बाइबिल (अल किताब ) का तर्जुमा कैसे हुआ

 बाइबिल या अल किताब आमतौर पर इसकी असली ज़बानों  (हिब्रू और यूनानी ) में नहीं पढ़ी जाती है।इसका मतलब  यह नहीं कि  यह इन असली जवान में मौजूद नहीं है। यह मौजूद है, और विद्वान लोग यूनानी  और हिब्रू का अध्ययन जामीया  मै एक मकसद के साथ करते है ताकी वह अल किताब को उसकी असली जवान मे पड़ और उसका अध्ययन कर सके।(मूल हिब्रू में तोरा यहां देखें, और मूल  यूनानी मे इंजील शरीफ यहां देखें ) यह अक्सर ऐसा होता है बाइबल के पेशेवर  उस्ताद  इसका अध्ययन करते रहते हैं।लेकिन आमतौर पर नियमित विश्वासी अल किताब को असली जवान मे नहीं पड़ते बल्कि अपनी मात्र ज़ुबान  मे किये गए तर्जुमे मे अल किताब को पढ़ते हैं, इसलिए बाइबिल(अल-किताब ) अक्सर अपनी असली ज़ुबान मै नहीं देखी जाती है, और कुछ सोचते है कि असली(मूल) ज़ुबान  खो गयी हैं, और अन्य सोचते है कि तर्जुमा की प्रकिया को आगे बढ़ाते समय भ्रस्टाचार  को बढ़ावा मिला है, इन नतीजों पर कूदने से पहले, अल-किताब या बाइबिल के तर्जुमे की प्रक्रिया को समझना बेहतर है, इस लेख मै हम यही करेंगे।

 तर्जुमा बनाम लिप्यंतरण(उच्चारण )(शब्दो को एक लिपि से दूसरी लिपि में परिवर्तित करना)

हमें पहले तर्जुमे की कुछ बुनियादी बातों को समझना होगा,  तर्जुमेकार कभी कभी मायने के वजाये समान आवाज़ से तर्जुमा करना चुनते हैं, खासकर जब नाम और शीर्षक की बात आती है, यही लिप्यंतरण(उच्चारण) के रूप मै माना जाता है, नीचे दी गयी तस्वीर के उदाहरण मै तर्जुमा और लिप्यंतरण के बीच के फर्क को देख सकते हैं. गॉड लफ्ज को अरबी से अंग्रेजी मे लाने के लिए दो तरीके चुन सकते हैं। अगर आप मायने के रूप मै तर्जुमा करें तो गॉड लफ्ज़ मिलता है या अगर आप आवाज़ के रूप मै तर्जुमा करें तो अल्लाह लफ्ज मिलता है, 

 तर्जुमा बनाम लिप्यंतरण(उच्चारण)                                                                                                                                               

यहां गॉड लफ्ज़ का इस्तेमाल यह बताने के लिए होता है कि इस तरीके को कैसे हम एक ज़ुबान से दूसरी जुबान  मै तर्जुमा या लिप्यंतरण(उच्चारण) को कर सकते हैं।

 हाल के सालों में अंग्रेजी और अरबी के बीच बड़े हुए विनिमय  के साथ शब्द ‘अल्लाह’ अंग्रेजी भाषा में एक पहचान वाला लफ्ज़ बन गया है जिसका मतलब गॉड होता है. उसमे शीर्षक और खास शब्दो के तर्जुमा या लिप्यंतरण मै चूनाव लेते समय कोई सही या गलत विकल्प नहीं है.   यह भाषा को सूनने वाले पर निर्भर करता है की वह इसको कितनी अच्छी तरह समझ सकता है या स्वीकार करता है .

 सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  

 बाइबिल का पहला तर्जुमा तब हुआ था जब यहूदी  का पुराना नियम(तौरेत और जबूर) का यूनानी ज़ुबान मै तर्जुमा 250 बी सी मै हो गया था। इस तर्जुमें को यूनानी पुराने नियम (या llx  ) के रूप मे जानते हैं और यह बहुत प्रभावशाली था, क्योकि नया नियम(इंजील सरीफ) यूनानी ज़ुबान मै लिखा गया था, इसलिए पुराने नियम के कई उद्धरण यूनानी सेप्टुआजेंट से लिए गए थे

सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) मै तर्ज़ुमा और लिप्यंतरण

 नीचे दिए गए आंकड़े से यह पता चलता है कि यह सब आधुनिक दिनों की बाइबिल(अल- किताब) को कैसे प्रभावित करता है जहां अनुवाद  चरण चतुष्कोणों(वृत्त का चतुर्थ भाग) में दिखाए जाते हैं।

बाइबिल   = (अलकिताब ) आधुनिक भाषा मैं,   (उदाहरण -अंग्रेजी)
यह आधुनिक भाषा में बाइबिल (अल किताब) की अनुवाद प्रक्रिया को दर्शाता है,

मूल इब्रानी  पुराना नियम(तौरेत और ज़बूर) चतुर्थांश # 1 में है  और आज  मेसोरेटिक पाठ (आधिकारिक इब्रानी ) और मृत सागर हस्तलिपियों में आसानी से मिलती है।क्योंकि सेप्टुआजेंट( इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) एक  इब्रानी था -> यूनानी  अनुवाद में इसे तीर के रूप में # 1 से # 2 तक जाने वाले तीर के रूप में दिखाया गया है। नया नियम(इंजील) खुद मूल रूप से यूनानी मै लिखा गया था तो इसका मतलब नंबर 2 मै पुराना नियम(तौरेत, जबूर) और नया नियम(इंजील) शामिल है, नीचे के आधे भाग में (नंबर 3) बाइबल का नयी भाषा अनुवाद है (मिशाल के तौर पर अंग्रेजी). वहां जाने के लिए पुराना नियम(तौरेत, ज़बूर) का अनुवाद मूल इब्रानी भाषा मै किया गया है, (1 -> 3 ) और नया नियम(इंजील)  यूनानी मै अनुवादित है (2  -> 3). अनुवादकों को लिप्यंतरण(उच्चारण)  या नामों और शीर्षकों के अनुवाद के बारे में ज़रूर निर्णय लेना चाहिए जैसा की पहले से बताया गया है,  यह हरे रंग के तीर के साथ चित्रित किया गया है की लिप्यांतरण (उच्चारण) और अनुवाद, यह दर्शाता है कि अनुवादक या तो दृष्टिकोण ले सकते हैं।

 सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) बाइबल के बदलने के सवाल पर गवाह

चूंकि 250 ईसा पूर्व के आसपास सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  का इब्रानी भाषा से तर्जुमा किया गया था।  हम देख सकते हैं (यदि हम ग्रीक को इब्रानी  में वापस अनुवाद करते हैं) तो इन अनुवादकों ने अपने इब्रानी पांडुलिपियों में जो अनुवाद किया था, उसमे  क्या था। चूंकि ये ग्रंथ लगभग समान हैं, यह दर्शाता है कि पुराने नियम(तौरेत,ज़बूर)  का पाठ कम से कम 250 ईसा पूर्व से नहीं बदला है। यदि किसी ने (ईसाई, यहूदी या किसी और ने) पुराने नियम(तौरेत , ज़बूर ) को बदल दिया और उसे भ्रष्ट कर दिया, तो सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  इब्रानी पाठ से अलग होना चाहिए। लेकिन वे मूल रूप से समान हैं।

इसी तरह, यदि उदाहरण के लिए, अलेक्जेंड्रिया और मिस्र में किसी ने सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) को ही भ्रष्ट कर दिया था, तो सिकंदरिया में सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) पांडुलिपि की प्रतियां मध्य पूर्व और भूमध्यसागरीय में अन्य सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  पांडुलिपियों से अलग होंगी। लेकिन वे एक ही हैं। तो घटना हमें बिना किसी विरोधाभास के बताती है कि पुराना नियम(तौरेत, ज़बूर) बदला नहीं है।

 तर्जुमा मै सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)

आधुनिक तर्जुमा में मदद के लिए सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) का भी इस्तेमाल किया जाता था । तर्जुमा आलिम सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा) का इस्तेमाल  इस दिन करने के लिए करते है ताकि उन्हें पुराने नियम(तौरेत और ज़बूर) के कुछ कठिन भागों का तर्जुमा करने के लिए मदद मिल सके।यूनानी बहुत अच्छी तरह से समझी जाती है,  और कुछ मार्गों में जहां इब्रानी मुश्किल है तर्जुमेकार देख सकते हैं कि 2250 साल पहले सेप्टुआजेंट(इब्रानी बाइबिल का यूनानी तर्जुमा)  तर्जुमेकारो ने इन अस्पष्ट मार्गों को कैसे समझा। तर्जुमे, लिप्यंतरण और सेप्टुआजेंट को समझने में हमें यह समझने में मदद मिलती है कि ‘मसीह’  और ‘मसीहा’ शब्द कहां से आए हैं क्योंकि ये शब्द ईसा (या जीसस – पीबीयूएच) से संबंधित हैं, जिन्हें समझने के लिए हमें  इंजिल शरीफ का संदेश  समझने की जरूरत है। हम इसे आगे देखते हैं।

इब्राहीम की 2 निशानी : रास्त्बाज़ी

अल्लाह की जानिब से हम को क्या कुछ ज़रूरत है ? इस सवाल के लिए कई एक जवाब हैं, मगर आदम की निशानी हम को याद दिलाती है कि हमारी सब से पहली और सब से बड़ी ज़रुरत रास्त्बाज़ी  है। यहाँ हम उन अलफ़ाज़ को देखते हैं जो बराहे रास्त हमारी तरफ़ मुखातब है (बनी आदम)।

  हे आदम के बच्चों! हमने आपकी लाज को ढंकने के लिए आपको शुभकामनाएँ दी हैं, साथ ही साथ आपके लिए श्रंगार भी किया है। लेकिन धार्मिकता की छाप – यही सबसे अच्छा है। ऐसे अल्लाह के संकेतों में से हैं, कि उन्हें नसीहत मिल सकती है।

सूरत 7:26

तो फिर ‘रास्त्बाज़ी’ क्या है ? तौरेत अल्लाह कि बाबत हम से कहती है कि (इसतिसना 32:4)

मैं यहोवा के नाम की घोषणा करूंगा।
ओह, हमारे भगवान की महानता की प्रशंसा करो!
वह रॉक है, उसके काम एकदम सही हैं,
और उसके सभी तरीके सिर्फ हैं।
एक वफादार ईश्वर जो गलत नहीं करता,
ईमानदार और बस वह है।

यह अल्लाह की रास्त्बाज़ी की तस्वीर है जिसको तौरेत में बयान किया गया है ।रास्त्बाज़ी के मायने हैं वह जो कामिल है; यानि मुकम्मल तोर से कामिल; (थोड़ा या ज़ियादा नहीं बल्कि तमाम कमाल) जिसकी राहें सच्ची हैं ,जिसमें थोड़ी सी भी,नाम के लिए भी बुराई नहीं पाई जाती; जो कि बरहक़ है। यह है रास्त्बाज़ी जिसतरह से अल्लाह के बारे में तौरेत ज़िकर करती है। मगर सवाल यह है कि हमको रास्त्बाज़ी कि क्या ज़रुरत है और क्यूँ ज़रुरत है? इस का जवाब पाने के लिए हम एक ज़बूर का हवाला देखेंगे। ज़बूर 15 जिसको हज़रत दाऊद (अलै.) ने लिखा है इसे हम इस तरह से पढ़ते हैं:

प्रभु, आपके पवित्र तम्बू में कौन रह सकता है?
  आपके पवित्र पर्वत पर कौन रह सकता है?

