पेंतिकुस्त – मददगार क़ुववत देने और रहनुमाई करने आता है

सूरा अल – बलद सूरा 90 – शहर) एक चौड़े शहर का हवाला देता है और गवाही देता है और सूरा अन नसर (सूरा 110 – इलाही मदद) लोगों की भीड़ का रो’या पेश करता है जो खुदा की सच्ची इबादत के लिए आ रहे हैं ।     

मुझे इस शहर (मक्का) की कसम और तुम इसी शहर में तो रहते हो।

सूरा अल – बलद 90: 1-2

ऐ रसूल जब ख़ुदा की मदद आ पहुचेंगी और फतेह (मक्का) हो जाएगी और तुम लोगों को देखोगे कि गोल के गोल ख़ुदा के दीन में दाखि़ल हो रहे हैं तो तुम अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करना और उसी से मग़फे़रत की दुआ माँगना वह बेशक बड़ा माफ़ करने वाला है।

सूरा अन – नसर 110: 1-3

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत के ठीक 50 दिन बाद सूरह अल बलद में रोया दिखाया गया और सूरा अन – नसर में वह वाक़े हुआ । शहर येरूशलेम था, और ईसा अल मसीह के शागिर्द आज़ाद लोग थे जो उस शहर के लिए गवाह थे, मगर वह ख़ुदावंद की रूह थी जो उस शहर में भीड़ के बीचों बीच हरकत कर रही थी जो कि जश्न का, हमद ओ सितायश का और इक़रारे गुनाह और मुआफ़ी का सबब बना था । उस दिन का जो तजरूबा था उसे आज भी तजुरबा किया जा सकता है । इसे हम तब सीखते हैं जब हम तारीख़ की बे मिसल दिन को समझ लेंगे ।    

नबी हज़रत ईसा अल मसीह फ़सह के दिन मसलूब हुए थे और उसी हफ़ते इतवार के दिन मुरदों में से ज़िंदा हुए थे । मौत पर इस फ़तह के साथ अब वह हर किसी को जिंदगी का इनाम पेश करता है जो उसको अपना शख़्सी ख़ुदावंद और मुनजी कर के क़बूल करता है । नबी हज़रत ईसा अल मसीह 40 दिन अपने शागिर्दों के साथ रहे थे ताकि उन्हें यक़ीन होजाए कि वह मुरदों में से जी उठे हैं फिर उसके बाद वह आसमान पर सऊद फ़रमा गए । मगर इस से पहले कि वह सऊद फ़रमाए उनहों ने यह हिदायतें अपने शागिर्दों को दीं ।          

19 इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो।
20 और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं॥

मत्ती 28:19-20

उनहों ने उनके साथ हमेशा तक रहने का वायदा किया इसके बावजूद भी वह कुछ देर बाद उन्हें छोड़ कर आसमान पर सऊद फ़रमा गए । उनके सऊद फ़रमाने के बाद वह अभी भी उनके साथ कैसे साथ रह सकते थे और हमारे साथ कैसे रह सकते हैं ?

इसका जवाब कुछ दिन बाद हुए वाक़िये से हासिल होता है । उन्की गिरफ़्तारी से कुछ ही देर पहले शाम के खाने पर उनहों ने मददगार के आने का वायदा किया था । उनके जी उठने के पचास दिन बाद (उनके सऊद फ़रमाने के 10 दिन बाद) यह वायदा पूरा हुआ था । यह दिन पेनतिकुस्त का दिन कहलाता है या पेनतिकुस्त इतवार कहलाता है । उस दिन बड़े शानदार तरीक़े से जशन मनाया जाता है । यह सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उस दिन क्या हुआ था बल्कि कब और क्यूँ वाक़े हुआ जो  अल्लाह के निशान को ज़ाहिर करता है, और आप के लिए एक ज़बरदस्त इनाम है ।      

पेनतिकुस्त  के दिन क्या हुआ था

मुकम्मल वाक़ियात का ज़िक्र बाइबल के आमाल की किताब के दूसरे बाब में पाया जाता है । उस दिन खुदा का रूहुल क़ुद्दूस नबी हज़रत ईसा अल मसीह के पहले शागिरदों पर नाज़िल हुआ था और वह ऊंची आवाज़ में दुनया के कई मुख़तलिफ़ ज़ुबानों में बोलना शुरू कर दिया था । (मतलब यह कि वह दूसरी दूसरी ज़ुबानों में येसू की मनादी करने लगे थे) । इस वाक़िये ने एक ऐसा माहोल और हलचल पैदा कर दिया था कि हज़ारों लोग जो उस वक़्त येरूशलेम में मौजूद थे बाहर आ गए और उस जगह पर जमा होगाए यह देखने के लिए कि क्या हो रहा था । जहां भीड़ जमा होगयी थी वहाँ पतरस ने खड़े होकर पहली बार इनजील की मनादी की और ‘3000 लोग उसके पैगाम को क़बूल करके ईमान ले आए और उनमें शामिल हो गए’ (आमाल 2:41) । इंजील के पीछे चलने वालों की तादाद उस पेनतिकुस्त की इतवार से लेकर आज तक बढ़ती ही जा रही है ।

पेंतिकुस्त का यह खुलासा पूरा नहीं है । इसलिए कि नबियों की दीगर वाक़ियात की तरह ही पेंतिकुस्त का वाक़िया भी उसी दिन एक तेहवार की तरह हुआ था जो तौरात शरीफ़ के साथ नबी हज़रत मूसा के साथ शुरू हुआ था ।

मूसा  की तौरात से पेंतिकुस्त

हज़रत मूसा जो 1500 कबल मसीह में थे उनहों ने कई एक तेहवारें क़ायम कि पूरे साल भर में मनाई जाए । फ़सह यहूदी केलंडर का पहला ईद था । नबी हज़रत ईसा को फ़सह के दिन ईद पर सलीब दी गई थी । फ़सह के बररों की कुरबानियों का ऐन वक़्त उनकी मौत का वक़्त जो हमारे लिए निशानी है

दूसरी ईद पहले फलों की ईद थी और हम ने देखा था कि किस तरह नबी हज़रत ईसा अल मसीह इस ईद के दिन मुरदों में से जी उठे थे । जबकि उन की क़यामत पहले फलों की ईद के मोक़े पर हुई तो यह हमारे लिए एक वायदा था कि उन सब के लिए जो ईसा अल मसीह पर ईमान लाते वह मरने के बाद उनही की तरह जी उठेंगे । उनका मुरदों में से जी उठना पहला फल था जिस बतोर ईद के नाम की नबुवत हुई थी ।

ठीक इसी तरह पहले फलों की ईद जो इतवार को तौरात के मुताबिक़ यहूदियों को पेंतिकुस्त का ईद मनाने की ज़रूरत थी । (पेंती 50 के लिए कहा गया है) इससे पहले यह हफ़तों की ईद से जाना जाता था जिसमें सात हफ्तों का हिसाब लगाया जाता था । यहूदी लोग लगभग 1500 सालों से नबी हज़रत ईसा अल मसीह तक हफ़्तों की ईद के नाम से मना रहे थे । यही सबब था कि तमाम दुनया से यहूदी लोग मौजूद थे कि उस दिन पतरस के पैगाम को सुनें और उसी दिन जो येरूशलेम में रुहुल कुदुस नाज़िल हुआ था वह सही और साफ़ तोर पर था इसलिए कि उन्हे तौरात के पेनतिकुस्त की ईद को मनाना ज़रूरी था । आज भी यहूदी लोग पेनतिकुस्त को मनाना जारी रखे हुए हैं मगर इसका नाम उन्हों ने बदल दी है । वह इसे शावोत कहते हैं ।               

हम तौरात में पढ़ते हैं कि किस तरह हफ़्तों की ईद को मनाया जाना ज़रूरी था :

16 सातवें विश्रामदिन के दूसरे दिन तक पचास दिन गिनना, और पचासवें दिन यहोवा के लिये नया अन्नबलि चढ़ाना।
17 तुम अपने घरों में से एपा के दो दसवें अंश मैदे की दो रोटियां हिलाने की भेंट के लिये ले आना; वे खमीर के साथ पकाई जाएं, और यहोवा के लिये पहिली उपज ठहरें।

अहबार 23:16 -17

पेनतिकुस्त का दुरुस्त होना : अल्लाह की तरफ़ से निशानी

पेनतिकुस्त का एक ठीक वक़्त था जब लोगों पर रूहुल क़ुदुस नाज़िल हुआ जबकि यह उसी दिन वाक़े हुआ जिस दिन हफ़्तों की ईद थी या तौरात का (पेनतिकुस्त) का दिन था । नबी ईसा अल मसीह की मस्लूबियत फ़सह की ईद पर वाक़े होती है और उनकी क़यामत पहले फलों की ईद के दिन, और आने वाला इस रूहुल कुदुस का नाज़िल होना हफ्तों की ईद पर वाक़े हुआ यह सब कुछ अल्लाह की जानिब से हमारे लिए साफ़ निशानियाँ हैं । एक साल के कई एक दिनों के साथ क्यूँ ईसा अल मसीह की मस्लूबीयत, क़यामत, और फिर रूहुल कुदुस का नुज़ूल हफ्तों की ईद एक साथ दुरुस्तगी से वाक़े हुए वह भी हर एक दिन मोसम –ए- बहार के तीन ईदों के साथ जिन का तौरात शरीफ़ में ज़िकर पाया जाता है । ऐसा क्यूँ हुआ ? यह अल्लाह के पाक मंसूबे के अलावा और क्या हो सकता था जो वह हमको दिखाना चाहता था ।              

इंजील शरीफ के वाक़ियात जो दुरुस्तगी से तौरात शरीफ़ के तीन मौसमे बहार के मोक़े पर वाक़े हुए

 पेंटिकुस्त : मददगार नई क़ुव्वत देता है

रूहुल क़ुदुस के आने के निशानात को समझाने के लिए पतरस ने योएल नबी की एक नबुवत की तरफ़ इशारा किया, यह पेश बीनी करते हुए कि “मैं हर फ़र्द -ए- बशर पर अपनी रूह नाज़िल करूंगा”। पेंतिकुस्त के दिन के इस वाक़िए के साथ यह नबुवत पूरी हुई ।

हम ने देखा कि किस तरह नबियों ने हम पर ज़ाहिर किया कि हमारी रूहानी पियास की ख़सलत ही हमको गुनाह की तरफ़ ले जाती है । नबियों ने यह भी पेशे नज़र की एक नए अहद का आना जहां शरीअत हमारे दिलों के अंदर लिखा होगा न कि पतथर की तख्तियों पर या किताबों में बल्कि शरीअत हमारे दिलों के अंदर लिखे जाने से ही उसके पीछे चलने की ताक़त और क़ाबिलियत हम में होगी । उस पेनतिकुस्त के दिन ही रूहुल कुदुस के नाज़िल होने का मतलब था कि ईमानदारों में सुकूनत करे और इस वायदे की भी तकमील हो जाए ।

इंजील को ‘ख़ुश ख़बरी’ कहने का एक सबब यह है कि यह एक बेहतर ज़िंदगी जीने की ताक़त अता करता है । अब ज़िंदगी अल्लाह और लोगों के बीच इत्तिहाद के साथ है । यह इत्तिहाद तब शुरू होता है जब से कि ख़ुदा का रूह एक ईमानदार के अंदर सुकूनत करने लगता है – जो आमाल 2 के मुताबिक़ पेंतीकुस्त के इतवार के दिन से शुरू हुआ था । यह खुशख़बरी इसलिए भी है अब यह ज़िन्दगी फ़रक़ तरीक़े से गुज़ारी जा सकती है, ख़ुदा के रूह के वसीले से उसके अजीब रिश्ते के साथ । ख़ुदा का रूह हमको बातिनी और सच्ची रहनुमाई अता करता है – यानी ख़ुदा की तरफ़ से रहनुमाई । इसको बाइबल इस तरह से समझाती है :

13 और उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी।
14 वह उसके मोल लिए हुओं के छुटकारे के लिये हमारी मीरास का बयाना है, कि उस की महिमा की स्तुति हो॥

इफ़सियों1:13-14

  11 और यदि उसी का आत्मा जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।

रोमियों 8:11

23 और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।

रोमियों 8:23

ख़ुदा के रूह की सुकूनत एक दूसरा पहला फल है, रूह क्यूंकि पहले से चखा हुआ है – एक मामूली ईमानदार से , ‘ख़ुदा के फ़रज़ंद’ बनने की हमारी तबदीली के पूरा होने का — एक ज़ामिन — भी है ।  

खुशख़बरी एक नई ज़िन्दगी अता करती है कोशिश के जरिये से नहीं — बल्कि — शरीअत के मानने से इंकार के ज़रिये । न ही कसरत की ज़िन्दगी मिल्कियत, ओहदे, दौलत, और दीगर इस दुनया की ऐशो इशरत से हासिल होती है जिन्हें हज़रत सुलेमान ने तजुरबा किया था फिर भी उन्हों ने ख़ालीपन का एहसास किया था । इसके बर अक्स इंजील एक नई कसरत की ज़िन्दगी हमारे दिलों में ख़ुदा के रूह के सुकूनत किए जाने के ज़रिये से हासिल होती है । अगर अल्लाह सुकूनत करने दे, और हमको क़ुव्वत और रहनुमाई अता करे –- तो यह हमारे लिए खुशख़बरी होनी चाहिए ! तौरात के पेंतीकुस्त की ईद के मुताबिक़ इसका जश्न खमीरे आटे से बनी और पकी उम्दा रोटियों से मनाई जाती है जो इस आने वाली कसरत की ज़िन्दगी की तस्वीर है । पुराने और नए पेंतीकुस्त के दरमियान जो दुरुस्तगी पाई जाती है वह एक साफ़ निशानी है कि यह हमारे लिए अल्लाह कि निशानी है कि हम एक कसरत की ज़िन्दगी रखें ।         

ईसा अल मसीह से ज़िंदगी के इनाम को समझना और हासिल करना

हम ने नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आख़री हफ़्ते की जांच की थी । इंजील शरीफ़ बयान करती है कि उन्हें छट्टे दिन – मुबारक जुम्मे को सलीब दी गई थी और उसके तीसरे दिन जो इतवार का दिन था उन्हें जिलाया गया था । इन वाक़ियात को तौरात ज़बूर और नबियों की किताबों इन दोनों में देखा गया । मगर यह सब क्यूँ हुआ और मौजूदा दिनों में आपके और मेरे लिए क्या मायने रखते हैं ? यहाँ हम समझना चाहते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह के जरिये से क्या चीज़ पेश की गई और हम किस तरह फज़ल और बख़्शिश (गुनाहों की मुआफ़ी हासिल कर सकते हैं । यह हमको समझने में हमारी मदद करेगा जिस तरह सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37), सूरह अल- फ़ातिहा (सूरा 1—इफ़्तिताह) जबकि इसमें अल्लाह से    ‘सही रासता दिखाने की मांग की गई है’,इसके अलावा यह भी समझना है कि ‘मुस्लिम’ के मायने हैं ‘वह जो सुपुर्द करता है’, और मज़हबी रस्म ओ रिवाज के पाबंद होना जैसे वज़ू करना , ज़कात देना , और हलाल का इस्तेमाल करना वगैरा यह सब अच्छा है मगर रोज़े इंसाफ के लिए नाकाफ़ी इरादे हैं ।            

बुरी ख़बर – अल्लाह के साथ हमारे रिश्ते की बाबत अँबिया क्या कहते हैं ?

तौरात हमें सिखाती है कि जब अल्लाह ने बनी इंसान को बनाया तो उसने

  27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।

पैदाइश1:27

सूरत (शबीह) का मतलब एक जिस्मानी एहसास नहीं है बल्कि वह इसलिए बनाए गए थे कि ख़ुदा को इस बतोर मुनअकिस करें कि हम जज़्बाती तोर से , दमागी तोर से , मुआशिरती तोर से और रूहानी तोर से हरकत पिज़ीर होजाएँ । हमको उसके रिश्ते के साथ बने रहने के लिए बनाया गया है । इस रिश्ते को हम नीचे दी गई तस्वीर के ज़रिये देख सकते हैं । ख़ालिक़ को एक ना महदूद हाकिम बतोर सब से ऊपर रखा गया है जबकि आदमियों और औरतों को तस्वीर के नीचे रखा गया है जबकि हम सब महदूद मख़लूक़ हैं । रिश्ते को तीर के निशाने से जोड़ते हुए दिखाया गया है ।         

उसकी सूरत पर बनाए गए लोगों को चाहिए कि ख़ालिक़ के रिशते में बने रहें

अल्लाह अपनी सीरत में पूरी तरह से कामिल है । वह पाक है । क्यूंकि यह ज़बूर कहती है कि ईसा …

  4 क्योंकि तू ऐसा ईश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न हो; बुराई तेरे साथ नहीं रह सकती।
5 घमंडी तेरे सम्मुख खड़े होने न पांएगे; तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है।

ज़बूर5:4-5

आदम ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी का गुनाह किया था – एक ही गुनाह – और ख़ुदा की पाकीज़गी तक़ाज़ा करती है कि उसको इनसाफ़ करने की ज़रूरत है । तौरात शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ बयान करते हैं कि अल्लाह ने उसको फ़ानी बनाया और उसको अपनी नज़रों (हुज़ूरी) से दूर कर दिया । यही हालत हम पर भी नफ़िज़ होती है । किसी भी तोर बतोर जब हम गुनाह करते या नफ़रमानी करते हैं तो हम अल्लाह की बे इज़्ज़ती करते हैं इसलिए कि हम उस तरह से या उस सूरत में होकर या उसके मुताबिक़ नहीं चलते जिस सूरत में हम बनाए गए थे । हमारा रिश्ता टूटा हुआ है । जिसका अंजाम एक चट्टान की दीवार की तरह मज़बूत रुकावट है जो हमारे और ख़ालिक़ के बीच हायल होकर खड़ी हो जाती है ।    

हमारे गुनाह हमारे और पाक ख़ुदा के बीच एक मज़बूत रुकावट पैदा करते हैं

गुनाह की रुकावट को मज़्हबी नेक कामों से छेदना

हम में से बहुत हैं जो इस रुकावट को जो हमारे और अल्लाह के बीच है उसे मज़्हबी कामों के जरिये दूर करने की कोशिश करते हैं या वह काम जिससे काफ़ी नेकियाँ कमा सकें ताकि उस रुकावट को तोड़ डालें । दुआएं , रोज़े , हज्ज , नमाज़, ज़कात , ख़ैरात और अतिय्या वग़ैरा देना यह सारी चीज़ें नेकी कमाने का ज़रीया बतोर हैं ताकि रुकावट को दूर करें जिस तरह अगली तस्वीर में मिसाल पेश की गई है । उम्मीद यह है कि मज़्हबी नेकियाँ हमारे कुछ गुनाहों को मिटा देंगी । अगर हमारे कई एक आमाल के जरिये काफ़ी नेकियाँ कमाई जा  सकती तो हम अपने तमाम गुनाहों को

ख़ारिज करने की उम्मीद करते और फ़ज़ल और मुआफ़ी हासिल कर लेते ।

  म इस रुकावट को नेक काम करने के ज़रिये दूर करने की कोशिश करते हैं ताकि अल्लाह के हुज़ूर सवाब हासिल करें ।

मगर गुनाहों को खारिज करने के लिए हमको कितने सवाब या नेकियों की ज़रूरत पड़ेगी ? हमारा कितना भरोसा है कि हमारे नेक आमाल हमारे गुनाह खारिज करने के लिए और रुकावट  को छेदने के लिए काफ़ी होंगे जो हमारे और हमारे ख़ालिक़ के बीच खड़ी है ? क्या हम जानते हैं कि अच्छे इरादों के लिए हमारी कोशिशें काफ़ी होंगी ? हमारे पास कोई पक्का भरोसा नहीं है इस लिए हम ज़ियादा से ज़ियादा जितना हम से बनता है नेक कामों को अंजाम देने की कोशिश करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि इनसाफ़ के दिन (रोज़े क़यामत) में जवाब देने के लिए काफ़ी है ।

नेक आमाल के साथ हमको सवाब भी हासिल करने कि ज़रूरत है जो कि नेक इरादों के लिए कोशिश है , हम में से कई लोग साफ़ सुथरे रहने के लिए मेहनत करते हैं । हम आज़ादी से नमाज़ अदा करने से पहले वज़ू करते हैं । हम नापाक लोगों से , चीज़ों से और खानों से दूर रहने की कोशिश करते हैं ताकि वह हमें नापाक न कर दें । मगर नबी यसायह एनई हमपर ज़ाहिर किया कि :

  6 हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते की नाईं मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु की नाईं उड़ा दिया है।

यसायाह 64:6

नबी हम से कहते हैं यहाँ तक कि अगर हम उस हर एक चीज़ को रोकते हैं जो हमें ना पाक करती है , हमारे गुनाह हमारे ‘रासतबाज़ी के कामों’ को साफ़ करने के चक्कर में ऐसा बना देते हैं जैसे मैले गंदे छितड़े । यही तो बुरी ख़बर है । मगर यह और बदतर होता जाता है ।     

बदतर ख़बर : गुनाह और मौत की ताक़त 

नबी हज़रत मूसा ने शरीअत में साफ़ तोर से एक मेयार मुक़र्रर किया था कि  बनी इसराईल में से हर एक को मुकम्मल फ़रमानबरदारी की ज़रूरत थी । शरीयत कभी यह नहीं कहती कि “अहकाम में से फ़लां हुक्म को सख्ती से पाबंदी करो” नहीं ऐसा नहीं है बल्कि दरअसल शरीयत बार बार यह कहती है कि यक़ीनी तोर से गुनाह के कामों की क़ीमत मौत थी । इसे हम ने नबी हज़रत नूह के ज़माने में देखा और यहाँ तक कि नबी हज़रत लूत कि बीवी की  बाबत देखा कि गुनाह का अंजाम मौत साबित हुआ ।

इंजील शरीफ़ इस सच्चाई को इस तरह से ख़ुलासा करती है:         

क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी मौत है …

रोमियों6:23

लफ़ज़ी तोर से “मौत” के मायने हैं ‘जुदाई’ । जब हमारी जान हमारे जिस्म से अलग हो जाती है हम जिस्मानी तोर से मर जाते हैं । इसी तरीक़े से यहाँ तक कि अभी हम रूहानी तोर से ख़ुदा से जुदा हैं और मुरदा हैं और उसकी नज़रों में न पाक हैं ।

