हज़रत ईसा अल मसीह खोये हुओं को …. ढूंढने आते है

सूरा फुस्सिलत (सूरा 41 — तफ़सील से समझाया गया) फैसले के दिन (रोज़े क़यामत) की राह देखता है जब लोग अपने रुतबे के मुताबिक़ कतार मे चलेंगे I उस दिन यहाँ तक कि उनके जिस्म कि खालें उनके खिलाफ में  गवाही देंगीं जब उनसे कहा जाएगा I

  और तुम्हारी इस बदख्याली ने जो तुम अपने परवरदिगार के बारे में रखते थे तुम्हें तबाह कर छोड़ा आख़िर तुम घाटे में रहे

सूरा फ़ुस्सिलत 41:23

और तुम्हारी इस बदख़्याली ने जो तुम अपने परवरदिगार के बारे में रखते थे तुम्हें तबाह कर छोड़ा आखि़र तुम घाटे में रहे।

उनकी आख़री तजवीज़ होगी

 और हमने (गोया ख़ुद शैतान को) उनका हमनशीन मुक़र्रर कर दिया था तो उन्होने उनके अगले पिछले तमाम उमूर उनकी नज़रों में भले कर दिखाए तो जिन्नात और इन्सानो की उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं उनके शुमूल (साथ) में (अज़ाब का) वायदा उनके हक़ में भी पूरा हो कर रहा बेशक ये लोग अपने घाटे के दरपै थे

सूरा फ़ुस्सिलत 41:25

और हमने (गोया ख़ुद शैतान को) उनका हमनशीन मुक़र्रर कर दिया था तो उन्होने उनके अगले पिछले तमाम उमूर उनकी नज़रों में भले कर दिखाए तो जिन्नात और इन्सानो की उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं उनके शुमूल {साथ} में (अज़ाब का) वायदा उनके हक़ में भी पूरा हो कर रहा बेशक ये लोग अपने घाटे के दरपै थे।

यह एक ज़बरदस्त याददाश्त है कि हम में से बहुत से “सरासर तोर से खोए हुए हैं” यहाँ तक कि शायद आप भी I यह एक परेशानी पैदा करती है जिस तरह सूरा अल – मोमिनून (सूरा 23 – ईमानदार लोग) समझाता है I

    फिर जिन (के नेकियों) के पल्लें भारी होगें तो यही लोग कामयाब होंगेऔर जिन (के नेकियों) के पल्लें हल्के होंगे तो यही लोग है जिन्होंने अपना नुक़सान किया कि हमेशा जहन्नुम में रहेंगे

सूरा अल – मोमिनून 23:102–-103

(जहाँ) क़ब्रों से उठाए जाएँगें (रहना होगा) फिर जिस वक़्त सूर फूँका जाएगा तो उस दिन न लोगों में क़राबत दारियाँ रहेगी और न एक दूसरे की बात पूछेंगे। फिर जिन (के नेकियों) के पल्लें भारी होगें तो यही लोग कामयाब होंगे। और जिन (के नेकियों) के पल्लें हल्के होंगें तो यही लोग है जिन्होंने अपना नुक़सान किया कि हमेशा जहन्नुम में रहेंगे।

जिनके नेक कामों का पल्डा भारी और नेक कामों का हल्का होगा डबल्यूएच यक़ीनी तोर से खोए हुए हैं I उनके लिए कोई उम्मीद नहीं है I और सूरा मोमिनून कहता है कि वह यक़ीनन बरबादी मे खो चुके हैं I इस तरह वह लोगों में तक़सीम होकर रह जाएंगे एक वह जो (नजात कि उम्मेद के साथ) मज़हबी (ख़ुदा परस्त) और पाक हैं दूसरे वह लोग जो गैर मज़हबी और नापाक हैं I मगर ईसा अल मसीह खास उन लोगों की मदद करने आए जो न पाक हैं — जो खोए हुए और जहननुमी हैं जिस तरह सूरह फ़ुस्सिलत और सूरह अल मोमिनून में ज़िकर किया गया है I

अक्सर मज़हबी लोग उन लोगों से दूर रहेंगे जो मज़हबी नहीं हैं ताकि वह उन की सोहबत में पड़कर नापाक न हो जाएँ I नबी हज़रत ईसा अल मसीह के जमाने में यह बात शरीअत के उस्तादों के लिए सौ फ़ीसदी सच थी I वह लोग खुदकों नापाक लोगों से दूर रहते थे ताकि वह अपने में पाक ठहर सकें I मगर हज़रत ईसा अल मसीह ने तालीम दी कि पाकीज़गी और सफ़ाई यह हमारे दिलों की बात है I इस तरह से वह उन लोगों के साथ होगा जो रस्मी तोर से साफ़ नहीं थे I यहां पर इंजील -ए- शरीफ़ इन बातों का ज़िकर करती है कि किस तरह हज़रत मसीह गुनहगारों के क़रीब पाए जाते थे I कभी कभी उनका उठना बैठना और खाना खाना उनके साथ होता था और साथ ही शरीअत के उस्तादों का उनकी बाबत क्या तास्सुरात थे I

 ब चुंगी लेने वाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उस की सुनें।
2 और फरीसी और शास्त्री कुड़कुड़ा कर कहने लगे, कि यह तो पापियों से मिलता है और उन के साथ खाता भी है॥

लूक़ा 15 :1-2

तो फिर क्यूँ हज़रत ईसा अल मसीह गुनहगारों के बीच रहने और उनके खानों में शरीक होने के लिए ख़ैर मक़दम किया जाता था ? क्या वह गुनाह से लुत्फ अनदोज़ होता था ? नबी ने अपने नुक्ताचीनी करने वालों को तीन तासीलों का बयान करते हुए जवाब दिया I

खोई हुई भेड़ की तमसील

 3 तब उस ने उन से यह दृष्टान्त कहा।
4 तुम में से कौन है जिस की सौ भेड़ें हों, और उन में से एक खो जाए तो निन्नानवे को जंगल में छोड़कर, उस खोई हुई को जब तक मिल न जाए खोजता न रहे?
5 और जब मिल जाती है, तब वह बड़े आनन्द से उसे कांधे पर उठा लेता है।
6 और घर में आकर मित्रों और पड़ोसियों को इकट्ठे करके कहता है, मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरी खोई हुई भेड़ मिल गई है।
7 मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में भी स्वर्ग में इतना ही आनन्द होगा, जितना कि निन्नानवे ऐसे धमिर्यों के विषय नहीं होता, जिन्हें मन फिराने की आवश्यकता नहीं॥

लूक़ा 15:3 — 7

इस कहानी में नबी हमको भेड़ की मानिंद समझते हैं जबकि वह खुद भेड़ों का चरवाहा बतोर I जिस तरह कोई भी चरवाहा अपनी खोई हुई एक भेड़ की तलाश में निकलता है , उसी तरह वह खुद भी खोए हुए लोगों की तलाश में निकलता है — शायद आप किसी गुनाह में फंस चुके हैं — आपका गुनाह यहाँ तक कि ऐसा पोशीदा है जिसे आप के खानदान के लोगों में से कोई भी नहीं जानता हो I या शायद आपकी जिंदगी के बारे में कोई न जानता हो कि उसमें क्या कुछ परेशानियाँ छिपी हैं जो आप को उलझन में डाल देती और यह एहसास दिलाती है कि आप खो गए हैं I यह कहानी आपको एक नई उम्मीद दिलाती है जिस से आप मालूम कर सकते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह आपको तलाश रहे हैं ताकि आप उसकी नज़र में आजाएँ और आप ककी मदद कर सके I कोई जानी नुखसान जो आपको बर्बाद कर सकता है इस से पहले वह आप को छुड़ाना चाहता है I

फिर उसने दूसरी कहानी काही I

खोए हुए सिक्के की तमसील

 8 या कौन ऐसी स्त्री होगी, जिस के पास दस सिक्के हों, और उन में से एक खो जाए; तो वह दीया बारकर और घर झाड़ बुहार कर जब तक मिल न जाए, जी लगाकर खोजती न रहे?
9 और जब मिल जाता है, तो वह अपने सखियों और पड़ोसिनियों को इकट्ठी करके कहती है, कि मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरा खोया हुआ सिक्का मिल गया है।
10 मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिराने वाले पापी के विषय में परमेश्वर के स्वर्गदूतों के साम्हने आनन्द होता है॥

लूक़ा 15:8-10

इस कहानी में हम क़ीमती पाए जाते हैं मगर हम एक खोए हुए सिक्के की तरह हैं और हज़रत ईसा अल मसीह हैं जो सिक्के की तलाश कर रहे हैं I मगर सितमज़रीफ़ी यह है कि हालांकि सिक्का घर पर ही कहीं खो गया है और वह सिक्का खुद नहीं ‘जानता’ कि वह खो गया है I वह अपने नुखसान का एहसास नहीं करता I यह औरत है जिसे उसके खोने का एहसास है और इस लिए वह पूरे घर पर बड़ी होशियारी के साथ हर एक चीज़ के अंदर पीछे देखते हुए झाड़ू लगाती है Iवह तब तक तसल्ली बख्श नहीं होती जब तक कि उसको वह क़ीमती सिक्का नहीं मिल जाता I शायद आपको खुद को खोने का ‘एहसास’ न हो मगर सच्चाई यह है कि हम में से हर एक को अपने गुनाहों से तौबा करने की ज़रूरत है I अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आप खोए हुए हैं चाहे आप इसे महसूस करें या न करें I नबी हज़रत मसीह की नज़रों में आप कीमती तो हैं मगर खोए हुए सिक्के की तरह है और हज़रत मसीह आप के खो जाने का एहसास करते हैं और एक ऐसा काम आप के लिए करते हैं की आप तौबा करने पर आमादा होजाएँ I

उसकी तीसरी कहानी बहुत ज़बरदस्त थी I

खोये हुए बेटे की तमसील

11 फिर उस ने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।
12 उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी।
13 और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ा दी।
14 जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया।
15 और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पड़ा : उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा।
16 और वह चाहता था, कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था।
17 जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं।
18 मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है।
19 अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।
20 तब वह उठकर, अपने पिता के पास चला: वह अभी दूर ही था, कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा।
21 पुत्र ने उस से कहा; पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है; और अब इस योग्य नहीं रहा, कि तेरा पुत्र कहलाऊं।
22 परन्तु पिता ने अपने दासों से कहा; फट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहिनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां पहिनाओ।
23 और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खांए और आनन्द मनावें।
24 क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है : खो गया था, अब मिल गया है: और वे आनन्द करने लगे।
25 परन्तु उसका जेठा पुत्र खेत में था : और जब वह आते हुए घर के निकट पहुंचा, तो उस ने गाने बजाने और नाचने का शब्द सुना।
26 और उस ने एक दास को बुलाकर पूछा; यह क्या हो रहा है?
27 उस ने उस से कहा, तेरा भाई आया है; और तेरे पिता ने पला हुआ बछड़ा कटवाया है, इसलिये कि उसे भला चंगा पाया है।
28 यह सुनकर वह क्रोध से भर गया, और भीतर जाना न चाहा : परन्तु उसका पिता बाहर आकर उसे मनाने लगा।
29 उस ने पिता को उत्तर दिया, कि देख; मैं इतने वर्ष से तरी सेवा कर रहा हूं, और कभी भी तेरी आज्ञा नहीं टाली, तौभी तू ने मुझे कभी एक बकरी का बच्चा भी न दिया, कि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द करता।
30 परन्तु जब तेरा यह पुत्र, जिस ने तेरी संपत्ति वेश्याओं में उड़ा दी है, आया, तो उसके लिये तू ने पला हुआ बछड़ा कटवाया।
31 उस ने उस से कहा; पुत्र, तू सर्वदा मेरे साथ है; और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा ही है।
32 परन्तु अब आनन्द करना और मगन होना चाहिए क्योंकि यह तेरा भाई मर गया था फिर जी गया है; खो गया था, अब मिल गया है॥

लूक़ा 15 : 11—32

इस कहानी में या तो हम मज़हबी बड़े बेटे की तरह या छोटे बेटे की तरह हैं जो अपने बाप के घर से बहुत दूर चला जाता है I हालांकि बड़ा बेटा तमाम मज़हबी कानून काइदों की तामील करता या उन्हें अंजाम देता है I मगर उसने कभी अपने बाप की दिली दिली महब्बत और शफ़क़त को समझ नहीं पाया था I छोटे बेटे ने सोचा कि मैं अपने घर को छोड़ने के जरिये आज़ादी हासिल कर रहा हूँ मगर वक़्त के गुजरते उसने खुद को एक गुलाम बतोर पाया , भूकों मरने दिया , ज़िल्लत और रुसवाई सहनी पड़ी I फिर ‘वह अपने आपे में आया’ I उसने पहचाना और महसूस किया कि मुझे वापस अपने घर जाना होगा I घर वापस जाना इस बात को ज़ाहिर करेगा कि उसने अपने पहले मक़ाम को छोड़ने में बड़ी गलती की है I इस गलती को मानने के लिए उसे हलींम होने की ज़रूरत पड़ेगी I हमको यह एक म्साल पेश की गई है जो हमें समझने में मदद करती है कि हम तौबा करें I जिसकी बाबत नबी हज़रत यहया अलहिस्सलाम ने बहुत दिलेरी के साथ तालीम दी कि तौबा करने के हक़ीक़ी मायने क्या हैं I   

जब उसने अपने घमंड पर क़ाबू पालिया और अपने बाप के पास वापस आया तो उसने अपने बाप की महब्बत और शफ़क़त को उम्मीद से कहीं जियदा पाया I उसको नहलाए जाने का इंतजाम , नई जूतियाँ , नया सूट ,हाथ की उंगली में सोने की अंगूठी , दावत और जश्न मनाया जाना , बरकत दिया जाना और उसे वापस कबूल किया जाना — यह सब कुछ बाप के प्यार महब्बत को ज़ाहिर करता है I यह कहानी इस बात को समझने हमारी मदद करती है की अल्लाह तआला हम से बहुत जियादा महब्बत रखता I वह हमारी राह देखता है कि हम उसके पास वापस लौट आएँ I इसके लिए ज़रूरत है कि हम अपने ‘गुनाहों से तौबा करें’ I जब हम ऐसा करेंगे तो हम पाएंगे कि वह हमें कबूल करने के लिए तयार है I यही तो नबी हज़रत ईसा अल मसीह चाहते हैं कि हम सीखें I क्या आप खुद को अल्लाह के हाथ सौंप सकते और इस तरह की महब्बत को क़बूल कर सकते हैं ? क्या आप इस के लिए तैयार ?              

नबी हज़रत ईसा अल मसीह रहम को बढ़ाते हैं

क्या आप ने कभी शरीअत के किसी हुक्म को तोड़ा है ? हम में से कोई भी ऐसा करना नहीं चाहता मगर हक़ीक़त यह है कि हम में से अक्सर अपनी नाकामियों को छिपाते हैं यह उम्मीद करते हुए कि दूसरे लोग हमारे गुनाहों को दरयाफ़्त नहीं कर पाएंगे और न ही हमारी शर्मिंदगी ज़ाहिर हो पाएगी I मगर उस वक़्त क्या होगा जब आपकी नाकामी, आपका (गुनाह) दरयाफ़्त कर लिया जाएगा I आप उनकी क्या तवक़्क़ो रखते हैं ? 