   2 जिसकी राह चलती है, वह निर्दोष है,
    जो धर्मी है,
   जो उनके दिल से सच बोलता है;
    3 जिसकी जीभ में कोई बदनामी न हो,
    जो पड़ोसी के लिए गलत नहीं है,
    और दूसरों पर कोई गाली नहीं डालता;
     4 जो एक वीभत्स व्यक्ति का तिरस्कार करता है
    जो प्रभु से डरते हैं उनका आदर करते हैं;
    जो दर्द होने पर भी शपथ रखता है,
    और उनका मन नहीं बदलता है;
    5 जो बिना ब्याज के गरीबों को पैसा उधार देता है;
    जो निर्दोष के खिलाफ रिश्वत स्वीकार नहीं करता है …

  जब यह पूछा जाता है कि कौन अल्लाह के ‘मुक़द्दस पहाड़’ पर रह सकता है, तो दुसरे तरीके से यह पूछा जाता है या इस सवाल का दूसरा पहलू यह है कि ‘अल्लाह के साथ कौन जन्नत में रहेगा’? तो हम देख सकते हैं कि इस का जवाब यह है कि “वह जो बे गुनाह और ‘रास्त्बाज़’ है (आयत 2)। वह शख्स अल्लाह के साथ जन्नत में दाखिल हो सकता है। इसी लिए हम को रास्त्बाज़ी की ज़रूरत है। रास्त्बाज़ी की ज़रुरत इस लिए भी है क्यूंकि खुद अल्लाह कामिल है।

अब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दूसरी निशानी पर गौर करें। किताबों से इबारत को खोलने के लिए यहाँ पर किलिक करें। तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ की आयतों को पढने के बाद हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के रास्ते पर चले (सूरा 37:83) और ऐसा करते हुए उस ने ‘रास्त्बाज़ी’ हासिल की (पैदाइश 15:6)। यही बात आदम कि निशानी में भी हम से कहा गया था कि हमें रास्त्बाज़ी की ज़रुरत है। सो अहम् सवाल हमारे लिए यह है कि : उसने इसे किस तरह हासिल किया ?

अक्सर मैं सोचता हूँ कि मै रास्त्बाज़ी को दो रास्तों में से एक को चुनने के ज़रिये हासिल करता हूँ पहले रास्ते में (मेरे ख़यालात में) अल्लाह के वजूद पर ईमान लाने के ज़रिये या उसे तस्लीम करने के ज़रिये मैं रास्त्बाज़ी को हासिल करता हूँ। मैं अल्लाह पर ‘ईमान’ लाता हूँ। इस ख़याल का सहारा लेते हुए क्या हम तौरेत में ऐसा नहीं पढ़ते कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) खुदावंद पर ईमान नहीं लाए थे? देखें (पैदाइश 15:6) मगर कुछ और गौर ओ फ़िक्र के साथ मैं ने यह महसूस किया है कि ईमान लाने का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि एक वाहिद ख़ुदा के वजूद पर ईमान लाना – नहीं बल्कि अल्लाह ने उसको एक पक्का वायदा किया था कि वह अपना एक बेटा हासिल करेगा। और वह एक ऐसा वायदा था जिस के लिए इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को चुनना था कि वह इस पर ईमान लाएं या नहीं। इस की बाबत आगे सोचें कि शैतान या इब्लीस भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखता है। और यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि उस के अन्दर कोई रास्त्बाज़ी नहीं है। सो सादगी के साथ अल्लाह के वजूद पर ईमान लाना ही ‘किसी मसले का हल’ नहीं है। मतलब यह कि इतना ही काफ़ी नहीं है।

दूसरा रासता जो मैं अक्सर सोचता हूँ वह यह है कि रास्त्बाज़ी को मैं अपनी क़ाबिलियत से हासिल कर सकता हूँ या मैं इसको नेक काम या मज़हबी कामों को करने के ज़रिये अल्लाह से कमा सकता हूँ जैसे बुरे कामों की निस्बत भले कामों को ज़ियादा करना, नमाज़ अदा करना, रोज़े रखना या किसी तरह के मज़हबी कामों को अंजाम देना मुझे इजाज़त देता है कि मैं रस्त्बाज़ी हासिल करने का हक़दार बनू, कमाऊं या क़ाबिल बनूं। मगर गौर करें तौरेत शरीफ़ इस तरह से हरगिज़ नहीं कहती।

अबराम खुदावंद पर ईमान लाया और उसने [यानी कि अल्लाह ने] उसके लिए [यानी इब्राहीम अलै. के लिए] रास्त्बाज़ी गिना गया।

पैदाइश15:6

इब्राहीम (अलै.) ने रास्त्बाज़ी को कमाया नहीं था बल्कि यह उसके लिए ‘शुमार किया गया’ था। सो इन दोनों में क्या फ़रक़ है? सहीह मायनों में देखा जाए, अगर कोई चीज़ ‘कमानी’ है तो आप उस के लिए काम करते हैं फिर आप उसके मुस्तहक़ होते हैं। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे आप मेहनत करते हैं तो आप मज़दूरी के हक़दार होते है। पर अगर आप के नाम कोई चीज़ जमा की जाती या मंसूब की जाती है तो यह आप को अता की जाती है। यह आप का कमाया हुआ नहीं है या आप मुस्तहक़ नहीं थे।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) वह शख्स थे जो गहराई से अल्लाह (वाहिद ख़ुदा) के वजूद पर ईमान लाए थे। वह दुआ बंदगी करने वाले और दूसरों की मदद करने वाले थे। जैसे कि वह अपने भतीजे लूत/लोट की मदद करते और उस के लिए दुआ करते थे। यह वह बातें हैं जिन का हम इनकार नहीं कर सकते। मगर जो कुछ इब्राहीम के तोर तरीके की बाबत बताया वह बहुत ही सीधा साधा जिन्हें हम तक़रीबन चूक जाते हैं। तौरेत हम से कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) रास्त्बाज़ी इसव लिए अता हुई क्यूंकि उन्हों ने अल्लाह के वायदों पर यकीन किया था। रास्त्बाज़ी हासिल करने की बाबत जो भी हमारी आम समझ है यह उसको मंसूख करता है चाहे इस सोच के ज़रिये से कि अल्लाह के वजूद पर ईमान रखना ही काफी है या किसी हद तक नेक काम और मज़हबी सरगर्मियां (नमाज़, रोज़ा वगैरा) इन्हें बजा लाने से हम रास्त्बाज़ी को कमा सकते या उसके हक़दार हो सकते हैं। मगर याद रखें कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने इस रास्ते को नहीं अपनाया था। उन्हों ने सादगी से अल्लाह के वायदे पर यक़ीन करने को चुना।

अब आप देखें कि एक बेटा इनायत किये जाने के वायदे पर यकीन करने का चुनाव शायद एक सीधी बात हो सकती थी मगर यह यक़ीनी तोर से आसान नहीं था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) आसानी वायदे कि परवाह किये बगैर रह सकते थे इस सबब से कि हक़ीक़त में अल्लाह उसे एक बेटा देने की कुदरत रखता है तो उसी वक़्त उसे इनायत करे क्यूंकि इस दौरान इब्राहीम और उसकी बीवी सारा इतने उमरज़दह हो चुके थे कि बच्चे का होना ना मुमकिन था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की पहली निशानी में उसकी उम्र 75 साल से ऊपर थी जब उस ने अपने मुल्क को छोड़ा था और कनान में पहुंचा था। उस वक़्त अल्लाह ने उसको वादा किया था कि उस से एक बहुत ‘बड़ी कौम’ बनेगी। इस वायदे के बाद कई एक साल गुज़र चुके थे और वह दोनों उमर रसीदा हो चुके थे और डर हक़ीक़त उन्हों ने पहले से ही बहुत ज़ियादा इंतज़ार किया था। और अभी तक उनके एक बच्चा भी नहीं हुआ था तो एक ‘बड़ी कौम’ की बात कैसे हो सकती थी? “अगर अल्लाह को एक बड़ी कौम ही बनाना था तो उसने पहले से ही एक बेटा क्यूँ नहीं दिया” ? उसको शायद ताज्जुब लगा होगा। दुसरे लफ़्ज़ों में हालांकि उसके एक बेटा होने के वादे पर यकीन तो किया था मगर गालिबन उसके दमाग में वायदे की बाबत जवाब न मिलने वाले सवालात थे। उसने वायदे पर यकीन किया था इसलिए कि वायदे का देने वाला अल्लाह था – हालाँकि वह वायदे की हर बात को समझता नहीं था। मगर बुढापे की  उम्र में बच्चा होने के इस वायदे पर यकीन करने के लिए उसे और उसकी बीवी को ज़रुरत थी कि वह अल्लाह के एक मोजिज़े पर ईमान लाए कि वह एक मोजिज़े को अंजाम दे।

वायदे पर ईमान रखना सरगरम होकर इंतज़ार करने का भी तक़ाज़ा करता है। उसकी पूरी ज़िन्दगी एक तरह से दखलंदाज़ थी जब वह कनान के वायदा किये हुए मुल्क में खेमों में सालों तक इंतज़ारी में अपने दिन गुज़ार रहा था कि वायदा किया हुआ बेटा उसे मिल जाए। यह उस के लिए बड़ा आसान हो जाता अगर वह अल्लाह के वायदे को इल्तिफ़ात कर जाता और मसोपतामिया (मौजूदा इराक़) में अपने घर वापस चला जाता जिसे वह बहुत सालों पहले छोड़ चुका था जहां उस के भाई और उस का ख़ानदान और दीगर रिश्तेदार अभी भी खयाम करते थे। सो इब्राहीम (अलै.) को मुश्किलों के साथ जीना पड़ रहा था ताकि वायदे पर ईमान रखना जारी रखे। हर एक घड़ी और हर एक दिन बल्कि कुछ साल तक जबकि वह वायदे के पूरा होने का इंतज़ार कर रहा था – वायदे पर का उसका भरोसा बहुत बड़ा था जो कि ज़िन्दगी के आम हुसूल (जैसे तस्कीन और फ़लाह व बहबूद) पर फौकिय्क्त हासिल था। हकीकी मायनों में वायदे के पेशबंदी में जीना इस का मतलब था कि ज़िन्दगी के आम हुसूल के लिए मरना। वायदे पर ईमान रखने के ज़रिये वह अपने भरोसे और अल्लाह के लिए महब्बत दोनों का इज़हार कर रहा था।

इस तरह वायदे पर यक़ीन करना यह सिर्फ़ उस के लिए दिमाग़ी समझोते से बाहर जा रहा था। इब्राहीम (अलै.) को  अपनी ज़िन्दगी, शोहरत, मुहाफ़िज़त, हाल के अमल और उम्मीदों को इस वायदे पर मुताक्बिल के लिए जोखों में डालने की ज़रुरत थी। क्यूंकि उसने मुस्तअद्दी और फ़रमानबरदारी से इंतज़ार किया था।             

यह निशानी बताती है कि किस तरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के उस वायदे पर ईमान लाया जो एक बेटे के अता करने की बाबत थी और ऐसा करने के ज़रिये उसको अता भी हुई और रास्त्बाज़ी उस के नाम शुमार किया गया। सही मायनों में देखा जाए तो इब्राहीम (अलै.) ने खुद को इस वायदे के लिए मख़सूस किया था। उस के पास चुनाव था कि वायदे की परवाह न करता और अपने मुल्क (मौजूदा इराक़) में वापस चला जाता जहां से वह वापस आया था। और वह ऐसा भी कर सकता था कि उस वायदे की परवाह न करता जबकि अभी भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखे हुए था, अभी भी नमाज़ रोज़े की पाबंदी और दूसरों की मदद करनी जारी थी – मगर इसके बाद अगर वह सिर्फ़ अपने मज़हब पर काइम रहता मगर उसको ‘रास्त्बाज़ी’ में शुमार नहीं किया जाता। और जिस तरह कुरान शरीफ़ कहता है “हम सब जो आदाम की औलाद हैं – रास्त्बाज़ी के पोशाक हैं – जो कि बहुत ही उमदा है” – यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का रासता था।

