इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने किसकी क़ुर्बानी दी , इस्माईल की या इस्हाक़ की?

जब हम नबी इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत जब हम बात करते हैं तो मेरे दोस्त लोग इसरार करते हैं कि बेटा जो कुर्बान होने को था वह इस्माईल था जो हज़रत इब्राहीम का बड़ा बेटा था जो हाजरा से था, छोटा बेटा इस्हाक़ नहीं था जो सारह से था। मगर मैं ने जब कुरान शरीफ़ में इस के बारे में पढ़ा तो मैं ता’ज्जुब में पढ़ गया।  जब मैं ने अपने दोस्तों को दिखाया तो वह लोग भी ताज्जुब करने लगे।  इब्राहीम के निशान 3 में मैं ने इस अहम् वक़िये को देखा जहां पूरी इबारत का हवाला दिया गया है। सो यह इबारत क्या कहती है? ख़ास आयत को दोबारा से दोहराया गया है। 

फिर जब इस्माईल अपने बाप के साथ दौड़ धूप करने लगा तो (एक दफा) इबराहीम ने कहा बेटा खूब मैं (वही के ज़रिये क्या) देखता हूँ कि मैं तो खुद तुम्हें ज़िबाह कर रहा हूँ तो तुम भी ग़ौर करो तुम्हारी इसमें क्या राय है इसमाईल ने कहा अब्बा जान जो आपको हुक्म हुआ है उसको (बे तअम्मुल) कीजिए अगर खुदा ने चाहा तो मुझे आप सब्र करने वालों में से पाएग

अल-सफ़फ़ात 37:102

इस इबारत में हज़रत इब्राहीम के बेटे की क़ुर्बानी की बाबत बेटे के नाम का ज़िक्र तक नहीं  किया गया है और ऐसी हालत में और ज़ियादा कलाम की खोज और मुताला करनी चाहिए। अगर आप पूरी कुरान शरीफ़ में नबी इस्माईल के नाम की तलाश करेंगे तो आप देखेंगे कि 12 मर्तबा उस के नाम का ज़िकर आया हुआ है।

°  इन बारह में से दो मर्तबा अपने बाप इब्राहीम के साथ उस का नाम आया हुआ है (2:125, 2:127)

°  बाक़ी बचे दस में से पांच मर्तबा उसका नाम इब्राहीम के साथ अपने भाई इस्हाक़ के साथ आया हुहै (2:133, 2:136, 2:140, 3:84, 4:163)।

°  बाक़ी बची पांच इबारतें अपने बाप इब्राहीम के नाम के बगैर ज़िकर किया गया है, मगर दीगर नबियों की फ़ेहरिस्त के साथ (6:86, 14:39, 19:54, 21:85, 38:48)।

दो मर्तबा उस का नाम अपने बाप हज़रत इब्राहीम के साथ ज़िकर हुआ है। आप इसको दुआ के दीगर वाक़ियात में देख सकते हैं –  न कि क़ुर्बानी के सिलसिले में।

 (ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो

अल – बक़रह 2:125

और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है

अल – बक़रह 2:127

कुरान शरीफ़ कभी भी  तअय्युन नहीं करता कि क़ुर्बानी के लिए इस्माईल को क़ुरबानगाह पर रखकर ख़ुदा के ज़रिये उसके बाप इब्ररहीम (अलैहिस्सलाम) का इम्तिहान लिया गया था। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘बेटे’ को कहता है। सो मुझे नहीं मा’लूम कि ऐसा क्यूँ यकीन किया जाता है कि वह इसमाईल था जिसे क़ुर्बानी के लिए नज़र किया गया था। 

हज़रत इब्राहीम के बेटे की क़ुर्बानी पर शरह (तफ़सीर)

यूसुफ अली कुरान शरीफ़ के एक मुअज़ज़िज़ मुफ़स्सिर और मुतर्जिम भी हैं।  उनकी तफ़सीर http://al-quraan.info में दस्तियाब है।

बेटे की क़ुर्बानी दिए जाने की तफ़सीर ज़ेल के दो हाशियों पर क़ुरबानी की इबारत मरक़ूम है :

4071 यह सीरिया और फ़लिस्तीन के ज़रखेज़ इलाक़े में था।  लड़का जो पैदा हुआ था वह मुस्लिम रिवायत के मुताबिक था, और वह इब्राहीम का पह्लोठा बेटा था या’नि इस्माईल – यह नाम खुद् ब खुद लफ़ज़ के असल समि’ आ से है जिस के मायने हैं सुनना। इसलिए कि ख़ुदा ने इब्राहीम की दुआ सुन ली थी (आयत 100) जब इस्माईल पैदा हुआ था तो उस वक़्त इब्राहिम की उम्र 86 थी

