हज़रत मूसा की निशानी : फ़सह

500 सालों के लग भाग जो अब गुज़र गया है जब से कि हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) जो 1500 क़ब्ल मसीह के लगभग थे।  हज़रत इब्राहीम के मरने के बाद के उन के बेटे हज़रत इस्हाक़ की औलाद आज इस्राईल कहलाते हैं।  अब उन्की तादाद बहुत ज़ियादा है। मगर एक ज़माना था कि वह मिसर में फ़िरोन  के गुलाम हो चुके थे। यह इसलिए हुआ कि हज़रत यूसुफ़ जो हज़रत इब्राहीम के पर पोते थे उनको मिसर में गुलाम बतोर बेच दिया गया था।  इस के कई सालों बाद उनकी शादी हुई और उन का ख़ानदान मिसर में बूदो बाश करने लगा -इन सारी वाक़ियात को पैदाइश 45-46 बाब में समझाया गया है जो हज़रत मूसा की किताब तौरात की पहली किताब है।

सो अब हम एक और बड़े नबी हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बड़ी निशानी में आ गए हैं जिन की बाबत तौरात की दूसरी किताब में ज़िकर पाया जाता है।  हज़रत मूसा को ख़ुदा की तरफ़ से हुक्म दिया गया था कि वह जाकर मिसर के बादशाह फ़िरोन से मुलाक़ात करे। हज़रत मूसा हुक्म मानकर फ़िरोन के पास गए जिस का अंजाम यह हुआ कि हज़रत मूसा और फ़िरोन के जादूगरों से मुडभेड़ हो गई। इस मुडभेड़ के चलते फ़िरोन और उस का खानदान और दीगर मिसरी लोग जो फ़िरोन की पैरवी करते थे उन के ख़िलाफ़ 9 वाबाएं नाज़िल हुईं जो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के लिए निशानी बतोर थीं। मगर इन सब के बावजूद भी फ़िरोन ख़ुदा पर ईमान नहीं लाया और उन निशानियों को नज़र अंदाज़ करके ख़ुदा की न फ़रमानी की।

सूरा अन नाज़िआत (सूरा 79 – वह लोग जो आगे घसीटे गए) इन वाक़ियात को इस तरह से बयान किया गया है

(ऐ रसूल) क्या तुम्हारे पास मूसा का किस्सा भी पहुँचा हैजब उनको परवरदिगार ने तूवा के मैदान में पुकाराकि फिरऔन के पास जाओ वह सरकश हो गया है(और उससे) कहो कि क्या तेरी ख्वाहिश है कि (कुफ्र से) पाक हो जाएऔर मैं तुझे तेरे परवरदिगार की राह बता दूँ तो तुझको ख़ौफ (पैदा) होग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया e

सूरा  अन नाज़ीआत  79:15-20

सूरा अल मुज़म्मिल (सूरा 73 – जिन्हें छिपा लिया गया या ढांक लिया गया) यह फ़िरों के जवाब का ज़िकर करता है:

 तो फिरऔन ने उस रसूल की नाफ़रमानी की तो हमने भी (उसकी सज़ा में) उसको बहुत सख्त पकड़ा

सुरह  अलमुज़म्मिल 73:16

हज़रत मूसा की बड़ी निशानी क्या थी जो सूरा अन नाज़ियात में बयान किया गया है? और सूरा अल मुज़म्मिल में फ़िरोन के लिए बड़ी सज़ा क्या थी?निशानी और सज़ा इन दोनों की बाबत दसवें वबा में बताया गया है।

दसवीं वबा

सो अल्लाह दसवें वबा को लेन वाला था जो बहुत ही इन्तहा दर्जे का ख़ौफ़नाक वबा (आफ़त) थी। भारी मुसीबत (दसवीं वबा के आने से पहले कुछ तैयारियों और तशरीह की बाबत तौरात हमें समझाती है और कुरान शरीफ़ की ज़ेल की  आयत भी इस मुद्दे पर बयान पेश करता है।

और हमने यक़ीनन मूसा को खुले हुए नौ मौजिज़े अता किए तो (ऐ रसूल) बनी इसराईल से (यही) पूछ देखो कि जब मूसा उनके पास आए तो फिरऔन ने उनसे कहा कि ऐ मूसा मै तो समझता हूँ कि किसी ने तुम पर जादू करके दीवाना बना दिया हैमूसा ने कहा तुम ये ज़रुर जानते हो कि ये मौजिज़े सारे आसमान व ज़मीन के परवरदिगार ने नाज़िल किए (और वह भी लोगों की) सूझ बूझ की बातें हैं और ऐ फिरऔन मै तो ख्याल करता हूँ कि तुम पर यामत आई है(सूरा  बनी इस्राईल

रात का सफ़र  17:101-102

सो फ़िरों के सल्तनत की तबाही और बर्बादी हुई। मगर सवाल यह है कि इस तबाही और बर्बादी के पीछे कौन था?क्या वाक़िया पेश आया था? आप देखें कि उस के आधे सल्तनत की तबाही उन नौ वाबाओं के ज़रिये फ़रक फ़रक तरीकों से हो चुकी थी। शायद आपको याद होगा कि नूह के ज़माने के लोग आलमगीर दर्जे पर उस बड़े सैलाब में डूब कर मर गए थे, तबाह हो गए थे।  और अगर आप हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की बात करें तो उन की बीवी ख़ुदा के हुक्म की नाफ़रमानी की वजह से नमक का खम्बा बन गई थी। मगर यह तबाही नूह के ज़माने के लोगों की तबाही से फ़रक थी क्यूंकि यह बनी इस्राईल के तमाम लोगों के लिए निशानी थी – एक बड़ी निशानी जिसतरह कुरान शरीफ़ कहता है

 ग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया

सूरा 79:20

दसवीं वबा की तशरीहात को आप तौरात की दूसरी किताब ख़ुरूज में पढ़ सकते हैं जिस को यहाँ पर जोड़ा गया है -यह एक मुकम्मल बयान है जिस से ज़ेल के मज़ामीं को समझने के लिए बहतर तशरीह हासिल होगी –

फ़सह का बर्रा मरने से बचाता है

यह ख़ुदा का कलाम हमको बताता है कि जो तबाही (दसवां वबा) बतोर था वह जो अल्लाह के ज़रिये नाज़िल हुआ थावह यह था कि उस आख़री रात को तमाम पह्लोठों को मार दिया जाना था सिवाए उन घरों के जहां पर एक बर्रा ज़ुबह करके उसके खून को घर की चौखट पर लगा दिया गया था। यह सारे घर बनी इस्राएल के घर थे जिन्हों ने ख़ुदा के हुक्म की फ़रमानबरदारी की थी। मगर इस में फ़िरोन का घराना शामिल नहीं था।  न ही उसके उमरा और उसके हाकिम लोग थे।  इन सब के घराने में पह्लोठे बच्चों की मौत हुई जो आगे चलकर ताजो तख़्त के और ऊंचे ओहदों के वारिस थे अगर फ़िरोन ख़ुदा पर ईमान लाकर मूसा की बात पर अमल करता तो क्या उस के बच्चे मरते? मगर ऐसा नहीं हुआ। मिस्रियों का का सारा घराना अपने पह्लोठे बच्चों को मरने से रोक न सके – जब उन्हों ने हज़रत मूसा की बात नहीं मानी, बर्रे की क़ुर्बानी नहीं की, उस का खून दरवाज़े के चौखट पर पर नहीं लगाया तो उन सब ने एक आलमगीर वबा का सामना किया । मगर जिन के घरों में एक बर्रा कुर्बान हुआ था और उस का खून दरवाज़े के चौखट पर लगाया गया था, उन में से हर एक के लिए वायदा था कि उन के पह्लोठे यहाँ तक कि उन का पूरा ख़ानदान तबाह होने से बच जाएगा। अल्लाह का इंसाफ़ उन के घरों से होकर गुजरेगा और वह महफूज़ रहेंगे -सो उस दिन उस निशानी को ही फ़सह कहा गया है (जबकि मौत उन तमाम घरों से होकर गुज़री जिन के घरों पर बर्रे के खून के निशान थे)। मगर दरवाजों पर यह जो खून का निशान था वह किस लिए था? तौरात हमें बताती है :