हम ने रस्त्बाज़ी की बाबत बहुत कुछ सीखा है जो कि जन्नत में दाखिल होने के लिए ज़रूरी है और यह कमाया नहीं जाता बल्कि हमारे लिए शुमार किया जाता है। और यह अल्लाह के वायदे पर भरोसा करने के ज़रिये शुमार किया जाता है ।मगर सवाल यह है कि रस्त्बाज़ी के लिए कौन क़ीमत चुकाएगा ? हम निशानी 3 के साथ जारी रखेंगे।

इब्राहीम की 1 निशानी : बरकत

इब्राहीम! उसे अब्रहाम और अब्राम (अलै.) के नाम से भी जाना जाता है। वाहिद ख़ुदा पर ईमान रखने वाले तमाम तीनों मज़ाहिब यहूदियत, मसीहियत और इस्लाम उसके पीछे चलने के लिए एक नमूना पेश करती है। अरब के लोग और यहूदी मौजूदा ज़माने में उसके बेटे इश्माईल और इस्साक़ के जिस्मानी नसल के ज़रिये उसके नाम को बड़े एहतिमाम से लेते हैं। नबियों की क़तार में भी वह बहुत ही अहम् माने जाते हैं क्यूंकि उन के बाद के अंबिया उन्हीं की नसल से ताल्लुक़ रखते हैं। सो हम अब्रहाम (अलैहिस्सलाम) कि निशानी को कई एक हिस्सों में गौर करेंगे। उसकी पहली निशानी को कुरान शरीफ़ और तौरात शरीफ़ में पढने के लिए यहाँ पर किलिक करें

कुरान शरीफ़ से एक आयत में हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पीछे कई एक क़बीले वजूद में आए जिस से क़ौम के लोग पैदा हुए। इन लोगों के ज़रिये कई एक ‘बड़ी हुकूमतें’ क़ाइम हुईं। मगर लोगों के ‘क़बीले’ रुनुमा होने से पहले एक शख्स के पास कम अज़ कम एक बेटा तो ज़रूर होना चाहिए था और एक ‘बड़ी हुकूमत’ को शक्ल देने के लिए एक बड़ी जगह का होना भी ज़रूरी था।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए वायदा

तौरेत की इबारत (पैदाइश 12:1।7) बताती है कि अल्लाह किसतरह ‘क़बीले’ और ‘बड़ी हुकूमत’ जो इब्राहीम (अलै.) से आने वाली थी अपने इस दोहरे तकमील को आशकारा करने जा रहा था। अल्लाह ने उसे एक वायदा दिया जो मुस्तकबिल के लिए एक बुन्याद था। आइये हम इसे तफ़सील के साथ मज़ीद नज़र।ए।सानी करें। हम देखते हैं कि अल्लाह इब्राहीम (अलै.) से कहता है :

2 “मैं तुम्हें एक महान राष्ट्र में बनाऊंगा,
और मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगा;
मैं तुम्हारा नाम महान कर दूंगा,
और आप एक आशीर्वाद होंगे।
3 मैं उन्हें आशीर्वाद दूंगा जो तुम्हें आशीर्वाद देते हैं,
और जो कोई तुम्हें शाप देगा, मैं शाप दे दूंगा;
और सभी लोग पृथ्वी पर हैं
आपके माध्यम से धन्य हो जाएगा।

   इब्राहीम (अलै.) की अज़मत

जहां मैं रहता हूँ वहाँ बहुत से लोग ताज्जुब करते हैं कि क्या कोई ख़ुदा है और कोई शख्स कैसे जान सकता है कि अगर उसने हक़ीक़त में खुद को तौरेत के वसीले से ज़ाहिर किया हो। यहां हमारे सामने एक वायदा है जिस के हिससों से हम सहीह साबित कर सकते हैं। इस मुकाश्फ़े का ख़ातमा कलमबंद करता है कि अल्लाह ने बराहे रास्त इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से वायदा किया कि “मैं तेरा नाम सरफ़राज़ करूंगा” हम 21 वीं सदी में बैठे हुए हैं और इब्राहीम/अब्रहाम/अब्राम का नाम तारीक़ में अलमगीर तोर से जाना पहचाना नामों में से एक है। यह वायदा ल्फ्ज़ी और तारीक़ी तोर से सच साबित होता है। तौरेत का सब से क़दीम नुसख़ा जो आज मौजूद है वह बहीरा।ए।मुरदार के तूमार में से है जिस की तारीक़ 200 -100 क़ब्ल मसीह है। इसका मतलब यह है कि यह वायदा ज़ियादा से ज़ियादा इसके लिखे जाने वक़्त से मौजूद है। उस ज़माने में इब्राहीम (अलै.) के नाम और शख्सियत को सहीह तोर से नहीं जाना जाता था सिवाए यहूदियों की अक़लियत के जो तौरेत के मानने वाले थे। मगर आज उसका नाम बहुत ऊँचा है। सो हम सही साबित कर सकते हैं कि एक तकमील तभी पूरी होती है जब उसे लिखा जाता है, उससे पहले नहीं।

इब्राहीम (अलै.) के लिए वायदे का यह हिस्सा यक़ीनी तोर से वाक़े हुआ यहाँ तक कि ग़ैर ईमानदारों के लिए ज़रूरी था और यहाँ तक कि यह हआरे लिए अल्लाह का वायदा जो इब्राहीम (अलै.) के लिए है उसके बाक़ी हिस्से को समझने के लिए ज़ियादा यकीन दिलाता है। सो आइये हम इस मुताला को जारी रखें।

हमारे लिए बरकत

फिर से हम इब्राहीम (अलै.) की तरफ़ से एक बड़ी क़ौम के बरपा होने के वायदे को देखते हैं जो खुद इब्राहीम (अलै.) के लिए बाईस ए बरकत है। मगर इस के अलावा और भी कुछ है यह बरकत सिर्फ़ इब्राहीम (अलै.)के लिए ही नहीं है क्यूंकि यह इबारत कहती है “ज़मीन की तमाम कौमें तेरे वसीले से बरकत पाएंगीं” (यानी इब्राहीम अलै. के वसीले से)। यह मेरे और आप के लिए गौर करने की बात है क्यूंकि आप और मैं ‘ज़मीन के तमाम लोगों का’ एक हिस्सा हैं। इससे कुछ फ़रक नहीं पड़ता कि हम किस मज़हब से ताल्लुक रखते हैं, हमारी नसल की गोशा ।ए। गुमनामी क्या है, हम कहां रहते हैं, हमारी तहज़ीबी रुतबा क्या है, या हम कौनसी ज़बान बोलते हैं वगैरा। यह वायदा हर एक के लिए है जो आज ज़िन्दा मौजूद हैं। यह वायदा आपके और मेरे लिए है। हालांकि हमारे फ़रक़ फ़रक़ मज़ाहिब, नसल बतोर गोशा।ए।गुम्नामियाँ और ज़बानें अक्सर लोगों को तकसीम करते और मुख़ालिफ़त का सबब बनाते हैं। मगर यह ऐसा वायदा है जो इन बातों पर ग़ालिब आता नज़र आता है जो आम तोर से हमको तक़सीम करता है। किस तरह? कब? किस तरह की बरकतें? यह इस मुद्दे पर साफ़ नहीं करता। मगर इस निशानी ने एक वायदे को जन्म दिया है जो इब्राहीम (अलै.) के वसीले से आपके और मेरे लिए है। जबकि हम जानते हैं कि इस वायदे का एक हिस्सा सच साबित हुआ है और हम भरोसा कर सकते हैं कि दूसरा हिस्सा जो हम पर नाफ़िज़ होता है वह भी साफ़ हो जाएगावह भी लफ्ज़ी तकमील बतोर – हमें इस को खोलने के लिए सिर्फ़ इसकी कुन्जी को ढूंढना ज़रूरी है।

हम इस बात पर गौर कर सकते हैं कि जब इब्राहीम (अलै.) ने इस वायदे को हासिल किया तो वह अल्लाह का फरमान बरदार हुआ और ….

“सो अब्राम खुदावंदके कहने के मुताबिक चल पड़ा”

पैदाइश 12:4

      इब्राहीम (अलै.) की हिजरत

ऊर से ।।> हारान ।।>कनान का मुल्क

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वायदा किया हुआ मुल्क में पहुँचने के लिए यह सफ़र कितना लम्बा था? यहाँ पर यह नक्शा इब्राहीम (अलै.) के सफ़र को दिखता है। वह असल में ऊर (मौजूदा जुनूबी इराक़) में रहता था। फिर वह हारान (मौजूदा शुमाली इराक़) में आया ।फिर उसने अपने ज़माने के कनान कि तरफ़ सफ़र किया। नक्शे में आप देख सकते हैं कि यह बहुत लम्बा सफ़र था। उसको ऊँट घोड़ा या गधे पर सवार होकर सफ़र करना था। सो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इस सफ़र को अंजाम देने में कई एक महीने लगे होंगे जब अल्लाह कि बुलाहट हुई तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने ख़ानदान को छोड़ा। अपनी ऐशो इशरत की ज़िन्दगी को छोड़ा जिसे वह मसोपतामिया में रहकर गुज़ारा करता था। मौजूदा मसोपतामिया उस ज़माने में ख़ास तहज़ीब ।ओ। तमद्दुन का मरकज़ था। उसकी मुहाफ़ज़त को लेकर और जो कुछ उसके इस सफ़र से मुताल्लिक़ मशहूर है वह यह है कि जिस तरफ़ वह सफ़र कर रहा था वह उस के लिए बिलकुल बेगाना था। जब वह अपनी मंजिल पर पहुंचा तो तोरेत हम से कहती है कि उस वक़्त उस की उम्र 75 साल कि थी!

