जान लेने के  लिए उसके खिलाफ़ साज़िश की”(युहन्ना 11:53)    
उन्हों ने उसको ज़मीन के एक गढ़े में फ़ेंक दिया हज़रत ईसा अल मसीह ज़मीन के अन्दर आलमे अर्वाह में गए      
यूसुफ़ को बेचा गया और ग़ैर मुल्की सौदागरों के हाथों सोंपा गया ईसा अल मसीह को बेचा गया और ग़ैर क़ौमों के हाथों उस का काम तमाम करने के लिए सोंपा गया
उसको अपने मक़ाम से बहुत दूर ले जाया गया ताकि उसके भाइयों और बाप के ज़रिये मरा हुआ समझा जाए बनी इस्राईल और उसके यहूदी भाइयों ने सोचा कि ईसा अल मसीह का वजूद नहीं रहा औ अब वह मर गए हैं  
यूसुफ़ ने एक ख़ादिम की तरह खुद को हलीम किया     ईसा अल मसीह ने एक खादिम की सूरत इख्तियार की और इतना हलीम किया कि सलीबी मौत तक सह लिया (फ़िलि-2:7)  
यूसुफ़ पर गुनाह का झूठा इलज़ाम लगाया गया  यहूदियों ने अल मसीह पर “कई तरह के झूठे इलज़ाम लगाए” (मरक़ुस 15:3)  
यूसुफ़ को क़ैद में एक गुलाम की तरह भेजा जाता है जहां से वह पहले से ही कुछ क़ैदियों के तहख़ाने की तार्रीकी से आज़ाद किये जाने की पेशबीनी करता है (नान बाई)     हज़रत ईसा अल मसीह को भेजा गया था कि शिकस्ता दिलों को तसल्ली दे , क़ैदियों के लिए रिहाई और असीरों के लिए आज़ादी का एलान करे ….(यसायाह 61:1)
यूसुफ़ को मिस्र के तख़्त पर बिठाया गया और उसे मिसर के कुल इख्तियारत से नवाज़ा गया जो सिर्फ़ फ़िरोन को हासिल थे । जो लोग उसके सामने से गुज़रते थे उसको सिजदा करते थे ।    “इसी वास्ते खुदा ने भी उसे (मसीह को) बहुत सर बुलंद किया और उसे वह नाम बख्शा जो सब नामों से आला है ताकि येसू के नाम पर हर एक घुटना टिके ख्वाह आस्मानियों का हो ख्वाह ज़मिनियों का ख्वाह उनका जो ज़मीन  के निचे हैं ….(फ़ि लिप्पियों 2:10 -11)   
उसके भाइयों की तरफ़ से जबकि अभी भी इनकार किया गया था और मरा हुआ समझा गया था , क़ौमें अनाज के लिए यूसुफ के पास आती थीं की वह रोटी मुहैया करे ।     मस्लूबियत के बाद जबकि उसको मरा हुआ समझ कर अपने ज़ाती भाइयों से इनकार किया गया कौमें ईसा अल मसीह के पास जिंदगी की रोटी के लिए आती हैं और सिर्फ़ वही अकेला उन्हें वह रोटी मुहैया कर सकता है ।
यूसुफ़ अपने धोका दिए जाने की बाबत अपने भाइयों से कहता है (पैदाइश 50 20) ईसा अल मसीह कहते हैं अपने यहूदी भाई के ज़रिये धोका दिया जाना यह खुदा की मर्ज़ी के मुताबिक है जिस से बहुत सी जिंदगियां बचाई जाएंगी (युहन्ना 5:24)  
उसके भाई और क़ौमें यूसुफ़ के सामने सिजदा करती हैं इब्न आदम की बाबत दानिएल की नबुवतें कहती हैं कि “तमाम कौमें और हर ज़बान के लोग उसकी इबादत करेंगे “।

कई नमूने — कई निशानियां

तौरात शरीफ़ से तक़रीबन तमाम क़दीम अंबिया की जिंदगियां नबी हज़रत हज़रत ईसा अल मसीह के नमूने पर क़ा इम थीं – इन नमूनों को उनकी आमद से सदियों साल पहले क़ायम किया गया था । इसको इस तरह किया गया गया था ताकि हम को यह ज़ाहिर करे कि मसीह की आमद हक़ीक़त में खुदा के मनसूबे के मुताबिक था । यह कोई इंसानी ख़याल के मुताबिक़ नहीं था क्यूंकि बनी इंसान पहले से ही मुस्तक़बिल की बातों को नहीं जानता ।

हज़रत आदम से शुरू करते हुए , जिसमें मसीह की बाबत पेश बीनी की गयी थी । बाइबिल कहती है कि हज़रत आदम

…एक नमूना बतोर हैं उस एक् के जो आने वाला था (मिसाल बतोर हज़रत ईसा अल मसीह) 

रोमियों 5:14

हालाँकि यूसुफ़ अपने भाइयों की तरफ़ से सजदे कबूल करना ख़तम करता है , यह एक इनकारी है ,क़ुरबानी और अपने भाइयों की तरफ़ से बेगानगी यही थे जो उसकी जिंदगी में ज़ोर दिया गया । और इस अहमियत को मसीह की क़ुरबानी में भी नबी हज़रत इबराहीम की क़ुरबानी के साथ देखा गया है । यूसुफ के बाद हज़रत याकूब के बारह बेटे इस्राईल के बारह क़बीले बन जाते हैं और नबी हज़रत मूसा के ज़रिये मिसर में रहनुमाई किये जाते हैं । और जिस तरीक़े से हज़रत मूसा ने रहनुमाई की और बनी इस्राईल ने क़ुरबानियों को अंजाम दिया वह सब नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी का एक नमूना और पेश बिनी की तफ़सील थी । दरअसल तौरात में निशानियों की तफ़सीलें हैं जो मसीह के आने के सदियों पहले लिखी गयी थीं । इसके अलावा ज़बूर और दीगर नबियों की किताबें भी मुस्तक़बिल की तफसीलें थीं जो मसीह के आने के सदियों साल पहले लिखे गए थे । इन में दुःख उठाने वाले ख़ादिम की नबुवत जिसे इनकारी के साथ ज़ोर दिया गया है । जबकि कोई भी बनी इंसान सदियों साल बाद होने वाली मुस्तक़बिल को नहीं मालूम कर सकता इन नबियों को इन की तफसील की बाबत कैसे इल्म हुआ जब तक कि खुदा के ज़रिये इल्हाम नहीं दिया गया था ? अगर उन्हें खुदा के ज़रिये इल्हाम दिया गया था तो ईसा अल मसीह की इनकारी और उनकी क़ुरबानी भी खुदा के मनसूबे में ज़रूर शामिल थी ।        

इन नमूनों या नबुवतों में से अक्सर मसीह की पहली आमद ताल्लुक़ रखते हैं जहाँ उसने खुद को पेश किया ताकि हम अपने गुनाहों से छुड़ाये जा सकें और खुदा की बादशाही में दाखिल होने के क़ाबिल हो सकें ।      

मगर यूसुफ़ का नमूना भी बहुत आगे चलकर नज़र आता है जब बादशाही को पहल दिया जाएगा और ईसा अल मसीह ज़मीन पर लौटने के वक़्त तमाम क़ौमें उसके सामने सजदा करेंगी । जबकि हम अभी आज के ज़माने में ऐसे वक़्त में जी रहे हैं जब हमको ख़ुदा की बादशाही के लिए दावत दी जा रही है , तो उस बेवकूफ़ शख्स की मानिन्द न बनें जो सूरा अल – मिराज में ज़िक्र किया गया है जिसने एक छुड़ाने वाले की खोज करने में देर लगादी और इन्साफ़ के दिन तक का इंतज़ार किया – और वह बहुत देर हो चुकी थी । सो आप के लिए मसीह की ज़िन्दगी की पेश कश की बाबत अभी और ज़ियादा सीखें ।      

मसीह ने सिखाया कि उसकी दूसरी आमद इस तरह से वाक़े होगी 

ब स्वर्ग का राज्य उन दस कुंवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं।
2 उन में पांच मूर्ख और पांच समझदार थीं।
3 मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया।
4 परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया।
5 जब दुल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं, और सो गई।
6 आधी रात को धूम मची, कि देखो, दूल्हा आ रहा है, उस से भेंट करने के लिये चलो।
7 तब वे सब कुंवारियां उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं।
8 और मूर्खों ने समझदारों से कहा, अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझी जाती हैं।
9 परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया कि कदाचित हमारे और तुम्हारे लिये पूरा न हो; भला तो यह है, कि तुम बेचने वालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो।
10 जब वे मोल लेने को जा रही थीं, तो दूल्हा आ पहुंचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ ब्याह के घर में चलीं गई और द्वार बन्द किया गया।
11 इसके बाद वे दूसरी कुंवारियां भी आकर कहने लगीं, हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे।
12 उस ने उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच कहता हूं, मैं तुम्हें नहीं जानता।
13 इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम न उस दिन को जानते हो, न उस घड़ी को॥
14 क्योंकि यह उस मनुष्य की सी दशा है जिस ने परदेश को जाते समय अपने दासों को बुलाकर, अपनी संपत्ति उन को सौंप दी।
15 उस ने एक को पांच तोड़, दूसरे को दो, और तीसरे को एक; अर्थात हर एक को उस की सामर्थ के अनुसार दिया, और तब पर देश चला गया।
16 तब जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने तुरन्त जाकर उन से लेन देन किया, और पांच तोड़े और कमाए।
17 इसी रीति से जिस को दो मिले थे, उस ने भी दो और कमाए।
18 परन्तु जिस को एक मिला था, उस ने जाकर मिट्टी खोदी, और अपने स्वामी के रुपये छिपा दिए।
19 बहुत दिनों के बाद उन दासों का स्वामी आकर उन से लेखा लेने लगा।
20 जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने पांच तोड़े और लाकर कहा; हे स्वामी, तू ने मुझे पांच तोड़े सौंपे थे, देख मैं ने पांच तोड़े और कमाए हैं।
21 उसके स्वामी ने उससे कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।
22 और जिस को दो तोड़े मिले थे, उस ने भी आकर कहा; हे स्वामी तू ने मुझे दो तोड़े सौंपें थे, देख, मैं ने दो तोड़े और कमाएं।
23 उसके स्वामी ने उस से कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।
24 तब जिस को एक तोड़ा मिला था, उस ने आकर कहा; हे स्वामी, मैं तुझे जानता था, कि तू कठोर मनुष्य है, और जहां नहीं छीटता वहां से बटोरता है।
25 सो मैं डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया; देख, जो तेरा है, वह यह है।
26 उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, कि हे दुष्ट और आलसी दास; जब यह तू जानता था, कि जहां मैं ने नहीं बोया वहां से काटता हूं; और जहां मैं ने नहीं छीटा वहां से बटोरता हूं।
27 तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रुपया सर्राफों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता।
28 इसलिये वह तोड़ा उस से ले लो, और जिस के पास दस तोड़े हैं, उस को दे दो।
29 क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा: परन्तु जिस के पास नहीं है, उस से वह भी जो उसके पास है, ले लिया जाएगा।
30 और इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धेरे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।

मत्ती 25:1-30

नबी हज़रत अय्यूब कौन थे ? आज वह क्यूँ अहमियत रखते हैं ?

सूरा अल – बययानह (सूरा 98 – साफ़ सबूत) एक अच्छे आदमी के लिए ज़रूरतों का बयान करता है । वह कहता है :    

(तब) और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के ख़ुदा की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है।

 सूरए अल बय्यानह 98: 5

इसी तरह सूरह अल – अस्र (103 – ढलने वाला दिन) बयान करता है कि हमको अल्लाह के सामने किन  नुख़सान दिह आदतों से बाज़ रहना पड़ेगा ।   

बेशक इन्सान घाटे में है। मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे।

सूरए अल अस्र 103:2-3

नबी हज़रत अय्यूब एक ऐसे शख्स थे जिस तरह सूरा अल – बय्यानह और सूरा अल- असर में बयान किया गया है । नबी हज़रत अय्यूब ज़ियादा मशहूर नहीं हैं । उन का नाम क़ुरान शरीफ़ में सिर्फ़ चार मर्तबा आया हुआ है ।

(ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (भी) तो इसी तरह ‘वही’ भेजी जिस तरह नूह और उसके बाद वाले पैग़म्बरों पर भेजी थी और जिस तरह इबराहीम और इस्माइल और इसहाक़ और याक़ूब और औलादे याक़ूब व ईसा व अय्यूब व युनुस व हारून व सुलेमान के पास ‘वही’ भेजी थी और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता की ।

 सूरए निसा4:163

और ये हमारी (समझाई बुझाई) दलीलें हैं जो हमने इबराहीम को अपनी क़ौम पर (ग़ालिब आने के लिए) अता की थी हम जिसके मरतबे चाहते हैं बुलन्द करते हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार हिक़मत वाला बाख़बर है।

 सूरए अनआम 6:84

(कि भाग न जाएँ) और (ऐ रसूल) अय्यूब (का कि़स्सा याद करो) जब उन्होंने अपने परवरदिगार से दुआ की कि (ख़ुदा वन्द) बीमारी तो मेरे पीछे लग गई है और तू तो सब रहम करने वालो से (बढ़ कर है मुझ पर तरस खा) ।

सूरए अल अम्बिया 21:83

और (ऐ रसूल) हमारे (ख़ास) बन्दे अय्यूब को याद करो जब उन्होंने अपने परवरगिार से फरियाद की कि मुझको शैतान ने बहुत अज़ीयत और तकलीफ पहुँचा रखी है ।

साद 38:41

नबी हज़रत अय्यूब का नाम दीगर नबियों जैसे हज़रत इबराहीम, हज़रत ईसा अल मसीह और नबी हज़रत दाऊद की फ़ेहरिस्त में ज़ाहिर होता है जिन्हों ने ज़बूर शरीफ़ को लिखा । वह नबी हज़रत नूह और हज़रत इबराहीम के ज़माने में रहते थे । बाइबिल उन के बारे में इस तरह बयान करती है कि :  

ज़ देश में अय्यूब नाम एक पुरुष था; वह खरा और सीधा था और परमेश्वर का भय मानता और बुराई से परे रहता था।
2 उसके सात बेटे और तीन बेटियां उत्पन्न हुई।
3 फिर उसके सात हजार भेड़-बकरियां, तीन हजार ऊंट, पांच सौ जोड़ी बैल, और पांच सौ गदहियां, और बहुत ही दास-दासियां थीं; वरन उसके इतनी सम्पत्ति थी, कि पूरबियों में वह सब से बड़ा था।
4 उसके बेटे उपने अपने दिन पर एक दूसरे के घर में खाने-पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने-पीने के लिये बुलवा भेजते थे।
5 और जब जब जेवनार के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवा कर पवित्र करता, और बड़ी भोर उठ कर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, कि कदाचित मेरे लड़कों ने पाप कर के परमेश्वर को छोड़ दिया हो। इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।

अय्यूब 1:1-5

नबी हज़रत अय्यूब में वह सारी अच्छी खूबियाँ मौजूद थीं जो सूरा अल – बय्यनाह और सूरा अल अस्र दावा करता है । मगर शैतान खुदावंद के सामने हाज़िर हुआ । अयूब की किताब खुदावंद और शैतान के बीच जो गुफ़्तगू हुई उसको बयान करती है ।

6 एक दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके साम्हने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया।
7 यहोवा ने शैतान से पूछा, तू कहां से आता है? शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, कि पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।
8 यहोवा ने शैतान से पूछा, क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य और कोई नहीं है।
9 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?
10 क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बान्धा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है,
11 और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुंह पर तेरी निन्दा करेगा।
12 यहोवा ने शैतान से कहा, सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना। तब शैतान यहोवा के साम्हने से चला गया।

अय्यूब 1:6-12

तो फिर शैतान ने इस तरह से नबी हज़रत अय्यूब पर एक आफ़त पर दूसरी आफ़त ले कर आया ।

13 एक दिन अय्यूब के बेटे-बेटियां बड़े भाई के घर में खाते और दाखमधु पी रहे थे;
14 तब एक दूत अय्यूब के पास आकर कहने लगा, हम तो बैलों से हल जोत रहे थे, और गदहियां उनके पास चर रही थी,
15 कि शबा के लोग धावा कर के उन को ले गए, और तलवार से तेरे सेवकों को मार डाला; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
16 वह अभी यह कह ही रहा था कि दूसरा भी आकर कहने लगा, कि परमेश्वर की आग आकाश से गिरी और उस से भेड़-बकरियां और सेवक जलकर भस्म हो गए; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
17 वह अभी यह कह ही रहा था, कि एक और भी आकर कहने लगा, कि कसदी लोग तीन गोल बान्धकर ऊंटों पर धावा कर के उन्हें ले गए, और तलवार से तेरे सेवकों को मार डाला; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
18 वह अभी यह कह ही रहा था, कि एक और भी आकर कहने लगा, तेरे बेटे-बेटियां बड़े भाई के घर में खाते और दाखमधु पीते थे,
19 कि जंगल की ओर से बड़ी प्रचण्ड वायु चली, और घर के चारों कोनों को ऐसा झोंका मारा, कि वह जवानों पर गिर पड़ा और वे मर गए; और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।
20 तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुंड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् कर के कहा,
21 मैं अपनी मां के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊंगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।
22 इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।

अय्यूब 1:13-32

शैतान अभी भी इस जुस्तजू में था कि वह खुदावंद को आमादा करे कि अय्यूब को लानत भेजे । सो हज़रत अय्यूब के लिए एक दूसरा इम्तिहान था ।   

र एक और दिन यहोवा परमेश्वर के पुत्र उसके साम्हने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके साम्हने उपस्थित हुआ।
2 यहोवा ने शैतान से पूछा, तू कहां से आता है? शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, कि इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।
3 यहोवा ने शैतान से पूछा, क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय मानने वाला और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य और कोई नहीं है? और यद्यापि तू ने मुझे उसको बिना कारण सत्यानाश करते को उभारा, तौभी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।
4 शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, खाल के बदले खाल, परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है।
5 सो केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियां और मांस छू, तब वह तेरे मुंह पर तेरी निन्दा करेगा।
6 यहोवा ने शैतान से कहा, सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।
7 तब शैतान यहोवा के साम्हने से निकला, और अय्यूब को पांव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया।
8 तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा ले कर राख पर बैठ गया।
9 तब उसकी स्त्री उस से कहने लगी, क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।
10 उसने उस से कहा, तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दु:ख न लें? इन सब बातों में भी अय्यूब ने अपने मुंह से कोई पाप नहीं किया।

अय्यूब 2:1-10

इस लिए सूरा अल – अंबिया  हज़रत अय्यूब को मुसीबत में पुकारते हुए बयान करता है और सूरा साद समझाता है कि शरीर (शैतान) ने उनको ईज़ा पहुँचाया । 

उनके दुःख तकलीफ़ में साथ देने के लिए उनके तीन दोस्त थे जिन्हों ने उनकी मुलाक़ात की कि उन्हें ऐसे वक़्त में तसल्ली दे सके ।   

11 जब तेमानी एलीपज, और शूही बिलदद, और नामाती सोपर, अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं, तब वे आपस में यह ठान कर कि हम अय्यूब के पास जा कर उसके संग विलाप करेंगे, और उसको शान्ति देंगे, अपने अपने यहां से उसके पास चले।
12 जब उन्होंने दूर से आंख उठा कर अय्यूब को देखा और उसे न चीन्ह सके, तब चिल्लाकर रो उठे; और अपना अपना बागा फाड़ा, और आकाश की ओर धूलि उड़ाकर अपने अपने सिर पर डाली।
13 तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही।

अय्यूब 2:11-13

अय्यूब की किताब उनके बीच हुई बात चीत का बयान करती है कि इस तरह की बद – नसीबी का वाक़िया हज़रत अय्यूब के साथ क्यूँ गुज़रा । इन की बातचीत कई एक अबवाब में जाकर एक सरसरी तस्वीर पेश करती है । मुख़तसर तोर से , उनके दोस्त लोग उनसे कहते हैं कि इसतरह की बद – क़िस्मत मुसीबतें बुरे लोगों पर ही आते हैं । इसका मतलब यह हुआ कि शायद हज़रत अय्यूब ने पोशीदा तोर से गुनाह किये हों । अगर वह इन गुनाहों का इक़रार करले तो शायद उनको गुनाहों की मुआफ़ी हासिल हो सकती है । मगर हज़रत अय्यूब लगातार उन्हें जवाब देते हैं कि वह किसी भी तरह की ख़ताकारी करने से बे – जुर्म हैं । वह इस बात को समझ नहीं सकते थे कि क्यूँ बद-क़िस्मती ने उनको चारों तरफ़ घेर लिया था ।     

