हज़रत यूसुफ़ कौन था? उसका निशान क्या था

सूरा यूसुफ़ (सूरा 12 – यूसुफ़) नबी हज़रत यूसुफ़/जोसेफ़  की कहानी कहती है । नबी हज़रत यूसुफ़ हज़रत याक़ूब (जैकब) के बेटे थे , और हज़रत याक़ूब हज़रत इसहाक़ के बेटे थे , और हज़रत इसहाक़ नबी हज़रत इब्राहीम (अबराहाम) के बेटे थे । हज़रत याकूब के 12 बेटे थे , उन में से एक हज़रत यूसुफ़ थे । हज़रत याक़ूब यूसुफ़ को दीगर बेटों से ज़ियादा चाहते थे इस सबब से यूसुफ़ के 11 भाइयों ने उसके खिलाफ साज़िश की और उसके ख़िलाफ़ में जो उन्हों ने मनसूबा बांधा था यूसुफ़ की कहानी का एक रूप ले लिया । इस कहानी को हज़रत मूसा की तौरात में पहली बार 3500 साल पहले लिखा गया था । तौरात शरीफ़ से इस का पूरा बयान यहाँ पर है । और सूरा यूसुफ़ (सूरा 12 यूसुफ़) का बयान यहाँ पर है । सूरा यूसुफ़ हम से कहता है यह सिर्फ़ मामूली कहानी नहीं है बल्कि       

(ऐ रसूल) यूसुफ और उनके भाइयों के किस्से में पूछने वाले (यहूद) के लिए (तुम्हारी नुबूवत) की यक़ीनन बहुत सी निशनियाँ हैं ।

सूरए यूसुफ़ 12:7

कहानी में यूसुफ़ और उसके भाई मुतालाशियों के लिए कौन सी ‘निशानियाँ’ हैं ? हम इस कहानी को तौरात शरीफ़ और सूरा यूसुफ़ दोनों से नज़रे सानी करते हैं ताकि इन ‘निशानियों’ को समझ सकें ।   

सामने सिजदा करना  ….?

एक साफ़ निशानी वह ख़ाब है जो यूसुफ़ ने अपने बाप हज़रत याक़ूब से कही जहां  

(वह वक़्त याद करो) जब यूसूफ ने अपने बाप से कहा ऐ अब्बा मैने ग्यारह सितारों और सूरज चाँद को (ख़्वाब में) देखा है मैने देखा है कि ये सब मुझे सजदा कर रहे हैं।

सूरए यूसुफ़ 12:4

कहानी के आख़िर में हम हक़ीक़त में देखते हैं कि

(ग़रज़) पहुँचकर यूसुफ ने अपने माँ बाप को तख़्त पर बिठाया और सब के सब यूसुफ की ताज़ीम के वास्ते उनके सामने सजदे में गिर पड़े (उस वक़्त) यूसुफ ने कहा ऐ अब्बा ये ताबीर है मेरे उस पहले ख़्वाब की कि मेरे परवरदिगार ने उसे सच कर दिखाया बेशक उसने मेरे साथ एहसान किया जब उसने मुझे क़ैद ख़ाने से निकाला और बावजूद कि मुझ में और मेरे भाईयों में शैतान ने फसाद डाल दिया था उसके बाद भी आप लोगों को गाँव से (शहर में) ले आया (और मुझसे मिला दिया) बेशक मेरा परवरदिगार जो कुछ करता है उसकी तद्बीर खूब जानता है बेशक वह बड़ा वाकिफकार हकीम है