यह हमारी उम्मीद की परेशानी को ज़ाहिर करता है लियाक़त (नेकी) को कमाने में ताकि गुनाह की क़ीमत अदा कर सके । परेशानी यह है कि हमारी सख्त कोशिशें, लियाक़तें, अच्छे इरादे, और नेक आमाल हालांकि बुरी नहीं हैं मगर यह सब न काफ़ी हैं इस लिए कि क़ीमत कि ज़रूरत होती है क्यूंकि गुनाह की (‘मज़दूरी’) ‘मौत’ है । सिर्फ मौत ही इस दीवार को छेद  सकती है क्यूंकि यह ख़ुदा के इंसाफ़ के तक़ाज़े को पूरा करती है । नेकियाँ कमाने की हमारी कोशिशें वैसी ही है जैसे कैंसर का इलाज करने की कोशिश करना जिस का नतीजा  (आखिरकार मौत है) । हलाल की चीज़ें खाना बुरा नहीं है बल्कि यह अच्छा है और हर एक मोमिन को हलाल ही खाना चाहिए – मगर यह केनसर का इलाज नहीं कर सकता । केनसर के लिए आपको फ़रक़ तरीक़े से इलाज करने की ज़रूरत है क्यूंकि केन्सर के ख़ुलये मौत पैदा  करते हैं ।  

सो यहाँ तक कि हमारी कोशिशें और अच्छे इरादे मज़्हबी लियाक़त पैदा करने के लिए हम सच मुछ में मरे हुए हैं और अपने ख़ालिक़ की नज़र में मुरदा लाश की तरह हैं ।  

हमारे गुनाह मौत को अंजाम देते हैं । हम अल्लाह के हुज़ूर ना पाक मुरदा लाश की तरह हैं 

नबी हज़रत इब्राहीम का सही रास्ता दिखाना

नबी हज़रत इब्राहीम के साथ यह बात फ़रक़ थी । उसके लिए ‘रास्तबाज़ी गिना गया’ उसके नेक कामों के सबब से नहीं बल्कि इस लिए कि उसने एतक़ाद किया और ख़ुदा के वायदे पर भरोसा किया । उसने ख़ुदा की क़ीमत की ज़रूरत के पूरे होने पर भरोसा किया बजाए इसके कि वह इसे खुद कमाए । हम ने उसकी बड़ी क़ुरबानी में देखा कि मौत (जो गुनाह का ख़मयज़ा था) उसे चुका दिया गया था, मगर उसके बेटे के ज़रिये से नहीं बल्कि उस मेंढ़े के ज़रिये जो ख़ुदा के ज़रिये ज़रूरत को पूरा किया गया था ।       

हज़रत इब्राहीम को सीधी सच्ची राह दिखाई गई थी – क्यूंकि उसने सादे तोर से ख़ुदा के वायदे पर ईमान लाया था और ख़ुदा ने उसके गुनाह के मौत की क़ीमत का इंतज़ाम किया था  

क़ुरान  शरीफ़ इस की बाबत सूरा अस – साफ़्फ़ात (सूरा 37 – वह जिन्हों ने दर्जा बंदी क़ाइम की ) जहां वह कहता है : 

 और हमने इस्माईल का फ़िदया एक ज़िबाहे अज़ीम (बड़ी कुर्बानी) क़रार दियाऔर हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा हैकि (सारी खुदायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं

सूरा अस साफ़्फ़ात 37: 107-109

अल्लाह ने खमयाज़ा अदा किया (क़ीमत चुकाया ) और इबराहीम ने बरकत ,फज़ल ,रहम और मुआफ़ी  हासिल की जिसमें ‘तसल्ली’ भी शामिल है ।

खुशख़बरी : हज़रत ईसा अल मसीह के काम हमारी ख़ातिर

नबी का नमूना यहाँ पर हमें सही रास्ता दिखाने के लिए जिस तरह सूरा अल फ़ातिहा (सूरा 1 – इफ़्तिताही)

रोज़े जज़ा का मालिक है।हम तेरी ही इबादत करते हैं, और तुझ ही से मदद मांगते है।हमें सीधा रास्ता दिखा।उन लोगों का रास्ता जिन पर तूने इनाम फ़रमाया, जो माअतूब नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं है।

सूरा 1 – इफ़्तिताही 1:4-7

इंजील शरीफ़ हमें समझाती है कि यह एक मिसाल थी हमें समझाने के लिए कि किस तरह अल्लाह गुनाह की क़ीमत चुकाएगा और मौत और नापाकी के लिए सादे तौर से शिफ़ा का इंतज़ाम करेगा मगर ज़बरदस्त तरीक़े से ।  

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

अबतक यह सारी बातें ‘बुरी ख़बरें’ थीं । मगर ‘इंजील’ के लफ़ज़ी मायनी हैं ‘ख़ुश ख़बरी’ और यह ऐलान करते हुए कि हज़रत ईसा की मौत उस दीवार (रुकावट) को छेदने के लिए काफ़ी है जो हमारे और ख़ुदा के बीच है, और हम देख सकते हैं कि यह क्यूँ ख़ुश ख़बरी है जैसे दिखाया गया है ।      

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी – ख़ुदा का बररा – मौत के ज़रिये हमारी ख़ातिर गुनाहों के लिए क़ीमत अदा करता है जिस तरह नबी हज़रत इबराहीम के मेंढ़े ने किया था ।

  नबी हज़रत ईसा अल मसीह क़ुरबान हुए थे और फिर पहले फल बतोर मुरदों में से जी उठे थे सो अब वह हमारे लिए नई जिंदगी पेश करते हैं । अब हमें  आगे को गुनाह की मौत के क़ैदी बने रहने की ज़रूरत नहीं है ।  

हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत ‘पहला फल’ था । हम मौत से आज़ाद किए जा सकते हैं और यही मौत से ज़िंदा होने की क़ुव्वत को हासिल केएआर सकते हैं ।  

उनकी क़ुरबानी और क़यामत में ईसा अल मसीह दरवाज़ा बन गए कि गुनाह की रुकावट का रास्ता बतोर जो कि हमको ख़ुदा से जुदा करता है । इसी लिये ईसा नबी ने कहा :

  9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।  

यूहनना10:9-10
हज़रत ईसा अल मसीह इस तरह दरवाज़ा हैं जो गुनाह और मौत की रुकावट के लिये अंदर दाख़िल होने का रास्ता हैं

इस दरवाज़े के सबब से अब हम दोबारा से रिश्ते को हासिल कर सकते है जो हमारे ख़ालिक़ के साथ हज़रत आदम के गुनाह करने से पहले मौजूद थी और गुनाह के बाद एक रुकावट बन गई थी मगर अब यक़ीन है कि ख़ुदा का रहम ओ फज़ल गुनाहों की मूआफ़ी हमें हासिल है ।   

एक खुले दरवाज़े के साथ अब हम अपने ख़ालिक़ के साथ एक रिश्ते की बहाली में पाये जाते हैं

जिस तरह इंजील शरीफ़ ऐलान करती है :

  5 क्योंकि परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।
6 जिस ने अपने आप को सब के छुटकारे के दाम में दे दिया; ताकि उस की गवाही ठीक समयों पर दी जाए।  

1तीमुथियुस2:5-6

ख़ुदा का इनाम आप के लिये

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने तमाम लोगों के लिये खुद को देदिया । सो यह आपको और साथ और साथ ही साथ मुझको भी शामिल करता है । उसकी मौत और क़यामत के वसीले से उसने एक ‘दरमियानी’ की क़ीमत अदा की और हमारे लिये जिंदगी भी । यह जिंदगी किस तरह दी जाती है ? 

  23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है॥

रोमियों6:23

ग़ौर करें कि यह हमको कैसे दिया जाता है । यह हमको एक इनाम बतोर दिया जाता है । कोई बात नहीं कि यह इनाम क्या है, अगर यह हक़ीक़त में इनाम है जिसके लिए आप ने कोई मेहनत नहीं की और जिसे आप ने नेक कामों से नहीं कमाया था । अगर आपने उस इनाम को नेक कामों से कमाया तो वह इनाम, इनाम नहीं रह जाता – बल्कि वह एक मज़दूरी कहलाता ! इसी तरीक़े से नेकी (क़ाबिलियत) या ईसा अल मसीह की क़ुरबानी को भी आप नहीं कमा सकते । यह आप को इनाम बतोर दिया जाता है । क्या यह आसान नहीं है ?

और यह इनाम क्या है ? यह इनाम ‘हमेशा की ज़िन्दगी’ है । इसका मतलब यह है कि गुनाह जो आप के लिए और मेरे लिए मौत लेकर आया था उसकी क़ीमत दी जा चुकी है । इतनी महब्बत ख़ुदा हमसे करता है । क्या यह ज़बरदस्त नहीं है ?

सो किस तरह आप और मैं हमेशा की ज़िन्दगी हासिल करते हैं ? फिर से इनामों की बाबत सोचिये । अगर कोई आप को इनाम देना चाहे तो आपको उसे ‘हासिल करना’ ही होगा । जब भी कभी इनाम दिया जाता है तो सिर्फ दो तबादिले होते हैं । या तो (“नहीं शुकरिया”) बोलकर इन्कार कर दिया जाए या यह कहकर क़बूल कर लिया जाता है कि (“आप के इनाम के लिए शुक्रिया, मैं इसे ले लेता हूँ”) । तो फिर इस इनाम को भी हासिल कर लेनी चाहिए । इस बात को सिर्फ़ दमाग़ एतक़ाद कर लेना, मुताला करना या समझ लेना काफ़ी नहीं है । जो इनाम आप को दिया जाता है उससे फ़ाइदा लेने के लिए, आप को उसे ‘हासिल करना’ ज़रूरी है ।        

  12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहनना1:12-13

दरअसल इंजील शरीफ़ ख़ुदा की बाबत कहती है कि :

ख़ुदा हमारा नजात दहिन्दा है , जो चाहता है कि सब आदमी नजात पाएं …

1तीमुथियुस 2:3-4

वह एक नजात दहिन्दा है और उस की ख़्वाहिश है कि ‘सब लोग’ उसके इनाम को हासिल करें और गुनाह और मौत से बच जाएँ । अगर यह उसका इरादा है तो फिर, उसके इनाम को हासिल करें और सादे तरीक़े से उसके इरादे के तहत खुदको सोंप दें – ‘मुस्लिम’ लफ़्ज़ के मायने ही है – वह जिस ने सौंप दिया है ।

इस इनाम को हम कैसे हासिल करते हैं ? इंजील शरीफ़ कहती है कि:      

  12 यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है; और अपने सब नाम लेने वालों के लिये उदार है।

रोमियों10:12

ग़ौर करें कि यह वायदा ‘हरेक’ के लिए है । जबकि वह मुरदों में से ज़िंदा हो चुके ईसा अल मसीह यहाँ तक कि अभी भी ज़िंदा हैं । अगर आप उन्हे पुकारेंगे तो वह सुनेंगे और अपना इनाम आप को देंगे । आप उन्हें पुकारें और उनसे पूछें । शायद आपने इस तरह इससे पहले कभी न किया हो । ज़ेल में एक हिदायत है जो आप की मदद कर सकती है । यह कोई जादूई तरन्नुम नहीं है । यह कोई ख़ास अलफ़ाज़ नहीं हैं जो ताक़त देती हो । यह हज़रत इब्रहीम का भरोसा जैसा है जो हम ईसा अल मसीह पर रखते हैं ताकि वह हमको यह इनाम दे । जैसे ही हम उनपर भरोसा करेंगे वह हमारी सुनेंगे और जवाब देंगे । इंजील शरीफ़ बहुत ज़ोरावर है, और इसके साथ ही वह बहुत आसान भी है । अगर यह आप के लिए मददगार साबित होता है तो इस हिदायत के पीछे चलने या इसे दोहराने के लिए आज़ाद है ।      

पियारे नबी और और ख़ुदावंद ईसा अल मसीह । मैं जानता हूँ मेरे अपने गुनाहों के साथ अल्लाह जो मेरा ख़ालिक़ है उससे जुदा हो गया हूँ । हालांकि मेरे कोशिश करने पर भी इस रुकावट को दूर नहीं कर पाता हूँ । मगर मैं जानता हूँ कि आपकी मौत एक क़ुरबानी थी जिस से कि मेरे तमाम गुनाह धोने की कुवत रखता है और मुझे साफ़ कर सकता है । मैं जानता हूँ कि आप की क़ुरबानी के बाद आप मुरदों में से ज़िंदा हो गए । मैं एतक़ाद रखता हूँ कि आपकी क़ुरबानी काफ़ी थी इसलिए मैं खुद को आपके सुपुर्द करता हूँ । मैं आप से इल्तिजा करता हूँ कि बराए मेहरबानी मुझे मेरे गुनाहों से धोएँ और मेरवे ख़ालिक़ से मेरी मसालीहत कराएं ताकि मुझे हमेशा की जिंदगी हासिल हो । ईसा अल मसीह आप का शुकरिया यह सब कुछ मेरे लिए करने के लिए यहाँ तक कि अभी भी मेरी जिंदगी में रहनुमाई करने के लिए ताकि मैं आपको अपना ख़ुदावंद मानकर आपके पीछे चल सकूँ ।

   ख़ुदा के नाम में जो निहायत रहम करने वाला है ।

क़यामत पहले फलों में से एक : आप के लिए ज़िन्दगी

सूरा अर – रा’द (सूरा 13 – बिजली) एक आम दावा या या ग़ैर ईमानदारों से नुक्ताचीनी को बयान करता है I   

और अगर तुम्हें (किसी बात पर) ताज्जुब होता है तो उन कुफ्फारों को ये क़ौल ताज्जुब की बात है कि जब हम (सड़गल कर) मिट्टी हो जायंगें तो क्या हम (फिर दोबारा) एक नई जहन्नुम में आयंगे ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने परवरदिगार के साथ कुफ्र किया और यही वह लोग हैं जिनकी गर्दनों में (क़यामत के दिन) तौक़ पड़े होगें और यही लोग जहन्नुमी हैं कि ये इसमें हमेशा रहेगें

सूरा अर – रा’द 13:5,7

और वो लोग काफिर हैं कहते हैं कि इस शख़्स (मोहम्मद) पर उसके परवरदिगार की तरफ से कोई निशानी (हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़) क्यों नहीं नाजि़ल की जाती ऐ रसूल तुम तो सिर्फ (ख़ौफे ख़़ुदा से) डराने वाले हो

सूरा अर – रा’द 13:,7

यह दो हिस्सों में बाटता I सूरा रा’द का 5 आयत पूछता है कि क्या क़यामत कभी होगीI उनके ज़ाहिरी तनासुब से ऐसा कभी भी इस से पहले नहीं हुआ, और न मुस्तक़बिल में होगा I फिर वह पूछते हैं कि ज्यूँ कोई मोजिज़ाना निशानीजायज़ क़रार देने के लिए निहीं दिया एक क़ियामत वाक़े होगी I हकीकी मायनों में पुछा जाए तो वह कहते हैं कि, “सबूत पेश करो”!    

सूरह अल – फुरक़ान (सूरा 25 — मेयार) इसी दावे को दिखाता है जो हलके तोर से फ़रक़ तोर पर दिखाया गया है I    

हमने उनको ख़ूब सत्यानास कर छोड़ा और ये लोग (कुफ़्फ़ारे मक्का) उस बस्ती पर (हो) आए हैं जिस पर (पत्थरों की) बुरी बारिश बरसाई गयी तो क्या उन लोगों ने इसको देखा न होगा मगर (बात ये है कि) ये लोग मरने के बाद जी उठने की उम्मीद नहीं रखते (फिर क्यों इमान लाएँ)
और (ऐ रसूल) ये लोग तुम्हें जब देखते हैं तो तुम से मसख़रा पन ही करने लगते हैं कि क्या यही वह (हज़रत) हैं जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है (माज़ अल्लाह)

सूरा अल-फ़ुरक़ान 25:40 -41

उनको क़यामत के आने का कोई डर नहीं है, न ही नबी हज़रत मोहम्मद का I वह क़यामत के आने के सबूत में अड़े रहे I   

सूरा अल – फ़ुरक़ान भी ज़ाहिर करता है कि किसतरह अल्लाह ग़ैर ईमानदारों पर नज़र करता है I

और लोगों ने उसके सिवा दूसरे दूसरे माबूद बना रखें हैं जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते बल्कि वह खुद दूसरे के पैदा किए हुए हैं और वह खुद अपने लिए भी न नुक़सान पर क़ाबू रखते हैं न नफ़ा पर और न मौत ही पर इख्तियार रखते हैं और न जि़न्दगी पर और न मरने के बाद जी उठने पर

सूरा अल-फ़ुरक़ान 25:3 

सूरा अल फ़ुरक़ान ज़ाहिर करता है कि लोग अक्सर ग़ैर माबूदों को लेते हैं I कोई कैसे सच्चे खुदा और ग़ैर मबूदों में फरक कर सकता है ? आयत इसका जवाब देती है, ग़ैर माबूद ‘न मौत न ज़िन्दगी और न क़यामत पर क़ाबू पा सकते हैं’ I एक क़यामत पर क़ाबू पाने के लिए —जो झूठे माबूद को सच्चे खुदा से अलग करता है I     

चाहे दावा ग़ैर ईमानदारों की तरफ़ से अल्लाह और उसके रसूलों को पेश किया गया हो किस बात से खौफ़ रखना चाहिए जो नज़र अंदाज़ किया जा सकता है, या चाहे चितौनी अल्लाह की तरफ़ से ग़ैर ईमानदारों को दी गयी हो की सच्चे खुदा की इबादत करें न कि ग़ैर माबूदों की, नापने वाली छड़ी एक ही है –यानी कि क़यामत I    

क़ियामत आख़िरेकार इख्तियार और क़ुव्वत का तक़ाज़ा करता है I नबी हज़रत इबराहीम (अलैहिस्सलाम),मूसा (अलैहिस्सलाम), दाऊद (अलैहिस्सलाम)और मोहम्मद (सल्लम) — हालांकि बहुत बड़े नबी थे I इसके बावजूद भी वह — मुर्दों में से जिंदा नहीं हुए I सक़रात, एनिसटिन, न्यूटन, और सुलेमान क्या यह बड़े लोग नहीं थे I इनमें  से कोई भी मुर्दों में से जिंदा नहीं हुए I किसी भी शाहिन्शाह को लीजिये जो कभी तख़्त में बैठ कर हुकूमत किया करते थे यूनानियों को शामिल करते हुए, रोमोयों , बैज़नटाइन, उममायाद , अब्बासिद , मम्लूक और ओटटोमन की सल्तनतें –इन में से कोई भी मौत पर हावी नहीं हो पाए और दोबारा ज़िन्दा नहीं हुए I यह आखरी दावा है I यह वह दावा है जिस को हज़रत ईसा अल मसीह ने सामना करने का चुनाव किया I                   

उन्हों ने अपनी फ़तेह को इतवार के दिन पौ फटने से पहले हासिल किया I पौ फटने पर मौत पर उनकी फ़तेह आपके और मेरे लिए भी थी I जो मसीह ईसा पर ईमान रखते हैं उनके लिए दुन्या में आगे को ख़ताओं और गुनाहों के गुलाम होने की ज़रुरत नहीं है I जिस तरह सूरा अल – फ़लक़ (सूरा 113 – पौ फटना) दरखास्त करता है       

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की हर चीज़ की बुराई स
जो उसने पैदा की पनाह माँगता हूँ
और अँधेरी रात की बुराई से जब उसका अँधेरा छा जाए

(सूरए अल फलक़ 113:1-3)

यहाँ हम गौर करेंगे कि इस ख़ास फ़ज्र की बाबत जिसकी सदियों पहले पेश्बीनी हुई थी वह तौरात में पहले फलों की ईद से मुतालिक़ थी और किस तरह फ़ज्र का ख़ुदावंद दुन्या के गुनाहों से हमको छुटकारा दिलाता है I                                                                        

ईसा अल मसीह और तौरात शरीफ़ की ईदें

हमने होशियारी से नबी हज़रत ईसा अल मसीह के आखरी हफ़्ते के वाक़ियात को जो इंजील शरीफ़ बयान करती है उसका पीछा किया I हफ़्ते के आखिर में फ़सह के दिन जो यहूदियों की मुक़द्दस ईद है वह मस्लूब हुए I फिर वह सबत के दौरान मौत की हालत में आराम किये,वह दिन हफ़्ते का मुक़द्दस सातवाँ दिन था I इन मुक़द्दस दिनों को अल्लाह की जानिब से हज़रत मूसा के वसीले से तौरात में मुक़र्रर किया था I इन हिदायत व अहकाम को हम यहाँ पर इसतरह पढ़ते हैं :   

  यहोवा ने मूसा से कहा,
2 इस्त्राएलियों से कह, कि यहोवा के पर्ब्ब जिनका तुम को पवित्र सभा एकत्रित करने के लिये नियत समय पर प्रचार करना होगा, मेरे वे पर्ब्ब ये हैं।
3 छ: दिन कामकाज किया जाए, पर सातवां दिन परमविश्राम का और पवित्र सभा का दिन है; उस में किसी प्रकार का कामकाज न किया जाए; वह तुम्हारे सब घरों में यहोवा का विश्राम दिन ठहरे॥
4 फिर यहोवा के पर्ब्ब जिन में से एक एक के ठहराये हुए समय में तुम्हें पवित्र सभा करने के लिये प्रचार करना होगा वे ये हैं।
5 पहिले महीने के चौदहवें दिन को गोधूलि के समय यहोवा का फसह हुआ करे।

अह्बार 23:1-5

क्या यह हैरत अंगेज़ नहीं है कि हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत और आराम दोनों हूबहू दो मुक़द्दस ईदों के साथ मुत्तफ़िक़ हो रहा था जिसका ज़िक्र 1500 साल पहले हुआ जैसा की तारीख़ी वक़्त की लकीर में दिखाया गया है ? ऐसा क्यूं है ? इस का जवाब हम सब तक पहुँचता है यहाँ तक कि हम किस तरह हर दिन एक दुसरे को सलाम करते हैं I    

हज़रत ईसा अल मसीह की मौत फ़सह की क़ुरबानी के दिन वाक़े हुई (दिन 6) और उसका आराम सबत के आराम के दिन (दिन 7

यह तंज़ीम व तरतीब नबी हज़रत ईसा अल मसीह तौरात की ईदों के दरमियान जारी रहती है I तौरात से ऊपर के आयातों की तिलावत सिर्फ़ पहली दो ईदों से मेल जोल रखती है I दूसरा ईद था ‘पहले फलों’ को खुदावंद के हुज़ूर लाने की ईद , और तौरात इसकी बाबत हिदायत पेश करती है I   

  9 फिर यहोवा ने मूसा से कहा,
10 इस्त्राएलियों से कह, कि जब तुम उस देश में प्रवेश करो जिसे यहोवा तुम्हें देता है और उस में के खेत काटो, तब अपने अपने पक्के खेत की पहिली उपज का पूला याजक के पास ले आया करना;
11 और वह उस पूले को यहोवा के साम्हने हिलाए, कि वह तुम्हारे निमित्त ग्रहण किया जाए; वह उसे विश्रामदिन के दूसरे दिन हिलाए।
12 और जिस दिन तुम पूले को हिलवाओ उसी दिन एक वर्ष का निर्दोष भेड़ का बच्चा यहोवा के लिये होमबलि चढ़ाना।
13 और उसके साथ का अन्नबलि एपा के दो दसवें अंश तेल से सने हुए मैदे का हो वह सुखदायक सुगन्ध के लिये यहोवा का हव्य हो; और उसके साथ का अर्घ हीन भर की चौथाई दाखमधु हो।
14 और जब तक तुम इस चढ़ावे को अपने परमेश्वर के पास न ले जाओ, उस दिन तक नये खेत में से न तो रोटी खाना और न भुना हुआ अन्न और न हरी बालें; यह तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में तुम्हारे सारे घरानों में सदा की विधि ठहरे॥

