इब्राहीम की 1 निशानी : बरकत

इब्राहीम! उसे अब्रहाम और अब्राम (अलै.) के नाम से भी जाना जाता है। वाहिद ख़ुदा पर ईमान रखने वाले तमाम तीनों मज़ाहिब यहूदियत, मसीहियत और इस्लाम उसके पीछे चलने के लिए एक नमूना पेश करती है। अरब के लोग और यहूदी मौजूदा ज़माने में उसके बेटे इश्माईल और इस्साक़ के जिस्मानी नसल के ज़रिये उसके नाम को बड़े एहतिमाम से लेते हैं। नबियों की क़तार में भी वह बहुत ही अहम् माने जाते हैं क्यूंकि उन के बाद के अंबिया उन्हीं की नसल से ताल्लुक़ रखते हैं। सो हम अब्रहाम (अलैहिस्सलाम) कि निशानी को कई एक हिस्सों में गौर करेंगे। उसकी पहली निशानी को कुरान शरीफ़ और तौरात शरीफ़ में पढने के लिए यहाँ पर किलिक करें

कुरान शरीफ़ से एक आयत में हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पीछे कई एक क़बीले वजूद में आए जिस से क़ौम के लोग पैदा हुए। इन लोगों के ज़रिये कई एक ‘बड़ी हुकूमतें’ क़ाइम हुईं। मगर लोगों के ‘क़बीले’ रुनुमा होने से पहले एक शख्स के पास कम अज़ कम एक बेटा तो ज़रूर होना चाहिए था और एक ‘बड़ी हुकूमत’ को शक्ल देने के लिए एक बड़ी जगह का होना भी ज़रूरी था।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए वायदा

तौरेत की इबारत (पैदाइश 12:1।7) बताती है कि अल्लाह किसतरह ‘क़बीले’ और ‘बड़ी हुकूमत’ जो इब्राहीम (अलै.) से आने वाली थी अपने इस दोहरे तकमील को आशकारा करने जा रहा था। अल्लाह ने उसे एक वायदा दिया जो मुस्तकबिल के लिए एक बुन्याद था। आइये हम इसे तफ़सील के साथ मज़ीद नज़र।ए।सानी करें। हम देखते हैं कि अल्लाह इब्राहीम (अलै.) से कहता है :

2 “मैं तुम्हें एक महान राष्ट्र में बनाऊंगा,
और मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगा;
मैं तुम्हारा नाम महान कर दूंगा,
और आप एक आशीर्वाद होंगे।
3 मैं उन्हें आशीर्वाद दूंगा जो तुम्हें आशीर्वाद देते हैं,
और जो कोई तुम्हें शाप देगा, मैं शाप दे दूंगा;
और सभी लोग पृथ्वी पर हैं
आपके माध्यम से धन्य हो जाएगा।

   इब्राहीम (अलै.) की अज़मत

जहां मैं रहता हूँ वहाँ बहुत से लोग ताज्जुब करते हैं कि क्या कोई ख़ुदा है और कोई शख्स कैसे जान सकता है कि अगर उसने हक़ीक़त में खुद को तौरेत के वसीले से ज़ाहिर किया हो। यहां हमारे सामने एक वायदा है जिस के हिससों से हम सहीह साबित कर सकते हैं। इस मुकाश्फ़े का ख़ातमा कलमबंद करता है कि अल्लाह ने बराहे रास्त इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से वायदा किया कि “मैं तेरा नाम सरफ़राज़ करूंगा” हम 21 वीं सदी में बैठे हुए हैं और इब्राहीम/अब्रहाम/अब्राम का नाम तारीक़ में अलमगीर तोर से जाना पहचाना नामों में से एक है। यह वायदा ल्फ्ज़ी और तारीक़ी तोर से सच साबित होता है। तौरेत का सब से क़दीम नुसख़ा जो आज मौजूद है वह बहीरा।ए।मुरदार के तूमार में से है जिस की तारीक़ 200 -100 क़ब्ल मसीह है। इसका मतलब यह है कि यह वायदा ज़ियादा से ज़ियादा इसके लिखे जाने वक़्त से मौजूद है। उस ज़माने में इब्राहीम (अलै.) के नाम और शख्सियत को सहीह तोर से नहीं जाना जाता था सिवाए यहूदियों की अक़लियत के जो तौरेत के मानने वाले थे। मगर आज उसका नाम बहुत ऊँचा है। सो हम सही साबित कर सकते हैं कि एक तकमील तभी पूरी होती है जब उसे लिखा जाता है, उससे पहले नहीं।