सूरए यूसुफ़ 12:100

पूरे क़ुरान शरीफ़ में सजदा करने को बहुत बार ज़िकर किया गया है । मगर वह सारे सजदे दुआ (नमाज़ या इबादत) में क़ादिरे मुतलक़ खुदा के सामने , का’बा में या अल्लाह के मोजिज़ों के सामने (जैसे मिसर के जादूगरों और हज़रत मूसा) के बीच जो करामात हुए इन के लिए सजदा करने का हवाला दिया गया है । मगर यहाँ एक मुसतस्ना वाली बात है कि एक आदमी (यूसुफ़) के सामने ‘सजदा करना’। एक दूसरा हूबहू वाक़िया उस वक़्त का है जब फ़रिश्तों को हुक्म दिया गया था कि हज़रत आदम के सामने सजदा करें । (सूरा ता-हा 116 और सूरा अल आराफ़ 11) । मगर फ़रिश्ते इनसान नहीं थे , और एक आम दस्तूर (क़ाइदा) यह कहता है कि बनी इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदावंद को ही सजदा करे ।        

और तमाम उमूर की रूजूअ खु़दा ही की तरफ होती है ऐ ईमानवालों रूकू करो और सजदे करो और अपने परवरदिगार की इबादत करो और नेकी करो ।

सूरए अल हज 22:77

हज़रत यूसुफ़ की बाबत क्या मुस्तस्ना थी कि हज़रत याक़ूब जो उनके वालिद थे , उनकी वालिदा और उनके भाइयों ने यूसुफ़ के सामने सजदा किया ?

इब्न आदम

वक़्त की लकीर नबी हज़रत दानिएल और दीगर ज़बूर के नबियों को दिखा रहा है  

इसी तरह बाइबिल में हमको हुक्म दिया गया है कि इबादत में या खुदावंद के आगे सजदा करें मगर यहाँ पर भी एक इस्तिसना की बात है । नबी हज़रत दानिएल ने एक एक रोया हासिल करी थी जो वक़्त से बहुत बहुत आगे नज़र आ रही थी कि खुदा की बादशाही का क़ायम किया जाना था और उसके रोया में उसने ‘इब्न आदम’ को देखा था ।    

13 मैं ने रात में स्वप्न में देखा, और देखो, मनुष्य के सन्तान सा कोई आकाश के बादलों समेत आ रहा था, और वह उस अति प्राचीन के पास पहुंचा, और उसको वे उसके समीप लाए।
14 तब उसको ऐसी प्रभुता, महिमा और राज्य दिया गया, कि देश-देश और जाति-जाति के लोग और भिन्न-भिन्न भाषा बालने वाले सब उसके आधीन हों; उसकी प्रभुता सदा तक अटल, और उसका राज्य अविनाशी ठहरा॥

दानिएल 7:13-14

रोया में लोग ‘इब्न आदम’ के सामने सजदा करते हैं , जिस तरह से हज़रत यूसुफ़ का ख़ानदान हज़रत यूसुफ़ के सामने सजदा कर रहे थे ।  

‘इब्न आदम’ एक लक़ब है जो नबी हज़रत ईसा अल मसीह ने अक्सर अपने लिए इस्तेमाल किया था । उसने जब वह ज़मीन पर चलता था तालीम देने में , मरीज़ों को शिफ़ा देने में , क़ुदरत पर इख्तियार जताने में अपने बड़े इख़तियार का किरदार निभाया था । मगर वह उन दिनों में ‘आसमान के बादलों पर’ नहीं आया था जिस तरह से हज़रत दानिएल के रोया की पेशीन गोई की गयी है । यह इसलिए कि वह रोया आगे को मुस्तक़बिल की तरफ देखा जा रहा था माज़ी में उसकी पहली आमद से लेकर दूसरी आमद तक – और फिर वापस ज़मीन पर लौटने में ताकि दज्जाल को ख़तम करे उसे आना ज़रूरी था (जिसतरह हज़रत आदम को पहले से ही बताया गया था) और खुदा की बादशाही को क़ायम करनी थी ।

उनकी पहली आमद कुंवारी मरयम से पैदा होना लोगों को छुटकारा देने के लिए था ताकि खुदा की बादशाही के शहरी बन सके । मगर इस के बावजूद भी उसने नबुवत की कि किसतरह इब्न व् आदम अपनी दूसरी आमद में बादलों पर अपने लोगों को दुसरे लोगों से जुदा करेगा । उसने पेशे नज़र की कि तमाम कौमें उसके सामने सजदा कर रहे हैं जिसतरह यूसुफ़ के भाई खुद से यूसुफ़ के सामने सजदा किये थे । यहाँ वह बातें हैं जो मसीह ने तालीम दी थी ।

