क़ाबील और हाबील की निशानी

इस से पहले के मज़मून में हम ने आदम और हव्वा के निशानात पर गौर किया था जिन्होंने तशद्दुद के साथ एक दुसरे का सामना किया था। यह खानी है इंसानी तारीक़ में पहले क़त्ल की – मगर हम भी इस कहानी से आलमगीर कायदों को सीखना चाहते हैं ताकि उन की निशानी से समझ हासिल कर सकें। सो आइये हम इसे पढ़ें और सीखें। (यहां पर किलिक करें ताकि दुसरे विंडो पर इबारत को खोल सकें।

क़ाइन और हाबील (क़ाबील और हाबील) दो बेटे दो कुर्बानियों के साथ

तौरेत में आदम और हव्वा केदो बेटों को क़ाइन और हाबील नाम दिया गया है। कुरान शरीफ में ऐसा नहीं लिखा है कि इन दोनों का नाम रखा गया मगर इस्लामी रिवायत के मुताबिक वह दोनों काबील और हाबील के नाम से जाने जाते हैं। उन दोनों ने अल्लाह के किये क़ुर्बानी पेश की। मगर हाबील की क़ुर्बानी को क़बूल किया गया जबकि क़ाइन की क़ुर्बानी को क़बूल नहीं किया गया। सो क़ाइन ने हसद में आकर अपने भाई का क़त्ल कर डाला। मगर वह अल्लाह से अपने जुर्म की शरमिन्दगी को नहीं छिपा पाया। इस बयान से अहम् सवाल यह उठता है कि हाबील की क़ुर्बानी क्यूं क़बूल हुई और काइन की क्यूं नहीं? बहुत से दोनों भाइयों के फ़रक बात को लेकर अंदेशा ज़ाहिर करते हैं मगर बयान का बगोर मुताला हमको मुख्तलिफ तौर से एक अलग सोच की तरफ ले जाएगा। तौरेत इस बात को साफ़ करती है कि लाइ गई क़ुरबानियों में एक ख़ास फ़रक को देखा गया। क़ाइन ने ज़मीन के फ़सल (मिसाल के तौर पर फलों और तरकारियों) की क़ुरबानी ले आया जबकि हाबील ने गल्ले के पह्लोठों की चरबी का हिस्सा लेकर आया था। इस का मतलब यह है कि हाबील ने एक जानवर को ज़बह किया था। वह भेड़ या बकरी का हो सकता है मगर खुद के गल्ले का था।

यहाँ हम आदम की निशानी के लिए एक मुतवाज़ी बात को देखते हैं। आदम ने अपनी शरमिन्दगी को पेड़ के पत्तों से ढांकने की कोशिश की थी मगर जानवर का चमड़ा (जानवर की मौत) उनके लिए एक कारामद और असरकारक सर्पोश (ढांकने की चीज़) बना- पत्ते , फल और तरकारियों में खून नहीं होता और उन में वैसी ज़िन्दगी भी नहीं होती जैसी जानवरों या इंसानों में होती है। जिस तरह खून से ख़ाली पत्तों का सर्पोश (ढांका जाना) आदाम के लिए काफ़ी नहीं था इसी तरह खून से खाली फल तरकारी की क़ुर्बानी भी जो क़ाइन के ज़रिये पेश कि गई थी वह क़बूल करने के लायक़ नहीं था। जबकि हाबील की चर्बियों की क़ुर्बानी का मतलब था कि एक जानवर का खून बहाया गया था और खून को छाना गया था जिस तरह कि उस जानवर का खून भी असलियत में बहाया और छाना गया ताकि आदम और हव्वा के नंगे जिस्म को ढांक सके।

इस निशानी की शायद हाँ ख़ुलासा कर सकते हैं एक इज़हार के ढंग के साथ जो मैं ने बचपन में सीखा था: ‘जहन्नुम के रास्ते को अच्छे इरादों’ के साथ हमवार बनाया और साफ किया जा सकता है। वह इज़हार क़ाइन के लिए मुनासिब नज़र आता है। वह अल्लाह पर ईमान लाया था और उसने अपने ईमान को एक क़ुर्बानी के ज़रिये अल्लाह के हुज़ूर में आने के साथ ज़ाहिर किया। इस के बावजूद भी अल्लाह ने उसकी क़ुर्बानी को क़बूल नहीं किया और इस तरह से अल्लाह नेउसको शख्सी तौर से भी क़बूल नहीं किया। मगर क्यूं? क्या उस का बर्ताव बुरा था? ऐसा कलाम नहीं कहता कि शुरू में उसने ऐसा कोई काम नहीं किया। यह हो सकता है कि अल्लाह के लिए उस के दिल में बहतरीन से बहतरीन इरादे और  बर्ताव थे। आदम की निशानी में उस का बाप हमें ख़यालात का एक सिलसिला (इशारा) पेश करता है।  जब अल्लाह ने आदम और हव्वा का इंसाफ किया तो उस ने उन्हें फानी बनाया -इसतरह से मौत उनके लिए एक क़ीमत थी।  फिर अल्लाह ने उन के लिए एक निशानी दी -पोशाक (जो चमड़े का था) जो जानवर से आया था जिन से उनके नंगे पन को ढांका गया। मगर इस का मतलब यह है कि उस जानवर को सवालिया तौर पर मरना ज़रूरी था। सो एक जानवर मरा और उसका खून छाना गया ताकि आदम और हव्वा की शर्मिंदगी को ढांका जाए, और अब उन के बेटे कुरबानी ले आए मगर सिर्फ़ हाबील की कुरबानी जो (गल्ले के जानवर की चरबी) मंज़ूर की गयी क्यूंकि इस क़ुरबानी के लिए मौत की, खून बहाने और छाने जाने की ज़रूरत थी। ‘ज़मीन के फल तरकारियाँ’ मर नहीं सकती थीं क्यूंकि उन में ‘ज़िन्दगी’ नहीं थी और इसी तरह छाने जाने के लिए उन में खून भी नहीं था।

हमारे लिए निशानी:

खून का बहाया जाना और छाना जाना

यहाँ अल्लाह हमको एक सबक़ सिखाता है।  यह हम पर मुनहसर करता है यह फ़ैसला करने के लिए कि किस तरह हम अल्लाह के पास पहुंचें। वह एक मे’यार मुक़र्रर करता है और हम फ़ैसला करते हैं कि इस मे’यार के लिए हम मखसूस हैं या नहीं और वह मे’यार यहाँ पर एक क़ुरबानी है जो मरता है, खून बहाता है और उस के खून को छानता  है। मै शायद किसी और ज़रुरत को पहला मक़ाम दूँ क्यूंकि फिर मैं उसे अपने खुद के ज़रायों से दे सकूं। मैं अपना वक़्त दे सकता हूँ, अपनी ताक़त, अपने पैसे, अपनी दुआएं, अपनी मख्सूसियत दे सकता हूँ मगर अपनी ज़िन्दगी नहीं दे सकता। मगर वह – क़ुरबानी का खून – जो अल्लाह को हूबहू ज़रुरत है इस के अलावा दीगर चीजें किसी भी तरह  से काफी नहीं हैं। अगर यह क़ुर्बानी का नमूना यूँ ही जारी रहता है तो कामयाब नबुवती निशानियाँ देखने में दिलचस्प साबित होगा।

