तौरात बरकतों और ला’नतों के साथ ख़त्म होता है

हम ने अपने आख़री बयान में मे’यारों को देखा जो अल्लाह ने दिए ताकि हम सच्चे नबियों को पेह चान सकें कि वह अपने पैग़ाम का हिस्सा बतोर मुस्तक़बिल की बाबत पेश्बिनी करे ।हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने खुद ही इस मेयार को बनी इस्राईल के मुस्तक़बिल की बाबत पेशबीनी करने के ज़रिये नाफ़िज़ किया । उन में से सारी सच साबित हुईं यह साबित करने के लिए कि यह पैग़ाम अल्लाह कि तरफ़ से थीं । यह पेश बीनियाँ बनी इस्राईल पर ला’नतों और बरकतों बतोर उनपर ज़ाहिर होते रहे । यहां पर आप इन बरकतों और लानतों को पढ़ सकते हैं । इन की ख़ास सुर्ख़ियाँ ज़ेल में दी गई हैं –

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बरकतें

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) उन अजीब ओ ग़रीब बरकतों का बयान करते हुए शुरू करते हैं जिन को बनी इस्राईल इस शर्त पर हासिल करेंगे अगर वह अल्लाह के अहकाम पर चलेंगे । अगर बनी इसराईल अल्लाह के हुक्मों पर चल कर कामयाब होते हैं तो यह ग़ैर क़ौमों के लिए भी एक मिसाल बतोर साबित होंगे ताकि वह इन बरकतों को पेहचान सकें जिसतरह लिखा है :

  10 तब पृथ्वी के सभी लोग देखेंगे कि तुम यहोवा के नाम से जाने जाते हो और वे तुमसे भयभीत होंगे।

इस्तिसना 28:10

किसी तरह अगर वह अल्लाह के अहकाम मानने में न काम हो जाते हैं तो बनी इस्राईल लानत के हक़दार होंगे जो बरकत का बिलकुल उल्टा है । यह लानतें मुक़ाबला करेंगी और बरकतें आइना दिखाएंगी । इन लानतों को चारों तरफ़ की ग़ैर क़ौमों में भी देखी जाएंगी –

  37 जिन देशों में यहोवा तुम्हें भेजेगा उन देशों के लोग तुम लोगों पर आई विपत्तियों को सुनकर स्तब्ध रह जाएंगे। वे तुम्हारी हँसी उड़ायेंगे और तुम्हारी निन्दा करेंगे।

इस्तिसना 28:37

और यह लानतें बनी इस्राईल के खुद के लिए होंगे –

46 ये अभिशाप लोगों को बताएंगे कि परमेश्वर ने तुम्हारे वंशजों के साथ सदैव न्याय किया है। ये अभिशाप संकेत और चेतावनी के रूप में तुम्हें और तुम्हारे वंशजों को हमेशा याद रहेंगे।

इस्तिसना 28:46

और अल्लाह ने उनको ख़बरदार किया था कि लानतों का सब से बदतरीन हिस्सा दीगर क़ौमों (ग़ैर क़ौमों) कि तरफ़ से आएँगी –

49 “यहोवा तुम्हारे विरुद्ध बहुत दूर से एक राष्ट्र को लाएगा। यह राष्ट्र पृथ्वी की दूसरी ओर से आएगा। यह राष्ट्र तुम्हारे ऊपर आकाश से उतरते उकाब की तरह शीघ्रता से आक्रमण करेगा। तुम इस राष्ट्र की भाषा नहीं समझोगे। 50 इस राष्ट्र के लोगों के चेहरे कठोर होंगे। वे बूढ़े लोगों की भी परवाह नहीं करेंगे। वे छोटे बच्चों पर भी दयालु नहीं होंगे। 51 वे तुम्हारे मवेशियों के बछड़े और तुम्हारी भूमि की फसल तब तक खायेंगे जब तक तुम नष्ट नहीं हो जाओगे। वे तुम्हारे लिये अन्न, नयी दाखमधु, तेल तुम्हारे मवेशियों के बछड़े अथवा तुम्हारे रेवड़ों के मेमने नहीं छोड़ेंगे। वे यह तब तक करते रहेंगे जब तक तुम नष्ट नहीं हो जाओगे।

52 “यह राष्ट्र तुम्हारे सभी नगरों को घेर लेगा। तुम अपने नगरों के चारों ओर ऊँची और दृढ़ दीवारों पर भरोसा रखते हो। किन्तु तुम्हारे देश में ये दीवारें सर्वत्र गिर जाएंगी। हाँ, वह राष्ट्र तुम्हारे उस देश के सभी नगरों पर आक्रमण करेगा जिसे यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें दे रहा है।

इस्तिसना 28:49-52

और यह बद से बदतर की तरफ़ जाएगा –

63 “पहले यहोवा तुम्हारी भलाई करने और तुम्हारे राष्ट्र को बढ़ाने में प्रसन्न था। उसी तरह यहोवा तुम्हें नष्ट और बरबाद करने में प्रसन्न होगा। तुम उस देश से बाहर ले जाए जाओगे जिसे तुम अपना बनाने के लिये उसमें प्रवेश कर रहे हो। 64 यहोवा तुम्हें पृथ्वी के एक छोर से दूसरी छोर तक संसार के सभी लोगों मे बिखेर देगा। वहाँ तुम दूसरे लकड़ी और पत्थर के देवताओं को पूजोगे जिन्हें तुमने या तुम्हारे पूर्वजों ने कभी नहीं पूजा।

65 “तुम्हें इन राष्ट्रों के बीच तनिक भी शान्ति नहीं मिलेगी। तुम्हें आराम की कोई जगह नहीं मिलेगी। यहोवा तुम्हारे मस्तिष्क को चिन्ताओं से भर देगा। तुम्हारी आँखें पथरा जाएंगी। तुम अपने को ऊखड़ा हुआ अनुभव करोगे।

इस्तिसना 28 : 63-65

और यह बरकतें और लानतें एक अहद के ज़रिये क़ायम की गई थीं । (एक मुआहदा)

12 तुम सभी यहाँ यहोवा अपने परमेश्वर के साथ एक वाचा करने वाले हो। यहोवा तुम लोगों के साथ यह वाचा आज कर रहा है। 13 इस वाचा द्वारा यहोवा तुम्हें अपने विशेष लोग बना रहा है और वह स्वंय तुम्हारा परमेश्वर होगा। उसने यह तुमसे कहा है। उसने तुम्हारे पूर्वजों इब्राहीम, इसहाक और याकूब को यह वचन दिया था। 14 यहोवा अपना वचन देकर केवल तुम लोगों के साथ ही वाचा नहीं कर रहा है। 15 वह यह वाचा हम सभी के साथ कर रहा है जो यहाँ आज यहोवा अपने परमेश्वर के सामने खड़े हैं। किन्तु यह वाचा हमारे उन वंशजों के लिये भी है जो यहाँ आज हम लोगों के साथ नहीं हैं। ()

इस्तिसना 29 :12-15

दुसरे लफ़्ज़ों में  यह अहद बनी इस्राईल की औलाद (नसल) से बंधा रहा होगा या मुताक्बिल की नस्लों के साथ । दर असल यह अहद मुस्तक़बिल की नसल की तरफ़ ही इशारा करती थीं –  बनी इस्राईल और ग़ैर क़ौमों की तरफ़ –

21 यहोवा उस व्यक्ति को क्षमा नहीं करेगा। नहीं, यहोवा उस व्यक्ति पर क्रोधित होगा और बौखला उठेगा। इस पुस्तक में लिखे सभी अभिशाप उस पर पड़ेंगे। यहोवा उसे इस्रएल के सभी परिवार समूहों से निकाल बाहर करेगा। यहोवा उसको पूरी तरह नष्ट करेगा। सभी आपत्तियाँ जो इस पुस्तक में लिखी गई हैं, उस पर आयेंगी। वे सभी बातें उस वाचा का अंश हैं जो व्यवस्था की पुस्तक में लिखी गई हैं।

22 “भविष्य में, तुम्हारे वंशज और बहुत दूर के देशों से आने वाले विदेशी लोग देखेंगे कि देश कैसे बरबाद हो गया है। वे उन लोगों को देखेंगे जिन्हें यहोवा उनमें लायेगा। 23 सारा देश जलते गन्धक और नमक से ढका हुआ बेकार हो जाएगा। भूमि में कुछ भी बोया हुआ नहीं रहेगा। कुछ भी, यहाँ तक कि खर—पतवार भी यहाँ नहीं उगेंगे। यह देश उन नगरों—सदोम, अमोरा, अदमा और सबोयीम, की तरह नष्ट कर दिया जाएगा। जिन्हें यहोवा, ने तब नष्ट किया था जब वह बहुत क्रोधित था।

24 “सभी दूसरे राष्ट्र पूछेंगे, ‘यहोवा ने इस देश के साथ ऐसा क्यों किया? वह इतना क्रोधित क्यों हुआ?’ 25 उत्तर होगा: ‘यहोवा इसलिए क्रोधित हुआ कि इस्राएल के लोगों ने यहोवा, अपने पूर्वजों के परमेश्वर की वाचा तोड़ी। उन्होंने उस वाचा का पालन करना बन्द कर दिया जिसे योहवा ने उनके साथ तब किया था जब वह उन्हें मिस्र देश से बाहर लाया था। 26 इस्राएल के लोगों ने ऐसे अन्य देवाताओं की सेवा करनी आरम्भ की जिनकी पूजा का ज्ञान उन्हें पहले कभी नहीं था। यहोवा ने अपने लोगों से उन देवताओं की पूजा करना मना किया था। 27 यही कारण है कि यहोवा इस देश के लोगों के विरुद्ध बहुत क्रोधित हो गया। इसलिए उसने इस पुस्तक में लिखे गए सभी अभिशापों को इन पर लागू किया।

इस्तिसना 29 :21-27

क्या हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बरकतें और लानतें बनी इस्राईल पर वाक़े हुईं ?

बनी इस्राईल के लिए जिन बरकतों का वायदा किया गया था वह बहुत ही अजीब ओ ग़रीब थे , मगर जो ला’नतें उन पर नाफ़िज़ की गई थीं वह बहुत संजीदा थे: किसी तरह जो अहम् सवाल हम पूछ सकते हैं वह यह है कि “क्या यह चीज़ें वाक़े हुईं थीं” ? इस का जवाब देते हुए हम देखेंगे कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) हर सूरत में एक सच्चे नबी थे और आज भी हम अपनी जिंदगियों के लिए उनकी रहनुमाई हासिल करते रहेंगे –

इस का जवाब हमारी अपनी गिरफ़त में है । पुराने अहद्नामे की ज़ियादा तर किताबें बनी इस्राईल की तारीख़ की दास्तां पेश करती हैं जो हम देख सकते हैं कि इस में क्या कुछ ज़िक्र पाया जाता है । पुराने अहद नामे के अलावा भी कुछ बाहिरी तारीख़ी क़लम्बंद जो यहूदी तारीख़दानों जैसे जोसफ़स, यूनानी रोमी तारीख़दान जैसे टेसिटस और इन के अलावा हम ने कई एक आसारे क़दीमा से मुताल्लिक़ दस्तावेज़ देखे हैं । यह तमाम ज़राए इस बात से राज़ी हैं और बनी इस्राईल की तारीख़ की तस्वीर कशी करते हैं । यह हमारे लिए एक दूसरा निशान है । यहां बनी इस्राईल की तारीख का पस मंज़र वक़्त की लकीर (टाइम लाइन) के साथ तस्वीर कशी की गई है । बेहतर तरीक़े से देखने में मदद करने के लिए कि उनकी तारीख़ में क्या हुआ –

इस तारीख़ में हम क्या देखते हैं ? जी हाँ । हक़ीक़त में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की लानतें बहुत ही हौलनाक थीं जो उन पर वाक़े हुईं –  और हूबहू वैसे ही जैसे उन्हों ने हज़ारों साल पहले लिखा था । यहाँ हम आप को याद दिलाना चाहते हैं कि यह पेशीन गोइयाँ वाक़े होने बाद नहीं बल्कि वाक़े होने पहले लिखे गए थे –

मगर हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की ला’नतें वहीँ तक ख़तम नहीं हुईं बल्कि वह जारी रहीं ।यहाँ ज़ेल के हवाले में वह बात लिखी है कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने किस अंदाज़ में इन लानतों को अंजाम तक पहुंचाया (ख़त्म किया)।

  “जो मैंने कहा है वह तुम पर घटित होगा। तुम आशीर्वाद से अच्छी चीजें पाओगे और अभिशाप से बुरी चीज़ें पाओगे। यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें दूसरे राष्ट्रों में भेजेगा। तब तुम इनके बारे में सोचोगे। उस समय तुम और तुम्हारे वंशज यहोवा, अपने परमेश्वर के पास लौटेंगे। तुम पूरे हृदय और आत्मा से उन आदेशों का पालन करोगे जो आज हम ने दिये हैं उनका पूरा पालन करोगे। तब यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम पर दयालु होगा। यहोवा तुम्हें फिर स्वतन्त्र करेगा। वह उन राष्ट्रों से तुम्हें लौटाएगा जहाँ उसने तुम्हें भेजा था। चाहे तुम पृथ्वी के दूरतम स्थान पर भेज दिये गये हो, यहोवा, तुम्हारा परमेश्वर तुमको इकट्ठा करेगा और तुम्हें वहाँ से वापस लाएगा। यहोवा तुम्हें उस देश में लाएगा जो तुम्हारे पूर्वजों का था और वह देश तुम्हारा होगा। यहोवा तुम्हारा भला करेगा और तुम्हारे पास उससे अधिक होगा, जितना तुम्हारे पूर्वजों के पास था और तुम्हारे राष्ट्र में उससे अधिक लोग होंगे जितने उनके पास कभी थे।

इस्तिसना 30:1-5

एक ज़रूरी सवाल फिर से पूछने के लिए यह है कि : क्या यह यूँ ही वाक़े हुई थीं ? उनकी तारीख़ के सिलसिले को जान्ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तारेत का इख़तिताम – ज़बूर को अमल में लाया जाना

इन सारी बरकतों और ला’नतों के साथ तौरेत इख़तिताम तक पहुचता है । तौरेत की तसनीफ़ के कुछ ही अरसे बाद हज़रत मूसा की मौत हो जाती है फिर बनी इस्राईल हज़रत मूसा के जानिशीन – यशौ – के मातहत में वायदा किया हुआ  मुल्क में दाख़िल होते हैं । जिस तरह से बनी इसराईल की तारीख़ में समझाया गया है बनी इसराईल वहां पर बग़ैर एक बादशाह और पाए तख़्त शहर के रह रहे थे जब तक कि बादशाह ।ए। अज़ीम दाऊद की हुकूमत का आग़ाज़ न हुआ उसने पुराने अहद नामे का एक नया बाब शुरू किया जिसको क़ुरान शरीफ़ ज़बूर के नाम से पुकारता है । हमें ज़बूरों को समझने की ज़रुरत है क्यूंकि यह उन निशानों को जारी रखती है जो तौरेत में शुरू हुई थी । और यह हमें इंजील को भी समझने में मदद करेगी – इसके बाद हम देखते हैं कि कुरान शरीफ़ और ईसा अल मसीह हज़रत दाऊद (अलै.) और ज़बूर की बाबत बताते हैं ।                       

तौरात के नबी की निशानी

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) ने 40 साल तक बनी इस्राईल की रहनुमाई की ।  उन्हों ने अहकाम लिखे और क़ुर्बानियां अंजाम दीं । और भी बहुत से मोजिज़े अंजाम दिए जिन नका तौरेत में ज़िक्र पाया जाता है । बहुर जल्द इन दो नबियों के मरने का वक़्त आजाता है ।  आइये हम तौरेत से उन नमूनों की नज़रे सानी करें इस से पहले कि हा तौरात के बयान को ख़तम करें ।

तौरेत के नमूनों की नज़रे सानी करना

तो फिर तौरेत में निशानों के नमूने क्या हैं ?

तौरेत में क़ुर्बानी 

अहमियत पर गौर करें और देखें कि किसतरह कुर्बानियां मुतवातिर वाक़े होती रहीं यह इस में पेश की गई हैं । ज़ेल की बातों पर सोचें जिन पर हम गौर कर चुके हैं :

     °  हाबील ने एक उम्दा क़ुरबानी दी जबकि क़ाबील ने फल तरकारियों का हदिया पेश किया ।  काबील का हदिया              

       क़बूल नहीं किया गया क्यूंकि मौत की ज़रुरत थी ।

     °  सैलाब के बाद हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने कुछ जानवरों की क़ुर्बानी दी ।

     °  हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने वायदा किया हुआ मुल्क में पहुँचने के बाद एक क़ुरबानी पेश की ।    

     °  हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने बेटे की क़ुर्बानी के इम्तिहान के बाद मेंढे की क़ुर्बानी दी और इसी

       क़ुर्बानी के फ़ौरन बाद हज़रत इब्राहीम ने एलान किया कि उसी मक़ाम पर मुस्तक़बिल में एक और क़ुर्बानी का

       इंतज़ाम किया जाएगा ।

    °  तमाम बनी इस्राईल के घाराने ने फ़सह की क़ुरबानी अदा की । इस क़ुरबानी ने उनको मौत से बचाया और यहूदी

       क़ौम आज भी इस फ़सह को हर साल उसी दिन मानते हैं ।

    °  हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) अपने लिए क़ुरबानी पेश करने के बाद बनी इस्राईल के लिए भी हर साल दो बकरों   

       की क़ुर्बानी अदा की ।

    °  एक बछिया क़ुर्बान किया गया ताकि उसका राख एक मुर्दा लाश को छूने से अगर कोई नापाक हो जाए तो राख

       मिली हुई पानी से वज़ू करने से पाक होजाए ।  

यह सारी कुर्बानियां पाक जानवरों के साथ की जाती थीं ।  चाहे वह भेड़ें, बकरियां या बैलें हों ।  बछिया को छोड़ वह सारे जानवर नर होते थे ।

यह क़ुर्बानियां कफ़फ़ारा थे उन लोगों के लिए जो क़ुरबानी पेश करते थे ।  इस का मतलब यह है कि वह सब एक पर्शिश थे इस से लोगों की शर्मिंदगी को क़ुर्बानी के ज़रिये ढंका गया ।  यह ढांके जाने का काम दुनया के पहले इंसान आदम के गुनाह से ही शुरू किया गया था जिस ने अल्लाह का रहम – ओ – करम जानवर के चमड़े की शक्ल में हासिल किया इन चमड़ों को हासिल करने के लिए एक जानवर के मौत की ज़रुरत थी जिस से कि उनकी शर्मिंदगी ढंक सकती थी एक अहम् सवाल पूछने के लिए यह है कि : क्यूँ यह क़ुरर्बानियां एक ज़माने के बाद नहीं देनी पड़ीं या पेश नकारने की ज़रुरत नहीं थी ? इस का जवाब हम बाद में देखेंगे ।

तौरात में रास्त्बाज़ी

लफ्ज़ ‘रास्तबाज़ी’ कलाम में शुरू से आखिर तक बराबर ज़ाहिर होता रहा है ।  हम ने इसको सब से पहले आदम के साथ देखा जब अल्लाह ने उससे कहा कि रास्त्बाज़ी का लिबास बेहतरीन है ।  हम ने पैदाइश में देखा कि हज़रत ए इब्राहीम के हक़ में रास्तबाज़ी गिना गया क्यूंकि वह ख़ुदा पर ईमान लाया था कि उसको एक बेटा इनायत होगा । बनी इस्राईल भी अगर वह अहकाम के पाबन्द होते तो रास्त्बाज़ी के हक़दार होते …  मगर वह नहीं हुए क्यूंकि वह पूरी तरह – से पाबन्द नहीं हुए थे ।