पैदाइश 16:16

।  इस हिसाब से देखा जाए तो इस्माईल इस्हाक़ से 14 साल बड़ा था। उसके पहले 14 सालों में इस्माईल ही इब्राहीम का एकलौता बेटा था इस के बाद जब इस्हाक़ पैदा हुआ तो वही उस का एकलौता बन गया। इस के बावजूद भी जब हम क़ुर्बानी की बात करते हैं तो पुराना अहद नामा कहता है (पैदाइश 22:2) “तब ख़ुदा ने कहा तू अपने बेटे इस्हाक़ को जो तेरा एकलौता है और जिसे तू प्यार करता है ,अपने साथ लेकर मोरियाह के मुल्क में जा और वहां उसे पहाड़ों में से एक पहाड़ पर जो मैं तुझे बताऊंगा सोख़तनी क़ुर्बानी के तोर पर चढ़ा …”   

ज़ेल के इस हाशिये में वह बहस करता है कि जबकि तौरात कहती है कि ‘तू अपने को ले जो तेरा एकलोता है …..” (पैदाइश 22:2) और इस्माईल 14 साल का था, इस लिए सिर्फ़ इस्माईल को ही एकलोता बेटा बतोर क़ुर्बानी के लिए नज़र किया जा सकता था। मगर वह भूल जाता है कि इस से पहले पैदाइश 21 में उसने इस्माईल आर हाजरा को अपने ख़ानदान से दूर कर दिया था तो इस्हाक़ ही वाजिब तोर से उस का एकलोता बेटा ठहरा – यहाँ ज़ेल में कुछ और बातें तफ़सील से दी गई हैं :

इब्राहीम का बेटा क़ुर्बान हुआ : तौरात की गवाही

तो फिर कुरान शरीफ़ तअय्युन नहीं करता कि किस बेटे को क़ुर्बानी के लिए नज़र किया गया था मगर तौरात में साफ़ लिखा है-आप देख सकते हैं कि तौरात में पैदाइश के 22 बाब में इस्हाक़ के नाम को फ़रक़ फ़रक़ औक़ात में 6 बार ब्यान करता है : देखें (22:2, 3, 6, 7 और 9 आयत में दो बार)-

तौरात का हज़रत मुहम्मद (सल्लम) के ज़रिये तस्दीक़ किया जाना 

तौरात जो आज की तारीख़ में मौजूद है उसको हज़रत मोहम्मद (सल्लम)के ज़रिये किये जाने का साफ़ बयान हदीसों में मौजूद है। इस से ताल्लुक़ रखते हुए कई एक हदीसें मेरे पास मौजूद हैं जिन में से एक बयान करता है : मुलाहजा फरमाएं :

 नाराज़ अब्दुल्ला इब्न उमर: .. यहूदियों का एक समूह आया और अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) को क्वफ में आमंत्रित किया। … उन्होंने कहा: Q अबुलकसीम, हमारे एक आदमी ने एक महिला के साथ व्यभिचार किया है; इसलिए उन पर फैसला सुनाएँ। ‘ उन्होंने अल्लाह के रसूल (पीबीयूएच) के लिए एक गद्दी रखी जो उस पर बैठ गया और कहा: “टोरा लाओ”। इसे तब लाया गया था। फिर उसने अपने नीचे से गद्दी वापस ले ली और यह कहते हुए तोराह को रख दिया: “मैं तुम पर विश्वास करता था और तुम कौन हो।” :

सुनन अबू दाऊद, किताब 38 सफ़्हा 4434:

तौरात का नबी हज़रत ईसा अल – मसीह (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये तस्दीक़ किया जाना

नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने भी तौरात को पूरे दा’वे के साथ तसदीक़ की है जिस के बयानात को हम ने यहाँ देखा -उसकी तरफ़ से एक ता’लीम इस तरह है देखें :

18 मैं तुम से सत्य कहता हूँ कि जब तक धरती और आकाश समाप्त नहीं हो जाते, मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा, वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।19 “इसलिये जो इन आदेशों में से किसी छोटे से छोटे को भी तोड़ता है और लोगों को भी वैसा ही करना सिखाता है, वह स्वर्ग के राज्य में कोई महत्व नहीं पायेगा। किन्तु जो उन पर चलता है और दूसरों को उन पर चलने का उपदेश देता है, वह स्वर्ग के राज्य में महान समझा जायेगा।

मत्ती 5:18-19

  चौकन्ना होना : रिवायात तौरात पर कभी हावी नहीं होती

किसी रिवायत का वास्ता देकर हज़रत मूसा के ज़रिये लिखी गई तौरात को ख़ारिज कर देना समझदारी नहीं है।  दरअसल हज़रत ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) ने अपने ज़माने के मज़हबी रहनुमाओं की बाक़ायदा तौर से नुक्ताचीनी की थी क्यूंकि वह लोग मूसा की शरीयत के साथ अपनी रिवायात का इज़ाफ़ा अपने मतलब के लिए करदेते थे जिसतरह हम यहाँ देखते हैं :