और खुदावंद ने मूसा से कहा ….” …और जिन घरों में तुम हो उन पर वह फ़सह के बर्रे का खून तुम्हारी तरफ़   से निशान ठहरेगा और मैं उस खून को देखकर तुमको छोड़ता जाऊंगा – और जब मैं मिस्रियों को मारूंगा तो वह वबा तुम्हारे पास फटकने की भी नहीं कि तुमको हलाक करे”  

ख़ुरूज 12:13

सो हालांकि ख़ुदा दरवाज़े पर लगे उस खून को देख रहा था और जब उस ने उस खून को देखा तो उस ने यह नहीं कहा  कि यह उस के लिए निशाँ था बल्कि उस ने कहा कि वह खून ‘तुम्हारी तरफ़ से निशान’ ठहरेगा – यानी बनी इस्राईल की तरफ़ से उस हरेक शख्स के लिए जो तौरात में इस बयान को पढ़ता है। तो फिर यह निशान हमारे लिए किसतरह है? उस खुश क़िस्मती की रात के बाद खुदावंद ने उन पर हुक्म जारी किया, वह क्या हुक्म था इस को पढ़ें :

27 तो तुम लोग कहोगे, ‘यह फसह पर्व यहोवा की भक्ति के लिए है। क्यों? क्योंकि जब हम लोग मिस्र में थे तब यहोवा इस्राएल के घरों से होकर गुजरा था। यहोवा ने मिस्रियों को मार डाला, किन्तु उसने हम लोगों के घरों में लोगों को बचाया।’

ख़ुरूज 12:27

फ़सह के दिन से यहूदी केलेन्डर का आग़ाज़ होता है

सो तमाम बनी इस्राईल को हुक्म दिया जाता है कि हर साल उसी दिन फ़सह मनाया करें। इस्राईली केलेन्डर मग़रिबी केलेन्डर से थोड़ा फ़रक़ है। सो अगर आप मग़रिबी केलेन्डर के पीछे चलते हैं तो हर साल दिन का हल्का सा फ़रक़हो जाता है – यह बिलकुल वैसे ही है जैसे रमज़ान का महीना और ईद में हर साल दिन का फ़रक़ हो जाता है क्यूंकि यह दोनों केलेन्डर चाँद के हिसाब से चलते हैं।  मगर आज के दिन तक 3500 साल के बाद भी यहूदी लोग हर साल इस वाक़िये की याद में फ़सह की ईद मनाते आ रहे हैं। हज़रत मूसा का वह वाक़िया जिस में खुदावंद ने तौरात शरीफ़ में हुक्म दिया था उसकी ताबेदारी में यहूदी लोग इसे मनाते हैं।   

  1. मौजूदा दिनों का नज़ारा जब कई एक बर्रे आने वाले यहूदियों की

फ़सह के जश्न के लिए ज़बह किये जाते हैं –

यहाँ यहूदी लोगों के मौजूदा ज़माने की तस्वीर है जिस में फ़सह की ईद की तैयारी में कई एक बर्रों की क़ुरबानी दी जा रही है।  यह ईद का जश्न मनाने की तरह ही है तारीख़ के ज़रिये इस जश्न को मानते हुए हम बिलकुल खिलाफ़ मामूल तोर से एक बात नोट कर सकते हैं।  आप इंजील शरीफ़ में नबी हज़रत ईसा अल मसीह की गिरफ़्तारी और मुक़द्दमे की तफ़सीलात के बयान पर गौर कर सकते हैं।  

“फिर यहूदियों के सरदार येसू को कैफ़ा के पास से क़िले को ले गए और सुबह का वक़्त था और वह खुद किले में न गए ताकि ना पाक न हों बल्कि फ़सह खा सकें “……”मगर तुम्हारा दस्तूर है कि मैं फ़साह के मौके पर तुम्हारी खातिर एक आदमी को छोड़ दिया करता हूँ – पस तुमको क्या मंज़ूर है कि मैं तुम्हारी खातिर यहूदियों के बादशाह (येसू ) को छोड़ दूँ? उन्हों ने चिल्लाकर फिर कहा कि उस को नहीं बराब्बा को -और बराब्बा एक डाकू था “

युहन्ना 18:28, 39-40

दूसरे अलफ़ाज़ में,हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) गिरफ़तार हुए थे और यहूदी केलेन्डर के मुताबिक फ़सह के दिन ही येसू को मस्लूबियत के लिए ले जाया गया था। अगर आप को हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की तीसरी निशानी की बाबत याद है तो हज़रत यहया ने हज़रत ईसा अल मसीह को जो लक़ब दिया था वह था वह था :

 29 अगले दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी तरफ आते देखा और कहा, “परमेश्वर के मेमने को देखो जो जगत के पाप को हर ले जाता है। 30 यह वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, ‘एक पुरुष मेरे पीछे आने वाला है जो मुझसे महान है, मुझसे आगे है क्योंकि वह मुझसे पहले विद्यमान था।’

युहन्ना 1 : 29 -30

ईसा (अलैहिस्सलाम) फ़सह के दिन सज़ा याफ़ता हुए

यहाँ हम इस निशानी की बे मिसाली को देखते हैं।  ईसा (अलैहिस्सलाम) ख़ुदा का बर्रा इसी फ़सह के दिन मस्लूब (क़ुर्बान) होने के लिए दुनिया में भेजा गया था जिन दिनों में  यहूदी लोग (मग़रिबी केलेन्डर के मुताबिक़ 33 ईस्वी में रहते थे) जिस दिन 1500 साल पहले फ़सह की यादगारी में ईद मना रहे थे।  इसी लिए यहूदियों के फ़सह का जश्न आम तोर से हर साल ईस्टर के हफ़ते में पड़ता है – ईसा अल मसीह के गुज़रने की याददाश्त बतोर – क्यूंकि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम इसी मुक़र्ररा दिन में कुर्बान होने के लिए भेजे गए थे।  (ईस्टर और फ़सह का एक जैसा तारीख़ नहीं है क्यूंकि यहूदी और मग़रिबी केलेन्डर के साल को फ़रक़ फ़रक़ तरीक़े से मुवाफ़िक़ बना कर पूरा किया जाता है।  मगर आम तोर से यह दोनों उसी हफ़्ते में पास्ता है )

अब आप एक मिनिट के लिए सोचें कि “निशानी” क्या क रत्ते हैं -आप एक ही निशानियों को ज़ेल में देख सकते हैं जब हम खोपड़ी और हड्डियों के निशाँ को देखते हैं तो हम मौत और खतरे कि बाबत सोचते हैं।  सुनहरे तीर की ‘निशानी’  देखते हैं तो हम यह मान कर चलते हैं कि हम मैक डोनल्स कि बाबत सोच रहे हैं। निशानियाँ क्या करते हैं? वह हमारे दमागों में इशारा करने वाले होते हैं ताकि किसी चीज़ की तरफ़ देख कर हम सोच सकें।                                                

यह निशान टेनिस के खिलाड़ी नाडल बनडाना कि नाइक के लिए है।  नाइक चाहता है कि हम नाडल पर इस निशानी को देखें। दूसरे लफ़्ज़ों में निशानियाँ हमारे दमाग़ को इशारा करने वाले होते हैं कि हम अपनी समझ को ख्वाहिश की हुई चीज़ की तरफ़ देखने के लिए तवज्जोह करें। इसी तरह हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की निशानी भी है।  यह अल्लाह ही है जिस ने यह निशान हमारे लिए दिया है।  उस ने यह निशान क्यूँ दिया? खैर यह निशानी काबिले मुलाहज़ा बर्रों के औक़ात के साथ है जो एक ही दिन में क़ुर्बान हुए थे उसी तरह ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) क़ुर्बानी के लिए एक इशारा करने वाला बतोर होना चाहिए।