जिस तरह सूरा लुक़मान (सूरा 31 – लुक़मान) हमें याद दिलाता है    

 ये सूरा हिकमत से भरी हुई किताब की आयतें हैजो (अज़सरतापा) उन लोगों के लिए हिदायत व रहमत है

सूरा लुक़मान 31:2-3

खु़दा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान रहम वाला है

अलिफ़ लाम मीम । ये सूरा हिकमत से भरी हुयी किताबा की आयतें है

सूरा लुक़मान ऐलान करता है कि ‘नेक काम करने वाले’ तो अल्लाह के रहम की उम्मेद कर सकते हैं ,मगर बुरे काम करने वाले नहीं I इसी तरह सूरा अल हिजर (सूरा 15 – पथरीली इलाक़ा) एक अहम सवाल पूछता है I

  बस तो आप कुछ रात रहे अपने लड़के बालों को लेकर निकल जाइए और आप सब के सब पीछे रहिएगा और उन लोगों में से कोई मुड़कर पीछे न देखे और जिधर (जाने) का हुक्म दिया गया है (शाम) उधर (सीधे) चले जाओ और हमने लूत के पास इस अम्र का क़तई फैसला कहला भेजा

सूरा अल हिजर 15: 56

इबराहीम ने कहा गुमराहों के सिवा और ऐसा कौन है जो अपने परवरदिगार की रहमत से ना उम्मीद हो

उन लोगों की बाबत क्या है जो बहुत दूर भटक चुके हैं ? हज़रत ईसा अल मसीह की ख़िदमत उनके लिए थी जो अल्लाह केई रास्ते से भटक गए थे, और उनपर जिनपर रहम की गुंजाइश नहीं थी I वह रहम के लायक़ नहीं थे और वह इसके लिए तवक़्क़ो नहीं कर सकते थे I नबी हज़रत ईसा अल मसीह को मौक़ा मिला कि वह किसी पर रहम का इज़हार करे जो बुरी तरह से शरमिंदा हो चूकी थी I

यह एक जवान औरत के साथ हुआ जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह लोगों को तालीम दे रहे थे I इंजील शरीफ़ इस वाक़िया को इस तरह बयान करती है :

2 और भोर को फिर मन्दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा।
3 तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उस को बीच में खड़ी करके यीशु से कहा।
4 हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है।
5 व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्या कहता है?
6 उन्होंने उस को परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा।
7 जब वे उस से पूछते रहे, तो उस ने सीधे होकर उन से कहा, कि तुम में जो निष्पाप हो, वही पहिले उस को पत्थर मारे।
8 और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा।
9 परन्तु वे यह सुनकर बड़ों से लेकर छोटों तक एक एक करके निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई।
10 यीशु ने सीधे होकर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी।
11 उस ने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना॥

यूहनना 8 : 2-11

यह औरत ज़िना करने के ऐन फ़ेअल में पकड़ी गई थी और जो लोग हज़रत मूसा की शरीअत के उस्ताद थे वह उसे संगसार करना चाहते थे I मगर इस से पहले कि वह ऐसा करे वह देखना चाहते थे कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह इसके बारे में क्या फैसला लेते हैं I क्या वह शरीअत केआई सच्चाई की पाबंदी करते हैं या नहीं ? (ज़मनी तोर से शरीअत के मुताबिक़ आदमी और औरत दोनों को संगसार कर देना चाहिए था I मगर हज़रत ईसा ने देखा कि वह लोग सिर्फ़ औरत को ही सज़ा देने के लिए पकड़ कर लाये थे) I

अल्लाह का इंसाफ और बनी इंसान का गुनाह

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने शरीअत से मुंह नहीं फेरा — यह अल्लाह तआला कि जानिब से सज़ा का मेयार मुक़र्रर था और यह उसका कामिल इनसाफ़ था. मगर हज़रत ईसा अल मसीह ने उन मज़हबी उस्तादों और भीड़ के लोगों से कहा “तुम में से जो कोई बे गुनाह है वही सब से पहले पतथर मारे I जब शरीअत के उस्तादों ने इस मामले को एचएआर पहलू से गौर किया टीओ ज़ेल के ज़बूर के बयान की हक़ीक़त को उनहों ने मालूम किया I

 2 परमेश्वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है, कि देखे कि कोई बुद्धिमान, कोई परमेश्वर का खोजी है या नहीं।
3 वे सब के सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं।       

ज़बूर 14: 2-3

इसका मतलब यह है कि एनए सिर्फ़ गैर ईमानदार लोग, काफ़िर, गैर क़ौम के लोग जो कई एक माबूदों की परसतिश करते हैं वह भी गुनाह करते हैं —- यहाँ तक कि जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं वह भी गुनाह करते हैं I दरअसल इन आयतों के मुताबिक़ जब अल्लाह बनी इंसान पर नज़र करता है तो वह किसी एक शख्स को भी भलाई करते हुए नहीं पाता I

हज़रत मूसा की शरीअत बनी इंसान के लिए ख़ुदा का एक बहुत अच्छा इंतज़ाम था जिसकी बुनयाद कमिलियत से भरी हुई थी और जो सच्चाई से उसपर अमल करते थे वह रास्तबाज़ी हासिल करते सकते थे मगर जो मेयार था वह बिलकुल यहाँ तक कि एक तजावुज़ के बगैर छूट दी गई थी I

अल्लाह का रहम

मगर जबकि ‘तमाम लोग बिगड़ गए’ तो एक दूसरे इंतिज़ाम की सख्त ज़रूरत पड़ गई थी I यह इंतिज़ाम नेक कामों की बुनयाद पर किया गया फ़ैसला नहीं होगा —- क्यूंकि लोग शरीअत की क़ानूनी पाबंदियों को लगातार पकड़े नहीं रह सकते थे —- तो इसको अल्लाह तआला की एक दूसरी सीरत (ख़ासियत) की बुनयाद पर जारी रखना ज़रूरि था और वह दूसरी ख़ासियत थी उस का ‘रहम’— वह उस क़ानूनी मुआहदे की जगह अपनी रहम को बढ़ाएगा I इसको हज़रत मूसा की शरीअत में काम में लाया गया था यानी फ़सह के बर्रे ने बनी इसराईल पर रहम करके उन्हें जिंदगी अता की I उन पर जिन्हों ने अपने घरों की चौखट पर ज़बह किए गए बर्रे के ख़ून से रंगा था  I और उस गाय के सबब से (जिसका ज़िकर सूरा 2 जिसको बाद में सूरा बक़रा नाम दिया गयामें ज़िकर किया गया है जिसमें हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) ने गाय की क़ुरबानी दी थी) I इस रहम को हम अदन के बाग़ में भी देख सकते हैं जब आदम और हव्वा के नंगेपन को ढाँकने के लिए जानवर की क़ुरबानी यानी ख़ून का बहाया जाना काम में लाया गया I मतलब यह कि ज़बह किए गए जानवर के चमड़े से उनकी शर्मिंदगी को ढाँका गया I इसी तरह हाबील की क़ुरबानी पर गौर करें जिसको अल्लाह तआला ने क़बूल किया I और नबी हज़रत नूह और उनके पूरे खानदान पर उस बड़े सैलाब के दौरान रहम किया गया था I अल्लाह के इस रहम को ज़बूर शरीफ़ में भी काम में लाया गया था जब अल्लाह ने वायदा किया था कि :

“मैं इस मुल्क की बदकिरदारी को एक ही दिन में दूर कर दूँगा” I

ज़करियाह 3:9

अब नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने एक शख्स पर रहम को बढ़ाया क्यूंकि इसके अलावा उसके लिए और कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी बल्कि उसे इस रहम की खास ज़रूरत थी I इस वाक़िये की दिलचस्प बात यह है कि उस औरत के मज़हब का कहीं पर भी ज़िकर नहीं किया गया है – हम यह भी जानते हैं कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने अपने पहाड़ी वा’ज़ में सिखाया कि

धन्य हैं वे, जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।

मत्ती 5 : 7

और

ष मत लगाओ, कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए।
2 क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा; और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।

मत्ती 7 : 1-2

रहम को बढ़ाना ताकि रहम हासिल हो

आपके और मेरे लिए भी रोज़े क़यामत पर रहम को बढ़ाने की ज़रूरत है I नबी हज़रत ईसा अल मसीह चाहते थे कि किसी ऐसे शख्स पर अपने रहम को बढ़ाए जिसने साफ़ तोर से हुक्म को तोड़ा था I — वह औरत रहम के क़ाबिल नहीं थी I फिर भी उसपर रहम किया गया I वह हम से भी तवक़्क़ो करता है कि उनपर रहम करें जो हमारे चारों तरफ़ पाये जाते हैं I नबी के मुताबिक़ रहम का मेयार जो हम बढ़ाते हैं मुनहसर करेगा उस रहम पर जो हम अल्लाह तआला की जानिब से हासिल करते हैं या करेंगे I यह इसलिए कि हम बहुत जल्द दूसरों के गुनाहों का फैसला ले लेते हैं क्यूंकि हमारे चारों तरफ़ आवेज़िश (मुक़ाबला) बहुत है I हमारे लिए यह अक़लमनदी होगी कि उनके लिए रहम को बढ़ाएँ जो हमें नुकसान पहुंचाते हैं I आइये हम ख़ुदा से मांगे कि वह हमारी मदद करे कि हम ऐसे लोग बनें जैसे हज़रत ईसा अल मसीह जिन्हों ने ऐसों पर रहम को बढ़ाया जिसके लायक़ वह नहीं थे I हम भी जो रहम के लायाक़ नहीं हैं उसके रहम को हासिल कर सकते है जब हमको ज़रूरत होगी I तब हम इस बात को समझने के लिए तयार होंगे कि इंजील की खुशख़बरी में हम पर रहम अता हुई है I       

नबी यहया अलैहिससलाम दुख उठाते और — सच्ची शहादत — को दिखाते हैं

सूरा अल – मुनाफ़िक़ून (सूरा 63 – फ़रेबि लोग) बयान करता है कि कुछ लोग जिन्हों ने हज़रत मुहम्मद (सल्लम) के हक़ में गवाही दी मगर बाद में उन्हें नाकारा और झूटा पाया गया I

(ऐ रसूल) जब तुम्हारे पास मुनाफेक़ीन आते हैं तो कहते हैं कि हम तो इक़रार करते हैं कि आप यक़नीन ख़ुदा के रसूल हैं और ख़ुदा भी जानता है तुम यक़ीनी उसके रसूल हो मगर ख़ुदा ज़ाहिर किए देता है कि ये लोग अपने (एतक़ाद के लिहाज़ से) ज़रूर झूठे हैंइन लोगों ने अपनी क़समों को सिपर बना रखा है तो (इसी के ज़रिए से) लोगों को ख़ुदा की राह से रोकते हैं बेशक ये लोग जो काम करते हैं बुरे हैं

सूरा अल मुनाफ़िकून 63:1-2

फ़रेबी लोगों के मुक़ाबले में सूरा अज़ – ज़मर (सूरा 19 – गिरोह) ईमानदार गवाहों का बयान करता है I

  और ज़मीन अपने परवरदिगार के नूर से जगमगा उठेगी और (आमाल की) किताब (लोगों के सामने) रख दी जाएगी और पैग़म्बर और गवाह ला हाज़िर किए जाएँगे और उनमें इन्साफ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ( ज़र्रा बराबर ) ज़ुल्म नहीं किया जाएगा

सूरा अज़ – ज़मर 39:69

ईसा अल – मसीह के ज़माने में एक सच्चा गवाह एक शहीद कहलाता था I और एक शहीद वह होता था जो सच्चे वाक़िआत कि गवाही दे I ईसा अल – मसीह ने अपने शागिर्दों को शहीद कहा I

    परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।

आमाल 1:8

लफ़्ज़ शहीद सिर्फ़ उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता था जो ईमानदार गवाह होते थे I

मगर लफ़्ज़ शहीद को रसूलों के ज़माने में बहुत ज़ियादा इस्तेमाल किया जाता था I मैं ने सुना है कि जब कोई शख्स किसी जंग में हलाक हो जाता था या फ़िरक़ावाराना झगड़े में मारा जाता था तो उसको आम तोर पर एक शहीद बतोर हवाला दिया जाता था (और शायद जो उनके खिलाफ़ में लड़ते थे उन्हें ‘काफ़िर कहा जाता था) I

मगर क्या यह सही है ? इंजील ए शरीफ़ इस बात को बयान करती है कि किस तरह नबी यहया अलैहिस सलाम हज़रत ईसा अल – मसीह कि खिदमत गुज़ारी के दौरान शहीद हुए I और हज़रत ईसा अल – मसीह ने उनकी शहीदी मौत को लेकर एक बड़ा नमूना साबित किया कि हम इसको कैसे समझें I यहाँ आप देखें कि इंजील ए शरीफ़ किस तरह इन वाक़िआत को क़लमबंद करती है I

   स समय चौथाई देश के राजा हेरोदेस ने यीशु की चर्चा सुनी।
2 और अपने सेवकों से कहा, यह यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला है: वह मरे हुओं में से जी उठा है, इसी लिये उस से सामर्थ के काम प्रगट होते हैं।
3 क्योंकि हेरोदेस ने अपने भाई फिलेप्पुस की पत्नी हेरोदियास के कारण, यूहन्ना को पकड़कर बान्धा, और जेलखाने में डाल दिया था।
4 क्योंकि यूहन्ना ने उस से कहा था, कि इस को रखना तुझे उचित नहीं है।
5 और वह उसे मार डालना चाहता था, पर लोगों से डरता था, क्योंकि वे उसे भविष्यद्वक्ता जानते थे।
6 पर जब हेरोदेस का जन्म दिन आया, तो हेरोदियास की बेटी ने उत्सव में नाच दिखाकर हेरोदेस को खुश किया।
7 इसलिये उस ने शपथ खाकर वचन दिया, कि जो कुछ तू मांगेगी, मैं तुझे दूंगा।
8 वह अपनी माता की उक्साई हुई बोली, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर थाल में यहीं मुझे मंगवा दे।
9 राजा दुखित हुआ, पर अपनी शपथ के, और साथ बैठने वालों के कारण, आज्ञा दी, कि दे दिया जाए।
10 और जेलखाने में लोगों को भेजकर यूहन्ना का सिर कटवा दिया।
11 और उसका सिर थाल में लाया गया, और लड़की को दिया गया; और वह उस को अपनी मां के पास ले गई।
12 और उसके चेलों ने आकर और उस की लोथ को ले जाकर गाढ़ दिया और जाकर यीशु को समाचार दिया॥

मत्ती 14:1-12

सब से पहले हाँ देखते हैं कि यहया नबी को क्यूँ गिरफ्तार किया गया था I मक़ामी बादशाह हेरोदेस अपने भाई कि बीवी को उस के पास से ले लिया था और उसको अपनी बीवी बना लिया था I और यह मूसा की शरीअत के खिलाफ था I नबी यहया ने सारे आम कह दिया था कि यह उसके लिए जाइज़ नहीं है I मगर यह बिगड़ा हुआ बादशाह बजाए इसके कि नबी कि बात सुनता उसने नबी यहया को गिरफ़्तार कर लिया और उसे क़ैद में डलवा दिया I वह जो औरत थी नई शादी के मज़े लूट रही थी और उसकी एक बालिग लड़की भी थी I उस औरत को घमंड था कि अब मैं एक ताक़तवर बादशाह की बीवी हूँ मैं जो चाहे वह कर सकती हूँ I सो उसने चाहा कि नबी यहया का मुंह हमेशा के लिए बहड़ कर दूँ I इस साज़िश के तहत उस ने अपनी बालिग लड़की का इस्तेमाल किया और अपने शौहर और उसके दोस्तों के सामने नाच रंग कि मेहफिल का इंतज़ाम किया I उस लड़की के नाच से हेरोदेस इतना मुताससिर हुआ कि वह उससे वादा कर बैठा कि जो कुछ वह चाहेगी उसे दिया जाएगा I उसकी माँ ने लड़की को चुपके से बुलाकर कहा कि यहया नबी का सर अभी इसी वक़्त मंगवाले I उसकी इस मांग पर हेरोदेस को अफ़सोस तो हुआ मगर मेहमानों के सबब से मजबूर होकर उसने एक सिपाहो हुक्म दिया हज़रत यहया का सर काट कर लाया जाए I नबी यहया जो सच बोलने के सबब से क़ैद में थे उनका सर काट कर थाल में ले जाया गया I एक लड़की के सिर्फ़ एक श्हवानी नाच ने मेहमानों के सामने बादशाह को जाल मे फंसाया I

हम यह भी देखते हैं कि नबी हरत यहया ने किसी से कभी लड़ाई झगड़ा नहीं किए थे न ही उनहों ने कभी बादशाह को हलाक करने की कोई साज़िश रची थी I वह सिर्फ़ सच बोलते थे इसलिए वह एक बिगड़े हुए बादशाह को तंबीह देने से नहीं डरे I हालांकि हज़रत यहया के पास कोई ज़मीनी ताक़त नहीं थी कि उस बादशाह के इख्तियार को ललकारे I उनहों ने सच बोला इसलिए कि उन्हें ख़ुदा कि शरीअत से लगाव था जो हज़रत मूसा के मुबारक हाथों से दी गई थी I यह आज के दौर के लिए एक अच्छी मिसाल है कि हम कि तरह (सच बोलने के जरिये) झूठ का मुक़ाबला कर सकते हैं जिस के लिए हम लड़ते हैं I (यही नबियों की सच्चाई है) I नबी यहया अलैहिससलाम ने कभी बादशाह को मरने की कोशिश नहीं की जो एक तहरीक की तरफ़ ले जाए या एक जंग की शुरुआत करे I

नबी यहया की शहादत का अंजाम

उसकी पहुँच बहुत ज़ियादा कारगर साबित हुई I नबी यहया के क़त्ल के सबब से बादशाह के ज़मीर को बहुत धक्का लगा I वह खौफ़ ज़दह होगया और घबरा गया I वह नबी हज़रत ईसा अल मसीह की ज़बरदस्त तालीम और मोजिजों को देखकर घबरा गया था कि सोच बैठा कि कहीं हज़रत यहया वापस मुरदों में से ज़िंदा तो नहीं होगाए ?