  यीशु ने उत्तर दिया, “अपने रीति-रिवाजों के कारण तुम परमेश्वर के विधि को क्यों तोड़ते हो? क्योंकि परमेश्वर ने तो कहा था ‘तू अपने माता-पिता का आदर कर’ [a] और ‘जो कोई अपने पिता या माता का अपमान करता है, उसे अवश्य मार दिया जाना चाहिये।’ [b] किन्तु तुम कहते हो जो कोई अपने पिता या अपनी माता से कहे, ‘क्योंकि मैं अपना सब कुछ परमेश्वर को अर्पित कर चुका हूँ, इसलिये तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।’ इस तरह उसे अपने माता पिता का आदर करने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार तुम अपने रीति-रिवाजों के कारण परमेशवर के आदेश को नकारते हो। ओ ढोंगियों, तुम्हारे बारे में यशायाह ने ठीक ही भविष्यवाणी की थी। उसने कहा था:

मत्ती 15: 3 – 7

नबी की तंबीह पैग़ाम को रिवायात की खातिर कभी भी बातिल या मनसूख़ करने के लिए कभी नहीं है यह बिलकुल साफ़ है।

मौजूदा तौरात की गवाही बहीरा -ए- मुरदार के तूमार की तसदीक़ करती है

ज़ेल का नक्शा बताता है कि जो सब से क़दीम तौरात के तूमार हैं वह बहीरा -ए- मुरदार के तूमार हैं, जिन की तारीख़ लग भाग 200 क़ब्ल मसीह है – (इस से भी ज़ियादा ज़ेल के नक्शे में यहाँ है। इस का मतलब यह है कि जिस तौरात का हवाला हज़रत मोहम्मद (सल्लम) और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने दिया था वह वही है, जिन का मौजूदा दौर में इस्तेमाल किया जा रहा है ।

The Bible through time

जो कुछ नबियों ने ज़ाहिर किया है उस की तरफ़ वापस लौटते हुए यह सवाल हमारे लिए साफ़ करती है।

इब्राहीम का निशान 3 : क़ुरबानी

पिछली निशानी में बड़े पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को एक बेटे का वायदा किया गया था। और अल्लाह ने अपने वायदे को क़ाइम रखा। दरअसल तौरात इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के इस  कैफ़ियत को जारी रखती है यह बयान करने के लिए कि किसतरह उसके दो बेटे हुए थे। पैदाइश का 16 बाब बताता है कि किसतरह उसने हाजरा से अपने बेटे इस्माईल को पाया और फिर उसके बाद पैदाइश का 21 बाब बताता है कि किसतरह उसने सारा से 14 साल बाद अपने बेटे इस्हाक़ को पाया। बदक़िस्मती से उसके घराने के लिए यह बात उन दो औरतों, हाजरा और सारा के दरमियान एक बड़े रक़ाबत का अंजाम ज़ाहिर हुआ कि इब्राहीम को मजबूरन हाजरा और उसके बेटे को घर से बाहर भेजना पड़ा।  यह कैसे हुआ इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं और मालूम कर सकते हैं कि किसतरह अल्लाह ने दुसरे तरीक़े से हाजरा और इस्माईल को बरकत दी।          

पैग़म्बर इब्राहीम की क़ुरबानी : ईद -उल- अज़हा के लिए बुनियाद

इसतरह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के घराने में एक ही बेटा रह गया था कि उसका सब से बड़ा इम्तिहान से मुक़ाबला हो मगर यह एक ही ज़रीया है जो हमारे लिए सीधे रास्ते की एक बड़ी समझ का रासता खोलता है। आप इस बयान को जो उस के बेटे की क़ुर्बानी की इम्तिहान की बाबत है तौरात शरीफ़ और कुरान शरीफ़ दोनों में यहाँ पढ़ सकते हैं। इन किताबों की कहानी के सबब से ही ईद -उल- अज़हा मनाई जाती है – मगर यह सिर्फ़ एक तारीक़ी वाक़िया नहीं है। बल्कि यह इस से भी ज़ियादा है।

किताबों के बयान से हम देख सकते हैं कि यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए एक इम्तिहान है मगर यह इस से भी ज़ियादा कुछ और है। जबकि इब्राहीम (अलै.) एक पैग़म्बर हैं तो यह इम्तिहान भी हमारे लिए एक निशानी है ताकि हमारे लिए ख़ुदा की परवाह की बाबत हम और ज़ियादा सीख सकें -किस तरीक़े से यह एक निशानी है? बराए मेहरबानी उस जगह पर धियान दें जिसे इब्राहीम ने नाम दिया था जहाँ कि उसके बेटे को कुर्बान होना था।  तौरात के उस हिस्से को यहां बताया गया है ताकि आप उसे बराहे रास्त पढ़ सकें।

 13 इब्राहीम ने ऊपर दृष्टि की और एक मेढ़े को देखा। मेढ़े के सींग एक झाड़ी में फँस गए थे। इसलिए इब्राहीम वहाँ गया, उसे पकड़ा और उसे मार डाला। इब्राहीम ने मेढ़े को अपने पुत्र के स्थान पर बलि चढ़ाया। इब्राहीम का पुत्र बच गया। 14 इसलिए इब्राहीम ने उस जगह का नाम “यहोवा यिरे” [a] रखा। आज भी लोग कहते हैं, “इस पहाड़ पर यहोवा को देखा जा सकता है।”