अह्बार 23:11,14

सो फ़सह के सबत के दुसरे दिन के बाद एक तीसरा मुक़द्दस दिन था I हर साल इस दिन सरदार काहिन मुक़द्दस मक्दिस में दाखिल होता था और बाहर आकर फ़सल के पहले फलों को खुदावंद के आगे लहराया करता था I यह इस बात को ज़ाहिर करता था की जाड़े की मुर्दगी के बाद एक नई जिंदगी की शुरुआत हुई है I लोग आने वाले दिनों में भी भरपूर फ़सल की उम्मीद लगाते थे ताकि लोग खाएं और सैर हो सकें I

सबत के बाद यह बिलकुल वही दिन था जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह मौत की हालत में आराम किया, नए हफ़्ते का पहला इतवार निसान महीने की 16 तारीख़ थी I इंजील शरीफ़ उसी दिन चोंका देने वाले वाक़ियात का बयान करती है कि सरदार काहिन मक़दिस के अन्दर जाता हैकी नै जिंदगी के नए फलों का चढ़ावा चढ़ाए I यहाँ इस का बयां पेश है I      

ईसा अल मसीह मुरदों में से ज़िनदा हुए

  रन्तु सप्ताह के पहिले दिन बड़े भोर को वे उन सुगन्धित वस्तुओं को जो उन्होंने तैयार की थीं, ले कर कब्र पर आईं।
2 और उन्होंने पत्थर को कब्र पर से लुढ़का हुआ पाया।
3 और भीतर जाकर प्रभु यीशु की लोथ न पाई।
4 जब वे इस बात से भौचक्की हो रही थीं तो देखो, दो पुरूष झलकते वस्त्र पहिने हुए उन के पास आ खड़े हुए।
5 जब वे डर गईं, और धरती की ओर मुंह झुकाए रहीं; तो उन्होंने उन ने कहा; तुम जीवते को मरे हुओं में क्यों ढूंढ़ती हो?
6 वह यहां नहीं, परन्तु जी उठा है; स्मरण करो; कि उस ने गलील में रहते हुए तुम से कहा था।
7 कि अवश्य है, कि मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथ में पकड़वाया जाए, और क्रूस पर चढ़ाया जाए; और तीसरे दिन जी उठे।
8 तब उस की बातें उन को स्मरण आईं।
9 और कब्र से लौटकर उन्होंने उन ग्यारहों को, और, और सब को, ये बातें कह सुनाईं।
10 जिन्हों ने प्रेरितों से ये बातें कहीं, वे मरियम मगदलीनी और योअन्ना और याकूब की माता मरियम और उन के साथ की और स्त्रियां भी थीं।
11 परन्तु उन की बातें उन्हें कहानी सी समझ पड़ीं, और उन्होंने उन की प्रतीति न की।
12 तब पतरस उठकर कब्र पर दौड़ गया, और झुककर केवल कपड़े पड़े देखे, और जो हुआ था, उस से अचम्भा करता हुआ, अपने घर चला गया॥
13 देखो, उसी दिन उन में से दो जन इम्माऊस नाम एक गांव को जा रहे थे, जो यरूशलेम से कोई सात मील की दूरी पर था।
14 और वे इन सब बातों पर जो हुईं थीं, आपस में बातचीत करते जा रहे थे।
15 और जब वे आपस में बातचीत और पूछताछ कर रहे थे, तो यीशु आप पास आकर उन के साथ हो लिया।
16 परन्तु उन की आंखे ऐसी बन्द कर दी गईं थी, कि उसे पहिचान न सके।
17 उस ने उन से पूछा; ये क्या बातें हैं, जो तुम चलते चलते आपस में करते हो? वे उदास से खड़े रह गए।
18 यह सुनकर, उनमें से क्लियुपास नाम एक व्यक्ति ने कहा; क्या तू यरूशलेम में अकेला परदेशी है; जो नहीं जानता, कि इन दिनों में उस में क्या क्या हुआ है?
19 उस ने उन से पूछा; कौन सी बातें? उन्होंने उस से कहा; यीशु नासरी के विषय में जो परमेश्वर और सब लोगों के निकट काम और वचन में सामर्थी भविष्यद्वक्ता था।
20 और महायाजकों और हमारे सरदारों ने उसे पकड़वा दिया, कि उस पर मृत्यु की आज्ञा दी जाए; और उसे क्रूस पर चढ़वाया।
21 परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्त्राएल को छुटकारा देगा, और इन सब बातों के सिवाय इस घटना को हुए तीसरा दिन है।
22 और हम में से कई स्त्रियों ने भी हमें आश्चर्य में डाल दिया है, जो भोर को कब्र पर गई थीं।
23 और जब उस की लोथ न पाई, तो यह कहती हुई आईं, कि हम ने स्वर्गदूतों का दर्शन पाया, जिन्हों ने कहा कि वह जीवित है।
24 तब हमारे साथियों में से कई एक कब्र पर गए, और जैसा स्त्रियों ने कहा था, वैसा ही पाया; परन्तु उस को न देखा।
25 तब उस ने उन से कहा; हे निर्बुद्धियों, और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करने में मन्दमतियों!
26 क्या अवश्य न था, कि मसीह ये दुख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे?
27 तब उस ने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्र शास्त्रों में से, अपने विषय में की बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।
28 इतने में वे उस गांव के पास पहुंचे, जहां वे जा रहे थे, और उसके ढंग से ऐसा जान पड़ा, कि वह आगे बढ़ना चाहता है।
29 परन्तु उन्होंने यह कहकर उसे रोका, कि हमारे साथ रह; क्योंकि संध्या हो चली है और दिन अब बहुत ढल गया है। तब वह उन के साथ रहने के लिये भीतर गया।
30 जब वह उन के साथ भोजन करने बैठा, तो उस ने रोटी लेकर धन्यवाद किया, और उसे तोड़कर उन को देने लगा।
31 तब उन की आंखे खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उन की आंखों से छिप गया।
32 उन्होंने आपस में कहा; जब वह मार्ग में हम से बातें करता था, और पवित्र शास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?
33 वे उसी घड़ी उठकर यरूशलेम को लौट गए, और उन ग्यारहों और उन के साथियों को इकट्ठे पाया।
34 वे कहते थे, प्रभु सचमुच जी उठा है, और शमौन को दिखाई दिया है।
35 तब उन्होंने मार्ग की बातें उन्हें बता दीं और यह भी कि उन्होंने उसे रोटी तोड़ते समय क्योंकर पहचाना॥
36 वे ये बातें कह ही रहे ये, कि वह आप ही उन के बीच में आ खड़ा हुआ; और उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले।
37 परन्तु वे घबरा गए, और डर गए, और समझे, कि हम किसी भूत को देखते हैं।
38 उस ने उन से कहा; क्यों घबराते हो और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं?
39 मेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वहीं हूं; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी मांस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।
40 यह कहकर उस ने उन्हें अपने हाथ पांव दिखाए।
41 जब आनन्द के मारे उन को प्रतीति न हुई, और आश्चर्य करते थे, तो उस ने उन से पूछा; क्या यहां तुम्हारे पास कुछ भोजन है?
42 उन्होंने उसे भूनी मछली का टुकड़ा दिया।
43 उस ने लेकर उन के साम्हने खाया।
44 फिर उस ने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों।
45 तब उस ने पवित्र शास्त्र बूझने के लिये उन की समझ खोल दी।
46 और उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा।
47 और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा।
48 तुम इन सब बातें के गवाह हो।

लूक़ा 24:1-48

ईसा अल मसीह की फ़तेह

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ‘पहले फलों’ के उस मुक़द्दस दिन पर एक इतनी बड़ी फ़तेह हासिल की कि उनके दुश्मनों और उनके साथियों को एत्क़ाद करना मुमकिन न था I उन्हों ने मौत पर ज़िन्दगी की जीत हासिल करके फ़ातिहाना जिंदगी में वापस आ गए थे I जिस तरह से इंजील शरीफ़ हमें समझाती है:     

  54 और जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तक वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया।
55 हे मृत्यु तेरी जय कहां रही?
56 हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है।

1कुरिनथियों15:54-56

मगर यह फ़तेह सिर्फ़ नबी के लिए नहीं थी बल्कि यह फ़तेह आपके और मेरे लिए भी थी, वक़्तों की मीयाद के ज़रीये ज़मानत देते हुए ईद के पहले फलों के साथ I इंजील शरीफ़ इसे इस तरह समझाती है:   

  20 परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ।
21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।
22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।
23 परन्तु हर एक अपनी अपनी बारी से; पहिला फल मसीह; फिर मसीह के आने पर उसके लोग।
24 इस के बाद अन्त होगा; उस समय वह सारी प्रधानता और सारा अधिकार और सामर्थ का अन्त करके राज्य को परमेश्वर पिता के हाथ में सौंप देगा।
25 क्योंकि जब तक कि वह अपने बैरियों को अपने पांवों तले न ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है।
26 सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।

1कुरिन्थियों15:20-25

पहले फलों का ईद बतोर नबी हज़रत ईसा अल मसीह को भी उसी दिन मुर्दों में से जिंदा किया गया था ताकि हम जानें कि इसी मुर्दों में से जी उठने में हम भी यकसां तोर से शामिल हो सकें I जिस तरह से पहले फलों की ईद आने वाले दिनों के लिए मोसम –ए- बहार में अच्छे फ़सल की उम्मीदों के साथ एक नयी जिंदगी का हदया था इंजील शरीफ़ हम से कहती है कि हज़रत ईसा अल मसीह का मुर्दों में से ज़िन्दा होना भी तमाम जी उठने वालों में से पहला फल है और इससे यह उम्मीद की जाती है कि उसके ईमानदार लोग भी ‘जो उसके हैं’ कसीर तादाद में मुर्दों में से जी उठेंगे I तौरात शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ हमें समझाते हैं कि हज़रत आदम के सबब से मौत आयी I इंजील शरीफ़ हमसे कहती है कि एक मुतवाज़ी तरीक़े से ईसा अल मसीह के वसीले से क़यामत की जिंदगी हासिल होती है I ईसा नबी नयी जिंदगी का पहला फल है जिस में शामिल होने के लिए सब को दावत दी जाती है I      

ईस्टर : उस इतवार के दिन जी उठने को मनाना

मौजूदा ज़माने में हज़रत ईसा अल मसीह के जी उठने को अक्सर ईस्टर बतोर हवाला दिया जाता है,और वह इतवार का दिन था इसलिए उसे अक्सर ईस्टर का इतवार (ईस्टर सन्डे) बतोर याद किया जाता है I मगर यह अलफ़ाज़ सदियों साल बाद ही इस्तेमाल में लाये गए I इसके लिए मख़सूस अलफ़ाज़ ज़रूरी नहीं हैं I जो ज़रूरी है वह यह कि ईसा नबी का जी उठना पहले फलों की ईद की तकमील बतोर है जो सदियों साल पहले हज़रत मूसा के ज़माने से शुरू होकर ईसा नबी की सलीबी मौत तक चला आ रहा था, और यह भी कि आपके और मेरे लिए यह क्या मायने रखता है I                                                                                                                                             

नए हफ़्ते के इतवार के दिन के लिए इसे वक़्त की लकीर में देखा जा चूका है :                                                 

ईसा अल मसीह पहले फलों के दिन जी उठते हैं – मौत से नयी जिंदगी की नेमत आपके लिए और मेरे लिए पेश किया गया है I 

 ‘मुबारक जुम्मा’ जवाब दिया गया

 ‘मुबारक जुम्मे’ की बाबत यह भी हमारे सवाल का जवाब देता है I जिस तरह इंजील शरीफ समझाती है :

  9 पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।

इब्रानियों 2:9

मुबारक जुम्मे के दिन जब ‘इम्तिहान शुदा मौत’ की तरह उन्हों ने आप के और मेरे लिए और हम में से ‘हरेक के लिए’ किया तो मुबारक जुम्मा यह नाम इसलिए है कि यह हमारे लिये मुबारक था I जब वह पहले फलों की ईद में जी उठे तो वह अब हम में से हरेक के लिए नयी जिंदगी पेश करते हैं I    

हज़रत ईसा अल मसीह की क़यामत और तसल्ली क़ुरान शरीफ़ में

हालांकि हज़रत ईसा अल मसीह के मुर्दों में से जी उठने की बाबत कुरान शरीफ़ बहुत कम तफ़सील पेश करता है मगर तीन बहुत ही जियादा ख़ास दिनों की बाबत जोर देता है I इसे सूरा मरयम इस तरीके से तिलावत करता है कि :

 और (खुदा की तरफ़ से) जिस दिन मैं पैदा हुआ हूँ और जिस दिन मरूँगा मुझ पर सलाम है और जिस दिन (दोबारा) ज़िन्दा उठा कर खड़ा किया जाऊँगा

सूरए मरयम 19:33

इंजील शरीफ भी हज़रत ईसा अल मसीह की पैदाइश, उनकी मौत और अब उनकी क़ियामत I जबकि उनकी क़ियामत ‘पहला-फल’ है, जो तसलली नबी पर उनकी क़यामत में थी वह आज और अभी आपके और मेरे लिए भी दस्तियाब है I हज़रत ईसा अल मसीह ने इसे तब दिखाया जब वह मुर्दों में से जी उठे थे और जब उन्हों ने अपने शागिर्दों को सलाम किया था :       

  19 उसी दिन जो सप्ताह का पहिला दिन था, सन्ध्या के समय जब वहां के द्वार जहां चेले थे, यहूदियों के डर के मारे बन्द थे, तब यीशु आया और बीच में खड़ा होकर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले।
20 और यह कहकर उस ने अपना हाथ और अपना पंजर उन को दिखाए: तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।
21 यीशु ने फिर उन से कहा, तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूं।
22 यह कहकर उस ने उन पर फूंका और उन से कहा, पवित्र आत्मा लो।  

युहन्ना 20:19-22

दस्तूर के मुताबिक़ मुलिम्स ने एक दुसरे को सलाम करने के रिवाज को अपनाया है वह है : (अस-सलामु अलैकुम —तुम पर सलाम या (सलामती) हो) I इसको नबी हज़रत हज़रत इसा अल मसीह अपने ज़माने में सलामती के साथ अपनी क़यामत को जोड़ने के लिए इस्तेमाल करते थे जिसे आज हमारे लिए दिया गया है I ईसा नबी की जानिब से हर वक़्त हमें इस वायदे को याद करनी चाहिए जब हम एक दुसरे को सलाम करते वक़्त इमं अल्फाज़ को बोलते या सुनते हैं, और रूहुल कुदुस की नेमत को भी सोचें जो अभी हमारे लिए दस्तियाब है I              

हज़रत ईसा अल मसीह की क़ियामत का लिहाज़ किया गया

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने खुद को बहुत दिनों तक अपने शागिर्दों पर मुर्दों में से जिंदा साबित किया I यह वाक़ियात इंजील शरीफ़ से यहाँ बयान किया गया है I मगर हमको इसपर भी गौर करना चाहिए जो उन्हों ने अपने शागिर्दों पर अपना पहला मज़ाहिरा पेश किया I  

….उनके लिए कहानी सी मालूम हुईं

लूक़ा 24:10

नबी ख़ुद को चाहिए था कि:

  27 तब उस ने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्र शास्त्रों में से, अपने विषय में की बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।

लूक़ा 24:27

और फिर से बाद में

  44 फिर उस ने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों।

लूक़ा 24:44

हम कैसे यक़ीन कर सकते हैं कि अगर यह हक़ीक़त में अल्लाह का मंसूबा है जो हमें मौत से जिंदगी देता है ? सिर्फ़ ख़ुदा ही मुस्तक़बिल को जान सकता है, सो निशानात सदियों साल पहले तौरात शरीफ़ और ज़बूर शरीफ़ के नबियों के ज़रिये ज़ाहिर कर दिए गए थे और वह नबी ईसा अल मसीह के ज़रिये पूरे हुए थे उसे हमारे यकीन के लिए लिखे गए थे : 

  4 कि तू यह जान ले, कि वे बातें जिनकी तू ने शिक्षा पाई है, कैसी अटल हैं॥

लूक़ा1:4

कि हम नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी और जी उठने के अहम् सवाल की मतला कर सकते हैं जो चार मुख़तलिफ़ तहरीरों को जोड़ता है जो दस्तियाब हैं :

  1. यह निशानियों की नज़रे सानी करता है जो मूसा की तौरात में दी गयी है जिसका इशारा अल मसीह की तरफ़ है I
  2. यह निशानियों की तरफ़ नज़रे सानी करता है जो ‘नबियों की किताबों और ज़बूरों’ में दी गयी हैं I यह दो तहरीरें हमें इजाज़त देती हैं कि हम अपने खुद के लिए इन्साफ़ करें कि क्या वह हक़ीक़त में लिखा गया था कि “मसीह दुःख उठाएगा और तीसरे दिन मुर्दों में से जिलाया जाएगा”(लूक़ा 24:46) I
  3. यह हमको समझने में मदद करता है कि किस तरह इस क़यामत की जिंदगी के इनाम को हज़रत ईसा अल मसीह के ज़रिये से हासिल करें I
  4. यह हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत की बाबत कुछ गलत फह्मिफह्मी ले आता है,नज़रे सानी करते हुए कि मुक़द्दस कुरान शरीफ इस के बारे में क्या कहता है I     

दिन 7 – सबत का आराम

नबी हज़रात ईसा अल मसीह को फ़रेब दिया गया था और यहूदियों के फ़सह के मुक़द्दस दिन पर सलीब दी गयी थी, जो अब मुबारक जुम्मा बतोर जाना जाता है I फ़सह जुमेरात की शाम गुरूबे आफ़ताब से शुरू होता और जुम्मे के दिन गुरूबे आफ़ताब पर — छटे दिन ख़तम होता है I उस दिन का आखरी वाक़िया नबी के मुर्दा जिस्म का दफ़नाया जाना था I इंजील शरीफ़ बयान करती है कि किसतरह औरतों ने नबी के दफ़नाए जाने की गवाही दी I    

  55 और उन स्त्रियों ने जो उसके साथ गलील से आईं थीं, पीछे पीछे जाकर उस कब्र को देखा, और यह भी कि उस की लोथ किस रीति से रखी गई है।
56 और लौटकर सुगन्धित वस्तुएं और इत्र तैयार किया: और सब्त के दिन तो उन्होंने आज्ञा के अनुसार विश्राम किया॥

लूक़ा 23:55-56

औरतें नबी के जिस्म को तय्यार करना चाहती थीं मगर वक़्त निकल चुका था और जुम्मे की शाम को गुरूबे आफ़ताब पर सबत का आराम का दिन शुरू हो चुका था I और यह हफ़्ते का सातवां दिन था और यहूदी लोगों को उस दिन काम करने की इजाज़त नहीं थी I यह हुक्म तौरात में तखलीक के शुरू से चली आरही है I अल्लाह ने तमाम चीज़ों को छे दिन में बनाए I तौरात में इसतरह ज़िक्र है :   

आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया।
2 और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया। और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया।

पैदाइश 2:1-2

सो औरतें हालाँकि नबी के जिस्म को तैयार तो करना चाहती थीं, मगर तौरात के दस अहकाम की फ़रमान बरदार थी और उन्हों ने उस दिन आराम किया I

मगर सरदार काहिनों ने सबत के दिन भी अपना काम जारी रखा I इनजीले शरीफ़ गवर्नर के साथ उनकी मीटिंगों की बाबत बयान करती है I      

 

62 दूसरे दिन जो तैयारी के दिन के बाद का दिन था, महायाजकों और फरीसियों ने पीलातुस के पास इकट्ठे होकर कहा।
63 हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमाने वाले ने अपने जीते जी कहा था, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा।
64 सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहने लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।
65 पीलातुस ने उन से कहा, तुम्हारे पास पहरूए तो हैं जाओ, अपनी समझ के अनुसार रखवाली करो।
66 सो वे पहरूओं को साथ ले कर गए, और पत्थर पर मुहर लगाकर कब्र की रखवाली की॥

मत्ती 27:62 -66

सो उस सबत के दिन काम करते हुए देखा और सोचा कि मसीह का जिस्म जो कब्र में दफ़न है उसकी हिफ़ाज़त होनी चाहिए I नबी हज़रात ईसा अल मसीह का जिस्म मुर्दे की हालत में आराम किया जा औरतों ने उस मुक़द्दस हफ़्ते में सबत की फ़रमान बरदारी में आराम किया I वक़्त की लकीर बताती है कि उस दिन उनका आराम सातवें दिन की तख़लीक़ का अक्स था जहां तौरात कहती है कि अल्लाह ने तख़ लीक़ के काम से आराम किया I     

मौत के सबत का आराम नबी हज़रत ईसा अल मसीह के लिए

मगर यह अपने कुव्वत के इज़हार से पहले सिर्फ़ आराम था I सूरा अल फ़ज्र (सूरा 89— तुलूए सुबह)हम को याद दिलाती है कि एक अँधेरी रात के बाद का फ़ज्र कितना अहम् हो सकता है I पौ फटना अजीब कामों को ज़ाहिर कर सकता है ‘उनके लिए जो समझते हैं’I    

सुबह की क़सम
और दस रातों की
और ज़ुफ्त व ताक़ की
और रात की जब जाने लगे
अक़्लमन्द के वास्ते तो ज़रूर बड़ी क़सम है (कि कुफ़्फ़ार पर ज़रूर अज़ाब होगा) और दुसरे दिन अछम्बे में डालने वाली फ़तेह वाक़े हुई जिस तरह हम यहाँ देखते है I

सूरा अल फ़ज्र 89:1-5 

पौ फटने पर हम वह चीज़ देखते हैं जो दुसरे दिन इज़हार होता है 

दिन छे – हज़रत ईसा अल मसीह और मुबारक जुम्मा

सूरा 62 (इबादत गुज़ारों की जमाअत, रोज़े जुम्मा—अल जुम्मा) हम से कहता है कि रोज़े जुम्मा मुसमानों के लिए नमाज़ अदा करने का दिन है, मगर सूरा अल—जुम्मा सब से पहले एक दावा पेश करता है – जिसको नबी हज़रत ईसा ने अपनी अदाकारी में मसीह अल जुम्मा होने बतोर कबूल किया, नमाज़ के दिन को मुक़द्दस ठहराते हुए की वह जुम्मे का दिन हो, एलान किया:     

 (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं तो अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करोऔर ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है

सूरा अल–जुम्मा 62:6—7

(ऐ रसूल)) तुम कह दो कि ऐ यहूदियों अगर तुम ये ख़्याल करते हो कि तुम ही ख़ुदा के दोस्त हो और लोग नहीं तो अगर तुम(अपने दावे में) सच्चे हो तो मौत की तमन्ना करो
और ये लोग उन आमाल के सबब जो ये पहले कर चुके हैं कभी उसकी आरज़ू न करेंगे और ख़ुदा तो ज़ालिमों को जानता है