इब्राहीम (अलै.) के लिए वायदे का यह हिस्सा यक़ीनी तोर से वाक़े हुआ यहाँ तक कि ग़ैर ईमानदारों के लिए ज़रूरी था और यहाँ तक कि यह हआरे लिए अल्लाह का वायदा जो इब्राहीम (अलै.) के लिए है उसके बाक़ी हिस्से को समझने के लिए ज़ियादा यकीन दिलाता है। सो आइये हम इस मुताला को जारी रखें।

हमारे लिए बरकत

फिर से हम इब्राहीम (अलै.) की तरफ़ से एक बड़ी क़ौम के बरपा होने के वायदे को देखते हैं जो खुद इब्राहीम (अलै.) के लिए बाईस ए बरकत है। मगर इस के अलावा और भी कुछ है यह बरकत सिर्फ़ इब्राहीम (अलै.)के लिए ही नहीं है क्यूंकि यह इबारत कहती है “ज़मीन की तमाम कौमें तेरे वसीले से बरकत पाएंगीं” (यानी इब्राहीम अलै. के वसीले से)। यह मेरे और आप के लिए गौर करने की बात है क्यूंकि आप और मैं ‘ज़मीन के तमाम लोगों का’ एक हिस्सा हैं। इससे कुछ फ़रक नहीं पड़ता कि हम किस मज़हब से ताल्लुक रखते हैं, हमारी नसल की गोशा ।ए। गुमनामी क्या है, हम कहां रहते हैं, हमारी तहज़ीबी रुतबा क्या है, या हम कौनसी ज़बान बोलते हैं वगैरा। यह वायदा हर एक के लिए है जो आज ज़िन्दा मौजूद हैं। यह वायदा आपके और मेरे लिए है। हालांकि हमारे फ़रक़ फ़रक़ मज़ाहिब, नसल बतोर गोशा।ए।गुम्नामियाँ और ज़बानें अक्सर लोगों को तकसीम करते और मुख़ालिफ़त का सबब बनाते हैं। मगर यह ऐसा वायदा है जो इन बातों पर ग़ालिब आता नज़र आता है जो आम तोर से हमको तक़सीम करता है। किस तरह? कब? किस तरह की बरकतें? यह इस मुद्दे पर साफ़ नहीं करता। मगर इस निशानी ने एक वायदे को जन्म दिया है जो इब्राहीम (अलै.) के वसीले से आपके और मेरे लिए है। जबकि हम जानते हैं कि इस वायदे का एक हिस्सा सच साबित हुआ है और हम भरोसा कर सकते हैं कि दूसरा हिस्सा जो हम पर नाफ़िज़ होता है वह भी साफ़ हो जाएगावह भी लफ्ज़ी तकमील बतोर – हमें इस को खोलने के लिए सिर्फ़ इसकी कुन्जी को ढूंढना ज़रूरी है।

हम इस बात पर गौर कर सकते हैं कि जब इब्राहीम (अलै.) ने इस वायदे को हासिल किया तो वह अल्लाह का फरमान बरदार हुआ और ….

“सो अब्राम खुदावंदके कहने के मुताबिक चल पड़ा”