पेश्तर नबियों की तरह जानवरों की कुर्बानियां

तौरेत हम से यह भी कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) हिफाज़त से जब कनान में पहुंचे:

“तो उसने खुदावंद के लिए एक मज़बह बनाया”

पैदाइश 12:7

एक मजबह वह है जहां हाबील और नूह (अलैहिस्सलाम) ने इस से पहले क़ुर्बानी अदा की थी। उन्होंने अल्लाह के लिए जानवरों के खून की क़ुर्बानी दी। हम देखते हैं कि नबियों ने किस तरह अल्लाह की इबादत की थी उसका यह एक नमूना था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उस नए मुल्क में दाखिल होने और सफ़र करने के लिएअपनी ज़िन्दगी के आखरी अय्याम में जोखिम उठाया था। मगर ऐसा करने के लिए उसने खुद को अल्लाह के वायदे के हाथों में सोंप दिया था ताकि खुद के लिए और दीगर तमाम लोगों के लिए बरकत का बाइस बने। और इसी लिए वह हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है। हम इब्राहीम की अगली निशानी नम्बर 2 के साथ इस मुताले को जारी रखते हैं।

लूत की निशानी

(तौरात या बाइबिल) का लूत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का भतीजा था। उसने शरारत पसंद लोगों के बीच रहना पसंद किया था। अल्लाह ने इस हालत को उस ज़माने के तमाम लोगों के लिये पैगम्बराना निशानी बतोर इस्तेमाल किया। मगर सवाल यह है कि वह निशानात क्या थे ? इस के जवाब के लिए हमको इस बयान में दिए गए फ़रक़ फ़रक़ लोगों की तरफ़ नज़दीकी से धियान देना होगा। इस बयान को तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तौरेत्त शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में देख सकते हैं कि तीन जमाअत के लोग पाए फ़ जाते हैं, इन के अलावा अल्लाह के फरिश्तों (पैगम्बरों की जमाअत)। आइये हम इन्हें बारी बारी से देखें।

सदोम के लोग

यह लोग निहायत ही गुमराह थे। यह लोग उम्मीद करते थे कि इनसानी औरतों के अलावा दूसरों की इज़्ज़त से भी खेल सकते थे (जो हक़ीक़त में फ़रिश्ते थे मगर सदोम के लोगों ने सोचा कि वह इंसान थे सो उन्हों ने उन के साथ गिरोह में होकर अस्मतदरी करने का मंसूबा किया)। इस तरह का गुनाह ऐसी संगीन बुराई थी कि अल्लाह ने सारे शहर का इंसाफ़ करने का फ़ैसला किया। फ़ैसला वही था जो इस से पहले भी आदम को दिया गया था।पीछे शुरुआत में अल्लाह ने आदम को इस फ़ैसले से ख़बरदार किया था कि गुनाह की मज़दूरी मौत है। और दूसरी तरह कि सज़ा नहीं (जैसे मारना , क़ैद करना वगेरा जो काफ़ी नहीं था। अल्लाह ने आदम से कहा था:

“….लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का फल कभी न खाना क्यूंकि जिस रोज़ तूने उस में से खाया    तू मरा।”

पैदाइश 2:17

इसी तरह से सदोम के लोगों के गुनाहों कि सज़ा यह थी कि उन लोगों को भी मरना था। दरअसल सदोम शहर के सारे लोगों को और उस में रहने वाले तमाम जानदारों को आस्मान से नाजिल आग के ज़रिये बर्बाद किया जाना था।यह एक नमूने की मिसाल है जो बाद में इंजील शरीफ़ में समझाया गया है:

  “क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी तो मौत है”

रोमियों 6:23

लूत के दामाद 

नूह के बयान में। अल्लाह ने तमाम दुनिया का फ़ैसला किया और आदम की निशानी के साथ यकसां (बराबर का सुलूक किया कि सारे लोग उस बड़े तूफ़ान के ज़रिये हलाक हुए। मगर तौरात शरीफ और कुरान शरीफ़ हमसे कहते हैं कि नूह के ख़ानदान को छोड़ सारी दुनया के लोग बुरे थे। अल्लाह ने सदोम के लोगों का भी इन्साफ़ किया जबकि वह लोग भी गुमराह और बुरे थे। सिर्फ़ इन बयानात के साथ मैं यह सोचने के लिए आज़माया जा सकता हूँ कि मैं अल्लाह के इंसाफ़ से महफूज़ हूँ क्योंकि मैं इतना बुरा नहीं हूँ जैसे कि वह लोग थे । आखिर कार मैं अल्लाह पर पूरा ईमान रखता हूँ, मैं बहुत से नेक काम करता हूँ और मैं ने कभी इस तरह के बुरे काम अनजाम नहीं दिए। तो फिर क्या मैं महफूज़ हूँ ? लूत की निशानी उस के दामादों के साथ मुझे ख़बरदार करती है। हालाँकि वह लोग इस गिरोह में शरीक नहीं थे जो एक गिरोह में होकर जिंसी गुनाह (असमतदरी) अंजाम देने की कोशिश कर रहे थे किसी तरह से उन्हों ने आने वाले इंसाफ़ की तंबीह को संजीदा तोर से नहीं लिया। दरअसल तौरेत शरीफ़ हम से कहती है, लोग  सोच रहे थे कि ‘(वह) लूत उन से मज़ाक़ कर रहा था’। मगर सवाल यह है कि क्या उन की किस्मत शहर के दुसरे लोगों से फ़रक़ थी ? नहीं ! वह उन्हीं की किस्मत में शरीक हुए। अंजाम बतोर लूत के दामादों और सदोम के बुरे लोगों उन दोनों में कोई फ़रक नहीं था। यहाँ निशानी यह है कि हर एक शख्स को इस तंबीह को संजीदा तोर से लेना ज़रूरी था क्यूंकि वह न सिर्फ़ गुमराह लोग थे।

लूत की बीवी          

लूत की बीवी हमारे लिए एक बड़ी निशानी है। तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में ही वह भी दीगर शरीर लोगों के साथ हलाक हुई – वह एक नबी की बीवी थी – मगर लूत के साथ उसका एक ख़ास रिश्त्ता होते हुए भी वह रिश्ता बचा न सका हांलांकि वह सदोम के लोगों के साथ उस बड़े गुनाह में शामिल नहीं थी। उसने फ़रिश्ते के हुक्म को तोड़ा:

              ‘तुम में से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे’ (सूरा 11:81) सूरा ।ए। हूद या

              ‘पीछे मुड़कर न देखना’ (पैदाइश 19:17)

तौरेत हम से कहती है कि

 लेकिन लूत की पत्नी ने वापस देखा, और वह नमक का एक स्तंभ बन गई।

उत्पत्ति १ ९: २६

उसके “पीछे मुड़ कर देखने” का असल मक़सद क्या था उसे समझाया नहीं गया है मगर उस ने सोचा कि अल्लाह के इस छोटे से हुक्म को नज़र अंदाज़ करदेने से कोई ख़ास फ़रक नहीं पड़ेगा – उसकी किस्मत – उसके “छोटे” गुनाह के साथ वैसा ही था जैसा कि सदोम के लोगों का “बड़ा” गुनाह उन के लिए मौत बन कर आई थी। यह हमारे लिए कुछ ऐसी ज़रूरी निशानी है जो कभी कभी यह सोचने से दूर रखती हैं कि यह छोटे गुनाह हैं जिन्हें अल्लाह हिसाब में नहीं लाएगा (इन का इंसाफ़ नहीं होगा) — लूत की बीवी इस ग़लत सोच के खिलाफ़ तम्बीह के लिए हमारी निशानी है:

लूत, अल्लाह और फ़रिश्ते पैग़म्बरान 

जिसतरह हम ने आदम की निशानी में देखा था कि जब अल्लाह ने आदम का इंसाफ़ किया था तो उस ने तो उसने उस पर अपना फ़ज़ल भी अता किया था। और वह इंसाफ़ था उन के लिए चमड़े के पोशाक का इनायत किया जाना। नूह के साथ जब अल्लाह ने इंसाफ़ किया तो उसने फिर से एक बड़ी कश्ती के साथ फ़ज़ल अता किया। फिर से एक बार अल्लाह यहाँ तक कि अपने इंसाफ़ में बा ख़बर है कि वह इंसाफ़ अता करता है ।इसको तौरेत ने इसतरह बयान किया है कि:

जब वह (ल्यूक) हिचकिचाया, तो पुरुषों (स्वर्गदूत जो पुरुषों की तरह दिखते थे) ने अपना हाथ और अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के हाथों को पकड़ लिया और उन्हें सुरक्षित रूप से शहर से बाहर ले गए, क्योंकि प्रभु उनके लिए दयालु थे।

उत्पत्ति १ ९: १६

इससे हम क्या सीख सकते हैं? से पीछे की निशानियों की तरह फ़ज़ल आलमगीर था मगर सिर्फ़ एक तरीके के ज़रीये ही अता किया जाना था। लूत के ख़ानदान को शहर से बाहर रहनुमाई करते हुए अल्लाह ने रहम करके मिसाल के तोर पर शहर के अन्दर एक ऐसी पनाहगाह का इंतज़ाम नहीं किया जो आसमान से आग नाज़िल होने पर उनकी मुहाफ़िज़त हो सके। अल्लाह की तरफ़ से रहम हासिल करने का एक ही रास्ता था – कि शहर से बाहर फ़रिश्तों के पीछे चलो। अल्लाह ने लूत और उसके खानदान पर इसलिए रहम नहीं किया क्यूंकि लूत एक कामिल शख्स था। दरअसल तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ इन दोनों में हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों को अस्मतदरी करने वालों के हाथ सोंपने जा रहा था। यह एक शरीफ़ाना पेशकश नहीं थी। तौरेत हमसे कहती है कि फरिशतों के ख़बरदार किये जाने पर भी लूत ‘हिचकिचाया’। इन सब के बावजूद भी अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिये उसका हाथ पकड़ कर शहर के बाहर लेजाने के ज़रिये उसपर अपना रहम ज़ाहिर करता है। यह हमारे लिए एक निशानी है : अल्लाह हम पर रहम इनायत करेगा, यह हमारी भलाई पर मुनहसर नहीं है। मगर हम लूत की मानिंद जो हमारे सामने है रहम हासिल करने की ज़रुरत है जिस से हमारी मदद हो – लूत के दामादों ने इसे हासिल नहीं किया और उन्हें इससे कोई फाइदा हासिल नहीं हुआ।

तौरेत हम से कहती है कि अल्लाह ने लूत के चचा, एक बड़े नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबब से जिसने उसके लिए अल्लाह से इल्तिजा करी थी उस पर अपना रहम ज़ाहिर किया – (यहाँ पैदाइश की इबारत को देखें) तौरेत शरीफ़ इब्राहिम (अलै.) के निशानियों के वसीले से अल्लाह की  जानिब से वायदों को को जारी रखती है कि “तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब क़ौमें बरकत पाएंगीं क्यूंकि तू ने मेरी बात मानी” (पैदाइश 22:11)। यह वायदा हमको चौकन्ना कर देना चाहिए इसलिए कि कोई फ़रक़ नहीं पड़ता कि हम कौन हैं, कौन सी ज़बान हम बोलते हैं, हम किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, या हम कहां रहते हैं वगैरा हम मालूम कर सकते हैं कि आप और मैं ‘ज़मीन की तमाम कौमों का’ एक हिस्सा हैं।अगर इब्राहिम की इल्तिजा के ज़रिये अललाह ने मुतहर्रिक होकर लूत पर रहम ज़ाहिर किया हालांकि वह इस के लिए काबिल नहीं था तो कितना ज़ियादा इब्राहीम (अलै.) की निशानियां हम पर रहम ज़ाहिर करेंगीं जो कि हम भी ‘तमाम कौमों में से’ एक हैं? इसी सोच के साथ हम तौरेत में इब्राहीम की निशानियों को देखते हुए आगे बढ़ेंगे।

नूह की निशानी

हम तारीक़ी सिलसिले को शुरू से जारी रखेंगे (मिसाल के तौर पर आदम/हव्वा और काबील/हाबील) और अब तौरेत में हमारा अगला तवज्जो के क़ाबिल न्काबी है नूह (अलैहिस्सलाम) जो आदम के ज़माने के 1600  बाद रहा करता था। बहुत से लोग मशरिक में नूह (अलैहिस्सलाम) की कहानी को जानते हैं और इनकार न करने लायक़ सैलाब की  बाबत कहानी को भी जानते हैं। मगर दुनिया तिलछट के तौर पर चट्टानों से ढका हुआ है जो कि कहा जाता है कि ऐसा सैलाब के दौरान ही तिलछट के जमा होने ज़रिये शक्ल इख्तियार करता है। सो हमारे पास इस सैलाब का माद्दी सबूत मौजूद है मगर सवाल यह है कि नूह की क्या निशानी थी जिस पर हमको गौर करने की ज़रुरत है? अब नूह (अलैहिस्स्सलाम)के बयान को तौरात और कुरान में पढ़ने के लिए यहां पर किलिक करें-