आदम की निशानी

आदम और उस की बीवी हव्वा जबकि अल्लाह की तरफ़ से बनाए गए थे बे मिसल हैं। और वह बाग़ -ए- अदन में रहते थे। इस लिए वह हमारे सीखने के लिए अहम निशानी रखते हैं। कुरान शरीफ़ में दो इबारतें हैं जो आदम की  बाबत कहते हैं – एक तौरात में (यहाँ उन्हें पढ़ने के लिए किलिक करें)-

यह बयानात बहुत ही एक जैसे हैं – दोनों बयानात में शख्सियतें जो पह्चानी गई हैं वह हैं : (आदम, हव्वा, शैतान (इब्लीस) और अल्लाह ; दोनों बयानात में जगह एक ही है (बाग़); दोनों बयानत में शैतान (इब्लीस) झूट बोलता है और आदम और हव्वा से चालाकी करता है। दोनों बयानात में आदम और हव्वा अपने नंगे पन की शरमिन्दगी को छिपाने के लिए पेड़ के पत्तों का इस्तेमाल करते हैं फिर अल्लाह आकर उन से इंसाफ़ की बात करता है ; दोनों बयानात में अल्लाह उन्हें चमड़े का लबादा (यानी कि पोशाक) अता करने के ज़रिये उन पर रहम ज़ाहिर करता है ताकि उनके नंगेपन की ‘शर्मिंदगी’ को ढांक सके कुरान शरीफ़ कहता है यह ‘अल्लाह की निशानी’ ‘आदम की औलाद’ के लिए है -यानी हमारे लिए – इसलिए यह सिर्फ़ माज़ी में हुए मज़हबी वाक़िया की बाबत तारीक़ का सबक नहीं है। हम आदम की कहानी से बहुत कुछ सीख सकते हैं

आदम की तंबीह हमारे लिए

अल्लाह के इनसाफ़ किये जाने से पहले आदम और हव्वा ने सिर्फ़ नाफ़रमानी के गुनाह के लिए मख़सूस किया था ऐसा नहीं है। मिसाल के तौर पर अल्लाह के साथ दस नाफ़रमानी के गुनाह के लिए जो नौ तंबीह दे रहा है और फिर आख़िरकार इंसाफ़ कर रहा है। अल्लाह ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी के अमल के लिए इंसाफ़ किया। बहुत से लोग यकीन करते हैं कि अल्लाह बहुत से गुनाह करने के बाद ही उनका इंसाफ करेगा। वह सोचते हैं कि अगर उन्हों ने बहुतों की बनिस्बत “कम गुनाह” किये हैं या उनके नेक आमाल बुरे आमाल से ज़ियादा हैं तो फिर (शायद) ख़ुदा इनसाफ़ नहीं करेगा। आदम और हव्वा का तजरुबा हमारी तंबीह करता है यह ऐसा नहीं है बल्कि अल्लाह हर एक नाफ़रमानी के गुनाह के लिए इंसाफ़ करेगा।

यह हमें एहसास दिलाता है कि अगर हम अल्लाह के लिए नाफ़रमानी का मवाज़िना करते हैं तो एक कौम के कानून को तोड़ने के साथ नाफ़रमानी करते है। केनडा में जहाँ मैं रहता हूँ, अगर मैं सिर्फ़ एक कानून को तोड़ता हूँ (मिसाल के तौर पर अगर मैं कोई चीज़ चोरी करता हूँ) तो मुल्क मेरा इंसाफ़ कर सकता है।  मैं यह नालिश नहीं कर कर सकता कि मैंने सिर्फ़ एक ही कानून को तोड़ा है।  मैं ने क़त्ल करके या किसी को भगाकर ले जाने से कानून को नहीं तोड़ा है। मुझे सिर्फ़ एक कानून के तोड़े जाने के लिए केनडा में इंसाफ़ का सामना करना पड़ेगा। यही बात तो अल्लाह के लिए भी नाफ़िज़ होता है।

जब आदम और हव्वा पत्तों के ज़रिये खुद से ढांके गए तो हम देखते हैं कि वह इस के बाद भी शर्मिंदगी का एहसास करते और अपने नंगेपन को ढांकने की नाकाम कोशिश करते थे।  इसी तरह जब हम ऐसा काम करते हैं जिस से शरम महसूस होती है तो हम उसे ढांकने या दूसरों से छिपाने की कोशिश करते हैं।  मगर आदम और हव्वा की  कोशिश ख़ुदा के सामने बेकार और नाकाम थी और अल्लाह उनकी नाकामी को देख सकता था। तब फिर दोनों ने ढोंग किया और ख़ुदा से बात की।

इंसाफ़ की बिना पर अल्लाह के कारगुज़ारमगर रहम के साथ

हम तीन कारगुज़ार देख सकते हैं :

1 अल्लाह उन्हें फ़ना पिजीर बनाता है – अब वह मर्मर जाएंगे।

2 अल्लाह उन्हें बाग़ से निकाल देता है  – उन्हें अब बहुत ज़ियादा तकलीफ़ के साथ ज़मीन पर ज़िन्दगी जीना पड़ेगा।

3 अल्लाह उन्हें चमड़े के पोशाक देता है।

यह बहुत ही अफ़सोस की बात है कि हम सब के सब आज के दिन तक इन से असर पिजीर हैं। हर कोई मरता है; कोई भी शख्स यहां तक कि कोई नबी भी आज तक बाग़ में वापस नहीं गया; हर एक शख्स लगातार कपड़े पहनता है। दरअसल यह तींन बातें बहुत ही मामूली हैं फिर भी इस बात को गौर करने से चूक जाते हैं कि जो अल्लाह ने आदम और हव्वा के साथ किया वह हज़ारों सालों के बाद भी उस का एहसास किया जाता है। जो कुछ अदन के बाग़ में वाक़े हुआ उस का अंजाम आज भी असर करक होते हुए नज़र आता  है।

अल्लाह कि तरफ़ से पोशाक का दिया जाना उनके लिए इनाम है। उनकी शर्मिंन्दगी अब ढकी जा चुकी है। जी हाँ। अल्लाह ने इंसाफ़ किया है। मगर साथ ही उसने मेहरबानी भी की है जो कि उसे नहीं करना चाहिए था। आदम और हव्वा ने पोशाक का ‘अतियया’ उन के अच्छे बर्ताव के सबब से हासिल नहीं किया बल्कि उनकी नाफ़रमानी की उजरत में हासिल किया। आदम और हव्वा अल्लाह के उस इनाम को सिर्फ़ बगैर किसी लियाक़त और मुस्तहक होने के ही हासिल कर सकते थे। मगर इसके लिए किसी ने क़ीमत अदा की थी। तौरेत हम से कहती है कि वह पोशाक ‘चमड़े’ के थे। इस तरह से वह एक जानवर से आए थे। इस नुक्ते पर आने तक कहीं भी मौत नहीं थी मगर अब एक जानवर का चमड़ा जो ढंकने के लिए पोशाक बना उस ने क़ीमत अदा की। अपनी ज़िन्दगी की क़ीमत! एक जानवर मरा ताकि ताकि आदम और हव्वा अल्लाह कि तरफ़ से रहम हासिल करे।