हेरोदेस ने चालाकी से जो हज़रत यहया का क़त्ल करवाया था उसकी कोई क़द्रों क़ीमत नहीनरह गई थी I उसका मंसूबा एक ज़ालिमाना मंसूबे की एक अच्छी मिसाल थी यहाँ तक कि यह सूरा अल फ़ील की भी I सूरा अल — फ़ील (सूरह 105 – हाथी)

  ऐ रसूल क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे परवरदिगार ने हाथी वालों के साथ क्या किया,क्या उसने उनकी तमाम तद्बीरें ग़लत नहीं कर दीं (ज़रूर)और उन पर झुन्ड की झुन्ड चिड़ियाँ भेज दीं,जो उन पर खरन्जों की कंकरियाँ फेकती थीं

रा अल – फ़ील 105:1-4

हज़रत ईसा अल – मसीह ने हज़रत यहया की बाबत जो बात कही उसका बयान देखें :

    7 जब वे वहां से चल दिए, तो यीशु यूहन्ना के विषय में लोगों से कहने लगा; तुम जंगल में क्या देखने गए थे? क्या हवा से हिलते हुए सरकण्डे को?
8 फिर तुम क्या देखने गए थे? क्या कोमल वस्त्र पहिने हुए मनुष्य को? देखो, जो कोमल वस्त्र पहिनते हैं, वे राजभवनों में रहते हैं।
9 तो फिर क्यों गए थे? क्या किसी भविष्यद्वक्ता को देखने को? हां; मैं तुम से कहता हूं, वरन भविष्यद्वक्ता से भी बड़े को।
10 यह वही है, जिस के विषय में लिखा है, कि देख; मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूं, जो तेरे आगे तेरा मार्ग तैयार करेगा।
11 मैं तुम से सच कहता हूं, कि जो स्त्रियों से जन्मे हैं, उन में से यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से कोई बड़ा नहीं हुआ; पर जो स्वर्ग के राज्य में छोटे से छोटा है वह उस से बड़ा है।
12 यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के दिनों से अब तक स्वर्ग के राज्य पर जोर होता रहा है, और बलवान उसे छीन लेते हैं।
13 यूहन्ना तक सारे भविष्यद्वक्ता और व्यवस्था भविष्यद्ववाणी करते रहे।
14 और चाहो तो मानो, एलिय्याह जो आनेवाला था, वह यही है।
15 जिस के सुनने के कान हों, वह सुन ले।

मत्ती 11:7-15

यहाँ हज़रत ईसा अल मसीह तौसीक़ करते है कि हज़रत यहया एक बहुत बड़े नबी थे I और वह ऐसे नबी थे जिनको दुनया में एक ‘तयार करने वाला’ बतोर आने के लिए बा क़ाइदा नबुवत की गई थी I उनका ख़ुदा कि बादशाही में दाखिल होना आज के दिन को बर्दाश्त करता है जबकि बादशाह हेरोदेस जो बहुत ही ताक़तवर था जो हज़रत यहया के बाद में आता है उसके पास कुछ नहीं था क्यूंकी उसने नबियों के आगे सौंपे जाने से इंकार कर दिया था I

नबी हज़रत यहया के ज़माने में हेरोदेस जैसे कई एक हमलावर और क़ातिल थे इसी तरह आज भी बहुत से हमलावर लोग हैं जो कई एक मासूमों की जान लेते है I यही वह हमलावर लोग है जो आसमान की बादशाही को दूर लेजाते हैं मगर वह उस में दाखिल नहीं होंगे I आसमान की बादशाही में दाखिल होने का मतलब है जिस राह पर हज़रत यहया चलते थे उसी को अपनाना होगा मतलब यह कि एक सच्ची गवाही को लेकर कलना होगा I अगर हम उनके बताए हुए रास्ते पर चलते हैं तो हम समझदार गिने जाएंगे I हम उनकी राहों पर न चलें जो मौजूदा ज़माने में हमलावर है I                  

हज़रत ईसा अल मसीह ‘आब ए हयात’ पेश करते हैं

अल मुताफ़्फ़िफ़ीन (सूरा 83 – फ़रेबी लोग) ताज़गी बख़्शने वाला मशरूबात का चश्मा जन्नत में उन लोगों के लिए पेश सूरा किया जाएगा जो अल्लाह के सब से ज़ियादा क़रीब में पाये जाते हैं I

उसके पास मुक़र्रिब (फ़रिश्ते) हाज़िर हैंबेशक नेक लोग नेअमतों में होंगेतख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगेतख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगे सूरा अल –

मुतफ़्फ़िफ़ीन 83:21 23

उनको सर ब मोहर ख़ालिस शराब पिलायी जाएगीजिसकी मोहर मिश्क की होगी और उसकी तरफ अलबत्ता शायक़ीन को रग़बत करनी चाहिएऔर उस (शराब) में तसनीम के पानी की आमेज़िश होगीवह एक चश्मा है जिसमें मुक़रेबीन पियेंगे

सूरा अल – मुतफ़्फ़िफ़ीन 83:25,28

सूरा अल दहर (सूरा 76 – ज़मीन) भी एक इसी तरह के फ़रहत बख़्शने वाले चशमे का बयान करता है I यह उनके लिए है जो जन्नत में दाखिल होते हैं I

बेशक नेकोकार लोग शराब के वह सागर पियेंगे जिसमें काफूर की आमेज़िश होगी ये एक चश्मा है जिसमें से ख़ुदा के (ख़ास) बन्दे पियेंगेऔर जहाँ चाहेंगे बहा ले जाएँगे

सूरा अल- दहर 76: 5-6

और वहाँ उन्हें ऐसी शराब पिलाई जाएगी जिसमें जनजबील (के पानी) की आमेज़िश होगीये बेहश्त में एक चश्मा है जिसका नाम सलसबील है

सूरा अल- दहर 76:17-18

मगर उस प्यास का क्या होगा जो अभी हमारी इस ज़िंदगी में पाई जाती है ? अपनी गुनहगारी और माज़ी की शरमनाक और ज़िल्लत की ज़िन्दगी के सबब से अल्लाह के सब से क़रीब में नहीं पाए जाते I नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने हमें सिखाया जब उसने एक छोड़ी हुई सामरी औरत का सामना किया I

इससे पहले हमने सीखा था कि किस तरह नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने सिखाया कि हमको अपने दुशमनों के साथ कैसा बरताव करना चाहिए I हमारे इस मौजूदा ज़माने में हमारा बहुतों के साथ रगड़ा झगड़ा है और हमने अपनी दूनया को जहन्न्मी और आफ़त ज़दा दुनया में तबदील कर दिया है I हज़रत ईसा अल मसीह ने इस तमसील में सिखाया कि जन्नत में दाखिल होना किस तरह मुनहसर करता है कि हमने अपने दुशमनों के साथ कैसा कुछ बरताव किया !

किसी चीज़ को सिखाना यह बहुत आसान है मगर उस पर अमल करना बहुत मुश्किल है क्यूंकि यह बहुत फ़रक़ होता है I कई एक इमामों और दीगर उस्तादों ने बहुत सी बातों को सिखाया तो है मगर उसके मुताबिक उनकी ज़िंदगी जीने का अंदाज़ फ़रक़ था I नबी हज़रत ईसा अल मसीह की बाबत हमारा क्या ख़्याल है ? एक तरफ़ वह एक सामरी औरत का सामना करते हैं (जबकि उस ज़माने में सामरियों की नज़र में यहूदी उनके दुश्मन क़ारार दिये जाते थे)I आप देखें कि इंजील –ए-शरीफ़ इस मुडभेड़ का बयान करती है I

    र जब प्रभु को मालूम हुआ, कि फरीसियों ने सुना है, कि यीशु यूहन्ना से अधिक चेले बनाता, और उन्हें बपतिस्मा देता है।
2 (यद्यपि यीशु आप नहीं वरन उसके चेले बपतिस्मा देते थे)।
3 तब यहूदिया को छोड़कर फिर गलील को चला गया।
4 और उस को सामरिया से होकर जाना अवश्य था।
5 सो वह सूखार नाम सामरिया के एक नगर तक आया, जो उस भूमि के पास है, जिसे याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दिया था।
6 और याकूब का कूआं भी वहीं था; सो यीशु मार्ग का थका हुआ उस कूएं पर यों ही बैठ गया, और यह बात छठे घण्टे के लगभग हुई।
7 इतने में एक सामरी स्त्री जल भरने को आई: यीशु ने उस से कहा, मुझे पानी पिला।
8 क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गए थे।
9 उस सामरी स्त्री ने उस से कहा, तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते)।
10 यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।
11 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया?
12 क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिस ने हमें यह कूआं दिया; और आप ही अपने सन्तान, और अपने ढोरों समेत उस में से पीया?
13 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा।
14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।
15 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, वह जल मुझे दे ताकि मैं प्यासी न होऊं और न जल भरने को इतनी दूर आऊं।
16 यीशु ने उस से कहा, जा, अपने पति को यहां बुला ला।
17 स्त्री ने उत्तर दिया, कि मैं बिना पति की हूं: यीशु ने उस से कहा, तू ठीक कहती है कि मैं बिना पति की हूं।
18 क्योंकि तू पांच पति कर चुकी है, और जिस के पास तू अब है वह भी तेरा पति नहीं; यह तू ने सच कहा है।
19 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, मुझे ज्ञात होता है कि तू भविष्यद्वक्ता है।
20 हमारे बाप दादों ने इसी पहाड़ पर भजन किया: और तुम कहते हो कि वह जगह जहां भजन करना चाहिए यरूशलेम में है।
21 यीशु ने उस से कहा, हे नारी, मेरी बात की प्रतीति कर कि वह समय आता है कि तुम न तो इस पहाड़ पर पिता का भजन करोगे न यरूशलेम में।
22 तुम जिसे नहीं जानते, उसका भजन करते हो; और हम जिसे जानते हैं उसका भजन करते हैं; क्योंकि उद्धार यहूदियों में से है।
23 परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही भजन करने वालों को ढूंढ़ता है।
24 परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।
25 स्त्री ने उस से कहा, मैं जानती हूं कि मसीह जो ख्रीस्तुस कहलाता है, आनेवाला है; जब वह आएगा, तो हमें सब बातें बता देगा।
26 यीशु ने उस से कहा, मैं जो तुझ से बोल रहा हूं, वही हूं॥
27 इतने में उसके चेले आ गए, और अचम्भा करने लगे, कि वह स्त्री से बातें कर रहा है; तौभी किसी ने न कहा, कि तू क्या चाहता है? या किस लिये उस से बातें करता है।
28 तब स्त्री अपना घड़ा छोड़कर नगर में चली गई, और लोगों से कहने लगी।
29 आओ, एक मनुष्य को देखो, जिस ने सब कुछ जो मैं ने किया मुझे बता दिया: कहीं यह तो मसीह नहीं है?
30 सो वे नगर से निकलकर उसके पास आने लगे।
31 इतने में उसके चेले यीशु से यह बिनती करने लगे, कि हे रब्बी, कुछ खा ले।
32 परन्तु उस ने उन से कहा, मेरे पास खाने के लिये ऐसा भोजन है जिसे तुम नहीं जानते।
33 तब चेलों ने आपस में कहा, क्या कोई उसके लिये कुछ खाने को लाया है?
34 यीशु ने उन से कहा, मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजने वाले की इच्छा के अनुसार चलूं और उसका काम पूरा करूं।
35 क्या तुम नहीं कहते, कि कटनी होने में अब भी चार महीने पड़े हैं? देखो, मैं तुम से कहता हूं, अपनी आंखे उठाकर खेतों पर दृष्टि डालो, कि वे कटनी के लिये पक चुके हैं।
36 और काटने वाला मजदूरी पाता, और अनन्त जीवन के लिये फल बटोरता है; ताकि बोने वाला और काटने वाला दोनों मिलकर आनन्द करें।
37 क्योंकि इस पर यह कहावत ठीक बैठती है कि बोने वाला और है और काटने वाला और।
38 मैं ने तुम्हें वह खेत काटने के लिये भेजा, जिस में तुम ने परिश्रम नहीं किया: औरों ने परिश्रम किया और तुम उन के परिश्रम के फल में भागी हुए॥
39 और उस नगर के बहुत सामरियों ने उस स्त्री के कहने से, जिस ने यह गवाही दी थी, कि उस ने सब कुछ जो मैं ने किया है, मुझे बता दिया, विश्वास किया।
40 तब जब ये सामरी उसके पास आए, तो उस से बिनती करने लगे, कि हमारे यहां रह: सो वह वहां दो दिन तक रहा।
41 और उसके वचन के कारण और भी बहुतेरों ने विश्वास किया।
42 और उस स्त्री से कहा, अब हम तेरे कहने ही से विश्वास नहीं करते; क्योंकि हम ने आप ही सुन लिया, और जानते हैं कि यही सचमुच में जगत का उद्धारकर्ता है॥

यूहनना 4:1— 42

सामरी औरत ने इस बात से ताज्जुब किया कि नबी ईसा अल मसीह ने यहाँ तक कि उस से बातचीत की –उन दिनों में यहूदियों और सामरियों के दरमियान दुशमनी पीएएआई जाती थी I नबी ने दो असबाब से उससे पानी मांग कर अपने बहस की शुरुआत की I पहला यह कि जैसे कहा जाता है कि वह पियासा था I मगर वह एक (नबी होने के नाते) कि वह औरत ख़ुद भी किसी दूसरे तरीक़े से पूरी तरह से पियासी थी I वह अपनी ज़िंदगी में खुशी, तसकीन और इतमीनान की पीयासी थी I उसने सोचा था कि वह इस पियास को गैर मरदों के साथ नाजाइज़ रिश्ते में अपनी हवस को मिटाने और जिस्म फ़रोशी के ज़रिये पूरा कर सकती थी I इसे अंजाम देते हुए उसके कई एक शौहर हो गए I यहाँ तक कि जब वह मसीह से बात कर रही थी उस वक़्त का शौहर भी उसका असली शौहर नहीं था I सामरिया शहर के तमाम लोग जानते थे कि वह एक बदकार औरत थी I गालिबन यही एक सबब था वह कुएं से पानी लेने के लिए दोपहर के वक़्त में अकेले ही जाया करती थी जब शहर के सब लोग अपने घरों में आराम कर रहे होते थे I या शहर की दीगर औरतों ने उसे सखती से ताकीद की थी कि सुबह के वक़्त में वह उनके सामने न आया करे I उस औरत के कई एक मर्द थे और उसकी शर्मनाक हरकतों ने उसे शहर की दीगर औरतों से जुदा कर रखा था I

ज़बूर हमें बताती है कि हमारी ज़िंदगियों में गुनाह एक ऐसे गहरे प्यास को ज़ाहिर करता है – एक ऐसी प्यास जो कि बुझाई जाए I आज बहुत से लोग चाहे उनका कोई भी मज़हब क्यूँ न हो इसी प्यास के सबब से गुनाह गारी की हालत में ज़िंदगी गुज़ारते हैं I

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने उस गुनहगार औरत को रोका नहीं था बल्कि उस आबे हयात को देने का वायदा किया जो उसके पियास को बुझाएगा I मगर वह जिस्मानी पानी की बात नहीं कर रहा था (जिसको एक बार पीने से कुछ देर बाद दोबारा पियासा हो जाए) I मगर इस औरत के दिल में अंदरूनी तोर से एक नया बदलाव होने वाला था I ज़बूर के नबियों ने नबुवत की थी कि इस नए दिल का एक अहद आने वाला था I ईसा अल मसीह ने दिल के बदलाव के उस नए अहद को पेश किया यानी “अब्दी ज़िंदगी के पानी को अपने लिए सींचना”I

ईमान लाना – यानी सच्चाई से तौबा करना

मगर इस आबे हयात का दिया जाना सामरी औरत के लिए कश्मकश सा बन गया I जब ईसा ने उससे कहा कि अपने शौहर को बुला ला तो ईसा का मक़सद था कि औरत अपने गुनाह को पहचाने और उसे कबूल करके उससे तौबा करे I हम भी कुछ इसी तरह से बहाना करके गुनाह को रोकने की कोशिश करते हैं ! मगर ऐसा करने के बदले हम गुनाह को छिपाने पर तरजीह देते हैं यह उम्मीद करते हुए कि कोई हमें नहीं देखता I या फिर अपने गुनाह के लिए बहाना बनाते हुए अपनी अक़लियत का रंग चढ़ाते हैं I आदम और हव्वा ने बागे अदन में ऐसा किया था जब उनहों ने गुनाह किया था I इसी तरह हम भी अपने गुनाह छिपाने पर तरजीह देते या बहाना बनाते हैं I पर अगर हम खुदा के रहम का तजरुबा करना चाहते हैं जो हयाते अब्दी की तरफ़ ले  जाता है तो फिर हमको अपने गुनाह की बाबत ईमानदार होने की ज़रूरत है कि उस का एतराफ़ क्यूंकि मुक़द्दस इंजील वायदा करता है कि :

9 सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।

1यूहनना1:9

इस सबब से जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने उस सामरी औरत से कहा कि “खुदा रूह है और उसके सच्चे परसतारों को चाहिए कि उसकी इबादत रूह और सच्चाई से करें …..