तौरात में ख़ुदा का इंसाफ़

हम ने यह भी देखा कि अहकाम के न मानने का नतीजा बतोर बनी इस्राईल को अल्लाह की जानिब से फ़ैसले का एलान हुआ ।  यह तो आदम से ही शुरू हो चुका था जो कोई नाफ़रमानी करे वह इंसाफ़ के मातहत है ।  अल्लाह का इंसाफ़ हमेशा मौत के अंजाम को पहुंचाता है ।  इंसाफ़ के अंजाम बतोर मौत कि सज़ा या तो इंसान पर या क़ुर्बान होने वाले जानवर पर होती थी ।  ज़ेल कि बातों पर सोचिये :

   °  हज़रत आदम के साथ जो जानवर चमड़े कि ख़ातिर क़ुरबान हुआ था उसकी मौत हुई थी ।

   °  हज़रत हाबील के साथ जिस जानवर की क़ुरबानी को क़बूल किया गया उसकी मौत हुई थी ।

   °  हज़रत नूह के साथ सैलाब में बे शुमार लोग हलाक हुए थे ।  फिर भी हज़रत नूह ने सैलाब के बाद कुछ जानवरों

      की क़ुर्बानी दी तब भी उनकी मौत हुई ।

   °  लूत के जमाने में अल्लाह का इंसाफ़ बुरे लोगों पर हुआ और सदोम और अमोरा के लोग मारे गए थे जिन में

      लूट की बीवी भी शामिल थी ।

   °  इब्राहीम के बेटे की क़ुरबानी के साथ उसके बेटे को मरना था मगर उस के बदले में एक मेंढे की मौत हुई ।

   °  फ़सह के साथ या तो (फ़िरोन या दीगर ग़ैर ईमानदारों के) पह्लोठे मरे या तो वह बररे जिन के खून को हर एक

      बनी इस्राईल के घरों के चौखट पर लगाया गया था ,उनकी मौत हुई ।

  °   शरीअत के अहकाम के साथ या तो गुनाहगार शख्स की मौत हुई या फिर कफ़फ़ारे के दिन एक बकरे की मौत हुई ।

इसका क्या मतलब है ? आगे चल कर इस पर हम गौर करेंगे मगर अभी आप देखें कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और हज़रत हारुन (अलैहिस्सलाम) तौरात को ख़तम करने पर हैं ।  मगर वह अल्लाह से बराहे रास्त दो ख़ास पैग़ाम हासिल करने के बाद ऐसा करते हैं ।  वह दोनों पैग़ाम मुस्तक़बिल के लिए तवक़क़ो की जाती हैं और आज के लिए बहुत ज़रूरी हैं ।  और आने वाली लानतों और बरकतों की बाबत था । यहाँ हम उस आने वाले नबी की बाबत देखते हैं ।

आने वाला नबी

जब अल्लाह ने सीना पहाड़ पर दस अहकाम की लोहें दीं तब उसने बड़े हौलनाक तरीक़े से अपनी ताक़त और क़ुदरत का इज़हार किया ।  इन लोहों के दिए जाने से पहले के नज़ज़ारे की बाबत तौरेत इस तरह बयान करती है :

16 तीसरे दिन पर्वत पर बिजली की चमक और मेघ की गरज हुई। एक घना बादल पर्वत पर उतरा और तुरही की तेज ध्वनि हुई। डेरे के सभी लोग डर गए। 17 तब मूसा लोगों को पर्वत की तलहटी पर परमेश्वर से मिलने के लिए डेरे के बाहर ले गया। 18 सीनै पर्वत धुएँ से ढका था। पर्वत से धुआँ इस प्रकार उठा जैसे किसी भट्टी से उठता है। यह इसलिए हुआ कि यहोवा आग में पर्वत पर उतरे और साथ ही सारा पर्वत भी काँपने लगा।

ख़ुरुज 19 :16 – 18

बनी इस्राईल खौफ़ के मारे कांप रहे थे …  तौरात इन को इस तरह बयान करती है :

18 घाटी में लोगों ने इस पूरे समय गर्जन सुनी और पर्वत पर बिजली की चमक देखी। उन्होंने तुरही की ध्वनि सुनी और पर्वत से उठते धूएँ को देखा। लोग डरे और भय से काँप उठे। वे पर्वत से दूर खड़े रहे और देखते रहे। 19 तब लोगों ने मूसा से कहा, “यदि तुम हम लोगों से कुछ कहना चाहोगे तो हम लोग सुनेंगे। किन्तु परमेश्वर को हम लोगों से बात न करने दो। यदि यह होगा तो हम लोग मर जाएंगे।”

ख़ुरूज 20 :18-19

यह हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) बनी इस्राईल क़ौम कि रहनुमाई के 40 साल के दौरान के शुरू में वाक़े हुआ ।  आखिर में अल्लाह ने हज़रत मूसा से गुज़रे हुए हालात की बाबत बात की । उन्हें उन लोगों कि याद दिलाते हुए जब लोग डरे हुए थे ।  और उन के मुस्तक़बिल के एक वायदा करते हुए हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) तौरात में इस तरह क़लम्बन्द करते हैं :  

15 यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे पास अपना नबी भेजेगा। यह नबी तुम्हारे अपने ही लोगों में से आएगा। वह मेरी तरह ही होगा। तुम्हें इस नबी की बात माननी चाहिए। 16 यहोवा तुम्हारे पास इस नबी को भेजेगा क्योंकि तुमने ऐसा करने के लिए उससे कहा है। उस समय जब तुम होरेब (सीनै) पर्वत के चारों ओर इकट्ठे हुए थे, तुम यहोवा की आवाज और पहाड़ पर भीषण आग को देखकर भयभीत थे। इसलिए तुमने कहा था, हम लोग यहोवा अपने परमेश्वर की आवाज फिर न सुनें। ‘हम लोग उस भीषण आग को फिर न देखें। हम मर जाएंगे!’17 “यहोवा ने मुझसे कहा, ‘वे जो चाहते हैं, वह ठीक है। 18 मैं तुम्हारी तरह का एक नबी उनके लिए भेज दूँगा। यह नबी उन्हीं लोगों में से कोई एक होगा। मैं उसे वह सब बताऊँगा जो उसे कहना होगा और वह लोगों से वही कहेगा जो मेरा आदेश होगा। 19 यह नबी मेरे नाम पर बोलेगा और जब वह कुछ कहेगा तब यदि कोई व्यक्ति मेरे आदेशों को सुनने से इन्कार करेगा तो मैं उस व्यक्ति को दण्ड दूँगा।’झूठे नबियों को कैसे जाना जाये

20 “किन्तु कोई नबी कुछ ऐसा कह सकता है जिसे करने के लिए मैंने उसे नहीं कहा है और वह लोगों से कह सकता है कि वह मेरे स्थान पर बोल रहा है। यदि ऐसा होता है तो उस नबी को मार डालना चाहिए या कोई ऐसा नबी हो सकता है जो दूसरे देवताओं के नाम पर बोलता है। उस नबी को भी मार डालना चाहिए। 21 तुम सोच सकते हो, ‘हम कैसे जान सकते हैं कि नबी का कथन, यहोवा का नहीं है?’ 22 यदि कोई नबी कहता है कि वह यहोवा की ओर से कुछ कह रहा है, किन्तु उसका कथन सत्य घटित नहीं होता, तो तुम्हें जान लेना चाहिए कि यहोवा ने वैसा नहीं कहा। तुम समझ जाओगे कि यह नबी अपने ही विचार प्रकट कर रहा था। तुम्हें उससे डरने की आवश्यकता नहीं।

ख़ुरुज 18 :15- 22

अल्लाह लोगों से चाहता था कि वह उसकी इज़्ज़त करें क्यूंकि उसने उन्हें दस अहकाम दिए थे । एक यादगारी के तोर पर उन्हें पत्थर की लोहों पर अपने मुबारक हाथों से लिखे थे ।  उसने इस तरह इसलिए किया कि उसका खौफ़ उनके बीच में बना रहे ।  मगर अब अल्लाह ज़माना ए मुस्तकबिल की तरफ़ देख रहा था ।  और वह वायदा करता है कि वह वक़्त आएगा जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) कि तरह ही एक आर नबी बनी इस्राईल के बीच में से रुनुमा होगा । इस के लिए दो रहनुमाई के जुमले दिए गए हैं :

1. पहला यह कि अल्लाह उन्हें खुद ही ज़िम्मेवार ठहराएगा अगर वह आने वाले नबी की बाबत धियान नहीं देंगे ।

2. दूसरा यह फ़ैसला करना है कि एक पैग़ाम के ज़रिये जब मुस्तकबिल की पेशबीनी होगी और उस का सच होना बिलकुल ज़रूरी है ।

पहला रहनुमाई के जुमले का मतलब हरगिज़ यह नहीं कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के बाद सिरफ़ एक और नबी होगा ।  मगर एक जो आ रहा है जो ख़ास है उसकी सुन्नी पड़ेगी क्यूंकि इस (पेशबीनी) पैग़ाम के साथ उसकी एक बे मिसल अदाकारी है … ।  वह होंगे ‘मेरे कलाम’ ।  जबकि सिर्फ़ अल्लाह ही मुस्तक़बिल की सारी बातें जानता है और यक़ीनन कोई और शख्स नहीं जानता ।  दूसरा रहनुमाई के जुमले का मतलब लोगों के लिए जान्ने का एक तरीक़ा था कि आया कि वह पैग़ाम अल्लाह कि तरफ़ से है कि नहीं ।  इस दुसरे पैग़ाम में हम देखते हैं कि किसतरह हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने इस दूसरी रहनुमाई की पेशबीनी को बनी इस्राईल के मुस्तक़बिल के लिए बनी इस्राईल की बरकतों और लानतों का बयान करते हुए किया ।  और इन्हीं बातों से तौरेत इन्तिहाई कमाल को पहुँचती है ।  (ख़तम होती है) ।

मगर इस आने वाले नबी की बाबत क्या कहा जाए ? कौन था वह नबी ? कुछ उलमा’ ने तसव्वुर किया कि वह आने वाला नबी हज़रत मोहम्मद (सल्लम) थे ।  मगर नबुवत पर गौर करें जो यह बयान करता है कि यह नबी “हम रुतबा इस्राईलियों के बीच में रुनुमा होगा । “ इस तरह यह इशारा उसके यहूदी होने की तरफ़ जाता है ।  इसलिए यह हज़रत मोहम्मद (सल्लम) नहीं हो सकते ।  दीगर उलमा’ इस बात से मुता’ज्जुब हैं कि यह पेशबीनी हज़रत ईसा अल मसीह पर कैसे नाफ़िज़ होता है ।  जबकि वह यहूदी थे और उन्होंने बड़े इख्तियार के साथ सिखाया कि हज़रत मसीह की ज़ुबाने मुबारक पर अल्लाह का कलाम था ।  इसी लिए उनको कलिमतुललाह के नाम से भी जाना गया है ।  हज़रत ईसा अल मसीह की आमद को हज़रत इबराहीम की क़ुर्बानी के पहले से देखा गया था ।  और आखिर में इस नबी के आने की नबुवत में देखा गया कि ख़ुदा का कलाम उन के मुंह में होगा ।   

हारुन का निशान : 1 गाय 2 बकरियां

हम ने मूसा के निशान 2 में देखा था कि जो अहकाम सीना पहाड़ पर दिए गए थे वह बहुत सख्त थे ।  मैं ने आपको दावत दी थी कि आप खुद से सवाल करें ।  क्यूंकि यह अहकाम का मामला है कि आप हमेशा अहकाम की पाबन्दी करते हैं कि नहीं ।  अगर आप हमेशा अहकाम की पाबंदी करते हैं तो आप और मैं संजीदा तोर से मुसीबत में हैं मतलब यह कि आप इंसाफ़ की पकड़ में हैं (शिकनजे में हैं)। अगर ऐसी बात है तो क्या किया जा सकता है ? (हारुन मूसा का बड़ा भाई था)। और उसकी औलाद ने भी कुर्बानगाह की ख़िदमत पर सवालिया निशान खड़े किये थे । और यह कुर्बानियां कफ्फारा बतोर थीं या गुनाह ढांके जाने बतोर थे ।  हारून दो तरह की क़ुर्बानी गुज़रानता था । वह इस बात को समझने के निशान थे कि किस तरह अल्लाह उन गुनाहों को ढँक देगा जब कोई शख्स अहकाम को तोड़ेगा ।  यह एक बछड़े और दो बकरियों की क़ुर्बानी थी ।  हारुन के गाय की क़ुरबानी को अंजाम देने की बाबत ही कुरान शरीफ़ के दुसरे सूरा का नाम सूरा अल ।  बक़रा रखा गया है ।  मगर आइये हम बकरियों से शुरू करते हैं।

(क़ुर्बानी) नज़र का बकरा और कफ़फ़ारे का दिन 

हज़रत मूसा के निशान 1 से फ़सह की बाबत जो हम ने देखा था वह आज भी फ़िरोन से छुटकारे की याद में यहूदी लोगों के ज़रिये मनाया जाता है ।  मगर तौरेत ने इस के साथ ही दीगर ईदों को भी मनाने का हुकम दिया । उन में से जो ख़ासुल ख़ास था वह था कफ़फ़ारे का दिन ।  तौरात में इस पूरे बयान को पढने के लिए यहाँ पर किलिक करें ताकि इस पूरी इबारत को पढ़ सकें ।

इसे क्यूँ बड़ी होशियारी से तफ़सील के साथ कफ़फ़ारे के दिन के लिए हिदायत दी गई थी ? हम देखते हैं कि यह किसतरह शुरू होता है :

   हारून के दो पुत्र यहोवा को सुगन्ध भेंट चढ़ाते समय मर गए थे। फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपने भाई हारून से बात करो कि वह जब चाहे तब पर्दे के पीछे महापवित्र स्थान में नहीं जा सकता है। उस पर्दे के पीछे जो कमरा है उसमें पवित्र सन्दूक रखा है। उस पवित्र सन्दूक के ऊपर उसका विशेष ढक्कन लगा है। उस विशेष ढक्कन के ऊपर एक बादल में मैं प्रकट होता हूँ। यदि हारून उस कमरे में जाता है तो वह मर जायेगा!

अह्बार 16:1-2

इस से पहले क्या वाक़िया पेश आया था जब हारून के दोनों बेटे एक साथ मर गए थे ।  जब वह बे धड़क पाक्त्रीन मुक़ाम में दाखिल हो गए थे जहां खुदावंद की हुज़ूरी सुकूनत करती थी ।  मगर (जैसे हम यहाँ देखते हैं कि) पूरी तरह से हुक्म की पाबन्दी न करने के अंजाम बतोर उन पर मौत वाक़े हुई ।  क्यूँ ? इसलिए कि उस पाक तरीन मुक़ाम में (ताबूत) यानी अहद का संदूक रखा गया था जो ख़ुदा की पाक हुज़ूरी की निशानी थी ।  कुरान शरीफ़ भी इस अहद के संदूक का ज़िक्र करता है ।  वह कहता है :

 और उन के नबी ने उनसे ये भी कहा इस के (मुनाजानिब अल्लाह) बादशाह होने की ये पहचान है कि तुम्हारे पास वह सन्दूक़ आ जाएगा जिसमें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तसकीन दे चीजें और उन तब्बुरक़ात से बचा खुचा होगा जो मूसा और हारुन की औलाद यादगार छोड़ गयी है और उस सन्दूक को फरिश्ते उठाए होगें अगर तुम ईमान रखते हो तो बेशक उसमें तुम्हारे वास्ते पूरी निशानी है

सूरा 2:248अल – बक़रा

जिसतरह यह सूरा कहता है यह ‘अहद का संदूक’ जिसको शहादत का संदूक भी कहा जाता है य्हिख्त्यार का निशान  था ।  क्यूंकि यह संदूक मूसा की शरीअत के अहद का निशान था ।  इस संदूक के अन्दर शरीअत के दस अहकाम की पत्थर की लोहें रखी हुई थी । इस अहद के संदूक की हुज़ूरी में जो भी कोई अहकाम को तोड़ता था वह मर जाता था । हारुन के बेटे बेधड़क पाक्त्रीन मक़ाम में घुस आए थे इस लिए वह मर गए थे । इस लिए एहतियात के साथ हिदायत दी गई थी जिस में यह भी शामिल था कि हारुन साल में एक मर्तबा बैलों और बकरियों का खून लेकर दाखिल होता था । इसी दिन को कफ़फ़ारे का दिन कहा जाता था ।  हारुन या और कोई सरदार काहिन को उस दिन के अलावा किसी दुसरे दिन उस पाक तरीन मकाम में दाखिल होने की इजाज़त नहीं थी ।  ऐसा करने पर उस के लिए मौत ठहराई गई थी ।  मगर कफ़फ़ारे के एक दिन पहले हारून अहद के संदूक के सामने हाजिर हो सकता था ताकि क़ुर्बानी की रसम को अंजाम दे ।  देखें

 

तब हारून बैल की पापबलि चढ़ाएगा। यह पापबलि उसके अपने लिए और उसेक परिवार के लिए है। तब हारून वह उपासना करेगा जिसमें वह और उसका परिवार शुद्ध होंगे।“इसके बाद हारून दो बकरे लेगा और मिलापवाले तमबू के द्वार पर यहोवा के सामने लाएगा। हारून दोनों बकरों के लिए चिट्ठी डालेगा। एक चिट्ठी यहोवा के लिए होगी। दूसरी चिट्ठी अजाजेल के लिए होगी।“तब हारून चिट्ठी डालकर यहोवा के लिए चुने गए बकरे की भेंट चढ़ाएगा। हारून को इस बकरे को पापबलि के लिये चढ़ाना चाहिए। 10 किन्तु चिट्ठी डालकर अजाजेल के लिए चुना गया बकरा यहोवा के सामने जीवित लाया जाना चाहिए। याजक उसे शुद्ध बनाने के लिये उपासना करेगा। तब यह बकरा मरुभूमि में अजाजेल के पास भेजा जाएगा।11 “तब हारून अपने लिये बैल को पापबलि के रूप में चढ़ाएगा। हारून अपने आप को और अपने परिवार को शुद्ध करेगा। हारुन बैल को अपने लिए पापबलि के रूप में मारेगा। 12 तब उसे आग के लिए एक तसला वेदी के अंगारों से भरा हुआ यहोवा के सामने लाना चाहिए। हारून दो मुट्ठी वह मधुर सुगन्धि धूप लेगा जो बारीक पीसी गिई है। हारून को पर्दे के पीछे कमरे में उस सुगन्धित को लाना चाहिये। हारून को यहोवा के सामने सुगन्ध को आग में डालना चाहिए। 13 तब सुगन्धित धूप के धुएका बादल साक्षीपत्र के ऊपर के विशेष ढक्कन को ढक लेगा। इस प्रकार हारून नहीं मरेगा।

अह्बार 16: 6,13

सो एक बछड़े को ज़बह करना होता था ताकि वह अपने ख़ानदान के ख़ता लिए कफ़फ़ारा दे सके ।  फिर वह दो बकरों का रस्म अदा करता था ।

“इसके बाद हारून दो बकरे लेगा और मिलापवाले तमबू के द्वार पर यहोवा के सामने लाएगा। हारून दोनों बकरों के लिए चिट्ठी डालेगा। एक चिट्ठी यहोवा के लिए होगी। दूसरी चिट्ठी अजाजेल के लिए होगी।“तब हारून चिट्ठी डालकर यहोवा के लिए चुने गए बकरे की भेंट चढ़ाएगा। हारून को इस बकरे को पापबलि के लिये चढ़ाना चाहिए।

अह्बार 16:7-9

एक बार उस बछड़े की क़ुर्बानी के बाद हारून दो बकरों को लेकर उन दोनों पर कुरा डालता था कि कौनसा क़ुर्बानी के लिए है और कौन सा अज़ाज़ील के लिए है ।  कुरा निकलने के बाद अज़ाज़ील के बकरे को बयाबान में छोड़ दिया जाता था और क़ुर्बानी वाले बकरे को खता की क़ुर्बानी बतोर ज़बह किया जाता था ।  क्यूँ ?