पैदाइश 12:4

      इब्राहीम (अलै.) की हिजरत

ऊर से ।।> हारान ।।>कनान का मुल्क

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वायदा किया हुआ मुल्क में पहुँचने के लिए यह सफ़र कितना लम्बा था? यहाँ पर यह नक्शा इब्राहीम (अलै.) के सफ़र को दिखता है। वह असल में ऊर (मौजूदा जुनूबी इराक़) में रहता था। फिर वह हारान (मौजूदा शुमाली इराक़) में आया ।फिर उसने अपने ज़माने के कनान कि तरफ़ सफ़र किया। नक्शे में आप देख सकते हैं कि यह बहुत लम्बा सफ़र था। उसको ऊँट घोड़ा या गधे पर सवार होकर सफ़र करना था। सो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इस सफ़र को अंजाम देने में कई एक महीने लगे होंगे जब अल्लाह कि बुलाहट हुई तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने ख़ानदान को छोड़ा। अपनी ऐशो इशरत की ज़िन्दगी को छोड़ा जिसे वह मसोपतामिया में रहकर गुज़ारा करता था। मौजूदा मसोपतामिया उस ज़माने में ख़ास तहज़ीब ।ओ। तमद्दुन का मरकज़ था। उसकी मुहाफ़ज़त को लेकर और जो कुछ उसके इस सफ़र से मुताल्लिक़ मशहूर है वह यह है कि जिस तरफ़ वह सफ़र कर रहा था वह उस के लिए बिलकुल बेगाना था। जब वह अपनी मंजिल पर पहुंचा तो तोरेत हम से कहती है कि उस वक़्त उस की उम्र 75 साल कि थी!

पेश्तर नबियों की तरह जानवरों की कुर्बानियां

तौरेत हम से यह भी कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) हिफाज़त से जब कनान में पहुंचे:

“तो उसने खुदावंद के लिए एक मज़बह बनाया”

पैदाइश 12:7

एक मजबह वह है जहां हाबील और नूह (अलैहिस्सलाम) ने इस से पहले क़ुर्बानी अदा की थी। उन्होंने अल्लाह के लिए जानवरों के खून की क़ुर्बानी दी। हम देखते हैं कि नबियों ने किस तरह अल्लाह की इबादत की थी उसका यह एक नमूना था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उस नए मुल्क में दाखिल होने और सफ़र करने के लिएअपनी ज़िन्दगी के आखरी अय्याम में जोखिम उठाया था। मगर ऐसा करने के लिए उसने खुद को अल्लाह के वायदे के हाथों में सोंप दिया था ताकि खुद के लिए और दीगर तमाम लोगों के लिए बरकत का बाइस बने। और इसी लिए वह हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है। हम इब्राहीम की अगली निशानी नम्बर 2 के साथ इस मुताले को जारी रखते हैं।

लूत की निशानी

(तौरात या बाइबिल) का लूत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का भतीजा था। उसने शरारत पसंद लोगों के बीच रहना पसंद किया था। अल्लाह ने इस हालत को उस ज़माने के तमाम लोगों के लिये पैगम्बराना निशानी बतोर इस्तेमाल किया। मगर सवाल यह है कि वह निशानात क्या थे ? इस के जवाब के लिए हमको इस बयान में दिए गए फ़रक़ फ़रक़ लोगों की तरफ़ नज़दीकी से धियान देना होगा। इस बयान को तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तौरेत्त शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में देख सकते हैं कि तीन जमाअत के लोग पाए फ़ जाते हैं, इन के अलावा अल्लाह के फरिश्तों (पैगम्बरों की जमाअत)। आइये हम इन्हें बारी बारी से देखें।

सदोम के लोग

यह लोग निहायत ही गुमराह थे। यह लोग उम्मीद करते थे कि इनसानी औरतों के अलावा दूसरों की इज़्ज़त से भी खेल सकते थे (जो हक़ीक़त में फ़रिश्ते थे मगर सदोम के लोगों ने सोचा कि वह इंसान थे सो उन्हों ने उन के साथ गिरोह में होकर अस्मतदरी करने का मंसूबा किया)। इस तरह का गुनाह ऐसी संगीन बुराई थी कि अल्लाह ने सारे शहर का इंसाफ़ करने का फ़ैसला किया। फ़ैसला वही था जो इस से पहले भी आदम को दिया गया था।पीछे शुरुआत में अल्लाह ने आदम को इस फ़ैसले से ख़बरदार किया था कि गुनाह की मज़दूरी मौत है। और दूसरी तरह कि सज़ा नहीं (जैसे मारना , क़ैद करना वगेरा जो काफ़ी नहीं था। अल्लाह ने आदम से कहा था:

“….लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का फल कभी न खाना क्यूंकि जिस रोज़ तूने उस में से खाया    तू मरा।”

