लूत की निशानी

(तौरात या बाइबिल) का लूत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का भतीजा था। उसने शरारत पसंद लोगों के बीच रहना पसंद किया था। अल्लाह ने इस हालत को उस ज़माने के तमाम लोगों के लिये पैगम्बराना निशानी बतोर इस्तेमाल किया। मगर सवाल यह है कि वह निशानात क्या थे ? इस के जवाब के लिए हमको इस बयान में दिए गए फ़रक़ फ़रक़ लोगों की तरफ़ नज़दीकी से धियान देना होगा। इस बयान को तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तौरेत्त शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में देख सकते हैं कि तीन जमाअत के लोग पाए फ़ जाते हैं, इन के अलावा अल्लाह के फरिश्तों (पैगम्बरों की जमाअत)। आइये हम इन्हें बारी बारी से देखें।

सदोम के लोग

यह लोग निहायत ही गुमराह थे। यह लोग उम्मीद करते थे कि इनसानी औरतों के अलावा दूसरों की इज़्ज़त से भी खेल सकते थे (जो हक़ीक़त में फ़रिश्ते थे मगर सदोम के लोगों ने सोचा कि वह इंसान थे सो उन्हों ने उन के साथ गिरोह में होकर अस्मतदरी करने का मंसूबा किया)। इस तरह का गुनाह ऐसी संगीन बुराई थी कि अल्लाह ने सारे शहर का इंसाफ़ करने का फ़ैसला किया। फ़ैसला वही था जो इस से पहले भी आदम को दिया गया था।पीछे शुरुआत में अल्लाह ने आदम को इस फ़ैसले से ख़बरदार किया था कि गुनाह की मज़दूरी मौत है। और दूसरी तरह कि सज़ा नहीं (जैसे मारना , क़ैद करना वगेरा जो काफ़ी नहीं था। अल्लाह ने आदम से कहा था:

“….लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का फल कभी न खाना क्यूंकि जिस रोज़ तूने उस में से खाया    तू मरा।”

पैदाइश 2:17

इसी तरह से सदोम के लोगों के गुनाहों कि सज़ा यह थी कि उन लोगों को भी मरना था। दरअसल सदोम शहर के सारे लोगों को और उस में रहने वाले तमाम जानदारों को आस्मान से नाजिल आग के ज़रिये बर्बाद किया जाना था।यह एक नमूने की मिसाल है जो बाद में इंजील शरीफ़ में समझाया गया है:

  “क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी तो मौत है”

रोमियों 6:23

लूत के दामाद 

नूह के बयान में। अल्लाह ने तमाम दुनिया का फ़ैसला किया और आदम की निशानी के साथ यकसां (बराबर का सुलूक किया कि सारे लोग उस बड़े तूफ़ान के ज़रिये हलाक हुए। मगर तौरात शरीफ और कुरान शरीफ़ हमसे कहते हैं कि नूह के ख़ानदान को छोड़ सारी दुनया के लोग बुरे थे। अल्लाह ने सदोम के लोगों का भी इन्साफ़ किया जबकि वह लोग भी गुमराह और बुरे थे। सिर्फ़ इन बयानात के साथ मैं यह सोचने के लिए आज़माया जा सकता हूँ कि मैं अल्लाह के इंसाफ़ से महफूज़ हूँ क्योंकि मैं इतना बुरा नहीं हूँ जैसे कि वह लोग थे । आखिर कार मैं अल्लाह पर पूरा ईमान रखता हूँ, मैं बहुत से नेक काम करता हूँ और मैं ने कभी इस तरह के बुरे काम अनजाम नहीं दिए। तो फिर क्या मैं महफूज़ हूँ ? लूत की निशानी उस के दामादों के साथ मुझे ख़बरदार करती है। हालाँकि वह लोग इस गिरोह में शरीक नहीं थे जो एक गिरोह में होकर जिंसी गुनाह (असमतदरी) अंजाम देने की कोशिश कर रहे थे किसी तरह से उन्हों ने आने वाले इंसाफ़ की तंबीह को संजीदा तोर से नहीं लिया। दरअसल तौरेत शरीफ़ हम से कहती है, लोग  सोच रहे थे कि ‘(वह) लूत उन से मज़ाक़ कर रहा था’। मगर सवाल यह है कि क्या उन की किस्मत शहर के दुसरे लोगों से फ़रक़ थी ? नहीं ! वह उन्हीं की किस्मत में शरीक हुए। अंजाम बतोर लूत के दामादों और सदोम के बुरे लोगों उन दोनों में कोई फ़रक नहीं था। यहाँ निशानी यह है कि हर एक शख्स को इस तंबीह को संजीदा तोर से लेना ज़रूरी था क्यूंकि वह न सिर्फ़ गुमराह लोग थे।

लूत की बीवी          

लूत की बीवी हमारे लिए एक बड़ी निशानी है। तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में ही वह भी दीगर शरीर लोगों के साथ हलाक हुई – वह एक नबी की बीवी थी – मगर लूत के साथ उसका एक ख़ास रिश्त्ता होते हुए भी वह रिश्ता बचा न सका हांलांकि वह सदोम के लोगों के साथ उस बड़े गुनाह में शामिल नहीं थी। उसने फ़रिश्ते के हुक्म को तोड़ा:

              ‘तुम में से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे’ (सूरा 11:81) सूरा ।ए। हूद या

              ‘पीछे मुड़कर न देखना’ (पैदाइश 19:17)