ग़ैब हो जाना  मुक़ाबिल  रहम हासिल करना

जब मैं मशरिकी लोगों से अल्लाह के इंसाफ़ की  बात करता हूँ तो अक्सर मुझे कुछ इस तरह के जवाब सुनने को मिलते हैं,  “मैं इंसाफ़ के लिए इतना ज़ियादा फ़िकर मंद नहीं हूँ क्यूंकि अल्लाह इतना ज़ियादा रहम करने वाला है कि मैं नहीं सोचता कि वह सच मुच मेरा इंसाफ़ करेगा।” यह वह नूह (अलैहिस्स्स्लाम) का बयान है जो एक सबब के लिए सवाल खड़ा करता है। जी हाँ। अल्लाह बहुत ज़ियादा रहम करने वाला है। वह अपने सिफ़त में बदलता नहीं है, और इस में कोई शक नहीं कि वह नूह (अलैहिस्स्सलाम) के ज़माने में भी रहम करने वाला था। इस्के बावजूद भी (नूह और उसके खानदान को) छोड़ तमाम दुनया अल्लाह के इंसाफ़ के तहत तबाह व बर्बाद हो गयी थी। 

अपने पापों के कारण वे डूब गए और उन्हें आग में डाल दिया, और उन्होंने अपने लिए अल्लाह [कोई भी] मददगार नहीं पाया सूरा नूह

सूरा 71 – नूह हमें बताती है कि

तो फिर उस का इंसाफ़ कहां गया? उसका इंसाफ़ उस कश्ती में मौजूद था। जिस तरह हम कुरान शरीफ़ में पढ़ते हैं:

            हम (अल्लाह) ने उसे (नूह पीबीयूएच) दिया, और उन लोगों को आर्क में

द हाइट्स 7:64

अल्लाह ने अपने रहम में होकर नबी नूह (अलैहिस्सलाम) का इसतेमाल करते हुए एक कश्ती का इन्तिज़ाम किया जो किसी के लिए भी दस्तियाब था। हर कोई उस कशती में दाखिल हो सकता था और खुद के लिए रहम और मह्फूज़ियत को हासिल कर सकता था। मगर एक संजीदा मसला यह था कि नूह के खानदान को छोड़ तक़रीबन सब लोग ख़ुदा के पैग़ाम पर ईमान नहीं लाए थे। और ईमान लाना तो दूर उल्टा नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाया और आने वाले इंसाफ़ की बाबत भरोसा नहीं किया। अगर यह सब न करते हुए सिर्फ़ कश्ती में दाखिल भी हो जाते तो वह लोग अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाते।

कुरान शरीफ़ की इबारत भी हमसे कहती है कि नूह का एक बेटा अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान नहीं लाया था। हक़ीक़त में वह एक पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। वह सोच रहा था कि ऐसा करके वह अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाएगा। मगर फिर से यहाँ पर एक परेशानी थी। वह अपने ईमान को मख्सूसियत के साथ जोड़ नहीं पाया था और इस चुनाव का फ़ैसला नहीं कर पाया था। उसने इंसाफ़ से बचने के लिए अपने तरीके का इस्तेमाल किया। मगर उस के बाप ने उससे कहा:

“आज के दिन तुझे अल्लाह के हुक्म से कोई चीज़ बचा नहीं सकती मगर उन्हीं को जिन पर उसने अपना रहम ज़ाहिर किया      है!”

हूद 11:43

उस बेटे को अल्लाह के रहम की सख्त ज़रुरत थी न कि खुद की अपनी कोशिश जो उसे इंसाफ़ से बचा सकती थी। दर हक़ीक़त पहाड़ पर चढ़ने की उस की कोशिश फुज़ूल और बे हासिल था। इसलिए इस का अंजाम भी उन लोगों के साथ ही था जो नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाते थे। और उनका मज़ाक़ उन्हें पानी में डूब कर मरने पर मजबूर किया।  यह सब कुछ करने से बेहतर अगर वह अपने बाप के साथ कश्ती में दाखिल हो जाता तो अल्लाह के इंसाफ से बच सकता था। इस बयान से हम मालूम कर सकते हैं कि सिर्फ़ अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान लाना ही काफ़ी नहीं था कि सैलाब से बच जाते। दर असल अल्लाह जो रहम इनायत करता है उस के लिए मखसूस हो जाना य सुपुर्द करना भी ज़रूरी होता है बनिस्बत इस के कि हमारे अपने ख़यालात को इस में शामिल करें कि हम यकीनी तौर से अल्लाह के रहम को हासिल कर लेंगे। सो – कश्ती हमारे लिए ‘नूह’ की निशानी है। सच पूछा जाए तो यह सरे आम यानी कि खुल्लम खुल्ला अल्लाह के इंसाफ़ की निशानी थी और साथ ही बचने और उस के रहम का ज़रिया भी था। क्यूंकि नूह के जमाने के लोगों में से हर किसी ने उस किश्ती को तैयार होते हुए देखा था। इस लिए यह आने वाले इंसाफ़ का और रहम की दस्तियाबी दोनों के लिए ‘खुल्लम खुल्ला’ निशानी था। मगर यह दिखता है कि उस के रहम का हुसूल उस फ्राह्मी के ज़रिये ही मुमकिन था जिसे अल्लाह ने पहले से इंतज़ाम किया हुआ था।

सो नूह ने अल्लाह के रहम व फ़ज़ल को क्यूँ हासिल किया? तौरेत बहुत बार इस मुहावरे को दोहराती है कि

            “नूह ने उन सब कामों को अंजाम दिया जो खुदावंद ने उसे हुक्म दिया था”

मैं यह पाता हूँ कि मैं उसी काम को करने पर माइल होता हूँ जो मैं समझता हूँ या जो मैं चाहता हूँ या जिस से मैं राज़ी होता हूँ।  मुझे यकीन है कि – नूह (अलैहिस्सलाम) के दिल में भी सैलाब के आने की इतला (तंबीह) और सूखी ज़मीन पर एक बड़ी कश्ती के तामीर के लिए अल्लाह के हुक्म को लेकर कई एक सवाल उस के दिल ओ दमाग में रहे थे होंगे। मगर मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि दीगर लोगों की बनिस्बत नूह एक रास्त्बाज़ शख्स था उसने कश्ती बनाने के मामले में कोई धियान नहीं दिया। मगर उस ने वही सब किया जो उस को अल्लाह की तरफ़ से हुक्म मिला था इस बिना पर नहीं कि उस के बाप ने उसे क्या सिखाया था या इस बिना पर नहीं कि उस ने अपनी ज़िन्दगी में क्या सीखा और समझा था। इस बिना पर नहीं कि उन चीज़ों से जिन से वह मुतमइन था और इस बिना पर भी नहीं कि यह उस के लिए क्या मायने रखता है। सो यह बातें हमारे लिए बड़ी मिसालें यानी कि नमूने हैं जिन के पीछे हमें चलने की ज़रुरत है।

नजात के लिए दरवाज़ा

तौरात हम से यह भी कहती है कि नूह, उसका ख़ानदान और तमाम जानवरों के कश्ती में दाखिल होने के बाद (सवार होने बाद)

            “खुदावंद ने बाहर से उस कश्ती का दरवाज़ा बंद कर दिया था”

पैदाइश 7:16

यह अल्लाह ही था जिसने कश्ती के उस एक दरवाज़े पर काबू रखा हुआ था न कि नूह (अलैहिस्सलाम) ने जब इंसाफ़ की बिना पर ज़मीन पर पानी आया तो बाहर से लोग कश्ती को किसी तरह का नुख्सान नहीं पहुंचा सकते थे न ही उसका दरवाज़ा खोल सकते थे क्यूंकि अल्लाह उस एक दरवाज़े को पूरी तरह से काबू में रखा हुआ था। मगर उसी वक़्त जो अन्दर मौजूद थे वह इस यकीन के साथ आराम से रह सकते थे कि अल्लाह ने कश्ती के दरवाज़े पर काबू कर रखा है इस लिए कोई हवा या मौज उस दरवाज़े को खोल नहीं सकती थी। वह लोग अल्लाह की हिफाज़त और उसके रहम में महफूज़ थे।

इसलिए कि अल्लाह बदलता नहीं है यह बात आज भी हमारे लिए नाफ़िज़ होती है। तमाम नबियों ने ख़बरदार किया है कि एक और इंसाफ़ का दिन आने वाला है। और यह आग के साथ आएगा मगर नूह (अलैहिस्सलाम) की  निशानी हमको यक़ीन दिलाती है कि उस के इंसाफ़ के साथ वह अपना रहम भी पेश करेगा। मगर हमको एक दरवाज़े के साथ उसके कश्ती की राह देखनी है जो हमको रहम हासिल करने की ज़मानत देगा।

अंबिया की क़ुर्बानी

तौरात हमसे यह भी कहती कि

   तब नूह ने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई। उसने कुछ शुद्ध पक्षियों और कुछ शुद्ध जानवर  को लिया और उनको वेदी पर परमेश्वर को भेंट के रूप में जलाया।

पैदाइश 8:20

यह आदम/हव्वा और क़ाबील/हाबील के जानवरों कि क़ुर्बानी के नमूने के लिए मुनासिब बैठता है। इस का मतलब यह है कि एक बार फिर एक जानवर की मौत और उस के खून के छाने जाने के ज़रिये नूह (अलैहिस्सलाम) ने दुआ की और अल्लाह के ज़रिये वह दुआ क़बूल की गई। “और ख़ुदा ने नूह और उसके बेटों को बरकत दी” (पैदाइश 9:1) “और नूह के साथ एक अहद बांधा” (पैदाइश 9:8) कि वह आइन्दा से कभी भी पानी के सैलाब के ज़रिये लोगों का इंसाफ नहीं करेगा। तो ऐसा लगता है कि नूह के ज़रिए क़ुर्बानी , मौत और एक जानवर के खून का छाना जाना अल्लाह की इबादत में बहुत दिक्कतें लेकर आ रही थीं। इस के बावजूद भी यह कितनी अहम् बात है। हम तौरेत के नबियों के वसीले से अगली बार लूत के साथ इस जायज़ा को जारी रखेंगे।

क़ाबील और हाबील की निशानी

इस से पहले के मज़मून में हम ने आदम और हव्वा के निशानात पर गौर किया था जिन्होंने तशद्दुद के साथ एक दुसरे का सामना किया था। यह खानी है इंसानी तारीक़ में पहले क़त्ल की – मगर हम भी इस कहानी से आलमगीर कायदों को सीखना चाहते हैं ताकि उन की निशानी से समझ हासिल कर सकें। सो आइये हम इसे पढ़ें और सीखें। (यहां पर किलिक करें ताकि दुसरे विंडो पर इबारत को खोल सकें।