सूरा अल – जुम्मा की इन आयतों का मतलब है कि अगर हम अल्लाह के सच्चे दोस्त हैं तो हमको मौत का कोई खौफ़ नहीं होगा I मगर जबकि वह (और हम) अपने नेक आमाल की बाबत शक करते की वह कैसे हैं तो हम मौत की बड़ी क़ीमत का एहतिराज़ करते हैं I मगर इस जुम्मे को उसके आख़री हफ़्ते के छट्टे दिन एक यहूदी होने के नाते ईसा अल मसीह ने इस क़तई इम्तिहान का सामना किया – और इसको दुआ के साथ शुरू किया I जिस तरह इंजील शरीफ़ नबी की बाबत समझाती है :    

  37 और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा।
38 तब उस ने उन से कहा; मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला चाहते: तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो।
39 फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।

मत्ती 26:37—39

इस जुम्मे के वाक़ियात को जारी रखने से पहले, हम उन वाकियात की नज़रे सानी करेंगे जो इस जुम्मे की नमाज़ तक ले जा रही है I   हमारा ठहराया हुआ दुश्मन, शैतान पांचवें दिन यहूदा इस्करयूत में समा चुका था कि नबी ईसा अल मसीह को पकड़वाए I दुसरे दिन यानी 6 की शाम को नबी ने अपने आखरी अशा को अपने साथियों के साथ अंजाम दिया (जिन्हें उनके शागिर्द भी कहा जाता है) I उस खाने पर उन्हों ने तम्सीलों और तालीमात के ज़रिये समझाया कि हमें किसतरह खुदा की उस बड़ी महब्बत को जानते हुए एक दुसरे से महब्बत करनी चाहिए I बजा तोर से उन्हों ने इसे कैसे अंजाम दिया इंजील शरीफ़ से बयान किया गया है I फिर उन्हों ने तमाम ईमानदारों के लिए दुआ की जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं I       

इंजील शरीफ़ इस बात का ज़िक्र करती है कि उनके जुम्मे की नमाज़ के बाद क्या हुआ था :   

गत्सम्नी बाग़ में गिरफ़्तारी

  शु ये बातें कहकर अपने चेलों के साथ किद्रोन के नाले के पार गया, वहां एक बारी थी, जिस में वह और उसके चेले गए।
2 और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी वह जगह जानता था, क्योंकि यीशु अपने चेलों के साथ वहां जाया करता था।
3 तब यहूदा पलटन को और महायाजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहां आया।
4 तब यीशु उन सब बातों को जो उस पर आनेवाली थीं, जानकर निकला, और उन से कहने लगा, किसे ढूंढ़ते हो?
5 उन्होंने उस को उत्तर दिया, यीशु नासरी को: यीशु ने उन से कहा, मैं ही हूं: और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उन के साथ खड़ा था।
6 उसके यह कहते ही, कि मैं हूं, वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।
7 तब उस ने फिर उन से पूछा, तुम किस को ढूंढ़ते हो।
8 वे बोले, यीशु नासरी को। यीशु ने उत्तर दिया, मैं तो तुम से कह चुका हूं कि मैं ही हूं, यदि मुझे ढूंढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।
9 यह इसलिये हुआ, कि वह वचन पूरा हो, जो उस ने कहा था कि जिन्हें तू ने मुझे दिया, उन में से मैं ने एक को भी न खोया।
10 शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर, उसका दाहिना कान उड़ा दिया, उस दास का नाम मलखुस था।
11 तब यीशु ने पतरस से कहा, अपनी तलवार काठी में रख: जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे न पीऊं?
12 तब सिपाहियों और उन के सूबेदार और यहूदियों के प्यादों ने यीशु को पकड़कर बान्ध लिया।
13 और पहिले उसे हन्ना के पास ले गए क्योंकि वह उस वर्ष के महायाजक काइफा का ससुर था।

युहन्ना18:1—13

हज़रत ईसा नबी येरूशलेम से कुछ ही फ़ासिले पर बाहर दुआ करने गए I जहां यहूदा इस्करयूत सिपाहियों को अपने साथ ले आया कि उन्हें गिरफ़्तार करे I अगर हाँ गिरफ़्तारी का सामना करते हैं तो हम लड़ने, भागने या छिपने की कोशिश करते I मगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने न लड़ाई की और न छिपने या भागने की कोशिश की I उन्हों ने साफ़ तोर से क़बूला कि वह हक़ीक़त में नबी ईसा हैं जिन की उन्हें तलाश थी I उनका साफ़ इक़रार (“मैं वही हूं”) सिपाहियों को अछमबा कर दिया था और उनके शागिर्द उन्हें छोड़ कर भाग लिए थे हज़रत ईसा नबी ने खुद को गिरफ़्तारी दी और उन्हें मुक़द्दमे के लिए सरदार काहिन हन्ना के घर ले गए I        

पहला मुक़द्दमा

इंजील शरीफ़ बयान करती है कि ईसा नबी पर किस तरह मुक़द्दमा चलाया गया था :

  18 दास और प्यादे जाड़े के कारण को एले धधकाकर खड़े ताप रहे थे और पतरस भी उन के साथ खड़ा ताप रहा था॥
19 तक महायाजक ने यीशु से उसके चेलों के विषय में और उसके उपदेश के विषय में पूछा।
20 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि मैं ने जगत से खोलकर बातें की; मैं ने सभाओं और आराधनालय में जहां सब यहूदी इकट्ठे हुआ करते हैं सदा उपदेश किया और गुप्त में कुछ भी नहीं कहा।
21 तू मुझ से क्यों पूछता है? सुनने वालों से पूछ: कि मैं ने उन से क्या कहा? देख वे जानते हैं; कि मैं ने क्या क्या कहा
22 तब उस ने यह कहा, तो प्यादों में से एक ने जो पास खड़ा था, यीशु को थप्पड़ मारकर कहा, क्या तू महायाजक को इस प्रकार उत्तर देता है।
23 यीशु ने उसे उत्तर दिया, यदि मैं ने बुरा कहा, तो उस बुराई पर गवाही दे; परन्तु यदि भला कहा, तो मुझे क्यों मारता है?
24 हन्ना ने उसे बन्धे हुए काइफा महायाजक के पास भेज दिया॥  

युहन्ना18:19-24

नबी हज़रत ईसा अल मसीह को साबिक़ सरदार काहिन् से पूछ ताछ के बाद उस ज़माने के हाल के सरदार काहीं के पास दुसरे मुक़द्दमे के भेजा गया I   

दूसरा मुक़द्दमा                      

वहाँ उनको तमाम मज़हबी रहनुमाओं के सामने पूछ ताछ की जाएगी I इंजील शरीफ़ इसको आगे के मुक़द्दमे के साथ बयान करती है :

  53 फिर वे यीशु को महायाजक के पास ले गए; और सब महायाजक और पुरिनए और शास्त्री उसके यहां इकट्ठे हो गए।
54 पतरस दूर ही दूर से उसके पीछे पीछे महायाजक के आंगन के भीतर तक गया, और प्यादों के साथ बैठ कर आग तापने लगा।
55 महायाजक और सारी महासभा यीशु के मार डालने के लिये उसके विरोध में गवाही की खोज में थे, पर न मिली।
56 क्योंकि बहुतेरे उसके विरोध में झूठी गवाही दे रहे थे, पर उन की गवाही एक सी न थी।
57 तब कितनों ने उठकर उस पर यह झूठी गवाही दी।
58 कि हम ने इसे यह कहते सुना है कि मैं इस हाथ के बनाए हुए मन्दिर को ढ़ा दूंगा, और तीन दिन में दूसरा बनाऊंगा, जो हाथ से न बना हो।
59 इस पर भी उन की गवाही एक सी न निकली।
60 तब महायाजक ने बीच में खड़े होकर यीशु से पूछा; कि तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं?
61 परन्तु वह मौन साधे रहा, और कुछ उत्तर न दिया: महायाजक ने उस से फिर पूछा, क्या तू उस पर म धन्य का पुत्र मसीह है?
62 यीशु ने कहा; हां मैं हूं: और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी और बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे।
63 तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा; अब हमें गवाहों का और क्या प्रयोजन है
64 तुम ने यह निन्दा सुनी: तुम्हारी क्या राय है? उन सब ने कहा, वह वध के योग्य है।
65 तब कोई तो उस पर थूकने, और कोई उसका मुंह ढांपने और उसे घूसे मारने, और उस से कहने लगे, कि भविष्यद्वाणी कर: और प्यादों ने उसे लेकर थप्पड़ मारे॥

मरक़ुस14:53-65

यहूदी रहनुमाओं ने नबी ईसा अल मसीह पर मौत का फ़रमान जारी किया I मगर जबकि येरुशलेम में रोम की सल्तनत थी तो क़त्ल का हुक्म सिर्फ़ और सिर्फ़ रोम के हाकिम की मंज़ूरी से ही होसकता था इसो उन्हों ने नबी हज़रत मसीह को हाल के रोमी हाकिम पिन्तुस पिलातुस के पास ले गए I इन्जील शरीफ़ यह भी बयां करती है कि उसी दौरान यहूदा इस्करयूत का क्या हुआ जिसने नबी हज़रत ईसा को पकड़वाया था I   

यहूदा इस्करयूत फ़रेबी का क्या हुआ ?

  ब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।
2 और उन्होंने उसे बान्धा और ले जाकर पीलातुस हाकिम के हाथ में सौंप दिया॥
3 जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया।
4 और कहा, मैं ने निर्दोषी को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान।
5 तब वह उन सिक्कों मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फांसी दी।
6 महायाजकों ने उन सिक्कों लेकर कहा, इन्हें भण्डार में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लोहू का दाम है।
7 सो उन्होंने सम्मति करके उन सिक्कों से परदेशियों के गाड़ने के लिये कुम्हार का खेत मोल ले लिया।
8 इस कारण वह खेत आज तक लोहू का खेत कहलाता है।

मत्ती 27:1-8

रोम के हाकिम के ज़रिये हज़रत ईसा अल मसीह की पेशी हुई

  11 जब यीशु हाकिम के साम्हने खड़ा था, तो हाकिम ने उस से पूछा; कि क्या तू यहूदियों का राजा है? यीशु ने उस से कहा, तू आप ही कह रहा है।
12 जब महायाजक और पुरिनए उस पर दोष लगा रहे थे, तो उस ने कुछ उत्तर नहीं दिया।
13 इस पर पीलातुस ने उस से कहा: क्या तू नहीं सुनता, कि ये तेरे विरोध में कितनी गवाहियां दे रहे हैं?
14 परन्तु उस ने उस को एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहां तक कि हाकिम को बड़ा आश्चर्य हुआ।
15 और हाकिम की यह रीति थी, कि उस पर्व्व में लोगों के लिये किसी एक बन्धुए को जिसे वे चाहते थे, छोड़ देता था।
16 उस समय बरअब्बा नाम उन्हीं में का एक नामी बन्धुआ था।
17 सो जब वे इकट्ठे हुए, तो पीलातुस ने उन से कहा; तुम किस को चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूं? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?
18 क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे डाह से पकड़वाया है।
19 जब वह न्याय की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उस की पत्नी ने उसे कहला भेजा, कि तू उस धर्मी के मामले में हाथ न डालना; क्योंकि मैं ने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है।
20 महायाजकों और पुरनियों ने लोगों को उभारा, कि वे बरअब्बा को मांग ले, और यीशु को नाश कराएं।
21 हाकिम ने उन से पूछा, कि इन दोनों में से किस को चाहते हो, कि तुम्हारे लिये छोड़ दूं? उन्होंने कहा; बरअब्बा को।
22 पीलातुस ने उन से पूछा; फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूं? सब ने उस से कहा, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।
23 हाकिम ने कहा; क्यों उस ने क्या बुराई की है? परन्तु वे और भी चिल्ला, चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए”।
24 जब पीलातुस ने देखा, कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इस के विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के साम्हने अपने हाथ धोए, और कहा; मैं इस धर्मी के लोहू से निर्दोष हूं; तुम ही जानो।
25 सब लोगों ने उत्तर दिया, कि इस का लोहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो।
26 इस पर उस ने बरअब्बा को उन के लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए॥

मत्ती 27:11-26

नबी हज़रत ईसा अल मसीह की मस्लूबियत, मौत और तद्फ़ीन (दफ़न किया जाना)

इंजील शरीफ़ बड़े तफ़सील के साथ बयान करती है कि हज़रत ईसा अल मसीह को किस तरह सलीब दी गयी थी I यहाँ इस का पूरा बयान मौजूद है I

  27 तब हाकिम के सिपाहियों ने यीशु को किले में ले जाकर सारी पलटन उसके चहुं ओर इकट्ठी की।
28 और उसके कपड़े उतारकर उसे किरिमजी बागा पहिनाया।
29 और काटों को मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा; और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेककर उसे ठट्ठे में उड़ाने लगे, कि हे यहूदियों के राजा नमस्कार।
30 और उस पर थूका; और वही सरकण्डा लेकर उसके सिर पर मारने लगे।
31 जब वे उसका ठट्ठा कर चुके, तो वह बागा उस पर से उतारकर फिर उसी के कपड़े उसे पहिनाए, और क्रूस पर चढ़ाने के लिये ले चले॥
32 बाहर जाते हुए उन्हें शमौन नाम एक कुरेनी मनुष्य मिला, उन्होंने उसे बेगार में पकड़ा कि उसका क्रूस उठा ले चले।
33 और उस स्थान पर जो गुलगुता नाम की जगह अर्थात खोपड़ी का स्थान कहलाता है पहुंचकर।
34 उन्होंने पित्त मिलाया हुआ दाखरस उसे पीने को दिया, परन्तु उस ने चखकर पीना न चाहा।
35 तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया; और चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।
36 और वहां बैठकर उसका पहरा देने लगे।
37 और उसका दोषपत्र, उसके सिर के ऊपर लगाया, कि “यह यहूदियों का राजा यीशु है”।
38 तब उसके साथ दो डाकू एक दाहिने और एक बाएं क्रूसों पर चढ़ाए गए।
39 और आने जाने वाले सिर हिला हिलाकर उस की निन्दा करते थे।
40 और यह कहते थे, कि हे मन्दिर के ढाने वाले और तीन दिन में बनाने वाले, अपने आप को तो बचा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो क्रूस पर से उतर आ।
41 इसी रीति से महायाजक भी शास्त्रियों और पुरनियों समेत ठट्ठा कर करके कहते थे, इस ने औरों को बचाया, और अपने को नहीं बचा सकता।
42 यह तो “इस्राएल का राजा है”। अब क्रूस पर से उतर आए, तो हम उस पर विश्वास करें।
43 उस ने परमेश्वर का भरोसा रखा है, यदि वह इस को चाहता है, तो अब इसे छुड़ा ले, क्योंकि इस ने कहा था, कि “मैं परमेश्वर का पुत्र हूं”।
44 इसी प्रकार डाकू भी जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे उस की निन्दा करते थे॥
45 दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अन्धेरा छाया रहा।
46 तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, एली, एली, लमा शबक्तनी अर्थात हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?
47 जो वहां खड़े थे, उन में से कितनों ने यह सुनकर कहा, वह तो एलिय्याह को पुकारता है।
48 उन में से एक तुरन्त दौड़ा, और स्पंज लेकर सिरके में डुबोया, और सरकण्डे पर रखकर उसे चुसाया।
49 औरों ने कहा, रह जाओ, देखें, एलिय्याह उसे बचाने आता है कि नहीं।
50 तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्लाकर प्राण छोड़ दिए।
51 और देखो मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट कर दो टुकड़े हो गया: और धरती डोल गई और चटानें तड़क गईं।
52 और कब्रें खुल गईं; और सोए हुए पवित्र लोगों की बहुत लोथें जी उठीं।
53 और उसके जी उठने के बाद वे कब्रों में से निकलकर पवित्र नगर में गए, और बहुतों को दिखाई दिए।
54 तब सूबेदार और जो उसके साथ यीशु का पहरा दे रहे थे, भुईंडोल और जो कुछ हुआ था, देखकर अत्यन्त डर गए, और कहा, सचमुच “यह परमेश्वर का पुत्र था”।
55 वहां बहुत सी स्त्रियां जो गलील से यीशु की सेवा करती हुईं उसके साथ आईं थीं, दूर से यह देख रही थीं।
56 उन में मरियम मगदलीली और याकूब और योसेस की माता मरियम और जब्दी के पुत्रों की माता थीं।                                                         

मत्ती 27:27-56

इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह की मौत के लम्हों पर कई मकामों में ज़लज़लों के आने, चट्टानों के तड़ख़ने, और क़ब्रों के खुलने का बयान करती है जबकि सूरा अज़–ज़ल्ज़लह भी इन्हीं बैटन का ज़िकर करता है (सूरा 99 – ज़ल्ज़लह)

 जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगीऔर ज़मीन अपने अन्दर के बोझे (मादनयात मुर्दे वग़ैरह) निकाल डालेगीऔर एक इन्सान कहेगा कि उसको क्या हो गया हैउस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगीक्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसको हुक्म दिया होगाउस दिन लोग गिरोह गिरोह (अपनी कब्रों से) निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देखे                                                        

सूरा अज़ – ज़ल्ज़लह 99:1—6

सूरा अज़–ज़ल्ज़लह इन्साफ़ के दिन (क़यामत के दिन) का इस्तेमाल करता है I हज़रत ईसा अल मसीह की मौत पर सूरा अज़ — ज़लज़ला के वाक़ियात का मुताबिक़ होना एक निशानी बतोर है कि उनकी मौत उस आने वाले इन्साफ़ के दिन के लिए एक बहुत ही ज़रूरी क़ीमत थी I     

उसके पहलू को ‘छेदा गया’

युहन्ना की इनजील मस्लूबियत के दौरान एक गुरवीदा किये जाने की तफ़सील को बयान करती है I वह बयान करती है :

  31 और इसलिये कि वह तैयारी का दिन था, यहूदियों ने पीलातुस से बिनती की कि उन की टांगे तोड़ दी जाएं और वे उतारे जाएं ताकि सब्त के दिन वे क्रूसों पर न रहें, क्योंकि वह सब्त का दिन बड़ा दिन था।
32 सो सिपाहियों ने आकर पहिले की टांगें तोड़ीं तब दूसरे की भी, जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे।
33 परन्तु जब यीशु के पास आकर देखा कि वह मर चुका है, तो उस की टांगें न तोड़ीं।
34 परन्तु सिपाहियों में से एक ने बरछे से उसका पंजर बेधा और उस में से तुरन्त लोहू और पानी निकला।
35 जिस ने यह देखा, उसी ने गवाही दी है, और उस की गवाही सच्ची है; और वह जानता है, कि सच कहता है कि तुम भी विश्वास करो।
36 ये बातें इसलिये हुईं कि पवित्र शास्त्र की यह बात पूरी हो कि उस की कोई हड्डी तोड़ी न जाएगी।
37 फिर एक और स्थान पर यह लिखा है, कि जिसे उन्होंने बेधा है, उस पर दृष्टि करेंगे॥

युहन्ना19:31-37

युहन्ना ने रोमी सिपाहियों को ईसा अल मसीह के पहलू पर नेज़े से छेदते हुए देखा था जिस से पानी और खून पह्लू से बहने लगा था, जो इस बात का इशारा करता है कि ईसा नबी की मौत दिल की धड़कन रुकने के सबब से हुई थी I

इंजील शरीफ उस दिन के एक ख़ास वाक़िये का बयान करती है – यानी कि उन के बदन का दफ़नाया जाना I   

  57 जब सांझ हुई तो यूसुफ नाम अरिमतियाह का एक धनी मनुष्य जो आप ही यीशु का चेला था आया: उस ने पीलातुस के पास जाकर यीशु की लोथ मांगी।
58 इस पर पीलातुस ने दे देने की आज्ञा दी।
59 यूसुफ ने लोथ को लेकर उसे उज्ज़वल चादर में लपेटा।
60 और उसे अपनी नई कब्र में रखा, जो उस ने चट्टान में खुदवाई थी, और कब्र के द्वार पर बड़ा पत्थर लुढ़काकर चला गया।
61 और मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम वहां कब्र के साम्हने बैठी थीं॥

मत्ती 27:57-61

दिन 6 – मुबारक जुम्मा

यहूदी कैलंडर के हिसाब से उनका हरेक दिन गुरूबे आफ़ताब से शुरू होता है I सो हफ़्ते का वह छटटा दिन ईसा नबी के अपने शागिरदों के साथ पाक अशा में शरीक होने के साथ शुरू हुआ I मगर दिन के ख़त्म होने पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया, कई मर्तबा मुक़द्दमे में लेजाया गया, सलीब दी गयी, उनके पहलू पर नेज़े से छेदा गया, और उन्हें दफ़नाया गया I इस दिन को अक्सर ‘मुबारक जुम्मा’ के नाम से हवाला दिया जाता है I मगर यह वाक़ियात एक सवाल ले आता है कि : एक पकड़वाए जाने का दिन, सताए जाने और एक नबी की मौत को क्या कभी ‘अच्छा’ या ‘मुबारक’ बतोर क़रार दिया जा सकता है? यह क्यूँ मुबारक या अच्छा जुम्मा है , और खराब जुम्मा क्यूं नहीं है ?

यह एक बड़ा सवाल है जिसे हम इंजील के बयानात को अगले दिनों में जारी रखते हुए जवाब दे सकते हैं , मगर तारीखी वक़्त की लकीर में एक सबूत पाया जाता है वह यह है कि अगर हम गौर करते हैं कि यह जुम्मे का दिन निसान महीने की 14 तारीख़ को पड़ता है और उसी दिन फ़सह का दिन भी है जिस दिन यहूदियों ने मिस्र में 1500 साल पहले मिस्र की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए हर ख़ानदान के हिसाब से एक बर्रे को ज़बह किया था I                   

दिन 6–जुम्मा – ईसा अल मसीह की जिंदगी के आखरी हफ़्ते को तौरात शरीफ़ की तंज़ीम ओ तरतीब से मवाज़िना किया गया है

कई एक आदमियों की ज़िन्दगी का बयान उनकी मौत पर ख़त्म होता है, मगर इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह की कहानी को जरी रखती है ताकि हम समझ सकें कि यह दिन एक मुबारक जुम्मा  बतोर कभी सोचा जा सकता है I उसका दूसरा दिन सबत का दिन था – दिन 7 .    