हम उनकी लम्बी बातचीत के हर एक हिस्से की तह तक नहीं पहुँच सकते , मगर उनके सवालात के बीच हज़रत अय्यूब वही बयान करते हैं जिनको वह यक़ीनी तोर से जानते हैं ।   

25 मुझे तो निश्चय है, कि मेरा छुड़ाने वाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।
26 और अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में हो कर ईश्वर का दर्शन पाऊंगा।
27 उसका दर्शन मैं आप अपनी आंखों से अपने लिये करूंगा, और न कोई दूसरा। यद्यपि मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर भी हो जाए, तौभी मुझ में तो धर्म का मूल पाया जाता है

अय्यूब 19:25-27

हालांकि हज़रत अय्यूब नहीं समझ सकते थे कि क्यूँ इस तरह का अलमिया (शदीद वाक़िया) उन पर आ गुज़रा मगर वह इतना ज़रूर जानते थे कि एक ‘छुड़ाने वाला’ था जो ज़मींन पर आ रहा था । वह छुड़ाने वाला ऐसा शख्स होगा जो उनके गुनाहों के लिए पूरी कीमत चुकाएगा । छुड़ाने वाले को हज़रत अय्यूब ‘मेरा छुड़ाने वाला कहते हैं । सो वह जानते थे की उनका छुड़ाने वाला उनके लिए आ रहे थे । उन्हें यह यक़ीन था कि इसतरह से ‘उनके खाल के बर्बाद होजाने पर’ भी (मरने के बाद) वह ख़ुदा को इसी खाल के साथ देखेंगे ।

मतलब यह कि हज़रत अयूब क़यामत के दिन की राह देख रहे थे । बल्कि उन्हें यही भी यक़ीन था कि क़ियामत के दिन पोशीदा तोर से वह खुदा का मुंह देखेंगे क्यूंकि उनका छुड़ाने वाला आज भी ज़िन्दा है और उसने उनको छुड़ाया है ।

सूरा अल – मआरिज (सूरा 70 – आने वाली सीढ़ियों का रास्ता) यह सूरा भी कियामत के दिन एक छुड़ाने वाले की बात करता है । मगर सूरा अल – मआरिज एक बेवकूफ़ आदमी का ज़िकर करता है जो मुज़तरिबाना तोर से उस दिन किसी भी छुटकारा देने वाले की राह देखता है ।           

कोई किसी दोस्त को न पूछेगा गुनेहगार तो आरज़ू करेगा कि काश उस दिन के अज़ाब के बदले उसके बेटों और उसकी बीवी और उसके भाई और उसके कुनबे को जिसमें वह रहता था और जितने आदमी ज़मीन पर हैं सब को ले ले और उसको छुटकारा दे दें

सूरए अल मआरिज 70:11-14

सूरा अल – मआरिज में यह बे – वकूफ़ आदमी बग़ैर कामयाबी से किसी की भी राह देखता है कि उसको छुड़ा ए । वह एक छुड़ाने वाले की राह देख रहा है जो उसको ‘उस दिन के ख़मयाज़े से’ उसको छुड़ाए — (इन्साफ़ के दिन के खम्याज़े से) । उसके बच्चे , बीवी , भाई बहिन और ज़मींन पर जो भी उसके ख़ानदान के हैं उन में से कोई भी उसको छुड़ा नहीं सकते क्यूंकि उन सबको अपने किये की सज़ा भुगतनी पड़ेगी , उनके लिए अपने खुद का खम्याज़ा भरना पड़ेगा ।          

हज़रत अय्यूब एक रास्त्बाज़ शख्स थे इसके बावजूद भी वह जानते थे कि उस दिन के लिए उन्हें एक छुड़ाने वाले की ज़रुरत है । उनके तमाम दुःख मुसीबत होने के बावजूद भी उन्हें यक़ीन था उन के पास यह छुड़ाने वाला था । जबकि तौरात शरीफ़ ने एलान कर दिया था कि किसी भी गुनाह का खम्याज़ा (मज़दूरी) मौत है । छुड़ाने वाले को उसकी अपनी जिंदगी का खम्याज़ा देना पड़ेगा । हज़रत अय्यूब जानते थे कि उनका छुड़ाने वाला उनके लिए ‘ज़माने के आख़िर में ज़मीन पर खड़ा होगा’ । हज़रत अय्यूब का ‘छुड़ाने वाला’ कौन था ? वह एक ही शख्स हो सकता है जो कभी मरा था मगर मौत से जिंदा हुआ ताकि ज़माने के आख़िर में फिर से खड़ा हो सके । वह हैं हज़रत ईसा अल मसीह । वही एक हैं जो मुमकिन तोर से खम्याज़े की क़ीमत (मौत) को अदा कर सकते थे । मगर वह ‘ज़माने के आख़िर में ज़मीन पर खड़े होंगे’ ।          

अगर हज़रत अय्यूब जैसे रास्त्बाज़ शख्स के खुद के लिए एक छुड़ाने वाले की सख्त ज़रुरत थी तो आप के और मेरे लिए एक छुड़ाने वाले की कैसी सख्त ज़रुरत होनी चाहिए ताकि हमारे गुनाहों का खाम्याज़ा अदा कर सके ? वह शख्स जो अच्छी खूबियाँ रखने वाला हो , जिसे सूरह अल – बय्यानह और अल – असर नबियों की फ़ेहरिस्त में शामिल करे ऐसे शख्स के लिए एक छुड़ाने वाले की ज़रूरत थी तो हमारी क्या औक़ात कि हमें ज़रुरत न पड़े ? सूरा अल – मआरिज़ में ज़िकर किये हुए बेवकूफ़ शख़स की तरह न हों जो आखरी दिन तक इंतज़ार करता है कि मुज़तरिबाना तोर से ऐसे शख्स को पाए जो उसके गुनाहों का खमयाज़ा अदा कर सके । आज और अभी समझलें कि किस तरह से नबी हज़रत ईसा अल मसीह आप को छुड़ा सकते हैं जिस तरह नबी हज़रत अय्यूब ने पहले से ही देख लिया था ।      

किताब के आख़िर में , नबी हज़रत अय्यूब का आमना सामना (यहाँ) खुदावंद के साथ होता है और उसकी खुश नसीबी (यहाँ) बहाल होती है ।

नबी हज़रत इल्यास कौन थे ? वह आज हमारी रहनुमाई कैसे कर सकते हैं ?

नबी हज़रत इल्यास (या एलियाह) के नाम का ज़िक्र तीन बार सूरा अल –-अनआम और अस — साफ़फ़ात में किया गया है । वह हम से कहते हैं :      

और हमने इबराहीम को इसहाक़ वा याक़ूब (सा बेटा पोता) अता किया हमने सबकी हिदायत की और उनसे पहले नूह को (भी) हम ही ने हिदायत की और उन्हीं (इबराहीम) को औलाद से दाऊद व सुलेमान व अय्यूब व यूसुफ व मूसा व हारुन (सब की हमने हिदायत की) और नेकों कारों को हम ऐसा ही इल्म अता फरमाते हैं।

सूरए अनआम 6:85

और इसमें शक नहीं कि इलियास यक़ीनन पैग़म्बरों में से थे।

सूरए अस साफ़्फ़ात 37:123-132

इल्यास का ज़िक्र युहन्ना (यहया) और येसू (ईसा अल मसीह) के साथ किया गया है क्यूंकि वह भी बाइबिल के नबियों में से एक हैं । जैसा बयान किया गया है कि इल्यास (एलियाह) ने बाल देवता के नबियों का सामना किया । इस सयाक़े इबारत को बड़ी तफ़सील के साथ यहाँ बाइबिल में कलमबंद किया गया है । ज़ेल में जो बरकत हमारे लिए रखा गया है उसकी हम तलाश करते हैं (आने वाली नसल के लिए जिस तरह सूरा अस साफ़फ़ात वायदा करता है) ।      

नबी हज़रत इल्यास और बा’ल के नबियों के लिए इम्तहान

एलियाह एक सख्त आदमी था जिसने 450 बाल देवता के नबियों का सामना किया । इतने लोगों का मुक़ाबला वह कैसे कर सकता था ? बाइबिल हमें समझाती है कि उसने एक शातिराना इम्तिहान का इस्तेमाल किया । उन्हें और बाल देवता के नबियों को एक जानवर की क़ुरबानी देनी थी मगर वह दोनों ही उस क़ुरबानी को जलाने के लिए उसमें आग नहीं लगाएंगे । (वह दोनों) एक तरफ़ एलियाह अकेले खड़ा हुआ था और दूसरी तरफ़ उस के मुकाबले में बाल देवता के नबी थे । हरेक तरफ़ से अपने अपने ख़ुदा, देवता को बुलाना था ताकि राखी हुई क़ुरबानी में आग भेज कर उसे भसम करदे । जिस किसी का ख़ुदा या देवता आसमान से आग भेज कर क़ुरबानी को जलाकर भस्म करदे वही सच्चा देवता या जिंदा खुदा माना जाएगा । सो उन 450 बाल देवता के नबियों ने पूरे दिन भर बाल को पुकारा कि आसमान से आग भेज कर उनकी क़ुरबानी को जलाकर भस्म करदे –– मगर आसमान से कोई आग नाजिल नहीं हुई । फिर एलियाह ने अपने ख़ालिक़ को पुकारा कि आसमान से आग नाजिल हो और उसकी क़ुरबानी को जला कर भस्म कर दे , और फ़ौरन आसमान से आग नाजिल हुई और उसकी ऊँई तमाम चीजों को जला कर राख कट दिया । वह लोग जिन्हों ने इस मुक़ाबले की गवाही दी वुन्हों ने मालूम कर लिया कि कौन सच्चा ख़ुदा है और कौन झूठा । इस तरह बाल देवता लोगों की नज़र में झूठा साबित हुआ ।        

हम इस मुकाबले के गवाह तो नहीं हैं मगर हम एलिया के इस हिकमत ए अमली का पीछा कर सकते हैं यह जान्ने के लिए कि अगर एक पैग़ाम या एक नबी खुदा की तरफ़ से आता है तो उसकी जांच इस तरिके से करनी है सिर्फ़ खुदा और उसके पैग़म्बर ही कामयाब हो सके और वह लोग जो महज़ इंसानी क़ाबिलियत के साथ हो जैसे बाल देवता के पुजारी नहीं हो सकते ।   

इल्यास की जांच आज के दौर में   

इल्यास की रूह में होकर ऐसी कौनसी हो सकती है ?

सूरा अन नज्म हम से कहता है

 आख़ेरत और दुनिया तो ख़ास ख़ुदा ही के एख़्तेयार में हैं।

सूरए अन नज्म 53:25

आक़िबत की साड़ी चीज़ें सिर्फ़ खुदा ही जानता है, यहाँ तक कि ख़ात्मा जब वाक़े होता है ।बनी इनसान ख़ातिमे की चीज़ों को उन के वाक़े होने से पहले नहीं जनता उसको तब ही जनता है जब वह आकर गुज़र जाए । इसलिए जांच यह देखने के लिए होती है कि अगर पैग़ाम वाक़े होने के बहुत पहले मुस्तकबिल की पेशबीनी सही तरीक़े से की जाए । कोई भी इंसान या मूरत (देवता) इसे नहीं कर सकता । सिर्फ़ खुदा कर सकता है ।        

कई एक अजीब काम नबी हज़रत ईसा अल मसीह जिसतरह इंजील शरीफ़ में ज़ाहिर किये एक सही ख़ुदा का पैग़ाम है, या फिर चालाक लोगों के ज़रिये ईजाद किया हुआ है । तो हम इल्यास की जांच को इस सवाल के लिए नाफ़िज़ कर सकते है । तौरात और ज़बूर की किताबें नबियों की किताबों के साथ जिन में इल्यास का बयान है इन्हें नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़माने से सदियों साल पहले लिखे गए थे ।इन्हें यहूदी नबियों के ज़रिये लिखे गए थे और इस तरह से यह ‘मसीही’ तहरीर नहीं थे । क्या इन क़दीम तहरीरों में नबुवतें पाई जाती हैं जो सही तोर से नबी हज़रत ईसा अल मसीह के वाक़ियात की पेश बीनी करते हैं ? जिन नबुवतों का ज़िक्र तौरेत में दिया गया है यहाँ उसका ख़ुलासा पेश किया गया है । ज़बूर में और उसके बाद की नबियों की किताबों में जो नबुवतें पाई जाती है उन का खुलासा यहाँ पेश किया गया है । अब आप नबी हज़रत इल्यास की तरह जांच कर सकते है यह देखने के लिए कि अगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह जैसे इंजील शरीफ़ में बयान किया गया है क्या वह खुदा की तरफ़ से सच्चे नबी हैं, या आदमियों के ज़रिये एक झूटी ग़लत बयानी है ।         

सूरा अल -अनआम ने नबी हज़रत यहया और ईसा अल मसीह के साथ हज़रत इल्यास के नाम का ज़िकर किया । दिलचस्पी की बात यह है कि पुराने अहद नामे की आखरी किताब में नबी हज़रत इल्यास की बाबत नबुवत की गयी है कि वह हज़रत मसीह की आमद के लिए हमारे दिलों को तैयार करने आएँगे । हम इंजील शरीफ़ में देखते हैं कि किस तरह नबी हज़रत यहया नबी इल्यास की शक्ल में आये ताकि लोगों को तस्कीन और तसल्ली दे और उन्हें नबी हज़रत ईसा अल मसीह के कलाम को सुनने और उनकी आमद के लिए दिलों को तैयार करे । नबी हज़रत इल्यास की शख्सियत खुद ही यहया नबी और नबी हज़रत ईसा अल मसीह की नबुवतों में बंध कर रह गयी है ।    

क़ुरान शरीफ़ : कोई इख्तिलाफ़ नहीं ! हदीसें क्या कहती हैं

 “क़ुरान शरीफ़ असली किताब है –वही ज़ुबान, अहराफ़ और तिलावत । इंसानी तशरीह के लिए या तर्जुमे की बिगाड़ के लिए कोई मक़ाम नहीं … अगर आप क़ुरान शरीफ़ की एक जिल्द दूनया के किसी भी घर से उठालें तौ भी मुझे शक है कि आप उस में और दीगर क़ुरान में कोई फ़रक़ देख पाएंगे । “  

एक दोस्त ने मुझे यह मुख़तसर हाशिया (नोट) भेजा । वह मुक़द्दस क़ुरान शारीफ़ के मत्न का मवाज़िना इंजील शारीफ़/बाइबल से कर रहा था । 24,000 इंजील के क़दीम नुस्ख़जात (दस्तावेज़) आज मौजूद हैं और उनमें कुछ छोटे इनहिराफ़ को छोड़ किसी तरह का इख्तिलाफ़ नहीं पाया जाता । हालांकि तमाम मोज़ूअ और ख़यालात उन तमाम 24,000 नुस्ख़जात में एक ही हैं इस मोज़ू को शामिल करते हुए कि ईसा अल मसीह अपनी मौत और कियामत में हमारा फ़िद्या देता है, ऊपर दिये गये बयानात के मुताबिक़ मताल्बा अक्सर किया जाता है कि क़ुरान शरीफ़ में कोई इख्तिलाफ़ नहीं पाया जाता यह बाइबल की निस्बत में क़ुरान शरीफ़ की अज़मत का एक इशारा बतोर और उसकी मोजिज़ाना तहफ़्फुज़ बतोर देखा गया है । मगर क़ुरान शरीफ़ की तरतीब व तालीफ़ की बाबत हदीस हम से क्या कहते हैं ?           

क़ुरान शरीफ़ की तरतीब नबी से लेकर खलीफ़ाओं तक

उमर बिन ख़तताब ने फ़रमाया :

मैं ने हिशाम बिन हकीम बिन हिज़ाम को सूरा अल – फ़ुरक़ान को जैसे मैं तिलावत  करता हूँ उससे फ़रक़ तरीक़े से तिलावत करते हुए पाया । अल्लाह के पैगंबर ने मुझे इसको (फ़रक़ तरीक़े) से सिखाया था । सो (नमाज़ के वक़्त) मेरा उनसे झगड़ा होने को था मगर उनकी तिलावत खत्म होने तक मैं ने इंतज़ार किया फिर मैं ने कपड़े से उनकी गरदन बांधकर उन्हें अल्लाह के पैगम्बर के पास खींच कर ले गया और कहा, “हुज़ूर मैंने इनको सूरा अल – फ़ुरकान को जिस तरह आप ने मुझे तिलावत करना सिखाया था उस से फ़रक़ तरीक़े से तिलावत करते सुना है । पैगम्बर ने मुझे उनको छोड़ देने को कहा और हिशाम से कहा कि उसकी तिलावत करो । जब हिशाम ने तिलावत की तो अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया, “यह इस तरीक़े से इनकिशाफ़ हुआ था” । फिर उनहों ने मुझसे तिलावत करने को कहा । जब मैं ने तिलावत की तो उनहों ने कहा, “यह इस तरह से इंकिशाफ़ हुआ है । क़ुरान शरीफ़ का इंकिशाफ़ सात फ़रक़ तरीक़े से हुआ है, सो जैसे तुमको आसान लगे वैसे तुम इसकी तिलावत करो ।”          

सहीह अल-बुख़ारी 241 9 : किताब 44, हदीस 9 

इब्न मसूद ने बयान किया:

मैं ने एक शख्स को (क़ुरान शरीफ़) की एक आयत को फुलां तरीक़े से तिलावत करते सुना, और मैं ने उसी आयत को नबी हज़रत मोहम्मद की मुबारक ज़ुबानी भी तिलावत करते सुना मगर फ़रक़ तरीक़े से । सो मैं उसको नबी के पास ले गया और यह बात कही, मगर मैं ने उन के चेहरे पर ना मंज़ूरी के आसार देखे और फिर उन्हों ने कहा, “तुम दोनों सही हो, सो फ़रक़ मत करो, क्यूंकि तुम्हारे सामने फ़रक़ कर दिया, इस लिए वह बर्बाद हो गए ।”               

सहीह अल – बुख़ारी 3476  : किताब 60, हदीस 143

यह दोनों हम से साफ़ कहते हैं कि हज़रत मोहम्मद सल्लम की जिंदगी के दौरान क़ुरान शरीफ़ की तिलावत के लिए कई एक फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे थे जो तिलावत के इस्तेमाल के लिए हज़रत मोहम्मद सल्लम के ज़रिये मंज़ूरी दी गयी थी । तो फिर उन की मौत के बाद क्या हुआ ? 