यह हमारे दमागों में काम करता है जिस तरह मैं ने नक्शे में दिखाया है।  निशानी वहां पर मजूद थी कि ईसा अल मसीह के दिए जाने की तरफ़ हमको इशारा करे। उस पहले फ़साह में बर्रे क़ुर्बान किये जाते थे और खून निथारे जाते थे और फैलाए जाते थे कि लोग ज़िन्दा रह सकें। और इस तरह यह निशानी हज़रत ईसा की तरफ़ इशारा करते हुए हम से कहता है कि यह वही ख़ुदा का बर्रा है जो मौत के हवाला किया गया ताकि हम ज़िन्दगी हासिल कर सकें।

हज़रत इब्राहिम की तीसरी निशानी में हमने देखा था कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का इम्तिहान मोरियाह के पहाड़ पर अपने बेटे की क़ुरबानी से हुआ। मगर आख़री लम्हे में हमने देखा था कि उसके बेटे के बदले में एक मेंढा कुर्बान किया गया। एक मेंढा मारा ताकि हज़रत इब्राहीम का बेटा ज़िन्दा रह सके। मोरिया का पहाड़ बिलकुल वही जगह थी जहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को क़ुर्बानी के वास्ते दिया गया था – वह एक निशानी थी हमारे सोचने के लिए कि हज़रत ईसा अल मसीह क़ुर्बानी के लिए उसी मक़ाम  का इशारा करने के ज़रिये दिए जा रहे हैं। यहाँ इस मूसा की निशानी में उसी वाक़िये के लिए एक और इशारा करने वाले को पाते हैं – हज़रत ईसा अल मसीह का क़ुर्बानी के लिए दिया जाना – फ़सह की क़ुर्बानी की बाबत केलेन्डर के उस दिन की तरफ़ इशारा करने के ज़रिये इसी वाक़िये की तरफ़ इशारा करने के लिए एक बर्रे की क़ुर्बानी को एक बार फिर इस्तेमाल किया गया – क्यूँ? हम हज़रत मूसा की अगली निशानी के साथ बयान को जारी रखेंगे ताकि आगे की मालूमात हासिल कर सकें। यह निशानी है सीना पहाड़ पर शरीअत का दिया जाना।

मगर इस कहानी को ख़तम करने के लिए कि फ़िरोन का क्या हाल हुआ? जिसतरह हम ने तौरात की इबारत में से   पढ़ा उस ने उस तंबीह की परवाह नहीं की जो हज़रत मूसा ने उसे साफ़ लफ़्ज़ों में बताया था न ही अपने पह्लोठे बेटे का ख़याल किया जो उस का वारिस था और उस रात मारा गया था -तब उस ने बनी इस्राईल को मिसर छोड़ने की इजाज़त दी थी। मगर कुछ घंटों बाद उस ने अपना इरादा बदल दिया था और उस ने बहरे क़ुल्ज़ुम तक बनी इस्राईल का पीछा किया। वहां खुदावंद ने बनी इस्राईल को बहरे क़ुल्ज़ुम को पार करने का रास्ता तैयार किया। मगर फ़िरोन और उसका सारा लश्कर उसी दरया में डूब कर मर गए – 9 वबाओं के बाद फ़साह की मौतें (पह्लोठों का मारा जाना) और लश्कर का नुक़सान यह सब मिलकर मुल्क -ए- मिसर में फ़िरोन कि सल्तनत को ऐसा कमज़ोर किया कि अपने उस पहले दर्जे को फिर से हासिल नहीं कर पाया जिसतरह कि वह दुनया सब से ज़ियादा ताक़तवर फ़ौजी बेड़ा माना जाता था।  अल्लाह ने मुल्क -ए- मिसर का इंसाफ़ किया।

इब्राहीम की 2 निशानी : रास्त्बाज़ी

अल्लाह की जानिब से हम को क्या कुछ ज़रूरत है ? इस सवाल के लिए कई एक जवाब हैं, मगर आदम की निशानी हम को याद दिलाती है कि हमारी सब से पहली और सब से बड़ी ज़रुरत रास्त्बाज़ी  है। यहाँ हम उन अलफ़ाज़ को देखते हैं जो बराहे रास्त हमारी तरफ़ मुखातब है (बनी आदम)।

  हे आदम के बच्चों! हमने आपकी लाज को ढंकने के लिए आपको शुभकामनाएँ दी हैं, साथ ही साथ आपके लिए श्रंगार भी किया है। लेकिन धार्मिकता की छाप – यही सबसे अच्छा है। ऐसे अल्लाह के संकेतों में से हैं, कि उन्हें नसीहत मिल सकती है।

सूरत 7:26

तो फिर ‘रास्त्बाज़ी’ क्या है ? तौरेत अल्लाह कि बाबत हम से कहती है कि (इसतिसना 32:4)

मैं यहोवा के नाम की घोषणा करूंगा।
ओह, हमारे भगवान की महानता की प्रशंसा करो!
वह रॉक है, उसके काम एकदम सही हैं,
और उसके सभी तरीके सिर्फ हैं।
एक वफादार ईश्वर जो गलत नहीं करता,
ईमानदार और बस वह है।

यह अल्लाह की रास्त्बाज़ी की तस्वीर है जिसको तौरेत में बयान किया गया है ।रास्त्बाज़ी के मायने हैं वह जो कामिल है; यानि मुकम्मल तोर से कामिल; (थोड़ा या ज़ियादा नहीं बल्कि तमाम कमाल) जिसकी राहें सच्ची हैं ,जिसमें थोड़ी सी भी,नाम के लिए भी बुराई नहीं पाई जाती; जो कि बरहक़ है। यह है रास्त्बाज़ी जिसतरह से अल्लाह के बारे में तौरेत ज़िकर करती है। मगर सवाल यह है कि हमको रास्त्बाज़ी कि क्या ज़रुरत है और क्यूँ ज़रुरत है? इस का जवाब पाने के लिए हम एक ज़बूर का हवाला देखेंगे। ज़बूर 15 जिसको हज़रत दाऊद (अलै.) ने लिखा है इसे हम इस तरह से पढ़ते हैं:

प्रभु, आपके पवित्र तम्बू में कौन रह सकता है?
  आपके पवित्र पर्वत पर कौन रह सकता है?

   2 जिसकी राह चलती है, वह निर्दोष है,
    जो धर्मी है,
   जो उनके दिल से सच बोलता है;
    3 जिसकी जीभ में कोई बदनामी न हो,
    जो पड़ोसी के लिए गलत नहीं है,
    और दूसरों पर कोई गाली नहीं डालता;
     4 जो एक वीभत्स व्यक्ति का तिरस्कार करता है
    जो प्रभु से डरते हैं उनका आदर करते हैं;
    जो दर्द होने पर भी शपथ रखता है,
    और उनका मन नहीं बदलता है;
    5 जो बिना ब्याज के गरीबों को पैसा उधार देता है;
    जो निर्दोष के खिलाफ रिश्वत स्वीकार नहीं करता है …

  जब यह पूछा जाता है कि कौन अल्लाह के ‘मुक़द्दस पहाड़’ पर रह सकता है, तो दुसरे तरीके से यह पूछा जाता है या इस सवाल का दूसरा पहलू यह है कि ‘अल्लाह के साथ कौन जन्नत में रहेगा’? तो हम देख सकते हैं कि इस का जवाब यह है कि “वह जो बे गुनाह और ‘रास्त्बाज़’ है (आयत 2)। वह शख्स अल्लाह के साथ जन्नत में दाखिल हो सकता है। इसी लिए हम को रास्त्बाज़ी की ज़रूरत है। रास्त्बाज़ी की ज़रुरत इस लिए भी है क्यूंकि खुद अल्लाह कामिल है।

अब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की दूसरी निशानी पर गौर करें। किताबों से इबारत को खोलने के लिए यहाँ पर किलिक करें। तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ की आयतों को पढने के बाद हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के रास्ते पर चले (सूरा 37:83) और ऐसा करते हुए उस ने ‘रास्त्बाज़ी’ हासिल की (पैदाइश 15:6)। यही बात आदम कि निशानी में भी हम से कहा गया था कि हमें रास्त्बाज़ी की ज़रुरत है। सो अहम् सवाल हमारे लिए यह है कि : उसने इसे किस तरह हासिल किया ?