15 “तब हारून को लोगों के लिए पापबलि स्वरूप बकरे को मारना चाहिए। हारून को बकरे का खून पर्दे के पीछे कमरे में लाना चाहिए। हारून को बकरे के खून से वैसा ही करना चाहिए जैसा बैल के खून से उसने किया। हारून को उस ढक्कन पर और ढक्कन के साने बकरे का खून छिड़कना चाहिए। 16 ऐसा अनेक बार हुआ जब इस्राएल के लोग अशुद्ध हुए। इसलिए हारून इस्राएल के लोगों के अपराध और पाप से महापवित्र स्थान को शुद्ध करने के लिए उपासना करेगा। हारून को ये काम क्यों करना चाहिए क्योंकि मिलापवाला तम्बू अशुद्ध लोगों के बीच में स्थित है।(अ)

ह्बार 16:15-16

और नज़र के बकरे का क्या होता था ?

20 “हारून महापवित्र स्थान, मिलापवाले तम्बू तथा वेदी को पवित्र बनाएगा। इन कामों के बाद हारून यहोवा के पास बकरे को जीवित लाएगा। 21 हारून अपने दोनों हाथों को जीवित बकरे के सिर पर रखेगा। तब हारून बकरे के ऊपर इस्राएल के लोगों के अपराध और पाप को कबूल करेगा। इस प्रकार हारून लोगों के पापों को बकरे के सिर पर डालेगा। तब वह बकरे को दूर मरुभूमि में भेजेगा. एक व्यक्ति बगल में बकरे को ले जाने के लिए खड़ा रहेगा। 22 इस प्रकार बकरा सभी लोगों के पाप अपने ऊपर सूनी मरुभूमि में ले जाएगा। जो व्यक्ति बकरे को ले जाएगा वह मरुभूमि में उसे खुला छोड़ देगा।

अह्बार 16:20-22

बछड़े कि क़ुर्बानी तो हारून के खुद के लिए और उसके ख़ानदान के लिए था और उस पहले बकरे की क़ुर्बानी तमाम बनी इस्राईल के गुनाहों के लिए था । फिर दुसरे बक्रेव पर हारून अपने दोनों हाथ रखता था । वह नज़र का बकरा निशान बतोर होता था जिस पर बनी इस्राईल के तमाम गुनाह लादे हुए बयाबान में घूमता फिरता था ।  जो उसे बयाबान में छोड़ने जाता था उस को वापस आकर गुसुल करना होता था । इन रस्मों और कुर्बानियों के वसीले से गुनाहों का कफ़फ़ारा होता था ।  ऐसा हर साल कफ़फ़ारे के दिन मनाया जाता था ।

बछिया या गाय  सूरा – ए – बक़रा और तौरात में

हारुन इस बछिए (नर बछड़े के बदले मादा गाय) की क़ुर्बानी के अलावा दीगर कुर्बानियां भी गुज़रानता था ।  इस बछिए की क़ुर्बानी के सबब से ही सूरा का नाम सूरा । ए।  बक़रा रखा गया जो कि क़ुरान शरीफ़ का दूसरा सूरा है ।  सो क़ुरान शरीफ़ बराहे रास्त इस क़ुर्बानी की बाबत कहता है ।  यहाँ किलिक करें ताकि आप इस बयान को पढ़ सकें । जिस बतोर आप देख सकते थे कि लोग उस वक़्त चोंक गए थे और उलझन में पड़ गए थे जबुन्हें गाय की क़ुर्बानी का हुक्म दिया गया था (यानी कि मादा जानवर की क़ुर्बानी) जब कि आम तोर पर नर जानवर की क़ुर्बानी दी जाती थी । और यह ख़त्म होता है ज़ेल के सूरा में ।

 खुदा को उसका ज़ाहिर करना मंजूर था पस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस (की लाश) पर मारो यूँ खुदा मुर्दे को ज़िन्दा करता है और तुम को अपनी कुदरत की निशानियाँ दिखा देता है

सूरा 2:73 अल –  बक़रा

सो यह भी कई एक निशानों में से एक निशान है जिस पर धियान देने कि ज़रुरत है कि यह बछिया किस बात का निशान है । हम ने पढ़ा था कि ज़िन्दगी और मौत से इस का ता’ललुक़ है ।  “इत्तिफ़ाक़न हम इसे समझ सकते हैं”जब हम तौरात में असली हिदायत का मुताला करते हैं तो हारुन की इस क़ुर्बानी की बाबत पढने को मिलता है । यहाँ पर किलिक करें ताकि इस पूरे इबारत को तौरात में से पढ़ सकें । हम देखते हैं कि :

 बछिया को जलाया जाना है – उसके छिपने, मांस, रक्त और आंतों को। पुजारी को कुछ देवदार की लकड़ी, हाईसोप और स्कारलेट ऊन लेना है और उन्हें जलती हुई बछिया पर फेंकना है

गिनती 19 : 5 – 6

ज़ूफ़े  की लकड़ी एक पत्तों वाला दरख़्त है ।  जहां तक ज़ुफे का सवाल है फ़सह के दौरान जब बनी इस्राईल को फ़सह के बर्रे का खून घर के चौखट पर छिड़कना था तो ज़ूफ़े का इस्तेमाल किया जाता था जिस से मौत का फ़रिश्ता उस घर को छोड़ता जाए ।

22 जूफा [b] के गुच्छों को लो और खून से भरे प्यालों में उन्हें डुबाओ। खून से चौखटों के दोनों पटों और सिरों को रंग दो। कोई भी व्यक्ति सवेरा होने से पहले अपना घर न छोड़े।

ख़ुरूज 12:22

ज़ूफ़े को उस बछिए के साथ भी इस्तेमाल किया गया । और बछिया , ज़ूफ़ा , ऊन , और देवदार इन सब को तब तक जलाया जाता था जब तक कि सिर्फ़ राख ही राख रह जाता था । देखें :

“एक आदमी जो साफ है वह बछिया की राख को इकट्ठा करेगा और उन्हें शिविर के बाहर एक औपचारिक रूप से साफ जगह पर रखेगा। उन्हें इज़राइली समुदाय द्वारा सफाई के पानी में उपयोग के लिए रखा जाना है; यह पाप से शुद्धिकरण के लिए है।

गिनती 19:9

फिर उस राख को ‘पाक किये जाने के पानी में’ मिलाया जाता था ।  एक नापाक शख्स इस सफ़ाई (रस्मी ग़ुसल या वज़ू) को अंजाम देता था ताकि राख मिले हुए पानी को इस्तेमाल करके सफ़ाई से बहाल हो जाए ।  मगर राख अकेला किसी गंदगी को साफ़ करने के लिए नहीं था ।

 “जो कोई भी इंसान की लाश को छूता है वह सात दिनों तक अशुद्ध रहेगा। उन्हें तीसरे दिन और सातवें दिन पानी के साथ खुद को शुद्ध करना होगा (बछिया की राख के साथ मिश्रित); तब वे साफ हो जाएंगे। लेकिन अगर वे तीसरे और सातवें दिन खुद को शुद्ध नहीं करते हैं, तो वे साफ नहीं होंगे। यदि वे मानव लाश को छूने के बाद खुद को शुद्ध करने में विफल होते हैं, तो वे यहोवा की झांकी को परिभाषित करते हैं।

गिनती 19 :11- 13

सो यह गाय की राख जो पानी में मिला हुआ था इस से वज़ू (सफ़ाई) होती थी ।  मगर सवाल यह है कि एक शख्स जब मुरदार जिस्म को छू लेता था तो मुरदार जिस्म को छूने से एक शख्स इतनी संजीदा तोर से क्यूँ नापाक क़रार दिया जाता था ? आप इस के बारे में सोचें ! आदम को एक फानी इंसान बनाया गया था ।  उस के गुनाह के अंजाम बतोर वह फ़ानी हुआ ।  और उसकी औलाद भी फ़ानी हुई (जिस में मैं और आप शामिल हैं) ।  इसलिए मौत एक नापाक चीज़ है क्यूंकि यह गुनाह का अंजाम है ।  यह गुनाह की नापाकी से शिरकत करती है ।  इसलिए जो मुर्दा जिस्म को छूता है तो वह खुद भी नापाक हो जाता है ।  मगर यह राख एक निशाँ थे कि इस नापाकी से पाक करे । एक नापाक शख्स जो अपनी ‘नापाकी’ में मुर्दा वह बछिया के राख के साथ नजासत से पाक होकर ‘ज़िन्दगी’ पाएगा

 एक मादा जानवर का इस्तेमाल क्यूँ किया गया और नर का क्यूँ नहीं ? इस सवाल के लिए कोई बराहे रास्त वज़ा हत नहीं दी गई है मगर हम कलाम से सबब निकाल सकते हैं ।  पूरे तौरात में (और दीगर तमाम मुक़द्दस किताबों में)अल्लाह ने खुद को मुज़क्कर के जिन्स में ज़ाहिर किया और बनी इस्राईल को मज्मूआ तोर से मुअननस के जिन्स  में ज़ाहिर किया गया है ।  अल्लाह ने इन को अपनी क़ौम कहा और इन की रहनुमाई की और उन्होंने जवाब दिया यानी उसकी रहनुमाई क़बूल की ।  मगर हमेशा हर बात में अल्लाह ने पहल की ।  उसी ने पहल करके इब्राहिम को हुक्म दिया था कि वह अपने बेटे को कुर्बान करे ; उसी ने पहल करके बनी इस्राईल के लिए दस अहकाम पत्थर की  लोहों पर लिखवाये; उसी ने पहल करके नूह के ज़माने के लोगों का इंसाफ़ किया वग़ैरा वग़ैरा …..  किसी भी बात की शुरुआत के लिए कभी किसी इंसान (नबी या और किसी शख्स के ख़याल में नहीं आया) । यह महज़ उसके पीछे चलने वाले लोग हैं जो उसकी रहनुमाई के मातहत हैं ।

बछिया के राख से इंसान की इंसान कि ज़रुरत पूरी हुई जो कि नजासत से पाक होने की थी ।  इस तरह यह इंसानी ज़रुरत का निशान था । वह जानवर जो नज़र किया गया था मादा जानवर था ।  नजासत या नापाकी उस शर्मिंदगी की तरफ़ इशारा करती है जो गुनाह करने पर हमको एहसास होता है । वह कसूर नहीं जो अल्लाह के हुज़ूर हमको क़सूरवार ठहराता है ।  जब मैं गुनाह करता हूँ तो न सिर्फ़ मैं ने कानून को तोड़ा है बल्कि मैं मुंसिफ़ के सामने कुसूरवार भी हूं और मैं इस के लिए शरमिंदा हूँ और अफ़सोस करता हूँ ।  अब सवाल यह है कि अल्लाह किसतरह हमारे गुनाह की शर्मिंदगी को दूर करता है ।  सब से पहले वह हमारी शर्मसारी को ढंकने के लिए कपड़े देता है । पहले इंसान को अल्लाह ने चमड़े के कुरते बनाए थे कि उनकी शर्मिंदगी और नंगेपन को ढांक सके ।  उसके बाद तब से आदम की औलाद ने खुद को कपड़े से ढांकना शुरू किया ।  दर असल ऐसा करना बहुत ही फ़ितरती बात है ।  मगर यह बहुत ही कम ऐसा होता है कि हम रुक कर नहीं पूछते कि ऐसा क्यूँ है ? दूसरा यह मामला कि बछिए कि राख से नजासत से पाक होजाना जिन से हम नापाक होते हैं यानी वह चीज़ें जो हमको नापाक करती हैं वह बछिए का निशान था कि हमको पाक करे ।

22 तो फिर आओ, हम सच्चे हृदय, निश्चयपूर्ण विश्वास अपनी अपराधपूर्ण चेतना से हमें शुद्ध करने के लिए किए गए छिड़काव से युक्त अपने हृदयों को लेकर शुद्ध जल से धोए हुए अपने शरीरों के साथ परमेश्वर के निकट पहुँचते हैं।

इब्रानियों 10:22

ऊपर ब्यान किये गए अफ़आल (कारवाईयों) के मुताबिक़ कफ़फ़ारे के दिन कुर्बान किये जाने वाले नर बकरे सब से पहले अल्लाह के लिए थे इसलिए नर बकरे का इस्तेमाल होता था ।  दस अहकाम की निशानी के साथ हम ने नोट किया कि ना फ़र्मानी का ख़मयाज़ा बतोर लगातार मौतें होती थीं । (इबारत की जांच के लिए यहां किलिक करें) । अल्लाह मुंसिफ़ था (और आज भी है !) और मुंसिफ़ होने के नाते उसने मौत का तक़ाज़ा किया ।  नर बैल की क़ुर्बानी (मौत) सब बसे पहले अल्लाह के तक़ाज़े को पूरा करती थी कि हारून के घराने के गुनाहों का ख़मयाज़ा हो । फिर पहले नर बकरे की क़ुर्बानी (मौत) बनी इस्राईल के गुनाहों के लिए अल्लाह का तकाज़ा ख्म्याज़ा बतोर था । फिर बनी इस्राईल क़ौम को गुनाहों के लिए नज़र के बकरे को हारुन के ज़रिये बयाबान में छोड़ा जाता था और यह निशान था कि इस्राईली क़ौम का गुनाह कौम से अलग किया गया है ।

बनी इस्राईल की तारीख़ बताती है कि यह कुर्बानियां सरदार काहिन हारुन और उसकी औलाद के ज़रिये उनके ठहराए हुए मुल्क में एक हज़ार साल से ज़ियादा अरसे तक मनाया जा रहा था ।  यह दाऊद के ज़माने में भी था जब वह बादशाह बना और जब उसके बेटों ने हुकूमत की थी ; और जबकि कई एक अंबिया आए और उन्हों ने तंबीह भरे पैग़ामात दिए ; यहां तक कि हज़रत ईसा अल ।  मसीह के ज़माने तक यह कुर्बानियां यूँ ही जारी रहीं ।  मगर यह सब कुछ आने वाली नजात की महज़ एक निशानी थी ।  

सो मूसा और हारून के इन आख़री निशानों के साथ तौरात का ज़माना ख़त्म होने जा रहा था ।  अनक़रीब जानिशीन अंबिया आयेंगे और ज़बूरों में अल्लाह के पैग़ाम का आग़ाज़ होगा ।  मगर उस से पहले तौरात का एक आखरी पैग़ाम था । वह यह था कि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने आने वाले एक और नबी की इतला’ दी जो उसी कि मानिंद होने वाला था ।  इस के साथ ही हज़रत मूसा बनी इस्राईल की मुसतक़बिल की बरकतों और लानतों को देख सकता था ।      

हज़रत ए मूसा का निशान 2 शरीअत

हज़रत मूसा के पहले निशान में हम ने देखा ।  फ़सह – जिसमें अल्लाह ने तमाम पह्लोठे बेटों को मरने का हुक्म जारी किया था सिवाए उन के जो घर पर थे ,और उनहोंने एक बर्रा ज़ुबह करके उसके खूनको अपने घरों की चौखट पर लगाया था । फ़िरोंन ने खुद को ख़ुदा के के सुपुर्द नहीं किया था इसलिए उसका पहलोथा मर गया था ।और मूसा जिन को हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) भी कहा जाता है उन्हों ने बनी इस्राईल को मिसर से बाहर निकालने मेंरहनुमाई कीऔरबहरे क़ुल्ज़ुम को पार कराते वक़्त फ़िरोन और उसकी लश्कर को उसमें डुबो दिया था ।

मगर हज़रत मूसा का किरदार नबी होने बतोर ही महदूद नहीं था बल्कि बनी इस्राईल को ज़िन्दगी की एक नै सिम्त की तरफ़ लेजाना था शरीअत के अहकाम के मुताबिक जिसे अल्लाह ने क़ाइम किया था । (सूरा अल – आला 87 – सब से बरतर) हम को यदा दिलाता है कि अल्लाह ने दुनया को बनाया ताकि उसको अपने क़ायदे पर चलाए ।

ऐ रसूल अपने आलिहन परवरदिगार के नाम की तस्बीह करोजिसने (हर चीज़ को) पैदा कियाऔर दुरूस्त किया और जिसने (उसका) अन्दाज़ा मुक़र्रर किया फिर राह बतायीऔर जिसने (हैवानात के लिए) चारा उगायाफिर ख़ुश्क उसे सियाह रंग का कूड़ा कर दिया

सूरा अल – आला 87 :1-5

इसी तरह अल्लाह की मरज़ी है कि बनी इंसान क़वानैन के मातहत होकर चलें ।

मुख़्तसर तोर पर मिसर को छोड़ने के बाद हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और बनी इस्राईल सीना पहाड़ पर आए । हज़रत मूसा सीना पहाड़ के ऊपर गए , वहां 40 दिन और 40 रात तक अल्लाह की हुज़ूरी में रहे ताकि उस से शरीअत के अहकाम हासिल करे । सूरा अल बक़रा और सूरा अल आराफ़ कि ज़ेल की आयतें इन वाकिआत का हवाला पेश करती हैं ।

और (वह वक्त याद करो) जब हमने (तामीले तौरेत) का तुमसे एक़रार कर लिया और हमने तुम्हारे सर पर तूर से (पहाड़ को) लाकर लटकाया और कह दिया कि तौरेत जो हमने तुमको दी है उसको मज़बूत पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसको याद रखो

सूरा अल – बक़रा  2:63 – गाय

और हमने मूसा से तौरैत देने के लिए तीस रातों का वायदा किया और हमने उसमें दस रोज़ बढ़ाकर पूरा कर दिया ग़रज़ उसके परवरदिगार का वायदा चालीस रात में पूरा हो गया और (चलते वक्त) मूसा ने अपने भाई हारून कहा कि तुम मेरी क़ौम में मेरे जानशीन रहो और उनकी इसलाह करना और फसाद करने वालों के तरीक़े पर न चलना

सूरा अल – आराफ़ 7:142 – बुलंदियां

सो वह अहकाम क्या थे जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह त आला से हासिल किये थे ? हालांकि मुकम्मल अहकाम तो बहुत लम्बी थी (613 अहकाम और क़वानैन जिन में बनी इस्राईल को फ़ैसला करना था कि क्या करना जायज़ था और क्या करना ना जायज़ था । इस बतोर भी कि खाने में कौनसी चीज़ उनके लिए हलाल थी और कौन सी हराम) और यह अहकाम ज़ियादातर तौरात में पाई जाती हैं । इन सब से पहले मूसा ने ख़ास अहकाम अल्लाह त आला से हासिल किये जिन को उसने अपने हाथ से पत्थर कि लोहों पर लिखे थे । इसको दस अहकाम कहा जाता है ।यह दीगर तमाम क़वानैन के लिए बुनयादी क़ानून बन गया ।यह दस हकीकी तोर से बहुत ही अहम् शरअ बतोर क़रार दिया गया – यानी की जो बतोर ए शर्त ए अव्वलीन ज़रूरी हो । सूरा अल आराफ़ की ज़ेल की यह आयत इस का हवाला देती है ।

और हमने (तौरैत की) तख्तियों में मूसा के लिए हर तरह की नसीहत और हर चीज़ का तफसीलदार बयान लिख दिया था तो (ऐ मूसा) तुम उसे मज़बूती से तो (अमल करो) और अपनी क़ौम को हुक्म दे दो कि उसमें की अच्छी बातों पर अमल करें और बहुत जल्द तुम्हें बदकिरदारों का घर दिखा दूँगा (कि कैसे उजड़ते हैं)जो लोग (ख़ुदा की) ज़मीन पर नाहक़ अकड़ते फिरते हैं उनको अपनी आयतों से बहुत जल्द फेर दूंगा और मै क्या फेरूंगा ख़ुदा (उसका दिल ऐसा सख्त है कि) अगर दुनिया जहॉन के सारे मौजिज़े भी देखते तो भी ये उन पर ईमान न लाएगें और (अगर) सीधा रास्ता भी देख पाएं तो भी अपनी राह न जाएगें और अगर गुमराही की राह देख लेगें तो झटपट उसको अपना तरीक़ा बना लेगें ये कजरवी इस सबब से हुई कि उन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया और उनसे ग़फलत करते रहे(सूरा अल