हज़रत अबू बककर और क़ुरान शरीफ़

ज़ैद बिन थाबित ने बयान किया :

जब यमामा के लोग क़त्ल किये गए तो मेरे लिए हज़रत अबूबक्कर सिद्दीक़ को भेजा गया (यमामा के लोग वह लोग थे जो नबी हज़रत मोहम्मद के साथी थे जिन्हों ने मुसैलिमा के खिलाफ़ जंग लड़ी थी)। (मैं उन के पास गया) और पाया कि उमर बिन अल – ख़त्ताब उन के साथ बैठे हुए थे) तब हज़रत अबू बककर ने (मुझ से) कहा “हज़रत उमर मेरे पास आए हैं और वह कहते हैं : हाफ़िज़े क़ुरान में से मजरूहीन की तादाद ज़ियादा है (हाफ़िज़े क़ुरान वह लोग हैं जिन्हों ने क़ुरान शरीफ़ को पूरी तरह से हिफ्ज़ कर लिया है) । यमामा के जंग के दिन मुझे दर है कि जंगे मैदान की दूसरी तरफ़ और ज़ियादा हाफ़िज़ लोग मारे न जाएं और क़ुरान के अक्सर हिस्सों का नुक़सान होजाए । इसलिए मैं तुम्हें (अबू बककर) सलाह देता हूँ हुक्म करो कि क़ुरान ऐसा हो “आप ऐसा कुछ कैसे कर सकते हैं जो आल्लाह के रसूल ने नहीं किया ?”(यानी सब को एक साथ जमा नहीं किया) । तब मैं ने हज़रत उमार से कहा, हज़रत उमर ने कहा, “अल्लाह की क़सम यह तो बहुत अच्छी तजवीज़ है ।” हज़रत उमर लगातार मुझ से बहस करते रहे कि जब तक अल्लाह ने इस बात के लिए मेरे सीने को खोल रखा है मैं इस मनसूबे को क़बूल करता हूँ और अब मैं पेहचान्ने लगा हूँ कि यह एक अच्छी तजवीज़ है जिसको हज़रत उमर ने महसूस किया “फिर हज़रत अबूबककर ने (मुझ से कहा) ‘और अल्लाह तुम एक अक़लमंद जवान हो और हमें तुम्हारी बाबत कोई शुबह नहीं है । और तुम अल्लाह के पैग़मबर के लिए इलाही पैग़ाम लिखते थे – सो तुम को इस की खोज करनी है (ख़ास इबारत के ग़ैर मुकम्मल हिस्सों) की और उन्हें एक किताब की शक्ल में जमा करनी है । तब हज़रत उमर ने कहा “अल्लाह की क़सम, अगर उन्हों ने मुझे एक पहाड़ हटाने का भी हुक्म फ़रमाते तो यह मेरे लिए मुश्किल बात नहीं थी मगर यह तो क़ुरान शरीफ़ को एक जगह जमा करने का है । फिर मैं ने हज़रत अबू बककर से कहा, आप उस काम को कैसे करेंगे जिसे अल्लाह के पैग़म्बर ने नहीं किया ?”हज़रत अबू बककर ने जवाब में कहा, “अल्लाह की क़सम यह एक अच्छी तजवीज़ है, हज़रत अबू बककर मुझ से अपने ख़यालात का इज़हार करते हुए बहस करते जा रहे थे जब तक कि अल्लाह ने मेरे सीने को न खोला जिसके लिए उसने हज़रत अबू बककर के सीने को खोला था (यानि इस काम के किये हम दोनों एक साथ मुत्तफ़िक़ नहीं हुए) । सो मैं ने क़ुरान शरीफ़ के चीदा चीदा हिस्सों को ढूँढना शुरू किया और उन को जमा करता गया (जिन पर क़ुरान की आयतें लिखी हुई थीं) इनमें खजूर के डंठल, बारीक सफ़ेद पत्थर वगैरा थे और उन हाफ़िज़ों को भी बुलाया गया जिन्हों ने आयतों को हिफ्ज़ कर लिए थे । जब तक कि मैं सूरा अत – तौबा की आखरी आयत तक नहीं पहुंचा मैं ने इस काम को जारी रखा । इस काम में अबी ख़ुज़ैमा अल – अंसारी मेरा साथ दे रहे थे । उन को छोड़ मैं ने किसी और को इस लायक़ नहीं पाया । सो वह सूरा अत – तौबा की आयत थी : …“लोगोतुम्हारेपास और तुम ही में से एक पैग़मबर आए हैं । तुम्हारी तकलीफ़ उनको गिरां मालूम होती है और तुम्हारी भलाई के बहुत ख्वाहिशमंद हैं और मोमिनों पर निहायत शफ़क़त करने वाले और मेहेरबान हैं ….(इस सूरा के आख़िर तक सूरा – बारा (अत – तौबा) (9:128 -129) । हज़रत उमर के ज़रिये क़ुरान शरीफ़ की इस तरतीब के बाद मुकम्मल दस्तावेज़ (नुस्ख़ाजात) हज़रत अबू बककर के साथ उनके मरने तक रहा फिर यह मसौदा हज़रत उमर के साथ उनके मरने तक रहा फिर यह हज़रत हफ़सा के पास रहा जो हज़रत उमर की बेटी थी ।                              

 सहीह  अल -बुख़ारी 4986 : किताब 66, हदीस 8  

यह वाक़िआ उस ज़माने में हुआ जब हज़रत अबू बककर ख़लीफ़ा थे बराहे रास्त नबी हज़रत मोहम्मद के इनतक़ाल के बाद । यह हम से कहती है कि हज़रत मोहम्मद ने कभी भी क़ुरान शरीफ़ की आयतों को जमा करके उसकी असल इबारतों को कमाल तक नहीं पहुंचाया था न ही उन्हों ने ऐसा कुछ इशारा किया कि इसकी तरतीब ओ तालीफ़ होनी चाहिए थी । मगर यह ज़रूर हुआ कि जंग के दौरान जो मजरूहीन (जंग में मारे गए लोग) थे उन में से बहुत से हाफ़िज़ लोग थे । तब हज़रत और हज़रत उमर (जो दुसरे नंबर के ख़लीफ़ा हुए) उन्हों ने हज़रत ज़ैद बिन हारिस को क़ाइल किया कि मुख़तलिफ़ ज़रायों से क़ुरान शरीफ़ को जमा करना शुरू करे । हज़रत ज़ैद बिन हारिस शुरू शुरू में इस काम के लिए रज़ा मन्द नहीं थे क्यूंकि वह जानते थे कि नबी हज़रत मोहम्मद ने कभी भी ख्वाहिश ज़ाहिर नहीं की थी कि क़ुरान शरीफ़ की इबारतों को मेयार के मुवाफ़िक़ तरतीब दिया जाए । नबी हज़रत मोहम्मद सल्लम ने अपने कई एक साथियों पर भरोसा किया था कि वह उनके पीछे चलने वालों को क़ुरान शरीफ़ की तालीम दे जिस तरह ज़ेल की हदीस हम से कहती है ।          

मसरिक़ ने बयान किया :

अब्दुल्ला बिन अमर ने ज़िकर किया, अब्दुल्ला बिन मसूद के बारे में यह कहते हुए कि मैं उस शख्स से कभी प्यार करूंगा क्यूंकि मैं ने नबी को यह कहते सुना ()[],”चार अशख़ास से क़ुरान पढ़ना सीखो : अब्दुल्लाह बिन मसूद, सलीम मुआध और उबैद बिन कअब’ “         

 सहीह अल बुख़ारी 4999 :किताब 66, हदीस 21

 
किसी तरह नबी के इंतक़ाल के बाद उन के साथियों के बीच इन फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों को लेकर ना मंज़ूरियां  हो गईं । ज़ेल की हदीस सूरा 92:1-3 की तिलावत को लेकर एक ना मंज़ूरी का बयान करती है (सूरा अल –लैल)       

इब्राहीम ने बयान किया :

अब्दुल्लाह (बिन मसूद ) के साथी लोग  अबू दरदा के पास आए (और उन के उसके घर पहुंचने से पहले) वह उन से मिला और उनसे पुछा : “तुम में से कौन है जो अब्दुल्ला जैसे (क़ुरानशरीफ़) की तिलावत कर सकता है ?”  उन्हों ने जवाब दिया “हम सब हैं “ फिर उसने पुछा तुम में से कौन है जो इसे मुंह ज़ुबानी जानता हो ? उन्हों ने अलक़मा की तरफ़ इशारा किया । उसने उस से पुछा तुम ने किस से सुना ? उस ने कहा “मैं ने अब्दुल्लाह बिन मसूद सूरा अल – लैल (रात) की तिलावत करते सुना”। अलक़मा ने तिलावत की :’आदमियों और औरतों के ज़रिये’ । अबू अल दरदा ने कहा “मैं गवाही देता हूँ कि मैं ने नबी को ऐसे ही तिलावत करते सुना है मगर यह लोग चाहते हैं कि मैं इसे  तिलावत करूँ – ‘और उसके ज़रिये जिसने आदमी और औरत को बनाया’ मगर अल्लाह ज़रिये, मैं उनकी तरह तिलावत नहीं करूंगा ।”  

जिल्द 6 किताब 60 हदीस 468


आज का क़ुरान सूरा अल लैल 92:3 के लिए दूसरी तिलावत है । दिलचस्पी के साथ अब्दुल्लाह, इसके पिछले हदीस में जो चार में से एक हैं ख़ास तोर से जिन को नबी हज़रत मोहम्मद (सल्लम) की जानिब से क़ुरान शरीफ़ की तिलावत का ख़ास इख्तियार रखने वाले बतोर इशारा किया गया था और अबू दरदा ने इस आयत के लिए एक फ़रक़ तिलावत करी थी और नहीं चाहते थे की दूसरों का पीछा करे ।

ज़ेल की हदीस बताती है कि इस्लामी सल्तनत का पूरे का पूरा इलाक़ा जिन के पास ज़ेल की फ़रक़ फ़रक़ तिलावातें हैं । अगर इसकी पेहचान बढ़ानी है तो यह देखना पड़ता है कि तिलावत करने वाला शख्स किस इलाके से ताल्लुक़ रखता है और किस तरह की तिलावत का वह इस्तेमाल करता था । ज़ेल के मामले में कुफ़ा के इराक़ी लोग अब्दुल्ला बिन मसूद की सूरा 92:1-3 की तिलावत का इस्तेमाल करते हैं ।

      अलक़मा ने रिपोर्ट दी :

‘मैं अबू दरदा से मिला’ और उसने मुझ से पुछा : तुम किस मुल्क से ताल्लुक़ रखते हो ? मैं ने कहा मैं एक इराक़ी हूँ । उसने दोबारा मुझ से पुछा : कौनसे शहर से ? मैं ने जवाब दिया, कुफ़ा शहर से । उसने फिर मुझ से पुछा : क्या तुम अब्दुल्लाह बिन मसूद की तिलावत का इस्तेमाल करते हो ? मैं ने कहा, हाँ । उसने कहा, इस आयत की तिलावत करो (रात के ज़रिये जब वह छा जाती है) सो मैं ने उसकी तिलावत की : रात जब छा जाती है और जब दिन चमकता (उगता) है और मर्द और औरत की तखलीक) वह हंसा और कहा, मैं ने अल्लाह के पैग़म्बर से इस तरह ()[] तिलावत करते सुना है ।           

   सहीह मुस्लिम 824c: किताब 6, हदीस 346


इब्न अब्बास ने बयान किया :

उमर ने कहा उबैद हम में से सब से अच्छा (कुरान शरीफ़ की) तिलावत करने वाला था इसके बावजूद भी हमारे पास कुछ है जिस से वह तिलावत करता है । ‘ उबैद कहता है, “मैं ने उसे अल्लाह के पैग़म्बर की ज़ुबानी सुनी है ()[] और मैं किसी भी हालत में इसे नहीं छोडूंगा” मगर अल्लाह ने कहा “हम जिस आयत को मंसूख कर देते या उसे फ़रामोश करा देते हैं तो उस से बेहतर या वैसी ही और आयत भेज देते हैं, क्या तुम नहीं जानते कि खुदा हर बात पर क़ादिर है ?” 2:106                                                                                                

सहीह अल बुख़ारी 5005  किताब 66 हदीस 27


हालांकि उबैद क़ुरान शरीफ़ की तिलावत के लिए ‘सब से बेहतर’ शख्स माने जाते थे (वह उन में से एक थे जो पहले हज़रत मोहम्मद (सल्लम) के ज़रिये जांचे गए थे) और जमाअत में से दीगर छोड़ दिए गए थे । सो इस को लेकर जो बात मनसूख़ हुई और जो बात मनसूख़ नहीं हुई इस का इख्तिलाफ हुआ । इख्तिलाफ़ फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों को लेकर था और जो मनसूख़ किये जाते थे इस से तनाव का माहोल था । हम ज़ेल की हदीस में देखते हैं कि इस परेशानी का कैसे हल हुआ ।             

ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान और क़ुरान

अनस बिन मालिक ने बयान किया:

हुदैफ़ा बिन अल यमन उस वक़्त हज़रत उस्मान के पास आए जब शाम और इराक़ के लोग जंग का मशाहिदा कर रहे थे की आर्मीनिया और अधरबिजन के खिलाफ़ जंग लड़ सके और उनपर जीत हासिल कर सके । हुदैफ़ा को (शाम और इराक़ के लोगों से) उनके क़ुरान शरीफ़ की तिलावत के फ़रक़ को लेकर उन से डर था । सो हुदैफ़ा ने हज़रत उस्मान से कहा, ”ऐ मोमिनों के सरदार ! इस से पहले कि क़ुरान   शरीफ़ की तिलावत में फ़रक़ करने लगे इस क़ौम को बचाएं जिस तरह यहूदियों और मसीहियों ने इस से पहले बचाया था । “सो हज़रत उस्मान ने हज़रत हफ़सा को यह कहकर पैग़ाम भेजा कि क़ुरान की दस्तावेज़ों को हमारे पास भेजा जाए ताकि हम क़ुरान के मसौदों को लेकर एक कामिल नक़लें तैयार कर सकें और फिर दस्तावेज़ आपको वापस कर देंगे । हज़रत उस्मान ने हज़रत हफ़सा को वह सारे दस्तावेज़ भेजे । फिर हज़रत उस्मान ने ज़ैद बिन थाबित, अब्दुल्लाह बिन अज़ ज़ुबैर, सैद बिन अल आस और अब्दुर रहमान बिन हरीत बिन हिशाम को हुक्म फ़रमाया कि बेहतर तरीक़े से दस्तावेज़ों की दोबारा से नक़ल करें । इस के अलावा हज़रत उस्मान ने तीन क़ुरेशियों को हिदायत दी कि अगर किसी सूरत में क़ुरान शरीफ़ के मामले में आप ज़ैद बिन थाबित से इत्तिफाक़ नहीं रखते हैं तो क़ुरान शरीफ़ की आयतों को कुरेश के मक़ामी ज़बान में लिखें क्यूंकि क़ुरान शरीफ़ को उनकी ज़बान में इन्किशाफ़ हुआ है ।” सो उन्हों ने वैसा ही किया और जब उन्हों ने बहुत सारी नकलें तैयार कर लीं तो हज़रत उस्मान ने असली दस्तावेजों को हज़रत हफ़सा के यहाँ लौटा दीं । हज़रत उस्मान ने उनमें से एक एक कापी मुस्लिम मुल्कों में भेज दीं और हुक्म दिया कि दस्तावेज़ों को छोड़ दीगर मसौदों और छोटे हिस्सों को जला दिया जाए ।          

सहीह अल –बुख़ारी 4987 : किताब 66, हदीस 9

इसी लिए मौजूदा ज़माने में फ़रक़ फ़रक़ तिलावातें नहीं हैं । यह इस सबब से नहीं था कि सिर्फ़ नबी हज़रत मोहम्मद ने तिलावत हासिल की या एक ही तिलावत का इस्तेमाल किया (उन्हों ने नही किया,उन्हों ने सात तरह की तिलावातों का इस्तेमाल किया) न ही इस सबब से कि उन्हों ने कोई इख्तियार दिए जाने वाले मुकम्मल क़ुरान किसी के हाथों में दी । उन्हों ने नहीं दी । दर असल अगर आप आन लाइन फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों की खोज करेंगे सुन्नाह की 61 हदीसें पाएंगे जो क़ुरान शरीफ़ की फ़रक़ फ़रक़ तिलावातों पर बहस की गयी है । मौजूदा क़ुरान शरीफ़ ग़ैर तग़ययुर पिज़ीर है क्यूंकि हज़रत उस्मान (जो तीसरे ख़लीफ़ा थे) उन्हों ने एक तरह की तिलावत को चुना था उनकी ग़लतियों को सुधारा था और दीगर तमाम नुस्ख़ों को जला दिया था । ज़ेल की हदीस बताती है कि उस सुधार को मौजूदा क़ुरान शरीफ़ में आज भी जारी रखा गया है ।             

इब्न अब्बास ने बयान किया :

हज़रत उमर ने कहा, एक अरसा गुज़र चुका है मुझे डर है कि कहीं लोग कहने लगें कि मुक़द्दस किताब में रजम (मौत तक संगसार किये जाने) की बाबत हम कोई आयत नहीं पाते,” नतीजा बतोर हो सकता है वह क़ानूनी पाबन्दी को छोड़ कर बहुत दूर चले जाएं जो अल्लाह ने ज़ाहिर किया है । मैं इस बात की तौसीक़ करता हूँ कि रजम संगसार किये जाने का ख़मयाज़ा उस शख्स पर लगाया जाए ग़ैर क़ानूनी तोर से ज़िना करता है, अगर वह पहले से ही शादी शुदा है और जुर्म गवाहों से साबित हुआ है, जैसे हमल ठहरने या खुद के इक़रार के ज़रिये से हो ।”सुफ़यान ने यह बात शामिल की, “मैं ने इस बयान को इस तरीक़े से याद किया”। हज़रत उमर ने कहा “यक़ीनन अल्लाह के पैगम्बर ने रजम ()[]संगसार किए जाने के ख़म्याज़े को जारी रखा और उन के बाद हम ने इसे किया ।      

सहीह अल बुख़ारी 6829 : किताब 86, हदीस 56


इब्न अब्बास ने बयान किया :

अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद को सच्चाई के साथ भेजा और उन पर मुक़द्दस किताब क़ुरान शरीफ़ को इल्हाम होने दिया । उन क़ुरान शरीफ़ की आयातों के साथ अल्लाह ने जिसका मुकाशिफ़ा किया वह राजम की आयत थी (एक शादीशुदा शख्स का संगसार किया जाना(आदमी और औरत दोनों को) जो ग़ैर कानूनी तरीक़े से ज़िनाकारी को अंजाम देते हैं, और हम ने इस आयत की तिलावत की और उसे हिफ्ज़ किया था अल्लाह के पैगम्बर ने रजम ()[]संगसार किए जाने के ख़म्याज़े को जारी रखा और उन के बाद हम ने इसे किया । …..      

     बुख़ारी किताब 86, हदीस 57

संगसार किया जाना (रजम) की बाबत ज़िनाकारी की बदकारी के लिए मौजूदा क़ुरान शरीफ़ में कोई आयत नहीं है । इस के बगैर ही इसकी इशा अत हुई है ।  

इब्न अज़ –ज़ुबैर ने बयान किया : मैं नेहज़रत उस्मान से कहा “ यह आयत जो सूरा बक़रा में पाया जाता है : आप में से जो मर जाते हैं और अपने पीछे बेवाओं को छोड़ जाते हो ….उनके फिर जाने के बगैर” उन्हें दूसरी आयत के ज़रिये मनसूख़ किया गया है । मगर हज़रत उस्मान ने कहा, आप उस को क्यूँ लिखते हो (क़ुरान शरीफ़ में) ?” हज़रत उस्मान ने कहा (वह जहां है) उसे वहीँ छोड़ दो,…… क्यूंकि मैं उस आयत की जगह को उसकी असली जगह से नहीं बदल सकता ।”          

जिल्द 6 किताब 60 हदीस 60   किताब 65 हदीस 4536

यहाँ हम हज़रत उस्मान और इब्न अज़ – ज़ुबैर के बीच एक इख्तिलाफ़ देखते हैं चाहे वह एक आयत की मंसूख की बाबत मायना रखे या न रखे क़ुरान शरीफ़ में रखा जाना था । हज़रत उस्मान का अपना तरीक़ा था और इस लिए यह आयत क़ुरान शरीफ़ में पाई जाती है । मगर इस की बाबत तख़ालुफ़ ज़रूर था ।      

हज़रत उस्मान और सूरा 9 के लिए उनकी क़ियादत

उस्मान बिन अफ़फ़ान ने बयान किया:                                                

यज़ीद अल फ़रीसी ने कहा: मैं ने इब्न अब्बास को कहते सुना :मैं ने उस्मान इब्न अफ्फ़ान से पुछा, किस बात ने आप को तरगीब दी कि (सूरा) अल बरा’हा को जो (सूरा) मीईन से ताल्लुक़ रखता है उसमें रखे (जिसमें एक सौ आयतें हैं) और (सूरा) अल-अनफ़ाल को जो मदनी के सुराजात में से हैं उस दरजे के सूरे में रखा जो सबा’अत-तवील (क़ुरान शरीफ़ के सात लम्बे सूराजात में गिने जाते हैं), और आप ने उसे “बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम” से शुरू नहीं किया या इसे नहीं लिखा ?