क़ुरान शरीफ़ कहता है कि उस पोशाक ने उनकी शर्मगाह को ढांका। मगर हक़ीक़त में अगर ज़रुरत थी तो उनकी रास्त्बाज़ी को ढांका जाना था। और किसी तरह (चमड़े का) यह लिबास उस रास्त्बाज़ी की एक निशानी थी और एक निशानी हमारे लिये :

            “ऐ आदम की औलाद! हमने तुमको लिबास अता किया है ताकि तुम अपनी शर्मिंदगी को ढांको, और यह तुम्हारे लिए आराइश के लिए भी है- मगर रास्त्बाज़ी का लिबास सब से बेहतरीन है। यह अल्लाह कि निशानियों में से एक है उनके लिए    जो हमारी हिदायतें हासिल करते हैं”

सूरा-7:26 (इरतिफ़ा)

एक अच्छा सवाल है: कि हम इस “रास्त्बाज़ी के लिबास” को कैसे हासिल करते हैं? बाद के अंबिया इस अहम सवाल के जवाब को पेश करेंगे।

इंसाफ़ और रहम की बिना पर अल्लाह के अलफ़ाज़

अल्लाह न सिर्फ़ यह तीन चीजें आदम और हव्वा के लिए और हमारे लिए (उनके फ़रज़न्दों के लिए) करता है बल्कि वह अपने कलाम के ज़रिये से बात भी करता है। दोनों बयानात में अल्लाह दुश्मनी की बात करता है। मगर तौरेत में यह जोड़ दिया गया है कि यह दुश्मनी औरत और सांप (शैतान)के दरमियान होगी। यह ख़ास पैग़ाम फिर से ज़ेल में दिया गया है -इसको मैंने ब्रेकट () के अन्दर लिख दिया है ताकि इस का हवाला देख सकें। अल्लाह कहता है :

“और मैं (अल्लाह) तेरे (शैतान) और औरत के दरमियान, तेरी नसल और औरत की नसल के दरमियान अदावत डालूँगा। वह तेरे (शैतान) के सिर को कुचलेगा, और तू (शैतान) उसकी (औरत के नसल) की एड़ी पर काटेगा।

पैदाइश 3:15

यह एक पहेली जैसी लगती है मगर समझने लायक़ है। गौर से पढ़ने पर आप देखेंगे कि यहाँ पर पांच फ़रक फ़रक शख्सियतों का ज़िकर किया गया है और यह नबुवत बतौर है जिस में आप आगे के ज़माने की बातें देख सकते हैं यानी (मुस्तक़बिल के ज़माने को दुहराया गया है) यह शख्सियतें हैं :

1. ख़ुदा (या अल्लाह)

2. शैतान (या इब्लीस)

3. औरत

4. औरत की नसल

5. शैतान की नसल

और यह पहेली एक नक्शा बनती है कि यह शख्सियतें मुताक्बिल में किस तरह एक दुसरे से ताल्लुक रखेंगे इसे नीचे दिखाया गया है :

शख्सियतें और उनके ताल्लुकात अल्लाह के वायदे में जो जन्नत में दिया गया था।

यहां यह नहीं कहा गया है कि औरत कौन है -मगर ख़ुदा यहाँ पर शैतान की ‘नसल’ और औरत की नसल की बात करता है। यह पोशीदा है। मगर हम औरत की ‘नसल’ की बाबत एक बात जानते हैं कि नसल को ‘वह’ और ‘उसे’ बतौर इशारा किया गया है जो कि वाहिद और नरीना इंसान है। इस समझ के साथ हम एक पतता छांट सकते हैं मतलब एक मुमकिन तर्जुमा निकाल सकते हैं कि ‘वह’ का इशारा एक औरत से नहीं बल्कि एक मर्द से है जो औरत की नसल से है। इसको जमा के सेगे में (यानी कि वह सब) करके भी नहीं लिखा गया है। तो यह ज़ाहिर है कि ‘नसल’ लोगों की एक जमाअत भी नहीं है चाहे वह क़ौमी पेहचान की तरफ़ इशारा करता हो या किसी कौम के लोगों को, और यह नसल (यह, वह) यानि ज़मीर से भी ताल्लुक़ नहीं रखता बल्कि यह एक शख्स को ज़ाहिर करता है (मतलब यह कि यह नसल एक शख्स है) हालाँकि यह ज़रूरी नज़र आए यह उस मुमकिन को निकाल फेंकता है कि यह नसल एक फ़लसफ़ा, ता’लीम या मज़हब है। सो यह नसल (मिसाल के तौर पर) मसीहियत या इस्लाम नहीं है क्यूंकि अगर यह ऐसा होता तो (यह, वह) यानी ज़मीर को ज़ाहिर करता, और यह लोगों की जमाअत भी नहीं है जिस तरह यहूदियों की मसीहियों की या मुसलमानों की जमाअत होती है। अगर होता तो ‘वह सब’ का लफ्ज़ इस्तेमाल होता।  हालाँकि अभी भी यह पोशीदा है कि ‘यह नसल’ कौन है। जबकि हम नेकई एक मुम्किनात को हटा दिया है ताकि यह क़ुदरती तौर से हमारे दिमाग़ में आए।

हम इस वायदे के मुस्तक़बिल के ज़माने के नज़रिए से देखें तो यह एक मनसूबा है जो अल्लाह कि हिकमत में तजवीज़ की गई थी कि यह “नसल” शैतान के सर को कुचलेगा।  मतलब यह कि वह उस को (पूरी तरह से बर्बाद कर देगा) जबकि उसी वक़्त शैतान उसको एड़ी पर काटेगा। इस नुक़ते पर देखा जाए तो इस भेद के मतलब को साफ़ नहीं किया गया है मगर हम जानते हैं कि यह ख़ुदा का एक मंसूबा है जो ज़ाहिर होकर रहेगा।

अब गौर तलब बात यह है कि अल्लाह यह बात आदम से नहीं कहता और ऐसा भी नहीं लगता कि वह इस ख़ास नसल के वायदे को औरत से कहता है। यह बहुत ही हैरत अंगेज़ और ग़ैर मामूली तौर से तौरेत, ज़बूर और इंजील में और ख़ास तौर से नबियों की किताबों में जोर दिया गया है। इन तीनों में जो नसबनामे दिए गये हैं वह तक़रीबन ज़रा हट कर क़लमबंद किया गया है कि जो फ़र्ज़न्द हैं वह सिर्फ़ बापों से आते हैं। मगर इस नसल का वायदा जो बाग़ में किया गया था यह बिलकुल फ़रक है। ऐसा कोई नसल का वायदा नहीं है (एक ‘वह’) एक मर्द से आए। तौरेत कहती है कि वह नसल एक औरत से होगी (औरत की नसल) – एक मर्द का ज़िकर किये बगैर।