आराफ़ 7:145 – 146 – बुलंदियां

दस अहकाम

सो कुरान शरीफ़ सूरा अल आराफ़ में कहता है कि दस अहकाम पत्थर की लोहों पर जो लिखे गए थे यह खुद अल्लाह कि तरफ़ से निशान थे । मगर यह क्या थे ? डर असल वह तौरात शरीफ़ में ख़ुरूज की किताब में दिए गए हैं जिस को हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उन दस अहकाम की तख्तियों से नक़ल की थीं ।

तब परमेश्वर ने ये बातें कहीं,

“मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ। मैं तुम्हें मिस्र देश से बाहर लाया। मैंने तुम्हें दासता से मुक्त किया। इसलिए तुम्हें निश्चय ही इन आदेशों का पालन करना चाहिए।

“तुम्हे मेरे अतिरिक्त किसी अन्य देवता को, नहीं मानना चाहिए।

“तुम्हें कोई भी मूर्ति नहीं बनानी चाहिए। किसी भी उस चीज़ की आकृति मत बनाओ जो ऊपर आकाश में या नीचे धरती पर अथवा धरती के नीचे पानी में हो। किसी भी प्रकार की मूर्ति की पूजा मत करो, उसके आगे मत झुको। क्यों? क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ। मेरे लोग जो दूसरे देवताओं की पूजा करते हैं मैं उनसे घृणा करता हूँ। यदि कोई व्यक्ति मेरे विरुद्ध पाप करता है तो मैं उसका शत्रु हो जाता हूँ। मैं उस व्यक्ति की सन्तानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी तक को दण्ड दूँगा। किन्तु मैं उन व्यक्तियों पर बहुत कृपालू रहूँगा जो मुझसे प्रेम करेंगे और मेरे आदेशों को मानेंगे। मैं उनके परिवारों के प्रति सहस्रों पीढ़ी तक कृपालु रहूँगा।

“तुम्हारे परमेश्वर यहोवा के नाम का उपयोग तुम्हें गलत ढंग से नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति यहोवा के नाम का उपयोग गलत ढंग से करता है तो वह अपराधी है और यहोवा उसे निरपराध नहीं मानेगा।

“सब्त को एक विशेष दिन के रूप में मानने का ध्यान रखना। सप्ताह में तुम छः दिन अपना कार्य कर सकते हो। 10 किन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की प्रतिष्ठा में आराम का दिन है। इसलिए उस दिन कोई व्यक्ति चाहे तुम, या तुम्हारे पुत्र और पुत्रियाँ, तुम्हारे दास और दासियाँ, पशु तथा तुम्हारे नगर में रहने वाले सभी विदेशी काम नहीं करेंगे।” 11 क्यों? क्योंकि यहोवा ने छ: दिन काम किया और आकाश, धरती, सागर और उनकी हर चीज़ें बनाईं। और सातवें दिन परमेश्वर ने आराम किया। इस प्रकार यहोवा ने शनिवार को वरदान दिया कि उसे आराम के पवित्र दिन के रूप में मनाया जाएगा। यहोवा ने उसे बहुत ही विशेष दिन के रूप में स्थापित किया।

12 “अपने माता और अपने पिता का आदर करो। यह इसलिए करो कि तुम्हारे परमेश्वर यहोवा जिस धरती को तुम्हें दे रहा है, उसमें तुम दीर्घ जीवन बिता सको”

13 “तुम्हें किसी व्यक्ति की हत्या नहीं करनी चाहिए”

14 “तुम्हें व्यभिचार नहीं करना चाहिए”

15 “तुम्हें चोरी नहीं करनी चाहिए”

16 “तुम्हें अपने पड़ोसियों के विरुद्ध झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए।”

17 “दूसरे लोगों की चीज़ों को लेने की इच्छा तुम्हें नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपने पड़ोसी का घर, उसकी पत्नी, उसके सेवक और सेविकाओं, उसकी गायों, उसके गधों को लेने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। तुम्हें किसी की भी चीज़ को लेने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।”

18 घाटी में लोगों ने इस पूरे समय गर्जन सुनी और पर्वत पर बिजली की चमक देखी। उन्होंने तुरही की ध्वनि सुनी और पर्वत से उठते धूएँ को देखा। लोग डरे और भय से काँप उठे। वे पर्वत से दूर खड़े रहे और देखते रहे।

ख़ुरूज 20 :1-18

अक्सर यह देखा गया है कि हम में से अक्सर जो ग़ैर मज़हबी मुल्कों में रहते हैं वह भूल गए हैं कि यह अहकाम थे यह सलाह मशवरे नहीं थे ।न ही यह शिफ़ाअतनामा हैं / न ही गुफत ओ शनीद से मामला तै करने वाली बात है बल्कि यह वह अहकाम थे कि इनकी इताअत की जाए या इस के लिए सुपुर्द हों ।यह शरीअत के अहकाम थे ,और बनी इस्राईल ख़ुदा के खौफ़ की पाकीज़गी में बंधे हुए थे ।

आज्ञापालन का मानक

सूरा अल हशर (सूरा 59 ।जिलावतन) हवाला देती है कि किसतरह इन दस अहकाम को क़ुरान शरीफ़ के मुकाशिफ़े के म्वाज़िने में दिया गया था । कुरान शरीफ़ के मुक़ाबले में दस अहकाम एक मुक़द्दस पहाड़ पर दिया गया था और जिस वक़्त यह दिया गया था उसवक़त पहाड़ पर एक दहशतनाक नज़्ज़ारा था ।

अगर हम इस क़ुरान को किसी पहाड़ पर (भी) नाज़िल करते तो तुम उसको देखते कि ख़ुदा के डर से झुका और फटा जाता है ये मिसालें हम लोगों (के समझाने) के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करेंवही ख़ुदा है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, पोशीदा और ज़ाहिर का जानने वाला वही बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

सूरा अल – हशर 59: 21-22

मगर एक ख़ास सवाल बाक़ी रह जाता है । बनी इसराईल को कितने अहकाम की पाबंदी करनी थी ? ज़ेल कि आयत को देखें जो दस अहकाम के दिए जाने से कुछ ही पहले  की है ।

लोगों ने रपीदीम को छोड़ दिया था और वे सीनै मरुभूमि में आ पहुँचे थे। इस्राएल के लोगों ने मरुभूमि में पर्वत [a] के निकट डेरा डाला। तब मूसा पर्वत के ऊपर परमेश्वर के पास गया। जब मूसा पर्वत पर था तभी पर्वत से परमेश्वर ने उससे कहा, “ये बातें इस्राएल के लोगों अर्थात् याकूब के बड़े परिवार से कहो, ‘तुम लोगों ने देखा कि मैं अपने शत्रुओं के साथ क्या कर सकता हूँ। तुम लोगों ने देखा कि मैंने मिस्र के लोगों के साथ क्या किया। तुम ने देखा कि मैंने तुम को मिस्र से बाहर एक उकाब की तरह पंखों पर बैठाकर निकाला। और यहाँ अपने समीप लाया। इसलिए अब मैं कहता हूँ तुम लोग मेरा आदेश मानो। मेरे साक्षीपत्र का पालन करो। यदि तुम मेरे आदेश मानोगे तो तुम मेरे विशेष लोग बनोगे। समस्त संसार मेरा है।

ख़ुरूज 19 :2,5

और दस अहकाम के फ़ौरन बाद यह आयत दी गई थी ।       

मूसा ने चर्म पत्र पर लिखे विशेष साक्षीपत्र को पढ़ा। मूसा ने साक्षीपत्र को इसलिए पढ़ा कि सभी लोग उसे सुन सकें और लोगों ने कहा, “हम लोगों ने उन नियमों को जिन्हें यहोवा ने हमें दिया, सुन लिया है और हम सब लोग उनके पालन करने का वचन देते हैं।”

निर्गमन 24: 7

तौरेत कि पांच किताबों में से आखरी किताब जिस में मूसा का आखरी वअज़ पाया जाता है उस में हज़रत मूसा ने शरी अत के अहकाम की बापंदी की बाबत इह तरह कहा :

24 यहोवा ने हमें इन सभी उपदेशों के पालन का आदेश दिया। इस प्रकार हम लोग यहोवा, अपने परमेश्वर का सम्मान करते हैं। तब यहोवा सदा हम लोगों को जीवित रखेगा और हम अच्छा जीवन बिताएंगे जैसा इस समय है। 25 यदि हम इन सारे नियमों का पालन परमेश्वर के निर्देशों के आधार पर करते हैं तो परमेश्वर हमें अच्छाईयों से भर देगा।’

इस्तिसना 6 :24-25

रास्त्बाज़ी हासिल करना

यहाँ फिर से रास्बाज़ी लफ्ज़ का इसतेमाल होता है । यह बहुत ही अहम् लफ्ज़ है । इस को सब से पहले हम ने आदम की निशानी में देखा था जब अल्लाह ने आदम कि औलाद से (हम से!) कहा था :

और उसी में से (और) उसी में से फिर दोबारा तुम ज़िन्दा करके निकाले जाओगे ऐ आदम की औलाद हमने तुम्हारे लिए पोशाक नाज़िल की जो तुम्हारे शर्मगाहों को छिपाती है और ज़ीनत के लिए कपड़े और इसके अलावा परहेज़गारी का लिबास है और ये सब (लिबासों) से बेहतर है ये (लिबास) भी ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों से है

सूरा अल । आराफ़ 7:26 (बुलंदियां

फिर इसको हमने इब्राहिम के निशान 2 में देखा था जब अल्लाह ने जब अल्लाह ने उस के लिए एक बेटे का वायदा किया था , और हज़रत इब्राहिम ने इस वायदे पर भरोसा किया और उस की बाबत इस तरह कहा गया

  अब्राम ने परमेश्वर पर विश्वास किया और परमेश्वर ने उसके विश्वास को एक अच्छा काम माना, शुमार किया ।

पैदाइश 15:6

(बराए मेहरबानी रास्त्बाज़ी की शरह के लिए इब्राहीम के निशान 2 को देखें)

यहाँ शरीअत के वसीले से रास्त्बाज़ी हासिल करने का एक तरीका पाया जाता है जिसतरह यहाँ कहा गया है ।“और अगर हम एहतियात रखें और ख़ुदा के हुज़ूर इन सब हुक्मों को मानें … तो इसी में हमारी सदाक़त

रास्त्बाज़ी) होगी।(इस्तिसना 6:25

मगर रास्त्बाज़ी हासिल करने कि शर्त सख्त है । कलाम कहता है , हमें ज़रुरत है कि ‘इन तमाम हुक्मों को मानें’ तब ही हम रास्त्बाज़ी हासिल करते हैं । यह हमको आदम की निशानी को याद दिलाती है ।इस के लिए नाफ़रमानी के एक अमल के चूक कि ज़रुरत थी जिस के सबब से अल्लाह तआला ने हज़रत आदम को बाग़ ।ए। अदन से निकाल बाहर करने का फ़ैसला लिया । जिस के लिए अल्लाह ने कई एक नाफार्मानी के अमल का इंतज़ार नहीं किया । लूत के निशान  में भी अल्लाह तआला ने यही बर्ताव लूत की बीवी से किया । इस संजीदगी को हक़ीक़त में समझने में मदद करने के लिए तौरेत की कई एक आयतें यहाँ पर जुड़ी हुई हैं जो इस बात पर ज़ोर देती हैं कि शरीअत की इताअत का असली मेयार क्या है ।

आइये हम सोचें कि इस का क्या मतलब है कभी कभार यूनिवर्सिटी के कोर्स में मैं यह गुमान करता हूँ कि प्रोफ़ेस्सर हमको इम्तहान में कई एक सवाल देगा , (मिसाल के तोर पर 25 सवालात) और उन में से हमको कुछ ही सवालात के जवाब देने होते हैं । मान लीजिये कि हम उन 25 में से 20 के ही जवाब दे पाते हैं । किसी के लिए एक सवाल बहुत ही मुश्किल होता है और वह उस को छोड़ देता है , इसी तरह दुसरे तालिबे इल्म के लिए दूसरा सवाल हाल करना मुश्किल हो जाता है और वह उसे छोड़ देता है ।इस तरह आप देखें कि प्रोफ़ेस्सर हमारे लिए इम्तहान आसान कर देता है ।

सो आप देखें कि कई लोग शरीअत के दस अहकाम के साथ भी कुछ ऐसा ही सुलूक करते हैं ।वह सोचते हैं कि अल्लाह ने जो हमें दस अहकाम दिए हैं इस का मतलब है कि हमको इन दस में से अपनी पसंद के 5 अहकाम को चुनना काफ़ी है ।मगर यह मामला ऐसा नहीं था । बल्कि बनी इस्राईल को तमाम अहकाम पर अमल करने की ज़रुरत थी ,यह नहीं कि अपनी पसंद के कुछ अहकाम पर । सो याद रखें कि तमाम अहकाम की इताअत ही रास्त्बाज़ी में उनकी मदद कर सकती थी ।

मगर क्यूं कुछ लोग शरीअत का इस तरह से सुलूक करते हैं ? इसलिए कि शरीअत की इताअत बहुत मुश्किल काम है ,ख़ास तोर से जबकि यह सिर्फ़ एक दिन के लिए नहीं बल्कि आप की पूरी ज़िन्दगी के लिए है । सो यह हमारे लिए आसान है कि खुद को धोका दें और अपने दर्जे को नीचा करें । इन अहकाम पर दुबारा से गौर करें । अपने आप से पूछें कि “क्या मैं इन तमाम अहकाम की पाबंदी कर सकता हूँ ? हर दिन ? बगैर चूक के ?” हमें खुद से यह सवाल इस सबब से करने कि ज़रुरत है क्योंकि दस अहकाम आज भी असर पिज़ीर है । अल्लाह ने इन अहकाम को दीगर नबियों तक मौखूफ़ नहीं किया बल्कि (ईसा अल । मसीह , हज़रत मोहम्मद (सल्लम) को शामिल करते हुए –  यहाँ देखें कि हज़रत मूसा के बाद भी जारी रखा गया । जबकि यह अहकाम बुनयादी हैं जैसे कि बुत परस्ती न करना, एक ख़ुदा कि इबादत करना ,जीना न करना चोरी न करना, खून न करना, झूट न बोलना वग़ैरा –  यह सब बे वक़्त तो हैं मगर हमको इन सब का पाबंद होना ज़रूरी है ।अच्छे और बुरे आमाल की बाबत किसी दुसरे शख्स के लिए कोई भी इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता । एक शख्स सिर्फ़ अपने लिए जवाब दे सकता है ।और वह अपने आमाल का फिर से अल्लाह के हुज़ूर इंसाफ़ के दिन जवाब देना होगा ।

अल्लाह के हुज़ूर तमाम ज़रूरी सवाल

सो मैं एक सवाल पूछूंगा जो इस्तिसना 6:25 से लिया गया है । इसलिए कि यह शख़सी है और आप अपने लिए इस का जवाब दे सकते हैं । यह शरीअत के इस बयान से आप के जवाब पर मुनहसर करते हुए है कि शरीअत के आमाल फ़रक़  फ़रक़ तरीके से आप पर क्या असर डालते हैं । सो आप उसी जवाब का चुनाव करें जो आप सोचते हैं कि वह आप की बाबत सच है । उन जवाबात पर किलिक करें जो आप पर नाफ़िज़ होते हैं ।

इस्तिसना 6:24-25 से हुक्म जो आप के लिए शख़सी बनाया गया है ।

“सो खुदावंद ने मुझको इन सब अहकाम पर अमल करने और हमेशा अपनी भलाई के लिए खुदावंद अपने ख़ुदा का खौफ़ मानने का हुक्म दिया है ताकि वह मुझको ज़िन्दा रखे जैसा आज के दिन ज़ाहिर है ।और अगर मैं एहतियात रखूं कि खुदावंद अपने ख़ुदा के हुज़ूर इन सब हुक्मों को मानूं जैसा उस ने मुझ से कहा है तो इसी में मेरी सदाक़त होगी”।

जी हाँ  यह मेरे लिए सच है ।

नहीं  मैं ने इन सब पर अमल नहीं किया है और यह मेरे लिए सच नहीं है ।             

हज़रत मूसा की निशानी : फ़सह

500 सालों के लग भाग जो अब गुज़र गया है जब से कि हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) जो 1500 क़ब्ल मसीह के लगभग थे।  हज़रत इब्राहीम के मरने के बाद के उन के बेटे हज़रत इस्हाक़ की औलाद आज इस्राईल कहलाते हैं।  अब उन्की तादाद बहुत ज़ियादा है। मगर एक ज़माना था कि वह मिसर में फ़िरोन  के गुलाम हो चुके थे। यह इसलिए हुआ कि हज़रत यूसुफ़ जो हज़रत इब्राहीम के पर पोते थे उनको मिसर में गुलाम बतोर बेच दिया गया था।  इस के कई सालों बाद उनकी शादी हुई और उन का ख़ानदान मिसर में बूदो बाश करने लगा -इन सारी वाक़ियात को पैदाइश 45-46 बाब में समझाया गया है जो हज़रत मूसा की किताब तौरात की पहली किताब है।

सो अब हम एक और बड़े नबी हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बड़ी निशानी में आ गए हैं जिन की बाबत तौरात की दूसरी किताब में ज़िकर पाया जाता है।  हज़रत मूसा को ख़ुदा की तरफ़ से हुक्म दिया गया था कि वह जाकर मिसर के बादशाह फ़िरोन से मुलाक़ात करे। हज़रत मूसा हुक्म मानकर फ़िरोन के पास गए जिस का अंजाम यह हुआ कि हज़रत मूसा और फ़िरोन के जादूगरों से मुडभेड़ हो गई। इस मुडभेड़ के चलते फ़िरोन और उस का खानदान और दीगर मिसरी लोग जो फ़िरोन की पैरवी करते थे उन के ख़िलाफ़ 9 वाबाएं नाज़िल हुईं जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के लिए निशानी बतोर थीं। मगर इन सब के बावजूद भी फ़िरोन ख़ुदा पर ईमान नहीं लाया और उन निशानियों को नज़र अंदाज़ करके ख़ुदा की न फ़रमानी की।

सूरा अन नाज़िआत (सूरा 79 – वह लोग जो आगे घसीटे गए) इन वाक़ियात को इस तरह से बयान किया गया है

(ऐ रसूल) क्या तुम्हारे पास मूसा का किस्सा भी पहुँचा हैजब उनको परवरदिगार ने तूवा के मैदान में पुकाराकि फिरऔन के पास जाओ वह सरकश हो गया है(और उससे) कहो कि क्या तेरी ख्वाहिश है कि (कुफ्र से) पाक हो जाएऔर मैं तुझे तेरे परवरदिगार की राह बता दूँ तो तुझको ख़ौफ (पैदा) होग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया e

सूरा  अन नाज़ीआत  79:15-20

सूरा अल मुज़म्मिल (सूरा 73 – जिन्हें छिपा लिया गया या ढांक लिया गया) यह फ़िरों के जवाब का ज़िकर करता है:

 तो फिरऔन ने उस रसूल की नाफ़रमानी की तो हमने भी (उसकी सज़ा में) उसको बहुत सख्त पकड़ा

सुरह  अलमुज़म्मिल 73:16

हज़रत मूसा की बड़ी निशानी क्या थी जो सूरा अन नाज़ियात में बयान किया गया है? और सूरा अल मुज़म्मिल में फ़िरोन के लिए बड़ी सज़ा क्या थी?निशानी और सज़ा इन दोनों की बाबत दसवें वबा में बताया गया है।