पैदाइश 22:13-14

उस नाम पर धियान दें जो इब्राहीम (तौरात में “अब्रहाम”है) ने उस जगह के लिए दी।  उसने नाम दिया “खुदावंद मुहैया करेगा।”  क्या यह नाम माज़ी में है, हाल में या मुस्तक़बिल में? यह साफ़ ज़ाहिर है कि यह ज़माना -ए-मुस्तक़बिल में है। यहां तक कि इसकी शरह ज़ियादा साफ़ तब होजाता है जब आगे चलकर यह यकीन होजाता है कि (इसे मूसा (अलैहिस्सलाम) ने ठीक 500 साल बाद तौरात में इस बयान का ज़िकर किया) इस मुहावरे को दोबारा देखें “…. यह मुहैया किया जाएगा ” फिर से देखें कि यह ज़माना -ए- मुस्तक़बिल में है और मुस्तक़बिल की तरफ़ देखा जा रहा है।  बहुत से लोग सोचते हैं कि इब्राहीम उस मेंढे (एक नर भेड़) का हवाला दे रहा था जिस के सींग झाड़ी में अटके हुए थे और उस ने उस को पकड़ कर अपने बेटे के बदल में कुर्बान किया -मगर आप देखें कि इब्राहीम जब इस जगह का नाम रखता है तो उस से पहले ही मेंढा कुर्बान हो चुका था, मर चुका था, और जला दिया गया था -अगर इब्राहीम उस मेंढे की बाबत सोचता – जो पहले ही से मर चुका था , कुर्बान हो चुका था और जला दिया गया था। तो उस को नाम देना चाहिए था ‘खुदावंद ने मुहैया किया है ‘, मतलब यह कि माजी के ज़माने में -और मूसा (अलैहिस्सलाम) अगर वह मेंढे की बाबत सोचते जो इब्राहीम के बेटे की जगह ली थी, उसको भी तौरात में इस तरह ज़िकर करना चाहिए था, ”चुनांचि आज के दिन तक यह कहावत है कि ख़ुदावंद के पहाड़ पर मुहैया किया गया था।”’मगर इब्राहीम और मूसा दोनों ही इस नाम को ज़माना -ए- मुस्तक़बिल में पेश करते हैं।  इस लिए वह दोनों उस मरे हुए और कुर्बान किये हुए मेंढे की बाबत नहीं सोच रहे थे।

तो फिर वह किसकी बाबत सोच रहे थे? अगर हम एक सुराग़ पर गौर करते हैं तो हम देखते हैं कि इस निशानी के  के आग़ाज़ में अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम को जिस जगह पर जाने के लिए फ़रमाया था इसे हम 22 बाब की 2 आयत पाते हैं, जहां इसतरह लिखा है :

 “तब ख़ुदा ने अब्रहाम से कहा तू अपने बेटे इस्हाक़ को जो तेरा एकलोता है और जिसे तू प्यार करता हैसाथ लेकर मोरियाह के मुल्क में जा और वहां उसे पहाड़ों में से एक पहाड़ जो मैं तुझे बताऊंगा सोख्तानीकुर्ब्क्नी के तोर पर चढ़ा“

यह वाक़िया ‘मोरियाह’ के पहाड़ों में से एक पहाड़ पर हुई।  और वह कहां पर है? हालाँकि हज़रत इब्राहिम के ज़माने  (2000 क़बल मसीह) में वह एक बयाबान का इलाक़ा था मगर 1000 साल बाद (1000 क़बल मसीह) में मशहूर दाऊद बादशाह ने वहां पर येरूशलेम शहर को बसाया और उस के बेटे सुलेमान ने खुदावंद के लिए एक अज़ीमुश्शान मक्दिस (हैकल–ए-सुलेमानी) ता’मीर की – इसकी बाबत हम ज़बूर में पढ़ते हैं :

सुलैमान ने यहोवा का मन्दिर मोरिय्याह पर्वत पर यरूशलेम में बनाना आरम्भ किया। पर्वत मोरिय्याह वह स्थान है जहाँ यहोवा ने सुलैमान के पिता दाऊद को दर्शन दिया था। सुलैमान ने उसी स्थान पर मन्दिर बनाया जिसे दाऊद तैयार कर चुका था। यह स्थान उस खलिहान में था जो ओर्नान का था। ओर्नान यबूसी लोगों में से एक था।