क़ाइन और हाबील (क़ाबील और हाबील) दो बेटे दो कुर्बानियों के साथ

तौरेत में आदम और हव्वा केदो बेटों को क़ाइन और हाबील नाम दिया गया है। कुरान शरीफ में ऐसा नहीं लिखा है कि इन दोनों का नाम रखा गया मगर इस्लामी रिवायत के मुताबिक वह दोनों काबील और हाबील के नाम से जाने जाते हैं। उन दोनों ने अल्लाह के किये क़ुर्बानी पेश की। मगर हाबील की क़ुर्बानी को क़बूल किया गया जबकि क़ाइन की क़ुर्बानी को क़बूल नहीं किया गया। सो क़ाइन ने हसद में आकर अपने भाई का क़त्ल कर डाला। मगर वह अल्लाह से अपने जुर्म की शरमिन्दगी को नहीं छिपा पाया। इस बयान से अहम् सवाल यह उठता है कि हाबील की क़ुर्बानी क्यूं क़बूल हुई और काइन की क्यूं नहीं? बहुत से दोनों भाइयों के फ़रक बात को लेकर अंदेशा ज़ाहिर करते हैं मगर बयान का बगोर मुताला हमको मुख्तलिफ तौर से एक अलग सोच की तरफ ले जाएगा। तौरेत इस बात को साफ़ करती है कि लाइ गई क़ुरबानियों में एक ख़ास फ़रक को देखा गया। क़ाइन ने ज़मीन के फ़सल (मिसाल के तौर पर फलों और तरकारियों) की क़ुरबानी ले आया जबकि हाबील ने गल्ले के पह्लोठों की चरबी का हिस्सा लेकर आया था। इस का मतलब यह है कि हाबील ने एक जानवर को ज़बह किया था। वह भेड़ या बकरी का हो सकता है मगर खुद के गल्ले का था।

यहाँ हम आदम की निशानी के लिए एक मुतवाज़ी बात को देखते हैं। आदम ने अपनी शरमिन्दगी को पेड़ के पत्तों से ढांकने की कोशिश की थी मगर जानवर का चमड़ा (जानवर की मौत) उनके लिए एक कारामद और असरकारक सर्पोश (ढांकने की चीज़) बना- पत्ते , फल और तरकारियों में खून नहीं होता और उन में वैसी ज़िन्दगी भी नहीं होती जैसी जानवरों या इंसानों में होती है। जिस तरह खून से ख़ाली पत्तों का सर्पोश (ढांका जाना) आदाम के लिए काफ़ी नहीं था इसी तरह खून से खाली फल तरकारी की क़ुर्बानी भी जो क़ाइन के ज़रिये पेश कि गई थी वह क़बूल करने के लायक़ नहीं था। जबकि हाबील की चर्बियों की क़ुर्बानी का मतलब था कि एक जानवर का खून बहाया गया था और खून को छाना गया था जिस तरह कि उस जानवर का खून भी असलियत में बहाया और छाना गया ताकि आदम और हव्वा के नंगे जिस्म को ढांक सके।

इस निशानी की शायद हाँ ख़ुलासा कर सकते हैं एक इज़हार के ढंग के साथ जो मैं ने बचपन में सीखा था: ‘जहन्नुम के रास्ते को अच्छे इरादों’ के साथ हमवार बनाया और साफ किया जा सकता है। वह इज़हार क़ाइन के लिए मुनासिब नज़र आता है। वह अल्लाह पर ईमान लाया था और उसने अपने ईमान को एक क़ुर्बानी के ज़रिये अल्लाह के हुज़ूर में आने के साथ ज़ाहिर किया। इस के बावजूद भी अल्लाह ने उसकी क़ुर्बानी को क़बूल नहीं किया और इस तरह से अल्लाह नेउसको शख्सी तौर से भी क़बूल नहीं किया। मगर क्यूं? क्या उस का बर्ताव बुरा था? ऐसा कलाम नहीं कहता कि शुरू में उसने ऐसा कोई काम नहीं किया। यह हो सकता है कि अल्लाह के लिए उस के दिल में बहतरीन से बहतरीन इरादे और  बर्ताव थे। आदम की निशानी में उस का बाप हमें ख़यालात का एक सिलसिला (इशारा) पेश करता है।  जब अल्लाह ने आदम और हव्वा का इंसाफ किया तो उस ने उन्हें फानी बनाया -इसतरह से मौत उनके लिए एक क़ीमत थी।  फिर अल्लाह ने उन के लिए एक निशानी दी -पोशाक (जो चमड़े का था) जो जानवर से आया था जिन से उनके नंगे पन को ढांका गया। मगर इस का मतलब यह है कि उस जानवर को सवालिया तौर पर मरना ज़रूरी था। सो एक जानवर मरा और उसका खून छाना गया ताकि आदम और हव्वा की शर्मिंदगी को ढांका जाए, और अब उन के बेटे कुरबानी ले आए मगर सिर्फ़ हाबील की कुरबानी जो (गल्ले के जानवर की चरबी) मंज़ूर की गयी क्यूंकि इस क़ुरबानी के लिए मौत की, खून बहाने और छाने जाने की ज़रूरत थी। ‘ज़मीन के फल तरकारियाँ’ मर नहीं सकती थीं क्यूंकि उन में ‘ज़िन्दगी’ नहीं थी और इसी तरह छाने जाने के लिए उन में खून भी नहीं था।

हमारे लिए निशानी:

खून का बहाया जाना और छाना जाना

यहाँ अल्लाह हमको एक सबक़ सिखाता है।  यह हम पर मुनहसर करता है यह फ़ैसला करने के लिए कि किस तरह हम अल्लाह के पास पहुंचें। वह एक मे’यार मुक़र्रर करता है और हम फ़ैसला करते हैं कि इस मे’यार के लिए हम मखसूस हैं या नहीं और वह मे’यार यहाँ पर एक क़ुरबानी है जो मरता है, खून बहाता है और उस के खून को छानता  है। मै शायद किसी और ज़रुरत को पहला मक़ाम दूँ क्यूंकि फिर मैं उसे अपने खुद के ज़रायों से दे सकूं। मैं अपना वक़्त दे सकता हूँ, अपनी ताक़त, अपने पैसे, अपनी दुआएं, अपनी मख्सूसियत दे सकता हूँ मगर अपनी ज़िन्दगी नहीं दे सकता। मगर वह – क़ुरबानी का खून – जो अल्लाह को हूबहू ज़रुरत है इस के अलावा दीगर चीजें किसी भी तरह  से काफी नहीं हैं। अगर यह क़ुर्बानी का नमूना यूँ ही जारी रहता है तो कामयाब नबुवती निशानियाँ देखने में दिलचस्प साबित होगा।

आदम की निशानी

आदम और उस की बीवी हव्वा जबकि अल्लाह की तरफ़ से बनाए गए थे बे मिसल हैं। और वह बाग़ -ए- अदन में रहते थे। इस लिए वह हमारे सीखने के लिए अहम निशानी रखते हैं। कुरान शरीफ़ में दो इबारतें हैं जो आदम की  बाबत कहते हैं – एक तौरात में (यहाँ उन्हें पढ़ने के लिए किलिक करें)-

यह बयानात बहुत ही एक जैसे हैं – दोनों बयानात में शख्सियतें जो पह्चानी गई हैं वह हैं : (आदम, हव्वा, शैतान (इब्लीस) और अल्लाह ; दोनों बयानात में जगह एक ही है (बाग़); दोनों बयानत में शैतान (इब्लीस) झूट बोलता है और आदम और हव्वा से चालाकी करता है। दोनों बयानात में आदम और हव्वा अपने नंगे पन की शरमिन्दगी को छिपाने के लिए पेड़ के पत्तों का इस्तेमाल करते हैं फिर अल्लाह आकर उन से इंसाफ़ की बात करता है ; दोनों बयानात में अल्लाह उन्हें चमड़े का लबादा (यानी कि पोशाक) अता करने के ज़रिये उन पर रहम ज़ाहिर करता है ताकि उनके नंगेपन की ‘शर्मिंदगी’ को ढांक सके कुरान शरीफ़ कहता है यह ‘अल्लाह की निशानी’ ‘आदम की औलाद’ के लिए है -यानी हमारे लिए – इसलिए यह सिर्फ़ माज़ी में हुए मज़हबी वाक़िया की बाबत तारीक़ का सबक नहीं है। हम आदम की कहानी से बहुत कुछ सीख सकते हैं

आदम की तंबीह हमारे लिए

अल्लाह के इनसाफ़ किये जाने से पहले आदम और हव्वा ने सिर्फ़ नाफ़रमानी के गुनाह के लिए मख़सूस किया था ऐसा नहीं है। मिसाल के तौर पर अल्लाह के साथ दस नाफ़रमानी के गुनाह के लिए जो नौ तंबीह दे रहा है और फिर आख़िरकार इंसाफ़ कर रहा है। अल्लाह ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी के अमल के लिए इंसाफ़ किया। बहुत से लोग यकीन करते हैं कि अल्लाह बहुत से गुनाह करने के बाद ही उनका इंसाफ करेगा। वह सोचते हैं कि अगर उन्हों ने बहुतों की बनिस्बत “कम गुनाह” किये हैं या उनके नेक आमाल बुरे आमाल से ज़ियादा हैं तो फिर (शायद) ख़ुदा इनसाफ़ नहीं करेगा। आदम और हव्वा का तजरुबा हमारी तंबीह करता है यह ऐसा नहीं है बल्कि अल्लाह हर एक नाफ़रमानी के गुनाह के लिए इंसाफ़ करेगा।

यह हमें एहसास दिलाता है कि अगर हम अल्लाह के लिए नाफ़रमानी का मवाज़िना करते हैं तो एक कौम के कानून को तोड़ने के साथ नाफ़रमानी करते है। केनडा में जहाँ मैं रहता हूँ, अगर मैं सिर्फ़ एक कानून को तोड़ता हूँ (मिसाल के तौर पर अगर मैं कोई चीज़ चोरी करता हूँ) तो मुल्क मेरा इंसाफ़ कर सकता है।  मैं यह नालिश नहीं कर कर सकता कि मैंने सिर्फ़ एक ही कानून को तोड़ा है।  मैं ने क़त्ल करके या किसी को भगाकर ले जाने से कानून को नहीं तोड़ा है। मुझे सिर्फ़ एक कानून के तोड़े जाने के लिए केनडा में इंसाफ़ का सामना करना पड़ेगा। यही बात तो अल्लाह के लिए भी नाफ़िज़ होता है।

जब आदम और हव्वा पत्तों के ज़रिये खुद से ढांके गए तो हम देखते हैं कि वह इस के बाद भी शर्मिंदगी का एहसास करते और अपने नंगेपन को ढांकने की नाकाम कोशिश करते थे।  इसी तरह जब हम ऐसा काम करते हैं जिस से शरम महसूस होती है तो हम उसे ढांकने या दूसरों से छिपाने की कोशिश करते हैं।  मगर आदम और हव्वा की  कोशिश ख़ुदा के सामने बेकार और नाकाम थी और अल्लाह उनकी नाकामी को देख सकता था। तब फिर दोनों ने ढोंग किया और ख़ुदा से बात की।

इंसाफ़ की बिना पर अल्लाह के कारगुज़ारमगर रहम के साथ

हम तीन कारगुज़ार देख सकते हैं :

1 अल्लाह उन्हें फ़ना पिजीर बनाता है – अब वह मर्मर जाएंगे।

2 अल्लाह उन्हें बाग़ से निकाल देता है  – उन्हें अब बहुत ज़ियादा तकलीफ़ के साथ ज़मीन पर ज़िन्दगी जीना पड़ेगा।

3 अल्लाह उन्हें चमड़े के पोशाक देता है।

यह बहुत ही अफ़सोस की बात है कि हम सब के सब आज के दिन तक इन से असर पिजीर हैं। हर कोई मरता है; कोई भी शख्स यहां तक कि कोई नबी भी आज तक बाग़ में वापस नहीं गया; हर एक शख्स लगातार कपड़े पहनता है। दरअसल यह तींन बातें बहुत ही मामूली हैं फिर भी इस बात को गौर करने से चूक जाते हैं कि जो अल्लाह ने आदम और हव्वा के साथ किया वह हज़ारों सालों के बाद भी उस का एहसास किया जाता है। जो कुछ अदन के बाग़ में वाक़े हुआ उस का अंजाम आज भी असर करक होते हुए नज़र आता  है।