  31 जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्ग दूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिहांसन पर विराजमान होगा।
32 और सब जातियां उसके साम्हने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकिरयों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा।
33 और वह भेड़ों को अपनी दाहिनी ओर और बकिरयों को बाई और खड़ी करेगा।
34 तब राजा अपनी दाहिनी ओर वालों से कहेगा, हे मेरे पिता के धन्य लोगों, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिये तैयार किया हुआ है।
35 क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी पिलाया, मैं पर देशी था, तुम ने मुझे अपने घर में ठहराया।
36 मैं नंगा था, तुम ने मुझे कपड़े पहिनाए; मैं बीमार था, तुम ने मेरी सुधि ली, मैं बन्दीगृह में था, तुम मुझ से मिलने आए।
37 तब धर्मी उस को उत्तर देंगे कि हे प्रभु, हम ने कब तुझे भूखा देखा और खिलाया? या प्यासा देखा, और पिलाया?
38 हम ने कब तुझे पर देशी देखा और अपने घर में ठहराया या नंगा देखा, और कपड़े पहिनाए?
39 हम ने कब तुझे बीमार या बन्दीगृह में देखा और तुझ से मिलने आए?
40 तब राजा उन्हें उत्तर देगा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया।
41 तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, हे स्रापित लोगो, मेरे साम्हने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है।
42 क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को नहीं दिया, मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी नहीं पिलाया।
43 मैं परदेशी था, और तुम ने मुझे अपने घर में नहीं ठहराया; मैं नंगा था, और तुम ने मुझे कपड़े नहीं पहिनाए; बीमार और बन्दीगृह में था, और तुम ने मेरी सुधि न ली।
44 तब वे उत्तर देंगे, कि हे प्रभु, हम ने तुझे कब भूखा, या प्यासा, या परदेशी, या नंगा, या बीमार, या बन्दीगृह में देखा, और तेरी सेवा टहल न की?
45 तब वह उन्हें उत्तर देगा, मैं तुम से सच कहता हूं कि तुम ने जो इन छोटे से छोटों में से किसी एक के साथ नहीं किया, वह मेरे साथ भी नहीं किया।
46 और यह अनन्त दण्ड भोगेंगे परन्तु धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे।

मत्ती 25:31-46

हज़रत यूसुफ़ और हज़रत ईसा अल मसीह

मुस्तस्ना के साथ जो दीगर बनी आदम जो अपने खुद के सामने सजदा करेंगे , हज़रत यूसुफ़ और हज़रत ईसा अल मसीह भी हूबहू इन्हीं नमूने के वाक़ियात से गुज़रे ।  ज़ेल के ख़ाके में ग़ौर करें कि उन दोनों की जिंदगियां किन किन तरीक़ों से मुशाबहत रखती थीं ।  