हज़रत उस्मान ने जवाब दिया : जब क़ुरान शरीफ़ की आयतें नबी हज़रत मोहम्मद पर इनकिशाफ़ हो रहे थे ()[] तो उन्हों ने एक शख्स को बुलाया कि उन आयतों को लिखे और उस से कहा कि फ़लां फ़लां आयतों को फ़लां फ़लां सूरे में रखा जाए जैसी जैसी बातों का ज़िकर किया गया है । और जब एक या दो आयतों की वही उतरती थी (उनकी बाबत भी) ऐसा ही कहते थे । सूरा अनफ़ाल पहला सूरा था जो मदीने में नाजिल हुआ था और सूरा अल-बराहा सबसे आख़िर में । और उसके मज़मून वैसे ही थे जैसे सूरा अल-अनफ़ाल के । इस सबब से मैं ने सोचा कि यह सूरा अल -अनफ़ाल का हिस्सा है । चुनांचि मैं ने उसको उस दरजे सूरे में रखा जो सबा’अत-तवील (क़ुरान शरीफ़ के सात लम्बे सूराजात) में रखा, और मैं ने उन के बीच “बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम” नहीं लिखा।                            

सुनन अबी दाऊद 786  : किताब 2 हदीस 396


सूरा 9 (अत तौबा या अल बराहा) क़ुरान शरीफ़ में एक ही सूरा है जो “बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम”से शुरू नहीं होता । हदीस हमें समझाती है क्यूँ ? हज़रत उस्मान ने सिखाया कि सूरा 9 सूरा 8 का हिस्सा था  और इसका मज़मून भी एक जैसा ही था । इसकी बाबत जो सवालात खड़े होते हैं इससे हम देख सकते हैं कि पिछले ज़माने के मुस्लिम क़ौम में मुबाहसा हुआ करता था । अगली हदीस बताती है कि हज़रत उस्मान की क़ुरान से दीगर ख़लीफ़ा के साथियों का क्या रद्दे अमल था ।     

अब्दुल्लाह (बिन मसूद) ने रिपोर्ट दी है कि उसने (अपने साथियों से कहा की अपने क़ुरान शरीफ़ के नुस्खों को पोशीदा रखें) और आगे कहा :  

वह शख्स जो कोई चीज़ छिपाता है तो जो चीज़ ऊसने छिपाई है उसे इन्साफ़ के दिन ज़ाहिर किया जाएगा, और फिर कहा कि आप मुझे किसके नमूने की तिलावत का हुक्म फ़रमाते हैं कि तिलावत करूं ? दरअसल मैं ने अल्लाह के पैगम्बर के सामने ()[] सत्तर से जियादा सूराजात की तिलावत की है और अल्लाह के पैग़म्बर ()[] के साथी लोग जानते हैं कि मैं (उन से ज़ियादा) अल्लाह की किताब की बाबत बेहतर समझ रखता हूँ और जब भी मुझे मालूम पड़ा कि कोई और शख्स मुझसे जियादा इल्म रखता था तो मैं उस के पास गया । शक़ीक़ ने कहा : मैं हज़रत मोहम्मद के साथियों()[] की जमाअत में बैठने का शर्फ़ हासिल हुआ मगर मैं ने किसी को फ़लां शख्स की तिलावत को रद्द करते या नज़र करते हुए नहीं पाया यह कहते हुए कि (यह उस की तिलावत है) या उसमें कुछ नुख्स बताते हुए पाया हो ।         

  सहीह मुस्लिम  2462: किताब 44, हदीस 162 

              कई एक चीज़ें अलग नज़र आती हैं :

  1. अब्दुल्लाह बिन मसूद अपने पैरूओं से कहते हैं कि अपने क़ुरान के नुस्खों को किसी सबब से छिपालो ।
  2. ऐसा लगता है वह किसी के ज़रिये से हुक्म पाए हुए हैं कि एक फ़रक़ तिलावत का इस्तेमाल करें । यह बेहतरीन समझ है जिसतरह वक़्त का हवाला दिया जाता है जब हज़रत उस्मान ने क़ुरान शरीफ़ के अपने तर्जुमे का मेयार कायम किया ।
  3. उसने जिस तरीक़े से क़ुरान शरीफ़ की तिलावत की उसको बदलने की बाबत इब्न मसूद का एतराज़ यह था कि : वह फ़ख़र से कहते थे : मैं(इब्न मसूद मुक़द्दस किताब की बेहतर समझ रखता हूँ )
  4. शक़ीक़ ने कहा हज़रत मोहम्मद के साथी इब्न मसूद से इख्तिलाफ़ राय नहीं थे । 

मौजूदा क़ुरान शरीफ़ की असल इबारत के तर्जुमे 

हज़रत उस्मान की इशाअत का पीछा करते हुए किसी तरह फ़रक़ फ़रक़ तरजुमे आज भी मौजूद हैं । दरअसल ऐसा लगता है कि हज़रत मोहम्मद के बाद चौथी सदी में कुछ किसम की तर्जुमों के लिए मंज़ूरी दी गयी थी । हालाँकि मौजूदा दौर में अरब के असली इबारत की तर्जुमें है हफ़स (या होफ़्स) है, एक वार्श भी है जो अक्सर शुमाली अफ्रीक़ा में इस्तेमाल किया जाता है, अल दुरी अक्सर मगरिबी अफ्रीक़ा यहाँ तक कि दीगर हिस्सों में भी इस्तेमाल किया जाता हैं । इन तर्जुमों के दरमियान ख़ास तोर से तलफ़फ़ुज़ का फ़रक़ पाया जाता है और कुछ हलके से अलफ़ाज़ की तरतीब (तर्ज़ –ए- बयान) का फ़रक़, आम तोर से इस के मायने पर कोई असर नहीं पड़ता, मगर कुछ अफ़राक़ के साथ मायनों में असर पड़ जाता है सिर्फ़ फ़ौरी सयाक़े इबारत में न कि अस्बाती समझ में ।                  

तो फिर एक चुनाव की बात है की क़ुरान शरीफ़ के कौन से तर्जुमे का इस्तेमाल करें ।                                                 

हम ने सीखा है कि मौजूदा दौर में अरबी क़ुरान शरीफ़ के फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे पाए जाते है और नबी हज़रत मोहामद के इंतक़ाल के बाद इन की तरतीब और ग़लतियों का सुधार और चुनाव का तरीक़े अमल हो चुका है यही सबब है कि क़ुरान शरीफ़ की असल इबारत के बहुत कम तर्जुमे पाए जाते है क्यूंकि दीगर तर्जुमों को हज़रत उस्मान के दौर ए ख़िलाफ़त में दीगर इबारतों को नक़ल के बाद जला दिया गया था । क़ुरान शरीफ़ में मुताबादिल अलफ़ाज़ या सफ़्हे के आख़िर में लिखी हुई शरह या कोई हाशिया नहीं पाया जाता । क्यूंकि उन्हें पहले से ही बर्बाद किया जा चुका था । हज़रत उस्मान ने क़ुरान शरीफ़ की ग़ालिबन एक अच्छी तिलावत पेश करी थी मगर वह एक ऐसी नक़ल नहीं थी जो मुबाहसे के बगैर हो मतलब यह कि मुबाहसे से भरपूर था । इस में एक बात ज़रूर है कि इसतरह इसको वसी‘अ तरीक़े से क़ुरान शरीफ़ का “असली नुस्खा (सहीफ़ा) बतोर कबूल किया गया — जिसकी ज़ुबान, अल्फ़ाज़ और तिलावत तीनों असल हैं । इसमें इंसानी तशरीह के लिए कोई मक़ाम नहीं है” यह सहीं नहीं है । हालांकि बाइबिल और क़ुरान दोनों के फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे हैं और दोनों के पास पक्का दस्तावेजी सबूतें पाई जाती हैं जो इशारा करते हैं कि माजूदा ज़माने में जो इबारत पाई जाती है वह असल के बहुत नज़दीक है । दोनों ही असली होने का एक क़ाबिले एतमाद नक़शा पेश कर सकते हैं । बहुत से लोग इन दोनों किताबों के समझने की तलाश से भटक चुके हैं इस बतोर कि कुरान के तहफ्फुज़ के तरीक़े को लेकर और बाइबिल के तहफ्फुज़ की तहकीर करते हुए । हमारे लिए यह बेहतर होगा कि इन दोनों  किताबों को बेहतर तरीक़े से समझने में धियान लगाना होगा । यही एक सबब था कि इन दोनों को पहला मक़ाम और पहला दर्जा दिया गया । शुरुआत के लिए अच्छा मुकाम आदम के साथ है ।                   

क़ुदरत की रात, जलाल का दिन और अँबिया का कलाम

सूरा अल – क़दर (सूरा 97 – क़ुदरत) क़ुदरत की रात का ज़िकर करता है जब कुरान शरीफ का पहला मुकशफ़ा हुआ ।   

हमने (इस कु़रान) को शबे क़द्र में नाजि़ल (करना शुरू) किया । और तुमको क्या मालूम शबे क़द्र क्या है । शबे क़द्र (मरतबा और अमल में) हज़ार महीनो से बेहतर है । इस (रात) में फ़रिश्ते और जिबरील (साल भर की) हर बात का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार के हुक्म से नाजि़ल होते हैं । ये रात सुबह के तुलूअ होने तक (अज़सरतापा) सलामती है।

सूरए अल–क़द्र  97:1-5

सूरा अल — क़दर, हालांकि क़ुदरत की रात का बयान करता है इस बतोर कि यह रात ‘एक हज़ार महीनों की रात’ से भी बेहतर है फिर भी यह पूछता है कि यह कुदरत कि रात क्या थी ? रूह क्या कर रही थी कि क़ुदरत कि रात को एक हज़ार महीनों कि रात से बेहतर बनाए ?

सूरा अल –- लैल, (सूरा 92 –- रात) इसका भी वही दिन और रोशनी का मोज़ू है जो रात का पीछा करता है । दिन जलाल के साथ निकलता है, और अल्लाह रहनुमाई करता है क्यूंकि वह हर चीज़ को शुरू से लेकर आख़िर तक जानता है । इसलिए वह हमको आख़िर में जहन्नम कि आग से ख़बरदार करता है ।           

 रात की क़सम जब (सूरज को) छिपा ले । और दिन की क़सम जब ख़ूब रौशन हो ।

सूरए अल लैल 92:1-2

हमें राह दिखा देना ज़रूर है । और आख़ेरत और दुनिया (दोनों) ख़ास हमारी चीज़े हैं। तो हमने तुम्हें भड़कती हुयी आग से डरा दिया।

सूरए अल लै ल 92:12-14

ज़ेल की इंजील शरीफ़ की आयत से सूरा अल—क़दर और सूरा अल—लैल की आयतों का मवाज़िना करें : 

और हमारे पास पैगंबरों का वचन अधिक निश्चित है, और आप उस पर ध्यान देने के लिए अच्छी तरह से करेंगे, जैसे कि एक अंधेरी जगह में एक प्रकाश चमक रहा है, जब तक कि दिन और सुबह का तारा आपके दिलों में उगता है

2 पतरस 1:19

क्या आप मुशाबहतों को देखते हैं ? जब मैं ने सूरा अल – क़दर और सूरा अल – लैल को पढ़ा तो मुझे इस हवाले को याद दिलाया गया था । यह इस बात को भी बयान करता है कि एक रात के बाद दूसरा दिन निकलता है । रात के दौरान नबियों को मुकाशफ़ा दिया जाता था । यह हमको इस बात से भी खबरदार करता है कि पैग़मबराना पैगामात को नज़र अंदाज़ न करे । वरना हम संजीदा अनजामत केए सामना करना पड़ेगा ।

इस खत को पतरस रसूल के जरिये लिखा गया था जो शागिरदों का रहनुमा और नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़ियादा करीब में रहने वाला शागिर्द था । सूरा अस — साफ़ (सूरा 61 –सिलसिला) ईसा अल मसीह के शागिरदों की बाबत कहता है : 

ऐ ईमानदारों ख़ुदा के मददगार बन जाओ जिस तरह मरियम के बेटे ईसा ने हवारियों से कहा था कि (भला) ख़ुदा की तरफ़ (बुलाने में) मेरे मददगार कौन लोग हैं तो हवारीन बोल उठे थे कि हम ख़ुदा के अनसार हैं तो बनी इसराईल में से एक गिरोह (उन पर) ईमान लाया और एक गिरोह काफ़िर रहा, तो जो लोग ईमान लाए हमने उनको उनके दुशमनों के मुक़ाबले में मदद दी तो आखि़र वही ग़ालिब रहे।

 सूरए अस साफ़ 61:14

सूरा अस साफ़ एलान करता है कि ईसा अल मसीह के शागिर्द ‘ख़ुदा’ के मददगार’ थे । शागिर्दों के पैगाम पर जो ईमान वह उस क़ुवत को हासिल करता था जिस के बारे में कहा गया है । पतरस जो शागिर्दों का रहनुमा था वह एक तरह से खुदा की मदद कर रहा था । हालांकि वह नबी हज़रत ईसा अल मसीह का एक शागिर्द था, वह अल मसीह के किए हुए कई एक मोजिज़ों का गवाह था, उनकी दी हुई कई एक तालिमात को बगोर सुनता था और जो उसके इख्तियारात हैं उसका उनहों ने कैसे इस्तेमाल किया इन सब को पतरस ने नजदीकी से देखा था । ऊपर दिये गए बयानात में उसने यहाँ तक एलान किया कि नबियों के कलाम जो उसके बारे में कहे गए थे वह यक़ीन से ज़ियादा साबित हुए । नबियों के कलाम जो उसके हक़ में कहे गए थे वह यक़ीन से ज़ियादा और उसके ख़ुद की गवाही से ज़ियादा क्यूँ साबित हुए ? इस बात को वह जारी रखता है ।         

  20 पर पहिले यह जान लो कि पवित्र शास्त्र की कोई भी भविष्यद्वाणी किसी के अपने ही विचारधारा के आधार पर पूर्ण नहीं होती।
21 क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे॥

2 पतरस 1:20-21

यह हम से कहता है कि खुदा का पाक रूह नबियों को अपने साथ ‘लिए चलता’ था, और जो खुदा के पैगामात को वह हिफ़्ज़ करते थे उन्हें खुदा के पाक रूह की मौजूदगी में लिख लेते थे इसी लिए यह कलाम ‘खुदा के इल्हाम’ से कहलाते हैं । इसी सबब से इस तरह कीएक रात एक हज़ार महीनों की रातों से बेहतर है । इस लिए कि यह रूहुल कुदुस से जड़ पकड़ी हुई हैं इंसान की ख़्वाहिश से कभी नहीं हुई । सूरा अस साफ़ हम से कहता है कि जिन्हों ने पतरस के पैगाम पर धियान दिया वह ऐसी कुवत हासिल करेंगे जो ताक़त की रात में इस्तेमाल किया गया था  और वह गालिब आएंगे ।  

नबी हज़रत ईसा अल मसीह के ज़माने में रहते वक़्त ‘अँबिया’ जिनकी बाबत पतरस ने लिखा वह पुराने अहद नामे के नबियों की बाबत है – पुराना अहद नामा वह मुक़द्दस किताबों का मज्मूआ है जो मुक़द्दस इंजील से पहले लिखी गई थींहज़रत मूसा की तौरात में कई एक बयानात हैं जो हज़रत आदम, क़ाबील और हाबील, हज़रत नूह, हज़रत लूत और हज़रत इब्राहीम और दीगर नबियों के साथ जुड़ी हुई हैं । इन नबियों के बयानात के साथ यह भी ज़िकर है कि जब हज़रत मूसा ने फ़िरोन का सामना किया और फिर शरीयत की किताब हासिल की । उसी उनके के भाई हज़रत हारून की कुरबानियों का ज़िकर है । क़ुरान शरीफ़ में सूरह बक़रा इन्हीं कुरबानियों को लेकर नाम दिया गया है ।

तौरात के ख़ात्मे का पीछा करते हुए हम ज़बूर शरीफ़ में पहुँचते हैं जहां हज़रत दाऊद हज़रत मसीह की आमद के बारे में लिखने के लिए इल्हामी होते हैं । फिर सिलसिलेवार नबियों ने नबूवत की कि मसीह कुंवारी से पैदा होंगे तो अल्लाह की बादशाही ज़मीन के सब लोगों के लिए खुल जाएगी । मसीह को आने वाला ख़ादिम भी कहा गया है जो दुखों को सहने वाला होगा । फिर उस का नाम मसीह होगा करके नबुवत की गई । इसके साथ ही उसके ज़ाहिर होने का वक़्त भी नबुवत के ज़रिये बताया गया एक रास्ता तयार करने वाला पेशवा के वायदे के साथ

हम में से अक्सर लोगों के पास मोक़ा नहीं रहा था होगा कि अपने खुद के लिए इन दस्तावेज़ों को पढ़ते यहाँ इन फ़रक़ फ़रक़ कड़ियों के साथ इन्हें पढ़ने का एक सुनेहरा मोक़ा है । सूरा अल- लैल आने वाली आग की बाबत ख़बरदार करता है । सूरा अल–क़द्र ऐलान करता है कि खुदा का रूह उस क़ुदरत की रात के दौरान खुदा का रूह काम कर रहा था । सूरा अस—साफ़ उन लोगों को रूह की क़ुवत देने का वायदा करता है जो रसूलों के पैगाम पर ईमान लाते हैं । पतरस जो शागिरदों का रहनुमा था वह हमें नसीहत देता है कि खादीम नबियों के मुकाश्फ़े जो दस्तावेज़ों में मौजूद हैं उनपर गौर तलब फ़रमाएँ, जो रात के वक़्त में दिये गए थे, जिन्हों ने अच्छे दिन की राह देखि । क्या यह समझदारी नहीं होगी कि उनके पैगामात को जानें ?  

रूथ और बोअज़ की एक बे मिसल महब्बत की कहानी कैसी है ?

अगर आपको बड़ी महब्बत की कहानी का नाम देना हो तो, शायद आप नबी हज़रत मोहम्मद सल्लम और हज़रत ख़दीजा (रज़ि) के बीच महब्बत की कहानी को या हज़रत मोहम्मद सल्लम और उन की चहेती बीवी हज़रत आइशा सिददीक़ा (रज़ि) के बीच महब्बत की दास्तान पेश करते या फिर हज़रत अली और हज़रत फ़ातिमा के महब्बत की कहानी की सलाह देते । और अगर फ़ि ल्मों और तसनीफ़ की बात करें तो आप शायद रोमियो और जूलियत, ब्यूटी एंड द बीस्ट, अलाउद्दीन की कहानी में अली और जेसमीन की, या शायद सिनडरेल्ला और प्रिनस चारमिंग की महब्बत की कहानी को तरजीह देते । जिन में तारीख़, ख़दीम अमरीकी तहज़ीब, और प्यार के फ़साने और जोश से भरी महब्बत की कहानियां पेश करते हैं जो हमारे दिलों , जज़्बातों और तसव्वुरात को क़ाबू मे कर लेते हैं ।                        

एक बड़े ताज्जुब के साथ, वह महब्बत जो रूथ और बोअज़ के बीच तरक़्क़ी की वह इन में से किसी भी महब्बत की दास्तान के मुक़ाबले में ज़ियादा अरसे तक क़ाइम रहने और शानदार नहीं थे । और दर असल हम में से खरबों लोगों की ज़िंदगियों में जो आज जी रहे हैं असर करती है — जबकि यह दोनों आशिक़ तीन हज़ार साल पहले आपस में मिले थे ।      

सूरा जात अल – मा ऊन , अद – ज़ुहा , अल –इनशराह  और अल – मुमतहनह   रूथ और बोअज़  में मिसाल बनते हैं   

रूथ और बोअज़ की कहानी इन सूराजात के जरिये से एक बुनयादी उसूल की मिसाल पेश करते हैं । बोअज़ ने रूथ पर एक छोटी सी मेहरबानी करी थी, मगर वह एक ऐसा शख़्स था जो शरीर आदमी के बिलकुल ही खिलाफ़ था जिसके खिलाफ़ में सूरा अल – माऊन (सूरा 107 – छोटी मेहरबानियाँ) बयान पेश करता है ।          

ये तो वही (कम्बख़्त) है जो यतीम को धक्के देता है। और मोहताजों को खिलाने के लिए (लोगों को) आमादा नहीं करता।

(सूरए अल माऊन 107:2-3)

और रोज़ मर्रा की मामूली बरतने की चीज़ें भी आरियत नहीं देते।

सूरए अल माऊन 107:7

तजरुबों के मामले में रूथ एक कामिल मिसाल है जिस तरह अज़ – ज़ुहा (सूरा 93 – सुबह के औक़ात) में पेश किया गया है।

और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंजि़ले मक़सूद तक पहुँचा दिया । और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया। तो तुम भी यतीम पर सितम न करना । माँगने वाले को झिड़की न देना । और अपने परवरदिगार की नेअमतों का जि़क्र करते रहना ।

सूरए अज़ ज़ुहा 93:7-11

नाओमी के तजरूबे, रूथ की कहानी में रूथ की सास अपने उसूलों की बहुत पक्की थी जिस तरह सूरह अल – इनशराह (सूरा 94 – छुटकारा) में पेश किया गया है ।     

(ऐ रसूल) क्या हमने तुम्हारा सीना इल्म से कुशादा नहीं कर दिया (जरूर किया)। और तुम पर से वह बोझ उतार दिया। जिसने तुम्हारी कमर तोड़ रखी थी। और तुम्हारा जि़क्र भी बुलन्द कर दिया । तो (हाँ) पस बेशक दुशवारी के साथ ही आसानी है । यक़ीनन दुशवारी के साथ आसानी है ।