2 तवारीख़ 3:1

दुसरे लफ़्ज़ों में मोरियाह का पहाड़ हज़रत इब्राहीम के ज़माने में (और बाद में हज़रत मूसा के ज़माने में) एक तनहा उंचाई पर बसा हुआ पहाड़ों से ढका हुआ बयाबान में वाक़े था। मगर 1000 साल बाद हज़रत दाऊद और सुलेमान के ज़माने में जब उनहोंने एक अज़ीमुश्शान हैकल (इबादत का घर) तामीर किया तो वह इस्राईल का मरकज़ी दारुल खिलाफ़ा बन गया- अब वह मौजूदा ज़माने में यहूदियों की मुक़द्दस इबादतगाह मानी जाती है।              

मोरियाह का पहाड़ ख़ुदावंद की तरफ़ से चुना गया था हज़रत इब्ररहीम की तरफ़ से नहीं। जिस तरह कुरान शरीफ़ के सूरा अल-जिन्ना (72) में हमें समझाया गया है :

और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न

करना(सूरा अल -जिन्ना 72 :18

जहाँ इस तरह लिखा है “इबादत के मक़ामात ख़ुदा की तरफ़ से चुने जाते हैं“ हम मा’लूम करेंगे कि इस मक़ाम को क्यूँ खुदा की तरफ़ से चुना गया था?

ईसा अल मसीह और मोरियाह पहाड़ पर उनकी क़ुर्बानी

और थां हम ईसा अल मसीह (अलैहिस्सलाम) और इंजील-ए- शरीफ़ से बराहे रास्त ताल्लुक़ को पाते हैं -हम इस ताल्लुक़ को उस वक़्त देखते हैं जब हम ईसा अल मसीह के कई एक अलक़ाब में से एक लक़ब को जानते हैं – ईसा अल मसीह को कई एक लक़ब से नवाज़ा गया था – शायद जो जाना पहचाना लक़ब था वह था “मसीह”- जिसे (मसीहा) भी कहा जाता है। मगर एक और दूसरा लक़ब भी है जो उसे दिया गया था – यह इतना जाना पहचाना नहीं है मगर यह बहुत ही अहम् है। इसको हम युहन्ना की इंजील में देखते हैं जिस में यहया नबी जिन्हें इंजील में युहन्ना इसतिबाग़ी कहा गया है कहते हैं :

29 अगले दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी तरफ आते देखा और कहा, “परमेश्वर के मेमने को देखो जो जगत के पाप को हर ले जाता है। 30 यह वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, ‘एक पुरुष मेरे पीछे आने वाला है जो मुझसे महान है, मुझसे आगे है क्योंकि वह मुझसे पहले विद्यमान था।

युहन्ना 1:29 -30

एक अहम्, मगर ईसा के लक़ब (अलैहिस्सलाम) में से कम जाना पहचाना जो उसे दिया गया था वह है ख़ुदा का बर्रा“अब हज़रत ईसा की ज़िन्दगी के आखरी दौर को देखें।  उन्हें कहां गिरफ्तार किया गया था और कहां पर उन्हें सलीबी मौत कि सज़ा सुनाई गई थी ? यह सब कुछ येरूशलेम में हुआ था।  और जहाँ सलीब दी गई थी वह ‘मोरयाह  का पहाड़’ ही था जिसे हम ने पिछले वाकिये में देखा था -उस की गिरफ़्तारी के वक्त इंजील में इस तरह कहा गया है :

 फिर जब उसको यह पता चला कि वह हेरोदेस के अधिकार क्षेत्र के अधीन है तो उसने उसे हेरोदेस के पास भेज दिया जो उन दिनों यरूशलेम में ही था।

लूका 23:7

दुसरे लफ़्ज़ों में कहा जाए तो हज़रत ईसा का गिरफ्तार होना, मुक़द्दमा और सलीबी मौत कि सज़ा का सुनाया जाना सब कुछ येरूशलेम में (= मोरयाह पहाड़) में वाक़े हुआ।

हज़रत इब्राहीम की तरफ़ चलें।  क्यूँ उसने उस जगह का नाम मुस्तक़बिल के ज़माने का रखा “खुदावंद मुहैया करेगा”? क्यूंकि वह एक नबी था और वह जानता था कि वहां पर कुछ न कुछ “मुहय्या” किया जाएगा और नाटकीय मंज़र में हज़रत इब्राहिम का बेटा आखरी वक़्त में बचा लिया जाता है, क्यूंकि एक मेंढा उस कि जगह पर मरता है। उसके ठीक 2000 साल बाद ईसा अल मसीह को ख़ुदा का बर्रा कहा जाता है – और उसी जगह पर उसकी गिरफ़्तारी होती है , और उसकी मौत की सज़ा सुनाई जाती है!