हज़रत यूसुफ़ की जिंदगी में वाक़ियात  हज़रत ईसा अल मसीह की जिंदगी में वाक़ियात
उसके भाई जो इसराईल के 12 क़बीले बन कर उभरे , उन्हों ने यूसुफ़ से नफरत की और और उसका इनकार किया  यहूदी लोग उन्ही क़बीलों से निकले एक क़ौम होने पर भी ईसा अल मसीह से नफ़रत की और उसको मसीहा होने से इनकार भी किया   
यूसुफ़ अपने भाइयों के मुस्तक़बिल के सजदे का एलान इस्राईल (याकूब) से करता है (याक़ूब का नाम खुदा के ज़रिये दिया गया था) ईसा अल मसीह अपने भाइयों की मुस्तक़बिल के सजदे की बाबत (अपने ज़ाती भाइयों) इस्राईल से पेश बीनी करते हैं (मरक़ुस 14:62)  
यूसुफ़ को उसके बाप याक़ूब के ज़रिये उसके भाइयों के पास भेजा जाता है मगर वह उसका इनकार कर उसके खिलाफ़ साज़िश करते हैं कि  उसकी जान ले ले  हज़रत ईसा अल मसीह को उसके बाप के ज़रिये अपने यहूदी भाइयों के पास भेजा गया “मगर उसके अपनों ने उसे कबूल नहीं किया”(युहन्ना 1:11) और उन्हों ने “उसकी जान लेने के  लिए उसके खिलाफ़ साज़िश की”(युहन्ना 11:53)    
उन्हों ने उसको ज़मीन के एक गढ़े में फ़ेंक दिया हज़रत ईसा अल मसीह ज़मीन के अन्दर आलमे अर्वाह में गए      
यूसुफ़ को बेचा गया और ग़ैर मुल्की सौदागरों के हाथों सोंपा गया ईसा अल मसीह को बेचा गया और ग़ैर क़ौमों के हाथों उस का काम तमाम करने के लिए सोंपा गया
उसको अपने मक़ाम से बहुत दूर ले जाया गया ताकि उसके भाइयों और बाप के ज़रिये मरा हुआ समझा जाए बनी इस्राईल और उसके यहूदी भाइयों ने सोचा कि ईसा अल मसीह का वजूद नहीं रहा औ अब वह मर गए हैं  
यूसुफ़ ने एक ख़ादिम की तरह खुद को हलीम किया     ईसा अल मसीह ने एक खादिम की सूरत इख्तियार की और इतना हलीम किया कि सलीबी मौत तक सह लिया (फ़िलि-2:7)  
यूसुफ़ पर गुनाह का झूठा इलज़ाम लगाया गया  यहूदियों ने अल मसीह पर “कई तरह के झूठे इलज़ाम लगाए” (मरक़ुस 15:3)  
यूसुफ़ को क़ैद में एक गुलाम की तरह भेजा जाता है जहां से वह पहले से ही कुछ क़ैदियों के तहख़ाने की तार्रीकी से आज़ाद किये जाने की पेशबीनी करता है (नान बाई)     हज़रत ईसा अल मसीह को भेजा गया था कि शिकस्ता दिलों को तसल्ली दे , क़ैदियों के लिए रिहाई और असीरों के लिए आज़ादी का एलान करे ….(यसायाह 61:1)
यूसुफ़ को मिस्र के तख़्त पर बिठाया गया और उसे मिसर के कुल इख्तियारत से नवाज़ा गया जो सिर्फ़ फ़िरोन को हासिल थे । जो लोग उसके सामने से गुज़रते थे उसको सिजदा करते थे ।    “इसी वास्ते खुदा ने भी उसे (मसीह को) बहुत सर बुलंद किया और उसे वह नाम बख्शा जो सब नामों से आला है ताकि येसू के नाम पर हर एक घुटना टिके ख्वाह आस्मानियों का हो ख्वाह ज़मिनियों का ख्वाह उनका जो ज़मीन  के निचे हैं ….(फ़ि लिप्पियों 2:10 -11)   
उसके भाइयों की तरफ़ से जबकि अभी भी इनकार किया गया था और मरा हुआ समझा गया था , क़ौमें अनाज के लिए यूसुफ के पास आती थीं की वह रोटी मुहैया करे ।     मस्लूबियत के बाद जबकि उसको मरा हुआ समझ कर अपने ज़ाती भाइयों से इनकार किया गया कौमें ईसा अल मसीह के पास जिंदगी की रोटी के लिए आती हैं और सिर्फ़ वही अकेला उन्हें वह रोटी मुहैया कर सकता है ।
यूसुफ़ अपने धोका दिए जाने की बाबत अपने भाइयों से कहता है (पैदाइश 50 20) ईसा अल मसीह कहते हैं अपने यहूदी भाई के ज़रिये धोका दिया जाना यह खुदा की मर्ज़ी के मुताबिक है जिस से बहुत सी जिंदगियां बचाई जाएंगी (युहन्ना 5:24)  
उसके भाई और क़ौमें यूसुफ़ के सामने सिजदा करती हैं इब्न आदम की बाबत दानिएल की नबुवतें कहती हैं कि “तमाम कौमें और हर ज़बान के लोग उसकी इबादत करेंगे “।