सूरए अल इन्शिराह 94:1-6

वह तरीक़ा जिसमें बोअज़ ग़ैर मुल्क से आकर पनाह ले रही रूथ पर यक़ीन करते हुए जाँचता है वह सूरा अल – मुमतहना (सूरा 60 – वह औरत जिस को जाँचना चाहिए) की बुनयाद पर है जिसे वह अपने लिए नाफ़िज़ करता है ।   

ऐ ईमानदारों जब तुम्हारे पास ईमानदार औरतें वतन छोड़ कर आएँ तो तुम उनको आज़मा लो, ख़ुदा तो उनके ईमान से वाकिफ़ है ही, पस अगर तुम भी उनको ईमानदार समझो तो उन्ही काफि़रों के पास वापस न फेरो न ये औरतें उनके लिए हलाल हैं और न वह कुफ़्फ़ार उन औरतों के लिए हलाल हैं और उन कुफ्फ़ार ने जो कुछ (उन औरतों के मेहर में) ख़र्च किया हो उनको दे दो, और जब उनका महर उन्हें दे दिया करो तो इसका तुम पर कुछ गुनाह नहीं कि तुम उससे निकाह कर लो और काफ़िर औरतों की आबरू (जो तुम्हारी बीवियाँ हों) अपने कब्ज़े में न रखो (छोड़ दो कि कुफ़्फ़ार से जा मिलें) और तुमने जो कुछ (उन पर) ख़र्च किया हो (कुफ़्फ़ार से) लो, और उन्होने भी जो कुछ ख़र्च किया हो तुम से माँग लें यही ख़ुदा का हुक्म है जो तुम्हारे दरमियान सादिर करता है और ख़ुदा वाकि़फ़कार हकीम है।

सूरए अल मुम्तहिनह 60:10

आज के ज़माने के लिए रूथ और बोअज़

उनके प्यार का मामला भी आप के और मेरे लिए अल्लाह की जानिब से एक मख़फ़ी या बातिनी और रूहानी महब्बत को पेश करता है । रूथ और बोअज़ की कहानी ग़ैर तहज़ीबी और ममनू शुदा महब्बत, तबदील ए वतन, एक ज़ोरावर आदमी और एक कमज़ोर औरत के बीच रिश्ते के साथ बरताव करता है – यह मौजूदा के # मी टू ईरा में नफ़िज़ होता है । यह क़दीम यहूदी -अरबी ताल्लुक़ात से बरताव रखता है । यह हमारे लिए एक नीला ख़ाका साबित होता है कि हम किस तरह से एक कामयाब शादी शुदा ज़िन्दगी को क़ायम करें । इन में से किसी एक मेयार पर रूथ और बोअज़ की महब्बत की कहानी जानने लायक़ है ।           

इन की महब्बत को किताब –ए- मुक़द्दस बाइबल के रूथ की किताब में बयान किया गया है । यह एक छोटी किताब है – इसमें सिरफ़ 2400 अल्फ़ाज़ पाये जाते हैं –और इसे (यहाँ) पढ़ने लायक़ है इसको 1150 में लिखा गया था, जिसको तमाम महब्बत की कहानियों में सब से पुराना माना जाता है । इसकी कई एक फ़िल्म भी बन चुकी है ।     

रूथ की महब्बत की होललीवुड फ़िल्म जो लफ़्ज़ों से तस्वीर खींची गई है  

रूथ के महब्बत की कहानी

नाओमी और उसका शोहर, जो दोनों यहूदी थे, उनके दो बेटे थे । तमाम इसराईल मुल्क में क़हत पड़ने से इन का जीना दूभर हो जाता है । क़हत से बचने के लिए वह अपने दोनों बेटों  को लेकर पास के मुल्क मोआब चले आते है । (मोआब मौजूदा यर्दन का इलाक़ा है) । कुछ दिन गुज़रने के बाद मक़ामी लड़कियों के साथ अपने बेटों की शादी करदी जाती है मगर मुकद्दर उन दोनों बेटों को जीने नहीं देता, वह दोनों बटे मर जाते है इसी तरह नओमी का शोहर भी अपनी बीवी और अपनी दोनों बहुओं को अकेला छोड़ कर मर जाता है । नओमी अपने मादिरे वतन इसराईल को लौटने का फैसला लेती है और दोनों बहुओं में से एक जिस का नाम रूथ था वह अपनी सास के साथ रहना पसंद करती है । अपने शहर बेथलहम से एक लम्बे अरसे तक दूर रहने के बाद एक मोहताज (मुफ़लिस) बेवा बतोर रूथ के साथ वह बेथलहम वापस आती है । रूथ एक खूबसूरत, जवान और कमज़ोर मोआबिन लड़की थी जो (अरब) से तबदीले वतन थी ।                 

रूथ और बोअज़ का मिलना 

कोई आमदनी न होने के सबब से, रूथ खेतों में अनाज बटोरने जाती थी जो मक़ामी फ़सल काटने वालों से अक्सर छूट जाता है या छोड़ दिया जाता है । अगर कोई ज़रूरतमन्द उन्हें बटोरता है तो उसके लिए मनाही नहीं थी । यह पुराने अहद नामे का रिवाज था । नबी हज़रत मूसा की शरीअत मे ऐसा लिखा हुआ है । मुआशिरती तहफ्फुज़ के निज़ाम के मुताबिक़ तमाम फ़सल काटने वालों के लिए हुक्म था कि कुछ अनाज अपने खेतों में छोड़ दिया करें ताकि ग़रीब और मुफ़लिस लोग उन्हें बटोर कर अपना गुज़ारा कर सकें । बिना सोचे समझे यह देखा गया कि रूथ खुद ही उन खेतों में जा कर छोड़ी हुई अनाज बटोरती है जिन का मालिक एक दौलतमंद था जिस का नाम बोअज़ था । बोअज़ इस बात पर धियान देता है कि रूथ दीगर औरतों के साथ अनाज बटोरने में मशक़त कर रही थी जो उसके काटने वाले मज़दूरों के जरिये छोड़ा जाता था । बोअज़ अपने ठेकेदार को हिदायत देता है कुछ मज़ीद अनाज पीछे खेत में छोड़ दिया करे ताकि रूथ ज़ियादा अनाज बटोर सके । ऐसा करते हुए, बोअज़ एक बुरे शख्स की उल्टा मिसाल पेश करता है जिस तरह सूरा अल-माऊन मे पेश किया गया है और रूथ अपनी ज़रूरत पूरा कर लेती है जिस तरह सूरा अज़-ज़ुहा मे बताया गया है ।                 

रूथ और बोअज़ की मुलाक़ात । मच आर्ट ने उनकी मुलाक़ात की तस्वीर कशी की है  

इसलिए कि रूथ बोअज़ के खेतों में कसरत से अनाज बटोर सकती थी अब वह हर दिन बिला नाग़ा आती थी । बोअज़ एक मुहाफ़िज़ बतोर यक़ीन रखता है कि रूथ किसी भी तरह से अपने किसी भी नौकर के ज़रिये न परेशान की जाए और न छेड़ी जाए । जैसे जैसे बोअज़ रूथ का ख्याल रखने लगा था वह दोनों आपस में एक दूसरे से दिलचसपी लेने लगे । मगर इसलिए कि उन दोनों के बीच उम्र का, मुआशिरती हैसियत का और क़ौमियत का फ़रक़ था, डीओएनओएन में से कोई आगे नहीं बढ़ा । पर नओमी इन दोनों की जोड़ी बनाने में लगी हुई थी । उसने रूथ को हिदायत दी कि फ़सल कटाई के आख़री दिन जश्न के बाद सोने के वक़्त दिलेरी से बोअज़ के बाज़ू में जाकर लेट जाए । और रूथ ऐसा ही करती है । बोअज़ समझ जाता है कि यह शादी की तजवीज़ है और वह उससे शादी करने फैसला करता है ।                     

क़रीबी रिश्तेदार छुड़ाने वाला

मगर उन दोनों के बीच महब्बत से ज़ियादा हालत और पेचीदा तब होजाती है जब उन्हें मालूम पड़ता है कि बोअज़ नओमी का रिश्तेदार साबित होता है । और जबकि रूथ नओमी की बहू है तो बोअज़ और रूथ शादी के ज़रिये क़रीबी रिश्तेदार हुए । इस सूरत में बोअज़ को ‘छुड़ाने वाला रिश्तेदार बतोर रूथ से शादी करनी पड़ी । इस का मतलब यह है नबी हज़रत मूसा की शरीअत के मातहत वह उसके पहले शोहर के नाम से (नओमी का बेटा) शादी करेगा और इस तरह उसके लिए मुहैया करेगा । इस का मतलब यह होगा कि बोअज़ नओमी के ख़ानदान के खेतों को खरीदे । हालांकि यह बोअज़ के लिए बहुत महंगा साबित हुआ मगर यह कोई बड़ी रुकावट नहीं थी । एक दूसरा क़रीबी रिश्तेदार था जो पहला हक़ रखता था कि नओमी के खानदान के खेतों को खरीदे । (और इस तरह से भी रूथ से शादी करे) इस तरह से रूथ की शादी बोअज़ से इस बात पर ठहर गया कि चाहे दूसरा शख्स चाहता था कि नओमी और रूथ की ज़िम्मेदारी उठाए कि उनकी परवाह की जाए । शहर के बुज़ुर्गों ने एक आम सभा के पहली क़तार में इस शादी को रद्द कर दिया इस लिए कि उसके ख़ुद के कुल इमलाक का जोखिम था । मगर बोअज़ आज़ाद था कि उसे ख़रीदे और नओमी के ख़ानदानी इमलाक को छुड़ाए और रूथ से शादी करे । नओमी ने जो मुश्किल साल काटे थे अब उनसे राहत पाई । इसी उसूल के मिसाल को सूरा इन-शराह में पेश किया गया है ।                      

रूथ और बोअज़ की विरासत  

शादी के बाद उन दोनों के मिलन से एक बच्चा पैदा हुआ जिस का नाम उनहों ने ओबेद रखा । जैसे जैसे इनकी नसल बढ़ती गई इनही की नसल से हज़रत दाऊद (दाऊद बादशाह) पैदा हुए । हज़रत दाऊद से वायदा किया गया था कि मसीह उन के ख़ानदान से पैदा होंगे । आगे की नबुवतें पेश बीनी करते हैं कि मसीह की पैदाइश एक कुंवारी से होगी और आखिरे कार नबी हज़रत ईसा अल मसीह बेथलहम में पैदा हुए उसी कस्बे में जहां रूथ और बोअज़ सदियों साल पहले मिले थे । उनकी महब्बत, शादी और ख़ानदानी शजरे से जो नसल चली आई जो मौजूदा ज़माने के केलंडर की बुनयाद है, और आलमगीर छुट्टियाँ जैसे क्रिसमस और ईस्टर इन्हीं की देन है – 3000 साल पहले एक धूल भरे गांव में जो महब्बत की दास्तान शुरु हुई उस का अंजाम कोई बुरा नहीं है ।           

एक बड़ी महब्बत की कहानी की तस्वीर कशी करना

जिस बहादुरी और इज्ज़त के साथ अमीर और ज़ोरावर बोअज़ ने रूथ के साथ सुलूक किया,जो मोहताज और बाहिरी मुल्क की थी वह एक मिसाली और परेशानियों का मुक़ाबला करती हुई फ़ा इदा उठा रही थी और अब यह #मी टू डे में मामूल सा बन गया है । ख़ानदानी शजरे का तारीख़ी असर जो इस महब्बत और शादी ने तय्यार किया, यह हमें हर वक़त याद दिलाता है जब भी हम अपने मनसूबों की तारीख़ नोट करते हैं कि यह महब्बत की कहानी क़ाइम रहने वाली विरासत को पेश करती है । मगर रूथ और बोअज़ की कहानी यहाँ तक कि दीगर महब्बत की कहानियों के मुक़ाबले में उन से बड़ी है — जिसमें आपको और मुझे दावत दी जाती है ।           

किताब मुक़द्दस बाइबल हम से बयान करता है कि जैसा रूथ ने कहा वैसा वह भी कहता है ।  

  23 और मैं अपने लिये उसे देश में बोऊंगा, और लोरूहामा पर दया करूंगा, और लोअम्मी से कहूंगा, तू मेरी प्रजा है, और वह कहेगा, “हे मेरे परमेश्वर”॥

होसी’अ 2:23

पुराने अहदनामे का नबी होसी’अ (सीए 750 क़बल मसीह) ने अपने खुद की टूटी शादी में सुलह का इस्तेमाल करते हैं तस्वीर कशी केई लिए कि अल्लाह अपनी महब्बत के साथ हम तक पहुँच रहा है । जिस तरह रूथ बोअज़ की ज़मीन पर ऐसे पहुंची थी जैसे उस के साथ प्यार का कोई वास्ता नहीं था मगर बाद में बोअज़ की तरफ़ से प्यार ज़ाहिर किया गया, अल्लाह की मर्ज़ी है कि वह अपनी महब्बत हम में से उन पर भी ज़ाहिर करे जो महसूस करते हैं कि हम उसकी महब्बत से बहुत दूर हैं । इसको इंजील शरीफ के रोमियों की किताब (9:25) में हवाला दिया गया है यह दिखाने के लिए कि जो लोग उसकी महब्बत से दूर हैं किस तरह अल्लाह उन तक पहुंचता है ।             

किस तरह उसकी महब्बत को दिखाया गया ? ईसा अल मसीह, जो बोअज़ और रूथ की नसल है, ऐसा शख्स जो हमारा ‘अज़ीज़’ (एक रिश्तेदार) बतोर बिलकुल उसी तरह बोअज़ रूथ के लिए था । उसने हमारे गुनाहों का क़र्ज़ा अल्लाह को अदा किया जब वह सलीब पर मसलूब किया गया था, और इस तरह वह             

14 जिस ने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिये एक ऐसी जाति बना ले जो भले भले कामों में सरगर्म हो॥

तितुस 2:14

जिस तरह बोअज़ एक ‘अज़ीज़ छुड़ाने वाला’ था जिस ने रूथ को छुड़ाने के लिए एक बड़ी रक़म अदा की, बिलकुल उसी तरह येसू हमारा ‘अज़ीज़ – छुड़ाने वाला’ है जिस ने हमको हमारे गुनाहों से छुड़ाने के लिए (अपनी ज़िन्दगी) क़ुरबान कर दी ।    

हमारी शादियों के लिए एक मिसाल

जिस तरीक़े से ईसा अल मसीह (और बोअज़) छुड़ाने के लिए क़ीमत अदा की और अपनी दुल्हन को जीत लिया (पा लिया) यह हमारे लिए मिसाल है कि हम किस तरह अपनी शादियां ता’मीर कर सकते हैं । आल-किताब/बाइबल समझाती है कि हम अपनी शादियाँ कैसे क़ायम करते हैं :          

 

21 और मसीह के भय से एक दूसरे के आधीन रहो॥
22 हे पत्नियों, अपने अपने पति के ऐसे आधीन रहो, जैसे प्रभु के।
23 क्योंकि पति पत्नी का सिर है जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है; और आप ही देह का उद्धारकर्ता है।
24 पर जैसे कलीसिया मसीह के आधीन है, वैसे ही पत्नियां भी हर बात में अपने अपने पति के आधीन रहें।
25 हे पतियों, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया।
26 कि उस को वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।
27 और उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बना कर अपने पास खड़ी करे, जिस में न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, वरन पवित्र और निर्दोष हो।
28 इसी प्रकार उचित है, कि पति अपनी अपनी पत्नी से अपनी देह के समान प्रेम रखें। जो अपनी पत्नी से प्रेम रखता है, वह अपने आप से प्रेम रखता है।
29 क्योंकि किसी ने कभी अपने शरीर से बैर नहीं रखा वरन उसका पालन-पोषण करता है, जैसा मसीह भी कलीसिया के साथ करता है
30 इसलिये कि हम उस की देह के अंग हैं।
31 इस कारण मनुष्य माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।
32 यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूं।
33 पर तुम में से हर एक अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम रखे, और पत्नी भी अपने पति का भय माने॥

इफ़सियों 5:21-23


जिस तरह बोअज़ और रूथ ने अपनी शादी एक दूसरे से महब्बत और एक दूसरे की इज्ज़त की बुनयाद पर क़ाइम की, और नबी ईसा की परवाह शोहरों के लिए एक मिसाल है कि अपनी बीवियों से नज़र –ओ- नियाज़ से प्यार करें, तब हम अपनी शादियों की तामीर इनही क़दर –ओ-क़ीमत के साथ एक उम्दा तरीक़े से कर पाएंगे ।       

एक शादी की दावत आपके और मेरे लिए

जिस तरह तमाम महब्बत की अच्छी कहानियों में होता है , वैसे ही किताब/बाइबल एक शादी के साथ ख़त्म करता है । जिस तरह बोअज़ ने रूथ को छुड़ाने के लिए क़ीमत अदा की, उनकी अपनी शादी के लिए रास्ता साफ़ किया उसी तरह नबी हज़रत ईसा आल मसीह ने भी हमारे गुनाहों के लिए क़ीमत अदा की और हमारी शादी के लिए रास्ता साफ़ किया । यह शादी तस्वीरी या तमसीली नहीं बल्कि हक़ीक़त है, और जो इस शादी की दावत को क़बूल कर लेते हैं उन्हें ‘मसीह की दुल्हन’ कहा जाता है । जैसे कलाम कहता है :        

  7 आओ, हम आनन्दित और मगन हों, और उस की स्तुति करें; क्योंकि मेम्ने का ब्याह आ पहुंचा: और उस की पत्नी ने अपने आप को तैयार कर लिया है                                    

मुकशफ़ा19:7

जो लोग येसू के छुटकारे की पेशक्श को क़बूल करते हैं वह उसकी ‘दुल्हन’ बन जाते हैं । इस आसमानी शादी को हम सब के लिए पेश किया गया है । उसकी शादी में आने के लिए आप को और मुझे यह दावत नामा देने के साथ बाइबल ख़त्म होती है ।   

  17 और आत्मा, और दुल्हिन दोनों कहती हैं, आ; और सुनने वाला भी कहे, कि आ; और जो प्यासा हो, वह आए और जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले॥

मुकाशफ़ा 22:17

रूथ और बोअज़ के बीच जो रिश्ता है वह महब्बत की एक मिसाल है जिसको आज और अभी भी महसूस किया जा सकता है । यह अल्लाह की आसमानी महब्बत की एक तस्वीर है । वह अपनी दुल्हन बतोर उनसे शादी करेगा जो उसकी तजवीज़ को क़बूल करते हैं जैसे किसी भी शादी में किया जाता है, उसकी पेशकश को तोला जाना चाहिए यह देखने के लिए कि आप उसे क़बूल करते हैं या नहीं । ‘मनसूबे’ के साथ यहाँ शुरू करें जो हज़रत आदम के साथ शुरू में पेश किया गया है, यहाँ यह देखना पड़ेगा कि हज़रत इब्राहीम ने मंसूबे की पेशबीनी की, यहाँ नबी हज़रत मूसा ने बताया कि छुटकारा देने वाला कैसे क़ीमत अदा करेगा, और यहाँ यह देखना है कि सदियों पहले इसकी पेशीनगोई कैसे हुई ताकि हम जान सकें कि यह सच मुच अल्लाह/खुदा की तजवीज़ है ।         

रूथ के किताब की दूसरी तसररूफ़ फ़िल्म में

क़ुरान शरीफ़ और तारीख़ : क्या ईसा अल मसीह सलीब पर मरे थे ?

हम इस सवाल का तफ़सील से जांच करेंगे , हजरे अस्वद का काबा से ग़ाइब हो जाने को इस्तेमाल करते हुए (318 अन्नो हिजरी में) ताकि इस मामले की मिसाल पेश कर सके ।       

वह लोग जो इंकार करते नबी हज़रत ईसा अल मसीह सलीब पर मारे गए वह आम तोर से सूरा -ए- निसा 157 केए हवाला देते हैं ।

और उनके यह कहने की वजह से कि हमने मरियम के बेटे ईसा (स.) ख़ुदा के रसूल को क़त्ल कर डाला हालाँकि न तो उन लोगों ने उसे क़त्ल ही किया न सूली ही दी उनके लिए (एक दूसरा शख़्स ईसा) से मुशाबेह कर दिया गया और जो लोग इस बारे में इख़्तेलाफ़ करते हैं यक़ीनन वह लोग (उसके हालत) की तरफ़ से धोखे में (आ पड़े) हैं उनको उस (वाकि़ये) की ख़बर ही नहीं मगर फ़क़्त अटकल के पीछे (पड़े) हैं और ईसा को उन लोगों ने यक़ीनन क़त्ल नहीं किया।

सूरए निसा 4:157

क्या ईसा अल मसीह मारे गए थे ?