पैदाइश 2:17

इसी तरह से सदोम के लोगों के गुनाहों कि सज़ा यह थी कि उन लोगों को भी मरना था। दरअसल सदोम शहर के सारे लोगों को और उस में रहने वाले तमाम जानदारों को आस्मान से नाजिल आग के ज़रिये बर्बाद किया जाना था।यह एक नमूने की मिसाल है जो बाद में इंजील शरीफ़ में समझाया गया है:

  “क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी तो मौत है”

रोमियों 6:23

लूत के दामाद 

नूह के बयान में। अल्लाह ने तमाम दुनिया का फ़ैसला किया और आदम की निशानी के साथ यकसां (बराबर का सुलूक किया कि सारे लोग उस बड़े तूफ़ान के ज़रिये हलाक हुए। मगर तौरात शरीफ और कुरान शरीफ़ हमसे कहते हैं कि नूह के ख़ानदान को छोड़ सारी दुनया के लोग बुरे थे। अल्लाह ने सदोम के लोगों का भी इन्साफ़ किया जबकि वह लोग भी गुमराह और बुरे थे। सिर्फ़ इन बयानात के साथ मैं यह सोचने के लिए आज़माया जा सकता हूँ कि मैं अल्लाह के इंसाफ़ से महफूज़ हूँ क्योंकि मैं इतना बुरा नहीं हूँ जैसे कि वह लोग थे । आखिर कार मैं अल्लाह पर पूरा ईमान रखता हूँ, मैं बहुत से नेक काम करता हूँ और मैं ने कभी इस तरह के बुरे काम अनजाम नहीं दिए। तो फिर क्या मैं महफूज़ हूँ ? लूत की निशानी उस के दामादों के साथ मुझे ख़बरदार करती है। हालाँकि वह लोग इस गिरोह में शरीक नहीं थे जो एक गिरोह में होकर जिंसी गुनाह (असमतदरी) अंजाम देने की कोशिश कर रहे थे किसी तरह से उन्हों ने आने वाले इंसाफ़ की तंबीह को संजीदा तोर से नहीं लिया। दरअसल तौरेत शरीफ़ हम से कहती है, लोग  सोच रहे थे कि ‘(वह) लूत उन से मज़ाक़ कर रहा था’। मगर सवाल यह है कि क्या उन की किस्मत शहर के दुसरे लोगों से फ़रक़ थी ? नहीं ! वह उन्हीं की किस्मत में शरीक हुए। अंजाम बतोर लूत के दामादों और सदोम के बुरे लोगों उन दोनों में कोई फ़रक नहीं था। यहाँ निशानी यह है कि हर एक शख्स को इस तंबीह को संजीदा तोर से लेना ज़रूरी था क्यूंकि वह न सिर्फ़ गुमराह लोग थे।

लूत की बीवी          

लूत की बीवी हमारे लिए एक बड़ी निशानी है। तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में ही वह भी दीगर शरीर लोगों के साथ हलाक हुई – वह एक नबी की बीवी थी – मगर लूत के साथ उसका एक ख़ास रिश्त्ता होते हुए भी वह रिश्ता बचा न सका हांलांकि वह सदोम के लोगों के साथ उस बड़े गुनाह में शामिल नहीं थी। उसने फ़रिश्ते के हुक्म को तोड़ा:

              ‘तुम में से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे’ (सूरा 11:81) सूरा ।ए। हूद या

              ‘पीछे मुड़कर न देखना’ (पैदाइश 19:17)

तौरेत हम से कहती है कि

 लेकिन लूत की पत्नी ने वापस देखा, और वह नमक का एक स्तंभ बन गई।

उत्पत्ति १ ९: २६

उसके “पीछे मुड़ कर देखने” का असल मक़सद क्या था उसे समझाया नहीं गया है मगर उस ने सोचा कि अल्लाह के इस छोटे से हुक्म को नज़र अंदाज़ करदेने से कोई ख़ास फ़रक नहीं पड़ेगा – उसकी किस्मत – उसके “छोटे” गुनाह के साथ वैसा ही था जैसा कि सदोम के लोगों का “बड़ा” गुनाह उन के लिए मौत बन कर आई थी। यह हमारे लिए कुछ ऐसी ज़रूरी निशानी है जो कभी कभी यह सोचने से दूर रखती हैं कि यह छोटे गुनाह हैं जिन्हें अल्लाह हिसाब में नहीं लाएगा (इन का इंसाफ़ नहीं होगा) — लूत की बीवी इस ग़लत सोच के खिलाफ़ तम्बीह के लिए हमारी निशानी है:

लूत, अल्लाह और फ़रिश्ते पैग़म्बरान 

जिसतरह हम ने आदम की निशानी में देखा था कि जब अल्लाह ने आदम का इंसाफ़ किया था तो उस ने तो उसने उस पर अपना फ़ज़ल भी अता किया था। और वह इंसाफ़ था उन के लिए चमड़े के पोशाक का इनायत किया जाना। नूह के साथ जब अल्लाह ने इंसाफ़ किया तो उसने फिर से एक बड़ी कश्ती के साथ फ़ज़ल अता किया। फिर से एक बार अल्लाह यहाँ तक कि अपने इंसाफ़ में बा ख़बर है कि वह इंसाफ़ अता करता है ।इसको तौरेत ने इसतरह बयान किया है कि:

जब वह (ल्यूक) हिचकिचाया, तो पुरुषों (स्वर्गदूत जो पुरुषों की तरह दिखते थे) ने अपना हाथ और अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के हाथों को पकड़ लिया और उन्हें सुरक्षित रूप से शहर से बाहर ले गए, क्योंकि प्रभु उनके लिए दयालु थे।

उत्पत्ति १ ९: १६

इससे हम क्या सीख सकते हैं? से पीछे की निशानियों की तरह फ़ज़ल आलमगीर था मगर सिर्फ़ एक तरीके के ज़रीये ही अता किया जाना था। लूत के ख़ानदान को शहर से बाहर रहनुमाई करते हुए अल्लाह ने रहम करके मिसाल के तोर पर शहर के अन्दर एक ऐसी पनाहगाह का इंतज़ाम नहीं किया जो आसमान से आग नाज़िल होने पर उनकी मुहाफ़िज़त हो सके। अल्लाह की तरफ़ से रहम हासिल करने का एक ही रास्ता था – कि शहर से बाहर फ़रिश्तों के पीछे चलो। अल्लाह ने लूत और उसके खानदान पर इसलिए रहम नहीं किया क्यूंकि लूत एक कामिल शख्स था। दरअसल तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ इन दोनों में हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों को अस्मतदरी करने वालों के हाथ सोंपने जा रहा था। यह एक शरीफ़ाना पेशकश नहीं थी। तौरेत हमसे कहती है कि फरिशतों के ख़बरदार किये जाने पर भी लूत ‘हिचकिचाया’। इन सब के बावजूद भी अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिये उसका हाथ पकड़ कर शहर के बाहर लेजाने के ज़रिये उसपर अपना रहम ज़ाहिर करता है। यह हमारे लिए एक निशानी है : अल्लाह हम पर रहम इनायत करेगा, यह हमारी भलाई पर मुनहसर नहीं है। मगर हम लूत की मानिंद जो हमारे सामने है रहम हासिल करने की ज़रुरत है जिस से हमारी मदद हो – लूत के दामादों ने इसे हासिल नहीं किया और उन्हें इससे कोई फाइदा हासिल नहीं हुआ।

तौरेत हम से कहती है कि अल्लाह ने लूत के चचा, एक बड़े नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबब से जिसने उसके लिए अल्लाह से इल्तिजा करी थी उस पर अपना रहम ज़ाहिर किया – (यहाँ पैदाइश की इबारत को देखें) तौरेत शरीफ़ इब्राहिम (अलै.) के निशानियों के वसीले से अल्लाह की  जानिब से वायदों को को जारी रखती है कि “तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब क़ौमें बरकत पाएंगीं क्यूंकि तू ने मेरी बात मानी” (पैदाइश 22:11)। यह वायदा हमको चौकन्ना कर देना चाहिए इसलिए कि कोई फ़रक़ नहीं पड़ता कि हम कौन हैं, कौन सी ज़बान हम बोलते हैं, हम किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, या हम कहां रहते हैं वगैरा हम मालूम कर सकते हैं कि आप और मैं ‘ज़मीन की तमाम कौमों का’ एक हिस्सा हैं।अगर इब्राहिम की इल्तिजा के ज़रिये अललाह ने मुतहर्रिक होकर लूत पर रहम ज़ाहिर किया हालांकि वह इस के लिए काबिल नहीं था तो कितना ज़ियादा इब्राहीम (अलै.) की निशानियां हम पर रहम ज़ाहिर करेंगीं जो कि हम भी ‘तमाम कौमों में से’ एक हैं? इसी सोच के साथ हम तौरेत में इब्राहीम की निशानियों को देखते हुए आगे बढ़ेंगे।