कई नमूने — कई निशानियां

तौरात शरीफ़ से तक़रीबन तमाम क़दीम अंबिया की जिंदगियां नबी हज़रत हज़रत ईसा अल मसीह के नमूने पर क़ा इम थीं – इन नमूनों को उनकी आमद से सदियों साल पहले क़ायम किया गया था । इसको इस तरह किया गया गया था ताकि हम को यह ज़ाहिर करे कि मसीह की आमद हक़ीक़त में खुदा के मनसूबे के मुताबिक था । यह कोई इंसानी ख़याल के मुताबिक़ नहीं था क्यूंकि बनी इंसान पहले से ही मुस्तक़बिल की बातों को नहीं जानता ।

हज़रत आदम से शुरू करते हुए , जिसमें मसीह की बाबत पेश बीनी की गयी थी । बाइबिल कहती है कि हज़रत आदम

…एक नमूना बतोर हैं उस एक् के जो आने वाला था (मिसाल बतोर हज़रत ईसा अल मसीह) 

रोमियों 5:14

हालाँकि यूसुफ़ अपने भाइयों की तरफ़ से सजदे कबूल करना ख़तम करता है , यह एक इनकारी है ,क़ुरबानी और अपने भाइयों की तरफ़ से बेगानगी यही थे जो उसकी जिंदगी में ज़ोर दिया गया । और इस अहमियत को मसीह की क़ुरबानी में भी नबी हज़रत इबराहीम की क़ुरबानी के साथ देखा गया है । यूसुफ के बाद हज़रत याकूब के बारह बेटे इस्राईल के बारह क़बीले बन जाते हैं और नबी हज़रत मूसा के ज़रिये मिसर में रहनुमाई किये जाते हैं । और जिस तरीक़े से हज़रत मूसा ने रहनुमाई की और बनी इस्राईल ने क़ुरबानियों को अंजाम दिया वह सब नबी हज़रत ईसा अल मसीह की क़ुरबानी का एक नमूना और पेश बिनी की तफ़सील थी । दरअसल तौरात में निशानियों की तफ़सीलें हैं जो मसीह के आने के सदियों पहले लिखी गयी थीं । इसके अलावा ज़बूर और दीगर नबियों की किताबें भी मुस्तक़बिल की तफसीलें थीं जो मसीह के आने के सदियों साल पहले लिखे गए थे । इन में दुःख उठाने वाले ख़ादिम की नबुवत जिसे इनकारी के साथ ज़ोर दिया गया है । जबकि कोई भी बनी इंसान सदियों साल बाद होने वाली मुस्तक़बिल को नहीं मालूम कर सकता इन नबियों को इन की तफसील की बाबत कैसे इल्म हुआ जब तक कि खुदा के ज़रिये इल्हाम नहीं दिया गया था ? अगर उन्हें खुदा के ज़रिये इल्हाम दिया गया था तो ईसा अल मसीह की इनकारी और उनकी क़ुरबानी भी खुदा के मनसूबे में ज़रूर शामिल थी ।        

इन नमूनों या नबुवतों में से अक्सर मसीह की पहली आमद ताल्लुक़ रखते हैं जहाँ उसने खुद को पेश किया ताकि हम अपने गुनाहों से छुड़ाये जा सकें और खुदा की बादशाही में दाखिल होने के क़ाबिल हो सकें ।      