मगर इस से पहले आइये हम सूरा अल – जुम्मा की तरफ़ वापस जाएं उस आयत को जारी रखते हुए जिसे हम ने पढ़ा था I 

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मौत जिससे तुम लोग भागते हो वह तो ज़रूर तुम्हारे सामने आएगी फिर तुम पोशीदा और ज़ाहिर के जानने वाले (ख़ुदा) की तरफ लौटा दिए जाओगे फिर जो कुछ भी तुम करते थे वह तुम्हें बता देगाऐ ईमानदारों जब जुमा का दिन नमाज़ (जुमा) के लिए अज़ान दी जाए तो ख़ुदा की याद (नमाज़) की तरफ दौड़ पड़ो और (ख़रीद) व फरोख्त छोड़ दो अगर तुम समझते हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है

सूरए जुमुअह62:8-9

नबी हज़रत ईसा अल मसीह सूरह अल –जुम्मा की छटटी और सातवें आयत को चुनौती बतोर लेते हुए मौत से नहीं भागे थे, मगर दुआ के साथ शुरू करते हुए इस बड़े इम्तिहान का सामना किया,यह साबित करने के लिए कि  वह ‘खुदा के एक दोस्त’ हैं I तो फिर क्या यह उनकी दिलेरी की याददाश्त नहीं है कि बाद में मुस्लिम्स ने जुम्मे को मस्जिद में नमाज़ के लिए अलग कर किया ? इस बतोर अल्लाह नहीं चाहता कि हम नबी की ख़िदमत गुज़ारी को भूल जाएं I

दिन 5 – शैतान नीचे उतरता है कि मसीह को मारे

नबी ईसा अल मसीह अपनी ज़िन्दगी के आख़री हफ़ते के चौथे दिन अपने ज़मीन पर लौटने के निशानात की बाबत नबुवत की थी I इंजील शरीफ़ फिर बयान करता कि किस तरह मज़हबी रहनुमा उन्हें गिरफ़्तार करना चाहते थे I शैतान (या इबलीस)ने यह तरीक़ा इस्तेमाल किया कि नबी को मारे – वह उनका ठहराया हुआ दुशमन है I यहाँ देखें कि इंजील में इसको किस तरह बयान किया गया है I     .

  खमीरी रोटी का पर्व्व जो फसह कहलाता है, निकट था।
2 और महायाजक और शास्त्री इस बात की खोज में थे कि उस को क्योंकर मार डालें, पर वे लोगों से डरते थे॥
3 और शैतान यहूदा में समाया, जो इस्करियोती कहलाता और बारह चेलों में गिना जाता था।
4 उस ने जाकर महायाजकों और पहरूओं के सरदारों के साथ बातचीत की, कि उस को किस प्रकार उन के हाथ पकड़वाए।
5 वे आनन्दित हुए, और उसे रूपये देने का वचन दिया।
6 उस ने मान लिया, और अवसर ढूंढ़ने लगा, कि बिना उपद्रव के उसे उन के हाथ पकड़वा दे॥                                                                                  

लूका 22:1-6

हम देखते हैं कि शैतान ने पूरा फ़ाइदा उठाया कि यहूदा इसकरयूत में समाए ताकि नबी को पकड़वाए I यह हमको हैरतज़दह नहीं करना चाहिए I सूरा फ़तीर (सूरा 35 – मोजिद) और सूरा या – सीन (सूरा 36 – यासीन) शैतान की बाबत इस तरह कहता है कि :      

 बेशक शैतान तुम्हारा दुश्मन है तो तुम भी उसे अपना दुशमन बनाए रहो वह तो अपने गिरोह को बस इसलिए बुलाता है कि वह लोग (सब के सब) जहन्नुमी बन जाएँ

सूरा फ़तीर 35:6

“बेशक शैतान तुम्हारा दुशमन है सो तुम भी (उसकी मुखालफ़त की शक्ल में) उसे दुशमन ही बनाए रखो I वह तो अपने गिरोह को इसलिए बुलाता है कि वह दोज़खियों में शामिल हो जाएँ I”    

 ऐ आदम की औलाद क्या मैंने तुम्हारे पास ये हुक्म नहीं भेजा था कि (ख़बरदार) शैतान की परसतिश न करना वह यक़ीनी तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन हैऔर ये कि (देखो) सिर्फ मेरी इबादत करना यही (नजात की) सीधी राह हैऔर (बावजूद इसके) उसने तुममें से बहुतेरों को गुमराह कर छोड़ा तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते थे

सूरा यासीन 36:60-62

इंजील शरीफ़ के आख़िर में शैतान को रोया में बयान किया गया है I

  7 फिर स्वर्ग पर लड़ाई हुई, मीकाईल और उसके स्वर्गदूत अजगर से लड़ने को निकले, और अजगर ओर उसके दूत उस से लड़े।
8 परन्तु प्रबल न हुए, और स्वर्ग में उन के लिये फिर जगह न रही।
9 और वह बड़ा अजगर अर्थात वही पुराना सांप, जो इब्लीस और शैतान कहलाता है, और सारे संसार का भरमाने वाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया; और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए।

मुकाशफ़ा12:7-9

शैतान आप का भी ठहराया हुआ दुश्मन है जिसको एक ज़बरदस्त अशधा बतोर तसव्वुर किया गया है I वह इतना अययार (धूर्त) है कि पूरी दुनया को वरग़ला कर सही रास्ते से दूर ले जा सकता है I इस दुश्मन को हज़रत आदम के साथ बागे अदन में इस बतोर नबुवत किया गया था कि वह बुरे कामों को ही अंजाम देगा I सो उसने यहूदा इसकरयूत को अपने क़ाबू में लिया कि नबी ईसा अल मसीह को बर्बाद करे I जिसे इंजील इस तरह बयान करती है कि :     

  16 और वह उसी समय से उसे पकड़वाने का अवसर ढूंढ़ने लगा॥

मत्ती  26:16

दूसरे दिन – दिन 6 – फ़सह की ईद थी जेओ जेओ नबी हज़रत मूसा ने उस ज़माने के हिसाब से 1500 साल पहले शुरू किया था I किस शैतान यहूदा इसकरयूत के ज़रिये इस मुक़द्दस दिन में अपने मोक़े का फ़ाइदा उठाएगा इसे हम अगली तहरीर में देखेंगे I  

दिन 5 का खुलासा

वक़्त की लकीर बताती है कि उस हफ़्ते के पांचवें दिन वह बड़ा अज़धा शैतान हरकत में आया कि उसके सबसे बड़े दुश्मन – नबी हज़रत ईसा अल मसीह को मारे –

शैतान बड़ा अज़धा यहूदा इसकरयूत में समाता है ताकि नबी हज़रत ईसा अल मसीह को मारे I

अल-अक्सा स्थान, रॉक स्थान का गुंबद, इसा अल मसिह भगवान का मेमना, भगवान का मेमना क्या है, चट्टान का गुंबद इतना महत्वपूर्ण क्यों है

अंजीर का पेड़ और तारों में कौनसी चीज़ यकसां (मुश्तरिक) है ?यह दोनों बड़े वाक़िआत की निशानियाँ हैं और जो लोग तय्यार नहीं हैं उनके लिए चितौनियाँ हैं I सूरा अत-तीन इससे शुरू होता है:  

इन्जीर और ज़ैतून की क़सम

सूरा अत – तीन 95:1

इन्जीर और ज़ैतून की क़सम

इज़हार करते हैं आने का 

 कि हमने इन्सान बहुत अच्छे कैड़े का पैदा कियाफिर हमने उसे (बूढ़ा करके रफ्ता रफ्ता) पस्त से पस्त हालत की तरफ फेर दिया()

सूरा अत –तीन 95 :4-5

कि हमने इन्सान बहुत अच्छे कैड़े का पैदा किया
फिर हमने उसे (बूढ़ा करके रफ़्ता रफ़्ता) पस्त से पस्त हालत की तरफ फेर दिया

सूरा अल – मुरसलात (इख़राज), सूरा अत – तक्वीर (ख़ात्मा करना),और सूरा अल इनफ़ितार (चिमटना) लगातार बयान करते हैं कि तारे बे – नूर हो जाएंगे और यह निशानियाँ किसी बड़े चीज़ के आने की है :      

फिर जब तारों की चमक जाती रहेगीऔर जब आसमान फट जाएगाऔर जब पहाड़ (रूई की तरह) उड़े उड़े फिरेंगे  

सूरा अल-मुरसलात77:8-10

फिर जब तारों की चमक जाती रहेगी
और जब आसमान फट जाएगा
और जब पहाड़ (रूई की तरह) उड़े उड़े फिरेंगे

जिस वक्त आफ़ताब की चादर को लपेट लिया जाएगाऔर जिस वक्त तारे गिर पडेग़ेंऔर जब पहाड़ चलाए जाएंगें

सूरा अत–तक्वीर81:1-3

जिस वक़्त आफ़ताब की चादर को लपेट लिया जाएगा
और जिस वक़्त तारे गिर पड़ेगा
और जब पहाड़ चलाए जाएँगे

जब आसमान तर्ख़ जाएगाऔर जब तारे झड़ पड़ेंगेऔर जब दरिया बह (कर एक दूसरे से मिल) जाएँगे

सूरा अल–इन्फ़ितार82:1-3

जब आसमान तखऱ् जाएगा
और जब तारे झड़ पड़ेंगे
और जब दरिया बह (कर एक दूसरे से मिल) जाएँगे

इन सब का क्या मतलब है ? नबी हज़रत ईसा अल मसीह अपने आख़री हफ़्ते में इन बातों को समझाते हैं I सब से पहले इसकी एक फ़ौरी नज़रे सानी :     

नबी दानिएल और ज़करियाह इन दोनों की नबुवत के मुताबिक़ निसान महीने की 9 तारीख़ को इतवार के दिन येरूशलेम में दाख़िल होने के बाद, और फिर निसान 10 तारीख़ को पीर के दिन मक्दिस में दाख़िल होने के बाद हज़रात मूसा की तौरात के तंज़ीम ओ तरतीब के मुताबिक नबी को अल्लाह का बर्रा बतोर चुन लिया जन ज़रूरी था, नबी हज़रत ईसा अल मसीह यहूदी रहनुमाओं के ज़रिये रद्द कर दिए गए I दर असल जब वह नाक्दिस की सफाई कर रहे थे तभी से उन्हों ने साज़िश करना शुरू कर दिया था कि उनको कैसे हालाक किया जाए I इंजील शरीफ़ बयान करती है इसके आगे हज़रात ईसा अल मसीह ने क्या किया:       

अंजीर के दरख़्त पर लानत भेजना

17 तब वह उन्हें छोड़कर नगर के बाहर बैतनिय्याह को गया, ओर वहां रात बिताई॥
18 भोर को जब वह नगर को लौट रहा था, तो उसे भूख लगी।
19 और अंजीर का एक पेड़ सड़क के किनारे देखकर वह उसके पास गया, और पत्तों को छोड़ उस में और कुछ न पाकर उस से कहा, अब से तुझ में फिर कभी फल न लगे; और अंजीर का पेड़ तुरन्त सुख गया।

मत्ती 21:17–19

बहुत से लोग ताज्जुब करते हैं कि हज़रात ईसा अल मसीह ने अंजीर के दरख़त को क्यूँ मुरझा दिया I इंजील शरीफ बराहे रास्त इसको नहीं समझाती I मगर पुराने नबी हमें इसे समझने में हमारी मदद कर सकते हैं I यह नबी जब आने वाले अदालत के दिन की बाबत ख़बरदार करते हैं तो अक्सर अंजीर के दरख़्त के मुरझाने की तमसील पेश करते हैं I गौर करें कि अंजीर के दरख़्त के मुरझाने की तमसील पहले के नबियों ने चितौनी देने के लिए किस् तरह इस्तेमाल किया :

  12 दाखलता सूख गई, और अंजीर का वृक्ष कुम्हला गया है। अनार, ताड़, सेव, वरन मैदान के सब वृक्ष सूख गए हैं; और मनुष्यों का हर्ष जाता रहा है॥

योएल 1:12

9 मैं ने तुम को लूह और गेरूई से मारा है; और जब तुम्हारी वाटिकाएं और दाख की बारियां, और अंजीर और जलपाई के वृक्ष बहुत हो गए, तब टिड्डियां उन्हें खा गईं; तौभी तुम मेरी ओर फिरकर न आए, यहोवा की यही वाणी है॥

आमोस 4:9

19 क्या अब तक बीच खत्ते में है? अब तक दाखलता और अंजीर और अनार और जलपाई के वृक्ष नहीं फले, परन्तु आज के दिन से मैं तुम को आशीष देता रहूंगा॥

हज्जी 2:19

4 आकाश के सारे गण जाते रहेंगे और आकाश कागज की नाईं लपेटा जाएगा। और जैसे दाखलता वा अंजीर के वृक्ष के पत्ते मुर्झाकर गिर जाते हैं, वैसे ही उसके सारे गण धुंधले हो कर जाते रहेंगे॥

यसायाह 34:4

13 यहोवा की सह भी वाणी है, मैं उन सभों का अन्त कर दूंगा। न तो उनकी दाखलताओं में दाख पाई जाएंगी, और न अंजीर के वृक्षों में अंजीर वरन उनके पत्ते भी सूख जाएंगे, और जो कुछ मैं ने उन्हें दिया है वह उनके पास से जाता रहेगा।

यरम्याह 8:13

नबी हज़रत होसियाह इससे आगे गए, अंजीर के दरख़्त को इस्राईल की एक मिसाल देकर और उनपर लानत भेजते हुए :  

10 मैं ने इस्राएल को ऐसा पाया जैसे कोई जंगल में दाख पाए; और तुम्हारे पुरखाओं पर ऐसे दृष्टि की जैसे अंजीर के पहिले फलों पर दृष्टि की जाती है। परन्तु उन्होंने पोर के बाल के पास जा कर अपने तईं लज्जा का कारण होने के लिये अर्पण कर दिया, और जिस पर मोहित हो गए थे, वे उसी के समान घिनौने हो गए।
11 एप्रैम का वैभव पक्षी की नाईं उड़ जाएगा; न तो किसी का जन्म होगा, न किसी को गर्भ रहेगा, और न कोई स्त्री गर्भवती होगी!
12 चाहे वे अपने लड़के-बालों का पालन-पोषण कर बड़े भी करें, तौभी मैं उन्हें यहां तक निर्वंश करूंगा कि कोई भी न बचेगा। जब मैं उन से दूर हो जाऊंगा, तब उन पर हाय!
13 जैसा मैं ने सोर को देखा, वैसा एप्रैम को भी मनभाऊ स्थान में बसा हुआ देखा; तौभी उसे अपने लड़के-बालों को घातक के साम्हने ले जाना पड़ेगा।
14 हे यहोवा, उन को दण्ड दे! तू क्या देगा? यह, कि उनकी स्त्रियों के गर्भ गिर जाएं, और स्थान सूखे रहें॥
15 उनकी सारी बुराई गिल्गाल में है; वहीं मैं ने उन से घृणा की। उनके बुरे कामों के कारण मैं उन को अपने घर से निकाल दूंगा। और उन से फिर प्रीति न रखूंगा, क्योंकि उनके सब हाकिम बलवा करने वाले हैं।
16 एप्रैम मारा हुआ है, उनकी जड़ सूख गई, उन में फल न लगेगा। और चाहे उनकी स्त्रियां बच्चे भी न जनें तौभी मैं उनके जन्मे हुए दुलारों को मार डालूंगा॥
17 मेरा परमेश्वर उन को निकम्मा ठहराएगा, क्योंकि उन्होंने उसकी नहीं सुनी। वे अन्यजातियों के बीच मारे मारे फिरेंगे॥

होसियाह 9:10-12,16-17;नोट करें एफ़राइम=इस्राईल

यह लानतें पूरी हुईं थीं जब पहली बार 586 में येरुशलेम को बर्बाद किया गया था (यहूदियों की तारीख के लिए यहाँ पर देखें)I जब हज़रत ईसा अल मसीह ने अंजीर के दरख़्त पर लानत भेजी, तो उसने अलामती तोर से येरूशलेम की एक दूसरी बरबादी के लिए और यहूदियों के अपने मुल्क से बाहर उनकी जिलावतनी की नबुवत कर रहा था I

अनजीर के दरख़्त को लानत देने के बाद, हज़रत ईसा अल मसीह मकदिस की तरफ़ आगे बढ़ते हैं और वहां लोगों को तालीम देते और यहूदी रहनुमाओं से बहस करते हैं I उन्हों ने अल्लाह की अदालत की बाबत कई एक चितावनियाँ दीं I इंजीले मुक़द्दस इन तालीमात को तफ़सील से बयान करती है जो पूरे तौर से यहाँ पर दर्ज है I         

नबी ईसा अपनी दूसरी आमद की निशानियों की पेश बीनी करते हैं 

तब नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने येरूशलेम में पाए जाने वाले यहूदियों की मक़दिस की तबाही एक तारीक नबुवत के साथ अपनी तालीम ख़तम की I उन दिनों में यह मक़दिस पूरे रोमी सल्तनत में सब से ज़ियादा मुतास्सिर करने वाली ईमारत थी I मगर इंजील उसकी बर्बादी को मसीह के दूर अनदेशी के ज़रिये पहले से देखने की बाबत बयान करती है I उनकी इस पेश बीनी ने उनके ज़मीन पर वापस लौटने के बहस को शुरू किया I जिस का ख़ास मुद्दा था उनके लौटने के निशानात I इंजील शरीफ़ उनकी तालीमात बयान करती है I

3 यहूदा से फिरिस, और यहूदा और तामार से जोरह उत्पन्न हुए; और फिरिस से हिस्रोन उत्पन्न हुआ, और हिस्रोन से एराम उत्पन्न हुआ।

मत्ती 24:1-3

नबी ने यहूदियों के मक़दिस की पूरी बरबादी की बाबत पेश्बीनी करने के ज़रिये अपनी तालीम शुरू की I तारीख़ के वसीले से हम जानते हैं कि 70 ईस्वी में यह वाक़िया गुज़रा I और फिर शाम को[i] हज़रात मसीह मक्दिस से निकलकर जैतून के पहाड़ पर गए जो येरूशलेम शहर से बाहर है I जबकि यहूदियों का दिन सूरज के गुरूब होने से शुरू होता है अब हज़रत मसीह के लिए हफ्ते के चौथे दिन की शुरुआत थी, दिन बुधवार था और निसान महीने का12वां दिन था, जब उन्हों ने उनके सवालात का जवाब दे दिया और ज़माने के आखीर दिनों की बाबत तालीम दी अपनी दूसरी आमद के बारे में बताया I     

4 यीशु ने उन को उत्तर दिया, सावधान रहो! कोई तुम्हें न भरमाने पाए।
5 क्योंकि बहुत से ऐसे होंगे जो मेरे नाम से आकर कहेंगे, कि मैं मसीह हूं: और बहुतों को भरमाएंगे।
6 तुम लड़ाइयों और लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे; देखो घबरा न जाना क्योंकि इन का होना अवश्य है, परन्तु उस समय अन्त न होगा।
7 क्योंकि जाति पर जाति, और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और जगह जगह अकाल पड़ेंगे, और भुईंडोल होंगे।
8 ये सब बातें पीड़ाओं का आरम्भ होंगी।
9 तब वे क्लेश दिलाने के लिये तुम्हें पकड़वाएंगे, और तुम्हें मार डालेंगे और मेरे नाम के कारण सब जातियों के लोग तुम से बैर रखेंगे।
10 तब बहुतेरे ठोकर खाएंगे, और एक दूसरे से बैर रखेंगे।
11 और बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बहुतों को भरमाएंगे।
12 और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।
13 परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा।
14 और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा॥
15 सो जब तुम उस उजाड़ने वाली घृणित वस्तु को जिस की चर्चा दानिय्येल भविष्यद्वक्ता के द्वारा हुई थी, पवित्र स्थान में खड़ी हुई देखो, (जो पढ़े, वह समझे )।
16 तब जो यहूदिया में हों वे पहाड़ों पर भाग जाएं।
17 जो को ठे पर हों, वह अपने घर में से सामान लेने को न उतरे।
18 और जो खेत में हों, वह अपना कपड़ा लेने को पीछे न लौटे।
19 उन दिनों में जो गर्भवती और दूध पिलाती होंगी, उन के लिये हाय, हाय।
20 और प्रार्थना किया करो; कि तुम्हें जाड़े में या सब्त के दिन भागना न पड़े।
21 क्योंकि उस समय ऐसा भारी क्लेश होगा, जैसा जगत के आरम्भ से न अब तक हुआ, और न कभी होगा।
22 और यदि वे दिन घटाए न जाते, तो कोई प्राणी न बचता; परन्तु चुने हुओं के कारण वे दिन घटाए जाएंगे।
23 उस समय यदि कोई तुम से कहे, कि देखो, मसीह यहां हैं! या वहां है तो प्रतीति न करना।
24 क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिन्ह और अद्भुत काम दिखाएंगे, कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें।
25 देखो, मैं ने पहिले से तुम से यह सब कुछ कह दिया है।
26 इसलिये यदि वे तुम से कहें, देखो, वह जंगल में है, तो बाहर न निकल जाना; देखो, वह को ठिरयों में हैं, तो प्रतीति न करना।
27 क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्चिम तक चमकती जाती है, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा।
28 जहां लोथ हो, वहीं गिद्ध इकट्ठे होंगे॥
29 उन दिनों के क्लेश के बाद तुरन्त सूर्य अन्धियारा हो जाएगा, और चान्द का प्रकाश जाता रहेगा, और तारे आकाश से गिर पड़ेंगे और आकाश की शक्तियां हिलाई जाएंगी।
30 तब मनुष्य के पुत्र का चिन्ह आकाश में दिखाई देगा, और तब पृथ्वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे; और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ और ऐश्वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे।
31 और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने दूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठे करेंगे।

मत्ती 24:4-31

यहाँ नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने पीछे होने वाले मक्दिस की बरबादी की तरफ़ देखा I उसने तालीम दी कि मक्दिस की बरबादी ज़माने से लेकर उसके ज़मीं पर लौटने तक उसने आगाह किया कि दुनया में बुराइयाँ बढेंगी, ज़लज़ले आयेंगे, आकाल पड़ेंगे, जंग होगी, और उसके शागिर्दों को सताया जाएगा I यहाँ तक कि उन्हों ने यह भी पेश बीनी की कि ‘ख़ुशख़बरी (इंजील) की मनादी दुनया के कोने कोने में की जाएगी’(आयत-14) I जब दुनया मसीह की बाबत मालूम करलेगी झूठे नबी और झूठे मसीह होने का दावा करने वाले उठ खड़े होंगे जंगों के बीच उनके वापस लौटने की अफ़वाहें कि मसीह यहाँ है या वहाँ है हर किसी को परेशान करेगी I अफ़रा तफ़री का माहोल होगा क्यूंकि सूरज चाँद सितारे तरीक हो जाएंगे I

हम अपनी आँखों से जंग का नज़ारे देखेंगे मुसीबतें और ज़लज़ले बढ़ते ही जायेंगे I यही आसार होंगे जो उसके लौटने को (दूसरी आमद को) क़रीब ले आएगी I ऐसा लगता है कि उनके लौटने का वक़्त बहुत नज़दीक है I मगर अभी तक आसमानी क़ुव्वतें हिलाई नहीं जा रही हैं – इसका मतलब यह है उस के आने में अभी देरी है I पर हमें यह भी सोचना है कि हम कितने क़रीब हैं I इस सवाल का जवाब देन के लिए हज़रात ईसा अल मसीह ने अपनी तालीम को जारी रखा :            