दसवीं वबा

सो अल्लाह दसवें वबा को लेन वाला था जो बहुत ही इन्तहा दर्जे का ख़ौफ़नाक वबा (आफ़त) थी। भारी मुसीबत (दसवीं वबा के आने से पहले कुछ तैयारियों और तशरीह की बाबत तौरात हमें समझाती है और कुरान शरीफ़ की ज़ेल की  आयत भी इस मुद्दे पर बयान पेश करता है।

और हमने यक़ीनन मूसा को खुले हुए नौ मौजिज़े अता किए तो (ऐ रसूल) बनी इसराईल से (यही) पूछ देखो कि जब मूसा उनके पास आए तो फिरऔन ने उनसे कहा कि ऐ मूसा मै तो समझता हूँ कि किसी ने तुम पर जादू करके दीवाना बना दिया हैमूसा ने कहा तुम ये ज़रुर जानते हो कि ये मौजिज़े सारे आसमान व ज़मीन के परवरदिगार ने नाज़िल किए (और वह भी लोगों की) सूझ बूझ की बातें हैं और ऐ फिरऔन मै तो ख्याल करता हूँ कि तुम पर यामत आई है(सूरा  बनी इस्राईल

रात का सफ़र  17:101-102

सो फ़िरों के सल्तनत की तबाही और बर्बादी हुई। मगर सवाल यह है कि इस तबाही और बर्बादी के पीछे कौन था?क्या वाक़िया पेश आया था? आप देखें कि उस के आधे सल्तनत की तबाही उन नौ वाबाओं के ज़रिये फ़रक फ़रक तरीकों से हो चुकी थी। शायद आपको याद होगा कि नूह के ज़माने के लोग आलमगीर दर्जे पर उस बड़े सैलाब में डूब कर मर गए थे, तबाह हो गए थे।  और अगर आप हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की बात करें तो उन की बीवी ख़ुदा के हुक्म की नाफ़रमानी की वजह से नमक का खम्बा बन गई थी। मगर यह तबाही नूह के ज़माने के लोगों की तबाही से फ़रक थी क्यूंकि यह बनी इस्राईल के तमाम लोगों के लिए निशानी थी – एक बड़ी निशानी जिसतरह कुरान शरीफ़ कहता है

 ग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया

सूरा 79:20

दसवीं वबा की तशरीहात को आप तौरात की दूसरी किताब ख़ुरूज में पढ़ सकते हैं जिस को यहाँ पर जोड़ा गया है -यह एक मुकम्मल बयान है जिस से ज़ेल के मज़ामीं को समझने के लिए बहतर तशरीह हासिल होगी –

फ़सह का बर्रा मरने से बचाता है

यह ख़ुदा का कलाम हमको बताता है कि जो तबाही (दसवां वबा) बतोर था वह जो अल्लाह के ज़रिये नाज़िल हुआ थावह यह था कि उस आख़री रात को तमाम पह्लोठों को मार दिया जाना था सिवाए उन घरों के जहां पर एक बर्रा ज़ुबह करके उसके खून को घर की चौखट पर लगा दिया गया था। यह सारे घर बनी इस्राएल के घर थे जिन्हों ने ख़ुदा के हुक्म की फ़रमानबरदारी की थी। मगर इस में फ़िरोन का घराना शामिल नहीं था।  न ही उसके उमरा और उसके हाकिम लोग थे।  इन सब के घराने में पह्लोठे बच्चों की मौत हुई जो आगे चलकर ताजो तख़्त के और ऊंचे ओहदों के वारिस थे अगर फ़िरोन ख़ुदा पर ईमान लाकर मूसा की बात पर अमल करता तो क्या उस के बच्चे मरते? मगर ऐसा नहीं हुआ। मिस्रियों का का सारा घराना अपने पह्लोठे बच्चों को मरने से रोक न सके – जब उन्हों ने हज़रत मूसा की बात नहीं मानी, बर्रे की क़ुर्बानी नहीं की, उस का खून दरवाज़े के चौखट पर पर नहीं लगाया तो उन सब ने एक आलमगीर वबा का सामना किया । मगर जिन के घरों में एक बर्रा कुर्बान हुआ था और उस का खून दरवाज़े के चौखट पर लगाया गया था, उन में से हर एक के लिए वायदा था कि उन के पह्लोठे यहाँ तक कि उन का पूरा ख़ानदान तबाह होने से बच जाएगा। अल्लाह का इंसाफ़ उन के घरों से होकर गुजरेगा और वह महफूज़ रहेंगे -सो उस दिन उस निशानी को ही फ़सह कहा गया है (जबकि मौत उन तमाम घरों से होकर गुज़री जिन के घरों पर बर्रे के खून के निशान थे)। मगर दरवाजों पर यह जो खून का निशान था वह किस लिए था? तौरात हमें बताती है :

और खुदावंद ने मूसा से कहा ….” …और जिन घरों में तुम हो उन पर वह फ़सह के बर्रे का खून तुम्हारी तरफ़   से निशान ठहरेगा और मैं उस खून को देखकर तुमको छोड़ता जाऊंगा – और जब मैं मिस्रियों को मारूंगा तो वह वबा तुम्हारे पास फटकने की भी नहीं कि तुमको हलाक करे”  

ख़ुरूज 12:13

सो हालांकि ख़ुदा दरवाज़े पर लगे उस खून को देख रहा था और जब उस ने उस खून को देखा तो उस ने यह नहीं कहा  कि यह उस के लिए निशाँ था बल्कि उस ने कहा कि वह खून ‘तुम्हारी तरफ़ से निशान’ ठहरेगा – यानी बनी इस्राईल की तरफ़ से उस हरेक शख्स के लिए जो तौरात में इस बयान को पढ़ता है। तो फिर यह निशान हमारे लिए किसतरह है? उस खुश क़िस्मती की रात के बाद खुदावंद ने उन पर हुक्म जारी किया, वह क्या हुक्म था इस को पढ़ें :

27 तो तुम लोग कहोगे, ‘यह फसह पर्व यहोवा की भक्ति के लिए है। क्यों? क्योंकि जब हम लोग मिस्र में थे तब यहोवा इस्राएल के घरों से होकर गुजरा था। यहोवा ने मिस्रियों को मार डाला, किन्तु उसने हम लोगों के घरों में लोगों को बचाया।’

ख़ुरूज 12:27

फ़सह के दिन से यहूदी केलेन्डर का आग़ाज़ होता है

सो तमाम बनी इस्राईल को हुक्म दिया जाता है कि हर साल उसी दिन फ़सह मनाया करें। इस्राईली केलेन्डर मग़रिबी केलेन्डर से थोड़ा फ़रक़ है। सो अगर आप मग़रिबी केलेन्डर के पीछे चलते हैं तो हर साल दिन का हल्का सा फ़रक़हो जाता है – यह बिलकुल वैसे ही है जैसे रमज़ान का महीना और ईद में हर साल दिन का फ़रक़ हो जाता है क्यूंकि यह दोनों केलेन्डर चाँद के हिसाब से चलते हैं।  मगर आज के दिन तक 3500 साल के बाद भी यहूदी लोग हर साल इस वाक़िये की याद में फ़सह की ईद मनाते आ रहे हैं। हज़रत मूसा का वह वाक़िया जिस में खुदावंद ने तौरात शरीफ़ में हुक्म दिया था उसकी ताबेदारी में यहूदी लोग इसे मनाते हैं।   

  1. मौजूदा दिनों का नज़ारा जब कई एक बर्रे आने वाले यहूदियों की

फ़सह के जश्न के लिए ज़बह किये जाते हैं –

यहाँ यहूदी लोगों के मौजूदा ज़माने की तस्वीर है जिस में फ़सह की ईद की तैयारी में कई एक बर्रों की क़ुरबानी दी जा रही है।  यह ईद का जश्न मनाने की तरह ही है तारीख़ के ज़रिये इस जश्न को मानते हुए हम बिलकुल खिलाफ़ मामूल तोर से एक बात नोट कर सकते हैं।  आप इंजील शरीफ़ में नबी हज़रत ईसा अल मसीह की गिरफ़्तारी और मुक़द्दमे की तफ़सीलात के बयान पर गौर कर सकते हैं।  

“फिर यहूदियों के सरदार येसू को कैफ़ा के पास से क़िले को ले गए और सुबह का वक़्त था और वह खुद किले में न गए ताकि ना पाक न हों बल्कि फ़सह खा सकें “……”मगर तुम्हारा दस्तूर है कि मैं फ़साह के मौके पर तुम्हारी खातिर एक आदमी को छोड़ दिया करता हूँ – पस तुमको क्या मंज़ूर है कि मैं तुम्हारी खातिर यहूदियों के बादशाह (येसू ) को छोड़ दूँ? उन्हों ने चिल्लाकर फिर कहा कि उस को नहीं बराब्बा को -और बराब्बा एक डाकू था “

युहन्ना 18:28, 39-40

दूसरे अलफ़ाज़ में,हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) गिरफ़तार हुए थे और यहूदी केलेन्डर के मुताबिक फ़सह के दिन ही येसू को मस्लूबियत के लिए ले जाया गया था। अगर आप को हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की तीसरी निशानी की बाबत याद है तो हज़रत यहया ने हज़रत ईसा अल मसीह को जो लक़ब दिया था वह था वह था :

 29 अगले दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी तरफ आते देखा और कहा, “परमेश्वर के मेमने को देखो जो जगत के पाप को हर ले जाता है। 30 यह वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, ‘एक पुरुष मेरे पीछे आने वाला है जो मुझसे महान है, मुझसे आगे है क्योंकि वह मुझसे पहले विद्यमान था।’

युहन्ना 1 : 29 -30

ईसा (अलैहिस्सलाम) फ़सह के दिन सज़ा याफ़ता हुए

यहाँ हम इस निशानी की बे मिसाली को देखते हैं।  ईसा (अलैहिस्सलाम) ख़ुदा का बर्रा इसी फ़सह के दिन मस्लूब (क़ुर्बान) होने के लिए दुनिया में भेजा गया था जिन दिनों में  यहूदी लोग (मग़रिबी केलेन्डर के मुताबिक़ 33 ईस्वी में रहते थे) जिस दिन 1500 साल पहले फ़सह की यादगारी में ईद मना रहे थे।  इसी लिए यहूदियों के फ़सह का जश्न आम तोर से हर साल ईस्टर के हफ़ते में पड़ता है – ईसा अल मसीह के गुज़रने की याददाश्त बतोर – क्यूंकि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम इसी मुक़र्ररा दिन में कुर्बान होने के लिए भेजे गए थे।  (ईस्टर और फ़सह का एक जैसा तारीख़ नहीं है क्यूंकि यहूदी और मग़रिबी केलेन्डर के साल को फ़रक़ फ़रक़ तरीक़े से मुवाफ़िक़ बना कर पूरा किया जाता है।  मगर आम तोर से यह दोनों उसी हफ़्ते में पास्ता है )

अब आप एक मिनिट के लिए सोचें कि “निशानी” क्या क रत्ते हैं -आप एक ही निशानियों को ज़ेल में देख सकते हैं जब हम खोपड़ी और हड्डियों के निशाँ को देखते हैं तो हम मौत और खतरे कि बाबत सोचते हैं।  सुनहरे तीर की ‘निशानी’  देखते हैं तो हम यह मान कर चलते हैं कि हम मैक डोनल्स कि बाबत सोच रहे हैं। निशानियाँ क्या करते हैं? वह हमारे दमागों में इशारा करने वाले होते हैं ताकि किसी चीज़ की तरफ़ देख कर हम सोच सकें।                                                

यह निशान टेनिस के खिलाड़ी नाडल बनडाना कि नाइक के लिए है।  नाइक चाहता है कि हम नाडल पर इस निशानी को देखें। दूसरे लफ़्ज़ों में निशानियाँ हमारे दमाग़ को इशारा करने वाले होते हैं कि हम अपनी समझ को ख्वाहिश की हुई चीज़ की तरफ़ देखने के लिए तवज्जोह करें। इसी तरह हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की निशानी भी है।  यह अल्लाह ही है जिस ने यह निशान हमारे लिए दिया है।  उस ने यह निशान क्यूँ दिया? खैर यह निशानी काबिले मुलाहज़ा बर्रों के औक़ात के साथ है जो एक ही दिन में क़ुर्बान हुए थे उसी तरह ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) क़ुर्बानी के लिए एक इशारा करने वाला बतोर होना चाहिए।

यह हमारे दमागों में काम करता है जिस तरह मैं ने नक्शे में दिखाया है।  निशानी वहां पर मजूद थी कि ईसा अल मसीह के दिए जाने की तरफ़ हमको इशारा करे। उस पहले फ़साह में बर्रे क़ुर्बान किये जाते थे और खून निथारे जाते थे और फैलाए जाते थे कि लोग ज़िन्दा रह सकें। और इस तरह यह निशानी हज़रत ईसा की तरफ़ इशारा करते हुए हम से कहता है कि यह वही ख़ुदा का बर्रा है जो मौत के हवाला किया गया ताकि हम ज़िन्दगी हासिल कर सकें।

हज़रत इब्राहिम की तीसरी निशानी में हमने देखा था कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का इम्तिहान मोरियाह के पहाड़ पर अपने बेटे की क़ुरबानी से हुआ। मगर आख़री लम्हे में हमने देखा था कि उसके बेटे के बदले में एक मेंढा कुर्बान किया गया। एक मेंढा मारा ताकि हज़रत इब्राहीम का बेटा ज़िन्दा रह सके। मोरिया का पहाड़ बिलकुल वही जगह थी जहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को क़ुर्बानी के वास्ते दिया गया था – वह एक निशानी थी हमारे सोचने के लिए कि हज़रत ईसा अल मसीह क़ुर्बानी के लिए उसी मक़ाम  का इशारा करने के ज़रिये दिए जा रहे हैं। यहाँ इस मूसा की निशानी में उसी वाक़िये के लिए एक और इशारा करने वाले को पाते हैं – हज़रत ईसा अल मसीह का क़ुर्बानी के लिए दिया जाना – फ़सह की क़ुर्बानी की बाबत केलेन्डर के उस दिन की तरफ़ इशारा करने के ज़रिये इसी वाक़िये की तरफ़ इशारा करने के लिए एक बर्रे की क़ुर्बानी को एक बार फिर इस्तेमाल किया गया – क्यूँ? हम हज़रत मूसा की अगली निशानी के साथ बयान को जारी रखेंगे ताकि आगे की मालूमात हासिल कर सकें। यह निशानी है सीना पहाड़ पर शरीअत का दिया जाना।

मगर इस कहानी को ख़तम करने के लिए कि फ़िरोन का क्या हाल हुआ? जिसतरह हम ने तौरात की इबारत में से   पढ़ा उस ने उस तंबीह की परवाह नहीं की जो हज़रत मूसा ने उसे साफ़ लफ़्ज़ों में बताया था न ही अपने पह्लोठे बेटे का ख़याल किया जो उस का वारिस था और उस रात मारा गया था -तब उस ने बनी इस्राईल को मिसर छोड़ने की इजाज़त दी थी। मगर कुछ घंटों बाद उस ने अपना इरादा बदल दिया था और उस ने बहरे क़ुल्ज़ुम तक बनी इस्राईल का पीछा किया। वहां खुदावंद ने बनी इस्राईल को बहरे क़ुल्ज़ुम को पार करने का रास्ता तैयार किया। मगर फ़िरोन और उसका सारा लश्कर उसी दरया में डूब कर मर गए – 9 वबाओं के बाद फ़साह की मौतें (पह्लोठों का मारा जाना) और लश्कर का नुक़सान यह सब मिलकर मुल्क -ए- मिसर में फ़िरोन कि सल्तनत को ऐसा कमज़ोर किया कि अपने उस पहले दर्जे को फिर से हासिल नहीं कर पाया जिसतरह कि वह दुनया सब से ज़ियादा ताक़तवर फ़ौजी बेड़ा माना जाता था।  अल्लाह ने मुल्क -ए- मिसर का इंसाफ़ किया।

इब्राहीम का निशान 3 : क़ुरबानी

पिछली निशानी में बड़े पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को एक बेटे का वायदा किया गया था। और अल्लाह ने अपने वायदे को क़ाइम रखा। दरअसल तौरात इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के इस  कैफ़ियत को जारी रखती है यह बयान करने के लिए कि किसतरह उसके दो बेटे हुए थे। पैदाइश का 16 बाब बताता है कि किसतरह उसने हाजरा से अपने बेटे इस्माईल को पाया और फिर उसके बाद पैदाइश का 21 बाब बताता है कि किसतरह उसने सारा से 14 साल बाद अपने बेटे इस्हाक़ को पाया। बदक़िस्मती से उसके घराने के लिए यह बात उन दो औरतों, हाजरा और सारा के दरमियान एक बड़े रक़ाबत का अंजाम ज़ाहिर हुआ कि इब्राहीम को मजबूरन हाजरा और उसके बेटे को घर से बाहर भेजना पड़ा।  यह कैसे हुआ इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं और मालूम कर सकते हैं कि किसतरह अल्लाह ने दुसरे तरीक़े से हाजरा और इस्माईल को बरकत दी।          

पैग़म्बर इब्राहीम की क़ुरबानी : ईद -उल- अज़हा के लिए बुनियाद

इसतरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के घराने में एक ही बेटा रह गया था कि उसका सब से बड़ा इम्तिहान से मुक़ाबला हो मगर यह एक ही ज़रीया है जो हमारे लिए सीधे रास्ते की एक बड़ी समझ का रासता खोलता है। आप इस बयान को जो उस के बेटे की क़ुर्बानी की इम्तिहान की बाबत है तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में यहाँ पढ़ सकते हैं। इन किताबों की कहानी के सबब से ही ईद -उल- अज़हा मनाई जाती है – मगर यह सिर्फ़ एक तारीक़ी वाक़िया नहीं है। बल्कि यह इस से भी ज़ियादा है।

किताबों के बयान से हम देख सकते हैं कि यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए एक इम्तिहान है मगर यह इस से भी ज़ियादा कुछ और है। जबकि इब्राहीम (अलै.) एक पैग़म्बर हैं तो यह इम्तिहान भी हमारे लिए एक निशानी है ताकि हमारे लिए ख़ुदा की परवाह की बाबत हम और ज़ियादा सीख सकें -किस तरीक़े से यह एक निशानी है? बराए मेहरबानी उस जगह पर धियान दें जिसे इब्राहीम ने नाम दिया था जहाँ कि उसके बेटे को कुर्बान होना था।  तौरात के उस हिस्से को यहां बताया गया है ताकि आप उसे बराहे रास्त पढ़ सकें।

 13 इब्राहीम ने ऊपर दृष्टि की और एक मेढ़े को देखा। मेढ़े के सींग एक झाड़ी में फँस गए थे। इसलिए इब्राहीम वहाँ गया, उसे पकड़ा और उसे मार डाला। इब्राहीम ने मेढ़े को अपने पुत्र के स्थान पर बलि चढ़ाया। इब्राहीम का पुत्र बच गया। 14 इसलिए इब्राहीम ने उस जगह का नाम “यहोवा यिरे” [a] रखा। आज भी लोग कहते हैं, “इस पहाड़ पर यहोवा को देखा जा सकता है।”