तमाम आदमी जो कभी वजूद में आए थे उन में से सिर्फ़ दो आदमी थे जिन के कभी कोई इंसानी बाप नहीं थे -सब से पहले आदम था जिस को बराहे रास्त ख़ुदा ने बनाया था, और दूसरा ईसा अल-मसीह (ईसा अलैहिस्सलाम) जो कि एक कुंवारी से पैदा हुआ। इस तरह उस का कोई इंसानी बाप नहीं था। यह मशाहिदा के मुताबिक मुनासिब बैठता है कि यह नसल “मुज़क्कर” है न कि “मुअननस”, जमा का सेगा या ज़मीर (यह, वह) नहीं है बल्कि वाहिद है। ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) एक औरत की ‘नसल’ है। मगर सवाल यह है कि उस का दुशमन कौन है? क्या उस का दुशमन शैतान की नसल है? हालाँकि हमारे पास जगह नहीं है कि इस को तफसील के साथ बयान करें मगर कलाम-ए- पाक में शैतान के बेटे को हलाकत का फ़र्ज़न्द कहा गया है, और दूसरा लक़ब जो तस्वीर कशी करता है वह आने वाला इंसानी हाकिम जो “मसीह” का मुख़ालिफ़ होगा। उस को दज्जाल भी कहा जाता है। बाद में कलाम में मरकूम है कि “मुख़ालिफ़ मसीह” और “मसीह” या (मसीहा) के दरमियान लड़ाई होगी। मगर सबसे पहले यहाँ  से  इस का ज़िकर तारीक़ की शुरुआत में जुनैन जैसा है।

तारीक़ का आखरी अंजाम लड़ाई का इख्तिताम शैतान और अल्लाह के बीच है जो अदन के बाग़ में शुरू हुआ था। और इसी शुरुआत में तौरात की पहली किताब में नबुवत की गई थी। बहुत से सवालात रह जाते हैं और कुछ और सवालात भी उठाए गए हैं। यहाँ से जारी रखते हुए और कामयाब पग़मबरों से सीखते हुए जिन से हमें मदद मिलेगी कि हमारे सवालात का बेहतर जवाब मिले और उन औकात को समझ पाएं जिमें हम पाए जाते  हैं। हम आदम और हव्वा के बेटों, क़ाबील और हाबील की मुख़्तसर कहानी के साथ इस बयान को जारी रखते हैं।

इंजील ख़राब हैं ! क़ुरान शरीफ क्या कहती है?

मेरे कई मुस्लिम दोस्त है। और क्योकि मै भी अल्लाह मै ईमान रखता हूँ। और  इंजील का एक अनुयायी हूँ   मै आमतौर पर ईमान और यक़ीन के बारे में अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ नियमित रूप से बातचीत करता हूं। असल मै हमारे बीच (मेरे और मेरे मुस्लिम दोस्तों के बीच मै) बहुत कुछ आम है, बल्की उनसे भी ज्यादा, दुनियावी पश्चिमी लोगों के साथ जो अल्लाह में ईमान नहीं रखते  हैं, या उनकी जिंदगी  के लिए ईमान बेतुक  है। अपनी बातचीत में लगभग बिना किसी अपवाद के मैं यह दावा सुनता हूं कि इंजिल सरीफ (  ज़बूर और तौरात जो अल किताब है = बाइबिल) ख़राब  है, या उसे बदल दिया गया है, इसलिए कि आज हम जो पैगाम पढ़ते हैं वह अपमानित और गलतियों से भरा है जो पहले अल्लाह के नबियों और मुरीदों के द्वारा प्रेरित था और उनके जरिये लिखा गया था। अब यह कोई छोटा दावा नहीं है, क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि हम अल्लाह के सच को उजागर करने के लिए आज की तारीख में बाइबल(किताबे मुकदस) पर भरोसा नहीं कर सकते। मैंने बाइबल (अल किताब) और पाक क़ुरआन दोनों को पढ़ा और अध्ययन किया, और सुन्नत का अध्ययन करना शुरू कर दिया। तो मुझे क्या पता चला कि यह एक केवल संदेह है बाइबिल(अल- किताब) के बारे मै, हालाँकि यह बात आज इतनी आम हो गयी है, लेकिन इसका कुछ भी जिक्र क़ुरान  सरीफ मै नहीं मिलता है, बल्कि हकीकत मै इस बात ने मुझे चौंका दिया कि क़ुरान शरीफ बाइबिल( अल- किताब) को कितनी गंभीरता से लेती है।         

 बाइबिल(अल-किताब)  के बारे मै क़ुरान शरीफ क्या कहती है ?   

 (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ एहले किताब जब तक तुम तौरेत और इन्जील और जो (सहीफ़े) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाजि़ल हुए हैं उनके (एहकाम) को क़ायम न रखोगे उस वक़्त तक तुम्हारा मज़बह कुछ भी नहीं और (ऐ रसूल) जो (किताब) तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से भेजी गयी है (उसका) रश्क (हसद) उनमें से बहुतेरों की सरकशी व कुफ़्र को और बढ़ा देगा तुम काफि़रों के गिरोह पर अफ़सोस न करना [(सूरा – 5:68)     

ऐ ईमानवालों ख़ुदा और उसके रसूल (मोहम्मद (स०)) पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (मोहम्मद) पर नाजि़ल की है और उस किताब पर जो उसने पहले नाजि़ल की ईमान लाओ और (ये भी याद रहे कि) जो शख़्स ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और रोज़े आखि़रत का मुन्किर हुआ तो वह राहे रास्त से भटक के दूर जा पड़ा [(सूरा 4:136) निसा] पस जो कु़रान हमने तुम्हारी तरफ नाजि़ल किया है अगर उसके बारे में तुम को कुछ शक हो तो जो लोग तुम से पहले से किताब (ख़़ुदा) पढ़ा करते हैं उन से पूछ के देखों तुम्हारे पास यक़ीनन तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से बरहक़ किताब आ चुकी तो तू न हरगिज़ शक करने वालों से होना  [(सूरा 10:94) यूनुस]  