32 अंजीर के पेड़ से यह दृष्टान्त सीखो: जब उस की डाली को मल हो जाती और पत्ते निकलने लगते हैं, तो तुम जान लेते हो, कि ग्रीष्म काल निकट है।
33 इसी रीति से जब तुम इन सब बातों को देखो, तो जान लो, कि वह निकट है, वरन द्वार ही पर है।
34 मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक ये सब बातें पूरी न हो लें, तब तक यह पीढ़ी जाती न रहेगी।
35 आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी।

मत्ती 24:32-35

अंजीर के दरख़्त को याद रखें, जो इस्राईल की अलामत है, जिसको हज़रत मसीह ने लानत भेजी थी और वह एक दिन पहले सूख गया था I जब मक़दिस को 70 ईस्वी में बर्बाद कर दिया गया था उसके बाद इस्राईल का मुरझाया जाना एक हज़ार साल तक जारी रहा नबी ने हम से कहा कि जब अंजीर के दरख्तों—से हरी शाखे और पत्तियां फूटने लगें तब हम मालूम करेंगे कि वक़्त ‘नज़दीक’ है I पिछले 70 सालों में हम सब ने गवाही दी है कि हरा होने लगा है और इसमें कोंपलें निकलने लगी हैं यह इस्राईल के मौजूदा नए जन्म से शुरू हुआ था और जब से की वापस आने लगे दरख़्त का फलना जारी रहा I मतलब यह कि इस्राईल ने फिर से आबपाशी और खेती करना शुरू करदिया है I जी हाँ, इसको हमारे वक़तों में बहुतों के लिए जंगों, मुसीबतों  और तकलीफों से जोड़ दिया गया है मगर यह हमारे लिए हैरत की बात नहीं होनी चाहिए क्यूंकि नबी ने इसकी बाबत अपनी तालीम में ख़बरदार कर दिया है I कई तरीक़े से देखा जाए तो इस ‘दरख़्त’ में अभी भी एक तरह से मुरदगी छाई हुई है मगर अंजीर के दरख़्त के पत्ते हरे हों लगे हैं I

इसलिए हमारे अपने दिनों में हमको बहुत होशियार और खबरदार होने की ज़रुरत है जबकि हज़रात मसीह ने चितौनी दी है कि उनकी दूसरी आमद के मामले में ला परवाह और ग़ैर जानिबदार न हों I        

 

36 उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत, और न पुत्र, परन्तु केवल पिता।
37 जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा।
38 क्योंकि जैसे जल-प्रलय से पहिले के दिनों में, जिस दिन तक कि नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उन में ब्याह शादी होती थी।
39 और जब तक जल-प्रलय आकर उन सब को बहा न ले गया, तब तक उन को कुछ भी मालूम न पड़ा; वैसे ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा।
40 उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा।
41 दो स्त्रियां चक्की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी, और दूसरी छोड़ दी जाएगी।
42 इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा प्रभु किस दिन आएगा।
43 परन्तु यह जान लो कि यदि घर का स्वामी जानता होता कि चोर किस पहर आएगा, तो जागता रहता; और अपने घर में सेंध लगने न देता।
44 इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।
45 सो वह विश्वासयोग्य और बुद्धिमान दास कौन है, जिसे स्वामी ने अपने नौकर चाकरों पर सरदार ठहराया, कि समय पर उन्हें भोजन दे?
46 धन्य है, वह दास, जिसे उसका स्वामी आकर ऐसा की करते पाए।
47 मैं तुम से सच कहता हूं; वह उसे अपनी सारी संपत्ति पर सरदार ठहराएगा।
48 परन्तु यदि वह दुष्ट दास सोचने लगे, कि मेरे स्वामी के आने में देर है।
49 और अपने साथी दासों को पीटने लगे, और पियक्कड़ों के साथ खाए पीए।
50 तो उस दास का स्वामी ऐसे दिन आएगा, जब वह उस की बाट न जोहता हो।
51 और ऐसी घड़ी कि वह न जानता हो, और उसे भारी ताड़ना देकर, उसका भाग कपटियों के साथ ठहराएगा: वहां रोना और दांत पीसना होगा॥

मत्ती 24:36-51

इंजील शरीफ़ हज़रत ईसा अल मसीह ने अपनी दूसरी आमद की बाबत तालीम देना जारी रखा जिसके लिए राबता यहाँ पर है I 

दिन 3 और दिन 4 का ख़ुलासा

मौजूदा तारीख़ में लाने वाली वक़्त की लकीर बताती है कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने हफते के तीसरे दिन मंगल को यहूदी रहनुमाओं के साथ एक लाबी बहस से पहले अंजीर के दरख़्त पर लानत भेजी I यह इस्राईल के नबुवती अलामती तोर का अमल था I फिर दिन 4 बुध को उन्हों ने अपनी दूसरी आमद के निशानात का बयान किया – वह निशानात हैं तमाम फ़ल्की अज्साम (नय्यरों) का सबसे बड़े पैमाने पर तारीक होजाना I   

दिन 3 और 4 को हज़रत ईसा अल मसीह के आखरी हफ़्ते के निशानात तौरात शरीफ़ की तनज़ीम ओ तरतीब मवाज़िना किया गया है I

फिर उन्हों ने हम सबको ख़बरदार किया कि चौकसी के साथ उसकी दूसरी आमद के लिए होशियार रहें I जबकि अब हम देख सकते हैं कि अंजीर का दरख़्त फिर से हरा भरा होने लगा है, इसलिए हम होशियार और खबरदार रहें I

इंजील शरीफ़ बयान करती है कि किसतरह शैतान (इब्लीस) नबी हज़रात मसीह के खिलाफ दिन 5 को हरकत में आया (चाल चला) जिसे हम अगली तहरीर में देखेंगे I     


[i]उस हफ़्ते की हरेक बात के बयान को लूका की किताब में खुलासा किया गया है कि :

  37 और वह दिन को मन्दिर में उपदेश करता था; और रात को बाहर जाकर जैतून नाम पहाड़ पर रहा करता था।

लूक़ा 21:37

दिन 2: हज़रत ईसा अल मसीह चुन लिये गए– जहां अल –अकसा और मौजूदा गुमबदुल सखरा हैं

येरूशलेम में अल–अक़सा के वह मक़ामात (अल मसजिदुल अक़सा या बैतुल मुक़द्दस) और पत्थर का गुम्बद (गुम्बदुल सख़रा) क्यूँ ज़ियादा अहमियत रखते हैं ? इसलिए कि कई एक मुक़द्दस वाक़िआत वहाँ पर वाके हुए मगर कुछ के बारे में जानें जो नबी हज़रत ईसा अल मसीह के साथ इन मुक़द्दस मक़ामात में वाक़े हुए I    

येरूशलेम में नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने जिन चुनौतियों का सामना किया उन्हें बेहतर तरीक़े से समझने के लिए हमको नबी हज़रत मोहम्मद सल्लम के चुनौतियों के साथ मवाज़िना करना होगा जिनका उन्हों ने मक्का में सामना किया था I सूरा अल – फ़तेह (सूरा 48 – जीत हासिल करना) क़ुरेश की बाबत कहता है जो काबा के पहुँच की हिफाज़त करते थे I

वह वही तो है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चा दीन देकर भेजा ताकि उसको तमाम दीनों पर ग़ालिब रखे और गवाही के लिए तो बस ख़ुदा ही काफ़ी है 

सूरा अल–फ़तेह 48:25

ये वही लोग तो हैं जिन्होने कुफ़्र किया और तुमको मस्जिदुल हराम (में जाने) से रोका और क़ुरबानी के जानवरों को भी (न आने दिया) कि वह अपनी (मुक़र्रर) जगह (में) पहुँचने से रूके रहे और अगर कुछ ऐसे ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें न होती जिनसे तुम वाकि़फ न थे कि तुम उनको (लड़ाई में कुफ़्फ़ार के साथ) पामाल कर डालते पस तुमको उनकी तरफ़ से बेख़बरी में नुकसान पहँच जाता (तो उसी वक़्त तुमको फतेह हुयी मगर ताख़ीर) इसलिए (हुयी) कि ख़ुदा जिसे चाहे अपनी रहमत में दाखि़ल करे और अगर वह (ईमानदार कुफ़्फ़ार से) अलग हो जाते तो उनमें से जो लोग काफि़र थे हम उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ज़रूर सज़ा देते

कुरेशियों ने मुक़द्दस मस्जिद और मक्का में ज़बह के मक़ाम से हज़रत मोहम्मद (सल्लम) और उनके पैरुओं की मज़ाहिमत की I येरूशलेम में मुक़द्दस हैकल और कुर्बानगाह के मक़ाम पर भी ऐसा ही कुछ हज़रत ईसा अल मसीह के साथ हो रहा था I मज़हबी रहनुमाओं ने हैकल के अन्दर क़ुरबानी के जानवर खरीदने और बेचने का एक निज़ाम चलाया था और जो दूर मुमालिक से परिसतार आते थे उनके सिक्काजात बदलने के लिए सर्राफ़ों की दुकानें लगवाई थी I हैकल में खुदा की सच्ची इबादत के लिए यह मज़हिमत का सबब बन रहा था I मगर हैकल की तामीर इसलिए की गयी थी कि ग़ैर क़ौमों के दरमियान (यहोवा) ख़ुदावंद को जाना जा सके – उसको ग़ैर क़ौमों से छिपाना नहीं था I हज़रत ईसा हालात को क़ाबू करने आगे बढ़े जिसका नतीजा ग़ैर क़ौमों के आगे चुनौती का सामना करना साबित हुआ जिसको सूरा तग़ाबुन (सूरा 64 —मुश्तारिका वहम दूर करना)       

नबी हज़रत ईसा अल मसीह सदियों साल पहले नबुवत किये जाने के ऐन दिन में खुद को मसीह बतोर ज़ाहिर करते हुए और क़ौमों के लिए एक रौशनी होने बतोर येरूशलेम में दाखिल हुए थे I वह दिन यहूदियों के कैलंडर में इतवार का दिन, निसान 9, मुक़द्दस हफ़ते का पहला दिन था I तौरात के तंज़ीम ओ तरतीब के मुताबिक़ अगला दिन निसान की दसवें तारीख़ थी, जो कि यहूदियों के कैलंडर में एक खास दिन होता है I बहुत पहले तौरात शरीफ में हज़रात मूसा ने लिखा कि फ़िरोन के ख़िलाफ़ दस वबाओं की तय्यारी की जाए I यह अल्लाह की जानिब से था I       

र यहोवा ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा,
2 कि यह महीना तुम लोगों के लिये आरम्भ का ठहरे; अर्थात वर्ष का पहिला महीना यही ठहरे।
3 इस्राएल की सारी मण्डली से इस प्रकार कहो, कि इसी महीने के दसवें दिन को तुम अपने अपने पितरों के घरानों के अनुसार, घराने पीछे एक एक मेम्ना ले रखो।

ख़ुरूज12:1-3

उन दिनों में निसान का महीना यहूदी साल का पहला महिना हुआ करता था I सो हर साल निसान की 10 तारीक़ को मूसा नबी के हुक्म के मुताबिक़ हरेक यहूदी ख़ानदान आने वाली फ़सह की ईद के लिए एक बर्रे का चुनाव करता था – यह सिर्फ़ उसी दिन ही किया जा सकता था I नबी हज़रत ईसा अल मसीह के दिनों में यहूदी लोग येरूशलेम में अपने हैकल में फ़सह के बर्रों का चुनाव करते थे I उसी मक़ाम पर जहां 2000 साल पहले नबी हज़रत इबराहीम ने ईमान की जांच बतोर अपने बेटे की क़ुरबानी दी थी I आज इस मक़ाम पर  मस्जिदुल — अक़सा और गुम्बदुल — सख़रा की इमारतें हैं I सो इन खास मक़ामों पर जहाँ यह दोनों इमारतें हैं और जहां यहूदियों की हैकल है नबी हज़रात ईसा अल मसीह के ज़माने में यहूदी साल के एक ख़ास दिन पर (निसान 10) को, यहूदी लोग अपने हर एक खानदान के लिए फ़सह का एक बर्रा चुनते थे (और ग़रीब ख़ा नदान अपने लिए एक जोड़ा फ़ाख़ते का चुनाव करते थे) I जिसतरह आप तसव्वुर कर सकते थे , लोगों की एक बहुत बड़ी तादाद, बहुत सारे जानवर, लेन देन का शोर शराबा, बाहरी सिक्कों का तबादला (इसलिए की कई एक यहूदी दीगर जगहों से आए थे) वह निसान की 10 तारीख़ हैकल को एक आरज़ी दीवानगी का बाज़ार बना रहे थे I इंजील शरीफ़ बयान करती है कि ऐसे हालात में उस दिन नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने क्या किया I जब इबारत ‘दुसरे दिन’ का हवाला पेश करता है तो यह उनकी येरूशलेम में शाही दाख़िले का अगला था, निसान की 10वें तारीख़—वह मुनासिब दिन होता है जब फ़सह के बर्रों को मंदिर के बाहर चुना जाता है I                                  

11 और वह यरूशलेम पहुंचकर मन्दिर में आया, और चारों ओर सब वस्तुओं को देखकर बारहों के साथ बैतनिय्याह गया क्योंकि सांझ हो गई थी॥
12 दूसरे दिन जब वे बैतनिय्याह से निकले तो उस को भूख लगी।
13 और वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया, कि क्या जाने उस में कुछ पाए: पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था।
14 इस पर उस ने उस से कहा अब से कोई तेरा फल कभी न खाए। और उसके चेले सुन रहे थे।
15 फिर वे यरूशलेम में आए, और वह मन्दिर में गया; और वहां जो लेन-देन कर रहे थे उन्हें बाहर निकालने लगा, और सर्राफों के पीढ़े और कबूतर के बेचने वालों की चौकियां उलट दीं।
16 और मन्दिर में से होकर किसी को बरतन लेकर आने जाने न दिया।
17 और उपदेश करके उन से कहा, क्या यह नहीं लिखा है, कि मेरा घर सब जातियों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा? पर तुम ने इसे डाकुओं की खोह बना दी है।

मरकुस11:11-17

इंसानी मेयार पर होने के नाते नबी हज़रत ईसा अल मसीह पीर के दिन मंदिर में गए (मुक़द्दस हफ़्ते का दिन 2), नासां की 10 तारीख़ के साथ व्यापारी सरगर्मियां ख़त्म हुईं I ख़रीद ओ फ़रोख्त ने आसमानी दुआ बंदगी के लिए रुकावट पैदा करदी थी ख़ासकर उनके लिए जो ग़ैर मुल्क से आए थे I नबी हज़रात ईसा अल् मसीह  इन क़ौमों के लिए एक रौशनी थे I सो उन्हों ने व्यापारी सरगर्मी रोकने के ज़रिये आसमान और ज़मीं के बीच की रुकावट को तोड़ डाला I मगर उसी वक़्त कुछ ग़ैर मुई चीज़ भी वाक़े हुई I इसको हम उस लक़ब से समझ सकते हैं जो नबी हज़रत यहया ने ईसा अल मसीह को दिया था I लोगों से मुख़ातब होकर हज़रत यहया ने कहा था कि :

  29 दूसरे दिन उस ने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप उठा ले जाता है।

युहन्ना1:29

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ‘खुदा का बर्रा’ थे I हज़रत इबराहीम की क़ुरबानी में, वह अल्लाह था जिस ने हज़रत इब्राहीम के लिए उन के बेटे की जगह पर क़ुरबानी के लिए मेंढे को चुना जिसका सींग झाड़ी में अटका हुआ था I इसी की याद में तो हर साल मौजूदा ज़माने में भी ईदुल — अज़हा मनाया जाता है I जिस जगह पर अल्लाह ने मेंढे को चुना था — यह वही मक़ाम है जहाँ आज मस्जिदुल — अक़सा और गुम्बदुल—सख़रा की इमारतें हैं I जब नबी हज़रात ईसा अल मसीह निसान की 10 वें तारीख को हैकल में दाखिल हुए तो अल्लाह ने उनको फ़सह का बर्रा बतोर चुन लिया था I ठीक उसी दिन उन्हें हैकल के अन्दर मौजूद होना ज़रूरी था ताकि वह अल्लाह के ज़रिये चुने जाएं –और वह वहाँ मौजूद थे :      

फ़सह का बर्रा बतोर ईसा अल मसीह का मक़सद

फ़साह का बर्रा बतोर क्या चीज़ चुनी गयी थी? हज़रात ईसा की तालीम जवाब पेश करती है I जब उसने कहा ‘मेरा घर तमाम क़ौमों के लिए दुआ का घर कहलाएगा’ वह यसायाह नबी का हवाला दे रहे थे I जो कुछ नबी ने कहा उसकी पूरी इबारत दी गयी है (जिसे लाल रंग में दिया गया है) I     

  6 परदेशी भी जो यहोवा के साथ इस इच्छा से मिले हुए हैं कि उसकी सेवा टहल करें और यहोवा के नाम से प्रीति रखें और उसके दास हो जाएं, जितने विश्रामदिन को अपवित्र करने से बचे रहते और मेरी वाचा को पालते हैं,
7 उन को मैं अपने पवित्र पर्वत पर ले आकर अपने प्रार्थना के भवन में आनन्दित करूंगा; उनके होमबलि और मेलबलि मेरी वेदी पर ग्रहण किए जाएंगे; क्योंकि मेरा भवन सब देशों के लोगों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा।

यसायाह 56: 6-7
ज़बूर में कुछ अन्य नबियों के साथ पैगंबर यशायाह (PBUH) की ऐतिहासिक समयरेखा

वह ‘मुक़द्दस पहाड़’ जो यसायाह नबी ने लिखा था वह ‘मोरियाह पहाड़’ था, जहां हज़रत इब्राहीम ने मेंढे की क़ुरबानी दी थी जिसको अल्लाह ने उनके बेटे की जगह पर चुना था I ‘दुआ का घर’ वही मक्दिस (मंदिर) था जिसमें निसान की 10 तारीख़ को दाख़िल हुए थे I यहूदियों के लिए मक़ाम –ए- ईद और तारीक़ हज़रत इब्राहीम की क़ुरबानी और हज़रत मूसा के फ़सह के साथ जुड़ा हुआ है I किसी तरह सिर्फ़ यहूदी लोग मक्दिस में क़ुरबानी दे सकते और फ़सह मना सकते थे I मगर य्सायाह नबी ने लिखा है कि ‘ग़ैर मुल्की लोग’(ग़ैर यहूदी) ‘एक दिन अपने सोख़तनी क़ुरबानियों और दीगर कुरबानियों को देखेंगे और उन्हें क़बूल किया जाएगा’ Iयसायाह नबी का यही हवाला देते हुए हज़रात ईसा ने इश्तिहार दिया कि उसके काम ग़ैर यहूदियों के लिए राइज करके क़बूल किया जाएगा I हज़रात इसा ने यह नहीं समझाया कि वह इस मामले को कैसे अंजाम देंगे I मगर जब हम इन बयानात को जारी रखते हैं तो हाँ सीखेंगे यहाँ तक कि हम पहचानेंगे कि अल्लाह के पास आपको और मुझे बरकत देने के लिए मंसूबा है I        

मुक़द्दस हफ़्ते के अगले दिनों में

निसान की 10 तारीख़ को यहूदियों के अपने बर्रे चुने जाने के बाद, तौरात की तंज़ीम ओ तरतीब के मुताबिक़ उन्हें हुक्म दिया गया था कि :   

  6 और इस महीने के चौदहवें दिन तक उसे रख छोड़ना, और उस दिन गोधूलि के समय इस्राएल की सारी मण्डली के लोग उसे बलि करें।

ख़ुरूज12:6

नबी हज़रत मूसा के पहले फ़सह के बाद यहूदियों ने हर साल निसान के 14 तारीक को फ़सह के बर्रों की क़ुरबानी देने लगे थे I हम बर्रों की देख रेख को और उनकी क़ुरबानी को हफ़्ते के लिए तौरात की तंजीम ओ तरतीब में जोड़ते हैं I वक़्त की लकीर के नीचे के आधे हिस्से में हम हफ़्ते के दुसरे दिन के लिए हज़रत ईसा नबी की सरगर्मियों को जोड़ते हैं – उसकी मक्दिस की सफ़ाई और अल्लाह का फ़सह का बर्रा बतोर उसका चुना जाना I  

पीर के दिन — (दिन2) — नबी हज़रात ईसा अल मसीह की सरगर्मियां तौरात की तंजीम ओ तरतीब से मवाज़िना किया गया 

जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह दाख़िल हुए थे और मक़दिस की सफ़ाई करी थी तो यहभी इंसानी मेयार पर असर छोडती थी I इंजील शरीफ का बयान जारी है :

18 यह सुनकर महायाजक और शास्त्री उसके नाश करने का अवसर ढूंढ़ने लगे; क्योंकि उस से डरते थे, इसलिये कि सब लोग उसके उपदेश से चकित होते थे॥

मरकुस11:18

मकदिस की सफ़ाई के सबब से यहूदी रहनुमाओं को बहाना मिला कि नबी को हलाक करने का निशाना बनेI    

अब उन्हों ने नबी का सामना करना शुरू किया I इंजील शरीफ़ बयां करती है कि दुसरे दिन —–

27 वे फिर यरूशलेम में आए, और जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो महायाजक और शास्त्री और पुरिनए उसके पास आकर पूछने लगे।
28 कि तू ये काम किस अधिकार से करता है? और यह अधिकार तुझे किस ने दिया है कि तू ये काम करे?