येरुस्शालेम में वाक़िआत की वक़्त की लकीर / मौरयाह पहाड़

   क़ुर्बानी ने इब्राहिम का मौत से  फ़िदया  दिया

क्या यह हमारे लिए ज़रूरी है।  मैं नोट करता हूँ कि किसतरह यह इब्राहिम की निशानी ख़त्म होती है। 37 सूरा का 107 आयत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बारे में कहता है कि :

  और हम ने एक निहायत अहम् क़ुरबानी के साथ फिदया दिया

लूका 23:7

“फ़िदया” देने का क्या मतलब है? एक फ़िदयादेने का मतलब है क़ीमत अदा करना किसी ऐसे शख्स के लिए जो क़ैद में है ताकि उस को क़ैद से छुटकारा मिल सके। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए फ़िदया दिए जाने मतलब है कि वह किसी तरह के क़ैद में था (जी हाँ यहाँ तक कि एक बड़ा नबी होने के बावजूद भी)! वह किस तरह कि क़ैद में था? यह उसके बेटे के साथ का मंज़र हमें दिखाता है- वह मौत का एक कैदी था -हालाँकि वह एक नबी था -फिर भी मौत ने उसको एक कैदी की तरह जकड़ रखा था। आदम की निशानी में हम ने देखा था कि अल्लाह ने आदम और उसकी औलाद को गुनाह के अंजाम बतोर (हरेक को — जिसमें नबी लोग भी शामिल थे) फ़ना पिज़ीर कर दिया था। अब वह सब के सब गुनाह के क़ैद में थे। मगर किसी तरह बर्रे की क़ुरबानी के इस ड्रामे में हज़रत इब्राहीम के लिए यह ‘फ़िदया’ साबित हुआ -अगर आप दोबारा से इन सिसिले वार निशानियों पर गौर करेंगे तो (आदम, क़ाईन और हाबील, नूह अब यहां इब्राहीम – इन सब की जिंदगियों में आप देखें कि यह लोग जानवर की क़ुरबानी से किस तरह जुड़े हुए हैं।  इस का मतलब यह है कि वह इस की बाबत कुछ न कुछ जानते थे कि यह उन को बचाएगा -और हम इब्राहीम के मामले में देख सकते हैं कि उस का यह अमल भी मुस्तक़बिल में हज़रत ईसा के ख़ुदा का बर्रा होने की तरफ़ इशारा करता है जो कि इब्राहीम से भी ताल्लुक़ रखता है।

क़ुरबानी : हमारे लिए बरकत का बाइस है

मौरयाह के पहाड़ पर मेंढे की क़ुरबानी हमारे लिए भी बहुत ज़ियादा अहमियत रखती है।  जब अदला बदली हुई तो उस वक़्त अल्लाह हज़रत इब्राहीम से कहता है कि :

 “….और तेरी नसल के वसीले से ज़मीन की सब कौमें बरकत पाएंगी क्यूंकि तूने मेरी बात मानकर उसपर  अमल किया”

पैदाइश 22 :18

अगर आप दुनिया की किसी भी ‘कौम’ से ताल्लुक़ रखते हैं (वैसे तो आप रखते ही हैं) तो यह आप से भी ताल्लुक़ रखता है,आप भी इस वायदे के हक़दार हैं क्यूंकि खुद अल्लाह ने यह वायदा आप के हक़ में किया है! क्या यह आप के लिए कीमती नहीं है! किसतरह इब्राहीम की कहानी का यह ताल्लुक़जो हज़रत ईसा से जुड़ाहुआ है किस तरह हमारे लिए बरकत का बाईस है? और क्यों? हम ने गौर किया था कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का फ़िदया हुआ था। और यह हमारे लिए भी एक इशारा है मगर इस के अलावा यह जवाब तय्यारी के साथ नुमायाँ नहीं है इसलिए हम को हज़रत मूसा की निशानी के साथ जारी रहना होगा (जो कि दो निशानियाँ हैं) और वह हमारे लिए इन सवालात को वाज़ेह करेंगे।

मगर एक लम्हे के लिए लफ्ज़ ‘नसल’ की तरफ़ इशारा करना चाहता हूँ जो यहाँ ‘नसल’ का लफ़ज़  वाहिद के सेगे में है।  यहां नस्लें नहीं लिखा गया है जिस तरह कई एक औलाद या लोगों में से होते हैं। एक बरकत का वायदा हज़रत इब्राहीम के एक ख़ास नसल के वसीले से था इसलिए यह वाहिद के सेगे में है न कि कई लोगों के वसीले से या लोगों की जमाअत से या’नी कि ‘उन से’ बल्कि “उस से”- आगे चल कर फ़सह जो मूसा की निशानी है इसे समझने में हमारी मदद करेगा।                          

इब्राहीम की 1 निशानी : बरकत

इब्राहीम! उसे अब्रहाम और अब्राम (अलै.) के नाम से भी जाना जाता है। वाहिद ख़ुदा पर ईमान रखने वाले तमाम तीनों मज़ाहिब यहूदियत, मसीहियत और इस्लाम उसके पीछे चलने के लिए एक नमूना पेश करती है। अरब के लोग और यहूदी मौजूदा ज़माने में उसके बेटे इश्माईल और इस्साक़ के जिस्मानी नसल के ज़रिये उसके नाम को बड़े एहतिमाम से लेते हैं। नबियों की क़तार में भी वह बहुत ही अहम् माने जाते हैं क्यूंकि उन के बाद के अंबिया उन्हीं की नसल से ताल्लुक़ रखते हैं। सो हम अब्रहाम (अलैहिस्सलाम) कि निशानी को कई एक हिस्सों में गौर करेंगे। उसकी पहली निशानी को कुरान शरीफ़ और तौरात शरीफ़ में पढने के लिए यहाँ पर किलिक करें