इस सबब से जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने उस सामरी औरत से कहा कि “खुदा रूह है और

उसके सच्चे परसतारों को चाहिए कि उसकी इबादत रूह और सच्चाई से करें …..

यहाँ सच्चाई का मतलब है कि अपने आप में सच्चा और मुअतबर बने रहना और गुनाह को छिपाने की कोशिष न करना या अपने बुरे काम के लिए बहाना पेश न करना I एक हैरत अंगेज़ खुशख़बरी यह है कि अल्लाह त आला गुनाहगारों को ढूंढता है और वह अपने परसतारों से मुंह नहीं मोड़ता जो इस तरह ईमानदारी से उसके पास आते हैं I

मगर यह उसके लिए बहुत मुश्किल था कि अपने गुनाह क़बूल करे I अपने गुनाह की शरमनाकी को छिपाने का एक आम तरीक़ा यह होता है कि अपने गुनाह से हट कर बहस के मुद्दे को बदल देना और उसे मज़हबी मामले में उलझा देना I मौजूदा दौर की दूनया बहुत सारे मज़हबी बहस ओ तकरार से भरी हुई है I उन दिनों में सामरियों और यहूदियों के दरमियान कई सारे मज़हबी मुद्दे मौजूद थे जिन में से एक था इबादत के लिए एक मखसूस मक़ाम I यहूदियों का यह मानना था कि इबादत येरूशलेम और सामरिया के बीच बसे जरेज़म पहाड़ पर की जानी चाहिए I सामरी औरत ने सोचा कि इस मज़हबी मुद्दे को छेड्ने के ज़रिये वह अपने गुनाह के बहस को बदल सकती है I उसने यह भी सोचा कि वह अपने गुनाह को मज़हब कि आड़ में छिपा सकती थी I

आप देखें कि किस तरह आज के दौर में भी कितनी आसानी से इसी काम को अंजाम देते हैं –- खास तोर से जब हम मज़हबी पाए जाते हों I तो फिर हम फ़ैसला कर लेते हैं कि दूसरे लोग कितने गलत और हम कितने सही हैं — यही मोक़ा होता है जब हम अपनी ज़रूरतों को नज़र अंदाज़ करने और अपने गुनाह इक़रार करने का I  

आप देखें कि नबी हज़रत ईसा अल मसीह इस औरत के साथ मज़हबी बहस में नहीं उलझे मगर उनहों ने इस बात पर तरजीह दी कि इबादत के लिए मक़ाम की कोई अहमियत नहीं है बल्कि उसकी इबादत में सच्चाई और रूहानियत ज़ियादा अहमियत रखती है वह अल्लाह के हुज़ूर कहीं भी और किसी भी वक़्त अंजाम दी जा सकती है (क्यूंकि अल्लाह रूह है) I मगर औरत के लिए ज़रूरी था कि उस आबे हयात को हासिल करने से पहले ख़ुद को सच्चाई से अल्लाह के हुज़ूर पेश करे I

एसओ उस औरत को एक अहम फ़ैसला लेने की ज़रूरत थी I वह अपने गुनाह को मज़हबी बहस की आड़ में छिपाना जारी रख सकती थी या शायद हज़रत मसीह को छोड़ कर जेए सकती थी I मगर उसने आखिरकार अपने गुनाह को क़बूल करने का –– तौबा करने का — फ़ैसला लिया I वह अपने शहर वापस गई I बहुत ज़ोर ओ शोर के साथ उसने लोगों को बताया कि किस तरह उस नबी ने मुझे और मेरे कामों को जाना जो अब तक मैं ने किए हैं — वह आगे को अपने गुनाह नहीं छिपा सकती थी I

ऐसा करते हुए वह एक ईमानदार बन गई I इससे पहले वह एक मज़हब परस्त थी जिस तरह हम में से बहुत से पाए जाते हैं I मगर अब वह — और उसके शहर के बहुत से लोग उसकी गवाही के ज़रिये —-ईमानदार बन गए I

एक ईमानदार बनने के लिए ऐसे ही किसी सही तालीम को दमाग में बिठा लेना काफ़ी नहीं है —- हालांकि यह भी ज़रूरी है मगर यह भी कि अल्लाह के रहम के वायदों पर ईमान लाना कि वह भरोसे लायक़ है I इस लिए जब ईमान ला लिया जाता है गुनाह को ढाकने कि ज़रूरत नहीं है बल्कि उसे इक़रार करने की ज़रूरत है I यही तो नबी हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने रास्तबाज़ गिने जाने से बहुत पहले किया था — क्यूंकि उनहों ने अल्लाह के एक वायदे पर पूरा भरोसा किया था I

क्या आप अपने गुनाह के लिए बहाना बनाते या उसे छिपाते हैं ? क्या आप उसे मज़हबी दस्तूर या रिवाजों की आड़ में छिपाते या फिर आप अपने गुनाह क़बूल करते हुए उससे तौबा करते हैं ? क्यूँ नहीं आप अल्लाह के हुज़ूर जो हमारा ख़ालिक़ व मालिक है भरोसे के साथ आकर अपने गुनाहों से मगफिरत हासिल कर लेते ? क्यूंकि ऐसा करना वाजिब है ताकि हम अपनी गुनाहगारी और नदामत से छुटकारा हासिल करें I तब आप खुश हो सकते हैं क्यूंकि अल्लाह ने आप की इबादत को क़बूल कर लिया है और वह आपको आपकी तमाम गैर रास्तबाज़ी से ‘पाक ओ साफ़ करेगा’ I

नबी हज़रत ईसा और सामरी औरत के बीच बहस में हम देखते हैं कि औरत ने नबी हज़रत ईसा को ‘मसीहा’ बतोर (‘= मसीह’= ‘येसू’) जाना और यह बहुत ज़रूरी था I और आप देखें कि सामरिया शहर के लोगों की दरखास्त पर नबी हज़रत ईसा वहाँ पर दो दिन और क़ियाम किया और उन्हें ख़ुदा की बादशाही की तालीम दी I सो उनहों ने समझा और जाना कि “दूनया का नजात दहिंदा” वही है I शायद हम पूरी तरह से नहीं समझते कि इन सब के क्या मायने हैं  मगर नबी यहया अलैहिससलाम ने लोगों को इस बतोर तयार किया वह ख़ुदा की बादशाही की बातों को जानें और अपने गुनाहों से तौबा करें जिससे हम अल्लाह तआला उसके रहम को हासिल कर सकते हैं I यह नजात के लिए हमारा पहला क़दम साबित होगा I

दुआ : ‘ऐ ख़ुदा मुझ गुनहगार पर अपनी रहमत अता कर’ आमीन I                        

ईसा अल मसीह जन्नत में दाख़िल होने की बाबत तालीम देते हैं

सूरा अल-कहफ़ (सूरा 18 – गार) बयान करता है कि जिन के आमाल नेक होंगे वह जन्नत में दाख़िल होगा I

बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे-अच्छे काम किये उनकी मेहमानदारी के लिए फिरदौस (बरी) के बाग़ात होंगे जिनमें वह हमेशा रहेंगे

सूरा अल – कहफ़ 18:107

दरअसल सूरा अल – जासिया (सूरा 45 — लजाजत) दुहराती है कि रास्तबाज़ के आमाल उसके बिहिश्त में दाख़िल होने के लिए रहम का बाइस होगा I

ग़रज़ जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किये तो उनको उनका परवरदिगार अपनी रहमत (से बेहिश्त) में दाख़िल करेगा यही तो सरीही कामयाबी है

सूरा अल – जासिया 45:30

क्या आप को उम्मीद है कि आप एक दिन (जन्नत) में दाख़िल होंगे ? आप को और मुझको जन्नत में दाख़िल होने के लिए किस चीज़ की ज़रूरत है ? एक ‘आलिम–ए-शरा’ यहूदी तालीम याफ़्ता ने हज़रत ईसा अल मसीह से एक सवाल पूछा कि मूसा अलैहिस्सलाम की शरीअत का क्या मतलब है ? हज़रत ईसा अल मसीह ने उसको एक बिला तवक़्क़ों का जवाब दिया – जेल में एक बहस मौजूद है जो मुक़द्दस इंजील से क़लमबंद किया हुआ है I हज़रत ईसा की तमसील से मुतास्सिरर होने के लिए आप को समझना चाहिए कि उन दिनों में सामरी लोग यहूदियों के ज़रिये ज़लील किए जाते थे I उन का आपस में सही बर्ताव नहीं था I इसके बदले में सामरी लोग यहूदियों से नफ़रत करने थे I और यह नफ़रत सामरियों और यहूदियों के दरमियान आज भी मौजूद है I यही वजह है कि यहूदी इसराईल और फलिसतियों के बीच निफ़ाक़ पाया जाता है या शीया और सुन्नी के बीच झगड़ा पाया जाता है I

अब्दी ज़िन्दगी और नेक सामरी की तमसील

   25 कि मनुष्यों में मेरा अपमान दूर करने के लिये प्रभु ने इन दिनों में कृपा दृष्टि करके मेरे लिये ऐसा किया है॥
26 छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया।
27 जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरूष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था।
28 और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।
29 वह उस वचन से बहुत घबरा गई, और सोचने लगी, कि यह किस प्रकार का अभिवादन है?
30 स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है।
31 और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।
32 वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उस को देगा।
33 और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।
34 मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरूष को जानती ही नहीं।
35 स्वर्गदूत ने उस को उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।
36 और देख, और तेरी कुटुम्बिनी इलीशिबा के भी बुढ़ापे में पुत्र होनेवाला है, यह उसका, जो बांझ कहलाती थी छठवां महीना है।
37 क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभावरिहत नहीं होता।

लूका 10:25-37

जब आलिम –ए- शरा ने जवाब दिया कि तू अपने ख़ुदावंद खुदा से महब्बत रख , और अपने पड़ौसी से अपनी मानिंद महब्बत रख”I तो वह  हज़रत मूसा की शरीअत की बातों का हवाला दे रहा था I हज़रत ईसा ने इशारा किया कि उसने सही जवाब दिया I मगर इससे सवाल यह उठता है कि उसका पड़ौसी कौन था ? तब ईसा अल मसीह ने यह तमसील कही I

इस तमसील से हम यह तवक़्क़ों करते हैं कि मज़हबी लोग (काहीन और लावी) उस मज़लूम की मदद करेंगे I मगर उनहों ने उस मज़लूम को नज़र अंदाज़ किया और उसको बेकसी की हालत पर छोड़ दिया I उनके मज़हब ने उन्हें एक अच्छा पड़ौसी होने नहीं दिया बल्कि इसके बरअक्स वह शख्स जिससे मदद की उम्मीद नहीं की जाती है और जो उसका दुश्मन बतौर गुमान किया जाता है — वह उस शख्स की मदद करता है I

ईसा अल मसीह हुक्म फ़रमाते हैं कि “जाओ और तुम भी ऐसा ही करो” I मैं आप की बाबत नहीं जानता, मगर इस तमसील की बाबत मेरा पहला ताससुर था कि मैं गलत फहमी में था और मुझे आजमाइश हुई कि मैं उसे नज़रअंदाज़ करूँ I

मगर उन तमाम झगड़ों, क़त्ल, दर्द–ए-दिल, परेशानी और मुसीबत की बाबत सोचें जो हमारे चारों तरफ़ वाक़े होते नज़र आते हैं क्यूंकि लोगों की एक बड़ी अकसरियत इस हुक्म को नज़रअंदाज़ करते हैं I अगर हम उस नेक सामरी की तरह जिंदगी जीते हैं तो हमारे शहर और मुमालिक पुर अमन और पुर सुकून की हालत में होते बजाए इसके कि लड़ाई झगड़ों से भरपूर चाहे वह सियासी झगसे हों या फ़िरक़ावाराना झगड़े, चाहे वह ख़ानदानी झगड़े हों या ज़ाती दुश्मनी के झगड़े हों I ऐसे में हम जन्नत में मक़ाम हासिल करने की सोच भी नहीं सकते I मगर एक बात ज़रूर है कि कुछ ही लोग हैं जिन्हें जन्नत में दाख़िल होने का पक्का भरोसा पाया जाता है I यहाँ तक कि वह बड़े ही मजहबी तोर बतोर ज़िन्दगी जीते उस आलिम –ए- शरा’ की तरह जो हज़रत ईसा से बात कर रहा था I

क्या आपको अब्दी ज़िन्दगी का एतमाद और पक्का भरोसा है ?           

मगर क्या इस तरह का पड़ौसी बनना किसी तरह मुमकिन है ? हम इसे कैसे कर सकते हैं ? अगर हम अपने आप में ईमानदार हैं तो हमें यह मानना पड़ेगा की एक अच्छा पड़ौसी जिस तरह से हुक्म दिया गया है बहुत ही मुश्किल है मगर कोशिश करना हमारा फर्ज़ है I

और यहाँ हम उम्मीद की एक झलक देख सकते हैं क्यूंकि जब हम देखते हैं कि हम इसे नहीं कर सकते तो रूह में कमज़ोर पड़ जाते हैं –जिसके बारे में ईसा अल मसीह ने भी तालीम दी कि हमारे लिए ज़रूरी है कि हम खुदा की बादशाही में दाख़िल हों I

बजाए इसके कि इस तमसील को नज़रअंदाज़ करें या कोई बहाने कि बाबत सोचें हमारे लिए ज़रूरी है कि खुदकों जाँचें और तस्लीम करें कि हम इसे खुद से नहीं कर सकते – यह बहुत मुश्किल है I तब फिर हमारी इस लाचारी में अल्लाह तआला से मदद की मांग कर सकते हैं जिस तरह ईसा अल मसीह ने पहाड़ी वा’ज़ में वादा किया कि ..

7 मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।
8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।
9 तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उस से रोटी मांगे, तो वह उसे पत्थर दे?
10 वा मछली मांगे, तो उसे सांप दे?
11 सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा?