मरकुस 11:27-28

सूरा अत – तग़ाबुन हमको याद दिलाता है कि इस तरह की चुनौतियां उन दिनों में नबी को दिया जाता था  

 क्या तुम्हें उनकी ख़बर नहीं पहुँची जिन्होंने (तुम से) पहले कुफ़्र किया तो उन्होने अपने काम की सज़ा का (दुनिया में) मज़ा चखा और (आख़िरत में तो) उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैये इस वजह से कि उनके पास पैग़म्बर वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके थे तो कहने लगे कि क्या आदमी हमारे हादी बनेंगें ग़रज़ ये लोग काफ़िर हो बैठे और मुँह फेर बैठे और ख़ुदा ने भी (उनकी) परवाह न की और ख़ुदा तो बे परवा सज़ावारे हम्द हैकाफ़िरों का ख्याल ये है कि ये लोग दोबारा न उठाए जाएँगे (ऐ रसूल) तुम कह दो वहाँ अपने परवरदिगार की क़सम तुम ज़रूर उठाए जाओगे फिर जो जो काम तुम करते रहे वह तुम्हें बता देगा और ये तो ख़ुदा पर आसान है

सूरा अत – तग़ाबुन 64 : 5 -7

क्या तुम्हें उनकी ख़बर नहीं पहुँची जिन्होंने (तुम से) पहले कुफ्ऱ किया तो उन्होने अपने काम की सज़ा का (दुनिया में) मज़ा चखा और (आखि़रत में तो) उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।
ये इस वजह से कि उनके पास पैग़म्बर वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके थे तो कहने लगे कि क्या आदमी हमारे हादी बनेंगें ग़रज़ ये लोग काफि़र हो बैठे और मुँह फेर बैठे और ख़ुदा ने भी (उनकी) परवाह न की और ख़ुदा तो बे परवा सज़ावारे हम्द है।
काफि़रों का ख़्याल ये है कि ये लोग दोबारा न उठाए जाएँगे (ऐ रसूल) तुम कह दो वहाँ अपने परवरदिगार की क़सम तुम ज़रूर उठाए जाओगे फिर जो जो काम तुम करते रहे वह तुम्हें बता देगा और ये तो ख़ुदा पर आसान है।

हज़रत ईसा अल मसीह को अपने इख़तियार का सबूत पेश करना बहुत मुश्किल इम्तिहान था, एक यह कि ग़ैर ईमानदार लोग लगातार नबी को चुनौतियाँ दे रहे थे जिस तरह सूरा तग़ाबुन में ज़िकर पाया जाता है I यह एक साफ़ निशानी होगा जो यह बताता है कि वह महज़ इंसानी इखतियार को अमल में नहीं ला रहे थे I जिस तरह सूरा अत–तगाबुन सफ़ाई पेश करता है कि इम्तिहान मुर्दे को जिलाए जाने से होना चाहिए था I मगर इस से पहले कुछ और वाक़िआत इस किस्मत भरे हफ़्ते में ज़ाहिर होना ज़रूरी था I      

हम आगे देखते हैं कि इख्तियार वाले नबी के खिलाफ़ किसतरह साज़िशें करते है I नबी के काम और तौरात से तंज़ीम ओ तरतीब एह साथ वाक़े होते हैं जब हम तीसरे और चौथे दिन के वाक़िआत पर नज़र करते हैं, आगे      

दिन 1 : ईसा अल मसीह – क़ौमों के लिए रौशनी

ईसा अल मसीह का खजूरी इतवार के दिन येरूशलेम में दाखिला उसके आखरी हफ़्ते में शुरू हुआ I सूरा अल अंबिया (सूरा 21 – अंबिया लोग) हमसे कहता है :  

और (ऐ रसूल) उस बीबी को (याद करो) जिसने अपनी अज़मत की हिफाज़त की तो हमने उन (के पेट) में अपनी तरफ से रूह फूँक दी और उनको और उनके बेटे (ईसा) को सारे जहाँन के वास्ते (अपनी क़ुदरत की) निशानी बनाया

रा अल – अंबिया 21:91

सूरा अल अंबिया साफ़ कहता है कि अल्लाह ने हज़रात ईसा अल मसीह को तमाम लोगों के लिए एक निशान  बनाया,न सिर्फ़ कुछ लोगों यानी मसीहियों या यहूदियों के लिए I नबी हज़रात ईसा अल मसीह किसतरह हम सब के लिए एक निशान बने ? अल्लाह की दुन्या की तख्लीक़ तमाम लोगों के लिए आलमगीर है I इसलिए इस आखरी हफ़ते के हरेक दिन में हज़रात ईसा अल मसीह ने बात की और इस बतोर किरदार निभाया जो पीछे छे दिनों की तखलीक़ की तरफ़ इशारा कर रहा था I (कुरान शरीफ और तौरात शरीफ़ सिखाते हैं कि अल्लाह ने हरेक चीज़ की तख़लीक़ छे दिनों में की)      

हम हज़रात ईसा अल मसीह के आखरी हफ्ते के हर एक दिन से होकर चलते हुए शुरू करते हैं इस बात पर गौर करते हुए कि उनकी तमाम तालीमात और किरदार तखलीक की तरफ़ इशारा करते हुए निशानात हैं I यह बतायेगा कि इस हफ़्ते के हर एक दिन के वाक़िआत अल्लाह के ज़रिये बहुत पहले वक़्त से ही ठहराए गए थे – किसी इंसान के ख़याल के ज़रिये नहीं जबकि इंसान उन वाक़िआत को तरतीब नहीं दे सकता जो हज़ारों सालों से जुदा किया गया हो I हम इतवार से शुरू करते हैं – दिन एक        

दिन एक – अन्धेरे में रौशनी

सूरा अन – नूर (सूरा 24 – रौशनी) ‘रौशनी’ की तमसील पेश करता है I वह बयान करता है :

ख़ुदा तो सारे आसमान और ज़मीन का नूर है उसके नूर की मिसल (ऐसी) है जैसे एक ताक़ (सीना) है जिसमे एक रौशन चिराग़ (इल्मे शरीयत) हो और चिराग़ एक शीशे की क़न्दील (दिल) में हो (और) क़न्दील (अपनी तड़प में) गोया एक जगमगाता हुआ रौशन सितारा (वह चिराग़) जैतून के मुबारक दरख्त (के तेल) से रौशन किया जाए जो न पूरब की तरफ हो और न पश्चिम की तरफ (बल्कि बीचों बीच मैदान में) उसका तेल (ऐसा) शफ्फाफ हो कि अगरचे आग उसे छुए भी नही ताहम ऐसा मालूम हो कि आप ही आप रौशन हो जाएगा (ग़रज़ एक नूर नहीं बल्कि) नूर आला नूर (नूर की नूर पर जोत पड़ रही है) ख़ुदा अपने नूर की तरफ जिसे चाहता है हिदायत करता है और ख़ुदा तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ है

सूरा अन – नूर 24:35

यह तमसील पीछे पहले दिन की तख्लीक़ का हवाला पेश करता है जब अल्लाह ने रौशनी बनाई I तौरात शरीफ बयान करता है:  

अल्लाह ने पहले दिन की तखलीक में तारीकी को दूर करने के लिए रौशनी के वजूद की बात की I एक निशानी बतोर यह बताने के लिए कि उस घड़ी के वाक़िआत उस पहले दिन की तखलीक़ से ही तजवीज़ ओ तदबीर में लाया जा चूका था I हज़रत मसीह ने खुद को रौशनी कहा जो तारीकी को दूर करती है I     

पैदाइश 1:3-6

रौशनी ग़ैर क़ौमों में चमकती है 

नबी हज़रत ईसा अल मसीह अभी अभी गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाखिल हुए थे जिस तरह नबी ज़क रियाह ने 500 साल पहले नबुवत की थी ऐसा किया जाना बिलकुल वैसा ही था जिसको हज़रात दानिएल ने भी 550 साल पहले बारे नबुवत की थी I उन दिनों क्यूंकि फ़सह की ईद बहुत करीब थी और यहूदी हज करने वाले कई एक मुल्कों से येरूशलेम आरहे थे और लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी (जिसतरह हज्ज के दौरान मक्का में होता है) I चुनांचि नबी हज़रत मसीह का पहुंचना यहूदियों के बीच एक हलचल का सबब बन गया था I मगर यह सिरफ़ यहूदी नहीं थे जिन्हें हजरत ईसा अल मसीह के पहुँचने की इतला हुई थी I बल्कि इंजील शरीफ बयान करती है कि उनके यरूशलेम में पहुँचने के फ़ौरन बाद कुआ कुछ वाक़िया हुआ I           

  20 जो लोग उस पर्व में भजन करने आए थे उन में से कई यूनानी थे।
21 उन्होंने गलील के बैतसैदा के रहने वाले फिलेप्पुस के पास आकर उस से बिनती की, कि श्रीमान् हम यीशु से भेंट करना चाहते हैं।
22 फिलेप्पुस ने आकर अन्द्रियास से कहा; तब अन्द्रियास और फिलेप्पुस ने यीशु से कहा।

युहन्ना 12:20—22

नबी हज़रात मसीह के ज़माने में यूनानियों और यहूदियों के दरमियान रोक जंगला या (मुदाफ़िअत)

यूनानियों (ग़ैर क़ौम या ग़ैर यहूदियों) के लिए यह निहायतही ग़ैर मामूली था कि किसी यहूदी तेह्वार में हाज़िर हो I उस ज़माने के यूनानी और रोमी, जबकि बहुत से देवताओं की परस्तिश करते थे,वह यहूदियों के ज़रिये नापाक गिने जाते और दूर रहते थे I और बहुत से यूनानी यहूदी मज़हब को (नादीदा) ख़ुदा और उनके ईदों को बेवक़ूफ़ी ठहराते थे I  उन दिनों में सिर्फ यहूदी एक ख़ुदा को मानने वाले थे I  सो यह लोग लगातार एक दुसरे से दूरी बनाएं रखते थे I जबकि ग़ैर कौम या ग़ैर यहूदी मआशिरा यहूदी मआशिरे से ककी गुना ज़ियादा थे इस के बावजूद भी दीगर क़ौमों से हट कर तनहा जीते थे I उनका फ़रक़ मज़हब,उनका हलाल खान पान, उनका मुस्तस्ना (मख़सूस) नबियों की किताबें यह साड़ी चीज़ें यहूदियों और ग़ैर क़ौमों के बीच एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ एक दुसरे के मुख़ालिफ़ाना अंदाज़ में मुदाफ़िअत पैदा करते थे I      

मौजूदा ज़माने में बहुत से खुदाओं को मानने वालों और बुतपरस्ती को दुन्या के अक्सर लोगों के ज़रिये इनकार किया जाता है, नबी हज़रत मसीह के ज़माने में यह कितना फ़रक़ था इसको हम आसानी से भूल सकते हैं I दर असल हज़रात इबराहीम के ज़माने में तक़रीबन हर कोई जो नबी से दूर था वह कई देवताओं को मानने वाला था I नबी हज़रात मूसा के ज़माने में बनी इस्राईल को छोड़ दीगर तमाम कौमें बुत परस्त थे यहाँ तक कि फ़िरोन खुद ही ख़ुद को खुदा होने का दावा करता था I बनी इसराईल बुत परस्तों के समुन्दर के चारों तरफ़ फैले हुए क़ौमों में वाहिद खुदा को मानने वाला एक छोटा सा टापू था I मगर नबी हज़रात यसायाह जो (750 क़ब्ल मसीह) में थे उन्हें इजाज़त दी गयी थी की मुस्तक़बिल को देखे और उन्हों ने इन तमाम क़ौमों के लिए एक बदलाव को देखा I उन्हों ने लिखा था :          

  द्वीपो, मेरी और कान लगाकर सुनो; हे दूर दूर के राज्यों के लोगों, ध्यान लगा कर मेरी सुनो! यहोवा ने मुझे गर्भ ही में से बुलाया, जब मैं माता के पेट में था, तब ही उसने मेरा नाम बताया।
2 उसने मेरे मुंह को चोखी तलवार के समान बनाया और अपने हाथ की आड़ में मुझे छिपा रखा; उसने मुझ को चमकिला तीर बनाकर अपने तर्कश में गुप्त रखा।
3 और मुझ से कहा, तू मेरा दास इस्राएल है, मैं तुझ में अपनी महिमा प्रगट करूंगा।
4 तब मैं ने कहा, मैं ने तो व्यर्थ परिश्रम किया, मैं ने व्यर्थ ही अपना बल खो दिया है; तौभी निश्चय मेरा न्याय यहोवा के पास है और मेरे परिश्रम का फल मेरे परमेश्वर के हाथ में है॥
5 और अब यहोवा जिसने मुझे जन्म ही से इसलिये रख कि मैं उसका दास हो कर याकूब को उसकी ओर फेर ले आऊं अर्थात इस्राएल को उसके पास इकट्ठा करूं, क्योंकि यहोवा की दृष्टि में मैं आदरयोग्य हूं और मेरा परमेश्वर मेरा बल है,
6 उसी ने मुझ से यह भी कहा है, यह तो हलकी सी बात है कि तू याकूब के गोत्रों का उद्धार करने और इस्राएल के रक्षित लोगों को लौटा ले आने के लिये मेरा सेवक ठहरे; मैं तुझे अन्यजातियों के लिये ज्योति ठहराऊंगा कि मेरा उद्धार पृथ्वी की एक ओर से दूसरी ओर तक फैल जाए॥  

यसायाह 49:1,5-6

  , प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है, और यहोवा का तेज तेरे ऊपर उदय हुआ है।
2 देख, पृथ्वी पर तो अन्धियारा और राज्य राज्य के लोगों पर घोर अन्धकार छाया हुआ है; परन्तु तेरे ऊपर यहोवा उदय होगा, और उसका तेज तुझ पर प्रगट होगा।
3 और अन्यजातियां तेरे पास प्रकाश के लिये और राजा तेरे आरोहण के प्रताप की ओर आएंगे॥    

यसायाह 60:1-3

सो यसायाह नबी ने पेश बीनी की थी कि आने वाला खुदा का ‘ख़ादिम’, हालाँकि यहूदियत से ताल्लुक़ रखता हुआ (याकूब के क़बीले से होगा) फिर भी वह ‘ग़ैर क़ौमों के लिए रौशनी होगा’(तमाम ग़ैर यहूदियों के लिए) और यह रौशनी दुनया के कोने कोने में पहुँच जाएगी I मगर यहूदियों और ग़ैर क़ौमों के बीच जो सदियों से रहते चले आ रहे थे इस रोक जंगला (रुकावट) के होते हुए कैसे मुमकिन हो सकता था ?

उस दिन जब हज़रत ईसा येरूशलेम में दाख़िल हुए थे रौशनी ने पहली बार ग़ैर क़ौमों को खींचना शुरू किया जब हम देखते हैं कि कुछ लोग नबी की तरफ़ पहुंचे I यहाँ इस यहूदी तेह्वार में कुछ यूनानी थे जो सफ़र करके येरूशलेम पहुंचे थे कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह की बाबत जानना चाहते थे I मगर क्या वह  यहूदियों के ठहराये हलाल हराम का धियान रखते हुए नबी को देखने के क़ाबिल हुए ? उन्हों ने हज़रात इसा के शागिर्दों से पुछा जिन्हों ने नबी के पास दरख़ास्त लेकर आए I उसने क्या कहा होगा ?क्या उस ने इन यूनानियों को इजाज़त दी होगी जो यहूदियत के बारे में थोड़ा बहुत जानते थे? इंजील शरीफ इसको जारी रखता है         

23 इस पर यीशु ने उन से कहा, वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र कि महिमा हो।
24 मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जब तक गेहूं का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है।
25 जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है; और जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है; वह अनन्त जीवन के लिये उस की रक्षा करेगा।
26 यदि कोई मेरी सेवा करे, तो मेरे पीछे हो ले; और जहां मैं हूं वहां मेरा सेवक भी होगा; यदि कोई मेरी सेवा करे, तो पिता उसका आदर करेगा।
27 जब मेरा जी व्याकुल हो रहा है। इसलिये अब मैं क्या कहूं? हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा? परन्तु मैं इसी कारण इस घड़ी को पहुंचा हूं।
28 हे पिता अपने नाम की महिमा कर: तब यह आकाशवाणी हुई, कि मैं ने उस की महिमा की है, और फिर भी करूंगा।
29 तब जो लोग खड़े हुए सुन रहे थे, उन्होंने कहा; कि बादल गरजा, औरों ने कहा, कोई स्वर्गदूत उस से बोला।
30 इस पर यीशु ने कहा, यह शब्द मेरे लिये नहीं परन्तु तुम्हारे लिये आया है।
31 अब इस जगत का न्याय होता है, अब इस जगत का सरदार निकाल दिया जाएगा।
32 और मैं यदि पृथ्वी पर से ऊंचे पर चढ़ाया जाऊंगा, तो सब को अपने पास खीचूंगा।
33 ऐसा कहकर उस ने यह प्रगट कर दिया, कि वह कैसी मृत्यु से मरेगा।
34 इस पर लोगों ने उस से कहा, कि हम ने व्यवस्था की यह बात सुनी है, कि मसीह सर्वदा रहेगा, फिर तू क्यों कहता है, कि मनुष्य के पुत्र को ऊंचे पर चढ़ाया जाना अवश्य है?
35 यह मनुष्य का पुत्र कौन है? यीशु ने उन से कहा, ज्योति अब थोड़ी देर तक तुम्हारे बीच में है, जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है तब तक चले चलो; ऐसा न हो कि अन्धकार तुम्हें आ घेरे; जो अन्धकार में चलता है वह नहीं जानता कि किधर जाता है।
36 जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है, ज्योति पर विश्वास करो कि तुम ज्योति के सन्तान होओ॥ ये बातें कहकर यीशु चला गया और उन से छिपा रहा।
37 और उस ने उन के साम्हने इतने चिन्ह दिखाए, तौभी उन्होंने उस पर विश्वास न किया।
38 ताकि यशायाह भविष्यद्वक्ता का वचन पूरा हो जो उस ने कहा कि हे प्रभु हमारे समाचार की किस ने प्रतीति की है? और प्रभु का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?
39 इस कारण वे विश्वास न कर सके, क्योंकि यशायाह ने फिर भी कहा।
40 कि उस ने उन की आंखें अन्धी, और उन का मन कठोर किया है; कहीं ऐसा न हो, कि आंखों से देखें, और मन से समझें, और फिरें, और मैं उन्हें चंगा करूं।
41 यशायाह ने ये बातें इसलिये कहीं, कि उस ने उस की महिमा देखी; और उस ने उसके विषय में बातें कीं।
42 तौभी सरदारों में से भी बहुतों ने उस पर विश्वास किया, परन्तु फरीसियों के कारण प्रगट में नहीं मानते थे, ऐसा न हो कि आराधनालय में से निकाले जाएं।
43 क्योंकि मनुष्यों की प्रशंसा उन को परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी॥
44 यीशु ने पुकारकर कहा, जो मुझ पर विश्वास करता है, वह मुझ पर नहीं, वरन मेरे भेजने वाले पर विश्वास करता है।
45 और जो मुझे देखता है, वह मेरे भेजने वाले को देखता है।
46 मैं जगत में ज्योति होकर आया हूं ताकि जो कोई मुझ पर विश्वास करे, वह अन्धकार में न रहे।
47 यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता, क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूं।
48 जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उस को दोषी ठहराने वाला तो एक है: अर्थात जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।
49 क्योंकि मैं ने अपनी ओर से बातें नहीं कीं, परन्तु पिता जिस ने मुझे भेजा है उसी ने मुझे आज्ञा दी है, कि क्या क्या कहूं और क्या क्या बोलूं
50 और मैं जानता हूं, कि उस की आज्ञा अनन्त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूं, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूं॥

युहन्ना12: 23–50

इस नाटकीय बदलाव में यहाँ तक कि आसमान से एक आवाज़ को शामिल करते हुए नबी ने कहा कि वह ‘ऊपर को उठा लिया जाएगा’ ताकि वह ‘तमाम लोगों को’ अपनी तरफ़ खींच ले –- न सिर्फ़ यहूदियों को –- बल्कि खुद को भी I बहुत से यहूदी यहाँ तक कि वह जो एक खुदा की इबादत करते थे वह नहीं समझ रहे थे की नबी क्या कह रहे थे I य्सायाह नबी ने उनके बारे में कहा था कि यह उनकी सख्त दिली की वजह से थी –अल्लाह के लिए खुद को मखसूस करने की चाह न रखना यह ख़ास बात थी, जबकि दीगर लोग खौफ़ के सबब से चुप चाप से ईमान ले आए थे I        

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने दिलेरी से दावा किया कि वह ‘दुनया में एक रौशनी की मानिंद आए’(आयत 46)जैसे कि पहले के नबियों ने लिखा था कि वह दुनया के तमाम क़ौमों पर चमकेगा I जिस दिन वह येरूशलेम में दाखिल हुए थे सब से पहले ग़ैर क़ौमों पर रौशनी चमकना शुरू हो गया था I क्या यह रौशनी दीगर तमाम क़ौमों में फैल जाएगी ? नबी हज़रात मसीह ने जब ‘ऊपर उठाए जाने’ की बात कही थी तो इसका क्या मतलब है ? हम इसको पिछले हफ़्ते के बयान के ज़रिये जरी रखेंगे ताकि इन सवालात को समझ सकें I  

ज़ेल का नक़शा इस हफ़ते के हर एक वाक़िये से होकर गुज़रता है I इतवार को जो हफ़्ते का पहला दिन है उन्हों ने तीन फ़रक़ फ़रक़ नबुवतों को पूरा किया जो पहले के तीन नबियों के ज़रिये पेश किये गए थे I पहला जो उन्हों ने गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाखिल हुए थे वह हज़रत ज़करियाह नबुवत की गयी थी I दूसरा, ऐसा उन्हों ने उस दौरान किया जब दानिएल की नबुवत का सिलसिला चल रहा था I तीसरा उनका पैगाम और मोजिज़े ग़ैर क़ौमों के बीच एक दिलचस्पी बतोर चमकना शुरू हुआ I इसकी बाबत नबी यसायाह ने पेशबीनी की थी कि क़ौमों के एक रौशनी चमकेगी और वह दुनया के चारों तरफ़ फैल जाएगी I         

मसाइबे मसीह का हफ़्ता के वाक़िआत – दिन 1 इतवार  

एक चोंका देने वाले तरीक़े से, एक फ़रक़ दुश्मन के लिये, हज़रत ईसा अल मसीह– जिहाद का ऐलान करते हैं

सूरा अत –तौबा (सूरा 9 — तौबा करना , तक़दीरे इलाही) बहस पैदा करता है जबकि यह जिहाद या जिददो जहद की बाबत बहस करता है I यह आयतें जिस्मानी जंग के लिये रहनुमाई करते हैं इसलिए इन आयतों की बाबत कई एक उलमा के ज़रिये फ़रक़ फ़रक़ तर्जुमे पेश किए गए हैं I सूरा अत – तौबा की आयत जो बहस करती है वह है :         

 (मुसलमानों) तुम हलके फुलके (हॅसते) हो या भारी भरकम (मसलह) बहर हाल जब तुमको हुक्म दिया जाए फौरन चल खड़े हो और अपनी जानों से अपने मालों से ख़ुदा की राह में जिहाद करो अगर तुम (कुछ जानते हो तो) समझ लो कि यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मशक़क़त (सख्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़ुदा की क़समें खॉएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं

सूरा अत –तौबा 9: 41 -42

(मुसलमानों) तुम हलके फुलके (हॅसते) हो या भारी भरकम (मसलह) बहर हाल जब तुमको हुक्म दिया जाए फौरन चल खड़े हो और अपनी जानों से अपने मालों से ख़़ुदा की राह में जिहाद करो अगर तुम (कुछ जानते हो तो) समझ लो कि यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है ।
(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मषक़क़त (सख़्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़़ुदा की क़समें खाएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेषक झूठे हैं।

सूरा अत तौबा की 42 आयत में जो मलामत है वह इस लिये कि अगर जंग के लिये सफ़र आसान था तो वह पीछा करेंगे ,मगर जो जिददो जहद करना चाहते हैं वह मुश्किल पड़ने पर गाइब हो जाएंगे I सिलसिलेवार आयतें  उन पैरुओं (मुरीदों) के बहानों और बहस का बयान करते हैं जो बे दिल थे I सूरा अत –तौबा फिर इस याद दाश्त को पेश करता है I