पैदाइश 22:13-14

उस नाम पर धियान दें जो इब्राहीम (तौरात में “अब्रहाम”है) ने उस जगह के लिए दी।  उसने नाम दिया “खुदावंद मुहैया करेगा।”  क्या यह नाम माज़ी में है, हाल में या मुस्तक़बिल में? यह साफ़ ज़ाहिर है कि यह ज़माना -ए-मुस्तक़बिल में है। यहां तक कि इसकी शरह ज़ियादा साफ़ तब होजाता है जब आगे चलकर यह यकीन होजाता है कि (इसे मूसा (अलैहिस्सलाम) ने ठीक 500 साल बाद तौरात में इस बयान का ज़िकर किया) इस मुहावरे को दोबारा देखें “…. यह मुहैया किया जाएगा ” फिर से देखें कि यह ज़माना -ए- मुस्तक़बिल में है और मुस्तक़बिल की तरफ़ देखा जा रहा है।  बहुत से लोग सोचते हैं कि इब्राहीम उस मेंढे (एक नर भेड़) का हवाला दे रहा था जिस के सींग झाड़ी में अटके हुए थे और उस ने उस को पकड़ कर अपने बेटे के बदल में कुर्बान किया -मगर आप देखें कि इब्राहीम जब इस जगह का नाम रखता है तो उस से पहले ही मेंढा कुर्बान हो चुका था, मर चुका था, और जला दिया गया था -अगर इब्राहीम उस मेंढे की बाबत सोचता – जो पहले ही से मर चुका था , कुर्बान हो चुका था और जला दिया गया था। तो उस को नाम देना चाहिए था ‘खुदावंद ने मुहैया किया है ‘, मतलब यह कि माजी के ज़माने में -और मूसा (अलैहिस्सलाम) अगर वह मेंढे की बाबत सोचते जो इब्राहीम के बेटे की जगह ली थी, उसको भी तौरात में इस तरह ज़िकर करना चाहिए था, ”चुनांचि आज के दिन तक यह कहावत है कि ख़ुदावंद के पहाड़ पर मुहैया किया गया था।”’मगर इब्राहीम और मूसा दोनों ही इस नाम को ज़माना -ए- मुस्तक़बिल में पेश करते हैं।  इस लिए वह दोनों उस मरे हुए और कुर्बान किये हुए मेंढे की बाबत नहीं सोच रहे थे।

तो फिर वह किसकी बाबत सोच रहे थे? अगर हम एक सुराग़ पर गौर करते हैं तो हम देखते हैं कि इस निशानी के  के आग़ाज़ में अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम को जिस जगह पर जाने के लिए फ़रमाया था इसे हम 22 बाब की 2 आयत पाते हैं, जहां इसतरह लिखा है :

 “तब ख़ुदा ने अब्रहाम से कहा तू अपने बेटे इस्हाक़ को जो तेरा एकलोता है और जिसे तू प्यार करता हैसाथ लेकर मोरियाह के मुल्क में जा और वहां उसे पहाड़ों में से एक पहाड़ जो मैं तुझे बताऊंगा सोख्तानीकुर्ब्क्नी के तोर पर चढ़ा“

यह वाक़िया ‘मोरियाह’ के पहाड़ों में से एक पहाड़ पर हुई।  और वह कहां पर है? हालाँकि हज़रत इब्राहिम के ज़माने  (2000 क़बल मसीह) में वह एक बयाबान का इलाक़ा था मगर 1000 साल बाद (1000 क़बल मसीह) में मशहूर दाऊद बादशाह ने वहां पर येरूशलेम शहर को बसाया और उस के बेटे सुलेमान ने खुदावंद के लिए एक अज़ीमुश्शान मक्दिस (हैकल–ए-सुलेमानी) ता’मीर की – इसकी बाबत हम ज़बूर में पढ़ते हैं :

सुलैमान ने यहोवा का मन्दिर मोरिय्याह पर्वत पर यरूशलेम में बनाना आरम्भ किया। पर्वत मोरिय्याह वह स्थान है जहाँ यहोवा ने सुलैमान के पिता दाऊद को दर्शन दिया था। सुलैमान ने उसी स्थान पर मन्दिर बनाया जिसे दाऊद तैयार कर चुका था। यह स्थान उस खलिहान में था जो ओर्नान का था। ओर्नान यबूसी लोगों में से एक था।

2 तवारीख़ 3:1

दुसरे लफ़्ज़ों में मोरियाह का पहाड़ हज़रत इब्राहीम के ज़माने में (और बाद में हज़रत मूसा के ज़माने में) एक तनहा उंचाई पर बसा हुआ पहाड़ों से ढका हुआ बयाबान में वाक़े था। मगर 1000 साल बाद हज़रत दाऊद और सुलेमान के ज़माने में जब उनहोंने एक अज़ीमुश्शान हैकल (इबादत का घर) तामीर किया तो वह इस्राईल का मरकज़ी दारुल खिलाफ़ा बन गया- अब वह मौजूदा ज़माने में यहूदियों की मुक़द्दस इबादतगाह मानी जाती है।              

मोरियाह का पहाड़ ख़ुदावंद की तरफ़ से चुना गया था हज़रत इब्ररहीम की तरफ़ से नहीं। जिस तरह कुरान शरीफ़ के सूरा अल-जिन्ना (72) में हमें समझाया गया है :

और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न

करना(सूरा अल -जिन्ना 72 :18

जहाँ इस तरह लिखा है “इबादत के मक़ामात ख़ुदा की तरफ़ से चुने जाते हैं“ हम मा’लूम करेंगे कि इस मक़ाम को क्यूँ खुदा की तरफ़ से चुना गया था?

ईसा अल मसीह और मोरियाह पहाड़ पर उनकी क़ुर्बानी

और थां हम ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) और इंजील-ए- शरीफ़ से बराहे रास्त ताल्लुक़ को पाते हैं -हम इस ताल्लुक़ को उस वक़्त देखते हैं जब हम ईसा अल मसीह के कई एक अलक़ाब में से एक लक़ब को जानते हैं – ईसा अल मसीह को कई एक लक़ब से नवाज़ा गया था – शायद जो जाना पहचाना लक़ब था वह था “मसीह”- जिसे (मसीहा) भी कहा जाता है। मगर एक और दूसरा लक़ब भी है जो उसे दिया गया था – यह इतना जाना पहचाना नहीं है मगर यह बहुत ही अहम् है। इसको हम युहन्ना की इंजील में देखते हैं जिस में यहया नबी जिन्हें इंजील में युहन्ना इसतिबाग़ी कहा गया है कहते हैं :

29 अगले दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी तरफ आते देखा और कहा, “परमेश्वर के मेमने को देखो जो जगत के पाप को हर ले जाता है। 30 यह वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, ‘एक पुरुष मेरे पीछे आने वाला है जो मुझसे महान है, मुझसे आगे है क्योंकि वह मुझसे पहले विद्यमान था।

युहन्ना 1:29 -30

एक अहम्, मगर ईसा के लक़ब (अलैहिस्सलाम) में से कम जाना पहचाना जो उसे दिया गया था वह है ख़ुदा का बर्रा“अब हज़रत ईसा की ज़िन्दगी के आखरी दौर को देखें।  उन्हें कहां गिरफ्तार किया गया था और कहां पर उन्हें सलीबी मौत कि सज़ा सुनाई गई थी ? यह सब कुछ येरूशलेम में हुआ था।  और जहाँ सलीब दी गई थी वह ‘मोरयाह  का पहाड़’ ही था जिसे हम ने पिछले वाकिये में देखा था -उस की गिरफ़्तारी के वक्त इंजील में इस तरह कहा गया है :

 फिर जब उसको यह पता चला कि वह हेरोदेस के अधिकार क्षेत्र के अधीन है तो उसने उसे हेरोदेस के पास भेज दिया जो उन दिनों यरूशलेम में ही था।

लूका 23:7

दुसरे लफ़्ज़ों में कहा जाए तो हज़रत ईसा का गिरफ्तार होना, मुक़द्दमा और सलीबी मौत कि सज़ा का सुनाया जाना सब कुछ येरूशलेम में (= मोरयाह पहाड़) में वाक़े हुआ।

हज़रत इब्राहीम की तरफ़ चलें।  क्यूँ उसने उस जगह का नाम मुस्तक़बिल के ज़माने का रखा “खुदावंद मुहैया करेगा”? क्यूंकि वह एक नबी था और वह जानता था कि वहां पर कुछ न कुछ “मुहय्या” किया जाएगा और नाटकीय मंज़र में हज़रत इब्राहिम का बेटा आखरी वक़्त में बचा लिया जाता है, क्यूंकि एक मेंढा उस कि जगह पर मरता है। उसके ठीक 2000 साल बाद ईसा अल मसीह को ख़ुदा का बर्रा कहा जाता है – और उसी जगह पर उसकी गिरफ़्तारी होती है , और उसकी मौत की सज़ा सुनाई जाती है!

येरुस्शालेम में वाक़िआत की वक़्त की लकीर / मौरयाह पहाड़

   क़ुर्बानी ने इब्राहिम का मौत से  फ़िदया  दिया

क्या यह हमारे लिए ज़रूरी है।  मैं नोट करता हूँ कि किसतरह यह इब्राहिम की निशानी ख़त्म होती है। 37 सूरा का 107 आयत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बारे में कहता है कि :

  और हम ने एक निहायत अहम् क़ुरबानी के साथ फिदया दिया

लूका 23:7

“फ़िदया” देने का क्या मतलब है? एक फ़िदयादेने का मतलब है क़ीमत अदा करना किसी ऐसे शख्स के लिए जो क़ैद में है ताकि उस को क़ैद से छुटकारा मिल सके। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए फ़िदया दिए जाने मतलब है कि वह किसी तरह के क़ैद में था (जी हाँ यहाँ तक कि एक बड़ा नबी होने के बावजूद भी)! वह किस तरह कि क़ैद में था? यह उसके बेटे के साथ का मंज़र हमें दिखाता है- वह मौत का एक कैदी था -हालाँकि वह एक नबी था -फिर भी मौत ने उसको एक कैदी की तरह जकड़ रखा था। आदम की निशानी में हम ने देखा था कि अल्लाह ने आदम और उसकी औलाद को गुनाह के अंजाम बतोर (हरेक को — जिसमें नबी लोग भी शामिल थे) फ़ना पिज़ीर कर दिया था। अब वह सब के सब गुनाह के क़ैद में थे। मगर किसी तरह बर्रे की क़ुरबानी के इस ड्रामे में हज़रत इब्राहीम के लिए यह ‘फ़िदया’ साबित हुआ -अगर आप दोबारा से इन सिसिले वार निशानियों पर गौर करेंगे तो (आदम, क़ाईन और हाबील, नूह अब यहां इब्राहीम – इन सब की जिंदगियों में आप देखें कि यह लोग जानवर की क़ुरबानी से किस तरह जुड़े हुए हैं।  इस का मतलब यह है कि वह इस की बाबत कुछ न कुछ जानते थे कि यह उन को बचाएगा -और हम इब्राहीम के मामले में देख सकते हैं कि उस का यह अमल भी मुस्तक़बिल में हज़रत ईसा के ख़ुदा का बर्रा होने की तरफ़ इशारा करता है जो कि इब्राहीम से भी ताल्लुक़ रखता है।

क़ुरबानी : हमारे लिए बरकत का बाइस है

मौरयाह के पहाड़ पर मेंढे की क़ुरबानी हमारे लिए भी बहुत ज़ियादा अहमियत रखती है।  जब अदला बदली हुई तो उस वक़्त अल्लाह हज़रत इब्राहीम से कहता है कि :

 “….और तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब कौमें बरकत पाएंगी क्यूंकि तूने मेरी बात मानकर उसपर  अमल किया”

पैदाइश 22 :18

अगर आप दुनिया की किसी भी ‘कौम’ से ताल्लुक़ रखते हैं (वैसे तो आप रखते ही हैं) तो यह आप से भी ताल्लुक़ रखता है,आप भी इस वायदे के हक़दार हैं क्यूंकि खुद अल्लाह ने यह वायदा आप के हक़ में किया है! क्या यह आप के लिए कीमती नहीं है! किसतरह इब्राहीम की कहानी का यह ताल्लुक़जो हज़रत ईसा से जुड़ाहुआ है किस तरह हमारे लिए बरकत का बाईस है? और क्यों? हम ने गौर किया था कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का फ़िदया हुआ था। और यह हमारे लिए भी एक इशारा है मगर इस के अलावा यह जवाब तय्यारी के साथ नुमायाँ नहीं है इसलिए हम को हज़रत मूसा की निशानी के साथ जारी रहना होगा (जो कि दो निशानियाँ हैं) और वह हमारे लिए इन सवालात को वाज़ेह करेंगे।

मगर एक लम्हे के लिए लफ्ज़ ‘नसल’ की तरफ़ इशारा करना चाहता हूँ जो यहाँ ‘नसल’ का लफ़ज़  वाहिद के सेगे में है।  यहां नस्लें नहीं लिखा गया है जिस तरह कई एक औलाद या लोगों में से होते हैं। एक बरकत का वायदा हज़रत इब्राहीम के एक ख़ास नसल के वसीले से था इसलिए यह वाहिद के सेगे में है न कि कई लोगों के वसीले से या लोगों की जमाअत से या’नी कि ‘उन से’ बल्कि “उस से”- आगे चल कर फ़सह जो मूसा की निशानी है इसे समझने में हमारी मदद करेगा।                          

इब्राहीम की 2 निशानी : रास्त्बाज़ी

अल्लाह की जानिब से हम को क्या कुछ ज़रूरत है ? इस सवाल के लिए कई एक जवाब हैं, मगर आदम की निशानी हम को याद दिलाती है कि हमारी सब से पहली और सब से बड़ी ज़रुरत रास्त्बाज़ी  है। यहाँ हम उन अलफ़ाज़ को देखते हैं जो बराहे रास्त हमारी तरफ़ मुखातब है (बनी आदम)।

  हे आदम के बच्चों! हमने आपकी लाज को ढंकने के लिए आपको शुभकामनाएँ दी हैं, साथ ही साथ आपके लिए श्रंगार भी किया है। लेकिन धार्मिकता की छाप – यही सबसे अच्छा है। ऐसे अल्लाह के संकेतों में से हैं, कि उन्हें नसीहत मिल सकती है।

सूरत 7:26

तो फिर ‘रास्त्बाज़ी’ क्या है ? तौरेत अल्लाह कि बाबत हम से कहती है कि (इसतिसना 32:4)

मैं यहोवा के नाम की घोषणा करूंगा।
ओह, हमारे भगवान की महानता की प्रशंसा करो!
वह रॉक है, उसके काम एकदम सही हैं,
और उसके सभी तरीके सिर्फ हैं।
एक वफादार ईश्वर जो गलत नहीं करता,
ईमानदार और बस वह है।

यह अल्लाह की रास्त्बाज़ी की तस्वीर है जिसको तौरेत में बयान किया गया है ।रास्त्बाज़ी के मायने हैं वह जो कामिल है; यानि मुकम्मल तोर से कामिल; (थोड़ा या ज़ियादा नहीं बल्कि तमाम कमाल) जिसकी राहें सच्ची हैं ,जिसमें थोड़ी सी भी,नाम के लिए भी बुराई नहीं पाई जाती; जो कि बरहक़ है। यह है रास्त्बाज़ी जिसतरह से अल्लाह के बारे में तौरेत ज़िकर करती है। मगर सवाल यह है कि हमको रास्त्बाज़ी कि क्या ज़रुरत है और क्यूँ ज़रुरत है? इस का जवाब पाने के लिए हम एक ज़बूर का हवाला देखेंगे। ज़बूर 15 जिसको हज़रत दाऊद (अलै.) ने लिखा है इसे हम इस तरह से पढ़ते हैं:

प्रभु, आपके पवित्र तम्बू में कौन रह सकता है?
  आपके पवित्र पर्वत पर कौन रह सकता है?

   2 जिसकी राह चलती है, वह निर्दोष है,
    जो धर्मी है,
   जो उनके दिल से सच बोलता है;
    3 जिसकी जीभ में कोई बदनामी न हो,
    जो पड़ोसी के लिए गलत नहीं है,
    और दूसरों पर कोई गाली नहीं डालता;
     4 जो एक वीभत्स व्यक्ति का तिरस्कार करता है
    जो प्रभु से डरते हैं उनका आदर करते हैं;
    जो दर्द होने पर भी शपथ रखता है,
    और उनका मन नहीं बदलता है;
    5 जो बिना ब्याज के गरीबों को पैसा उधार देता है;
    जो निर्दोष के खिलाफ रिश्वत स्वीकार नहीं करता है …

  जब यह पूछा जाता है कि कौन अल्लाह के ‘मुक़द्दस पहाड़’ पर रह सकता है, तो दुसरे तरीके से यह पूछा जाता है या इस सवाल का दूसरा पहलू यह है कि ‘अल्लाह के साथ कौन जन्नत में रहेगा’? तो हम देख सकते हैं कि इस का जवाब यह है कि “वह जो बे गुनाह और ‘रास्त्बाज़’ है (आयत 2)। वह शख्स अल्लाह के साथ जन्नत में दाखिल हो सकता है। इसी लिए हम को रास्त्बाज़ी की ज़रूरत है। रास्त्बाज़ी की ज़रुरत इस लिए भी है क्यूंकि खुद अल्लाह कामिल है।

अब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दूसरी निशानी पर गौर करें। किताबों से इबारत को खोलने के लिए यहाँ पर किलिक करें। तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ की आयतों को पढने के बाद हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के रास्ते पर चले (सूरा 37:83) और ऐसा करते हुए उस ने ‘रास्त्बाज़ी’ हासिल की (पैदाइश 15:6)। यही बात आदम कि निशानी में भी हम से कहा गया था कि हमें रास्त्बाज़ी की ज़रुरत है। सो अहम् सवाल हमारे लिए यह है कि : उसने इसे किस तरह हासिल किया ?