इस बात पर ग़ौर करें कि यह आयत यह नहीं कहती ईसा अल मसीह नहीं मरे थे । बल्कि यह कहती है कि ‘यहूदियों ने उनको नहीं मारा …’ सोइन दोनों बयानों में फ़रक़ पाया जाता है । इंजील शरीफ़ बयान करती है कि यहूदियों ने नबी को गिरफ़्तार किया और काइफ़ा जो सरदार काहिन था उसने नबी से स्वालात किए थे । मगर:

28 और वे यीशु को काइफा के पास से किले को ले गए और भोर का समय था, परन्तु वे आप किले के भीतर न गए ताकि अशुद्ध न हों परन्तु फसह खा सकें।  

यूहनना 18:28

पिलातुस उन दिनों रोम का हाकिम था । रोम की सरकार के मातहत रहते हुए, यहूदियों को कोई इख़तियार नहीं था कि वह किसी को हलाक करे । फिर पिलातुस ने नबी को रोमी सिपाहियों के हवाले कर दिया ।  

16 तब उस ने उसे उन के हाथ सौंप दिया ताकि वह क्रूस पर चढ़ाया जाए॥

यूहनना 19:16

सो यह रोमी सरकार थी और रोमी सिपाही थे जिन्हों ने नबी को सलीब दी थी – न कि यहूदियों ने । यहूदियों के सरदारों पर नबी के शागिर्दों का इल्ज़ाम था कि 

13 इब्राहीम और इसहाक और याकूब के परमेश्वर, हमारे बाप दादों के परमेश्वर ने अपने सेवक यीशु की महिमा की, जिसे तुम ने पकड़वा दिया, और जब पीलातुस ने उसे छोड़ देने का विचार किया, तब तुम ने उसके साम्हने उसका इन्कार किया।

आमाल 3:13

याहूदियों ने नबी को रोमियों के हवाले किया और उनहों ने उनको सलीब दी । उन के सलीब पर मरने के बाद , उन के जिस्म को एक क़बर में रखा गया  

41 उस स्थान पर जहां यीशु क्रूस पर चढ़ाया गया था, एक बारी थी; और उस बारी में एक नई कब्र थी; जिस में कभी कोई न रखा गया था।
42 सो यहूदियों की तैयारी के दिन के कारण, उन्होंने यीशु को उसी में रखा, क्योंकि वह कब्र निकट थी॥

यूहनना 19:41-42

सूरा अन निसा 157 बयान करता है कि यहोदियों ने ईसा अल मसीह को सलीब नहीं दी । यह सच है । रोमयों ने दी थी ।

सूरा अल मरयम और नबी की मौत

सूरा मरयम साफ़ करता है कि ईसा अल मसीह मरे थे कि नहीं ।  

और (खु़दा की तरफ़ से) जिस दिन मैं पैदा हुआ हूँ और जिस दिन मरूँगा मुझ पर सलाम है और जिस दिन (दोबारा) जि़न्दा उठा कर खड़ा किया जाऊँगा । ये है कि मरियम के बेटे ईसा का सच्चा (सच्चा) कि़स्सा जिसमें ये लोग (ख़्वाहमख़्वाह) शक किया करते हैं।

सूरा मरयम 19:33-34

यह साफ़ बयान करता है कि ईसा अल मसीह ने अपनी पेश-ए- नज़र के सबब से अपने आने वाली मौत की बाबत बोला जिस तरह से इंजील बयान करती है

मसीह के ‘इवज़ में यहूदा इसकरयूत के मारे जाने’ का नज़रिया   

ग़लत फ़हमियों से बहुत ज़ियादा फैला हुआ यह नज़रिया कि यहूदा इसकरयूत की शक्ल ईसा अल मसीह जैसी तब्दील हो गई । फिर यहूदियों ने यहूदा इसकरयूत को गिरफ़्तार किया (जो अब ईसा जैसा दिखता था), रोमियों ने यहूदा को सलीब दी (जो अभी भी ईसा के मुशाबह था), और आखिरे कार यहूदा दफ़न हुआ था (जो अभी भी ईसा जैसा दिख रहा था) । इस नज़रिये में ईसा अल मसीह बग़ैर मरे बराहे रास्त आसमान पर गए । हालांकि न तो क़ुरान शरीफ़ में और न इंजील शरीफ़ में कहीं भी इस तरह के बयानात को इतमाम तक पहुंचाया गया है, मगर इस ग़लत फ़हमी को जान बूझ कर फैलाया गया है ।               

ईसा अल मसीह तारीख़ी क़लमबंद में

ग़ैर मज़हबी तारीख़ के कई एक हवालजात ईसा अल मसीह और उनकी मौत का बयान करते हैं। आइये हम उन में से दो पर ग़ौर करें । रोमी तारीख़दान टेसिटुस ने यह बयान करते हुए हवाला दिया कि किस तरह रोमी सल्तनत के नीरो बादशाह ने नबी हज़रत ईसा अल मसीह के पहले शागिरदों को 65 ईस्वी में बहुत बीई दरदी से सताया था । टेसिटुस ने लिखा :    

 ‘नीरो ने उन लोगों को इंतिहाई  शिद्दत से सताते हुए सज़ा दी जो मसीही कहलाते थे जो उन के जुर्म के लिए नफ़रत किए जाते थे । खिरिस्तुस नाम बानी को पोनतुस पिलातुस के ज़रिये मरवा दिया गया था जो तिबरियुस के इलाक़े में यहूदिया का हाकिम था : मगर एक वक़्त के लिए (थोड़े अरसे के लिए) इस तबाहकुन बातिल अक़ीदे को जो दबा दिया गया था उसको फिर से तोड़ दिया गया , न सिर्फ यहूदिया के वसीले से जहां ग़लती शुरू हुई थी बल्कि रॉम के शहर के वसीले से भी ‘  

टेसिटुस अननल्स XV.44

टेसिटुस तसदीक़ करता है कि ईसा अल मसीह :

  • 1) एक तारीख़ी शख़्स था;
  • 2) पोनतुस पिलातुस के ज़रिये हलाक किया गया था;
  • 3) उसके शागिरदों ने नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मौत के बाद यहूदिया (येरूशलेम) में अपनी तहरीक शुरू की;
  • 4) 65 ईस्वी में (नीरो के ज़माने में) ईसा के शागिरदों ने अपनी मनादी को यहूदिया से शुरू करके रोम तक ले गये तब रोमी सल्तनत ने एहसास किया कि इस को रोका जाना चाहिए ।      

जोसेफुस एक यहूदी, रोमी सिपाहियों का रहनुमा और तारीख़दान जो पहली सदी में यहूदी तारीख़ लिखा करता था । ऐसा करते हुए उस ने ईसा अल मसीह की ज़िंदगी को इन लफ़्ज़ों में बयान किया कि :

       ‘इस ज़माने में एक दनिशमंद शख़्स है … येसू । … वह अच्छा, और … नेक है । और बहुत से

       लोग यहूदियों में से और दीगर क़ौमों में से उसके शागिर्द हो चुके हैं । पिलातुस को मजबूर किया

       गया कि उसको सज़ावार टहराए और मसलूब करे कि वह हलाक हो । और जो उसके शागिर्द बन

       चुके थे उनहों ने अपनी शागिरदगी को आख़री दम तक नहीं छोड़ा । उनहों ने इतला दी कि

       उसकी मस्लूबियत के तीन दिन बाद वह उन पर ज़ाहिर हुआ था और वह ज़िंदा था ।         

जोसेफुस॰ 90 ईस्वी एन्टीकुइटीस XVIII, 33 

जोसेफुस तसदीक़ करता है कि :

  • 1) ईसा अल मसीह का वजूद था,
  • 2) वह एक मज़हबी उस्ताद था,
  • 3) पिलातुस जेओ रोम का गवर्नर था उसने उसे मरवाया,
  • 4) उसके शागिरदों ने उसके मरने के फ़ौरन बाद उसके ज़िंदा होने की मनादी की।

इन तारीखी बयानात से लगता है कि नबी की मौत जानी पहचानी थी , बिना बहस वाला वाक़िया था , उसके मुरदों में से जी उठने के साथ उसके शागिरदों के ज़रिये तमाम रोमी सल्तनत में मनादी की गई ।   

बाइबल से – तारीक़ी गोशा –ए- गुमनामी 

यहाँ यह बताया गया है कि बाइबल में किस तरह आमाल की किताब उन तमाम वाक़ियात को कलमबंद करती है कि जब शागिरदों ने येरूशलेम में मन्दिर के फाटक के सामने खड़े होकर ईसा अल मसीह के जी उठने की गवाही दी और इसकी मनादी भी की ।   

ब वे लोगों से यह कह रहे थे, तो याजक और मन्दिर के सरदार और सदूकी उन पर चढ़ आए।
2 क्योंकि वे बहुत क्रोधित हुए कि वे लोगों को सिखाते थे और यीशु का उदाहरण दे देकर मरे हुओं के जी उठने का प्रचार करते थे।
3 और उन्होंने उन्हें पकड़कर दूसरे दिन तक हवालात में रखा क्योंकि सन्धया हो गई थी।
4 परन्तु वचन के सुनने वालों में से बहुतों ने विश्वास किया, और उन की गिनती पांच हजार पुरूषों के लगभग हो गई॥
5 दूसरे दिन ऐसा हुआ कि उन के सरदार और पुरिनये और शास्त्री।
6 और महायाजक हन्ना और कैफा और यूहन्ना और सिकन्दर और जितने महायाजक के घराने के थे, सब यरूशलेम में इकट्ठे हुए।
7 और उन्हें बीच में खड़ा करके पूछने लगे, कि तुम ने यह काम किस सामर्थ से और किस नाम से किया है?
8 तब पतरस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर उन से कहा।
9 हे लोगों के सरदारों और पुरनियों, इस दुर्बल मनुष्य के साथ जो भलाई की गई है, यदि आज हम से उसके विषय में पूछ पाछ की जाती है, कि वह क्योंकर अच्छा हुआ।
10 तो तुम सब और सारे इस्त्राएली लोग जान लें कि यीशु मसीह नासरी के नाम से जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, और परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, यह मनुष्य तुम्हारे साम्हने भला चंगा खड़ा है।
11 यह वही पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना और वह कोने के सिरे का पत्थर हो गया।
12 और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें॥
13 जब उन्होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं।
14 और उस मनुष्य को जो अच्छा हुआ था, उन के साथ खड़े देखकर, वे विरोध में कुछ न कह सके।
15 परन्तु उन्हें सभा के बाहर जाने की आज्ञा देकर, वे आपस में विचार करने लगे,
16 कि हम इन मनुष्यों के साथ क्या करें? क्योंकि यरूशलेम के सब रहने वालों पर प्रगट है, कि इन के द्वारा एक प्रसिद्ध चिन्ह दिखाया गया है; और हम उसका इन्कार नहीं कर सकते।
17 परन्तु इसलिये कि यह बात लोगों में और अधिक फैल न जाए, हम उन्हें धमकाएं, कि वे इस नाम से फिर किसी मनुष्य से बातें न करें।

आमाल 4:1-17

17 तब महायाजक और उसके सब साथी जो सदूकियों के पंथ के थे, डाह से भर कर उठे।
18 और प्रेरितों को पकड़कर बन्दीगृह में बन्द कर दिया।
19 परन्तु रात को प्रभु के एक स्वर्गदूत ने बन्दीगृह के द्वार खोलकर उन्हें बाहर लाकर कहा।
20 कि जाओ, मन्दिर में खड़े होकर, इस जीवन की सब बातें लोगों को सुनाओ।
21 वे यह सुनकर भोर होते ही मन्दिर में जाकर उपदेश देने लगे: परन्तु महायाजक और उसके साथियों ने आकर महासभा को और इस्त्राएलियों के सब पुरनियों को इकट्ठे किया, और बन्दीगृह में कहला भेजा कि उन्हें लाएं।
22 परन्तु प्यादों ने वहां पहुंचकर उन्हें बन्दीगृह में न पाया, और लौटकर संदेश दिया।
23 कि हम ने बन्दीगृह को बड़ी चौकसी से बन्द किया हुआ, और पहरे वालों को बाहर द्वारों पर खड़े हुए पाया; परन्तु जब खोला, तो भीतर कोई न मिला।
24 जब मन्दिर के सरदार और महायाजकों ने ये बातें सुनीं, तो उन के विषय में भारी चिन्ता में पड़ गए कि यह क्या हुआ चाहता है?
25 इतने में किसी ने आकर उन्हें बताया, कि देखो, जिन्हें तुम ने बन्दीगृह में बन्द रखा था, वे मनुष्य मन्दिर में खड़े हुए लोगों को उपदेश दे रहे हैं।
26 तब सरदार, प्यादों के साथ जाकर, उन्हें ले आया, परन्तु बरबस नहीं, क्योंकि वे लोगों से डरते थे, कि हमें पत्थरवाह न करें।
27 उन्होंने उन्हें फिर लाकर महासभा के साम्हने खड़ा कर दिया और महायाजक ने उन से पूछा।
28 क्या हम ने तुम्हें चिताकर आज्ञा न दी थी, कि तुम इस नाम से उपदेश न करना? तौभी देखो, तुम ने सारे यरूशलेम को अपने उपदेश से भर दिया है और उस व्यक्ति का लोहू हमारी गर्दन पर लाना चाहते हो।
29 तब पतरस और, और प्रेरितों ने उत्तर दिया, कि मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य कर्म है।
30 हमारे बाप दादों के परमेश्वर ने यीशु को जिलाया, जिसे तुम ने क्रूस पर लटका कर मार डाला था।
31 उसी को परमेश्वर ने प्रभु और उद्धारक ठहराकर, अपने दाहिने हाथ से सर्वोच्च कर दिया, कि वह इस्त्राएलियों को मन फिराव की शक्ति और पापों की क्षमा प्रदान करे।
32 और हम इन बातों के गवाह हैं, और पवित्र आत्मा भी, जिसे परमेश्वर ने उन्हें दिया है, जो उस की आज्ञा मानते हैं॥
33 यह सुनकर वे जल गए, और उन्हें मार डालना चाहा।
34 परन्तु गमलीएल नाम एक फरीसी ने जो व्यवस्थापक और सब लोगों में माननीय था, न्यायालय में खड़े होकर प्रेरितों को थोड़ी देर के लिये बाहर कर देने की आज्ञा दी।
35 तब उस ने कहा, हे इस्त्राएलियों, जो कुछ इन मनुष्यों से किया चाहते हो, सोच समझ के करना।
36 क्योंकि इन दिनों से पहले यियूदास यह कहता हुआ उठा, कि मैं भी कुछ हूं; और कोई चार सौ मनुष्य उसके साथ हो लिये, परन्तु वह मारा गया; और जितने लोग उसे मानते थे, सब तित्तर बित्तर हुए और मिट गए।
37 उसके बाद नाम लिखाई के दिनों में यहूदा गलीली उठा, और कुछ लोग अपनी ओर कर लिये: वह भी नाश हो गया, और जितने लागे उसे मानते थे, सब तित्तर बित्तर हो गए।
38 इसलिये अब मैं तुम से कहता हूं, इन मनुष्यों से दूर ही रहो और उन से कुछ काम न रखो; क्योंकि यदि यह धर्म या काम मनुष्यों की ओर से हो तब तो मिट जाएगा।
39 परन्तु यदि परमेश्वर की ओर से है, तो तुम उन्हें कदापि मिटा न सकोगे; कहीं ऐसा न हो, कि तुम परमेश्वर से भी लड़ने वाले ठहरो।
40 तब उन्होंने उस की बात मान ली; और प्रेरितों को बुलाकर पिटवाया; और यह आज्ञा देकर छोड़ दिया, कि यीशु के नाम से फिर बातें न करना।
41 वे इस बात से आनन्दित होकर महासभा के साम्हने से चले गए, कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्य तो ठहरे।

आमाल 5:17-41

इस बात पर ग़ौर करें कि किस तरह यहूदी रहनुमाओं ने रसूलों के पैग़ाम को रोकने की बहुत ज़ियादा कोशिशें कीं । जिस तरह कि मौजूदा सरकारें जो नई तहरीकों से डरती हैं और लोगों को जेल में डालती हैं इसी तरह उस ज़माने के यहूदी रहनुमाओं ने भी ईसा अल मसीह के कुछ शागिरदों को मनादी करने से रोकने के लिए धम्की दी गई , गिरफ़्तार किया गया , मारा पीटा गया , क़ैद में डाला गया और आखिरे कार उन्हें मौत कि नींद सुला दिया गया । इन शागिरदों ने यरुशलेम में अपने पैग़ाम की मनादी की – उसी शहर में जहां कुछ ही हफ्तों पहले ईसा अल मसीह के नाम से ज़ाहिर हुए एक शख्स को सारे आम हलाक करके उसको दफ़न कर दिया गया था । मगर कौन हलाक हुआ था ? एक नबी? या यहूदा जिसको उसके जैसा बना दिया गया था ?    

आइये दूसरी सूरतों पर ग़ौर करें और देखें कि क्या हल निकलता है ।

ईसा अल मसीह का जिस्म और क़बर

क़बर को लेकर सिर्फ़ दो ही इंतख़ाब हैं । या तो क़बर ख़ाली था या अभी भी उसमें एक लाश रखी हुई थी जो नबी के जैसी दिखती थी । इसमें कोई दो राय नहीं है ।  

आइये हम इस नज़रिये को फ़र्ज़ करते हैं कि यहूदा को नबी की शक्ल जैसी बना दी गई थी, और उसको मसीह के मक़ाम पर सलीब दे दी गई थी, और फिर उसका जिस्म जो (नबी के मुशाबह थी) क़बर में रख दी गई थी । अब दूसरे वाक़ियात की बाबत सोचें जो तारीख़ में वाक़े हुईं जिन्हें हम जानते हैं । जोसेफुस, टेसितुस और आमाल की किताब हम से कहते हैं कि शागिरदों ने येरूशलेम में मनादी के अपने पैग़ाम शुरू कर दिये और यहूदी इख़तियार वालों ने शागिरदों की मुख़ालफ़त में सख्त कारवाई की जब उनहों ने मस्लूबियत के कुछ ही दिनों बाद मनादी करना शुरू कर दिया था मगर (यहूदा जो नबी जैसा लगता था) – जबकि हम इस नज़रिये को फ़र्ज़ कर रहे हैं)। मगर यह नज़रिया कबूल करता है कि यहूदा मरा पड़ा था । इस नज़रिये में लाश क़बर में पड़ी रही (मगर अभी भी वह बदला हुआ नबी की शक्ल का लगता था) — शागिर्द, रोमी सरकार, टेसितुस, जोसेफुस – यहाँ तक कि – हर कोई सोचेगा कि वह नबी कि लाश थी मगर वह हक़ीक़त में यहूदा की मुर्दा लाश थी (जो नबी की शक्ल का था)

इस से यह सवाल उठता है कि येरूशलेम में रोमी सरकार और यहूदी रहनुमाओं को संजीदा फैसला लेने की ज़रूरत थी कि इस मुर्दा लाश के मुरदों में से जी उठने की कहानी को फैलने से रोका जाए जो अभी भी क़बर में पड़ी थी इसके साथ साथ नबी के मुरदों में से जी उठने की बाबत शागिरदों का खुले आम पैगाम देना ऐसा क्यूँ हो रहा था ? अगर यहूदा का जिस्म (जो ईसा अल मसीह जैसा दिख रहा था) जो अभी भी क़ब्र में रखा हुआ होगा तो यह इख्तियार वालों के लिए एक मामूली बात थी कि उसे हर एक को दिखाए और इस् तरह शागिर्दों को झुटलाए (जिन्हों ने कहा कि मसीह जी उठा है) बिना क़ैद करने के, और बिना सताव के आखिरे कार उन्हें शहीदी मौत दे देते । यही सबब है कि उनहों ने ऐसा नहीं किया क्यूंकि वहाँ पर दिखाने के लिए कोई मुर्दा लाश नहीं था – – और क़बर बिलकुल से खाली पड़ा हुआ था ।                       