कुरान शरीफ़ से एक आयत में हम देखते हैं कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पीछे कई एक क़बीले वजूद में आए जिस से क़ौम के लोग पैदा हुए। इन लोगों के ज़रिये कई एक ‘बड़ी हुकूमतें’ क़ाइम हुईं। मगर लोगों के ‘क़बीले’ रुनुमा होने से पहले एक शख्स के पास कम अज़ कम एक बेटा तो ज़रूर होना चाहिए था और एक ‘बड़ी हुकूमत’ को शक्ल देने के लिए एक बड़ी जगह का होना भी ज़रूरी था।

इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के लिए वायदा

तौरेत की इबारत (पैदाइश 12:1।7) बताती है कि अल्लाह किसतरह ‘क़बीले’ और ‘बड़ी हुकूमत’ जो इब्राहीम (अलै.) से आने वाली थी अपने इस दोहरे तकमील को आशकारा करने जा रहा था। अल्लाह ने उसे एक वायदा दिया जो मुस्तकबिल के लिए एक बुन्याद था। आइये हम इसे तफ़सील के साथ मज़ीद नज़र।ए।सानी करें। हम देखते हैं कि अल्लाह इब्राहीम (अलै.) से कहता है :

2 “मैं तुम्हें एक महान राष्ट्र में बनाऊंगा,
और मैं तुम्हें आशीर्वाद दूंगा;
मैं तुम्हारा नाम महान कर दूंगा,
और आप एक आशीर्वाद होंगे।
3 मैं उन्हें आशीर्वाद दूंगा जो तुम्हें आशीर्वाद देते हैं,
और जो कोई तुम्हें शाप देगा, मैं शाप दे दूंगा;
और सभी लोग पृथ्वी पर हैं
आपके माध्यम से धन्य हो जाएगा।

   इब्राहीम (अलै.) की अज़मत

जहां मैं रहता हूँ वहाँ बहुत से लोग ताज्जुब करते हैं कि क्या कोई ख़ुदा है और कोई शख्स कैसे जान सकता है कि अगर उसने हक़ीक़त में खुद को तौरेत के वसीले से ज़ाहिर किया हो। यहां हमारे सामने एक वायदा है जिस के हिससों से हम सहीह साबित कर सकते हैं। इस मुकाश्फ़े का ख़ातमा कलमबंद करता है कि अल्लाह ने बराहे रास्त इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से वायदा किया कि “मैं तेरा नाम सरफ़राज़ करूंगा” हम 21 वीं सदी में बैठे हुए हैं और इब्राहीम/अब्रहाम/अब्राम का नाम तारीक़ में अलमगीर तोर से जाना पहचाना नामों में से एक है। यह वायदा ल्फ्ज़ी और तारीक़ी तोर से सच साबित होता है। तौरेत का सब से क़दीम नुसख़ा जो आज मौजूद है वह बहीरा।ए।मुरदार के तूमार में से है जिस की तारीक़ 200 -100 क़ब्ल मसीह है। इसका मतलब यह है कि यह वायदा ज़ियादा से ज़ियादा इसके लिखे जाने वक़्त से मौजूद है। उस ज़माने में इब्राहीम (अलै.) के नाम और शख्सियत को सहीह तोर से नहीं जाना जाता था सिवाए यहूदियों की अक़लियत के जो तौरेत के मानने वाले थे। मगर आज उसका नाम बहुत ऊँचा है। सो हम सही साबित कर सकते हैं कि एक तकमील तभी पूरी होती है जब उसे लिखा जाता है, उससे पहले नहीं।

इब्राहीम (अलै.) के लिए वायदे का यह हिस्सा यक़ीनी तोर से वाक़े हुआ यहाँ तक कि ग़ैर ईमानदारों के लिए ज़रूरी था और यहाँ तक कि यह हआरे लिए अल्लाह का वायदा जो इब्राहीम (अलै.) के लिए है उसके बाक़ी हिस्से को समझने के लिए ज़ियादा यकीन दिलाता है। सो आइये हम इस मुताला को जारी रखें।