मगर यूसुफ़ का नमूना भी बहुत आगे चलकर नज़र आता है जब बादशाही को पहल दिया जाएगा और ईसा अल मसीह ज़मीन पर लौटने के वक़्त तमाम क़ौमें उसके सामने सजदा करेंगी । जबकि हम अभी आज के ज़माने में ऐसे वक़्त में जी रहे हैं जब हमको ख़ुदा की बादशाही के लिए दावत दी जा रही है , तो उस बेवकूफ़ शख्स की मानिन्द न बनें जो सूरा अल – मिराज में ज़िक्र किया गया है जिसने एक छुड़ाने वाले की खोज करने में देर लगादी और इन्साफ़ के दिन तक का इंतज़ार किया – और वह बहुत देर हो चुकी थी । सो आप के लिए मसीह की ज़िन्दगी की पेश कश की बाबत अभी और ज़ियादा सीखें ।      

मसीह ने सिखाया कि उसकी दूसरी आमद इस तरह से वाक़े होगी 

ब स्वर्ग का राज्य उन दस कुंवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं।
2 उन में पांच मूर्ख और पांच समझदार थीं।
3 मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया।
4 परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया।
5 जब दुल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊंघने लगीं, और सो गई।
6 आधी रात को धूम मची, कि देखो, दूल्हा आ रहा है, उस से भेंट करने के लिये चलो।
7 तब वे सब कुंवारियां उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं।
8 और मूर्खों ने समझदारों से कहा, अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझी जाती हैं।
9 परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया कि कदाचित हमारे और तुम्हारे लिये पूरा न हो; भला तो यह है, कि तुम बेचने वालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो।
10 जब वे मोल लेने को जा रही थीं, तो दूल्हा आ पहुंचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ ब्याह के घर में चलीं गई और द्वार बन्द किया गया।
11 इसके बाद वे दूसरी कुंवारियां भी आकर कहने लगीं, हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे।
12 उस ने उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच कहता हूं, मैं तुम्हें नहीं जानता।
13 इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम न उस दिन को जानते हो, न उस घड़ी को॥
14 क्योंकि यह उस मनुष्य की सी दशा है जिस ने परदेश को जाते समय अपने दासों को बुलाकर, अपनी संपत्ति उन को सौंप दी।
15 उस ने एक को पांच तोड़, दूसरे को दो, और तीसरे को एक; अर्थात हर एक को उस की सामर्थ के अनुसार दिया, और तब पर देश चला गया।
16 तब जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने तुरन्त जाकर उन से लेन देन किया, और पांच तोड़े और कमाए।
17 इसी रीति से जिस को दो मिले थे, उस ने भी दो और कमाए।
18 परन्तु जिस को एक मिला था, उस ने जाकर मिट्टी खोदी, और अपने स्वामी के रुपये छिपा दिए।
19 बहुत दिनों के बाद उन दासों का स्वामी आकर उन से लेखा लेने लगा।
20 जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने पांच तोड़े और लाकर कहा; हे स्वामी, तू ने मुझे पांच तोड़े सौंपे थे, देख मैं ने पांच तोड़े और कमाए हैं।
21 उसके स्वामी ने उससे कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।
22 और जिस को दो तोड़े मिले थे, उस ने भी आकर कहा; हे स्वामी तू ने मुझे दो तोड़े सौंपें थे, देख, मैं ने दो तोड़े और कमाएं।
23 उसके स्वामी ने उस से कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।
24 तब जिस को एक तोड़ा मिला था, उस ने आकर कहा; हे स्वामी, मैं तुझे जानता था, कि तू कठोर मनुष्य है, और जहां नहीं छीटता वहां से बटोरता है।
25 सो मैं डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया; देख, जो तेरा है, वह यह है।
26 उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, कि हे दुष्ट और आलसी दास; जब यह तू जानता था, कि जहां मैं ने नहीं बोया वहां से काटता हूं; और जहां मैं ने नहीं छीटा वहां से बटोरता हूं।
27 तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रुपया सर्राफों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता।
28 इसलिये वह तोड़ा उस से ले लो, और जिस के पास दस तोड़े हैं, उस को दे दो।
29 क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा: परन्तु जिस के पास नहीं है, उस से वह भी जो उसके पास है, ले लिया जाएगा।
30 और इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धेरे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।

मत्ती 25:1-30