अक्सर मैं सोचता हूँ कि मै रास्त्बाज़ी को दो रास्तों में से एक को चुनने के ज़रिये हासिल करता हूँ पहले रास्ते में (मेरे ख़यालात में) अल्लाह के वजूद पर ईमान लाने के ज़रिये या उसे तस्लीम करने के ज़रिये मैं रास्त्बाज़ी को हासिल करता हूँ। मैं अल्लाह पर ‘ईमान’ लाता हूँ। इस ख़याल का सहारा लेते हुए क्या हम तौरेत में ऐसा नहीं पढ़ते कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) खुदावंद पर ईमान नहीं लाए थे? देखें (पैदाइश 15:6) मगर कुछ और गौर ओ फ़िक्र के साथ मैं ने यह महसूस किया है कि ईमान लाने का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि एक वाहिद ख़ुदा के वजूद पर ईमान लाना – नहीं बल्कि अल्लाह ने उसको एक पक्का वायदा किया था कि वह अपना एक बेटा हासिल करेगा। और वह एक ऐसा वायदा था जिस के लिए इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को चुनना था कि वह इस पर ईमान लाएं या नहीं। इस की बाबत आगे सोचें कि शैतान या इब्लीस भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखता है। और यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि उस के अन्दर कोई रास्त्बाज़ी नहीं है। सो सादगी के साथ अल्लाह के वजूद पर ईमान लाना ही ‘किसी मसले का हल’ नहीं है। मतलब यह कि इतना ही काफ़ी नहीं है।

दूसरा रासता जो मैं अक्सर सोचता हूँ वह यह है कि रास्त्बाज़ी को मैं अपनी क़ाबिलियत से हासिल कर सकता हूँ या मैं इसको नेक काम या मज़हबी कामों को करने के ज़रिये अल्लाह से कमा सकता हूँ जैसे बुरे कामों की निस्बत भले कामों को ज़ियादा करना, नमाज़ अदा करना, रोज़े रखना या किसी तरह के मज़हबी कामों को अंजाम देना मुझे इजाज़त देता है कि मैं रस्त्बाज़ी हासिल करने का हक़दार बनू, कमाऊं या क़ाबिल बनूं। मगर गौर करें तौरेत शरीफ़ इस तरह से हरगिज़ नहीं कहती।

अबराम खुदावंद पर ईमान लाया और उसने [यानी कि अल्लाह ने] उसके लिए [यानी इब्राहीम अलै. के लिए] रास्त्बाज़ी गिना गया।

पैदाइश15:6

इब्राहीम (अलै.) ने रास्त्बाज़ी को कमाया नहीं था बल्कि यह उसके लिए ‘शुमार किया गया’ था। सो इन दोनों में क्या फ़रक़ है? सहीह मायनों में देखा जाए, अगर कोई चीज़ ‘कमानी’ है तो आप उस के लिए काम करते हैं फिर आप उसके मुस्तहक़ होते हैं। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे आप मेहनत करते हैं तो आप मज़दूरी के हक़दार होते है। पर अगर आप के नाम कोई चीज़ जमा की जाती या मंसूब की जाती है तो यह आप को अता की जाती है। यह आप का कमाया हुआ नहीं है या आप मुस्तहक़ नहीं थे।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) वह शख्स थे जो गहराई से अल्लाह (वाहिद ख़ुदा) के वजूद पर ईमान लाए थे। वह दुआ बंदगी करने वाले और दूसरों की मदद करने वाले थे। जैसे कि वह अपने भतीजे लूत/लोट की मदद करते और उस के लिए दुआ करते थे। यह वह बातें हैं जिन का हम इनकार नहीं कर सकते। मगर जो कुछ इब्राहीम के तोर तरीके की बाबत बताया वह बहुत ही सीधा साधा जिन्हें हम तक़रीबन चूक जाते हैं। तौरेत हम से कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) रास्त्बाज़ी इसव लिए अता हुई क्यूंकि उन्हों ने अल्लाह के वायदों पर यकीन किया था। रास्त्बाज़ी हासिल करने की बाबत जो भी हमारी आम समझ है यह उसको मंसूख करता है चाहे इस सोच के ज़रिये से कि अल्लाह के वजूद पर ईमान रखना ही काफी है या किसी हद तक नेक काम और मज़हबी सरगर्मियां (नमाज़, रोज़ा वगैरा) इन्हें बजा लाने से हम रास्त्बाज़ी को कमा सकते या उसके हक़दार हो सकते हैं। मगर याद रखें कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने इस रास्ते को नहीं अपनाया था। उन्हों ने सादगी से अल्लाह के वायदे पर यक़ीन करने को चुना।

अब आप देखें कि एक बेटा इनायत किये जाने के वायदे पर यकीन करने का चुनाव शायद एक सीधी बात हो सकती थी मगर यह यक़ीनी तोर से आसान नहीं था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) आसानी वायदे कि परवाह किये बगैर रह सकते थे इस सबब से कि हक़ीक़त में अल्लाह उसे एक बेटा देने की कुदरत रखता है तो उसी वक़्त उसे इनायत करे क्यूंकि इस दौरान इब्राहीम और उसकी बीवी सारा इतने उमरज़दह हो चुके थे कि बच्चे का होना ना मुमकिन था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की पहली निशानी में उसकी उम्र 75 साल से ऊपर थी जब उस ने अपने मुल्क को छोड़ा था और कनान में पहुंचा था। उस वक़्त अल्लाह ने उसको वादा किया था कि उस से एक बहुत ‘बड़ी कौम’ बनेगी। इस वायदे के बाद कई एक साल गुज़र चुके थे और वह दोनों उमर रसीदा हो चुके थे और डर हक़ीक़त उन्हों ने पहले से ही बहुत ज़ियादा इंतज़ार किया था। और अभी तक उनके एक बच्चा भी नहीं हुआ था तो एक ‘बड़ी कौम’ की बात कैसे हो सकती थी? “अगर अल्लाह को एक बड़ी कौम ही बनाना था तो उसने पहले से ही एक बेटा क्यूँ नहीं दिया” ? उसको शायद ताज्जुब लगा होगा। दुसरे लफ़्ज़ों में हालांकि उसके एक बेटा होने के वादे पर यकीन तो किया था मगर गालिबन उसके दमाग में वायदे की बाबत जवाब न मिलने वाले सवालात थे। उसने वायदे पर यकीन किया था इसलिए कि वायदे का देने वाला अल्लाह था – हालाँकि वह वायदे की हर बात को समझता नहीं था। मगर बुढापे की  उम्र में बच्चा होने के इस वायदे पर यकीन करने के लिए उसे और उसकी बीवी को ज़रुरत थी कि वह अल्लाह के एक मोजिज़े पर ईमान लाए कि वह एक मोजिज़े को अंजाम दे।

वायदे पर ईमान रखना सरगरम होकर इंतज़ार करने का भी तक़ाज़ा करता है। उसकी पूरी ज़िन्दगी एक तरह से दखलंदाज़ थी जब वह कनान के वायदा किये हुए मुल्क में खेमों में सालों तक इंतज़ारी में अपने दिन गुज़ार रहा था कि वायदा किया हुआ बेटा उसे मिल जाए। यह उस के लिए बड़ा आसान हो जाता अगर वह अल्लाह के वायदे को इल्तिफ़ात कर जाता और मसोपतामिया (मौजूदा इराक़) में अपने घर वापस चला जाता जिसे वह बहुत सालों पहले छोड़ चुका था जहां उस के भाई और उस का ख़ानदान और दीगर रिश्तेदार अभी भी खयाम करते थे। सो इब्राहीम (अलै.) को मुश्किलों के साथ जीना पड़ रहा था ताकि वायदे पर ईमान रखना जारी रखे। हर एक घड़ी और हर एक दिन बल्कि कुछ साल तक जबकि वह वायदे के पूरा होने का इंतज़ार कर रहा था – वायदे पर का उसका भरोसा बहुत बड़ा था जो कि ज़िन्दगी के आम हुसूल (जैसे तस्कीन और फ़लाह व बहबूद) पर फौकिय्क्त हासिल था। हकीकी मायनों में वायदे के पेशबंदी में जीना इस का मतलब था कि ज़िन्दगी के आम हुसूल के लिए मरना। वायदे पर ईमान रखने के ज़रिये वह अपने भरोसे और अल्लाह के लिए महब्बत दोनों का इज़हार कर रहा था।

इस तरह वायदे पर यक़ीन करना यह सिर्फ़ उस के लिए दिमाग़ी समझोते से बाहर जा रहा था। इब्राहीम (अलै.) को  अपनी ज़िन्दगी, शोहरत, मुहाफ़िज़त, हाल के अमल और उम्मीदों को इस वायदे पर मुताक्बिल के लिए जोखों में डालने की ज़रुरत थी। क्यूंकि उसने मुस्तअद्दी और फ़रमानबरदारी से इंतज़ार किया था।             

यह निशानी बताती है कि किस तरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के उस वायदे पर ईमान लाया जो एक बेटे के अता करने की बाबत थी और ऐसा करने के ज़रिये उसको अता भी हुई और रास्त्बाज़ी उस के नाम शुमार किया गया। सही मायनों में देखा जाए तो इब्राहीम (अलै.) ने खुद को इस वायदे के लिए मख़सूस किया था। उस के पास चुनाव था कि वायदे की परवाह न करता और अपने मुल्क (मौजूदा इराक़) में वापस चला जाता जहां से वह वापस आया था। और वह ऐसा भी कर सकता था कि उस वायदे की परवाह न करता जबकि अभी भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखे हुए था, अभी भी नमाज़ रोज़े की पाबंदी और दूसरों की मदद करनी जारी थी – मगर इसके बाद अगर वह सिर्फ़ अपने मज़हब पर काइम रहता मगर उसको ‘रास्त्बाज़ी’ में शुमार नहीं किया जाता। और जिस तरह कुरान शरीफ़ कहता है “हम सब जो आदाम की औलाद हैं – रास्त्बाज़ी के पोशाक हैं – जो कि बहुत ही उमदा है” – यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का रासता था।

हम ने रस्त्बाज़ी की बाबत बहुत कुछ सीखा है जो कि जन्नत में दाखिल होने के लिए ज़रूरी है और यह कमाया नहीं जाता बल्कि हमारे लिए शुमार किया जाता है। और यह अल्लाह के वायदे पर भरोसा करने के ज़रिये शुमार किया जाता है ।मगर सवाल यह है कि रस्त्बाज़ी के लिए कौन क़ीमत चुकाएगा ? हम निशानी 3 के साथ जारी रखेंगे।

इब्राहीम की 1 निशानी : बरकत

इब्राहीम! उसे अब्रहाम और अब्राम (अलै.) के नाम से भी जाना जाता है। वाहिद ख़ुदा पर ईमान रखने वाले तमाम तीनों मज़ाहिब यहूदियत, मसीहियत और इस्लाम उसके पीछे चलने के लिए एक नमूना पेश करती है। अरब के लोग और यहूदी मौजूदा ज़माने में उसके बेटे इश्माईल और इस्साक़ के जिस्मानी नसल के ज़रिये उसके नाम को बड़े एहतिमाम से लेते हैं। नबियों की क़तार में भी वह बहुत ही अहम् माने जाते हैं क्यूंकि उन के बाद के अंबिया उन्हीं की नसल से ताल्लुक़ रखते हैं। सो हम अब्रहाम (अलैहिस्सलाम) कि निशानी को कई एक हिस्सों में गौर करेंगे। उसकी पहली निशानी को कुरान शरीफ़ और तौरात शरीफ़ में पढने के लिए यहाँ पर किलिक करें

कुरान शरीफ़ से एक आयत में हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पीछे कई एक क़बीले वजूद में आए जिस से क़ौम के लोग पैदा हुए। इन लोगों के ज़रिये कई एक ‘बड़ी हुकूमतें’ क़ाइम हुईं। मगर लोगों के ‘क़बीले’ रुनुमा होने से पहले एक शख्स के पास कम अज़ कम एक बेटा तो ज़रूर होना चाहिए था और एक ‘बड़ी हुकूमत’ को शक्ल देने के लिए एक बड़ी जगह का होना भी ज़रूरी था।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए वायदा

तौरेत की इबारत (पैदाइश 12:1।7) बताती है कि अल्लाह किसतरह ‘क़बीले’ और ‘बड़ी हुकूमत’ जो इब्राहीम (अलै.) से आने वाली थी अपने इस दोहरे तकमील को आशकारा करने जा रहा था। अल्लाह ने उसे एक वायदा दिया जो मुस्तकबिल के लिए एक बुन्याद था। आइये हम इसे तफ़सील के साथ मज़ीद नज़र।ए।सानी करें। हम देखते हैं कि अल्लाह इब्राहीम (अलै.) से कहता है :

2 “मैं तुम्हें एक महान राष्ट्र में बनाऊंगा,
और मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगा;
मैं तुम्हारा नाम महान कर दूंगा,
और आप एक आशीर्वाद होंगे।
3 मैं उन्हें आशीर्वाद दूंगा जो तुम्हें आशीर्वाद देते हैं,
और जो कोई तुम्हें शाप देगा, मैं शाप दे दूंगा;
और सभी लोग पृथ्वी पर हैं
आपके माध्यम से धन्य हो जाएगा।

   इब्राहीम (अलै.) की अज़मत

जहां मैं रहता हूँ वहाँ बहुत से लोग ताज्जुब करते हैं कि क्या कोई ख़ुदा है और कोई शख्स कैसे जान सकता है कि अगर उसने हक़ीक़त में खुद को तौरेत के वसीले से ज़ाहिर किया हो। यहां हमारे सामने एक वायदा है जिस के हिससों से हम सहीह साबित कर सकते हैं। इस मुकाश्फ़े का ख़ातमा कलमबंद करता है कि अल्लाह ने बराहे रास्त इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से वायदा किया कि “मैं तेरा नाम सरफ़राज़ करूंगा” हम 21 वीं सदी में बैठे हुए हैं और इब्राहीम/अब्रहाम/अब्राम का नाम तारीक़ में अलमगीर तोर से जाना पहचाना नामों में से एक है। यह वायदा ल्फ्ज़ी और तारीक़ी तोर से सच साबित होता है। तौरेत का सब से क़दीम नुसख़ा जो आज मौजूद है वह बहीरा।ए।मुरदार के तूमार में से है जिस की तारीक़ 200 -100 क़ब्ल मसीह है। इसका मतलब यह है कि यह वायदा ज़ियादा से ज़ियादा इसके लिखे जाने वक़्त से मौजूद है। उस ज़माने में इब्राहीम (अलै.) के नाम और शख्सियत को सहीह तोर से नहीं जाना जाता था सिवाए यहूदियों की अक़लियत के जो तौरेत के मानने वाले थे। मगर आज उसका नाम बहुत ऊँचा है। सो हम सही साबित कर सकते हैं कि एक तकमील तभी पूरी होती है जब उसे लिखा जाता है, उससे पहले नहीं।

इब्राहीम (अलै.) के लिए वायदे का यह हिस्सा यक़ीनी तोर से वाक़े हुआ यहाँ तक कि ग़ैर ईमानदारों के लिए ज़रूरी था और यहाँ तक कि यह हआरे लिए अल्लाह का वायदा जो इब्राहीम (अलै.) के लिए है उसके बाक़ी हिस्से को समझने के लिए ज़ियादा यकीन दिलाता है। सो आइये हम इस मुताला को जारी रखें।

हमारे लिए बरकत

फिर से हम इब्राहीम (अलै.) की तरफ़ से एक बड़ी क़ौम के बरपा होने के वायदे को देखते हैं जो खुद इब्राहीम (अलै.) के लिए बाईस ए बरकत है। मगर इस के अलावा और भी कुछ है यह बरकत सिर्फ़ इब्राहीम (अलै.)के लिए ही नहीं है क्यूंकि यह इबारत कहती है “ज़मीन की तमाम कौमें तेरे वसीले से बरकत पाएंगीं” (यानी इब्राहीम अलै. के वसीले से)। यह मेरे और आप के लिए गौर करने की बात है क्यूंकि आप और मैं ‘ज़मीन के तमाम लोगों का’ एक हिस्सा हैं। इससे कुछ फ़रक नहीं पड़ता कि हम किस मज़हब से ताल्लुक रखते हैं, हमारी नसल की गोशा ।ए। गुमनामी क्या है, हम कहां रहते हैं, हमारी तहज़ीबी रुतबा क्या है, या हम कौनसी ज़बान बोलते हैं वगैरा। यह वायदा हर एक के लिए है जो आज ज़िन्दा मौजूद हैं। यह वायदा आपके और मेरे लिए है। हालांकि हमारे फ़रक़ फ़रक़ मज़ाहिब, नसल बतोर गोशा।ए।गुम्नामियाँ और ज़बानें अक्सर लोगों को तकसीम करते और मुख़ालिफ़त का सबब बनाते हैं। मगर यह ऐसा वायदा है जो इन बातों पर ग़ालिब आता नज़र आता है जो आम तोर से हमको तक़सीम करता है। किस तरह? कब? किस तरह की बरकतें? यह इस मुद्दे पर साफ़ नहीं करता। मगर इस निशानी ने एक वायदे को जन्म दिया है जो इब्राहीम (अलै.) के वसीले से आपके और मेरे लिए है। जबकि हम जानते हैं कि इस वायदे का एक हिस्सा सच साबित हुआ है और हम भरोसा कर सकते हैं कि दूसरा हिस्सा जो हम पर नाफ़िज़ होता है वह भी साफ़ हो जाएगावह भी लफ्ज़ी तकमील बतोर – हमें इस को खोलने के लिए सिर्फ़ इसकी कुन्जी को ढूंढना ज़रूरी है।

हम इस बात पर गौर कर सकते हैं कि जब इब्राहीम (अलै.) ने इस वायदे को हासिल किया तो वह अल्लाह का फरमान बरदार हुआ और ….

“सो अब्राम खुदावंदके कहने के मुताबिक चल पड़ा”

पैदाइश 12:4

      इब्राहीम (अलै.) की हिजरत

ऊर से ।।> हारान ।।>कनान का मुल्क

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वायदा किया हुआ मुल्क में पहुँचने के लिए यह सफ़र कितना लम्बा था? यहाँ पर यह नक्शा इब्राहीम (अलै.) के सफ़र को दिखता है। वह असल में ऊर (मौजूदा जुनूबी इराक़) में रहता था। फिर वह हारान (मौजूदा शुमाली इराक़) में आया ।फिर उसने अपने ज़माने के कनान कि तरफ़ सफ़र किया। नक्शे में आप देख सकते हैं कि यह बहुत लम्बा सफ़र था। उसको ऊँट घोड़ा या गधे पर सवार होकर सफ़र करना था। सो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इस सफ़र को अंजाम देने में कई एक महीने लगे होंगे जब अल्लाह कि बुलाहट हुई तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने ख़ानदान को छोड़ा। अपनी ऐशो इशरत की ज़िन्दगी को छोड़ा जिसे वह मसोपतामिया में रहकर गुज़ारा करता था। मौजूदा मसोपतामिया उस ज़माने में ख़ास तहज़ीब ।ओ। तमद्दुन का मरकज़ था। उसकी मुहाफ़ज़त को लेकर और जो कुछ उसके इस सफ़र से मुताल्लिक़ मशहूर है वह यह है कि जिस तरफ़ वह सफ़र कर रहा था वह उस के लिए बिलकुल बेगाना था। जब वह अपनी मंजिल पर पहुंचा तो तोरेत हम से कहती है कि उस वक़्त उस की उम्र 75 साल कि थी!

पेश्तर नबियों की तरह जानवरों की कुर्बानियां

तौरेत हम से यह भी कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) हिफाज़त से जब कनान में पहुंचे:

“तो उसने खुदावंद के लिए एक मज़बह बनाया”

पैदाइश 12:7

एक मजबह वह है जहां हाबील और नूह (अलैहिस्सलाम) ने इस से पहले क़ुर्बानी अदा की थी। उन्होंने अल्लाह के लिए जानवरों के खून की क़ुर्बानी दी। हम देखते हैं कि नबियों ने किस तरह अल्लाह की इबादत की थी उसका यह एक नमूना था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उस नए मुल्क में दाखिल होने और सफ़र करने के लिएअपनी ज़िन्दगी के आखरी अय्याम में जोखिम उठाया था। मगर ऐसा करने के लिए उसने खुद को अल्लाह के वायदे के हाथों में सोंप दिया था ताकि खुद के लिए और दीगर तमाम लोगों के लिए बरकत का बाइस बने। और इसी लिए वह हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है। हम इब्राहीम की अगली निशानी नम्बर 2 के साथ इस मुताले को जारी रखते हैं।

लूत की निशानी

(तौरात या बाइबिल) का लूत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का भतीजा था। उसने शरारत पसंद लोगों के बीच रहना पसंद किया था। अल्लाह ने इस हालत को उस ज़माने के तमाम लोगों के लिये पैगम्बराना निशानी बतोर इस्तेमाल किया। मगर सवाल यह है कि वह निशानात क्या थे ? इस के जवाब के लिए हमको इस बयान में दिए गए फ़रक़ फ़रक़ लोगों की तरफ़ नज़दीकी से धियान देना होगा। इस बयान को तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तौरेत्त शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में देख सकते हैं कि तीन जमाअत के लोग पाए फ़ जाते हैं, इन के अलावा अल्लाह के फरिश्तों (पैगम्बरों की जमाअत)। आइये हम इन्हें बारी बारी से देखें।

सदोम के लोग

यह लोग निहायत ही गुमराह थे। यह लोग उम्मीद करते थे कि इनसानी औरतों के अलावा दूसरों की इज़्ज़त से भी खेल सकते थे (जो हक़ीक़त में फ़रिश्ते थे मगर सदोम के लोगों ने सोचा कि वह इंसान थे सो उन्हों ने उन के साथ गिरोह में होकर अस्मतदरी करने का मंसूबा किया)। इस तरह का गुनाह ऐसी संगीन बुराई थी कि अल्लाह ने सारे शहर का इंसाफ़ करने का फ़ैसला किया। फ़ैसला वही था जो इस से पहले भी आदम को दिया गया था।पीछे शुरुआत में अल्लाह ने आदम को इस फ़ैसले से ख़बरदार किया था कि गुनाह की मज़दूरी मौत है। और दूसरी तरह कि सज़ा नहीं (जैसे मारना , क़ैद करना वगेरा जो काफ़ी नहीं था। अल्लाह ने आदम से कहा था:

“….लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का फल कभी न खाना क्यूंकि जिस रोज़ तूने उस में से खाया    तू मरा।”