अक्सर मैं सोचता हूँ कि मै रास्त्बाज़ी को दो रास्तों में से एक को चुनने के ज़रिये हासिल करता हूँ पहले रास्ते में (मेरे ख़यालात में) अल्लाह के वजूद पर ईमान लाने के ज़रिये या उसे तस्लीम करने के ज़रिये मैं रास्त्बाज़ी को हासिल करता हूँ। मैं अल्लाह पर ‘ईमान’ लाता हूँ। इस ख़याल का सहारा लेते हुए क्या हम तौरेत में ऐसा नहीं पढ़ते कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) खुदावंद पर ईमान नहीं लाए थे? देखें (पैदाइश 15:6) मगर कुछ और गौर ओ फ़िक्र के साथ मैं ने यह महसूस किया है कि ईमान लाने का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि एक वाहिद ख़ुदा के वजूद पर ईमान लाना – नहीं बल्कि अल्लाह ने उसको एक पक्का वायदा किया था कि वह अपना एक बेटा हासिल करेगा। और वह एक ऐसा वायदा था जिस के लिए इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को चुनना था कि वह इस पर ईमान लाएं या नहीं। इस की बाबत आगे सोचें कि शैतान या इब्लीस भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखता है। और यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि उस के अन्दर कोई रास्त्बाज़ी नहीं है। सो सादगी के साथ अल्लाह के वजूद पर ईमान लाना ही ‘किसी मसले का हल’ नहीं है। मतलब यह कि इतना ही काफ़ी नहीं है।

दूसरा रासता जो मैं अक्सर सोचता हूँ वह यह है कि रास्त्बाज़ी को मैं अपनी क़ाबिलियत से हासिल कर सकता हूँ या मैं इसको नेक काम या मज़हबी कामों को करने के ज़रिये अल्लाह से कमा सकता हूँ जैसे बुरे कामों की निस्बत भले कामों को ज़ियादा करना, नमाज़ अदा करना, रोज़े रखना या किसी तरह के मज़हबी कामों को अंजाम देना मुझे इजाज़त देता है कि मैं रस्त्बाज़ी हासिल करने का हक़दार बनू, कमाऊं या क़ाबिल बनूं। मगर गौर करें तौरेत शरीफ़ इस तरह से हरगिज़ नहीं कहती।

अबराम खुदावंद पर ईमान लाया और उसने [यानी कि अल्लाह ने] उसके लिए [यानी इब्राहीम अलै. के लिए] रास्त्बाज़ी गिना गया।

पैदाइश15:6

इब्राहीम (अलै.) ने रास्त्बाज़ी को कमाया नहीं था बल्कि यह उसके लिए ‘शुमार किया गया’ था। सो इन दोनों में क्या फ़रक़ है? सहीह मायनों में देखा जाए, अगर कोई चीज़ ‘कमानी’ है तो आप उस के लिए काम करते हैं फिर आप उसके मुस्तहक़ होते हैं। यह बिलकुल उसी तरह है जैसे आप मेहनत करते हैं तो आप मज़दूरी के हक़दार होते है। पर अगर आप के नाम कोई चीज़ जमा की जाती या मंसूब की जाती है तो यह आप को अता की जाती है। यह आप का कमाया हुआ नहीं है या आप मुस्तहक़ नहीं थे।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) वह शख्स थे जो गहराई से अल्लाह (वाहिद ख़ुदा) के वजूद पर ईमान लाए थे। वह दुआ बंदगी करने वाले और दूसरों की मदद करने वाले थे। जैसे कि वह अपने भतीजे लूत/लोट की मदद करते और उस के लिए दुआ करते थे। यह वह बातें हैं जिन का हम इनकार नहीं कर सकते। मगर जो कुछ इब्राहीम के तोर तरीके की बाबत बताया वह बहुत ही सीधा साधा जिन्हें हम तक़रीबन चूक जाते हैं। तौरेत हम से कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) रास्त्बाज़ी इसव लिए अता हुई क्यूंकि उन्हों ने अल्लाह के वायदों पर यकीन किया था। रास्त्बाज़ी हासिल करने की बाबत जो भी हमारी आम समझ है यह उसको मंसूख करता है चाहे इस सोच के ज़रिये से कि अल्लाह के वजूद पर ईमान रखना ही काफी है या किसी हद तक नेक काम और मज़हबी सरगर्मियां (नमाज़, रोज़ा वगैरा) इन्हें बजा लाने से हम रास्त्बाज़ी को कमा सकते या उसके हक़दार हो सकते हैं। मगर याद रखें कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने इस रास्ते को नहीं अपनाया था। उन्हों ने सादगी से अल्लाह के वायदे पर यक़ीन करने को चुना।

अब आप देखें कि एक बेटा इनायत किये जाने के वायदे पर यकीन करने का चुनाव शायद एक सीधी बात हो सकती थी मगर यह यक़ीनी तोर से आसान नहीं था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) आसानी वायदे कि परवाह किये बगैर रह सकते थे इस सबब से कि हक़ीक़त में अल्लाह उसे एक बेटा देने की कुदरत रखता है तो उसी वक़्त उसे इनायत करे क्यूंकि इस दौरान इब्राहीम और उसकी बीवी सारा इतने उमरज़दह हो चुके थे कि बच्चे का होना ना मुमकिन था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की पहली निशानी में उसकी उम्र 75 साल से ऊपर थी जब उस ने अपने मुल्क को छोड़ा था और कनान में पहुंचा था। उस वक़्त अल्लाह ने उसको वादा किया था कि उस से एक बहुत ‘बड़ी कौम’ बनेगी। इस वायदे के बाद कई एक साल गुज़र चुके थे और वह दोनों उमर रसीदा हो चुके थे और डर हक़ीक़त उन्हों ने पहले से ही बहुत ज़ियादा इंतज़ार किया था। और अभी तक उनके एक बच्चा भी नहीं हुआ था तो एक ‘बड़ी कौम’ की बात कैसे हो सकती थी? “अगर अल्लाह को एक बड़ी कौम ही बनाना था तो उसने पहले से ही एक बेटा क्यूँ नहीं दिया” ? उसको शायद ताज्जुब लगा होगा। दुसरे लफ़्ज़ों में हालांकि उसके एक बेटा होने के वादे पर यकीन तो किया था मगर गालिबन उसके दमाग में वायदे की बाबत जवाब न मिलने वाले सवालात थे। उसने वायदे पर यकीन किया था इसलिए कि वायदे का देने वाला अल्लाह था – हालाँकि वह वायदे की हर बात को समझता नहीं था। मगर बुढापे की  उम्र में बच्चा होने के इस वायदे पर यकीन करने के लिए उसे और उसकी बीवी को ज़रुरत थी कि वह अल्लाह के एक मोजिज़े पर ईमान लाए कि वह एक मोजिज़े को अंजाम दे।