अल हजर –ए- अस्वद, काबा और मिसाल बतोर मक्का मदीना की मस्जिदें

930 में चर्च ऑफ इंग्लैंड (318 अनो हिजरी) हजरे अस्वद की चोरी होरी हो गई थी और मक्का में काबा से हटा दिया गया था एक शीतती जमाअत के ज़रिये । उस ज़माने में यह जमाअत अबसिड सल्तनत के खिलाफ़ थी । उनके काबा लौट आने से पहले यह उनके कब्ज़े में रहा । हजर अस्वद भी किसी की मातहती से चूक सकता है ।         

उस तरह की एक हालत का तसव्वुर करें जहां एक जमाअत मकका के एक बड़ी मस्जिद (अल -मस्जिदुल हराम) में खड़े होकर भीड़ के सामने सरे आम मनादी करता हो कि अब हजरे अस्वद काबा के मशरिक़ि कोने पर मौजूद नहीं है । उनका यह पैगाम इतना क़ायल कर देने वाला है कि मस्जिद में आने आने वाले हाजी यक़ीन करने लगते हैं कि हजरे अस्वद अब हाथ से गया – इन दो मुक़द्दस मस्जिदों के मुहाफ़िज़ (ख़ादिमुल हरामैन अस – सरीफ़ाइन) कैसे इस तरह के पैग़ाम का मुक़ाबला कर सकते थे ? अगर पैग़ाम झूटा था और हजरे अस्वद काबा में अपनी बेहतर हालत में मौजूद है तो मुहाफ़िज़ों को चाहिए था कि इस पैग़ाम को रोक दे ताकि सरे आम यह बताने के लिए कि हजरे अस्वद काबा में अभी भी अपनी मुक़रररा मक़ाम पर वैसे ही मौजूद है जैसे सदियों से रहता चला आ रहा है । तो फिर यह ख़्याल बहुत जल्द बे –एतबार साबित होता । मक्का में हजरे अस्वद का मस्जिद से क़रीब होना इसको मुमकिन करता है । इसके बर खिलाफ़ अगर मुहाफ़िज़ इस ख़्याल को झूटा साबित करने के लिए हजरे अस्वद को न दिखा पाए तो इस से यह ज़ाहिर होता है कि हक़ीक़त में हजरे अस्वद हाथ से निकाल चुका है जिस तरह 318 अनो हिजरी में हाथ से निकल गया था ।        

किसी तरह अगर यह जमाअत मदीना के मस्जिद (अल-मस्जिद अन-नबवी) में है यह ख़बर देते हुए कि हजरे अस्वद मक्का में काबा से (450 किलो मिटर दूर) हटा दिया गया है तो फिर दो मुक़द्दस मस्जिदों के मुहाफ़िज़ों के लिए अपनी कहानी को गलत साबित करना और मुश्किल पेश आती जबकि उन्हें मदीना के लोगों को यह बताना मुश्किल होजाता कि हजरे अस्वद बहुत दूर है ।     

किसी मुतबररुक चीज़ की बाबत बहस की नज़दीकी झूटा साबित करने में आसान बना देती है या तसदीक़ करना उसकी बाबत दावा पेश करता है जबकि वह जाँचे जाने के क़रीब है ।     

यहूदी रहनुमाओं ने मसीह के मुरदों में से जी उठने के पैग़ाम की मुख़ाल्फ़त की थी मगर एक जिस्म के साथ झुटलाया नहीं था ।  

यह तरीक़ा येरूशलेम में यहूदा/ईसा के मुरदा लाश पर नाफ़िज़ होता है । क़बर जहां यहूदा की लाश नुमायां है (जो ईसा जैसा लगता है) वह मंदिर से कुछ ही मिटर दूरी पर पड़ी थी जहां ईसा अल मसीह के शागिर्द भीड़ से मुख़ातब होकर चिल्ला रहे थे नबी ईसा मुरदों में से ज़िंदा हो गए हैं । यहूदी रहनुमाओं के लिए क़बर में यहूदा की लाश को (जो ईसा जैसी दिखती थी) दिखाते हुए  यूं ही उनके जी उठने के पैग़ाम पर यक़ीन न करना आसान हो सकता था । यह हक़ीक़त है कि जी उठने का पैग़ाम (जो एक लाश के साथ ग़लत साबित किया जाता है वह अभी भी क़ब्र में है) वह क़ब्र के पास ही शुरू हुआ, जहां हर कोई सबूत देख सकता था । जबकि यहूदी रहनुमाओं ने एक मुरदा लाश को दिखाने के ज़रिये पैग़ाम को नहीं झुटलाया बल्कि वहाँ कोई लाश दिखाने के लिए नहीं थी ।            

हज़ारों लोग येरूशलेम में जी उठने के पैग़ाम पर ईमान ले आए 

उन दिनों येरूशलेम में ईसा अल मसीह के जिस्मानी तोर से ज़िंदा होजाने पर हज़ारों लोग ईमान लाकर तब्दील हुए (मसीहियत कबूल की) । पतरस जिस भीड़ से मुख़ातब था और वह जो उसकी सुन रहे थे अगर आप उन में से एक होते ताज्जुब करते हुए कि अगर उसका पैग़ाम सच था, क्या आप के पास कम अज़ कम इतना वक़्त नहीं था कि दोपहर के खाने के वक़्त लेकर क़ब्र पर जाते और अपने यक़ीन के लिए देखते कि वहाँ पर अभी भी कोई लाश थी कि नहीं । अगर यहूदा की लाश (जो नबी ईसा अल मसीह जैसी दिखती थी) क़ब्र में पड़ी रहती तो कोई भी रसूलों के पैग़ाम पर ईमान नहीं लाता । मगर तारीख़ बयान करती है कि येरूशलेम से शुरू करते हुए शागिरदों ने हज़ारों लोगों को अपनी तरफ़ कर लिया । जो कि उस लाश के साथ मुमकिन रहा था होगा जो नबी के जैसा लग रहा था जो अभी भी येरूशलेम के आस पास ही था । यहूदा की  लाश क़ब्र में पड़ा रहना बे सूद या खिलाफ़ -ए- अक़ल की तरफ़ ले जाता है । इसमें कोई समझदारी नहीं है ।            

यहूदा की लाश के नज़रिये को ख़ाली क़ब्र नहीं समझा सकता ।  

यहूदा के इस नज़रिये के साथ परेशानी यह है कि उसको ईसा अल मसीह की शक्ल में तब्दील किया जाना और फिर मसलूब किया जाना और उसकी क़ब्र में दफ़नाया जाना, क्या वह एक घेरी हुई क़ब्र की जगह के साथ ख़त्म होती है । मगर सिर्फ़ ख़ाली क़ब्र ही शागिरदों के लिए दूसरों को समझाने का एक ज़रिया था कि वहाँ से अपनी मनादी या गवाही को शुरू करने के क़ाबिल थे सिर्फ़ कुछ हफ़तों बाद पेनतिकुस्त के मोक़े पर, जो नबी के मुरदों में से जी उठने की बुनयाद पर जोकि उसी शहर में हलाक होने की सूरत में एक तहरीक थी ।          

सिरफ़ दो इंतिख़ाब थे, एक यहूदा की लाश के साथ जो नबी के जैसा लगता था, जो क़ब्र में पड़ा हुआ था, और दूसरा नबी हज़रत ईसा अल मसीह का मुरदों मे से जी उठना एक खाली क़ब्र के साथ । जबकि यहूदा की लाश का क़ब्र में पड़ा रहना खिलाफ़-ए-अक़ल की तरफ़ ले जाता है, फिर ईसा अल मसीह का रोमी लोगों के हाथों मारा जाना और क़ब्र से जी उठना जिस तरह इंजील में साफ़ बयान किया गया है, यह हमको जिंदगी का इनाम पेश कर रहा है ।        

आगे इस सवाल की खोज करते हुए तलाश करने वाला कममिंग सननी लिटरेचर की नज़रे सानी पेश करता है जिस का तरजुमा क्लेरिक्स और दीगर उलमा ने किया है ।   

अल किताब’ – किताबे मुक़द्दस का पैग़ाम क्या है?

अल किताब (बाइबल) के लफ़ज़ी मायने हैं ‘एक ख़ास किताब’ । तारीख़ में सब से पहले बाइबल बाइबल की तहरीर थी जिसकी किताब की शक्ल में इशाअत हुई जो आज हम देखते हैं । बाइबल दुनया के ऊंचे दरजे की किताब है जिसकी वुसअत में तमाम लोग और ज़मीन के क़बीले शामिल हैं । दुनया के कई एक अक़वाम पर बाइबल का एक गहरा ताससुर शुरू ही से रहा था और कुररा –ए- ज़मीन पर सब से ज़ियादा पढ़ी जाने वाली किताब है । मगर यह किताब भी दीगर किताबों की तरह एक पेचीदा कहानी के साथ लम्बी है । इसलिए हम में से बहुत हैं जो इस किताब के मौज़ू को न जानते और न समझते हैं । यह तहरीर बाइबल की किताब से एक जुमले को लेगा ताकि इस ऊंचे दरजे की किताब से कहानी को समझाए – नबी हज़रत ईसा अल मसीह के काम ।          

बाइबल इस लिए दी गई थी कि हमारे मुस्तक़्बिल के एक हक़ीक़ी मसला (परेशानी) मुख़ातब कराए । इस परेशानी को सूरा मुजादिला (सूरा 58 – हुज्जती औरत) जो इंसाफ के दिन की राह देखती है (इंतज़ार करती है)।   

जिस दिन ख़ुदा उन सबको दोबारा उठाएगा तो उनके आमाल से उनको आगाह कर देगा ये लोग (अगरचे) उनको भूल गये हैं मगर ख़ुदा ने उनको याद रखा है और ख़ुदा तो हर चीज़ का गवाह है। क्या तुमको मालूम नहीं कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा जानता है जब तीन (आदमियों) का ख़ुफिया मशवेरा होता है तो वह (ख़ुद) उनका ज़रूर चैथा है और जब पाँच का मशवेरा होता है तो वह उनका छठा है और उससे कम हो या ज़्यादा और चाहे जहाँ कहीं हो वह उनके साथ ज़रूर होता है फिर जो कुछ वह (दुनिया में) करते रहे क़यामत के दिन उनको उससे आगाह कर देगा बेशक ख़ुदा हर चीज़ से ख़ूब वाकि़फ़ है।

सूरा अल – मुजादिला 58: 6-7

सूरा अल – मुजादिला हम से कहता है कि ऐसी कोई पोशीदा बात नहीं है जिसे अल्लाह तआला हमारे बारे में न जानता हो और वह इस हिकमत का इस्तेमाल हमारा इनसाफ़ करने में करेगा ।  

सूरा अल – क़ियामा (सूरा 75 क़यामत) इस दिन को कियामत का दिन क़रार देता है और ख़बरदार भी करता है कि सब इन्सानों को अल्लाह के हुज़ूर लाया जाएगा कि अपनी जिंदगी के  अययाम में जो कुछ किया है उसका लेखा जोखा पेश करे ।    

तो इन्सान कहेगा आज कहाँ भाग कर जाऊँ। यक़ीन जानों कहीं पनाह नहीं। उस रोज़ तुम्हारे परवरदिगार ही के पास ठिकाना है। उस दिन आदमी को जो कुछ उसके आगे पीछे किया है बता दिया जाएगा। बल्कि इन्सान तो अपने ऊपर आप गवाह है। अगरचे वह अपने गुनाहों की उज्र व ज़रूर माज़ेरत पढ़ा करता रहे।

सूरा अल – क़ियामा 75:10 –15

किताब का पैगाम

हम ने नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आख़री हफ़्ते की जांच की थी । इंजील शरीफ़ बयान करती है कि उन्हें छट्टे दिन – मुबारक जुम्मे को सलीब दी गई थी और उसके तीसरे दिन जो इतवार का दिन था उन्हें जिलाया गया था । इन वाक़ियात को तौरात ज़बूर और नबियों की किताबों इन दोनों में देखा गया । मगर यह सब क्यूँ हुआ और मौजूदा दिनों में आपके और मेरे लिए क्या मायने रखते हैं ? यहाँ हम समझना चाहते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह के जरिये से क्या चीज़ पेश की गई और हम किस तरह फज़ल और बख़्शिश (गुनाहों की मुआफ़ी हासिल कर सकते हैं । यह हमको समझने में हमारी मदद करेगा जिस तरह सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37), सूरह अल- फ़ातिहा (सूरा 1—इफ़्तिताह) जबकि इसमें अल्लाह से    ‘सही रासता दिखाने की मांग की गई है’,इसके अलावा यह भी समझना है कि ‘मुस्लिम’ के मायने हैं ‘वह जो सुपुर्द करता है’, और मज़हबी रस्म ओ रिवाज के पाबंद होना जैसे वज़ू करना , ज़कात देना , और हलाल का इस्तेमाल करना वगैरा यह सब अच्छा है मगर रोज़े इंसाफ के लिए नाकाफ़ी इरादे हैं ।            

बुरी ख़बर – अल्लाह के साथ हमारे रिश्ते की बाबत अँबिया क्या कहते हैं ?

तौरात हमें सिखाती है कि जब अल्लाह ने बनी इंसान को बनाया तो उसने

  27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

पैदाइश1:27

सूरत (शबीह) का मतलब एक जिस्मानी एहसास नहीं है बल्कि वह इसलिए बनाए गए थे कि ख़ुदा को इस बतोर मुनअकिस करें कि हम जज़्बाती तोर से , दमागी तोर से , मुआशिरती तोर से और रूहानी तोर से हरकत पिज़ीर होजाएँ । हमको उसके रिश्ते के साथ बने रहने के लिए बनाया गया है । इस रिश्ते को हम नीचे दी गई तस्वीर के ज़रिये देख सकते हैं । ख़ालिक़ को एक ना महदूद हाकिम बतोर सब से ऊपर रखा गया है जबकि आदमियों और औरतों को तस्वीर के नीचे रखा गया है जबकि हम सब महदूद मख़लूक़ हैं । रिश्ते को तीर के निशाने से जोड़ते हुए दिखाया गया है ।         

उसकी सूरत पर बनाए गए लोगों को चाहिए कि ख़ालिक़ के रिशते में बने रहें

अल्लाह अपनी सीरत में पूरी तरह से कामिल है । वह पाक है । क्यूंकि यह ज़बूर कहती है कि ईसा …

  4 क्योंकि तू ऐसा ईश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न हो; बुराई तेरे साथ नहीं रह सकती।
5 घमंडी तेरे सम्मुख खड़े होने न पांएगे; तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है।

ज़बूर5:4-5

आदम ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी का गुनाह किया था – एक ही गुनाह – और ख़ुदा की पाकीज़गी तक़ाज़ा करती है कि उसको इनसाफ़ करने की ज़रूरत है । तौरात शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ बयान करते हैं कि अल्लाह ने उसको फ़ानी बनाया और उसको अपनी नज़रों (हुज़ूरी) से दूर कर दिया । यही हालत हम पर भी नफ़िज़ होती है । किसी भी तोर बतोर जब हम गुनाह करते या नफ़रमानी करते हैं तो हम अल्लाह की बे इज़्ज़ती करते हैं इसलिए कि हम उस तरह से या उस सूरत में होकर या उसके मुताबिक़ नहीं चलते जिस सूरत में हम बनाए गए थे । हमारा रिश्ता टूटा हुआ है । जिसका अंजाम एक चट्टान की दीवार की तरह मज़बूत रुकावट है जो हमारे और ख़ालिक़ के बीच हायल होकर खड़ी हो जाती है ।    

हमारे गुनाह हमारे और पाक ख़ुदा के बीच एक मज़बूत रुकावट पैदा करते हैं

गुनाह की रुकावट को मज़्हबी नेक कामों से छेदना

हम में से बहुत हैं जो इस रुकावट को जो हमारे और अल्लाह के बीच है उसे मज़्हबी कामों के जरिये दूर करने की कोशिश करते हैं या वह काम जिससे काफ़ी नेकियाँ कमा सकें ताकि उस रुकावट को तोड़ डालें । दुआएं , रोज़े , हज्ज , नमाज़, ज़कात , ख़ैरात और अतिय्या वग़ैरा देना यह सारी चीज़ें नेकी कमाने का ज़रीया बतोर हैं ताकि रुकावट को दूर करें जिस तरह अगली तस्वीर में मिसाल पेश की गई है । उम्मीद यह है कि मज़्हबी नेकियाँ हमारे कुछ गुनाहों को मिटा देंगी । अगर हमारे कई एक आमाल के जरिये काफ़ी नेकियाँ कमाई जा  सकती तो हम अपने तमाम गुनाहों को

ख़ारिज करने की उम्मीद करते और फ़ज़ल और मुआफ़ी हासिल कर लेते ।

  म इस रुकावट को नेक काम करने के ज़रिये दूर करने की कोशिश करते हैं ताकि अल्लाह के हुज़ूर सवाब हासिल करें ।

मगर गुनाहों को खारिज करने के लिए हमको कितने सवाब या नेकियों की ज़रूरत पड़ेगी ? हमारा कितना भरोसा है कि हमारे नेक आमाल हमारे गुनाह खारिज करने के लिए और रुकावट  को छेदने के लिए काफ़ी होंगे जो हमारे और हमारे ख़ालिक़ के बीच खड़ी है ? क्या हम जानते हैं कि अच्छे इरादों के लिए हमारी कोशिशें काफ़ी होंगी ? हमारे पास कोई पक्का भरोसा नहीं है इस लिए हम ज़ियादा से ज़ियादा जितना हम से बनता है नेक कामों को अंजाम देने की कोशिश करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि इनसाफ़ के दिन (रोज़े क़यामत) में जवाब देने के लिए काफ़ी है ।

नेक आमाल के साथ हमको सवाब भी हासिल करने कि ज़रूरत है जो कि नेक इरादों के लिए कोशिश है , हम में से कई लोग साफ़ सुथरे रहने के लिए मेहनत करते हैं । हम आज़ादी से नमाज़ अदा करने से पहले वज़ू करते हैं । हम नापाक लोगों से , चीज़ों से और खानों से दूर रहने की कोशिश करते हैं ताकि वह हमें नापाक न कर दें । मगर नबी यसायह एनई हमपर ज़ाहिर किया कि :

  6 हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते की नाईं मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु की नाईं उड़ा दिया है।

यसायाह 64:6

नबी हम से कहते हैं यहाँ तक कि अगर हम उस हर एक चीज़ को रोकते हैं जो हमें ना पाक करती है , हमारे गुनाह हमारे ‘रासतबाज़ी के कामों’ को साफ़ करने के चक्कर में ऐसा बना देते हैं जैसे मैले गंदे छितड़े । यही तो बुरी ख़बर है । मगर यह और बदतर होता जाता है ।     

बदतर ख़बर : गुनाह और मौत की ताक़त 

नबी हज़रत मूसा ने शरीअत में साफ़ तोर से एक मेयार मुक़र्रर किया था कि  बनी इसराईल में से हर एक को मुकम्मल फ़रमानबरदारी की ज़रूरत थी । शरीयत कभी यह नहीं कहती कि “अहकाम में से फ़लां हुक्म को सख्ती से पाबंदी करो” नहीं ऐसा नहीं है बल्कि दरअसल शरीयत बार बार यह कहती है कि यक़ीनी तोर से गुनाह के कामों की क़ीमत मौत थी । इसे हम ने नबी हज़रत नूह के ज़माने में देखा और यहाँ तक कि नबी हज़रत लूत कि बीवी की  बाबत देखा कि गुनाह का अंजाम मौत साबित हुआ ।

इंजील शरीफ़ इस सच्चाई को इस तरह से ख़ुलासा करती है:         

क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी मौत है …

रोमियों6:23

लफ़ज़ी तोर से “मौत” के मायने हैं ‘जुदाई’ । जब हमारी जान हमारे जिस्म से अलग हो जाती है हम जिस्मानी तोर से मर जाते हैं । इसी तरीक़े से यहाँ तक कि अभी हम रूहानी तोर से ख़ुदा से जुदा हैं और मुरदा हैं और उसकी नज़रों में न पाक हैं ।