मत्ती 7:7-11

इस तरह से मसीह हमको इजाज़त देते हैं कि अल्लाह तआला से मदद की मांग करें -– और मदद हासिल करने का वादा किया गया है I एक नमूना बतोर हम अल्लाह तआला से इस तरह दुआ करें :

“आसमानी बाप– तूने नबियों को भेजा कि हमको सीधी सच्ची राह दिखाएँ – ईसा अल मसीह ने तालीम दी कि हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए यहाँ तक कि अगर वह हमारे दुश्मन ही क्यूँ न हों I इसको अमल में लाए बगैर मैं अब्दी ज़िन्दगी हासिल नहीं कर सकता I बल्कि ऐसा करना मेरे लिए न मुमकिन है I बराए मेहरबानी मेरी मदद करें और मेरी जिंदगी बदलें ताकि मैं उस सच्ची राह पर हो लूँ और अब्दी जिंदगी हासिल करूँ I ऐ  अल्लाह तू मुझ पर रहम फ़रमा I

मसीह की हौसला अफ़ज़ाई और इजाज़त से ऐ खुदा मैं तुझ से दुआ करता हूँ I आमीन I

(दुआ में आप देखें कि कुछ खास चुनिन्दा अलफ़ाज़ इस्तेमाल करनी ज़रूरी नहीं है बल्कि दुआ में खास ज़रूरी है तौबा करने की और रहम की मांग करने की) I

मुक़द्दस इंजील इस बात को भी क़लमबंद करती है कि जब ईसा अल मसीह ने भी एक सामरी औरत का सामना किया तो उसने एक नमूना पेश किया कि एक नबी को किस तरह एक ऐसे शख्स से बरताव करना चाहिए जो उसके लोगों का दुश्मन बतोर माना जाता है I यानी कि (यहूदियों का) I उस सामरी औरत के साथ क्या हुआ और यह वाक़िया हमको कौन सी बात सीखने में मदद करती है कि हमको किस तरह का पड़ौसी बनना ज़रूरी है इसे हम अगली तहरीर में देखेंगे I                                  

ईसा अल मसीह तमसीलों के साथ तालीम देते हैं

हम ने देखा कि किस तरह हज़रत ईसा अल मसीह ने अपने बे मिसल इख्तियार के साथ तालीम दी I उनहों ने कहानी का इस्तेमाल करते हुए भी तालीम दी जो बुनयादी उसूलों की तमसीलें थी I मिसाल के तोर पर हम ने देखा कि उनहों ने किस तरह एक बड़ी शादी की ज़ियाफ़त की कहानी का इस्तेमाल करते हुए खुदा की बादशाही की बाबत तालिम दी , और किस तरह बे रहम नौकर की कहानी के ज़रिये मु आफ़ी की बाबत तालीम दी I इन्हीं कहानियों को तमसीलें कही जाती हैं I अब इस लिए कि हज़रत ईसा अल मसीह तमाम नबियों में बे मिसल हैं देखा गया है कि तालीम देने के लिए उनहों ने कितना ज़ियादा तमसीलों का इस्तेमाल किया और किस तरह उनकी तमसीलें वार करने वाली तमसीलें हैं I

सूरा अल-‘अनकबूत’(सूरा 29 – मकड़ी) हम से कहता है कि अल्लाह तआला भी तमसीलों का इस्तेमाल करता है वह कहता है :

और हम ये मिसाले लोगों के (समझाने) के वास्ते बयान करते हैं और उन को तो बस उलमा ही समझते हैं

सूरा अल – अनकबूत 29:43

सूरा ‘इबराहीम’ (सूरा 14) हम से कहता है अल्लाह तआला किस तरह हमको सिखाने ने के लिए एक दरख़्त कि तमसील का इस्तेमाल करता है I

   (ऐ रसूल) क्या तुमने नहीं देखा कि ख़ुदा ने अच्छी बात (मसलन कलमा तौहीद की) वैसी अच्छी मिसाल बयान की है कि (अच्छी बात) गोया एक पाकीज़ा दरख्त है कि उसकी जड़ मज़बूत है और उसकी टहनियाँ आसमान में लगी होअपने परवरदिगार के हुक्म से हर वक्त फ़ला (फूला) रहता है और ख़ुदा लोगों के वास्ते (इसलिए) मिसालें बयान फरमाता है ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करेंऔर गन्दी बात (जैसे कलमाए शिर्क) की मिसाल गोया एक गन्दे दरख्त की सी है (जिसकी जड़ ऐसी कमज़ोर हो) कि ज़मीन के ऊपर ही से उखाड़ फेंका जाए (क्योंकि) उसको कुछ ठहराओ तो है नहीं

सूरा इब्राहीम 14:24-26

ईसा अल मसीह की तमसीलें

उसके शागिर्दों ने एक मोक़े पर उससे पूछा कि वह तमसीलों का इस्तेमाल क्यूँ करते हैं ? सो उनहों ने जो जवाब दिया उसकी वज़ाहत इंजील में क़लमबंद किया गया है I

10 और चेलों ने पास आकर उस से कहा, तू उन से दृष्टान्तों में क्यों बातें करता है?
11 उस ने उत्तर दिया, कि तुम को स्वर्ग के राज्य के भेदों की समझ दी गई है, पर उन को नहीं।
12 क्योंकि जिस के पास है, उसे दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा; पर जिस के पास कुछ नहीं है, उस से जो कुछ उसके पास है, वह भी ले लिया जाएगा।
13 मैं उन से दृष्टान्तों में इसलिये बातें करता हूं, कि वे देखते हुए नहीं देखते; और सुनते हुए नहीं सुनते; और नहीं समझते।

मत्ती 13:10-13

इसका आख़री जुमला नबी हज़रत यसायाह के अलफ़ाज़ थे जो 700 क़बल मसीह में रहा करते थे और उनहों ने उनपर अफ़सोस ज़ाहिर किया जो अपने दिलों को सख्त करते हैं I दूसरे लफ़्ज़ों में हम कभी कभी कुछ बातें नहीं समझ पाते क्यूंकि हम उसकी शरह से चूक जाते हैं या फिर उसे समझने के लिए बहुत ज़ियादा पेचीदा हो जाते हैं I ऐसी हालत में एक साफ़ वज़ाहत उलझन को दूर कर देती है I मगर दीगर औकात होते हैं जब हम बातों को समझ नहीं पाते हैं I इसका सबब यह होता है कि हम दिल की गहराई में इन बातों को उतारने के लिए तयार नहीं होते हैं I हम फलां बात से राज़ी नहीं होते इसलिए हम लगातार सवाल करते रहते हैं जैसे दमागी तोर से समझने के लिए रुकावट बन गया हो I पर अगर उलझन हमारे दिलों में है, दमाग में नहीं है तब तो फिर किसी तरह की वज़ाहत काफ़ी नहीं है I ऐसी हालत में परेशानी यह है कि हम खुद को सौंपने के लिए रज़ामंद नहीं हैं , न तो हम दमागी तोर से समझते हैं I

जब नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने तमसीलों में तालीम दी तो लोगों की भीड़ पर काफ़ी अच्छा असर पड़ा I लोग दंग रह जाते थे कि इसको यह इल्म कहाँ से आया I वह लोग जो सादे तोर से अपने दमागी ताक़त उसकी बातें नहीं समझते थे , वह कहानी के मुश्ताक़ रहते और आगे की बाबत पूछते, समझ हासिल करते थे I जबकि वह लोग जो सुपुर्द करने लिए रज़ामंद नहीं थे वह कहानी से हिक़ारत और गैर दिलचस्पी के साथ सबक लेते और वह आगे की बातें जानने की कोशिश नहीं करते थे I तमसीलों का इस्तेमाल एक तरीक़ा था उस्तादों के लिए कि वह लोगों को उनकी इलमियत के हिसाब से तक़सीम करे जिस तरह एक किसान गहूँ को पिछोड्ने के ज़रिये भूसी से अलग करता है I जो लोग सुपुर्दगी के लिए रज़ामंद थे वह उन लोगों से अलग किए जाते थे I और जो रज़ामंद नहीं थे वह तमसील को उलझा हुआ पाते थे क्यूंकि उनके दिल उस सच्चाई के सुपुर्द होने के लिए रज़ामंद नहीं थे ताकि वह देखते हुए भी न देखें I

बीज बोने वाले की तमसील और चार तरह की ज़मीन

जब शागिर्द हज़रत ईसा अल मसीह से तमसीलों से तालीम देने की बाबत सवाल पूछ रहे थे I उसने खुदा की बादशाही की तालीम दी कि वह आदमियों पर कैसे असर करती है तो पहले असर की बाबत मत्ती का बयान इस तरह है :

3 और उस ने उन से दृष्टान्तों में बहुत सी बातें कही, कि देखो, एक बोने वाला बीज बोने निकला।
4 बोते समय कुछ बीज मार्ग के किनारे गिरे और पक्षियों ने आकर उन्हें चुग लिया।
5 कुछ पत्थरीली भूमि पर गिरे, जहां उन्हें बहुत मिट्टी न मिली और गहरी मिट्टी न मिलने के कारण वे जल्द उग आए।
6 पर सूरज निकलने पर वे जल गए, और जड़ न पकड़ने से सूख गए।
7 कुछ झाड़ियों में गिरे, और झाड़ियों ने बढ़कर उन्हें दबा डाला।
8 पर कुछ अच्छी भूमि पर गिरे, और फल लाए, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।
9 जिस के कान हों वह सुन ले॥

मत्ती 13:3-9

तो फिर इस तमसील के क्या मायने हैं ? हमको अंदाज़ा लगाना नहीं है I जबकि वह लोग जो कलाम के सुपुर्द होने के लिए रज़ामंद थे वह तमसील के ज़रिये क़यास करने लगे और उसका मतलब पूछने लगे जो उसने दी थी :

 18 सो तुम बोने वाले का दृष्टान्त सुनो।
19 जो कोई राज्य का वचन सुनकर नहीं समझता, उसके मन में जो कुछ बोया गया था, उसे वह दुष्ट आकर छीन ले जाता है; यह वही है, जो मार्ग के किनारे बोया गया था।
20 और जो पत्थरीली भूमि पर बोया गया, यह वह है, जो वचन सुनकर तुरन्त आनन्द के साथ मान लेता है।
21 पर अपने में जड़ न रखने के कारण वह थोड़े ही दिन का है, और जब वचन के कारण क्लेश या उपद्रव होता है, तो तुरन्त ठोकर खाता है।
22 जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता।
23 जो अच्छी भूमि में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनकर समझता है, और फल लाता है कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।

मत्ती 13:18-23

खुदा की बादशाही की बाबत पैगाम सुनने के बाद लोगों के दिलों में चार तरह से नतीजे हासिल होते हैं I पहला है पैगाम को ‘न समझने’ का नतीजा क्यूंकि शैतान (इबलीस) इस पैगाम को उनके दिलों से छीन ले जाता है I बचे हुए तीन नतीजे पहले तो असबाती नज़र आते हैं और वह पैगाम को खुशी से क़बूल तो कर लेते हैं मगर उस पैगाम को चाहिए कि हमारे दिलों में तरक़्क़ी करे चाहे वह मुश्किल औक़ात हि क्यूँ न हों I दूसरी बात यह है कि इस पैगाम को अपने दमाग में बसा लेना ही काफ़ी नहीं है बल्कि उसको हमारी ज़िंदगियों में लगातार जारी रहने की ज़रूरत है जैसे हम चाहते हैं I सो दो तरह के यह नतीजे , हालांकि वह शुरू शुरू में पैगाम को हासिल तो कर लेते हैं मगर अपने दिल में उसे पनपने नहीं देते I सिर्फ चौथा दिल है जो कलाम को सुनता है और उसे समझता भी है I वह खुद को इस बतोर सुपुर्द करता है जैसे अल्लाह उससे तवक़्क़ो रखता है I

इस तमसील की बाबत एक बात यह है कि यह हमको सवाल करने पर मजबूर करता है कि ‘उन चार अशखास मे से मैं कौन हूँ’ ? या यूं समझें कि पैगाम सुनने वालों की चार जमाअत में से ‘मैं कौन सी जमाअत में शामिल हूँ’ ? सिर्फ वह जमाअत जो सच मुच में तमसील को ‘समझती’ है I यानी कि सब से बहतरीन ज़मीन जिस में फ़सल उगाने से अच्छी फ़सल देगा I (यहाँ फ़सल से मुराद कलाम की फ़सल से है) I पैगाम को समझने में जो बात क़ुव्वत बख्शती है वह है उस पर गौर करना जो पहले के नबियों यानि कि हज़रत आदम के साथ खुदा के मंसूबे की शुरुआत हुई थी और यह आगे बढ़ कर तौरेत और ज़बूर के नबियों में जारी रही I आदम के बाद तौरेत में अहम निशानियाँ , हज़रत इब्राहिम से किए गए वायदों और उसकी कुर्बानी से , हज़रत मूसा के दस अहकाम , हज़रत हारून के ज़बीहे यह सब के सब मसीह की कुर्बानी के अक्स और इब्तिदा हैं I इन्हें समझने के लिए इन इब्तिदाई बातों को समझना ज़रूरी है I इसके साथ ही यसायाह ,यरम्याह , ज़करियाह , दानिएल और मलाकी के मुकशफ़े यह भी हमें खुदा की बादशाही के पैगाम को समझने के लिए तयार करती हैं I

जंगली दानों की तमसील

इस तमसील की वज़ाहत के बाद नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने जंगली दानों की तमसील की बाबत सिखाया I

 24 उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया कि स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिस ने अपने खेत में अच्छा बीज बोया।
25 पर जब लोग सो रहे थे तो उसका बैरी आकर गेहूं के बीच जंगली बीज बोकर चला गया।
26 जब अंकुर निकले और बालें लगीं, तो जंगली दाने भी दिखाई दिए।
27 इस पर गृहस्थ के दासों ने आकर उस से कहा, हे स्वामी, क्या तू ने अपने खेत में अच्छा बीज न बोया था फिर जंगली दाने के पौधे उस में कहां से आए?
28 उस ने उन से कहा, यह किसी बैरी का काम है। दासों ने उस से कहा क्या तेरी इच्छा है, कि हम जाकर उन को बटोर लें?
29 उस ने कहा, ऐसा नहीं, न हो कि जंगली दाने के पौधे बटोरते हुए उन के साथ गेहूं भी उखाड़ लो।

मत्ती 13 : 24 — 29

जो उसने वज़ाहत पेश की वह इस तरह से है :

  36 तब वह भीड़ को छोड़ कर घर में आया, और उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा, खेत के जंगली दाने का दृष्टान्त हमें समझा दे।
37 उस ने उन को उत्तर दिया, कि अच्छे बीज का बोने वाला मनुष्य का पुत्र है।
38 खेत संसार है, अच्छा बीज राज्य के सन्तान, और जंगली बीज दुष्ट के सन्तान हैं।
39 जिस बैरी ने उन को बोया वह शैतान है; कटनी जगत का अन्त है: और काटने वाले स्वर्गदूत हैं।
40 सो जैसे जंगली दाने बटोरे जाते और जलाए जाते हैं वैसा ही जगत के अन्त में होगा।
41 मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करने वालों को इकट्ठा करेंगे।
42 और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे, वहां रोना और दांत पीसना होगा।
43 उस समय धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की नाईं चमकेंगे; जिस के कान हों वह सुन ले॥

मत्ती 13 : 36 – 43

राई का दाना और ख़मीर की तमसीलें

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने कुछ और मुख़तसर तमसीलें भी सिखाईं I

 31 उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया; कि स्वर्ग का राज्य राई के एक दाने के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने लेकर अपने खेत में बो दिया।
32 वह सब बीजों से छोटा तो है पर जब बढ़ जाता है तब सब साग पात से बड़ा होता है; और ऐसा पेड़ हो जाता है, कि आकाश के पक्षी आकर उस की डालियों पर बसेरा करते हैं॥
33 उस ने एक और दृष्टान्त उन्हें सुनाया; कि स्वर्ग का राज्य खमीर के समान है जिस को किसी स्त्री ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिला दिया और होते होते वह सब खमीर हो गया॥

मत्ती 13: 31—33

खुदा की बादशाही इस दूनया में एक छोटे और अदना पैमाने से शुरू होगी मगर वह पूरी दूनया में फैल जाएगी उस ख़मीर की मानिंद जिसे बहुत सारा गुँधे हुए आटे में मिला दिया जाता है तो वह सारा गूँधा हुआ आटा ख़मीरा हो जाता है I वह एक छोटे बीज की तरह है जब उसे ज़मीन में बोया जाता है तो पहले एक छोटे पौडे की तरह होता है और आगे चल कर एक बहुत बड़ा दरख्त बन जाता है I आप देखें कि उसे बढ्ने के लिए उसपर कोई ज़बरदस्ती नहीं की जाती ना ही उसे बढ्ने के लिए मजबूर किया जाता है बल्कि वह खुद ब खुद बढ़ता ,और फलता फूलता जाता है I यह भी नहीं कि यह सब कुछ एक ही पल में होजता है बल्कि उसका बढ्ना गैबी तरीक़े से होता है मगर हर जगह और बिना रुके बढ़ता रहता है I

पोशीदा ख़ज़ाना और बेश क़ीमती मोती की तमसील

44 स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया॥
45 फिर स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है जो अच्छे मोतियों की खोज में था।
46 जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उस ने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया॥

मत्ती 13:44—46

यह तमसीलें खुदा की बादशाही की क़दर ओ क़ीमत को ज़ाहिर करती हैं I उस खजाने की बाबत सोचें जो किसी खेत में छिपाया गया है या गड़ा हुआ है I ऊपर से तो वह एक मामूली खेत है I हर आने जाने वाला सोचता है उसकी एक मामूली क़ीमत होगी इस लिए उसको खरीदने में कोई दिलचस्पी ज़ाहिर नहीं करता I मगर जिस शख्स ने उस खेत में खज़ाना छिपाया वह जानता है कि उस खेत की क़ीमत क्या है I सचमुच उसकी बड़ी क़ीमत है I इतनी बड़ी क़ीमत कि अपना सबकुछ बेचकर उसे ख़रीदने के लिए तयार हो जाता है I सो आप देखें कि यह ख़ुदा की बादशाही की बाबत है I उसकी एक क़ीमत है जिसकी बहुतों को इल्म नहीं है I ऐसे बहुत कम लोग हैं जो उसके मुस्तहक़ हैं I वह एक बहुत ही आला और बेहतरीन चीज़ के हक़दार होंगे I

एक बड़े जाल की तमसील

 47 फिर स्वर्ग का राज्य उस बड़े जाल के समान है, जो समुद्र में डाला गया, और हर प्रकार की मछिलयों को समेट लाया।
48 और जब भर गया, तो उस को किनारे पर खींच लाए, और बैठकर अच्छी अच्छी तो बरतनों में इकट्ठा किया और निकम्मी, निकम्मीं फेंक दी।
49 जगत के अन्त में ऐसा ही होगा: स्वर्गदूत आकर दुष्टों को धमिर्यों से अलग करेंगे, और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे।
50 वहां रोना और दांत पीसना होगा।

मत्ती 13:47—50

ख़ुदा की बादशाही लोगों को अलग करेगी I इस अलगाओ को इंसाफ़ के दिन मुकम्मल तरीक़े से इंकिशाफ़ किया जाएगा — जब दिलों को खाली छोड़ दिया जाएगा I

ख़ुदा की बादशाही पोशीदा तोर से बढ़ती जाती है आटे में ख़मीर की तरह , इसकी बड़ी क़दर ओ क़ीमत है जो बहुतों से छिपी है I और यह लोगों के दरमियान फ़रक़ फ़रक़ ज़िम्मेदारियों के लिये सबब बनता है I और जो लोग इसे समझते हैं और जो लोग इसे नहीं समझते उन्हें उनसे जुदा करता है I इन तमसीलों की तालिम देने के बाद नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने सामईन से एक ज़रूरी सवाल पूछा I

क्या तुम ने ये सब बातें समझीं?