अल्लाह कि तरफ़ से पोशाक का दिया जाना उनके लिए इनाम है। उनकी शर्मिंन्दगी अब ढकी जा चुकी है। जी हाँ। अल्लाह ने इंसाफ़ किया है। मगर साथ ही उसने मेहरबानी भी की है जो कि उसे नहीं करना चाहिए था। आदम और हव्वा ने पोशाक का ‘अतियया’ उन के अच्छे बर्ताव के सबब से हासिल नहीं किया बल्कि उनकी नाफ़रमानी की उजरत में हासिल किया। आदम और हव्वा अल्लाह के उस इनाम को सिर्फ़ बगैर किसी लियाक़त और मुस्तहक होने के ही हासिल कर सकते थे। मगर इसके लिए किसी ने क़ीमत अदा की थी। तौरेत हम से कहती है कि वह पोशाक ‘चमड़े’ के थे। इस तरह से वह एक जानवर से आए थे। इस नुक्ते पर आने तक कहीं भी मौत नहीं थी मगर अब एक जानवर का चमड़ा जो ढंकने के लिए पोशाक बना उस ने क़ीमत अदा की। अपनी ज़िन्दगी की क़ीमत! एक जानवर मरा ताकि ताकि आदम और हव्वा अल्लाह कि तरफ़ से रहम हासिल करे।

क़ुरान शरीफ़ कहता है कि उस पोशाक ने उनकी शर्मगाह को ढांका। मगर हक़ीक़त में अगर ज़रुरत थी तो उनकी रास्त्बाज़ी को ढांका जाना था। और किसी तरह (चमड़े का) यह लिबास उस रास्त्बाज़ी की एक निशानी थी और एक निशानी हमारे लिये :

            “ऐ आदम की औलाद! हमने तुमको लिबास अता किया है ताकि तुम अपनी शर्मिंदगी को ढांको, और यह तुम्हारे लिए आराइश के लिए भी है- मगर रास्त्बाज़ी का लिबास सब से बेहतरीन है। यह अल्लाह कि निशानियों में से एक है उनके लिए    जो हमारी हिदायतें हासिल करते हैं”

सूरा-7:26 (इरतिफ़ा)

एक अच्छा सवाल है: कि हम इस “रास्त्बाज़ी के लिबास” को कैसे हासिल करते हैं? बाद के अंबिया इस अहम सवाल के जवाब को पेश करेंगे।

इंसाफ़ और रहम की बिना पर अल्लाह के अलफ़ाज़

अल्लाह न सिर्फ़ यह तीन चीजें आदम और हव्वा के लिए और हमारे लिए (उनके फ़रज़न्दों के लिए) करता है बल्कि वह अपने कलाम के ज़रिये से बात भी करता है। दोनों बयानात में अल्लाह दुश्मनी की बात करता है। मगर तौरेत में यह जोड़ दिया गया है कि यह दुश्मनी औरत और सांप (शैतान)के दरमियान होगी। यह ख़ास पैग़ाम फिर से ज़ेल में दिया गया है -इसको मैंने ब्रेकट () के अन्दर लिख दिया है ताकि इस का हवाला देख सकें। अल्लाह कहता है :

“और मैं (अल्लाह) तेरे (शैतान) और औरत के दरमियान, तेरी नसल और औरत की नसल के दरमियान अदावत डालूँगा। वह तेरे (शैतान) के सिर को कुचलेगा, और तू (शैतान) उसकी (औरत के नसल) की एड़ी पर काटेगा।

पैदाइश 3:15

यह एक पहेली जैसी लगती है मगर समझने लायक़ है। गौर से पढ़ने पर आप देखेंगे कि यहाँ पर पांच फ़रक फ़रक शख्सियतों का ज़िकर किया गया है और यह नबुवत बतौर है जिस में आप आगे के ज़माने की बातें देख सकते हैं यानी (मुस्तक़बिल के ज़माने को दुहराया गया है) यह शख्सियतें हैं :

1. ख़ुदा (या अल्लाह)

2. शैतान (या इब्लीस)

3. औरत

4. औरत की नसल

5. शैतान की नसल

और यह पहेली एक नक्शा बनती है कि यह शख्सियतें मुताक्बिल में किस तरह एक दुसरे से ताल्लुक रखेंगे इसे नीचे दिखाया गया है :

शख्सियतें और उनके ताल्लुकात अल्लाह के वायदे में जो जन्नत में दिया गया था।

यहां यह नहीं कहा गया है कि औरत कौन है -मगर ख़ुदा यहाँ पर शैतान की ‘नसल’ और औरत की नसल की बात करता है। यह पोशीदा है। मगर हम औरत की ‘नसल’ की बाबत एक बात जानते हैं कि नसल को ‘वह’ और ‘उसे’ बतौर इशारा किया गया है जो कि वाहिद और नरीना इंसान है। इस समझ के साथ हम एक पतता छांट सकते हैं मतलब एक मुमकिन तर्जुमा निकाल सकते हैं कि ‘वह’ का इशारा एक औरत से नहीं बल्कि एक मर्द से है जो औरत की नसल से है। इसको जमा के सेगे में (यानी कि वह सब) करके भी नहीं लिखा गया है। तो यह ज़ाहिर है कि ‘नसल’ लोगों की एक जमाअत भी नहीं है चाहे वह क़ौमी पेहचान की तरफ़ इशारा करता हो या किसी कौम के लोगों को, और यह नसल (यह, वह) यानि ज़मीर से भी ताल्लुक़ नहीं रखता बल्कि यह एक शख्स को ज़ाहिर करता है (मतलब यह कि यह नसल एक शख्स है) हालाँकि यह ज़रूरी नज़र आए यह उस मुमकिन को निकाल फेंकता है कि यह नसल एक फ़लसफ़ा, ता’लीम या मज़हब है। सो यह नसल (मिसाल के तौर पर) मसीहियत या इस्लाम नहीं है क्यूंकि अगर यह ऐसा होता तो (यह, वह) यानी ज़मीर को ज़ाहिर करता, और यह लोगों की जमाअत भी नहीं है जिस तरह यहूदियों की मसीहियों की या मुसलमानों की जमाअत होती है। अगर होता तो ‘वह सब’ का लफ्ज़ इस्तेमाल होता।  हालाँकि अभी भी यह पोशीदा है कि ‘यह नसल’ कौन है। जबकि हम नेकई एक मुम्किनात को हटा दिया है ताकि यह क़ुदरती तौर से हमारे दिमाग़ में आए।

हम इस वायदे के मुस्तक़बिल के ज़माने के नज़रिए से देखें तो यह एक मनसूबा है जो अल्लाह कि हिकमत में तजवीज़ की गई थी कि यह “नसल” शैतान के सर को कुचलेगा।  मतलब यह कि वह उस को (पूरी तरह से बर्बाद कर देगा) जबकि उसी वक़्त शैतान उसको एड़ी पर काटेगा। इस नुक़ते पर देखा जाए तो इस भेद के मतलब को साफ़ नहीं किया गया है मगर हम जानते हैं कि यह ख़ुदा का एक मंसूबा है जो ज़ाहिर होकर रहेगा।

अब गौर तलब बात यह है कि अल्लाह यह बात आदम से नहीं कहता और ऐसा भी नहीं लगता कि वह इस ख़ास नसल के वायदे को औरत से कहता है। यह बहुत ही हैरत अंगेज़ और ग़ैर मामूली तौर से तौरेत, ज़बूर और इंजील में और ख़ास तौर से नबियों की किताबों में जोर दिया गया है। इन तीनों में जो नसबनामे दिए गये हैं वह तक़रीबन ज़रा हट कर क़लमबंद किया गया है कि जो फ़र्ज़न्द हैं वह सिर्फ़ बापों से आते हैं। मगर इस नसल का वायदा जो बाग़ में किया गया था यह बिलकुल फ़रक है। ऐसा कोई नसल का वायदा नहीं है (एक ‘वह’) एक मर्द से आए। तौरेत कहती है कि वह नसल एक औरत से होगी (औरत की नसल) – एक मर्द का ज़िकर किये बगैर।

तमाम आदमी जो कभी वजूद में आए थे उन में से सिर्फ़ दो आदमी थे जिन के कभी कोई इंसानी बाप नहीं थे -सब से पहले आदम था जिस को बराहे रास्त ख़ुदा ने बनाया था, और दूसरा ईसा अल-मसीह (ईसा अलैहिस्सलाम) जो कि एक कुंवारी से पैदा हुआ। इस तरह उस का कोई इंसानी बाप नहीं था। यह मशाहिदा के मुताबिक मुनासिब बैठता है कि यह नसल “मुज़क्कर” है न कि “मुअननस”, जमा का सेगा या ज़मीर (यह, वह) नहीं है बल्कि वाहिद है। ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) एक औरत की ‘नसल’ है। मगर सवाल यह है कि उस का दुशमन कौन है? क्या उस का दुशमन शैतान की नसल है? हालाँकि हमारे पास जगह नहीं है कि इस को तफसील के साथ बयान करें मगर कलाम-ए- पाक में शैतान के बेटे को हलाकत का फ़र्ज़न्द कहा गया है, और दूसरा लक़ब जो तस्वीर कशी करता है वह आने वाला इंसानी हाकिम जो “मसीह” का मुख़ालिफ़ होगा। उस को दज्जाल भी कहा जाता है। बाद में कलाम में मरकूम है कि “मुख़ालिफ़ मसीह” और “मसीह” या (मसीहा) के दरमियान लड़ाई होगी। मगर सबसे पहले यहाँ  से  इस का ज़िकर तारीक़ की शुरुआत में जुनैन जैसा है।

तारीक़ का आखरी अंजाम लड़ाई का इख्तिताम शैतान और अल्लाह के बीच है जो अदन के बाग़ में शुरू हुआ था। और इसी शुरुआत में तौरात की पहली किताब में नबुवत की गई थी। बहुत से सवालात रह जाते हैं और कुछ और सवालात भी उठाए गए हैं। यहाँ से जारी रखते हुए और कामयाब पग़मबरों से सीखते हुए जिन से हमें मदद मिलेगी कि हमारे सवालात का बेहतर जवाब मिले और उन औकात को समझ पाएं जिमें हम पाए जाते  हैं। हम आदम और हव्वा के बेटों, क़ाबील और हाबील की मुख़्तसर कहानी के साथ इस बयान को जारी रखते हैं।

तआरुफ़- अल्लाह की तरफ से एक संकेत के रूप मे क़ुरआन शरीफ़ मे इंजील के नमूने

जब मैंने पहली बार क़ुरआन शरीफ़ पढ़ी तो मैं कई तरीकों से फँस गया था। सबसे पहले मुझे इंजील शरीफ के कई सीधे हवाले मिले। लेकिन यह एक ख़ास नमूना था, जिसके मार्फ़त इंजील का जिक्र किया गया था जो कि वास्तव मै मुझे फिक्र मै डालता था। नीचे कुरान की सभी आयते हैं जो की इंजील शरीफ  का सीधे जिक्र करती है। शायद आप उस नमूने को देख सकते है जो की मैंने देखा है.