वायदे पर ईमान रखना सरगरम होकर इंतज़ार करने का भी तक़ाज़ा करता है। उसकी पूरी ज़िन्दगी एक तरह से दखलंदाज़ थी जब वह कनान के वायदा किये हुए मुल्क में खेमों में सालों तक इंतज़ारी में अपने दिन गुज़ार रहा था कि वायदा किया हुआ बेटा उसे मिल जाए। यह उस के लिए बड़ा आसान हो जाता अगर वह अल्लाह के वायदे को इल्तिफ़ात कर जाता और मसोपतामिया (मौजूदा इराक़) में अपने घर वापस चला जाता जिसे वह बहुत सालों पहले छोड़ चुका था जहां उस के भाई और उस का ख़ानदान और दीगर रिश्तेदार अभी भी खयाम करते थे। सो इब्राहीम (अलै.) को मुश्किलों के साथ जीना पड़ रहा था ताकि वायदे पर ईमान रखना जारी रखे। हर एक घड़ी और हर एक दिन बल्कि कुछ साल तक जबकि वह वायदे के पूरा होने का इंतज़ार कर रहा था – वायदे पर का उसका भरोसा बहुत बड़ा था जो कि ज़िन्दगी के आम हुसूल (जैसे तस्कीन और फ़लाह व बहबूद) पर फौकिय्क्त हासिल था। हकीकी मायनों में वायदे के पेशबंदी में जीना इस का मतलब था कि ज़िन्दगी के आम हुसूल के लिए मरना। वायदे पर ईमान रखने के ज़रिये वह अपने भरोसे और अल्लाह के लिए महब्बत दोनों का इज़हार कर रहा था।

इस तरह वायदे पर यक़ीन करना यह सिर्फ़ उस के लिए दिमाग़ी समझोते से बाहर जा रहा था। इब्राहीम (अलै.) को  अपनी ज़िन्दगी, शोहरत, मुहाफ़िज़त, हाल के अमल और उम्मीदों को इस वायदे पर मुताक्बिल के लिए जोखों में डालने की ज़रुरत थी। क्यूंकि उसने मुस्तअद्दी और फ़रमानबरदारी से इंतज़ार किया था।             

यह निशानी बताती है कि किस तरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के उस वायदे पर ईमान लाया जो एक बेटे के अता करने की बाबत थी और ऐसा करने के ज़रिये उसको अता भी हुई और रास्त्बाज़ी उस के नाम शुमार किया गया। सही मायनों में देखा जाए तो इब्राहीम (अलै.) ने खुद को इस वायदे के लिए मख़सूस किया था। उस के पास चुनाव था कि वायदे की परवाह न करता और अपने मुल्क (मौजूदा इराक़) में वापस चला जाता जहां से वह वापस आया था। और वह ऐसा भी कर सकता था कि उस वायदे की परवाह न करता जबकि अभी भी अल्लाह के वजूद पर ईमान रखे हुए था, अभी भी नमाज़ रोज़े की पाबंदी और दूसरों की मदद करनी जारी थी – मगर इसके बाद अगर वह सिर्फ़ अपने मज़हब पर काइम रहता मगर उसको ‘रास्त्बाज़ी’ में शुमार नहीं किया जाता। और जिस तरह कुरान शरीफ़ कहता है “हम सब जो आदाम की औलाद हैं – रास्त्बाज़ी के पोशाक हैं – जो कि बहुत ही उमदा है” – यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का रासता था।

हम ने रस्त्बाज़ी की बाबत बहुत कुछ सीखा है जो कि जन्नत में दाखिल होने के लिए ज़रूरी है और यह कमाया नहीं जाता बल्कि हमारे लिए शुमार किया जाता है। और यह अल्लाह के वायदे पर भरोसा करने के ज़रिये शुमार किया जाता है ।मगर सवाल यह है कि रस्त्बाज़ी के लिए कौन क़ीमत चुकाएगा ? हम निशानी 3 के साथ जारी रखेंगे।

लूत की निशानी

(तौरात या बाइबिल) का लूत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का भतीजा था। उसने शरारत पसंद लोगों के बीच रहना पसंद किया था। अल्लाह ने इस हालत को उस ज़माने के तमाम लोगों के लिये पैगम्बराना निशानी बतोर इस्तेमाल किया। मगर सवाल यह है कि वह निशानात क्या थे ? इस के जवाब के लिए हमको इस बयान में दिए गए फ़रक़ फ़रक़ लोगों की तरफ़ नज़दीकी से धियान देना होगा। इस बयान को तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ पर किलिक करें।

तौरेत्त शरीफ़ और कुरान शरीफ़ में देख सकते हैं कि तीन जमाअत के लोग पाए फ़ जाते हैं, इन के अलावा अल्लाह के फरिश्तों (पैगम्बरों की जमाअत)। आइये हम इन्हें बारी बारी से देखें।

सदोम के लोग

यह लोग निहायत ही गुमराह थे। यह लोग उम्मीद करते थे कि इनसानी औरतों के अलावा दूसरों की इज़्ज़त से भी खेल सकते थे (जो हक़ीक़त में फ़रिश्ते थे मगर सदोम के लोगों ने सोचा कि वह इंसान थे सो उन्हों ने उन के साथ गिरोह में होकर अस्मतदरी करने का मंसूबा किया)। इस तरह का गुनाह ऐसी संगीन बुराई थी कि अल्लाह ने सारे शहर का इंसाफ़ करने का फ़ैसला किया। फ़ैसला वही था जो इस से पहले भी आदम को दिया गया था।पीछे शुरुआत में अल्लाह ने आदम को इस फ़ैसले से ख़बरदार किया था कि गुनाह की मज़दूरी मौत है। और दूसरी तरह कि सज़ा नहीं (जैसे मारना , क़ैद करना वगेरा जो काफ़ी नहीं था। अल्लाह ने आदम से कहा था:

“….लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का फल कभी न खाना क्यूंकि जिस रोज़ तूने उस में से खाया    तू मरा।”

पैदाइश 2:17

इसी तरह से सदोम के लोगों के गुनाहों कि सज़ा यह थी कि उन लोगों को भी मरना था। दरअसल सदोम शहर के सारे लोगों को और उस में रहने वाले तमाम जानदारों को आस्मान से नाजिल आग के ज़रिये बर्बाद किया जाना था।यह एक नमूने की मिसाल है जो बाद में इंजील शरीफ़ में समझाया गया है:

  “क्यूंकि गुनाह की मज़दूरी तो मौत है”

रोमियों 6:23

लूत के दामाद 

नूह के बयान में। अल्लाह ने तमाम दुनिया का फ़ैसला किया और आदम की निशानी के साथ यकसां (बराबर का सुलूक किया कि सारे लोग उस बड़े तूफ़ान के ज़रिये हलाक हुए। मगर तौरात शरीफ और कुरान शरीफ़ हमसे कहते हैं कि नूह के ख़ानदान को छोड़ सारी दुनया के लोग बुरे थे। अल्लाह ने सदोम के लोगों का भी इन्साफ़ किया जबकि वह लोग भी गुमराह और बुरे थे। सिर्फ़ इन बयानात के साथ मैं यह सोचने के लिए आज़माया जा सकता हूँ कि मैं अल्लाह के इंसाफ़ से महफूज़ हूँ क्योंकि मैं इतना बुरा नहीं हूँ जैसे कि वह लोग थे । आखिर कार मैं अल्लाह पर पूरा ईमान रखता हूँ, मैं बहुत से नेक काम करता हूँ और मैं ने कभी इस तरह के बुरे काम अनजाम नहीं दिए। तो फिर क्या मैं महफूज़ हूँ ? लूत की निशानी उस के दामादों के साथ मुझे ख़बरदार करती है। हालाँकि वह लोग इस गिरोह में शरीक नहीं थे जो एक गिरोह में होकर जिंसी गुनाह (असमतदरी) अंजाम देने की कोशिश कर रहे थे किसी तरह से उन्हों ने आने वाले इंसाफ़ की तंबीह को संजीदा तोर से नहीं लिया। दरअसल तौरेत शरीफ़ हम से कहती है, लोग  सोच रहे थे कि ‘(वह) लूत उन से मज़ाक़ कर रहा था’। मगर सवाल यह है कि क्या उन की किस्मत शहर के दुसरे लोगों से फ़रक़ थी ? नहीं ! वह उन्हीं की किस्मत में शरीक हुए। अंजाम बतोर लूत के दामादों और सदोम के बुरे लोगों उन दोनों में कोई फ़रक नहीं था। यहाँ निशानी यह है कि हर एक शख्स को इस तंबीह को संजीदा तोर से लेना ज़रूरी था क्यूंकि वह न सिर्फ़ गुमराह लोग थे।