मत्ती 13 : 51

आप के बारे में क्या ख़याल है ?                        

ईसा अल मसीह मुआफ़ी पर तालीम देते हैं

सूरा गफ़ीर (सूरा 40 –- मुआफ़ करने वाला) सिखाता है कि अल्लाह तआला अज़ हद मगफ़िरत करने वाला है I

और तुमको क्या हो गया कि (अपना माल) ख़ुदा की राह में ख़र्च नहीं करते हालॉकि सारे आसमान व ज़मीन का मालिक व वारिस ख़ुदा ही है तुममें से जिस शख़्श ने फतेह (मक्का) से पहले (अपना माल) ख़र्च किया और जेहाद किया (और जिसने बाद में किया) वह बराबर नहीं उनका दर्जा उन लोगों से कहीं बढ़ कर है जिन्होंने बाद में ख़र्च किया और जेहाद किया और (यूँ तो) ख़ुदा ने नेकी और सवाब का वायदा तो सबसे किया है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़ूब वाक़िफ़ है

रा गफ़ीर 40: 3 और 7

सूरा अल हुजरात (सूरा 49 –- कमरे) हमको बताता है कि अल्लाह के रहम को हासिल करने के लिए हमको एक दूसरे के बीच सलामती बनाए रखने की ज़रूरत है –

 मोमिनीन तो आपस में बस भाई भाई हैं तो अपने दो भाईयों में मेल जोल करा दिया करो और ख़ुदा से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाए

सूरा अल – हुजरात  49:10

हज़रत ईसा अल मसीह ने अल्लाह की जानिब से होने वाली उस मु आफ़ी की बाबत तालीम दी I और इसके साथ ही हमें एक दूसरे को मुआफ़ करने की हिदायत को जोड़ दिया I

एक दूसरे को मुआफ़ करने की बाबत हज़रत ईसा अल मसीह        

जब मैं दुन्या ख़बरें देखता हूँ तो यह नज़र आता है कि ख़ून रेज़ियाँ और तशद्दुद हर तरफ़ बढ़ रहे हैं I अफ़गानिस्तान में बंबारियाँ, लबनान के अतराफ़ लड़ाइयाँ, सीरिया और ईराक़ के झगड़े, मिसर में तशद्दुद, पाकिस्तान में क़त्ल –ए-आम, तुरकी में दंगे फसाद, नाईजेरिया स्कूल के बच्चों का अगवा किया जाना, फलस्तीन और इसराईल के साथ जंग, कीनिया में बे दरदी से क़त्ल –ए-आम, यह तमाम बातें जिन को मैं ने सुना है बगैर देखी बुरी खबरें हैं I इन सब के अलावा दीगर कई एक गुनाह हैं जो चोट और दुख पहुंचाते हैं I हमने एक दूसरे को चोट पहुंचाए, तकलीफ़ें दीं, दुख दिये I यह वह बातें हैं जो अखबारों की सुर्खियों में नहीं पाये जाते I मगर किसी तरह हमें चोट ज़रूर पहुंचाते हैं — इंतिक़ाम और बदले का एहसास जो इन दिनों में पाया जाता है ईसा अल मसीह की मु आफ़ी पर तालीम लाज़िमी तोर से ज़ियादा अहमियत रखता है I एक बार उसके शागिरदों ने उससे पूछा कि हम अपने भाई को कितनी बार मुआफ़ करें ? यहाँ आप देखें कि इसकी बाबत इंजील का बयान पाया जाता है I 21 तब पतरस ने पास आकर, उस से कहा, हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूं, क्या सात बार तक?
22 यीशु ने उस से कहा, मैं तुझ से यह नहीं कहता, कि सात बार, वरन सात बार के सत्तर गुने तक।
23 इसलिये स्वर्ग का राज्य उस राजा के समान है, जिस ने अपने दासों से लेखा लेना चाहा।
24 जब वह लेखा लेने लगा, तो एक जन उसके साम्हने लाया गया जो दस हजार तोड़े धारता था।
25 जब कि चुकाने को उसके पास कुछ न था, तो उसके स्वामी ने कहा, कि यह और इस की पत्नी और लड़के बाले और जो कुछ इस का है सब बेचा जाए, और वह कर्ज चुका दिया जाए।
26 इस पर उस दास ने गिरकर उसे प्रणाम किया, और कहा; हे स्वामी, धीरज धर, मैं सब कुछ भर दूंगा।
27 तब उस दास के स्वामी ने तरस खाकर उसे छोड़ दिया, और उसका धार क्षमा किया।
28 परन्तु जब वह दास बाहर निकला, तो उसके संगी दासों में से एक उस को मिला, जो उसके सौ दीनार धारता था; उस ने उसे पकड़कर उसका गला घोंटा, और कहा; जो कुछ तू धारता है भर दे।
29 इस पर उसका संगी दास गिरकर, उस से बिनती करने लगा; कि धीरज धर मैं सब भर दूंगा।
30 उस ने न माना, परन्तु जाकर उसे बन्दीगृह में डाल दिया; कि जब तक कर्ज को भर न दे, तब तक वहीं रहे।
31 उसके संगी दास यह जो हुआ था देखकर बहुत उदास हुए, और जाकर अपने स्वामी को पूरा हाल बता दिया।
32 तब उसके स्वामी ने उस को बुलाकर उस से कहा, हे दुष्ट दास, तू ने जो मुझ से बिनती की, तो मैं ने तो तेरा वह पूरा कर्ज क्षमा किया।
33 सो जैसा मैं ने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?
34 और उसके स्वामी ने क्रोध में आकर उसे दण्ड देने वालों के हाथ में सौंप दिया, कि जब तक वह सब कर्जा भर न दे, तब तक उन के हाथ में रहे।
35 इसी प्रकार यदि तुम में से हर एक अपने भाई को मन से क्षमा न करेगा, तो मेरा पिता जो स्वर्ग में है, तुम से भी वैसा ही करेगा॥

मत्ती 18:21-35

इस कहानी का मुद्दा यह है कि अगर हम ने अल्लाह के रहम को कबूल किया है तो अल्लाह (जो बादशाह है) अफरात से हमको मु आफ़ करता है I इसको दस हज़ार अशरफ़ी के थैलों इशारी तर्ज़ में पेश किया गया है जो नौकर का बादशाह पर क़र्ज़ा बंता था I नौकर ने बादशाह से दरखास्त की कि इस बड़े क़र्ज़े को उतारने के लिए उसे कुछ दिनों की मोहलत की ज़रूरत है I मगर डबल्यूएच रक़म इतनी बड़ी थी कि मोहलत देने पर भी उसकी अदाएगी कभी नहीं हो सकती थी I बादशाह ने उस नौकर पर तरस खा कर उस का सारा क़रज़ा मुआफ कर दिया I यही अल्लाह तआला भी हमारे लिए करता है जब हम उसके रहम को हासिल करते हैं I

मगर जब यही नौकर अपने साथी नौकर के पास जाता है जिसके सौ चांदी के सिक्के क़र्ज़ा बनता था I सो उसने अपना दिया हुआ पूरा क़र्ज़ा उस से तलब करने लगा –और उसको कोई मोहलत भी नहीं दी I जब हम एक दूसरे के खिलाफ़ गुनाह करते हैं तो उन्हें चोट और नुक़सान पहुंचाते हैं I मगर मवाज़िना करें कि हमारे गुनाहों ने किस तरह अल्लाह को चोट और नुकसान पहुंचाया होगा जिसको हम हल्की बात समझते हैं – जैसे 100 चांदी के सिक्कों का मवाज़िना दस हज़ार अशरफ़ी की थैलियों से किया जाए I

तो फिर बादशाह (अल्लाह) उस नौकर को क़ैद में डलवा देता है कि उसके हर एक चीज़ को वापस करे I ईसा अल मसीह की तालीम हमको यह सिखाती है कि लोगों ने जो हमारे खिलाफ में गुनाह किए उन्हें बख्शे न जाने के सबब से हम भी अल्लाह त आला की मगफ़िरत से महरूम रह जाते और खुद को जहन्नम के लायक़ बना लेते हैं I इंसान की इससे बदतर और संजीदा हालत क्या हो सकती है ?

यहाँ हमारे लिए एक सबक़ मिलता है कि मुआफ़ी की रूह को बनाए रखें I मतलब यह कि दूसरों को मुआफ़  करने का जज़बा हर हमेशा हमारे अंदर होना चाहिए I जब कोई शख़्स हमें चोट पहुंचाता है तो हमारे अंदर बदले का एहसास बड़ा हो सकता है I मगर ऐसे वक़्त में मुआफ़ी के उस रूह को कहाँ से और कैसे हासिल किया जा सकता है जो दूसरों को मुआफ़ करदे I इसके लिए हम इंजील की तलाश जारी रखेंगे I                         

ईसा अल मसीह अंदरूनी पाकीज़गी की बाबत तालीम देते हैं

पाक होना कितना ज़रूरी है ? सूरा अन –निसा (सूरा 4 – औरत) बयान करती है :

 ऐ ईमानदारों तुम नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ ताकि तुम जो कुछ मुंह से कहो समझो भी तो और न जिनाबत की हालत में यहॉ तक कि ग़ुस्ल कर लो मगर राह गुज़र में हो (और गुस्ल मुमकिन नहीं है तो अलबत्ता ज़रूरत नहीं) बल्कि अगर तुम मरीज़ हो और पानी नुक़सान करे या सफ़र में हो तुममें से किसी का पैख़ाना निकल आए या औरतों से सोहबत की हो और तुमको पानी न मयस्सर हो (कि तहारत करो) तो पाक मिट्टी पर तैमूम कर लो और (उस का तरीक़ा ये है कि) अपने मुंह और हाथों पर मिट्टी भरा हाथ फेरो तो बेशक ख़ुदा माफ़ करने वाला है

और) बख्श ने वाला है(सूरा अन – निसा 4:43

सूरा अन – निसा में यह हुक्म है कि नमाज़ से पहले अपने हाथ मुंह को पाक मिट्टी से साफ़ करो I यानी कि बाहिरी पाकी सफ़ाई ज़रूरी है I

सूरा अश – शम्स (सूरा 91 — आफ़ताब) हमसे कहती है कि हमारी जान –हमारी बातिनी शख्सियत भी मसावी तोर से उतनी ही ज़रूरी है I

   और जान की और उसे दुरूस्त कियाफिर उसकी बदकारी और परहेज़गारी को उसे समझा दिया(क़सम है) जिसने उस (जान) को (गनाह से) पाक रखा वह तो कामयाब हुआऔर जिसने उसे (गुनाह करके) दबा दिया वह नामुराद रहा      

सूरा अश –शम्स 91: 7-10

(सूरा अश – शम्स हम से कहती है कि हमारी जान या अंदरूनी शख्सियत अगर साफ़ है तभी हम ने कामियाबी को पालिया है पर अगर हमारी जान बिगड़ी हुई है तो फिर हम नाकाम हो जाते हैं I ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) ने भी अंदरूनी और बाहिरी पाकीज़गी कि बाबत तालीम दी I

हम ने देखा कि हज़रत ईसा आला मसीह के कलाम में कुव्वत थी जिस से कि वह इख्तियार के साथ तालीम देते , लोगों को शिफा देते यहाँ तक कि अपने कलाम से क़ुदरत पर भी क़ाबू रखते थे I उनहों ने यह भी तालीम दी कि ख़ुदा के सामने हम अपने दिलों की हालत को खोल दें जिस तरह हसमारी बाहिरी हालत है ताकि ख़ुद को जांच सकें I हम बाहिरी पाकीज़गी से तो मशहूर हैं जिस के लिए हम नमाज़ से पहले वज़ू करते हैं और यह भी कि हलाल गोश्त खाने को अहमियत देते हैं I हज़रत मोहम्मद (सल्लम) ने एक हदीस में फ़रमाया कि :

       “पाकीज़गी आधा ईमान है …”

मुसलिम बाब 1 किताब 002 सफ़हा 0432

नबी हज़रत ईसा अल मसीह भी हम से चाहते थे कि उस दूसरे आधे ईमान कि बाबत सोचें — जो कि अंदरूनी पाकीज़गी है I यह बहुत ज़रूरी है हालांकि बनी इंसान दूसरे लोगों की बाहिरी पाकीज़गी की तरफ़ क्यूँ न देखता हो मगर अल्लाह की नज़र में यह फ़रक़ है —वह अंदरूनी पाकीज़गी की तरफ़ भी देखता है I जब यहूदा के बादशाहों में से एक ने मज़हबी रिवायात की तमाम पाबंदियों को बाहिरी तोर से लाज़िम ठहराया मगर अपने अंदरूनी दिल की पाकीज़गी पर धियान नहीं दिया तो उस ज़मानेका एक नबी इस पैगाम को लेकर आया :

9 देख, यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिये फिरती रहती है कि जिनका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपना सामर्थ दिखाए। तूने यह काम मूर्खता से किया है, इसलिये अब से तू लड़ाइयों में फंसा रहेगा।

2 तवारीक़ 16:9

जिस् तरह से यह पैगाम सुनाया गया है हम को ‘दिल’ से अंदरूनी पाकीज़गी को अंजाम देना ज़रूरी हो गया — ‘तुम’ का जो लाफ़्ज़ है वह सोचता , महसूस करता , फ़ैसला करता , इताअत करता या ना फ़रमानी करता है और ज़ुबान को क़ाबू में रखता है I ज़बूर शरीफ़ के नबियों ने तालीम दी कि यह हमारे दिलों की प्यास थी जो कि हमारे गुनाहों की जड़ पर थी I हमारे दिल इतने अहम हैं कि हज़रत ईसा अल मसीह ने अपनी तालीम में हमारी बाहिरी पाकीज़गी का मुक़ाबला करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया I यहाँ इंजील की उन बातों का ज़िकर है जब ईसा अल मसीह ने फ़रक़ फ़रक़ औक़ात में अंदरूनी पाकीज़गी की बाबत तालीम दी I

बाहिरी पाकीज़गी के साथ साथ अंदर की भी सफ़ाई करो

(‘फ़रीसियों’ के बारे में यहाँ ज़िकर किया गया है I उस जमाने में यह यहूदी उस्ताद थे जिस तरह मौजूदा ज़माने के इमाम लीग होते हैं I हज़रत ईसा यहाँ ख़ुदा के लिए ‘दहयकी’ देने की बात करते हैं I यह यहूदी ज़कात के लिए ज़रूरी था I )

37 जब वह बातें कर रहा था, तो किसी फरीसी ने उस से बिनती की, कि मेरे यहां भेजन कर; और वह भीतर जाकर भोजन करने बैठा।
38 फरीसी ने यह देखकर अचम्भा दिया कि उस ने भोजन करने से पहिले स्नान नहीं किया।
39 प्रभु ने उस से कहा, हे फरीसियों, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर तो मांजते हो, परन्तु तुम्हारे भीतर अन्धेर और दुष्टता भरी है।
40 हे निर्बुद्धियों, जिस ने बाहर का भाग बनाया, क्या उस ने भीतर का भाग नहीं बनाया?
41 परन्तु हां, भीतरवाली वस्तुओं को दान कर दो, तो देखो, सब कुछ तुम्हारे लिये शुद्ध हो जाएगा॥
42 पर हे फरीसियों, तुम पर हाय ! तुम पोदीने और सुदाब का, और सब भांति के साग-पात का दसवां अंश देते हो, परन्तु न्याय को और परमेश्वर के प्रेम को टाल देते हो: चाहिए तो था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते।
43 हे फरीसियों, तुम पर हाय ! तुम आराधनालयों में मुख्य मुख्य आसन और बाजारों में नमस्कार चाहते हो।
44 हाय तुम पर ! क्योंकि तुम उन छिपी कब्रों के समान हो, जिन पर लोग चलते हैं, परन्तु नहीं जानते॥