(ऐ रसूल) उसी ने तुम पर बरहक़ किताब नाज़िल की जो (आसमानी किताबें पहले से) उसके सामने मौजूद हैं उनकी तसदीक़ करती है और उसी ने उससे पहले लोगों की हिदायत के वास्ते तौरेत व इन्जील नाज़िल की. और हक़ व बातिल में तमीज़ देने वाली किताब (कुरान) नाज़िल की बेशक जिन लोगों ने ख़ुदा की आयतों को न माना उनके लिए सख्त अज़ाब है और ख़ुदा हर चीज़ पर ग़ालिब बदला लेने वाला है.  [(सुरा 3:3-4 (अल इमरान )]

और (ऐ मरयिम) ख़ुदा उसको (तमाम) किताबें आसमानी और अक्ल की बातें और (ख़ासकर) तौरेत व इन्जील सिखा देगा। [सूरा 3:48 (अल इमरान)]

ऐ अहले किताब तुम इबराहीम के बारे में (ख्वाह मा ख्वाह) क्यों झगड़ते हो कि कोई उनको नसरानी कहता है कोई यहूदी हालॉकि तौरेत व इन्जील (जिनसे यहूद व नसारा की इब्तेदा है वह) तो उनके बाद ही नाज़िल हुई. [सूरा 3:65 (अल इमरान)]

और हम ने उन्हीं पैग़म्बरों के क़दम ब क़दम मरियम के बेटे ईसा को चलाया और वह इस किताब तौरैत की भी तस्दीक़ करते थे जो उनके सामने (पहले से) मौजूद थी और हमने उनको इन्जील (भी) अता की जिसमें (लोगों के लिए हर तरह की) हिदायत थी और नूर (ईमान) और वह इस किताब तौरेत की जो वक्ते नुज़ूले इन्जील (पहले से) मौजूद थी तसदीक़ करने वाली और परहेज़गारों की हिदायत व नसीहत थी. [सूरा 5:46 (अल-मैदा)]

और अगर यह लोग तौरैत और इन्जील और (सहीफ़े) उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किये गए थे (उनके एहकाम को) क़ायम रखते तो ज़रूर (उनके) ऊपर से भी (रिज़क़ बरस पड़ता) और पॉवों के नीचे से भी उबल आता और (ये ख़ूब चैन से) खाते उनमें से कुछ लोग तो एतदाल पर हैं (मगर) उनमें से बहुतेरे जो कुछ करते हैं बुरा ही करते हैं. [सूरा 5:66(अल-मैदा)]

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ अहले किताब जब तक तुम तौरेत और इन्जील और जो (सहीफ़े) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल हुए हैं उनके (एहकाम) को क़ायम न रखोगे उस वक्त तक तुम्हारा मज़बह कुछ भी नहीं और (ऐ रसूल) जो (किताब) तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से भेजी गयी है (उसका) रश्क (हसद) उनमें से बहुतेरों की सरकशी व कुफ़्र को और बढ़ा देगा तुम काफ़िरों के गिरोह पर अफ़सोस न करना। [सूरा 5:68(अल-मैदा)]

(वह वक्त याद करो) जब ख़ुदा फरमाएगा कि ये मरियम के बेटे ईसा हमने जो एहसानात तुम पर और तुम्हारी माँ पर किये उन्हे याद करो जब हमने रूहुलक़ुदूस (जिबरील) से तुम्हारी ताईद की कि तुम झूले में (पड़े पड़े) और अधेड़ होकर (शक़ सा बातें) करने लगे और जब हमने तुम्हें लिखना और अक़ल व दानाई की बातें और (तौरेत व इन्जील (ये सब चीजे) सिखायी और जब तुम मेरे हुक्म से मिट्टी से चिड़िया की मूरत बनाते फिर उस पर कुछ दम कर देते तो वह मेरे हुक्म से (सचमुच) चिड़िया बन जाती थी और मेरे हुक्म से मादरज़ाद (पैदायशी) अंधे और कोढ़ी को अच्छा कर देते थे और जब तुम मेरे हुक्म से मुर्दों को ज़िन्दा (करके क़ब्रों से) निकाल खड़ा करते थे और जिस वक्त तुम बनी इसराईल के पास मौजिज़े लेकर आए और उस वक्त मैने उनको तुम (पर दस्त दराज़ी करने) से रोका तो उनमें से बाज़ कुफ्फ़ार कहने लगे ये तो बस खुला हुआ जादू है. [सूरा 5:110(अल-मैदा)]

इसमें तो शक़ ही नहीं कि ख़ुदा ने मोमिनीन से उनकी जानें और उनके माल इस बात पर ख़रीद लिए हैं कि (उनकी क़ीमत) उनके लिए बेहश्त है (इसी वजह से) ये लोग ख़ुदा की राह में लड़ते हैं तो (कुफ्फ़ार को) मारते हैं और ख़ुद (भी) मारे जाते हैं (ये) पक्का वायदा है (जिसका पूरा करना) ख़ुदा पर लाज़िम है और ऐसा पक्का है कि तौरैत और इन्जील और क़ुरान (सब) में (लिखा हुआ है) और अपने एहद का पूरा करने वाला ख़ुदा से बढ़कर कौन है तुम तो अपनी ख़रीद फरोख्त से जो तुमने ख़ुदा से की है खुशियाँ मनाओ यही तो बड़ी कामयाबी है. [सूरा 9:110(अत-तौबह)]

मोहम्मद ख़ुदा के रसूल हैं और जो लोग उनके साथ हैं काफ़िरों पर बड़े सख्त और आपस में बड़े रहम दिल हैं तू उनको देखेगा (कि ख़ुदा के सामने) झुके सर बसजूद हैं ख़ुदा के फज़ल और उसकी ख़ुशनूदी के ख्वास्तगार हैं कसरते सुजूद के असर से उनकी पेशानियों में घट्टे पड़े हुए हैं यही औसाफ़ उनके तौरेत में भी हैं और यही हालात इंजील में (भी मज़कूर) हैं गोया एक खेती है जिसने (पहले ज़मीन से) अपनी सूई निकाली फिर (अजज़ा ज़मीन को गेज़ा बनाकर) उसी सूई को मज़बूत किया तो वह मोटी हुई फिर अपनी जड़ पर सीधी खड़ी हो गयी और अपनी ताज़गी से किसानों को ख़ुश करने लगी और इतनी जल्दी तरक्क़ी इसलिए दी ताकि उनके ज़रिए काफ़िरों का जी जलाएँ जो लोग ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे ख़ुदा ने उनसे बख़्शिस और अज्रे अज़ीम का वायदा किया है. [सूरा 48:29(अल-फतह)]

जब आप कुरान शरीफ से इंजील शरीफ के सभी हवालों को एक साथ रखते हैं तो यहां क्या अलग बात दिखती है, यह कि ‘इंजिल’ कभी भी अकेली खड़ी नहीं होती है। हर वाकिया मे तौरेत(कानून की किताब) पहले मौजूद होती है। कानून या तौरेत पैगम्बर मूसा की किताबें हैं, जिन्हे आमतौर पर मुसलमानो के बीच ‘तौरेत’ और यहूदियों के बीच ‘तोरेह’ के नाम से जाना जाता है। इंजील शरीफ(खुश खबरी) सभी पाक किताबों में से बहुत ख़ास है, लेकिन  इसका जिक्र अकेले कभी नहीं किया जाता है। इसके बिपरित आप तौरेत और कुरान के हवाले पा सकते हैं जो कि अकेले खड़े है। यहां पर नीचे कुछ मिसाल दी गयी हैं –

फिर हमनें जो नेक़ी करें उस पर अपनी नेअमत पूरी करने के वास्ते मूसा को क़िताब (तौरौत) अता फरमाई और उसमें हर चीज़ की तफ़सील (बयान कर दी ) थी और (लोगों के लिए अज़सरतापा(सर से पैर तक)) हिदायत व रहमत है ताकि वह लोग अपनें परवरदिगार के सामने हाज़िर होने का यक़ीन करें। [(सूरा 6:154-155) अल अनाम]

तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते।[(सूरा -4:82) अन-निसा]

दूसरे अल्फाजो मै हम यह पाते है कि पाक क़ुरान मै जब भी इंजील का जिक्र होता है, तो हमेशा तौरेत के साथ और हमेशा तौरेत(कानून)  के बाद  इसका जिक्र होता है । यह बेमिसाल और गौर करने की बात है क्योकि क़ुरान शरीफ इंजील शरीफ का जिक्र करती है, दूसरी पाक किताबो का जिक्र करने के अलावा, और तौरेत का भी जिक्र करती है बिना किसी दूसरी पाक किताबो का जिक्र करने के अलावा। यह सोचने की बात है की क़ुरान शरीफ सिर्फ तौरेत और इंजील शरीफ का ही जिक्र क्यों करती है।.

पैग़म्बरों से हमारे लिए एक इसारा 

तो क्या यह नमूना ( तौरेत के बाद हमेशा ‘इंजील’ का हवाला आता है ) जरुरी है? कुछ इसे अचानक से घटी घटना के रूप मै या फ़िर कुछ लोग इसे एक साधारण तरीके से इंजील को पेस करने का रिवाज समझकर ख़ारिज कर देंगे। मैंने किताबों मै इस तरह के हवालों को बड़ी गंभीरता से लेना सीखा है। शायद यह अल्लाह की तरफ से एक उसूल को कायम करने और उसको कायम करने मै हमारी मदद करने के लिए हमारे लिए एक अहम संकेत है – की हम इंजील सरीफ को केवल तभी समझ सकते जब हम पहले तौरेत(कानून) सरीफ को पड़ेगे। तौरेत सरीफ एक सर्त है जिसे हमें इंजील सरीफ को समझने से पहले जानने की जरुरत है। यह बहुत कारगर हो सकता है यदि हम सबसे पहले तौरेत सरीफ को परखें, फिर देखें कि हम इंजील सरीफ को कैसे बेहतर तरीके से समझने के लिए हम इससे क्या सीख सकते हैं। क़ुरान सरीफ हमें बताती है कि सुरु के दौर के पैग़म्बरों की तरफ से यह  हमारे लिए एक संकेत है। गौर करें की निचे लिखीं आयते क्या कहती है –

ऐ औलादे आदम जब तुम में के (हमारे) पैग़म्बर तुम्हारे पास आए और तुमसे हमारे एहकाम बयान करे तो (उनकी इताअत करना क्योंकि जो शख्स परहेज़गारी और नेक काम करेगा तो ऐसे लोगों पर न तो (क़यामत में) कोई ख़ौफ़ होगा और न वह आर्ज़दा ख़ातिर (परेशान) होंगे।और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे सरताबी कर बैठे वह लोग जहन्नुमी हैं कि वह उसमें हमेशा रहेगें।[सूरा 7:35-36(अल-अराफ़)]

दूसरे लफ्जो मै कहें तो इन पैग़म्बरों के पास नबी आदम के बच्चों के लिए उनकी जिन्दगियो के लिए पैगाम और चिन्ह थे( और हम सभी नबी आदम के  बच्चे है)। जो कोई अकल्मन्द और सयाना है वह इन चिन्हो को समझने की कोशिश जरूर करेगा । तो आइये हम इंजील सरीफ को तौरेत सरीफ के द्वारा गौर से समझे, और पहले पैग़म्बरों को  सुरुआत से देखे कि उन्होंने हमें क्या चिन्ह दिए है जो हमें सीधे रास्ते को समझने मै मदद कर सकते है।.

हम सही समय मै नबी आदम के चिन्हो के साथ शुरुआत करते है। बेशक आप इस सवाल का जवाब देकर शुरू करना चाहेंगे कि क्या तौरत, ज़बुर और इंजील  सरीफ की किताबें बदल गई हैं। इस जरुरी सवाल के बारे में पाक कुरान क्या कहती है? और सुन्नत? और यह अच्छा होगा की क़यामत के रोज पर तौरेत शरीफ के बारे मै जानने के लिए समय निकलना अच्छा होगा, और यह सीधे रास्ते के लिए कैसे एक चिन्ह है।.