पैदाइश 2:17

इसी तरह से सदोम के लोगों के गुनाहों कि सज़ा यह थी कि उन लोगों को भी मरना था। दरअसल सदोम शहर के सारे लोगों को और उस में रहने वाले तमाम जानदारों को आस्मान से नाजिल आग के ज़रिये बर्बाद किया जाना था।यह एक नमूने की मिसाल है जो बाद में इंजील शरीफ़ में समझाया गया है:

  “क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी तो मौत है”

रोमियों 6:23

लूत के दामाद 

नूह के बयान में। अल्लाह ने तमाम दुनिया का फ़ैसला किया और आदम की निशानी के साथ यकसां (बराबर का सुलूक किया कि सारे लोग उस बड़े तूफ़ान के ज़रिये हलाक हुए। मगर तौरात शरीफ और कुरान शरीफ़ हमसे कहते हैं कि नूह के ख़ानदान को छोड़ सारी दुनया के लोग बुरे थे। अल्लाह ने सदोम के लोगों का भी इन्साफ़ किया जबकि वह लोग भी गुमराह और बुरे थे। सिर्फ़ इन बयानात के साथ मैं यह सोचने के लिए आज़माया जा सकता हूँ कि मैं अल्लाह के इंसाफ़ से महफूज़ हूँ क्योंकि मैं इतना बुरा नहीं हूँ जैसे कि वह लोग थे । आखिर कार मैं अल्लाह पर पूरा ईमान रखता हूँ, मैं बहुत से नेक काम करता हूँ और मैं ने कभी इस तरह के बुरे काम अनजाम नहीं दिए। तो फिर क्या मैं महफूज़ हूँ ? लूत की निशानी उस के दामादों के साथ मुझे ख़बरदार करती है। हालाँकि वह लोग इस गिरोह में शरीक नहीं थे जो एक गिरोह में होकर जिंसी गुनाह (असमतदरी) अंजाम देने की कोशिश कर रहे थे किसी तरह से उन्हों ने आने वाले इंसाफ़ की तंबीह को संजीदा तोर से नहीं लिया। दरअसल तौरेत शरीफ़ हम से कहती है, लोग  सोच रहे थे कि ‘(वह) लूत उन से मज़ाक़ कर रहा था’। मगर सवाल यह है कि क्या उन की किस्मत शहर के दुसरे लोगों से फ़रक़ थी ? नहीं ! वह उन्हीं की किस्मत में शरीक हुए। अंजाम बतोर लूत के दामादों और सदोम के बुरे लोगों उन दोनों में कोई फ़रक नहीं था। यहाँ निशानी यह है कि हर एक शख्स को इस तंबीह को संजीदा तोर से लेना ज़रूरी था क्यूंकि वह न सिर्फ़ गुमराह लोग थे।

लूत की बीवी          

लूत की बीवी हमारे लिए एक बड़ी निशानी है। तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में ही वह भी दीगर शरीर लोगों के साथ हलाक हुई – वह एक नबी की बीवी थी – मगर लूत के साथ उसका एक ख़ास रिश्त्ता होते हुए भी वह रिश्ता बचा न सका हांलांकि वह सदोम के लोगों के साथ उस बड़े गुनाह में शामिल नहीं थी। उसने फ़रिश्ते के हुक्म को तोड़ा:

              ‘तुम में से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे’ (सूरा 11:81) सूरा ।ए। हूद या

              ‘पीछे मुड़कर न देखना’ (पैदाइश 19:17)

तौरेत हम से कहती है कि

 लेकिन लूत की पत्नी ने वापस देखा, और वह नमक का एक स्तंभ बन गई।

उत्पत्ति १ ९: २६

उसके “पीछे मुड़ कर देखने” का असल मक़सद क्या था उसे समझाया नहीं गया है मगर उस ने सोचा कि अल्लाह के इस छोटे से हुक्म को नज़र अंदाज़ करदेने से कोई ख़ास फ़रक नहीं पड़ेगा – उसकी किस्मत – उसके “छोटे” गुनाह के साथ वैसा ही था जैसा कि सदोम के लोगों का “बड़ा” गुनाह उन के लिए मौत बन कर आई थी। यह हमारे लिए कुछ ऐसी ज़रूरी निशानी है जो कभी कभी यह सोचने से दूर रखती हैं कि यह छोटे गुनाह हैं जिन्हें अल्लाह हिसाब में नहीं लाएगा (इन का इंसाफ़ नहीं होगा) — लूत की बीवी इस ग़लत सोच के खिलाफ़ तम्बीह के लिए हमारी निशानी है:

लूत, अल्लाह और फ़रिश्ते पैग़म्बरान 

जिसतरह हम ने आदम की निशानी में देखा था कि जब अल्लाह ने आदम का इंसाफ़ किया था तो उस ने तो उसने उस पर अपना फ़ज़ल भी अता किया था। और वह इंसाफ़ था उन के लिए चमड़े के पोशाक का इनायत किया जाना। नूह के साथ जब अल्लाह ने इंसाफ़ किया तो उसने फिर से एक बड़ी कश्ती के साथ फ़ज़ल अता किया। फिर से एक बार अल्लाह यहाँ तक कि अपने इंसाफ़ में बा ख़बर है कि वह इंसाफ़ अता करता है ।इसको तौरेत ने इसतरह बयान किया है कि:

जब वह (ल्यूक) हिचकिचाया, तो पुरुषों (स्वर्गदूत जो पुरुषों की तरह दिखते थे) ने अपना हाथ और अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के हाथों को पकड़ लिया और उन्हें सुरक्षित रूप से शहर से बाहर ले गए, क्योंकि प्रभु उनके लिए दयालु थे।

उत्पत्ति १ ९: १६

इससे हम क्या सीख सकते हैं? से पीछे की निशानियों की तरह फ़ज़ल आलमगीर था मगर सिर्फ़ एक तरीके के ज़रीये ही अता किया जाना था। लूत के ख़ानदान को शहर से बाहर रहनुमाई करते हुए अल्लाह ने रहम करके मिसाल के तोर पर शहर के अन्दर एक ऐसी पनाहगाह का इंतज़ाम नहीं किया जो आसमान से आग नाज़िल होने पर उनकी मुहाफ़िज़त हो सके। अल्लाह की तरफ़ से रहम हासिल करने का एक ही रास्ता था – कि शहर से बाहर फ़रिश्तों के पीछे चलो। अल्लाह ने लूत और उसके खानदान पर इसलिए रहम नहीं किया क्यूंकि लूत एक कामिल शख्स था। दरअसल तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ इन दोनों में हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों को अस्मतदरी करने वालों के हाथ सोंपने जा रहा था। यह एक शरीफ़ाना पेशकश नहीं थी। तौरेत हमसे कहती है कि फरिशतों के ख़बरदार किये जाने पर भी लूत ‘हिचकिचाया’। इन सब के बावजूद भी अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिये उसका हाथ पकड़ कर शहर के बाहर लेजाने के ज़रिये उसपर अपना रहम ज़ाहिर करता है। यह हमारे लिए एक निशानी है : अल्लाह हम पर रहम इनायत करेगा, यह हमारी भलाई पर मुनहसर नहीं है। मगर हम लूत की मानिंद जो हमारे सामने है रहम हासिल करने की ज़रुरत है जिस से हमारी मदद हो – लूत के दामादों ने इसे हासिल नहीं किया और उन्हें इससे कोई फाइदा हासिल नहीं हुआ।

तौरेत हम से कहती है कि अल्लाह ने लूत के चचा, एक बड़े नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबब से जिसने उसके लिए अल्लाह से इल्तिजा करी थी उस पर अपना रहम ज़ाहिर किया – (यहाँ पैदाइश की इबारत को देखें) तौरेत शरीफ़ इब्राहिम (अलै.) के निशानियों के वसीले से अल्लाह की  जानिब से वायदों को को जारी रखती है कि “तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब क़ौमें बरकत पाएंगीं क्यूंकि तू ने मेरी बात मानी” (पैदाइश 22:11)। यह वायदा हमको चौकन्ना कर देना चाहिए इसलिए कि कोई फ़रक़ नहीं पड़ता कि हम कौन हैं, कौन सी ज़बान हम बोलते हैं, हम किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, या हम कहां रहते हैं वगैरा हम मालूम कर सकते हैं कि आप और मैं ‘ज़मीन की तमाम कौमों का’ एक हिस्सा हैं।अगर इब्राहिम की इल्तिजा के ज़रिये अललाह ने मुतहर्रिक होकर लूत पर रहम ज़ाहिर किया हालांकि वह इस के लिए काबिल नहीं था तो कितना ज़ियादा इब्राहीम (अलै.) की निशानियां हम पर रहम ज़ाहिर करेंगीं जो कि हम भी ‘तमाम कौमों में से’ एक हैं? इसी सोच के साथ हम तौरेत में इब्राहीम की निशानियों को देखते हुए आगे बढ़ेंगे।

नूह की निशानी

हम तारीक़ी सिलसिले को शुरू से जारी रखेंगे (मिसाल के तौर पर आदम/हव्वा और काबील/हाबील) और अब तौरेत में हमारा अगला तवज्जो के क़ाबिल न्काबी है नूह (अलैहिस्सलाम) जो आदम के ज़माने के 1600  बाद रहा करता था। बहुत से लोग मशरिक में नूह (अलैहिस्सलाम) की कहानी को जानते हैं और इनकार न करने लायक़ सैलाब की  बाबत कहानी को भी जानते हैं। मगर दुनिया तिलछट के तौर पर चट्टानों से ढका हुआ है जो कि कहा जाता है कि ऐसा सैलाब के दौरान ही तिलछट के जमा होने ज़रिये शक्ल इख्तियार करता है। सो हमारे पास इस सैलाब का माद्दी सबूत मौजूद है मगर सवाल यह है कि नूह की क्या निशानी थी जिस पर हमको गौर करने की ज़रुरत है? अब नूह (अलैहिस्स्सलाम)के बयान को तौरात और कुरान में पढ़ने के लिए यहां पर किलिक करें-

ग़ैब हो जाना  मुक़ाबिल  रहम हासिल करना

जब मैं मशरिकी लोगों से अल्लाह के इंसाफ़ की  बात करता हूँ तो अक्सर मुझे कुछ इस तरह के जवाब सुनने को मिलते हैं,  “मैं इंसाफ़ के लिए इतना ज़ियादा फ़िकर मंद नहीं हूँ क्यूंकि अल्लाह इतना ज़ियादा रहम करने वाला है कि मैं नहीं सोचता कि वह सच मुच मेरा इंसाफ़ करेगा।” यह वह नूह (अलैहिस्स्स्लाम) का बयान है जो एक सबब के लिए सवाल खड़ा करता है। जी हाँ। अल्लाह बहुत ज़ियादा रहम करने वाला है। वह अपने सिफ़त में बदलता नहीं है, और इस में कोई शक नहीं कि वह नूह (अलैहिस्स्सलाम) के ज़माने में भी रहम करने वाला था। इस्के बावजूद भी (नूह और उसके खानदान को) छोड़ तमाम दुनया अल्लाह के इंसाफ़ के तहत तबाह व बर्बाद हो गयी थी। 

अपने पापों के कारण वे डूब गए और उन्हें आग में डाल दिया, और उन्होंने अपने लिए अल्लाह [कोई भी] मददगार नहीं पाया सूरा नूह

सूरा 71 – नूह हमें बताती है कि

तो फिर उस का इंसाफ़ कहां गया? उसका इंसाफ़ उस कश्ती में मौजूद था। जिस तरह हम कुरान शरीफ़ में पढ़ते हैं:

            हम (अल्लाह) ने उसे (नूह पीबीयूएच) दिया, और उन लोगों को आर्क में

द हाइट्स 7:64

अल्लाह ने अपने रहम में होकर नबी नूह (अलैहिस्सलाम) का इसतेमाल करते हुए एक कश्ती का इन्तिज़ाम किया जो किसी के लिए भी दस्तियाब था। हर कोई उस कशती में दाखिल हो सकता था और खुद के लिए रहम और मह्फूज़ियत को हासिल कर सकता था। मगर एक संजीदा मसला यह था कि नूह के खानदान को छोड़ तक़रीबन सब लोग ख़ुदा के पैग़ाम पर ईमान नहीं लाए थे। और ईमान लाना तो दूर उल्टा नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाया और आने वाले इंसाफ़ की बाबत भरोसा नहीं किया। अगर यह सब न करते हुए सिर्फ़ कश्ती में दाखिल भी हो जाते तो वह लोग अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाते।

कुरान शरीफ़ की इबारत भी हमसे कहती है कि नूह का एक बेटा अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान नहीं लाया था। हक़ीक़त में वह एक पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। वह सोच रहा था कि ऐसा करके वह अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाएगा। मगर फिर से यहाँ पर एक परेशानी थी। वह अपने ईमान को मख्सूसियत के साथ जोड़ नहीं पाया था और इस चुनाव का फ़ैसला नहीं कर पाया था। उसने इंसाफ़ से बचने के लिए अपने तरीके का इस्तेमाल किया। मगर उस के बाप ने उससे कहा:

“आज के दिन तुझे अल्लाह के हुक्म से कोई चीज़ बचा नहीं सकती मगर उन्हीं को जिन पर उसने अपना रहम ज़ाहिर किया      है!”

हूद 11:43

उस बेटे को अल्लाह के रहम की सख्त ज़रुरत थी न कि खुद की अपनी कोशिश जो उसे इंसाफ़ से बचा सकती थी। दर हक़ीक़त पहाड़ पर चढ़ने की उस की कोशिश फुज़ूल और बे हासिल था। इसलिए इस का अंजाम भी उन लोगों के साथ ही था जो नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाते थे। और उनका मज़ाक़ उन्हें पानी में डूब कर मरने पर मजबूर किया।  यह सब कुछ करने से बेहतर अगर वह अपने बाप के साथ कश्ती में दाखिल हो जाता तो अल्लाह के इंसाफ से बच सकता था। इस बयान से हम मालूम कर सकते हैं कि सिर्फ़ अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान लाना ही काफ़ी नहीं था कि सैलाब से बच जाते। दर असल अल्लाह जो रहम इनायत करता है उस के लिए मखसूस हो जाना य सुपुर्द करना भी ज़रूरी होता है बनिस्बत इस के कि हमारे अपने ख़यालात को इस में शामिल करें कि हम यकीनी तौर से अल्लाह के रहम को हासिल कर लेंगे। सो – कश्ती हमारे लिए ‘नूह’ की निशानी है। सच पूछा जाए तो यह सरे आम यानी कि खुल्लम खुल्ला अल्लाह के इंसाफ़ की निशानी थी और साथ ही बचने और उस के रहम का ज़रिया भी था। क्यूंकि नूह के जमाने के लोगों में से हर किसी ने उस किश्ती को तैयार होते हुए देखा था। इस लिए यह आने वाले इंसाफ़ का और रहम की दस्तियाबी दोनों के लिए ‘खुल्लम खुल्ला’ निशानी था। मगर यह दिखता है कि उस के रहम का हुसूल उस फ्राह्मी के ज़रिये ही मुमकिन था जिसे अल्लाह ने पहले से इंतज़ाम किया हुआ था।

सो नूह ने अल्लाह के रहम व फ़ज़ल को क्यूँ हासिल किया? तौरेत बहुत बार इस मुहावरे को दोहराती है कि

            “नूह ने उन सब कामों को अंजाम दिया जो खुदावंद ने उसे हुक्म दिया था”

मैं यह पाता हूँ कि मैं उसी काम को करने पर माइल होता हूँ जो मैं समझता हूँ या जो मैं चाहता हूँ या जिस से मैं राज़ी होता हूँ।  मुझे यकीन है कि – नूह (अलैहिस्सलाम) के दिल में भी सैलाब के आने की इतला (तंबीह) और सूखी ज़मीन पर एक बड़ी कश्ती के तामीर के लिए अल्लाह के हुक्म को लेकर कई एक सवाल उस के दिल ओ दमाग में रहे थे होंगे। मगर मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि दीगर लोगों की बनिस्बत नूह एक रास्त्बाज़ शख्स था उसने कश्ती बनाने के मामले में कोई धियान नहीं दिया। मगर उस ने वही सब किया जो उस को अल्लाह की तरफ़ से हुक्म मिला था इस बिना पर नहीं कि उस के बाप ने उसे क्या सिखाया था या इस बिना पर नहीं कि उस ने अपनी ज़िन्दगी में क्या सीखा और समझा था। इस बिना पर नहीं कि उन चीज़ों से जिन से वह मुतमइन था और इस बिना पर भी नहीं कि यह उस के लिए क्या मायने रखता है। सो यह बातें हमारे लिए बड़ी मिसालें यानी कि नमूने हैं जिन के पीछे हमें चलने की ज़रुरत है।

नजात के लिए दरवाज़ा

तौरात हम से यह भी कहती है कि नूह, उसका ख़ानदान और तमाम जानवरों के कश्ती में दाखिल होने के बाद (सवार होने बाद)

            “खुदावंद ने बाहर से उस कश्ती का दरवाज़ा बंद कर दिया था”

पैदाइश 7:16

यह अल्लाह ही था जिसने कश्ती के उस एक दरवाज़े पर काबू रखा हुआ था न कि नूह (अलैहिस्सलाम) ने जब इंसाफ़ की बिना पर ज़मीन पर पानी आया तो बाहर से लोग कश्ती को किसी तरह का नुख्सान नहीं पहुंचा सकते थे न ही उसका दरवाज़ा खोल सकते थे क्यूंकि अल्लाह उस एक दरवाज़े को पूरी तरह से काबू में रखा हुआ था। मगर उसी वक़्त जो अन्दर मौजूद थे वह इस यकीन के साथ आराम से रह सकते थे कि अल्लाह ने कश्ती के दरवाज़े पर काबू कर रखा है इस लिए कोई हवा या मौज उस दरवाज़े को खोल नहीं सकती थी। वह लोग अल्लाह की हिफाज़त और उसके रहम में महफूज़ थे।

इसलिए कि अल्लाह बदलता नहीं है यह बात आज भी हमारे लिए नाफ़िज़ होती है। तमाम नबियों ने ख़बरदार किया है कि एक और इंसाफ़ का दिन आने वाला है। और यह आग के साथ आएगा मगर नूह (अलैहिस्सलाम) की  निशानी हमको यक़ीन दिलाती है कि उस के इंसाफ़ के साथ वह अपना रहम भी पेश करेगा। मगर हमको एक दरवाज़े के साथ उसके कश्ती की राह देखनी है जो हमको रहम हासिल करने की ज़मानत देगा।

अंबिया की क़ुर्बानी

तौरात हमसे यह भी कहती कि

   तब नूह ने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई। उसने कुछ शुद्ध पक्षियों और कुछ शुद्ध जानवर  को लिया और उनको वेदी पर परमेश्वर को भेंट के रूप में जलाया।

पैदाइश 8:20

यह आदम/हव्वा और क़ाबील/हाबील के जानवरों कि क़ुर्बानी के नमूने के लिए मुनासिब बैठता है। इस का मतलब यह है कि एक बार फिर एक जानवर की मौत और उस के खून के छाने जाने के ज़रिये नूह (अलैहिस्सलाम) ने दुआ की और अल्लाह के ज़रिये वह दुआ क़बूल की गई। “और ख़ुदा ने नूह और उसके बेटों को बरकत दी” (पैदाइश 9:1) “और नूह के साथ एक अहद बांधा” (पैदाइश 9:8) कि वह आइन्दा से कभी भी पानी के सैलाब के ज़रिये लोगों का इंसाफ नहीं करेगा। तो ऐसा लगता है कि नूह के ज़रिए क़ुर्बानी , मौत और एक जानवर के खून का छाना जाना अल्लाह की इबादत में बहुत दिक्कतें लेकर आ रही थीं। इस के बावजूद भी यह कितनी अहम् बात है। हम तौरेत के नबियों के वसीले से अगली बार लूत के साथ इस जायज़ा को जारी रखेंगे।