तौरेत हम से कहती है कि

 लेकिन लूत की पत्नी ने वापस देखा, और वह नमक का एक स्तंभ बन गई।

उत्पत्ति १ ९: २६

उसके “पीछे मुड़ कर देखने” का असल मक़सद क्या था उसे समझाया नहीं गया है मगर उस ने सोचा कि अल्लाह के इस छोटे से हुक्म को नज़र अंदाज़ करदेने से कोई ख़ास फ़रक नहीं पड़ेगा – उसकी किस्मत – उसके “छोटे” गुनाह के साथ वैसा ही था जैसा कि सदोम के लोगों का “बड़ा” गुनाह उन के लिए मौत बन कर आई थी। यह हमारे लिए कुछ ऐसी ज़रूरी निशानी है जो कभी कभी यह सोचने से दूर रखती हैं कि यह छोटे गुनाह हैं जिन्हें अल्लाह हिसाब में नहीं लाएगा (इन का इंसाफ़ नहीं होगा) — लूत की बीवी इस ग़लत सोच के खिलाफ़ तम्बीह के लिए हमारी निशानी है:

लूत, अल्लाह और फ़रिश्ते पैग़म्बरान 

जिसतरह हम ने आदम की निशानी में देखा था कि जब अल्लाह ने आदम का इंसाफ़ किया था तो उस ने तो उसने उस पर अपना फ़ज़ल भी अता किया था। और वह इंसाफ़ था उन के लिए चमड़े के पोशाक का इनायत किया जाना। नूह के साथ जब अल्लाह ने इंसाफ़ किया तो उसने फिर से एक बड़ी कश्ती के साथ फ़ज़ल अता किया। फिर से एक बार अल्लाह यहाँ तक कि अपने इंसाफ़ में बा ख़बर है कि वह इंसाफ़ अता करता है ।इसको तौरेत ने इसतरह बयान किया है कि:

जब वह (ल्यूक) हिचकिचाया, तो पुरुषों (स्वर्गदूत जो पुरुषों की तरह दिखते थे) ने अपना हाथ और अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के हाथों को पकड़ लिया और उन्हें सुरक्षित रूप से शहर से बाहर ले गए, क्योंकि प्रभु उनके लिए दयालु थे।

उत्पत्ति १ ९: १६

इससे हम क्या सीख सकते हैं? से पीछे की निशानियों की तरह फ़ज़ल आलमगीर था मगर सिर्फ़ एक तरीके के ज़रीये ही अता किया जाना था। लूत के ख़ानदान को शहर से बाहर रहनुमाई करते हुए अल्लाह ने रहम करके मिसाल के तोर पर शहर के अन्दर एक ऐसी पनाहगाह का इंतज़ाम नहीं किया जो आसमान से आग नाज़िल होने पर उनकी मुहाफ़िज़त हो सके। अल्लाह की तरफ़ से रहम हासिल करने का एक ही रास्ता था – कि शहर से बाहर फ़रिश्तों के पीछे चलो। अल्लाह ने लूत और उसके खानदान पर इसलिए रहम नहीं किया क्यूंकि लूत एक कामिल शख्स था। दरअसल तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ इन दोनों में हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों को अस्मतदरी करने वालों के हाथ सोंपने जा रहा था। यह एक शरीफ़ाना पेशकश नहीं थी। तौरेत हमसे कहती है कि फरिशतों के ख़बरदार किये जाने पर भी लूत ‘हिचकिचाया’। इन सब के बावजूद भी अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिये उसका हाथ पकड़ कर शहर के बाहर लेजाने के ज़रिये उसपर अपना रहम ज़ाहिर करता है। यह हमारे लिए एक निशानी है : अल्लाह हम पर रहम इनायत करेगा, यह हमारी भलाई पर मुनहसर नहीं है। मगर हम लूत की मानिंद जो हमारे सामने है रहम हासिल करने की ज़रुरत है जिस से हमारी मदद हो – लूत के दामादों ने इसे हासिल नहीं किया और उन्हें इससे कोई फाइदा हासिल नहीं हुआ।

तौरेत हम से कहती है कि अल्लाह ने लूत के चचा, एक बड़े नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबब से जिसने उसके लिए अल्लाह से इल्तिजा करी थी उस पर अपना रहम ज़ाहिर किया – (यहाँ पैदाइश की इबारत को देखें) तौरेत शरीफ़ इब्राहिम (अलै.) के निशानियों के वसीले से अल्लाह की  जानिब से वायदों को को जारी रखती है कि “तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब क़ौमें बरकत पाएंगीं क्यूंकि तू ने मेरी बात मानी” (पैदाइश 22:11)। यह वायदा हमको चौकन्ना कर देना चाहिए इसलिए कि कोई फ़रक़ नहीं पड़ता कि हम कौन हैं, कौन सी ज़बान हम बोलते हैं, हम किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, या हम कहां रहते हैं वगैरा हम मालूम कर सकते हैं कि आप और मैं ‘ज़मीन की तमाम कौमों का’ एक हिस्सा हैं।अगर इब्राहिम की इल्तिजा के ज़रिये अललाह ने मुतहर्रिक होकर लूत पर रहम ज़ाहिर किया हालांकि वह इस के लिए काबिल नहीं था तो कितना ज़ियादा इब्राहीम (अलै.) की निशानियां हम पर रहम ज़ाहिर करेंगीं जो कि हम भी ‘तमाम कौमों में से’ एक हैं? इसी सोच के साथ हम तौरेत में इब्राहीम की निशानियों को देखते हुए आगे बढ़ेंगे।