हमारे लिए बरकत

फिर से हम इब्राहीम (अलै.) की तरफ़ से एक बड़ी क़ौम के बरपा होने के वायदे को देखते हैं जो खुद इब्राहीम (अलै.) के लिए बाईस ए बरकत है। मगर इस के अलावा और भी कुछ है यह बरकत सिर्फ़ इब्राहीम (अलै.)के लिए ही नहीं है क्यूंकि यह इबारत कहती है “ज़मीन की तमाम कौमें तेरे वसीले से बरकत पाएंगीं” (यानी इब्राहीम अलै. के वसीले से)। यह मेरे और आप के लिए गौर करने की बात है क्यूंकि आप और मैं ‘ज़मीन के तमाम लोगों का’ एक हिस्सा हैं। इससे कुछ फ़रक नहीं पड़ता कि हम किस मज़हब से ताल्लुक रखते हैं, हमारी नसल की गोशा ।ए। गुमनामी क्या है, हम कहां रहते हैं, हमारी तहज़ीबी रुतबा क्या है, या हम कौनसी ज़बान बोलते हैं वगैरा। यह वायदा हर एक के लिए है जो आज ज़िन्दा मौजूद हैं। यह वायदा आपके और मेरे लिए है। हालांकि हमारे फ़रक़ फ़रक़ मज़ाहिब, नसल बतोर गोशा।ए।गुम्नामियाँ और ज़बानें अक्सर लोगों को तकसीम करते और मुख़ालिफ़त का सबब बनाते हैं। मगर यह ऐसा वायदा है जो इन बातों पर ग़ालिब आता नज़र आता है जो आम तोर से हमको तक़सीम करता है। किस तरह? कब? किस तरह की बरकतें? यह इस मुद्दे पर साफ़ नहीं करता। मगर इस निशानी ने एक वायदे को जन्म दिया है जो इब्राहीम (अलै.) के वसीले से आपके और मेरे लिए है। जबकि हम जानते हैं कि इस वायदे का एक हिस्सा सच साबित हुआ है और हम भरोसा कर सकते हैं कि दूसरा हिस्सा जो हम पर नाफ़िज़ होता है वह भी साफ़ हो जाएगावह भी लफ्ज़ी तकमील बतोर – हमें इस को खोलने के लिए सिर्फ़ इसकी कुन्जी को ढूंढना ज़रूरी है।

हम इस बात पर गौर कर सकते हैं कि जब इब्राहीम (अलै.) ने इस वायदे को हासिल किया तो वह अल्लाह का फरमान बरदार हुआ और ….

“सो अब्राम खुदावंदके कहने के मुताबिक चल पड़ा”

पैदाइश 12:4

      इब्राहीम (अलै.) की हिजरत

ऊर से ।।> हारान ।।>कनान का मुल्क

http://al-injil.net/wp-content/uploads/2012/06/map-of-abrahams-journey.jpg

                                            

वायदा किया हुआ मुल्क में पहुँचने के लिए यह सफ़र कितना लम्बा था? यहाँ पर यह नक्शा इब्राहीम (अलै.) के सफ़र को दिखता है। वह असल में ऊर (मौजूदा जुनूबी इराक़) में रहता था। फिर वह हारान (मौजूदा शुमाली इराक़) में आया ।फिर उसने अपने ज़माने के कनान कि तरफ़ सफ़र किया। नक्शे में आप देख सकते हैं कि यह बहुत लम्बा सफ़र था। उसको ऊँट घोड़ा या गधे पर सवार होकर सफ़र करना था। सो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इस सफ़र को अंजाम देने में कई एक महीने लगे होंगे जब अल्लाह कि बुलाहट हुई तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने ख़ानदान को छोड़ा। अपनी ऐशो इशरत की ज़िन्दगी को छोड़ा जिसे वह मसोपतामिया में रहकर गुज़ारा करता था। मौजूदा मसोपतामिया उस ज़माने में ख़ास तहज़ीब ।ओ। तमद्दुन का मरकज़ था। उसकी मुहाफ़ज़त को लेकर और जो कुछ उसके इस सफ़र से मुताल्लिक़ मशहूर है वह यह है कि जिस तरफ़ वह सफ़र कर रहा था वह उस के लिए बिलकुल बेगाना था। जब वह अपनी मंजिल पर पहुंचा तो तोरेत हम से कहती है कि उस वक़्त उस की उम्र 75 साल कि थी!

पेश्तर नबियों की तरह जानवरों की कुर्बानियां

तौरेत हम से यह भी कहती है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) हिफाज़त से जब कनान में पहुंचे:

“तो उसने खुदावंद के लिए एक मज़बह बनाया”

पैदाइश 12:7

एक मजबह वह है जहां हाबील और नूह (अलैहिस्सलाम) ने इस से पहले क़ुर्बानी अदा की थी। उन्होंने अल्लाह के लिए जानवरों के खून की क़ुर्बानी दी। हम देखते हैं कि नबियों ने किस तरह अल्लाह की इबादत की थी उसका यह एक नमूना था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उस नए मुल्क में दाखिल होने और सफ़र करने के लिएअपनी ज़िन्दगी के आखरी अय्याम में जोखिम उठाया था। मगर ऐसा करने के लिए उसने खुद को अल्लाह के वायदे के हाथों में सोंप दिया था ताकि खुद के लिए और दीगर तमाम लोगों के लिए बरकत का बाइस बने। और इसी लिए वह हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है। हम इब्राहीम की अगली निशानी नम्बर 2 के साथ इस मुताले को जारी रखते हैं।