मैंने यह बात ध्यान दी कि यह इस बात की घोषणा करता है कि जो प्रकाशन ‘ किताब के लोगों’ (इसाई और यहूदियों) को मिला है वह अल्लाह की तरफ से है। अब मेरे मुस्लिम दोस्त यह कहते हैं यह सिर्फ असली प्रकाशन पर लागू होता है, चुकी असली प्रकाशन ख़राब हो गया है तो यह आज के कलाम पर लागु नहीं होता है,  लेकिन दूसरा मार्ग उन लोगो की भी पुष्टि करता है जो यहूदियों के कलाम को  (यह वर्तमान काल के बारे  मै भूतकाल के बारे नहीं है) पढ़ रहे है। यह असली प्रकाशन के बारे में बात नहीं कर रहा है लेकिन उस समय जब का कलाम जब क़ुरान शरीफ ज़ाहिर हुई थी। यह लगभग 600 ईस्वी के दौरान नबी मोहम्मद को ज़ाहिर हुई थी।  तो यह रास्ता यहूदियों के कलाम को मंजूरी देता है क्योंकि यह 600 ईस्वी मै मौजूद था। दूसरे रास्ते समान हैं। यहां गौर करें:

और (ऐ रसूल) तुम से पहले आदमियों ही को पैग़म्बर बना बनाकर भेजा कि जिन की तरफ हम वहीं भेजते थे तो (तुम एहले मक्का से कहो कि) अगर तुम खुद नहीं जानते हो तो एहले जि़क्र (आलिमों से) पूछो (और उन पैग़म्बरों को भेजा भी तो) रौशन दलीलों और किताबों के साथ [(सूरा 16:43)अन नहल]

तो क्या ये लोग ईमान लाएँगे और ऐ रसूल हमने तुमसे पहले भी आदमियों ही को (रसूल बनाकर) भेजा था कि उनके पास “वही” भेजा करते थे तो अगर तुम लोग खु़द नहीं जानते हो तो आलिमों से पूँछकर देखो।[ (सूरा 21:7) अल अम्बिया]   

यह वह रसूल है जो पैगम्बर मुहम्मद  से पहले थे लेकिन अहम रूप से दावा करते हैं इन रसूल/पैगम्बरो को अल्लाह के ज़रिये दिये कलाम अभी भी(600 ईस्वी मैं ) उनके पैरोकारों के कब्जे मै थे, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि असल मै दिया गया प्रकाशन(अल-किताब) पैगम्बर मुहम्मद के समय मै ख़राब(बदली) नहीं हुआ था

पाक क़ुरान कहती है कि अल्लाह का कलाम कभी नहीं बदल सकता है

लेकिन अगर गहराई से सोचें और मान ले की अल-किताब बदल गयी है। लेकिन इस बदलाब का क़ुरान शरीफ हिमायत नहीं करती है। ध्यान दें सूरा 5:68 (कानून … खुश खबरी … यह एक प्रकाशन है और यह अल्लाह से आया है)  और निम्नलिखित पर गौर करें

और (कुछ तुम ही पर नहीं) तुमसे पहले भी बहुतेरे रसूल झुठलाए जा चुके हैं तो उन्होनें अपने झुठलाए जाने और अज़ीयत (व तकलीफ) पर सब्र किया यहाँ तक कि हमारी मदद उनके पास आयी और (क्यों न आती) ख़ुदा की बातों का कोई बदलने वाला नहीं है और पैग़म्बर के हालात तो तुम्हारे पास पहुँच ही चुके हैं। [सूरा 6:34(अनआम)] 

तो तुम (कहीं) शक़ करने वालों से न हो जाना और सच्चाई और इन्साफ में तो तुम्हारे परवरदिगार की बात पूरी हो गई कोई उसकी बातों का बदलने वाला नहीं और वही बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है। [सूरा 6:115 (अनआम )]    

उन्हीं लोगों के वास्ते दीन की ज़िन्दगी में भी और आख़िरत में (भी) ख़ुशख़बरी है ख़ुदा की बातों में अदल बदल नहीं हुआ करता यही तो बड़ी कामयाबी है। [सूरा 10:64 (यूनुस)]  

और (ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से वही के ज़रिए से नाज़िल हुईहै उसको पढ़ा करो उसकी बातों को कोई बदल नहीं सकता और तुम उसके सिवा कहीं कोई हरगिज़ पनाह की जगह (भी) न पाओगे। [सूरा 18:27 (अल कहफ़)]   

अगर हम राजी हैं की पैगम्बर मुहम्मद से पहले के नबीयों को अल्लाह  की ओर से प्रकाशन मिला है (जैसा की सूरा 5:68-69 मै लिखा है) और जब से यह आयते  कई बार काफी साफ़ तौर पे कहती है कि अल्लाह के पैगाम को कोई बदल नहीं सकता है तो कैसे कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि तौरेत , जबूर  और इंजील (अल- किताब = बाइबिल) किसी इंसान के जरिये बदल गयी या ख़राब हो गयी थी?  यह मानने के लिए की बाइबल(किताबे मुक़द्दस) बदल गयी है , उसके लिए क़ुरान सरीफ को खुद को नज़र अंदाज  करना होगा।

यह मामला हकीकत मै, यह विचार की अनेक प्रकार के अल्लाह के प्रकाशन को परखने का विचार की यह एक दूसरे से बेहतर या बदतर है,  हालांकि यह बड़े रूप मै  माना जाता है,  लेकिन कुरान में इसकी हामी नहीं है।

और ऐ मुसलमानों तुम ये) कहो कि हम तो खुदा पर ईमान लाए हैं और उस पर जो हम पर नाज़िल किया गया (कुरान) और जो सहीफ़े इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़ व याकूब और औलादे याकूब पर नाज़िल हुए थे (उन पर) और जो किताब मूसा व ईसा को दी गई (उस पर) और जो और पैग़म्बरों को उनके परवरदिगार की तरफ से उन्हें दिया गया (उस पर) हम तो उनमें से किसी (एक) में भी तफरीक़ नहीं करते और हम तो खुदा ही के फरमाबरदार हैं। [सूरा 2:136 (अल-बक़रह)]  (इस आयत पर भी गौर करें-  सूरा 2:285)          

 इसलिए इन बातों मै कोई फर्क नहीं होना चाहिए कि हम सभी प्रकाशन को कैसे मानते है. इसमें हमारी पड़ाई शामिल होगी. और दूसरे अल्फाज़ो मै, हमें सभी किताबों की जानकारी होनी चाहिए.  हकीकत मै,  मै ईसाइयों को कुरान का अध्ययन करने पर ज़ोर डालता हूँ और मुसलमानो को किताबे मुकदस (बाइबिल)  का अध्ययन करने पर ज़ोर डालता हूँ। 

इन किताबो का अध्ययन करने मै वक़्त और हौसला लगता है . बहुत सारे सवाल उठाये जाएंगे। यकीनन तौर पे हलाकि यह ज़मीन पर हमारे वक़्त का एक बखूबी इस्तेमाल हैं- उन सभी किताबो से सिखने के लिए जो पैगंम्बरो ने उजागर की है . मुझे पता है मेरे लिए, सभी रूहानी किताबो का अध्ययन करने मै वक़्त और हौसला लगा. और इसने मेरे मन मै कई सवाल उठाये है, यह मेरे लिए एक इनामी तज़ुर्बा रहा है और मैंने इसमें अल्लाह की बरकत को महसूस किया है। मुझे उम्मीद है की आप लोग इस वेबसाइट पर लिखे कुछ लेखो का अध्यन जारी रखेंगे। मगर एक अच्छी शुरआत करने के लिए देखे की हदीस और पैगम्बर मुहम्मद  ने क्या सोचा जब उन्होंने तौरात, ज़बूर और इंजील सरीफ का इस्तेमाल किया। इस लेख का लिंक यहां है। अगर आपको वैज्ञानिक दिलचस्पी है कि सभी कादिम (रूहानी) किताबो की विश्वसनीयता कैसे निर्धारित की जाती है, और क्या बाइबिल( किताबे मुक़द्दस) को इस वैज्ञानिक नज़रिये से भरोसे लायक या फिर ख़राब माना जाता है। यहां पर यह लेख देखे।                                                                                                                                                                       