नूह की निशानी

हम तारीक़ी सिलसिले को शुरू से जारी रखेंगे (मिसाल के तौर पर आदम/हव्वा और काबील/हाबील) और अब तौरेत में हमारा अगला तवज्जो के क़ाबिल न्काबी है नूह (अलैहिस्सलाम) जो आदम के ज़माने के 1600  बाद रहा करता था। बहुत से लोग मशरिक में नूह (अलैहिस्सलाम) की कहानी को जानते हैं और इनकार न करने लायक़ सैलाब की  बाबत कहानी को भी जानते हैं। मगर दुनिया तिलछट के तौर पर चट्टानों से ढका हुआ है जो कि कहा जाता है कि ऐसा सैलाब के दौरान ही तिलछट के जमा होने ज़रिये शक्ल इख्तियार करता है। सो हमारे पास इस सैलाब का माद्दी सबूत मौजूद है मगर सवाल यह है कि नूह की क्या निशानी थी जिस पर हमको गौर करने की ज़रुरत है? अब नूह (अलैहिस्स्सलाम)के बयान को तौरात और कुरान में पढ़ने के लिए यहां पर किलिक करें-

ग़ैब हो जाना  मुक़ाबिल  रहम हासिल करना

जब मैं मशरिकी लोगों से अल्लाह के इंसाफ़ की  बात करता हूँ तो अक्सर मुझे कुछ इस तरह के जवाब सुनने को मिलते हैं,  “मैं इंसाफ़ के लिए इतना ज़ियादा फ़िकर मंद नहीं हूँ क्यूंकि अल्लाह इतना ज़ियादा रहम करने वाला है कि मैं नहीं सोचता कि वह सच मुच मेरा इंसाफ़ करेगा।” यह वह नूह (अलैहिस्स्स्लाम) का बयान है जो एक सबब के लिए सवाल खड़ा करता है। जी हाँ। अल्लाह बहुत ज़ियादा रहम करने वाला है। वह अपने सिफ़त में बदलता नहीं है, और इस में कोई शक नहीं कि वह नूह (अलैहिस्स्सलाम) के ज़माने में भी रहम करने वाला था। इस्के बावजूद भी (नूह और उसके खानदान को) छोड़ तमाम दुनया अल्लाह के इंसाफ़ के तहत तबाह व बर्बाद हो गयी थी। 

अपने पापों के कारण वे डूब गए और उन्हें आग में डाल दिया, और उन्होंने अपने लिए अल्लाह [कोई भी] मददगार नहीं पाया सूरा नूह

सूरा 71 – नूह हमें बताती है कि

तो फिर उस का इंसाफ़ कहां गया? उसका इंसाफ़ उस कश्ती में मौजूद था। जिस तरह हम कुरान शरीफ़ में पढ़ते हैं:

            हम (अल्लाह) ने उसे (नूह पीबीयूएच) दिया, और उन लोगों को आर्क में

द हाइट्स 7:64

अल्लाह ने अपने रहम में होकर नबी नूह (अलैहिस्सलाम) का इसतेमाल करते हुए एक कश्ती का इन्तिज़ाम किया जो किसी के लिए भी दस्तियाब था। हर कोई उस कशती में दाखिल हो सकता था और खुद के लिए रहम और मह्फूज़ियत को हासिल कर सकता था। मगर एक संजीदा मसला यह था कि नूह के खानदान को छोड़ तक़रीबन सब लोग ख़ुदा के पैग़ाम पर ईमान नहीं लाए थे। और ईमान लाना तो दूर उल्टा नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाया और आने वाले इंसाफ़ की बाबत भरोसा नहीं किया। अगर यह सब न करते हुए सिर्फ़ कश्ती में दाखिल भी हो जाते तो वह लोग अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाते।