लूत की बीवी          

लूत की बीवी हमारे लिए एक बड़ी निशानी है। तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में ही वह भी दीगर शरीर लोगों के साथ हलाक हुई – वह एक नबी की बीवी थी – मगर लूत के साथ उसका एक ख़ास रिश्त्ता होते हुए भी वह रिश्ता बचा न सका हांलांकि वह सदोम के लोगों के साथ उस बड़े गुनाह में शामिल नहीं थी। उसने फ़रिश्ते के हुक्म को तोड़ा:

              ‘तुम में से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे’ (सूरा 11:81) सूरा ।ए। हूद या

              ‘पीछे मुड़कर न देखना’ (पैदाइश 19:17)

तौरेत हम से कहती है कि

 लेकिन लूत की पत्नी ने वापस देखा, और वह नमक का एक स्तंभ बन गई।

उत्पत्ति १ ९: २६

उसके “पीछे मुड़ कर देखने” का असल मक़सद क्या था उसे समझाया नहीं गया है मगर उस ने सोचा कि अल्लाह के इस छोटे से हुक्म को नज़र अंदाज़ करदेने से कोई ख़ास फ़रक नहीं पड़ेगा – उसकी किस्मत – उसके “छोटे” गुनाह के साथ वैसा ही था जैसा कि सदोम के लोगों का “बड़ा” गुनाह उन के लिए मौत बन कर आई थी। यह हमारे लिए कुछ ऐसी ज़रूरी निशानी है जो कभी कभी यह सोचने से दूर रखती हैं कि यह छोटे गुनाह हैं जिन्हें अल्लाह हिसाब में नहीं लाएगा (इन का इंसाफ़ नहीं होगा) — लूत की बीवी इस ग़लत सोच के खिलाफ़ तम्बीह के लिए हमारी निशानी है:

लूत, अल्लाह और फ़रिश्ते पैग़म्बरान 

जिसतरह हम ने आदम की निशानी में देखा था कि जब अल्लाह ने आदम का इंसाफ़ किया था तो उस ने तो उसने उस पर अपना फ़ज़ल भी अता किया था। और वह इंसाफ़ था उन के लिए चमड़े के पोशाक का इनायत किया जाना। नूह के साथ जब अल्लाह ने इंसाफ़ किया तो उसने फिर से एक बड़ी कश्ती के साथ फ़ज़ल अता किया। फिर से एक बार अल्लाह यहाँ तक कि अपने इंसाफ़ में बा ख़बर है कि वह इंसाफ़ अता करता है ।इसको तौरेत ने इसतरह बयान किया है कि:

जब वह (ल्यूक) हिचकिचाया, तो पुरुषों (स्वर्गदूत जो पुरुषों की तरह दिखते थे) ने अपना हाथ और अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के हाथों को पकड़ लिया और उन्हें सुरक्षित रूप से शहर से बाहर ले गए, क्योंकि प्रभु उनके लिए दयालु थे।

उत्पत्ति १ ९: १६

इससे हम क्या सीख सकते हैं? से पीछे की निशानियों की तरह फ़ज़ल आलमगीर था मगर सिर्फ़ एक तरीके के ज़रीये ही अता किया जाना था। लूत के ख़ानदान को शहर से बाहर रहनुमाई करते हुए अल्लाह ने रहम करके मिसाल के तोर पर शहर के अन्दर एक ऐसी पनाहगाह का इंतज़ाम नहीं किया जो आसमान से आग नाज़िल होने पर उनकी मुहाफ़िज़त हो सके। अल्लाह की तरफ़ से रहम हासिल करने का एक ही रास्ता था – कि शहर से बाहर फ़रिश्तों के पीछे चलो। अल्लाह ने लूत और उसके खानदान पर इसलिए रहम नहीं किया क्यूंकि लूत एक कामिल शख्स था। दरअसल तौरेत शरीफ़ और कुरान शरीफ़ इन दोनों में हम देखते हैं कि लूत अपनी बेटियों को अस्मतदरी करने वालों के हाथ सोंपने जा रहा था। यह एक शरीफ़ाना पेशकश नहीं थी। तौरेत हमसे कहती है कि फरिशतों के ख़बरदार किये जाने पर भी लूत ‘हिचकिचाया’। इन सब के बावजूद भी अल्लाह फ़रिश्तों के ज़रिये उसका हाथ पकड़ कर शहर के बाहर लेजाने के ज़रिये उसपर अपना रहम ज़ाहिर करता है। यह हमारे लिए एक निशानी है : अल्लाह हम पर रहम इनायत करेगा, यह हमारी भलाई पर मुनहसर नहीं है। मगर हम लूत की मानिंद जो हमारे सामने है रहम हासिल करने की ज़रुरत है जिस से हमारी मदद हो – लूत के दामादों ने इसे हासिल नहीं किया और उन्हें इससे कोई फाइदा हासिल नहीं हुआ।

तौरेत हम से कहती है कि अल्लाह ने लूत के चचा, एक बड़े नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के सबब से जिसने उसके लिए अल्लाह से इल्तिजा करी थी उस पर अपना रहम ज़ाहिर किया – (यहाँ पैदाइश की इबारत को देखें) तौरेत शरीफ़ इब्राहिम (अलै.) के निशानियों के वसीले से अल्लाह की  जानिब से वायदों को को जारी रखती है कि “तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब क़ौमें बरकत पाएंगीं क्यूंकि तू ने मेरी बात मानी” (पैदाइश 22:11)। यह वायदा हमको चौकन्ना कर देना चाहिए इसलिए कि कोई फ़रक़ नहीं पड़ता कि हम कौन हैं, कौन सी ज़बान हम बोलते हैं, हम किस मज़हब से ताल्लुक़ रखते हैं, या हम कहां रहते हैं वगैरा हम मालूम कर सकते हैं कि आप और मैं ‘ज़मीन की तमाम कौमों का’ एक हिस्सा हैं।अगर इब्राहिम की इल्तिजा के ज़रिये अललाह ने मुतहर्रिक होकर लूत पर रहम ज़ाहिर किया हालांकि वह इस के लिए काबिल नहीं था तो कितना ज़ियादा इब्राहीम (अलै.) की निशानियां हम पर रहम ज़ाहिर करेंगीं जो कि हम भी ‘तमाम कौमों में से’ एक हैं? इसी सोच के साथ हम तौरेत में इब्राहीम की निशानियों को देखते हुए आगे बढ़ेंगे।

आदम की निशानी

आदम और उस की बीवी हव्वा जबकि अल्लाह की तरफ़ से बनाए गए थे बे मिसल हैं। और वह बाग़ -ए- अदन में रहते थे। इस लिए वह हमारे सीखने के लिए अहम निशानी रखते हैं। कुरान शरीफ़ में दो इबारतें हैं जो आदम की  बाबत कहते हैं – एक तौरात में (यहाँ उन्हें पढ़ने के लिए किलिक करें)-