तआरुफ़- अल्लाह की तरफ से एक संकेत के रूप मे क़ुरआन शरीफ़ मे इंजील के नमूने

जब मैंने पहली बार क़ुरआन शरीफ़ पढ़ी तो मैं कई तरीकों से फँस गया था। सबसे पहले मुझे इंजील शरीफ के कई सीधे हवाले मिले। लेकिन यह एक ख़ास नमूना था, जिसके मार्फ़त इंजील का जिक्र किया गया था जो कि वास्तव मै मुझे फिक्र मै डालता था। नीचे कुरान की सभी आयते हैं जो की इंजील शरीफ  का सीधे जिक्र करती है। शायद आप उस नमूने को देख सकते है जो की मैंने देखा है.

(ऐ रसूल) उसी ने तुम पर बरहक़ किताब नाज़िल की जो (आसमानी किताबें पहले से) उसके सामने मौजूद हैं उनकी तसदीक़ करती है और उसी ने उससे पहले लोगों की हिदायत के वास्ते तौरेत व इन्जील नाज़िल की. और हक़ व बातिल में तमीज़ देने वाली किताब (कुरान) नाज़िल की बेशक जिन लोगों ने ख़ुदा की आयतों को न माना उनके लिए सख्त अज़ाब है और ख़ुदा हर चीज़ पर ग़ालिब बदला लेने वाला है.  [(सुरा 3:3-4 (अल इमरान )]

और (ऐ मरयिम) ख़ुदा उसको (तमाम) किताबें आसमानी और अक्ल की बातें और (ख़ासकर) तौरेत व इन्जील सिखा देगा। [सूरा 3:48 (अल इमरान)]

ऐ अहले किताब तुम इबराहीम के बारे में (ख्वाह मा ख्वाह) क्यों झगड़ते हो कि कोई उनको नसरानी कहता है कोई यहूदी हालॉकि तौरेत व इन्जील (जिनसे यहूद व नसारा की इब्तेदा है वह) तो उनके बाद ही नाज़िल हुई. [सूरा 3:65 (अल इमरान)]

और हम ने उन्हीं पैग़म्बरों के क़दम ब क़दम मरियम के बेटे ईसा को चलाया और वह इस किताब तौरैत की भी तस्दीक़ करते थे जो उनके सामने (पहले से) मौजूद थी और हमने उनको इन्जील (भी) अता की जिसमें (लोगों के लिए हर तरह की) हिदायत थी और नूर (ईमान) और वह इस किताब तौरेत की जो वक्ते नुज़ूले इन्जील (पहले से) मौजूद थी तसदीक़ करने वाली और परहेज़गारों की हिदायत व नसीहत थी. [सूरा 5:46 (अल-मैदा)]

और अगर यह लोग तौरैत और इन्जील और (सहीफ़े) उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किये गए थे (उनके एहकाम को) क़ायम रखते तो ज़रूर (उनके) ऊपर से भी (रिज़क़ बरस पड़ता) और पॉवों के नीचे से भी उबल आता और (ये ख़ूब चैन से) खाते उनमें से कुछ लोग तो एतदाल पर हैं (मगर) उनमें से बहुतेरे जो कुछ करते हैं बुरा ही करते हैं. [सूरा 5:66(अल-मैदा)]

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ अहले किताब जब तक तुम तौरेत और इन्जील और जो (सहीफ़े) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल हुए हैं उनके (एहकाम) को क़ायम न रखोगे उस वक्त तक तुम्हारा मज़बह कुछ भी नहीं और (ऐ रसूल) जो (किताब) तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से भेजी गयी है (उसका) रश्क (हसद) उनमें से बहुतेरों की सरकशी व कुफ़्र को और बढ़ा देगा तुम काफ़िरों के गिरोह पर अफ़सोस न करना। [सूरा 5:68(अल-मैदा)]

(वह वक्त याद करो) जब ख़ुदा फरमाएगा कि ये मरियम के बेटे ईसा हमने जो एहसानात तुम पर और तुम्हारी माँ पर किये उन्हे याद करो जब हमने रूहुलक़ुदूस (जिबरील) से तुम्हारी ताईद की कि तुम झूले में (पड़े पड़े) और अधेड़ होकर (शक़ सा बातें) करने लगे और जब हमने तुम्हें लिखना और अक़ल व दानाई की बातें और (तौरेत व इन्जील (ये सब चीजे) सिखायी और जब तुम मेरे हुक्म से मिट्टी से चिड़िया की मूरत बनाते फिर उस पर कुछ दम कर देते तो वह मेरे हुक्म से (सचमुच) चिड़िया बन जाती थी और मेरे हुक्म से मादरज़ाद (पैदायशी) अंधे और कोढ़ी को अच्छा कर देते थे और जब तुम मेरे हुक्म से मुर्दों को ज़िन्दा (करके क़ब्रों से) निकाल खड़ा करते थे और जिस वक्त तुम बनी इसराईल के पास मौजिज़े लेकर आए और उस वक्त मैने उनको तुम (पर दस्त दराज़ी करने) से रोका तो उनमें से बाज़ कुफ्फ़ार कहने लगे ये तो बस खुला हुआ जादू है. [सूरा 5:110(अल-मैदा)]

इसमें तो शक़ ही नहीं कि ख़ुदा ने मोमिनीन से उनकी जानें और उनके माल इस बात पर ख़रीद लिए हैं कि (उनकी क़ीमत) उनके लिए बेहश्त है (इसी वजह से) ये लोग ख़ुदा की राह में लड़ते हैं तो (कुफ्फ़ार को) मारते हैं और ख़ुद (भी) मारे जाते हैं (ये) पक्का वायदा है (जिसका पूरा करना) ख़ुदा पर लाज़िम है और ऐसा पक्का है कि तौरैत और इन्जील और क़ुरान (सब) में (लिखा हुआ है) और अपने एहद का पूरा करने वाला ख़ुदा से बढ़कर कौन है तुम तो अपनी ख़रीद फरोख्त से जो तुमने ख़ुदा से की है खुशियाँ मनाओ यही तो बड़ी कामयाबी है. [सूरा 9:110(अत-तौबह)]