लूक़ा 11:37-44

यहूदी शरीअत के मुताबिक़ एक यहूदी जब एक मुर्दा जिस्म को छूता है तो वह नापाक ठहरता है I जब हज़रत ईसा ने कहा कि लोग जब ‘उन क़ब्रों’ पर चलते हैं जिन पर ‘निशान नहीं बने होते’ इसका मतलब यह है कि वह यहाँ तक कि उसे ‘जानते हुए’ भी नापाक ठहरे क्यूंकी वह अंदरूनी पाकीज़गी का इंकार कर रहे थे I अगर हम इसका इंकार करते हैं तो हम भी गैर ईमानदारों की तरह नापाक ठहर सकते थे जो किसी तरह की पाकीज़गी का ख़्याल नहीं रखता I

मज़हबी तोर से पाकीज़ा शख्स को दिल नापाक टहराता है

ज़ेल की तालीम में ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) नबी यसायाह (अलैहिस्सलाम) का हवाला पेश करते हैं जो 750 क़बल मसीह में रहते थे I यहाँ नबी यसायाह की बाबत इतला के लिए हवाला पेश किया गया है :

ब यरूशलेम से कितने फरीसी और शास्त्री यीशु के पास आकर कहने लगे।
2 तेरे चेले पुरनियों की रीतों को क्यों टालते हैं, कि बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं?
3 उस ने उन को उत्तर दिया, कि तुम भी अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो?
4 क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, कि अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: और जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।
5 पर तुम कहते हो, कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, कि जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुंच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाई जा चुकी।
6 तो वह अपने पिता का आदर न करे, सो तुम ने अपनी रीतों के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया।
7 हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक की।
8 कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है।
9 और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।
10 और उस ने लोगों को अपने पास बुलाकर उन से कहा, सुनो; और समझो।
11 जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।
12 तब चेलों ने आकर उस से कहा, क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई?
13 उस ने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा।
14 उन को जाने दो; वे अन्धे मार्ग दिखाने वाले हैं: और अन्धा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड़हे में गिर पड़ेंगे।
15 यह सुनकर, पतरस ने उस से कहा, यह दृष्टान्त हमें समझा दे।
16 उस ने कहा, क्या तुम भी अब तक ना समझ हो?
17 क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता, वह पेट में पड़ता है, और सण्डास में निकल जाता है?
18 पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।
19 क्योंकि कुचिन्ता, हत्या, पर स्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलतीं है।
20 यही हैं जो मनुष्य को अशुद्ध करती हैं, परन्तु हाथ बिना धोए भोजन करना मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता॥

मत्ती 15:1-20

इस मुक़ाबले पर आने में हज़रत ईसा ने इशारा किया की हम ख़ुदा के पैगाम की बनिस्बत ‘इंसानी रिवायतों’ से मज़हबी पाबंदियों को नाफ़िज़ करने में बहुत तेज़ फहम हैं I यहूदी रहनुमाओं ने अपनी रिवायतों को अल्लाह के सामने नज़रअंदाज़ कर दिया इस बतोर कि उनहो ने अपने माँबाप को पैसे दिये ताकि उनकी उमर रसीदा दिनों में उनकी परवाह हो सके बजाए इस के कि उनकी ख़िदमत करे या उन का सहारा बने I ऐसा उनहों ने अपने मज़हबी वुजूहात की बिना पर किया I

आज भी हम अपनी अंदरूनी पाकीज़गी को लेकर उसकी इज़्ज़त न करते हुए इसी तरह की परेशानी का सामना करते हैं I मगर अल्लाह हमारे दिल से निकलने वाली हरेक नापाकी की बाबत ज़ियादा फ़िकरमंद है I अगर यह पाकीज़ा न हुआ तो इस नापाकी का अंजाम अदालत के दिन हमको अब्दी हलाकत की तरफ़ ले जाएगा I

बाहर से खूबसूरत मगर अंदर से नजासत से भरपूर

25 हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर असंयम से भरे हुए हैं।
26 हे अन्धे फरीसी, पहिले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों॥
27 हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हिड्डयों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।
28 इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो॥

मत्ती 23:25-28

जो हम सब ने देखा है उसकी बाबत हज़रत ईसा अल मसीह बयान करते हैं I ख़ुदा में जो ईमानदार पाए जाते हैं उनमें से बाहिरी पाकीज़गी का पीछा करने वाले आम हो सकते हैं ,मगर उनमें से बहुत से हैं जो बातिनी तोर से हिर्स और लुत्फ़ अंदोज़ी से भरे हुए हैं – यहाँ तक कि वह मज़हबी तोर से अहम शख़्सियत कहलाते हैं I अंदरूनी पाकीज़गी को हासिल करना हमारे लिए बहुत ज़रूरी है I मगर यह ज़ियादा मुश्किल है I अल्लाह हमारी बातिनी पाकीज़गी का बड़ी होशियारी से इनसाफ़ करेगा I सो यह मामला अपने आप से उठता है कि : हम अपने दिलों को कैसे साफ़ करते हैं ताकि अदालत के दिन हम ख़ुदा की बादशाही में दाख़िल हो सकें ? जवाबों के लिए हम इंजील को जारी रखेंगे I      

ख़ुदा की बादशाही : बहुतों के लिए दावत है मगर …

सूरा अस-सजदा (सूरा 32 – सजदा करना) यह बयान करता है कि जो लोग पुर शोक़ तरीक़े से सजदा करते हुए नमाज़ अदा करता है वह लोग इनाम के हक़दार हैं I

उन लोगों की कारगुज़ारियों के बदले में कैसी कैसी ऑंखों की ठन्डक उनके लिए ढकी छिपी रखी है उसको कोई शख़्श जानता ही नहीं  

सूरा अस-सजदा 32:17

सूरा अर-रहमान (सूरा 55 – करीमुन नफ़्स) आयत 13-77 तक 31 मर्तबा एक ही सवाल को पूछा गया है

तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगेफिर तुम अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से इन्कार करोगे

सूरा अर-रहमान 55:13-77

अगर इस तरह की खुशियाँ एक रास्तबाज़ के लिए जमा की जाती हैं तो एचएएम सोचेंगे कि ख़ुदावंद की तरफ़ से इस तरह की इनायत का कोई भी शख्स इंकार नहीं करेगा I अगर ऐसा करे तो वह सब से बड़ी बे वक़ूफ़ी होगी I मगर नबी हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) तमसीलों के ज़रिये हमें सिखाते हैं कि ख़ुदावंद की इन इनायतों का इंकार करते हुए जो हमारे लिए जखीरा किया हुआ है हम हक़ीक़ी तोर से ख़तरे में पड़े हुए हैं I आइये देखेँ सब से पहले थोड़ा नज़र ए सानी I

हम ने देखा कि नबी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम)का इख्तियार का ऐसा कलाम था जिस से बीमार शिफ़ा पाते और यहाँ तक कि कुदरत भी उसका हुक्म मानते थे और उसकी तालिम से हारकोइ हैरान था I इसके साथ ही उसने ख़ुदा की बादशाही की बाबत भी बहुत कुछ तालीम दी I कई एक ज़बूर के नबियों ने आने वाली ख़ुदा की बादशाही की बाबत लिखे थे I हज़रत ईसा ने इन्हीं को बुनयाद मानकर तालीम दी कि बादशाही नज़दीक थी I

उसने सब से पहले पहाड़ी वाज़ सिखाया यह बताते हुए कि ख़ुदा की बादशाही के शहरियों को किस तरह एक दूसरे से महब्बत करनी चाहिए I दुख, मुसीबत, मौत ,बे इंसाफ़ी , दहशत और खौफ़नाकी जिनका हम मौजूदा दौर में तजरुबा करते है (मौजूदा खबरों को सुनिए) I अब इसलिए कि ख़ुदा की महब्बत की बाबत लोग उसकी तालीम को नहीं सुन्ना चाहते I इस दूनया की जहन्न्मी जिंदगी के मुक़ाबले में ख़ुदा की बादशाही की उस जिंदगी की बाबत अगर थोड़ा सा भी समझ रखेंगे तो मैं सोचता हूँ कि हमारा आपसी बर्ताव में महब्बत के साथ बहुत कुछ फ़रक़ एनएज़ेडएआर आएगा I

बड़ी ज़ियाफ़त की तमसील

जबकि बहुत बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो हज़रत ईसा अल मसीह जैसी जिंदगी गुज़ारते हैं I उनहों ने जिस तरह से ख़ुदा की बादशाही की तालीम दी उसके मुताबिक़ आप सोचते होंगे कि बहुत ही कम लोग होंगे जो ख़ुदा की बादशाही में बुलाए जाएंगे I मगर यह ऐसा नहीं है I हज़रत ईसा ने एक बहुत बड़ी शादी की ज़ियाफ़त के बारे में तमसील देकर सिखाया कि बादशाही कितनी दूर तक फैली हुई है I उसकी पहुँच कहाँ तक है I मगर वह इतना दूर नहीं जैसे हम उम्मेद करते हैं I इंजील इसे इस तरह बयान करती है :

15 उसके साथ भोजन करने वालों में से एक ने ये बातें सुनकर उस से कहा, धन्य है वह, जो परमेश्वर के राज्य में रोटी खाएगा।
16 उस ने उस से कहा; किसी मनुष्य ने बड़ी जेवनार की और बहुतों को बुलाया।
17 जब भोजन तैयार हो गया, तो उस ने अपने दास के हाथ नेवतहारियों को कहला भेजा, कि आओ; अब भोजन तैयार है।
18 पर वे सब के सब क्षमा मांगने लगे, पहिले ने उस से कहा, मैं ने खेत मोल लिया है; और अवश्य है कि उसे देखूं: मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।
19 दूसरे ने कहा, मैं ने पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं: और उन्हें परखने जाता हूं : मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।
20 एक और ने कहा; मै ने ब्याह किया है, इसलिये मैं नहीं आ सकता।
21 उस दास ने आकर अपने स्वामी को ये बातें कह सुनाईं, तब घर के स्वामी ने क्रोध में आकर अपने दास से कहा, नगर के बाजारों और गलियों में तुरन्त जाकर कंगालों, टुण्डों, लंगड़ों और अन्धों को यहां ले आओ।
22 दास ने फिर कहा; हे स्वामी, जैसे तू ने कहा था, वैसे ही किया गया है; फिर भी जगह है।
23 स्वामी ने दास से कहा, सड़कों पर और बाड़ों की ओर जाकर लोगों को बरबस ले ही आ ताकि मेरा घर भर जाए।
24 क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि उन नेवते हुओं में से कोई मेरी जेवनार को न चखेगा।

लूक़ा 14:15 -24

हमारे क़बूल किए हुए समझ कई दफ़ा इस कहानी में उल्टे हो जाते हैं I सबसे पहले फर्ज़ कर सकते हैं कि अल्लाह उसकी अपनी बादशाही में बहुत से लोगों को दावत नहीं देगा (जो उसके घर की शादी की ज़ियाफ़त है) क्यूंकि वह क़ाबिल लोगों को नहीं पाता है जो इस ज़ियाफ़त मे शरीक हो सके I मगर यह ख़्याल गलत है I आप देखें कि इस बड़ी ज़ियाफ़त की दावत बहुत बहुत लोगों तक पहुँचती है वह जो अमीर शख़्स है (इस तमसील में अल्लाह से मुराद है) वह चाहता है कि शादी की महफ़िल लोगों से भर जाए I मगर यहाँ एक बे तवक़्क़ो मरोड़ पाया जाता है जो उस अमीर शख़्स के लिए अफ़सोस का सबब बनता है I मतलब यह कि बहुत कम मेहमान लोग ही इस ज़ियाफ़त में जाने को तैयार होते हैं I बल्कि कई लोगों के पास इस ज़ियाफ़त में न जाने के कोर बहाने हैं I ऐसे बहाने जिनको बहाना कहना भी मुनासिब नहीं है I कोई कहता है , मैं ने पाँच जोड़ी बैल ख़रीदे हैं मुझे उनको आज़माना है I भला ऐसा कौन शख़्स होगा जो बैलों को आज़माए बगैर ख़रीदता हो I दूसरा कहता है कि मैं ने खेत ख़रीदा है मैं उसे देखने जाता हूँ I भला ऐसा कौन शख़्स होगा जो खेत को देखे बगैर ख़रीदता हो ? कोई नहीं I बल्कि यह बहाने मेहमानों के दिल के असली इरादे को ज़ाहिर करते हैं —मतलब यह कि ख़ुदा की बादशाही में दाखिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है मगर दीगर बातों में दिलचस्पी ज़रूर है I

इसी तरह जब हम सोचते हैं शायद उस अमीर शख़्स को उस वक़्त सदमा हुआ होगा कि इतने कम लोग ज़ियाफ़त में शरीक हुए I एक और मरोड़ वाली बात यह है कि वह लोग जो इस ज़ियाफ़त में शरीक होने के क़ाबिल नहीं थे उन सबको हम अपने दमाग से निकाल देते हैं क्यूंकि वह इस बड़ी ज़ियाफ़त में दावत दिये जाने के क़ाबिल नहीं थे क्यूंकि वह शहर के बाज़ारों और चौराहों से लाए गए थे यहाँ तक कि बड़ी सड़कों और सड़कपार दीहातों से लाए गए थे , वह गरीब थे , अपाहज थे , अंधे और लँगड़े भी थे जिन से हम अकसर दूर ही रहते हैं —वह इस ज़ियाफ़त में दावत दिये जाते हैं I इसके बावजूद भी इस ज़ियाफ़त की दावत इस से और आगे जाती है I इस ज़ियाफ़त में कुछ और लोगों की शमूलियत होती है I और आप के ख़्याल के मुताबिक़ क्या यह मुमकिन है I ज़ियाफ़त का मालिक चाहता था ऐसे लोगों को दावत दी जाए जिन्हें हम खुद ही अपने घरों में दावत नहीं देना चाहते I

और यह लोग आते हैं ! मगर इन के पास और लोगों की तरह खेत खरीदने या बैल ख़रीदने का कोई बहाना नहीं है I इसी तरह ख़ुदा की बादशाही लोगों से भरपूर है और ख़ुदा की मर्ज़ी तकमील तक पहुँचती है !

ईसा अल मसीह ने जब इस तमसील को कहा तो एक सवाल वह हमसे पूछना चाहता था कि अगर इस बादशाही में जाने के लिए दावत दी जाए तो क्या मैं इसे क़बूल करूंगा ? या दिलचसपी ज़ाहिर करते हुए बहाना करूंगा और ज़ियाफ़त की दावत का इंकार करूंगा I सच्चाई यह है कि आप इस बादशाही की ज़ियाफ़त में दावत दिए गए हैं मगर हक़ीक़त यह बताती है कि हम में से बहुत से इस दावत का इंकार करेंगे I किसी एक सबब से हम कभी भी बराहे रास्त यह नहीं कहेंगे कि नहीं ताकि हम अपने इनकारी के बहाने को छिपाएँ I इस तमसील में हमारी इनकारी की जड़ है दूनया की दीगर चीजों से महब्बत रखना I जो पहले बुलाए गए थे वह दूनया की चीजों से महब्बत रखते थे (जैसे ‘खेत’ है , ‘बैलें’ और ‘शादी’ वगैरा) यह चीज़ें उन के लिए ख़ुदा की बादशाही से बढ़कर थीं I

एक गैर रास्तबाज़ मज़हबी इमाम की तमसील

हम में से कुछ दूनया की दीगर चीजों को ख़ुदा की बादशाही से ज़ियादा महब्बत रखते हैं इसलिए हम इस दावत का इंकार करेंगे I दूसरे वह लोग होंगे जो उनकी अपनी रास्तबाज़ी के आमाल पर भरोसा रखेंगे I नबी हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) ने इस की बाबत भी एक दूसरी कहानी के ज़रिये तालीम दी I वह कहानी एक मज़हबी रहनुमा की थी जिसको आम तोर पर इमाम भी कहा जा सकता है I

9 और उस ने कितनो से जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और औरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा।
10 कि दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेने वाला।
11 फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, कि हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करने वाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेने वाले के समान हूं।
12 मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूं; मैं अपनी सब कमाई का दसवां अंश भी देता हूं।
13 परन्तु चुंगी लेने वाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आंखें उठाना भी न चाहा, वरन अपनी छाती पीट-पीटकर कहा; हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर।
14 मैं तुम से कहता हूं, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा॥