कुरान शरीफ़ की इबारत भी हमसे कहती है कि नूह का एक बेटा अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान नहीं लाया था। हक़ीक़त में वह एक पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। वह सोच रहा था कि ऐसा करके वह अल्लाह के इंसाफ़ से बच जाएगा। मगर फिर से यहाँ पर एक परेशानी थी। वह अपने ईमान को मख्सूसियत के साथ जोड़ नहीं पाया था और इस चुनाव का फ़ैसला नहीं कर पाया था। उसने इंसाफ़ से बचने के लिए अपने तरीके का इस्तेमाल किया। मगर उस के बाप ने उससे कहा:

“आज के दिन तुझे अल्लाह के हुक्म से कोई चीज़ बचा नहीं सकती मगर उन्हीं को जिन पर उसने अपना रहम ज़ाहिर किया      है!”

हूद 11:43

उस बेटे को अल्लाह के रहम की सख्त ज़रुरत थी न कि खुद की अपनी कोशिश जो उसे इंसाफ़ से बचा सकती थी। दर हक़ीक़त पहाड़ पर चढ़ने की उस की कोशिश फुज़ूल और बे हासिल था। इसलिए इस का अंजाम भी उन लोगों के साथ ही था जो नूह (अलैहिस्सलाम) का मज़ाक़ उड़ाते थे। और उनका मज़ाक़ उन्हें पानी में डूब कर मरने पर मजबूर किया।  यह सब कुछ करने से बेहतर अगर वह अपने बाप के साथ कश्ती में दाखिल हो जाता तो अल्लाह के इंसाफ से बच सकता था। इस बयान से हम मालूम कर सकते हैं कि सिर्फ़ अल्लाह पर और उसके इंसाफ़ पर ईमान लाना ही काफ़ी नहीं था कि सैलाब से बच जाते। दर असल अल्लाह जो रहम इनायत करता है उस के लिए मखसूस हो जाना य सुपुर्द करना भी ज़रूरी होता है बनिस्बत इस के कि हमारे अपने ख़यालात को इस में शामिल करें कि हम यकीनी तौर से अल्लाह के रहम को हासिल कर लेंगे। सो – कश्ती हमारे लिए ‘नूह’ की निशानी है। सच पूछा जाए तो यह सरे आम यानी कि खुल्लम खुल्ला अल्लाह के इंसाफ़ की निशानी थी और साथ ही बचने और उस के रहम का ज़रिया भी था। क्यूंकि नूह के जमाने के लोगों में से हर किसी ने उस किश्ती को तैयार होते हुए देखा था। इस लिए यह आने वाले इंसाफ़ का और रहम की दस्तियाबी दोनों के लिए ‘खुल्लम खुल्ला’ निशानी था। मगर यह दिखता है कि उस के रहम का हुसूल उस फ्राह्मी के ज़रिये ही मुमकिन था जिसे अल्लाह ने पहले से इंतज़ाम किया हुआ था।

सो नूह ने अल्लाह के रहम व फ़ज़ल को क्यूँ हासिल किया? तौरेत बहुत बार इस मुहावरे को दोहराती है कि

            “नूह ने उन सब कामों को अंजाम दिया जो खुदावंद ने उसे हुक्म दिया था”