मोहम्मद ख़ुदा के रसूल हैं और जो लोग उनके साथ हैं काफ़िरों पर बड़े सख्त और आपस में बड़े रहम दिल हैं तू उनको देखेगा (कि ख़ुदा के सामने) झुके सर बसजूद हैं ख़ुदा के फज़ल और उसकी ख़ुशनूदी के ख्वास्तगार हैं कसरते सुजूद के असर से उनकी पेशानियों में घट्टे पड़े हुए हैं यही औसाफ़ उनके तौरेत में भी हैं और यही हालात इंजील में (भी मज़कूर) हैं गोया एक खेती है जिसने (पहले ज़मीन से) अपनी सूई निकाली फिर (अजज़ा ज़मीन को गेज़ा बनाकर) उसी सूई को मज़बूत किया तो वह मोटी हुई फिर अपनी जड़ पर सीधी खड़ी हो गयी और अपनी ताज़गी से किसानों को ख़ुश करने लगी और इतनी जल्दी तरक्क़ी इसलिए दी ताकि उनके ज़रिए काफ़िरों का जी जलाएँ जो लोग ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे ख़ुदा ने उनसे बख़्शिस और अज्रे अज़ीम का वायदा किया है. [सूरा 48:29(अल-फतह)]

जब आप कुरान शरीफ से इंजील शरीफ के सभी हवालों को एक साथ रखते हैं तो यहां क्या अलग बात दिखती है, यह कि ‘इंजिल’ कभी भी अकेली खड़ी नहीं होती है। हर वाकिया मे तौरेत(कानून की किताब) पहले मौजूद होती है। कानून या तौरेत पैगम्बर मूसा की किताबें हैं, जिन्हे आमतौर पर मुसलमानो के बीच ‘तौरेत’ और यहूदियों के बीच ‘तोरेह’ के नाम से जाना जाता है। इंजील शरीफ(खुश खबरी) सभी पाक किताबों में से बहुत ख़ास है, लेकिन  इसका जिक्र अकेले कभी नहीं किया जाता है। इसके बिपरित आप तौरेत और कुरान के हवाले पा सकते हैं जो कि अकेले खड़े है। यहां पर नीचे कुछ मिसाल दी गयी हैं –

फिर हमनें जो नेक़ी करें उस पर अपनी नेअमत पूरी करने के वास्ते मूसा को क़िताब (तौरौत) अता फरमाई और उसमें हर चीज़ की तफ़सील (बयान कर दी ) थी और (लोगों के लिए अज़सरतापा(सर से पैर तक)) हिदायत व रहमत है ताकि वह लोग अपनें परवरदिगार के सामने हाज़िर होने का यक़ीन करें। [(सूरा 6:154-155) अल अनाम]

तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते।[(सूरा -4:82) अन-निसा]

दूसरे अल्फाजो मै हम यह पाते है कि पाक क़ुरान मै जब भी इंजील का जिक्र होता है, तो हमेशा तौरेत के साथ और हमेशा तौरेत(कानून)  के बाद  इसका जिक्र होता है । यह बेमिसाल और गौर करने की बात है क्योकि क़ुरान शरीफ इंजील शरीफ का जिक्र करती है, दूसरी पाक किताबो का जिक्र करने के अलावा, और तौरेत का भी जिक्र करती है बिना किसी दूसरी पाक किताबो का जिक्र करने के अलावा। यह सोचने की बात है की क़ुरान शरीफ सिर्फ तौरेत और इंजील शरीफ का ही जिक्र क्यों करती है।.

पैग़म्बरों से हमारे लिए एक इसारा 

तो क्या यह नमूना ( तौरेत के बाद हमेशा ‘इंजील’ का हवाला आता है ) जरुरी है? कुछ इसे अचानक से घटी घटना के रूप मै या फ़िर कुछ लोग इसे एक साधारण तरीके से इंजील को पेस करने का रिवाज समझकर ख़ारिज कर देंगे। मैंने किताबों मै इस तरह के हवालों को बड़ी गंभीरता से लेना सीखा है। शायद यह अल्लाह की तरफ से एक उसूल को कायम करने और उसको कायम करने मै हमारी मदद करने के लिए हमारे लिए एक अहम संकेत है – की हम इंजील सरीफ को केवल तभी समझ सकते जब हम पहले तौरेत(कानून) सरीफ को पड़ेगे। तौरेत सरीफ एक सर्त है जिसे हमें इंजील सरीफ को समझने से पहले जानने की जरुरत है। यह बहुत कारगर हो सकता है यदि हम सबसे पहले तौरेत सरीफ को परखें, फिर देखें कि हम इंजील सरीफ को कैसे बेहतर तरीके से समझने के लिए हम इससे क्या सीख सकते हैं। क़ुरान सरीफ हमें बताती है कि सुरु के दौर के पैग़म्बरों की तरफ से यह  हमारे लिए एक संकेत है। गौर करें की निचे लिखीं आयते क्या कहती है –

ऐ औलादे आदम जब तुम में के (हमारे) पैग़म्बर तुम्हारे पास आए और तुमसे हमारे एहकाम बयान करे तो (उनकी इताअत करना क्योंकि जो शख्स परहेज़गारी और नेक काम करेगा तो ऐसे लोगों पर न तो (क़यामत में) कोई ख़ौफ़ होगा और न वह आर्ज़दा ख़ातिर (परेशान) होंगे।और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे सरताबी कर बैठे वह लोग जहन्नुमी हैं कि वह उसमें हमेशा रहेगें।[सूरा 7:35-36(अल-अराफ़)]

दूसरे लफ्जो मै कहें तो इन पैग़म्बरों के पास नबी आदम के बच्चों के लिए उनकी जिन्दगियो के लिए पैगाम और चिन्ह थे( और हम सभी नबी आदम के  बच्चे है)। जो कोई अकल्मन्द और सयाना है वह इन चिन्हो को समझने की कोशिश जरूर करेगा । तो आइये हम इंजील सरीफ को तौरेत सरीफ के द्वारा गौर से समझे, और पहले पैग़म्बरों को  सुरुआत से देखे कि उन्होंने हमें क्या चिन्ह दिए है जो हमें सीधे रास्ते को समझने मै मदद कर सकते है।.

हम सही समय मै नबी आदम के चिन्हो के साथ शुरुआत करते है। बेशक आप इस सवाल का जवाब देकर शुरू करना चाहेंगे कि क्या तौरत, ज़बुर और इंजील  सरीफ की किताबें बदल गई हैं। इस जरुरी सवाल के बारे में पाक कुरान क्या कहती है? और सुन्नत? और यह अच्छा होगा की क़यामत के रोज पर तौरेत शरीफ के बारे मै जानने के लिए समय निकलना अच्छा होगा, और यह सीधे रास्ते के लिए कैसे एक चिन्ह है।.

 

 

क़ुरान बाइबिल की जगह लेती है। क़ुरान क्या कहती है?