यह बयानात बहुत ही एक जैसे हैं – दोनों बयानात में शख्सियतें जो पह्चानी गई हैं वह हैं : (आदम, हव्वा, शैतान (इब्लीस) और अल्लाह ; दोनों बयानात में जगह एक ही है (बाग़); दोनों बयानत में शैतान (इब्लीस) झूट बोलता है और आदम और हव्वा से चालाकी करता है। दोनों बयानात में आदम और हव्वा अपने नंगे पन की शरमिन्दगी को छिपाने के लिए पेड़ के पत्तों का इस्तेमाल करते हैं फिर अल्लाह आकर उन से इंसाफ़ की बात करता है ; दोनों बयानात में अल्लाह उन्हें चमड़े का लबादा (यानी कि पोशाक) अता करने के ज़रिये उन पर रहम ज़ाहिर करता है ताकि उनके नंगेपन की ‘शर्मिंदगी’ को ढांक सके कुरान शरीफ़ कहता है यह ‘अल्लाह की निशानी’ ‘आदम की औलाद’ के लिए है -यानी हमारे लिए – इसलिए यह सिर्फ़ माज़ी में हुए मज़हबी वाक़िया की बाबत तारीक़ का सबक नहीं है। हम आदम की कहानी से बहुत कुछ सीख सकते हैं

आदम की तंबीह हमारे लिए

अल्लाह के इनसाफ़ किये जाने से पहले आदम और हव्वा ने सिर्फ़ नाफ़रमानी के गुनाह के लिए मख़सूस किया था ऐसा नहीं है। मिसाल के तौर पर अल्लाह के साथ दस नाफ़रमानी के गुनाह के लिए जो नौ तंबीह दे रहा है और फिर आख़िरकार इंसाफ़ कर रहा है। अल्लाह ने सिर्फ़ एक नाफ़रमानी के अमल के लिए इंसाफ़ किया। बहुत से लोग यकीन करते हैं कि अल्लाह बहुत से गुनाह करने के बाद ही उनका इंसाफ करेगा। वह सोचते हैं कि अगर उन्हों ने बहुतों की बनिस्बत “कम गुनाह” किये हैं या उनके नेक आमाल बुरे आमाल से ज़ियादा हैं तो फिर (शायद) ख़ुदा इनसाफ़ नहीं करेगा। आदम और हव्वा का तजरुबा हमारी तंबीह करता है यह ऐसा नहीं है बल्कि अल्लाह हर एक नाफ़रमानी के गुनाह के लिए इंसाफ़ करेगा।

यह हमें एहसास दिलाता है कि अगर हम अल्लाह के लिए नाफ़रमानी का मवाज़िना करते हैं तो एक कौम के कानून को तोड़ने के साथ नाफ़रमानी करते है। केनडा में जहाँ मैं रहता हूँ, अगर मैं सिर्फ़ एक कानून को तोड़ता हूँ (मिसाल के तौर पर अगर मैं कोई चीज़ चोरी करता हूँ) तो मुल्क मेरा इंसाफ़ कर सकता है।  मैं यह नालिश नहीं कर कर सकता कि मैंने सिर्फ़ एक ही कानून को तोड़ा है।  मैं ने क़त्ल करके या किसी को भगाकर ले जाने से कानून को नहीं तोड़ा है। मुझे सिर्फ़ एक कानून के तोड़े जाने के लिए केनडा में इंसाफ़ का सामना करना पड़ेगा। यही बात तो अल्लाह के लिए भी नाफ़िज़ होता है।

जब आदम और हव्वा पत्तों के ज़रिये खुद से ढांके गए तो हम देखते हैं कि वह इस के बाद भी शर्मिंदगी का एहसास करते और अपने नंगेपन को ढांकने की नाकाम कोशिश करते थे।  इसी तरह जब हम ऐसा काम करते हैं जिस से शरम महसूस होती है तो हम उसे ढांकने या दूसरों से छिपाने की कोशिश करते हैं।  मगर आदम और हव्वा की  कोशिश ख़ुदा के सामने बेकार और नाकाम थी और अल्लाह उनकी नाकामी को देख सकता था। तब फिर दोनों ने ढोंग किया और ख़ुदा से बात की।

इंसाफ़ की बिना पर अल्लाह के कारगुज़ारमगर रहम के साथ

हम तीन कारगुज़ार देख सकते हैं :

1 अल्लाह उन्हें फ़ना पिजीर बनाता है – अब वह मर्मर जाएंगे।

2 अल्लाह उन्हें बाग़ से निकाल देता है  – उन्हें अब बहुत ज़ियादा तकलीफ़ के साथ ज़मीन पर ज़िन्दगी जीना पड़ेगा।

3 अल्लाह उन्हें चमड़े के पोशाक देता है।

यह बहुत ही अफ़सोस की बात है कि हम सब के सब आज के दिन तक इन से असर पिजीर हैं। हर कोई मरता है; कोई भी शख्स यहां तक कि कोई नबी भी आज तक बाग़ में वापस नहीं गया; हर एक शख्स लगातार कपड़े पहनता है। दरअसल यह तींन बातें बहुत ही मामूली हैं फिर भी इस बात को गौर करने से चूक जाते हैं कि जो अल्लाह ने आदम और हव्वा के साथ किया वह हज़ारों सालों के बाद भी उस का एहसास किया जाता है। जो कुछ अदन के बाग़ में वाक़े हुआ उस का अंजाम आज भी असर करक होते हुए नज़र आता  है।

अल्लाह कि तरफ़ से पोशाक का दिया जाना उनके लिए इनाम है। उनकी शर्मिंन्दगी अब ढकी जा चुकी है। जी हाँ। अल्लाह ने इंसाफ़ किया है। मगर साथ ही उसने मेहरबानी भी की है जो कि उसे नहीं करना चाहिए था। आदम और हव्वा ने पोशाक का ‘अतियया’ उन के अच्छे बर्ताव के सबब से हासिल नहीं किया बल्कि उनकी नाफ़रमानी की उजरत में हासिल किया। आदम और हव्वा अल्लाह के उस इनाम को सिर्फ़ बगैर किसी लियाक़त और मुस्तहक होने के ही हासिल कर सकते थे। मगर इसके लिए किसी ने क़ीमत अदा की थी। तौरेत हम से कहती है कि वह पोशाक ‘चमड़े’ के थे। इस तरह से वह एक जानवर से आए थे। इस नुक्ते पर आने तक कहीं भी मौत नहीं थी मगर अब एक जानवर का चमड़ा जो ढंकने के लिए पोशाक बना उस ने क़ीमत अदा की। अपनी ज़िन्दगी की क़ीमत! एक जानवर मरा ताकि ताकि आदम और हव्वा अल्लाह कि तरफ़ से रहम हासिल करे।

क़ुरान शरीफ़ कहता है कि उस पोशाक ने उनकी शर्मगाह को ढांका। मगर हक़ीक़त में अगर ज़रुरत थी तो उनकी रास्त्बाज़ी को ढांका जाना था। और किसी तरह (चमड़े का) यह लिबास उस रास्त्बाज़ी की एक निशानी थी और एक निशानी हमारे लिये :

            “ऐ आदम की औलाद! हमने तुमको लिबास अता किया है ताकि तुम अपनी शर्मिंदगी को ढांको, और यह तुम्हारे लिए आराइश के लिए भी है- मगर रास्त्बाज़ी का लिबास सब से बेहतरीन है। यह अल्लाह कि निशानियों में से एक है उनके लिए    जो हमारी हिदायतें हासिल करते हैं”

सूरा-7:26 (इरतिफ़ा)

एक अच्छा सवाल है: कि हम इस “रास्त्बाज़ी के लिबास” को कैसे हासिल करते हैं? बाद के अंबिया इस अहम सवाल के जवाब को पेश करेंगे।