मैं यह पाता हूँ कि मैं उसी काम को करने पर माइल होता हूँ जो मैं समझता हूँ या जो मैं चाहता हूँ या जिस से मैं राज़ी होता हूँ।  मुझे यकीन है कि – नूह (अलैहिस्सलाम) के दिल में भी सैलाब के आने की इतला (तंबीह) और सूखी ज़मीन पर एक बड़ी कश्ती के तामीर के लिए अल्लाह के हुक्म को लेकर कई एक सवाल उस के दिल ओ दमाग में रहे थे होंगे। मगर मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि दीगर लोगों की बनिस्बत नूह एक रास्त्बाज़ शख्स था उसने कश्ती बनाने के मामले में कोई धियान नहीं दिया। मगर उस ने वही सब किया जो उस को अल्लाह की तरफ़ से हुक्म मिला था इस बिना पर नहीं कि उस के बाप ने उसे क्या सिखाया था या इस बिना पर नहीं कि उस ने अपनी ज़िन्दगी में क्या सीखा और समझा था। इस बिना पर नहीं कि उन चीज़ों से जिन से वह मुतमइन था और इस बिना पर भी नहीं कि यह उस के लिए क्या मायने रखता है। सो यह बातें हमारे लिए बड़ी मिसालें यानी कि नमूने हैं जिन के पीछे हमें चलने की ज़रुरत है।

नजात के लिए दरवाज़ा

तौरात हम से यह भी कहती है कि नूह, उसका ख़ानदान और तमाम जानवरों के कश्ती में दाखिल होने के बाद (सवार होने बाद)

            “खुदावंद ने बाहर से उस कश्ती का दरवाज़ा बंद कर दिया था”

पैदाइश 7:16

यह अल्लाह ही था जिसने कश्ती के उस एक दरवाज़े पर काबू रखा हुआ था न कि नूह (अलैहिस्सलाम) ने जब इंसाफ़ की बिना पर ज़मीन पर पानी आया तो बाहर से लोग कश्ती को किसी तरह का नुख्सान नहीं पहुंचा सकते थे न ही उसका दरवाज़ा खोल सकते थे क्यूंकि अल्लाह उस एक दरवाज़े को पूरी तरह से काबू में रखा हुआ था। मगर उसी वक़्त जो अन्दर मौजूद थे वह इस यकीन के साथ आराम से रह सकते थे कि अल्लाह ने कश्ती के दरवाज़े पर काबू कर रखा है इस लिए कोई हवा या मौज उस दरवाज़े को खोल नहीं सकती थी। वह लोग अल्लाह की हिफाज़त और उसके रहम में महफूज़ थे।

इसलिए कि अल्लाह बदलता नहीं है यह बात आज भी हमारे लिए नाफ़िज़ होती है। तमाम नबियों ने ख़बरदार किया है कि एक और इंसाफ़ का दिन आने वाला है। और यह आग के साथ आएगा मगर नूह (अलैहिस्सलाम) की  निशानी हमको यक़ीन दिलाती है कि उस के इंसाफ़ के साथ वह अपना रहम भी पेश करेगा। मगर हमको एक दरवाज़े के साथ उसके कश्ती की राह देखनी है जो हमको रहम हासिल करने की ज़मानत देगा।

अंबिया की क़ुर्बानी

तौरात हमसे यह भी कहती कि

   तब नूह ने यहोवा के लिए एक वेदी बनाई। उसने कुछ शुद्ध पक्षियों और कुछ शुद्ध जानवर  को लिया और उनको वेदी पर परमेश्वर को भेंट के रूप में जलाया।

पैदाइश 8:20

यह आदम/हव्वा और क़ाबील/हाबील के जानवरों कि क़ुर्बानी के नमूने के लिए मुनासिब बैठता है। इस का मतलब यह है कि एक बार फिर एक जानवर की मौत और उस के खून के छाने जाने के ज़रिये नूह (अलैहिस्सलाम) ने दुआ की और अल्लाह के ज़रिये वह दुआ क़बूल की गई। “और ख़ुदा ने नूह और उसके बेटों को बरकत दी” (पैदाइश 9:1) “और नूह के साथ एक अहद बांधा” (पैदाइश 9:8) कि वह आइन्दा से कभी भी पानी के सैलाब के ज़रिये लोगों का इंसाफ नहीं करेगा। तो ऐसा लगता है कि नूह के ज़रिए क़ुर्बानी , मौत और एक जानवर के खून का छाना जाना अल्लाह की इबादत में बहुत दिक्कतें लेकर आ रही थीं। इस के बावजूद भी यह कितनी अहम् बात है। हम तौरेत के नबियों के वसीले से अगली बार लूत के साथ इस जायज़ा को जारी रखेंगे।