लूक़ा 18:9-14

यहाँ एक फ़रीसी (एक मज़हबी उस्ताद जैसे एक इमाम) वह अपने मज़हबी कामों और लियाक़तों में कामिल था I उसके रोज़े और ज़कात हसबे मामूल से ज़ियादा थे I मगर यह इमाम अपने खुद की रास्तबाज़ी पर कुछ ज़ियादा ही एतमाद और एतबार किए हुए था I उसका वैसा ईमान नहीं था जो हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का था जिन्होंने अल्लाह के वायदे पर हलीमी से भरोसा किया था और यह एच यूएनकेई हक़ में रास्तबाज़ी गिना गया था I दरअसल एक महसूल लेने वाला (उस ज़माने के हिसाब से एक नफ़रती पेशा था) मगर उसने मक़्दिस में ख़ुदा की हुज़ूरी में खड़े होकर हलीमी से छाती पीटते हुए ख़ुदा के रहम की भीक मांगी और फिर ख़ुदा के फ़ज़ल को अपने दिल में महसूस करते हुए अपने घर लौटा I वह ख़ुदा की नज़र में ‘रास्तबाज़’ टहराया गया जबकि फ़रीसी (इमाम) जिसको हम समझते थे कि –‘उसका ख़ुदा के साथ का रिश्ता’— ठीक है I मगर उसके गुनाह अभी भी उसके खिलाफ़ गवाही देते थे I सो नबी हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) आप से और मुझसे पूछते हैं कि क्या हम सचमुच ख़ुदा की बादशाही में दाखिल होने की ख़्वाहिश रखते हैं या फिर ऐसी ही दिलचसपी है जैसे कि दूनया केआई दीगर चीज़ों में दिलचसपी रखते हैं ? वह यह भी पूछते हैं कि हमारा भरोसा किस पर है I क्या हमारे मज़हबी काम ख़ुदा के रहम ओ फ़ज़ल से ज़ियादा अहमियत रखते हैं ? इन स्वालात को खुद से ईमानदारी से पूछना बहुत ज़रूरी है क्यूंकी इस के बगैर हम मसीह की अगली तालीम को नहीं समझ पाएंगे जो कि अंदरूनी पाकीज़गी की बाबत है I

नबी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का क़ुदरत पर इख्तियार

सूरा अज़ – ज़ारियात (सूरा 51 — पिछोड़ती हवाएँ) बयान करता है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फ़िरोन के किस् तरह भेजा गया था I

 जब हमने उनको फिरऔन के पास खुला हुआ मौजिज़ा देकर भेजा

रा अज़ ज़ारियात 51:38

हज़रत मूसा ने मिस्र में कई एक मोजिज़ाना ताक़त का मज़ाहिरा करते हुए अपने इख्तियार को ज़ाहिर किया जिन में बहर ए कुल्ज़ुम को दो हिस्सों में तक़सीम किया जाना भी शामिल है I जब भी कभी किसी शख़्स ने ख़ुद को एक नबी होने का दावा किया (जिस तरह मूसा ने किया) उसने मुखालफ़त का सामना किया या फिर उसको एक नबी होने की क़ाबिलियत का सबूत देना पड़ा I गौर करें कि यह नमूना सूरा अश शो’रा के मुआफ़िक़ है (सूरा 26 – शाइर लोग) I यह सूरा इनकारी के सिलसिले और सबूत का बयान करती है जिन में से होकर नबी लोग गुज़रे थे I

(यूँ ही) नूह की क़ौम ने पैग़म्बरो को झुठलायाकि जब उनसे उन के भाई नूह ने कहा कि तुम लोग (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरते मै तो तुम्हारा यक़ीनी अमानत दार पैग़म्बर हूँतुम खुदा से डरो और मेरी इताअत करो

सूरा अश शो’रा 26:105-107

(इसी तरह क़ौम) आद ने पैग़म्बरों को झुठलायाजब उनके भाई हूद ने उनसे कहा कि तुम ख़ुदा से क्यों नही डरतेमैं तो यक़ीनन तुम्हारा अमानतदार पैग़म्बर हूँतो ख़ुदा से डरो और मेरी इताअत करो(सूरा अश शो’रा 26:123-126)

(इसी तरह क़ौम) समूद ने पैग़म्बरों को झुठलायाजब उनके भाई सालेह ने उनसे कहा कि तुम (ख़ुदा से) क्यो नहीं डरतेमैं तो यक़ीनन तुम्हारा अमानतदार पैग़म्बर हूँतो खुदा से डरो और मेरी इताअत करो

सूरा अश शो’रा 26:141-144

इसी तरह लूत की क़ौम ने पैग़म्बरों को झुठलायाजब उनके भाई लूत ने उनसे कहा कि तुम (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरतेमै तो यक़ीनन तुम्हारा अमानतदार पैग़म्बर हूँ तो ख़ुदा से डरोऔर मेरी इताअत करोसूरा

अश शो’रा 26:160-163

इसी तरह जंगल के रहने वालों ने (मेरे) पैग़म्बरों को झुठलायाजब शुएब ने उनसे कहा कि तुम (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरतेमै तो बिला शुबाह तुम्हारा अमानदार हूँतो ख़ुदा से डरो और मेरी इताअत करो

रा अश शो’रा 26:176-179

इन सारे नबियों ने इनकारी का सामना किया और उन के लिए एक बोझ था यह साबित करना कि वह भरोसे लायक़ नबी थे I यह बात नबी हज़रत ईसा अल मसीह के लिए भी सच था I

नबी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के पास तालीम देने और ‘एक हुक्म’ के साथ शिफ़ा बख्शने का इख्तियार था I उन के पास क़ुदरत पर भी इख्तियार था I इंजील इस बात का ज़िकर करती है कि उसने अपने शागिर्दों के साथ एक झील को इस तरह से पार किया कि उसके शागिर्द ‘खौफ़ज़दा और दंग’ रह गए थे I यहाँ यह बयान पेश है :

22 फिर एक दिन वह और उसके चेले नाव पर चढ़े, और उस ने उन से कहा; कि आओ, झील के पार चलें: सो उन्होंने नाव खोल दी।
23 पर जब नाव चल रही थी, तो वह सो गया: और झील पर आन्धी आई, और नाव पानी से भरने लगी और वे जोखिम में थे।
24 तब उन्होंने पास आकर उसे जगाया, और कहा; हे स्वामी! स्वामी! हम नाश हुए जाते हैं: तब उस ने उठकर आन्धी को और पानी की लहरों को डांटा और वे थम गए, और चैन हो गया।
25 और उस ने उन से कहा; तुम्हारा विश्वास कहां था? पर वे डर गए, और अचम्भित होकर आपस में कहने लगे, यह कौन है जो आन्धी और पानी को भी आज्ञा देता है, और वे उस की मानते हैं॥

लूक़ा 8:22-25

नबी हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का कलाम ए हुक्म से यहाँ तक कि हवाएँ और लहरें भी थम जाती  थीं ! इस में कोई शक नहीं कि ऐसे औक़ात उसके शागिर्द खौफ़ से भर जाते थे I ऐसे इख्तियारात और हुक्मों के होते उन्हें हैरत होती थी कि यह कौन शख़्स हो सकता है I एक और मोक़े पर जब वह हज़ारों लोगों के बीच में था उसने एक ऐसे ही इख्तियार का मज़ाहिरा किया I इस बार उसने हवा और लहरों को हुक्म नहीं दिया – बल्कि उस ने खाना खिलाया I देखें इसका ज़िकर :

दि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।
2 यही आदि में परमेश्वर के साथ था।
3 सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।
4 उस में जीवन था; और वह जीवन मुनष्यों की ज्योति थी।
5 और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।
6 एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिस का नाम यूहन्ना था।
7 यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाएं।
8 वह आप तो वह ज्योति न था, परन्तु उस ज्योति की गवाही देने के लिये आया था।
9 सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।
10 वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहिचाना।
11 वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।
12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।
14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।
15 यूहन्ना ने उसके विषय में गवाही दी, और पुकारकर कहा, कि यह वही है, जिस का मैं ने वर्णन किया, कि जो मेरे बाद आ रहा है, वह मुझ से बढ़कर है क्योंकि वह मुझ से पहिले था।

यूहनना 6:1-15

जब लोगों ने देखा कि हज़रत ईसा मसीह (अलैहिस्सलाम) सिर्फ़ मालूम किया पाँच रोटी और दो मछली से 5000 आदमियों को खिला सकते हैं , इस के बाद भी और लोगों को खिलाने लायक़ हैं तो तब लोगों ने मालूम किया कि यह एक बे मिसल नबी है I लोगों ने उसके नबी होने पर ताज्जुब ज़ाहिर किया कि मूसा की तौरत में बहुत पहले पेशीन गोई हुई थी कि वह आएगा I हम जानते हैं कि ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) हक़ीक़त में वही नबी हैं जिन के लिए तौरेत में ऐसे ही नबी का ज़िकर है I

18 सो मैं उनके लिये उनके भाइयों के बीच में से तेरे समान एक नबी को उत्पन्न करूंगा; और अपना वचन उसके मुंह में डालूंगा; और जिस जिस बात की मैं उसे आज्ञा दूंगा वही वह उन को कह सुनाएगा।
19 और जो मनुष्य मेरे वह वचन जो वह मेरे नाम से कहेगा ग्रहण न करेगा, तो मैं उसका हिसाब उस से लूंगा।

इस्तिसना 18:18-19

इस नबी की यह निशानी थी कि अल्लाह अपना ‘कलाम इस नबी के मुंह में’ डालेगा I वह कौनसी चीज़ है जो आदमियों को अल्लाह के कलाम से जुदा करती है ? इस के जवाब को ज़ेल की आयतों में दुहराया गया है जो सूरा अन नहल (सूरा 16 –शहद की मक्खी) से शुरू होता है :

हम जब किसी चीज़ (के पैदा करने) का इरादा करते हैं तो हमारा कहना उसके बारे में इतना ही होता है कि हम कह देते हैं कि ‘हो जा’ बस फौरन हो जाती है (तो फिर मुर्दों का जिलाना भी कोई बात है)

अन नहल 16:40

उसकी आज्ञा तभी है जब वह एक ऐसी चीज का इरादा करता है जो वह उसे कहता है, “रहो,” और यह है

या-सीन 36:82

और ताकि तुम (उसकी क़ुदरत को समझो) वह वही (ख़ुदा) है जो जिलाता और मारता है, फिर जब वह किसी काम का करना ठान लेता है तो बस उससे कह देता है कि ‘हो जा’ तो वह फ़ौरन हो जाता है

अल मोमिन 40:68

नबी हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) सिर्फ़ अपने मुंह के कलाम से बीमारों को शिफ़ा  बख्शते नापाक रूहों को लोगों में से निकालते थे I सो अभी हम ने देखा उसके कलाम से हवा और लहरें उसका हुक्म बाजा लाते थे , फिर वह बोलते थे उन के हाथों में आईं रोटियों की मिक़दार कई हज़ार गुना बढ़ जाती थीं I इन निशानियों को तौरेत शरीफ़ और क़ुरान शरीफ़ में इस लिए समझाया गया है की इधर ईसा अल मसीह ने कुछ कहा और वह उधर हो गया – क्यूंकि उसके पास इख्तियार था I वह मसीह था !

समझने के लिए दिल

मगर कई बार शागिर्दों को ख़ुद ही यह बातें समझ में नहीं आती थीं I उनहों ने उसके हाथों से जो रोटियों की मिक़दार बढ़ जाती थी उस अहमियत को नहीं समझा था I हम इसे जानते हैं क्यूंकि 5000 को खिलाने के कुछ ही अरसे बाद इस वाक़िए को इंजील ए शरीफ़ में कलमबंद कर दिया गया था I

45 तब उस ने तुरन्त अपने चेलों को बरबस नाव पर चढाया, कि वे उस से पहिले उस पार बैतसैदा को चले जांए, जब तक कि वह लोगों को विदा करे।
46 और उन्हें विदा करके पहाड़ पर प्रार्थना करने को गया।
47 और जब सांझ हुई, तो नाव झील के बीच में थी, और वह अकेला भूमि पर था।
48 और जब उस ने देखा, कि वे खेते खेते घबरा गए हैं, क्योंकि हवा उनके विरूद्ध थी, तो रात के चौथे पहर के निकट वह झील पर चलते हुए उन के पास आया; और उन से आगे निकल जाना चाहता था।
49 परन्तु उन्होंने उसे झील पर चलते देखकर समझा, कि भूत है, और चिल्ला उठे, क्योंकि सब उसे देखकर घबरा गए थे।
50 पर उस ने तुरन्त उन से बातें कीं और कहा; ढाढ़स बान्धो: मैं हूं; डरो मत।
51 तब वह उन के पास नाव पर आया, और हवा थम गई: और वे बहुत ही आश्चर्य करने लगे।
52 क्योंकि वे उन रोटियों के विषय में ने समझे थे परन्तु उन के मन कठोर हो गए थे॥
53 और वे पार उतरकर गन्नेसरत में पहुंचे, और नाव घाट पर लगाई।
54 और जब वे नाव पर से उतरे, तो लोग तुरन्त उस को पहचान कर।
55 आसपास के सारे देश में दोड़े, और बीमारों को खाटों पर डालकर, जहां जहां समाचार पाया कि वह है, वहां वहां लिए फिरे।
56 और जहां कहीं वह गांवों, नगरों, या बस्तियों में जाता था, तो लोग बीमारों को बाजारों में रखकर उस से बिनती करते थे, कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आंचल ही को छू लेने दे: और जितने उसे छूते थे, सब चंगे हो जाते थे॥

मर्क़ुस  6:45-56

फिर से नबी ईएसए अल मसीह ने एक इख्तियार का कलाम कहा और वह ‘हो गया’ I मगर शागिर्दों ने इसे ‘नहीं समझा’ I सबब यह नहीं था क्यूंकि वह समझदार नहीं नहीं थे ; सबब यह नहीं था कि वह वहाँ पर मौजूद नहीं थे ; सबब यह नहीं था कि वह बुरे शागिर्द थे ; न ही सबब यह था कि वह गैर ईमानदार थे I नहीं , बल्कि उन की बाबत ऐसा कहा गाय है कि ‘उनके दिल सख़्त थे ‘—नबी यरम्याह (अलैहिस्सलाम) ने नबुवत की थी कि एक नया अहद आने वाला था – जिसकी शरीअत को हमारे दिलों के अंदर लिखा जाना था I उस अहद के बदले जाने तक किसी का दिल तो सख़्त रहना ही था—यह यहाँ तक कि नबी के नज़दीकी शागिर्दों के दिल ही क्यूँ नहीं थे ! और हमारे ख़ुद के सख़्त दिल भी उन रूहानी सच्चाईयों को समझने से रोकते हैं जिन का नबियों के ज़रिये इंकिशाफ किया गया था I

यही सबब था कि नबी यहया अलैहिस्सलाम को लोगों के दिलों को तयार करने का काम सोंपा गया था जो कि बहुत ही ज़रूरी था I उसने लोगों को तौबा के लिए बुलाया कि वह आकर अपने गुनाहों का इक़रार करें बजाए इस के कि वह अपने गुनाहों को छिपाएँ I जब ईसा अल मसीह के शागिर्दों को अपने सख़्त दिली से तौबा करके उन्हें अपने गुनाहों को इक़रार करने की ज़रूरत थी तो कितना ज़ियादा आप को और मुझे ऐसा करने की ज़रूरत है ! शायद आप मेरे साथ अल्लाह की हुज़ूरी में सच्चे दिल से ख़ामोशी की दुआ में शामिल हो सकते हैं (क्यूंकि वह यहाँ तक कि हमारे खयालात से वाक़िफ़ है यह जान्ते हुए हम उस से दुआ कर सकते हैं) जिसमें हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) की तरह हमारे गुनाहों का इक़रार भी शामिल हो :

4 मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है, ताकि तू बोलने में धर्मी और न्याय करने में निष्कलंक ठहरे।
5 देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा॥
6 देख, तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है; और मेरे मन ही में ज्ञान सिखाएगा।
7 जूफा से मुझे शुद्ध कर, तो मैं पवित्र हो जाऊंगा; मुझे धो, और मैं हिम से भी अधिक श्वेत बनूंगा।
8 मुझे हर्ष और आनन्द की बातें सुना, जिस से जो हडि्डयां तू ने तोड़ डाली हैं वह मगन हो जाएं।
9 अपना मुख मेरे पापों की ओर से फेर ले, और मेरे सारे अधर्म के कामों को मिटा डाल॥
10 हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।
11 मुझे अपने साम्हने से निकाल न दे, और अपने पवित्र आत्मा को मुझ से अलग न कर।
12 अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल॥

ज़बूर 51:1-4,10-12

मैं यह दुआ करता हूँ और आप की हौसला अफ़ज़ाई करता हूँ आप ऐसा करें कि नबियों के जो पैगामत हैं उन्हें नर्म दिल से और स्सफ़ दिल से समझे जाएँ जबकि हम इंजील को जारी रखेंगे I