(ऐ रसूल) तुम मुनाफिकों से कह दो कि तुम तो हमारे वास्ते (फतेह या शहादत) दो भलाइयों में से एक के ख्वाह मख्वाह मुन्तज़िर ही हो और हम तुम्हारे वास्ते उसके मुन्तज़िर हैं कि ख़ुदा तुम पर (ख़ास) अपने ही से कोई अज़ाब नाज़िल करे या हमारे हाथों से फिर (अच्छा) तुम भी इन्तेज़ार करो हम भी तुम्हारे साथ (साथ) इन्तेज़ार करते हैं

सूरा अत –तौबा 9:52

(ऐ रसूल) तुम मुनाफिकों से कह दो कि तुम तो हमारे वास्ते (फतेह या शहादत) दो भलाइयों में से एक के ख़्वाह मख़्वाह मुन्तजि़र ही हो और हम तुम्हारे वास्ते उसके मुन्तजि़र हैं कि ख़़ुदा तुम पर (ख़ास) अपने ही से कोई अज़ाब नाजि़ल करे या हमारे हाथों से फिर (अच्छा) तुम भी इन्तेज़ार करो हम भी तुम्हारे साथ (साथ) इन्तेज़ार करते हैं।

दो मुमकिन नतीजों की बिना पर आम तोर से मलामत और तंबीह की जाती है : मौत (शहादत) या फ़तेह I पर अगर जब कश्मकश बहुत ज़ियादा बड़ी हो कि दोनों नतीजे सामने आजाएँ – यानी शहादत और फ़तेह दोनों I यह कश्मकश थी नबी हज़रत ईसा अल मसीह की जब उनहों ने येरूशलेम के उस लंबे सफ़र में सामना किया — उनके वहाँ पहुँचने पर नए चाँद या हिलाल के ज़रिये जो नबुवत की गई थी वह ज़बूर के नबियों के ज़रिये सदियों साल पहले की गई थी I       

येरूशलेम में दाखिल होना

सूरा अल – इसरा (सूरा 17— रात का सफ़र) एक जाना पेहचाना सूरा है जबकि वह नबी हज़रत मोहम्मद सल्लम के रात के सफ़र का बयान करता है , जिसमें वह अकेले रात के वक़्त में बुर्राक़ में सवार होकर मक्का पहुंचे थे I                 

वह ख़ुदा (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है जिसने अपने बन्दों को रातों रात मस्जिदुल हराम (ख़ान ऐ काबा) से मस्जिदुल अक़सा (आसमानी मस्जिद) तक की सैर कराई जिसके चौगिर्द हमने हर किस्म की बरकत मुहय्या कर रखी हैं ताकि हम उसको (अपनी कुदरत की) निशानियाँ दिखाए इसमें शक़ नहीं कि (वह सब कुछ) सुनता (और) देखता है

सूरा अल – इसरा 17:1

वह ख़ुदा (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है जिसने अपने बन्दों को रातों रात मस्जिदुल हराम (ख़ान ऐ काबा) से मस्जिदुल अक़सा (आसमानी मस्जिद) तक की सैर कराई जिसके चैगिर्द हमने हर किस्म की बरकत मुहय्या कर रखी हैं ताकि हम उसको (अपनी कुदरत की) निशानियाँ दिखाए इसमें शक नहीं कि (वह सब कुछ) सुनता (और) देखता है

रात के सफ़र की तरह हज़रत ईसा अल मसीह बिलकुल उसी जगह को जा रहे थे I मगर हज़रत ईसा अल मसीह कुछ दूसरा ही मक़सद था I मोजिजे दिखाने के बदले हज़रत ईसा अल मसीह खुद एक मोजिज़ा होने के लिये गए I हज़रत ईसा अल मसीह मोजिज़ों के इज़हार के लिये येरूशलेम में दाखिल हुए I सो वह रात के बदले दिन में सरे आम लोगों के बीच में नज़र आए वह बुर्राक़ के बदले एक गधी पर सवार थे I हालांकि हम नहीं सोच सकते कि उनका गधी पर सवार कर आना बुर्राक़ पर सवार होकर आने जैसा ता’ससुर रखता था , मगर उस दिन हज़रत मसीह का गधीपर सवार होकर येरूशलेम के हैकल में दाखिल होना लोगों के लिये साफ निशानी थी I हम समझाते हैं कि किस तरह I       

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने लजार को मुरदों में से जिलाकर अपनी खिदमत गुज़ारी का इज़हार कर चुके थे और अब उनका सफ़र येरूशलेम (अल कुदुस) कि तरफ था I जिस तरीक़े से वह येरूशलेम में दाखिल हुए थे उसकी नबुवत सदियों साल पहले हो चुकी थी I इंजीले शरीफ़ इसे इस तरह समझाती है :   

12 दूसरे दिन बहुत से लोगों ने जो पर्व में आए थे, यह सुनकर, कि यीशु यरूशलेम में आता है।
13 खजूर की, डालियां लीं, और उस से भेंट करने को निकले, और पुकारने लगे, कि होशाना, धन्य इस्त्राएल का राजा, जो प्रभु के नाम से आता है।
14 जब यीशु को एक गदहे का बच्चा मिला, तो उस पर बैठा।
15 जैसा लिखा है, कि हे सिय्योन की बेटी, मत डर, देख, तेरा राजा गदहे के बच्चा पर चढ़ा हुआ चला आता है।
16 उसके चेले, ये बातें पहिले न समझे थे; परन्तु जब यीशु की महिमा प्रगट हुई, तो उन को स्मरण आया, कि ये बातें उसके विषय में लिखी हुई थीं; और लोगों ने उस से इस प्रकार का व्यवहार किया था।
17 तब भीड़ के लोगों ने जो उस समय उसके साथ थे यह गवाही दी कि उस ने लाजर को कब्र में से बुलाकर, मरे हुओं में से जिलाया था।
18 इसी कारण लोग उस से भेंट करने को आए थे क्योंकि उन्होंने सुना था, कि उस ने यह आश्चर्यकर्म दिखाया है।
19 तब फरीसियों ने आपस में कहा, सोचो तो सही कि तुम से कुछ नहीं बन पड़ता: देखो, संसार उसके पीछे हो चला है॥  

यूहनना 12:12-19

हज़रत ईसा अल मसीह का दाखिल होना – ब क़ौल हज़रत दाऊद था

हज़रत दाऊद से शुरू करते हुए क़दीम यहूदी बादशाह साल में एक बार अपने शाही घोड़े पर सवार होते थे और येरूशलेम में लोगों के एक जुलूस की रहबरी करते थे I हज़रत ईसा अल मसीह ने इस रिवाज को दुहराया और एक गधी पर सवार होकर उस दिन जिसे खजूरी इतवार कहा जाता है येरूशलेम में दाखिल हुआ I लोगों ने ज़बूर शरीफ से ईसा अल मसीह के लिए वही गीत गाया जो उनहों ने हज़रत दाऊद के लिए गाया था :   

25 हे यहोवा, बिनती सुन, उद्धार कर! हे यहोवा, बिनती सुन, सफलता दे!
26 धन्य है वह जो यहोवा के नाम से आता है! हम ने तुम को यहोवा के घर से आशीर्वाद दिया है।
27 यहोवा ईश्वर है, और उसने हम को प्रकाश दिया है। यज्ञपशु को वेदी के सींगों से रस्सियों बान्धो!  

ज़बूर 118:25-27

लोगों ने इस क़दीम गाने को गाया जो बादशाहों के लिए लिखा गाया था क्यूंकि वह जानते थे कि हज़रत ईसा ने लाज़र को मुरदों में से जिलाया था , और इस लिए उसके येरूशलेम में दाखिल होने पर बर – अंगेख्ता थे जिस लफ्ज का वह ना’रा लगा रहे थे , वह था ‘होशा’ना’ जिस के माने हैं ‘हमें बचा’—बिलकुल उसी तरह जिस तरह ज़बूर 118:25 में बहुत पहले लिखा गाया था I वह किस बात से उन्हें बचाने जा रहे थे ? हज़रत ज़करियाह हम से कहते हैं I

इस दाख़िले की बाबत हज़रत ज़करियाह की नबुवत   

हालांकि हज़रत ईसा अल मसीह ने दोबारा से उस रिवाज को वज़ा दी जो पहले के बादशाहों ने सदियों साल पहले अंजाम दी थी इसको उनहों ने फ़रक़ तोर से अंजाम दी I नबी हज़रत ज़करियाह ने जिस मसीह के नाम से आने की नबुवत की थी उनहों ने यह भी नबुवत की कि वह मसीह एक गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाखिल होगा I वक़्त की लकीर ज़करियाह नबी को तारीख़ में दीगर नबियों के साथ दिखाती है जिन्हों ने खजूरी इतवार के वाक़ि आत की पेशबीनी की थी I   

वह अँबिया जिन्हों ने हज़रत ईसा के खजूरी इतवार को येरूशलेम में दाखिल होते हुए पहले से देखा था

नबुवत का वह हिस्सा जो यूहनना की इंजील में (ऊपर नीले रंग की इबारत में) हवाला दिया गाया था I हज़रत ज़करियाह की पूरी नबुवत यहाँ दर्ज की गई है :   

9 हे सिय्योन बहुत ही मगन हो। हे यरूशलेम जयजयकार कर! क्योंकि तेरा राजा तेरे पास आएगा; वह धर्मी और उद्धार पाया हुआ है, वह दीन है, और गदहे पर वरन गदही के बच्चे पर चढ़ा हुआ आएगा।
10 मैं एप्रैम के रथ और यरूशलेम के घोड़े नाश करूंगा; और युद्ध के धनुष तोड़ डाले जाएंगे, और वह अन्यजातियों से शान्ति की बातें कहेगा; वह समुद्र से समुद्र तक और महानद से पृथ्वी के दूर दूर के देशों तक प्रभुता करेगा॥
11 और तू भी सुन, क्योंकि मेरी वाचा के लोहू के कारण, मैं ने तेरे बन्दियों को बिना जल के गड़हे में से उबार लिया है।

ज़करियाह 9:9—11

नबी ज़करियाह के जरिये इस बादशाह की नबुवत की गई थी कि यह दीगर बादशाहों से फ़रक़ होगा I वह ऐसे बादशाहों की तरह नहीं आएगा जो ‘रथों’, ‘जंगी घोड़ों’ , और ‘जंगी तीर कमानों’ का इस्तेमाल करते हों I दर असल यह बादशाह इन औज़ारों को खारिज करेगा बल्कि इस के बदले वह ‘क़ौमों में सलामती की मनादी करेगा’I किसी तरह यह बादशाह अभी भी एक दुश्मन को शिकस्त देने के लिए कशमकश करेगा I उसको जिददो जहद करनी पड़ेगी जिस तरह एक बड़े जिहाद (जंग) में की जाती है I                                                       

यह साफ़ है जब हम दुश्मन को पहचान जाते हैं जिस से इस बादशाह को सामना करना था I हसबे मामूल तरीक़े से ,एक बादशाह का दुश्मन दूसरी क़ौम का मुकाबला करने वाला बादशाह होता है , या दूसरी फ़ौज य ,या उसी के लोगों में से बगावती लोग या फिर वह लोग जो उसके मुखालिफ़ होते हैं I मगर नबी हज़रत ज़करियाह ने लिखा कि बादशाह ‘सलामती की मनादी करते हुए’ एक ‘गधी’ पर ज़ाहिर हुआ था और ‘वह असीरों को अंधे कुएं से निकाल लाने वाला था’ (आयत11) I ‘अंधा कुआं’ या ‘गढ़ा’ इबरानी तोर तरीक़े से क़बर , या मौत का हवाला दिया जाता है बादशाह उन असीरों को आज़ाद करने वाला था , न कि हाकिमों , बिगड़े हुए सियासत दानों को और इन्सानों के बनाए क़ैदियों को बल्कि उन्हें जो मौत के ‘गुलाम’ थे I [1]  

हम लोगों को मौत से बचाने कि बात करते हैं तो हमारा मतलब है किसी उस शख्स को बचाना ताकि उसकी मौत मुल्तवी होजाए I मिसाल के तोर पर हम किसी शख्स को पानी मे डूबने से बचा सकते हैं ,या किसी की जिंदगी बचाने के लिए कोई द्वाई का इंतिज़ाम करते हैं I यह ‘बचाना’ सिर्फ़ मौत को मुल्तवी करना होता है ताकि जो बच गया है वह बाद में मरेगा I मगर हज़रत ज़करियाह लोगों को मौत से बचाने की बाबत नाबूवत नहीं कर रहे थे मगर उन लोगों को बचाने की बाबत जो मौत की क़ैद में थे -– यानी वह लोग जो पहले से ही मरे हुए थे I वह बादशाह जो गधी पर सवार था जिसकी बारे नबुवत हज़रत ज़करियाह ने की थी उसे मौत का सामना करना था और खुद उसको हराना भी था – ताकि वह दूसरों को जो मौत की क़ैद में थे उन्हें आज़ाद कराए I इस के लिए गैर मामूली तोर पर जिददो जहद की ज़रूरत है — एक जंग जो पहले कभी देखि नहीं गई थी I बाइबल के उलमा कभी कभी हमारी बातिनी कश्मकश को एक ‘बड़े जिहाद’ का और बाहरी कश्मकश को ‘कम जिहाद’ का हवाला देते हैं I उस मौत के ‘गढ़े’ का मुक़ाबला करते हुए यह बादशाह इन दोनों कश्मकश या जिहादों से होकर गुज़रेगा I        

अब सवाल यह है कि बादशाह मौत के साथ इस जिहाद या कश्मकश में किन औजारों का इस्तेमाल करेगा ? हज़रत ज़करियाह ने लिखा कि यह बादशाह सिर्फ़ ‘मेरे अहद का खून अपने साथ लेगा’ उसके जंग के लिए उस मौत के गढ़े में I सो उसका अपना ही खून औज़ार साबित होगा जिस से वह मौत का सामना करेगा I   

गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाखिल होने के जरिये हज़रत ईसा ने खुद को यह बादशाह होने का ऐलान किया – मसीह

क्यूँ हज़रत ईसा अल मसीह गम के साथ रोते हैं

खजूरी इतवार के दिन जब हज़रत ईसा अल मसीह येरूशलेम में दाखिल हुए तो इसे (फ़तहमंदाना दाखिला बतोर भी जाना जाता है) मज़हबी रहनुमाओं ने इसका तखालुफ़ किया I लूक़ा की इंजील उनके इस तखालुफ़ के जवाब का बयान करती है I   

41 जब वह निकट आया तो नगर को देखकर उस पर रोया।
42 और कहा, क्या ही भला होता, कि तू; हां, तू ही, इसी दिन में कुशल की बातें जानता, परन्तु अब वे तेरी आंखों से छिप गई हैं।
43 क्योंकि वे दिन तुझ पर आएंगे कि तेरे बैरी मोर्चा बान्धकर तुझे घेर लेंगे, और चारों ओर से तुझे दबाएंगे।
44 और तुझे और तेरे बालकों को जो तुझ में हैं, मिट्टी में मिलाएंगे, और तुझ में पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ेंगे; क्योंकि तू ने वह अवसर जब तुझ पर कृपा दृष्टि की गई न पहिचाना॥

लूक़ा 19:41-44

हज़रत ईसा अल मसीह ने खास तोर से रहनुमाओं से कहा कि ‘इस दिन’ खुदा के आने के वक़्त को पहचाने’ I इस से उन का क्या मतलब था ? लोग किस बात के करने से न काम हुए थे ?

उस ख़ास दिन की बाबत नबियों ने नबुवत की थी

सदियों पहले नबी हज़रत दानिएल ने नबुवत की थी कि मसीह फ़रमान जारी करने के 483 साल बाद आएगा ताकि येरूशलेम की दुबारा से तामीर करे I दानिएल के तवकक्क़ो किये हुए साल का हम ने हिसाब लगाया था तो वह 33  ईसवी होना चाहिए था I जिस साल हज़रात ईसा अल मसीह गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाखिल हुए थे I दाख़िले के साल की पेश्बीनी करते हुएसदियों साल पहले जो वाक़े हुआ वह सच मुच हैरत ज़दा है I मगर उस दिन के लिए वक़्त का हिसाब किया जा सकता है I जिसका हम ने हिसाब लगाया बराए मेहरबानी यहाँ सबसे पहले नज़रे सानी करें I       

दानिएल नबी ने जो 483 साल की पेशबीनी की थी वह मसीह के ज़ाहिर होने से पहले साल के 360 दिन के हिसाब से की थी I उसके मुताबिक़ दिनों की तादाद है :

483 साल *360 दिन /साल के =173880 दिन 

मौजूदा बैनुल अक़वामी केलंडर के हिसाब से 365.2422 दिन /साल यह 476 साल मज़ीद 25 के साथ I (173 880 /365.24219879 = 476 बचा हुआ 25)     

येरूशलेम की बहाली के लिए कब फ़रमान जारी होना था जिस से यह गिनती शुरू हुई थी ? यह दिया हुआ था :

अखोयरस बाशाह के 21वें साल के दौरान निसान के महीने में …

नहेमियाह 2:1

निसान (जो यहूदी केलंडर का एक महिना है) उसके कौनसे दिन यह नहीं दिया गया है, मगर उसकी पहली तारीख का अंदाज़ा लगाया जाता है क्यूंकि वह नए साल का पहला दिन था, एक जश्न के मौके पर नहेमियाह को बादशाह से इजाज़त लेना था I निसान का पहला दिन एक नए चाँद के तरफ़ भी इशारा करता है जबकि महीने चाँद के हिसाब से होते थे (जिसतरह इस्लामी कैलंडर होता है) मुस्लिम रिवायत के तरीके से नए चाँद का मुअय्यन किया जाता है I इसके लिए तीन ईमानदार बुज़ुर्ग लोग चुने जाते हैं जिन्हों ने (हिलाल) यानी नए चाँद को देखा है I मौजूदा इल्मे फ़ल्कियात के ज़रिये से हम जानते हैं कि उस दिन जो नया चाँद निशाँ दिही कर रहा था वह निसान की पहली तारीख़ 444 क़बल मसीह में पहली ज़ाहिरी थी I यह जानना मुश्किल होता है कि देखने वालों के ज़रिये वह पहला चाँद था या दूसरा I अगर दूसरा होगा तो एक दिन देर होजाएगा I फ़ल्कियात के हिसाब से निसान का पहला चाँद फ़ारस के शाहिंशा अखोयरस के 20 वें साल में तय हुआ था जो मौजूदा कैलंडर [2] के हिसाब से 4  मार्च 444 क़ब्ल मसीह को शाम के 10 बजे थे I              

दानिएल के नबुवत के वक़्त से लेकर इस तारीख़ तक 4 या 5 मार्च,33 ईस्वी पड़ता है I (मौजूदा कैलंडर में 1- क़ब्ल मसीह से लेकर1-ईस्वी तक कोई 0 साल नहीं है सो इसका हिसाब है :- 444 +476 +1 =33) दानिएल के नबुवत किये हुए वक़्त के बचे हुए 25 को जोड़ते हुए 33 ईस्वी का 4 या 5 मार्च हमें देता है 33 ईस्वी का 29 या 30 मार्च , जिसतरह से ज़ेल की मिसाल पेश की गयी है I मार्च 29, 33 ईस्वी—इतवार पड़ा था –यानी कि खजूरी इतवार – यही वह दिन था जब हज़रात ईसा अल मसीह, मसीहा का दावा करते हुए गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाख़िल हुए थे I हम यह जानते हैं इसलिए कि उसके बाद का जुमे का दिन फ़सह की ईद थी – और फ़सह हमेशा निसान के महीने की 14 को पड़ता है I 33 ईस्वी में निसान का 14 तारीख 3 अप्रैल था I पांच दिन पहले होने से 3 अप्रैल जुमे का दिन, और खजूरी इतवार था 29 मार्च I        

मार्च 29,33 ईस्वी को गधी पर सवार होकर येरूशलेम में दाखिल होते हुए नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने उस दिन ज़करियाह नबी और दानिएल नबी दोनों की नबुवत को पूरा किया I इसको ज़ेल की तारीख़ी वक़्त की लकीर में मिसाल बतोर पेश किया गया है I   

दानिएल नबी ने मसीह के ज़ाहिर होने के 173880 दिन पहले पेश्बीनी की थी ; नबीनहेमियाह ने वक़्त की शुरुआत की थी I और वह 33 ईस्वी 29 मार्च को ख़त्म हुई जब हज़रात ईसा खजूरी इतवार के दिन येरूशलेम में दाखिल हुए I

ऐसी कई एक नबुवतें एक दिन में पूरी हुईं जो साफ़ निशानियों को बताता है अल्लाह ने मसीह की बाबत अपने मंसूबे को इन्किशाफ़ करने के लिए इस्तेमाल किया I मगर बाद में उसी दिन इसा अल मसीह ने यहाँ तक कि हज़रत मूसा की दूसरी नबुवत को पूरा किया I ऐसा करते हुए उन्हों ने वाक़िआत को तजवीज़ में ले आया ताकि उस ‘गढ़े’ के साथ जो उसका दुश्मन मौत है अपने जिहाद की तरफ़ ले जाए – हम इसे अगली तहरीर में देखते हैं I    


 [1] कुछ मिसालें कि किस्तरह गढ़ा नबियों के लिए मौत का मतलब पेश करता है :

15 परन्तु तू अधोलोक में उस गड़हे की तह तक उतारा जाएगा।

यसायाह 14:15

  18 क्योंकि अधोलोक तेरा धन्यवाद नहीं कर सकता, न मृत्यु तेरी स्तुति कर सकती है; जो कबर में पड़ें वे तेरी सच्चाई की आशा नहीं रख सकते

यसायाह 38:18

  22 निदान वह कबर के निकट पहुंचता है, और उसका जीवन नाश करने वालों के वश में हो जाता है।

अय्यूब 33:22

  8 वे तुझे कबर में उतारेंगे, और तू समुद्र के बीच के मारे हुओं की रीति पर मर जाएगा।

हिज़िक़िएल 28:8

23 उसकी कबरें गड़हे के कोनों में बनी हुई हैं, और उसकी कबर के चारों ओर उसकी सभा है; वे सब के सब जो जीवनलोक में भय उपजाते थे, अब तलवार से मरे पड़े हैं।

हिज़िक़िएल 32:23

  3 हे यहोवा, तू ने मेरा प्राण अधोलोक में से निकाला है, तू ने मुझ को जीवित रखा और कब्र में पड़ने से बचाया है॥

ज़बूर30:3

 [2] क़दीम और मौजूदा कैलन्डरों के बीच तब्दीली के लिए (मिसाल बतोर निसान 1 = 4 मार्च, 444 कबल मसीह) और क़दीम नये चांदों का हिसाब लगाने के लिए मैं डॉ – हेरोल्ड डब्लू होयेनेर जो मसीह की जिंदगी के तारीख़ी वाक़िआ के पहलू के माहिर है ,1977.176pp —उनकी ख़िदमत का इस्तेमाल करता हूँ I