यह हमारी उम्मीद की परेशानी को ज़ाहिर करता है लियाक़त (नेकी) को कमाने में ताकि गुनाह की क़ीमत अदा कर सके । परेशानी यह है कि हमारी सख्त कोशिशें, लियाक़तें, अच्छे इरादे, और नेक आमाल हालांकि बुरी नहीं हैं मगर यह सब न काफ़ी हैं इस लिए कि क़ीमत कि ज़रूरत होती है क्यूंकि गुनाह की (‘मज़दूरी’) ‘मौत’ है । सिर्फ मौत ही इस दीवार को छेद  सकती है क्यूंकि यह ख़ुदा के इंसाफ़ के तक़ाज़े को पूरा करती है । नेकियाँ कमाने की हमारी कोशिशें वैसी ही है जैसे कैंसर का इलाज करने की कोशिश करना जिस का नतीजा  (आखिरकार मौत है) । हलाल की चीज़ें खाना बुरा नहीं है बल्कि यह अच्छा है और हर एक मोमिन को हलाल ही खाना चाहिए – मगर यह केनसर का इलाज नहीं कर सकता । केनसर के लिए आपको फ़रक़ तरीक़े से इलाज करने की ज़रूरत है क्यूंकि केन्सर के ख़ुलये मौत पैदा  करते हैं ।  

सो यहाँ तक कि हमारी कोशिशें और अच्छे इरादे मज़्हबी लियाक़त पैदा करने के लिए हम सच मुछ में मरे हुए हैं और अपने ख़ालिक़ की नज़र में मुरदा लाश की तरह हैं ।  

हमारे गुनाह मौत को अंजाम देते हैं । हम अल्लाह के हुज़ूर ना पाक मुरदा लाश की तरह हैं 

नबी हज़रत इब्राहीम का सही रास्ता दिखाना

नबी हज़रत इब्राहीम के साथ यह बात फ़रक़ थी । उसके लिए ‘रास्तबाज़ी गिना गया’ उसके नेक कामों के सबब से नहीं बल्कि इस लिए कि उसने एतक़ाद किया और ख़ुदा के वायदे पर भरोसा किया । उसने ख़ुदा की क़ीमत की ज़रूरत के पूरे होने पर भरोसा किया बजाए इसके कि वह इसे खुद कमाए । हम ने उसकी बड़ी क़ुरबानी में देखा कि मौत (जो गुनाह का ख़मयज़ा था) उसे चुका दिया गया था, मगर उसके बेटे के ज़रिये से नहीं बल्कि उस मेंढ़े के ज़रिये जो ख़ुदा के ज़रिये ज़रूरत को पूरा किया गया था ।       

हज़रत इब्राहीम को सीधी सच्ची राह दिखाई गई थी – क्यूंकि उसने सादे तोर से ख़ुदा के वायदे पर ईमान लाया था और ख़ुदा ने उसके गुनाह के मौत की क़ीमत का इंतज़ाम किया था  

क़ुरान  शरीफ़ इस की बाबत सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37 – वह जिन्हों ने दर्जा बंदी क़ाइम की ) जहां वह कहता है : 

 और हमने इस्माईल का फ़िदया एक ज़िबाहे अज़ीम (बड़ी कुर्बानी) क़रार दियाऔर हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा हैकि (सारी खुदायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं

सूरा अस साफ़्फ़ात 37: 107-109

अल्लाह ने खमयाज़ा अदा किया (क़ीमत चुकाया ) और इबराहीम ने बरकत ,फज़ल ,रहम और मुआफ़ी  हासिल की जिसमें ‘तसल्ली’ भी शामिल है ।

खुशख़बरी : हज़रत ईसा अल मसीह के काम हमारी ख़ातिर

नबी का नमूना यहाँ पर हमें सही रास्ता दिखाने के लिए जिस तरह सूरा अल फ़ातिहा (सूरा 1 – इफ़्तिताही)

रोज़े जज़ा का मालिक है।हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तुझ ही से मदद मांगते है।हमें सीधा रास्ता दिखा।उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, जो माअतूब नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं है।

सूरा 1 – इफ़्तिताही 1:4-7

इंजील शरीफ़ हमें समझाती है कि यह एक मिसाल थी हमें समझाने के लिए कि किस तरह अल्लाह गुनाह की क़ीमत चुकाएगा और मौत और नापाकी के लिए सादे तौर से शिफ़ा का इंतज़ाम करेगा मगर ज़बरदस्त तरीक़े से ।  

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

अबतक यह सारी बातें ‘बुरी ख़बरें’ थीं । मगर ‘इंजील’ के लफ़ज़ी मायनी हैं ‘ख़ुश ख़बरी’ और यह ऐलान करते हुए कि हज़रत ईसा की मौत उस दीवार (रुकावट) को छेदने के लिए काफ़ी है जो हमारे और ख़ुदा के बीच है, और हम देख सकते हैं कि यह क्यूँ ख़ुश ख़बरी है जैसे दिखाया गया है ।      

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी – ख़ुदा का बररा – मौत के ज़रिये हमारी ख़ातिर गुनाहों के लिए क़ीमत अदा करता है जिस तरह नबी हज़रत इबराहीम के मेंढ़े ने किया था ।

  नबी हज़रत ईसा अल मसीह क़ुरबान हुए थे और फिर पहले फल बतोर मुरदों में से जी उठे थे सो अब वह हमारे लिए नई जिंदगी पेश करते हैं । अब हमें  आगे को गुनाह की मौत के क़ैदी बने रहने की ज़रूरत नहीं है ।  

हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत ‘पहला फल’ था । हम मौत से आज़ाद किए जा सकते हैं और यही मौत से ज़िंदा होने की क़ुव्वत को हासिल केएआर सकते हैं ।  

उनकी क़ुरबानी और क़यामत में ईसा अल मसीह दरवाज़ा बन गए कि गुनाह की रुकावट का रास्ता बतोर जो कि हमको ख़ुदा से जुदा करता है । इसी लिये ईसा नबी ने कहा :

  9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।  

यूहनना10:9-10
हज़रत ईसा अल मसीह इस तरह दरवाज़ा हैं जो गुनाह और मौत की रुकावट के लिये अंदर दाख़िल होने का रास्ता हैं

इस दरवाज़े के सबब से अब हम दोबारा से रिश्ते को हासिल कर सकते है जो हमारे ख़ालिक़ के साथ हज़रत आदम के गुनाह करने से पहले मौजूद थी और गुनाह के बाद एक रुकावट बन गई थी मगर अब यक़ीन है कि ख़ुदा का रहम ओ फज़ल गुनाहों की मूआफ़ी हमें हासिल है ।   

एक खुले दरवाज़े के साथ अब हम अपने ख़ालिक़ के साथ एक रिश्ते की बहाली में पाये जाते हैं

जिस तरह इंजील शरीफ़ ऐलान करती है :

  5 क्योंकि परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।
6 जिस ने अपने आप को सब के छुटकारे के दाम में दे दिया; ताकि उस की गवाही ठीक समयों पर दी जाए।  

1तीमुथियुस2:5-6

ख़ुदा का इनाम आप के लिये

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने तमाम लोगों के लिये खुद को देदिया । सो यह आपको और साथ और साथ ही साथ मुझको भी शामिल करता है । उसकी मौत और क़यामत के वसीले से उसने एक ‘दरमियानी’ की क़ीमत अदा की और हमारे लिये जिंदगी भी । यह जिंदगी किस तरह दी जाती है ? 

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

ग़ौर करें कि यह हमको कैसे दिया जाता है । यह हमको एक इनाम बतोर दिया जाता है । कोई बात नहीं कि यह इनाम क्या है, अगर यह हक़ीक़त में इनाम है जिसके लिए आप ने कोई मेहनत नहीं की और जिसे आप ने नेक कामों से नहीं कमाया था । अगर आपने उस इनाम को नेक कामों से कमाया तो वह इनाम, इनाम नहीं रह जाता – बल्कि वह एक मज़दूरी कहलाता ! इसी तरीक़े से नेकी (क़ाबिलियत) या ईसा अल मसीह की क़ुरबानी को भी आप नहीं कमा सकते । यह आप को इनाम बतोर दिया जाता है । क्या यह आसान नहीं है ?

और यह इनाम क्या है ? यह इनाम ‘हमेशा की ज़िन्दगी’ है । इसका मतलब यह है कि गुनाह जो आप के लिए और मेरे लिए मौत लेकर आया था उसकी क़ीमत दी जा चुकी है । इतनी महब्बत ख़ुदा हमसे करता है । क्या यह ज़बरदस्त नहीं है ?

सो किस तरह आप और मैं हमेशा की ज़िन्दगी हासिल करते हैं ? फिर से इनामों की बाबत सोचिये । अगर कोई आप को इनाम देना चाहे तो आपको उसे ‘हासिल करना’ ही होगा । जब भी कभी इनाम दिया जाता है तो सिर्फ दो तबादिले होते हैं । या तो (“नहीं शुकरिया”) बोलकर इन्कार कर दिया जाए या यह कहकर क़बूल कर लिया जाता है कि (“आप के इनाम के लिए शुक्रिया, मैं इसे ले लेता हूँ”) । तो फिर इस इनाम को भी हासिल कर लेनी चाहिए । इस बात को सिर्फ़ दमाग़ एतक़ाद कर लेना, मुताला करना या समझ लेना काफ़ी नहीं है । जो इनाम आप को दिया जाता है उससे फ़ाइदा लेने के लिए, आप को उसे ‘हासिल करना’ ज़रूरी है ।        

  12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहनना1:12-13

दरअसल इंजील शरीफ़ ख़ुदा की बाबत कहती है कि :

ख़ुदा हमारा नजात दहिन्दा है , जो चाहता है कि सब आदमी नजात पाएं …

1तीमुथियुस 2:3-4

वह एक नजात दहिन्दा है और उस की ख़्वाहिश है कि ‘सब लोग’ उसके इनाम को हासिल करें और गुनाह और मौत से बच जाएँ । अगर यह उसका इरादा है तो फिर, उसके इनाम को हासिल करें और सादे तरीक़े से उसके इरादे के तहत खुदको सोंप दें – ‘मुस्लिम’ लफ़्ज़ के मायने ही है – वह जिस ने सौंप दिया है ।

इस इनाम को हम कैसे हासिल करते हैं ? इंजील शरीफ़ कहती है कि:      

  12 यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है; और अपने सब नाम लेने वालों के लिये उदार है।

रोमियों10:12

ग़ौर करें कि यह वायदा ‘हरेक’ के लिए है । जबकि वह मुरदों में से ज़िंदा हो चुके ईसा अल मसीह यहाँ तक कि अभी भी ज़िंदा हैं । अगर आप उन्हे पुकारेंगे तो वह सुनेंगे और अपना इनाम आप को देंगे । आप उन्हें पुकारें और उनसे पूछें । शायद आपने इस तरह इससे पहले कभी न किया हो । ज़ेल में एक हिदायत है जो आप की मदद कर सकती है । यह कोई जादूई तरन्नुम नहीं है । यह कोई ख़ास अलफ़ाज़ नहीं हैं जो ताक़त देती हो । यह हज़रत इब्रहीम का भरोसा जैसा है जो हम ईसा अल मसीह पर रखते हैं ताकि वह हमको यह इनाम दे । जैसे ही हम उनपर भरोसा करेंगे वह हमारी सुनेंगे और जवाब देंगे । इंजील शरीफ़ बहुत ज़ोरावर है, और इसके साथ ही वह बहुत आसान भी है । अगर यह आप के लिए मददगार साबित होता है तो इस हिदायत के पीछे चलने या इसे दोहराने के लिए आज़ाद है ।      

पियारे नबी और और ख़ुदावंद ईसा अल मसीह । मैं जानता हूँ मेरे अपने गुनाहों के साथ अल्लाह जो मेरा ख़ालिक़ है उससे जुदा हो गया हूँ । हालांकि मेरे कोशिश करने पर भी इस रुकावट को दूर नहीं कर पाता हूँ । मगर मैं जानता हूँ कि आपकी मौत एक क़ुरबानी थी जिस से कि मेरे तमाम गुनाह धोने की कुवत रखता है और मुझे साफ़ कर सकता है । मैं जानता हूँ कि आप की क़ुरबानी के बाद आप मुरदों में से ज़िंदा हो गए । मैं एतक़ाद रखता हूँ कि आपकी क़ुरबानी काफ़ी थी इसलिए मैं खुद को आपके सुपुर्द करता हूँ । मैं आप से इल्तिजा करता हूँ कि बराए मेहरबानी मुझे मेरे गुनाहों से धोएँ और मेरवे ख़ालिक़ से मेरी मसालीहत कराएं ताकि मुझे हमेशा की जिंदगी हासिल हो । ईसा अल मसीह आप का शुकरिया यह सब कुछ मेरे लिए करने के लिए यहाँ तक कि अभी भी मेरी जिंदगी में रहनुमाई करने के लिए ताकि मैं आपको अपना ख़ुदावंद मानकर आपके पीछे चल सकूँ ।

   ख़ुदा के नाम में जो निहायत रहम करने वाला है ।

क्या किरामन कातिबीन फ़रिश्ते इंसाफ़ के दिन मदद कर सकते हैं ?

सूरा अल हाक़ा (सूरा 69 – हक़ीक़त) बयान करता है कि किस तरह इनसाफ़ का दिन एक सूर फूंकने के ज़रिये ज़ाहिर होगा I  

फिर जब सूर में एक (बार) फूँक मार दी जाएगी और ज़मीन और पहाड़ उठाकर एक बारगी (टकरा कर) रेज़ा रेज़ा कर दिए जाएँगे तो उस रोज़ क़यामत आ ही जाएगी और आसमान फट जाएगा तो वह उस दिन बहुत फुस फुसा होगा और फ़रिश्ते उनके किनारे पर होंगे और तुम्हारे परवरदिगार के अर्ष को उस दिन आठ फ़रिश्ते अपने सरों पर उठाए होंगे उस दिन तुम सब के सब (ख़ुदा के सामने) पेश किए जाओगे और तुम्हारी कोई पोशीदा बात छुपी न रहेगी

सूरा अल – हाक़ा 69 : 13—18

सूरा क़ाफ़ (सूरा 50 भी बयान करता है एक दिन का जब अल्लाह के हुक्म से सूर फूंकी जाएगी और हमारे मुहाफ़िज़ फ़रिश्ते जो हमारे दाएँ बाएँ मौजूद हैं जो हमारे नेक आमाल और बुरे आमालों का हिसाब किताब रखते हैं वह अल्लाह के हुज़ूर ज़ाहिर करेंगे I यह आयतें इस तरह हैं :  

और बेशक हम ही ने इन्सान को पैदा किया और जो ख़्यालात उसके दिल में गुज़रते हैं हम उनको जानते हैं और हम तो उसकी शहरग से भी ज़्यादा क़रीब हैं। जब (वह कोई काम करता हैं तो) दो लिखने वाले (केरामन क़ातेबीन) जो उसके दाहिने बाएं बैठे हैं लिख लेते हैं। कोई बात उसकी ज़बान पर नहीं आती मगर एक निगेहबान उसके पास तैयार रहता है। मौत की बेहोशी यक़ीनन तारी होगी (जो हम बता देंगे कि) यही तो वह (हालात है) जिससे तू भागा करता था और सूर फूँका जाएगा यही (अज़ाब) के वायदे का दिन है और हर शख़्स (हमारे सामने) (इस तरह) हाजि़र होगा कि उसके साथ एक (फरिश्ता) हांका लाने वाला होगा और एक (आमाल का) गवाह उससे कहा जाएगा कि उस (दिन) से तू ग़फ़लत में पड़ा था तो अब हमने तेरे सामने से पर्दे को हटा दिया तो आज तेरी निगाह बड़ी तेज़ है और उसका साथी (फ़रिश्ता) कहेगा ये (उसका अमल) जो मेरे पास है ।

सूरा क़ाफ़ 50 : 16—23

आयत 20 कहता है सूर फूँकने की चीतौनी पहले से ही दी जा चुकी थी (इस से पहले कि  क़ुरान शरीफ़ का मूकाशफ़ा हुआ) यह कब दिया गया था ? यह हज़रत ईसा अल मसीह के ज़रिये उस वक़्त दिया गया था जब उनहों ने इंजील शारीफ़ में अपने ज़मीन पर लौटने की बाबत पेश बीनी की थी कि आसमानी नरसिंगे के साथ इश्तिहार दिया जाएगा I    

  31 और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने दूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठे करेंगे।

मत्ती 24 :31

इसके बाद क्या होता है ? सूरा क़ाफ़ बयान करता है कि हमारे दाहिने बाएँ कंधे पर एक एक फ़रिशता मौजूद रहता है, और यह दोनों फ़रिश्ते हमारे नेक बद आमाल को लिखते रहते हैं I जबकि अल्लाह हमारे गरदन या हलक़ के रग से भी क़रीब रहता है इंजील शरीफ़ हम से कहती है यह हमारे आमाल की फ़ेहरिस्त जो बहुत लम्बी होती हैं यह दरअसल ‘किताबें’ हैं I इन्हें रो’या में बयान किया गया था कि यूहनना, जो ईसा अल मसीह का शागिर्द था उसने इसके बारे में लिखा जिसे इंजील शरीफ़ की आखरी किताब मुकशफ़ा कहा जाता है I      

  11 फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उस को जो उस पर बैठा हुआ है, देखा, जिस के साम्हने से पृथ्वी और आकाश भाग गए, और उन के लिये जगह न मिली।
12 फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखा, और पुस्तकें खोली गई; और फिर एक और पुस्तक खोली गई; और फिर एक और पुस्तक खोली गई, अर्थात जीवन की पुस्तक; और जैसे उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, उन के कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया।
13 और समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उस में थे दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने उन मरे हुओं को जो उन में थे दे दिया; और उन में से हर एक के कामों के अनुसार उन का न्याय किया गया।
14 और मृत्यु और अधोलोक भी आग की झील में डाले गए; यह आग की झील तो दूसरी मृत्यु है।
15 और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला, वह आग की झील में डाला गया॥

मुकाशफ़ा 20 :11-15

यह ऐलान करता है कि हम सब का हमारे आमाल के मुताबिक़ इनसाफ़ किया जाएगा जिस तरह ‘किताबों’ में दर्ज है उसी के मुताबिक़ सज़ा और जज़ा मिलेगी I सो नमाज़ के बाद या नमाज़ के ख़त्म होते होते हम इन फ़रिश्तों को (किरामन कातिबीन) को जो दाएँ बाएँ रहते हैं उन्हे सलाम करते हैं इस उम्मीद से कि उनके आमाल के दर्ज में कुछ फ़ाइदा हो सके I     

किताब — ए –हयात

मगर ग़ौर करें कि एक दूसरी किताब है जिसे किताब ए हयात कहा जाता है, यह उस किताब से फ़रक़ है जिसमें नेक ओ बद आमाल का रेकार्ड पाया जाता है I यह बयान करता है कि जिस किसी का नाम इस किताबे हयात में नहीं पाया जाएगा वह आग की झील में डाला जाएगा (यह दोज़ख़ का दूसरा नाम है) I सो नेक ओ बद आमाल की किताब में भले ही हमारे नेक कामों की फ़ेहरिस्त बुरे आमाल के फ़ेहरिस्त के मुक़ाबले में लमबी हो — इसके बावजूद भी – अगर हमारे नाम किताबे हयात में दर्ज न हो तो हम दोज़ख़ के सज़ावार होंगे I अब सवाल यह है की यह ‘किताबे हयात’ क्या है और हमारे नाम में कैसे दर्ज किए जाते हैं ?

तौरत शारीफ़ और क़ुरान शारीफ़ दोनों बयान करती हैं कि जब हज़रत आदम ने गुनाह किया, तो उन्हें बाग़ –ए- अदन से निकाल दिया गया था और उन्हें फ़ानी क़रार दे दिया गया था I इस का मतलब यह था कि वह और (उनकी औलाद होने के नाते हम) ज़िन्दगी का ज़रिया होने से जुदा कर दिये गए थे I यही सबब है कि हम फ़ानी हैं और एक हम मर जाएंगे I नबी हज़रत ईसा अल मसीह इसलिए आए कि इस ‘ज़िन्दगी’ को हमारे लिए बहाल करे ताकि हमारे नाम इस किताबे हयात में दाखिल किए जाएँ I जिस तरह से उसने ऐलान किया कि :          

  24 मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

यूहनना5:24

किस तरह नबी हज़रत इब्राहीम ने ज़िन्दगी के इस इनाम को पहले से देखा और क्यूँ हज़रत ईसा अल मसीह ही हमको ज़िन्दगी दे सकते है इन बातों की तफ़्सील यहाँ पर समझाई गई है I सूरा क़ाफ़ हमको ख़बरदार करता है कि :

  तब हुक्म होगा कि तुम दोनों हर सरकश नाशुक्रे को दोज़ख़ में डाल दो

सूरा क़ाफ़ 50 : 24

सो अगर हमेशा की ज़िन्दगी पेश की गई है तो इसकी बाबत इतला क्यूँ नहीं दी गई ?