इंसाफ़ और रहम की बिना पर अल्लाह के अलफ़ाज़

अल्लाह न सिर्फ़ यह तीन चीजें आदम और हव्वा के लिए और हमारे लिए (उनके फ़रज़न्दों के लिए) करता है बल्कि वह अपने कलाम के ज़रिये से बात भी करता है। दोनों बयानात में अल्लाह दुश्मनी की बात करता है। मगर तौरेत में यह जोड़ दिया गया है कि यह दुश्मनी औरत और सांप (शैतान)के दरमियान होगी। यह ख़ास पैग़ाम फिर से ज़ेल में दिया गया है -इसको मैंने ब्रेकट () के अन्दर लिख दिया है ताकि इस का हवाला देख सकें। अल्लाह कहता है :

“और मैं (अल्लाह) तेरे (शैतान) और औरत के दरमियान, तेरी नसल और औरत की नसल के दरमियान अदावत डालूँगा। वह तेरे (शैतान) के सिर को कुचलेगा, और तू (शैतान) उसकी (औरत के नसल) की एड़ी पर काटेगा।

पैदाइश 3:15

यह एक पहेली जैसी लगती है मगर समझने लायक़ है। गौर से पढ़ने पर आप देखेंगे कि यहाँ पर पांच फ़रक फ़रक शख्सियतों का ज़िकर किया गया है और यह नबुवत बतौर है जिस में आप आगे के ज़माने की बातें देख सकते हैं यानी (मुस्तक़बिल के ज़माने को दुहराया गया है) यह शख्सियतें हैं :

1. ख़ुदा (या अल्लाह)

2. शैतान (या इब्लीस)

3. औरत

4. औरत की नसल

5. शैतान की नसल

और यह पहेली एक नक्शा बनती है कि यह शख्सियतें मुताक्बिल में किस तरह एक दुसरे से ताल्लुक रखेंगे इसे नीचे दिखाया गया है :

शख्सियतें और उनके ताल्लुकात अल्लाह के वायदे में जो जन्नत में दिया गया था।

यहां यह नहीं कहा गया है कि औरत कौन है -मगर ख़ुदा यहाँ पर शैतान की ‘नसल’ और औरत की नसल की बात करता है। यह पोशीदा है। मगर हम औरत की ‘नसल’ की बाबत एक बात जानते हैं कि नसल को ‘वह’ और ‘उसे’ बतौर इशारा किया गया है जो कि वाहिद और नरीना इंसान है। इस समझ के साथ हम एक पतता छांट सकते हैं मतलब एक मुमकिन तर्जुमा निकाल सकते हैं कि ‘वह’ का इशारा एक औरत से नहीं बल्कि एक मर्द से है जो औरत की नसल से है। इसको जमा के सेगे में (यानी कि वह सब) करके भी नहीं लिखा गया है। तो यह ज़ाहिर है कि ‘नसल’ लोगों की एक जमाअत भी नहीं है चाहे वह क़ौमी पेहचान की तरफ़ इशारा करता हो या किसी कौम के लोगों को, और यह नसल (यह, वह) यानि ज़मीर से भी ताल्लुक़ नहीं रखता बल्कि यह एक शख्स को ज़ाहिर करता है (मतलब यह कि यह नसल एक शख्स है) हालाँकि यह ज़रूरी नज़र आए यह उस मुमकिन को निकाल फेंकता है कि यह नसल एक फ़लसफ़ा, ता’लीम या मज़हब है। सो यह नसल (मिसाल के तौर पर) मसीहियत या इस्लाम नहीं है क्यूंकि अगर यह ऐसा होता तो (यह, वह) यानी ज़मीर को ज़ाहिर करता, और यह लोगों की जमाअत भी नहीं है जिस तरह यहूदियों की मसीहियों की या मुसलमानों की जमाअत होती है। अगर होता तो ‘वह सब’ का लफ्ज़ इस्तेमाल होता।  हालाँकि अभी भी यह पोशीदा है कि ‘यह नसल’ कौन है। जबकि हम नेकई एक मुम्किनात को हटा दिया है ताकि यह क़ुदरती तौर से हमारे दिमाग़ में आए।

हम इस वायदे के मुस्तक़बिल के ज़माने के नज़रिए से देखें तो यह एक मनसूबा है जो अल्लाह कि हिकमत में तजवीज़ की गई थी कि यह “नसल” शैतान के सर को कुचलेगा।  मतलब यह कि वह उस को (पूरी तरह से बर्बाद कर देगा) जबकि उसी वक़्त शैतान उसको एड़ी पर काटेगा। इस नुक़ते पर देखा जाए तो इस भेद के मतलब को साफ़ नहीं किया गया है मगर हम जानते हैं कि यह ख़ुदा का एक मंसूबा है जो ज़ाहिर होकर रहेगा।

अब गौर तलब बात यह है कि अल्लाह यह बात आदम से नहीं कहता और ऐसा भी नहीं लगता कि वह इस ख़ास नसल के वायदे को औरत से कहता है। यह बहुत ही हैरत अंगेज़ और ग़ैर मामूली तौर से तौरेत, ज़बूर और इंजील में और ख़ास तौर से नबियों की किताबों में जोर दिया गया है। इन तीनों में जो नसबनामे दिए गये हैं वह तक़रीबन ज़रा हट कर क़लमबंद किया गया है कि जो फ़र्ज़न्द हैं वह सिर्फ़ बापों से आते हैं। मगर इस नसल का वायदा जो बाग़ में किया गया था यह बिलकुल फ़रक है। ऐसा कोई नसल का वायदा नहीं है (एक ‘वह’) एक मर्द से आए। तौरेत कहती है कि वह नसल एक औरत से होगी (औरत की नसल) – एक मर्द का ज़िकर किये बगैर।

तमाम आदमी जो कभी वजूद में आए थे उन में से सिर्फ़ दो आदमी थे जिन के कभी कोई इंसानी बाप नहीं थे -सब से पहले आदम था जिस को बराहे रास्त ख़ुदा ने बनाया था, और दूसरा ईसा अल-मसीह (ईसा अलैहिस्सलाम) जो कि एक कुंवारी से पैदा हुआ। इस तरह उस का कोई इंसानी बाप नहीं था। यह मशाहिदा के मुताबिक मुनासिब बैठता है कि यह नसल “मुज़क्कर” है न कि “मुअननस”, जमा का सेगा या ज़मीर (यह, वह) नहीं है बल्कि वाहिद है। ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) एक औरत की ‘नसल’ है। मगर सवाल यह है कि उस का दुशमन कौन है? क्या उस का दुशमन शैतान की नसल है? हालाँकि हमारे पास जगह नहीं है कि इस को तफसील के साथ बयान करें मगर कलाम-ए- पाक में शैतान के बेटे को हलाकत का फ़र्ज़न्द कहा गया है, और दूसरा लक़ब जो तस्वीर कशी करता है वह आने वाला इंसानी हाकिम जो “मसीह” का मुख़ालिफ़ होगा। उस को दज्जाल भी कहा जाता है। बाद में कलाम में मरकूम है कि “मुख़ालिफ़ मसीह” और “मसीह” या (मसीहा) के दरमियान लड़ाई होगी। मगर सबसे पहले यहाँ  से  इस का ज़िकर तारीक़ की शुरुआत में जुनैन जैसा है।

तारीक़ का आखरी अंजाम लड़ाई का इख्तिताम शैतान और अल्लाह के बीच है जो अदन के बाग़ में शुरू हुआ था। और इसी शुरुआत में तौरात की पहली किताब में नबुवत की गई थी। बहुत से सवालात रह जाते हैं और कुछ और सवालात भी उठाए गए हैं। यहाँ से जारी रखते हुए और कामयाब पग़मबरों से सीखते हुए जिन से हमें मदद मिलेगी कि हमारे सवालात का बेहतर जवाब मिले और उन औकात को समझ पाएं जिमें हम पाए जाते  हैं। हम आदम और हव्वा के बेटों, क़ाबील और हाबील की मुख़्तसर कहानी के साथ इस बयान को जारी रखते हैं।