हमने देखा है कि कुरान शरीफ और सुन्नत दोनों इस बात को साबित करते हैं कि बाइबल (तौरात, ज़बूर और इंजिल जो की अल- किताब है) को बदला या ख़राब नहीं किया गया है। लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि या  बाइबल / अल किताब को बदल दिया है या रद्द किया गया है और या क़ुरान शरीफ  को इसकी जगह रख दिया है। तो इस ख्याल  के बारे में कुरान  शरीफ  खुद क्या कहती है?

और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने (सूरा – 5:48 अल- माएदा)

और इसके क़ब्ल मूसा की किताब पेशवा और (सरासर) रहमत थी और ये (क़ुरान) वह किताब है जो अरबी ज़बान में (उसकी) तसदीक़ करती है ताकि (इसके ज़रिए से) ज़ालिमों को डराए और नेकी कारों के लिए (अज़सरतापा) ख़ुशख़बरी है (सूरा – 46:12 अल-अहकाफ)

उसके बाद उन्हें छोड़ के (पडे झक मारा करें (और) अपनी तू तू मै मै में खेलते फिरें और (क़ुरान) भी वह किताब है जिसे हमने बाबरकत नाज़िल किया और उस किताब की तसदीक़ करती है जो उसके सामने (पहले से) मौजूद है (सूरा – 6:92 अनआम) 

और हमने जो किताब तुम्हारे पास ”वही” के ज़रिए से भेजी वह बिल्कुल ठीक है और जो (किताबें इससे पहले की) उसके सामने (मौजूद) हैं उनकी तसदीक़ भी करती हैं (सूरा – 35:31 फातिर)

ये आयते क़ुरान के पहले के बयान की पुष्टि करते हुए बाइबिल ( अल – किताब )के बारे में बात करती हैं।  (अदल-बदल  के बारे मै नहीं)। दूसरे लफ्ज़ो में, ये आयत यह नहीं कह रहीं हैं कि मोमिन(ईमान वाले को) शुरुआती प्रकाशन(यानी बाइबिल मै )  को अलग करना चाहिए और केवल बाद के प्रकाशन(यानी कुरान) को ही पड़ना चाहिए।मोमिन(ईमान वाले) को भी सीखना  चाहिए और पहले के प्रकाशन  को जानना चाहिए।

इस बात की तसदीक आयतों ने भी की है जो हमें बताती है कि विभिन्न खुलासे में कोई भेद नहीं है। यहाँ दो ऐसी आयतें हैं जिन पर मैंने गौर किया है:

हमारे पैग़म्बर (मोहम्मद) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ से नाज़िल किया गया है उस पर ईमान लाए और उनके (साथ) मोमिनीन भी (सबके) सब ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान लाए (और कहते हैं कि) हम ख़ुदा के पैग़म्बरों में से किसी में तफ़रक़ा नहीं करते और कहने लगे ऐ हमारे परवरदिगार हमने (तेरा इरशाद) सुना (सूरा – 2:285 -अल-बकरा)

(और ऐ मुसलमानों तुम ये) कहो कि हम तो खुदा पर ईमान लाए हैं और उस पर जो हम पर नाज़िल किया गया (कुरान) और जो सहीफ़े इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़ व याकूब और औलादे याकूब पर नाज़िल हुए थे (उन पर) और जो किताब मूसा व ईसा को दी गई (उस पर) और जो और पैग़म्बरों को उनके परवरदिगार की तरफ से उन्हें दिया गया (उस पर) हम तो उनमें से किसी (एक) में भी तफरीक़ नहीं करते और हम तो खुदा ही के फरमाबरदार हैं (सूरा – 2:136 – अल-बकरा)           

पहली आयत हमें बताती है कि रसूलों मै कोई फर्क नहीं है, उन सभी की बात सुनी जानी चाहिए और दूसरी आयत कहती है कि विभिन्न नबियों द्वारा दिए गए खुलासे में कोई फर्क  नहीं है – उन्हें सभी को कबूल करना चाहिए।इन आयतों में से किसी में भी ऐसा कोई सुझाव नहीं है कि पहले के प्रकाशन (यानि बाइबिल) को नज़र अंदाज़ किया जाए क्योंकि बाद के प्रकाशन(यानि क़ुरान) से  इसे तबदील कर दिया है।

और यह तरीक़ा ईसा अल मसीह  की मिसाल और तालीम के साथ दुरुस्त बैठता है। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि तौरात के शुरुआती खुलासे और फिर ज़बूर को रद्द कर दिया गया। हकीकत में, उन्होंने इसके उल्टा सिखाया। पैगम्बर मूसा की तौरात को ईसा अल मसीह ने  लगातार कदर और तवज्जो दी  है, जो उन्होनें इंजिल में अपनी खुद की तालीम मे भी दिखाया है.

  17 “यह मत सोचो कि मैं मूसा के धर्म-नियम या भविष्यवक्ताओं के लिखे को नष्ट करने आया हूँ। मैं उन्हें नष्ट करने नहीं बल्कि उन्हें पूर्ण करने आया हूँ। 18 मैं तुम से सत्य कहता हूँ कि जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।

19 “इसलिये जो इन आदेशों में से किसी छोटे से छोटे को भी तोड़ता है और लोगों को भी वैसा ही करना सिखाता है, वह स्वर्ग के राज्य में कोई महत्व नहीं पायेगा। किन्तु जो उन पर चलता है और दूसरों को उन पर चलने का उपदेश देता है, वह स्वर्ग के राज्य में महान समझा जायेगा। 20 मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जब तक तुम व्यवस्था के उपदेशकों और फरीसियों से धर्म के आचरण में आगे न निकल जाओ, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं पाओगे। (मत्ति- 5:17-20 (बाइबिल की किताब)

हकीकत में, ईसा अल मसीह ने सिखाया की उनकी तालीम को मुनासिफ तौर पर समझने के लिए पहले तौरात और फिर ज़बूर को जानना होगा। यहां यह बताया गया है कि उन्होंने अपने शागिर्दो को कैसे सिखाया:

 और इस तरह मूसा से प्रारम्भ करके सब नबियों तक और समूचे शास्त्रों में उसके बारे में जो कहा गया था, उसने उसकी व्याख्या करके उन्हें समझाया। (लुका – 24:27 (बाइबिल की किताब)

फिर उसने उनसे कहा, “ये बातें वे हैं जो मैंने तुमसे तब कही थीं, जब मैं तुम्हारे साथ था। हर वह बात जो मेरे विषय में मूसा की व्यवस्था में नबियों तथा भजनों की पुस्तक में लिखा है, पूरी होनी ही हैं।” (लुका – 24:44)

ईसा अल मसीह  ने पहले प्रकाशन(यानि तौरेत, जबूर)  को नज़र अंदाज करने की कोशिस नहीं की ।हकीकत  में उन्होंने अपनी तालीम और हिदायत की शुरुरात वहीं से की। यही कारण है की हम ईसा अल मसीह की मिसाल की पैरवी करते हुए  तौरात को शुरुरात से देखेंगे  तो हमें एक अच्छी बुनियाद मिलेगी तो हम इंजील सरीफ को अच्छे से समझ सकते  हैं ।